दर्पण तथा उनके प्रकार : Mirror

दर्पण तथा उनके प्रकार : Mirror

दर्पण तथा उनके प्रकार : Mirror

Q1= किसी समतल सतह के लंबवत पड़ने वाले किरण हमेशा
A अपनी दिशा में पुनः लौट जाती है✔
B अभिलंब के लंबवत हो जाती है
C शून्य के अतिरिक्त थीटा डिग्री के कोण पर मुड़ती है
D उपरोक्त में से कोई नहीं

व्याख्या:- किसी समतल सतह के लंबवत पड़ने वाले किरण हमेशा अपनी दिशा में पुनः लौट जाती है

Q2 =आपतित किरण परावर्तित किरण और अभिलंब सदैव
A द्वीअक्षीय होते हैं✔
B त्रिअक्षीय होती है
C एक ही अक्ष में बनते हैं
D उपरोक्त में से कोई नहीं

व्याख्या:- आपतित किरण परावर्तित किरण और अभिलंब द्वीअक्षीय होते हैं

Q3 अवतल दर्पण (Concave mirror) के अंदर प्रतिबिंब देखने के लिए वस्तु को कहां रखा जाता है
A फोकस तथा ध्रुव के मध्य✔
B फोकस तथा प्रकाश केंद्र के मध्य
C कहीं भी रखें प्रतिबिंब दर्पण के अंदर ही तैयार होगा
D अनंत पर

व्याख्या:- क्योंकि फोकस और ध्रुव के मध्य रखने पर वस्तु का आभासी प्रतिबिंब दर्पण के पीछे बनता है जो दर्पण के अंदर दिखाई देता है

Q4 निम्नलिखित में से किस प्रकाशिक यंत्र में वस्तु का सीधा वस्तु के समान तथा समान दूरी पर प्रतिबिंब प्राप्त होता है
A उत्तल लेंस तथा अवतल दर्पण( Convex lens and concave mirror)
B अवतल लेंस तथा उत्तल दर्पण( Concave lens and convex mirror)
C उत्तल दर्पण ( Convex mirror)
D उपरोक्त में से कोई नहीं✔

व्याख्या:- वस्तु के समान आकृति का वस्तु के समान दूरी पर सीधा प्रतिबिंब केवल समतल दर्पण में प्राप्त होता है

Q5= एक वायु का बुलबुला जल में किस प्रकार व्यवहार करेगा
A गोलाकार लेन्स की तरह
B अवतल लेन्स की तरह ✔
C उत्तल लेन्स की तरह
D कांच के टुकडे की तरह

व्याख्या:- क्योंकि कोई कम अपवर्तनांक की वस्तु जब अधिक अपवर्तनांक के द्रव में होती है तो वह उल्टे लेंस की तरह कार्य करती है

प्रश्न 6 = परवलयाकार दर्पण का उदाहरण है
A गोलीय दर्पण(Spherical mirror)✔
B अवतल दर्पण(Concave mirror)
C उत्तल दर्पण(Convex mirror)
D समतल दर्पण(Plane mirror)

व्याख्या:- दोनों ही प्रकार के दर्पण गोलाकार आकृति के होते हैं और गोलाकार मुड़ी हुई आकृति को परवलयाकार आकृति भी कहते हैं

Q7 = पूर्ण आंतरिक परावर्तन की घटना निम्नलिखित में से किससे हो सकती है
A जब किरण वायु से बारिश के जल की बूंद में प्रवेश करती है
B जब किरण बारिश की बूंद से वायु में प्रवेश करने की कोशिश करती है✔
C दर्पण तथा परावर्तक सतह द्वारा
D उपरोक्त सभी

व्याख्या:- जब किरण बारिश की बूंद से वायु में प्रवेश करने की कोशिश करती है

प्रश्न8 = निम्नलिखित में से पूर्ण आंतरिक परावर्तन के बारे में सत्य कथन है
1 यह तभी उत्पन्न होता है जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाता है
2 यह तब उत्पन्न होता है जब आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक हो जाता है
3 पूर्ण आंतरिक परावर्तन में संपूर्ण प्रकाश का परावर्तन हो जाता है

A केवल प्रथम दो कथन सत्य है
B केवल अंतिम दो कथन सत्य हैं
C तीनों कथन सत्य है✔
D प्रथम तथा अंतिम कथन सत्य है

व्याख्या:- पहले दो कथन पूर्ण आंतरिक परावर्तन की शर्ते हैं तथा तीसरा कथन पूर्ण आंतरिक परावर्तन का गुण है

Q9 निम्नलिखित कथनों पर विचार करें और सत्य कथन की पहचान करें
1 मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली किरणें दर्पण से परावर्तन के पश्चात मुख्य फोकस से गुजरती हैं
2 जो किरणें वक्रता केंद्र से जाती हैं वह उसी दिशा में वापस मुड़कर चली जाती है

A दोनों कथन सत्य है✔
B केवल कथन 1 सत्य है
C केवल कथन 2 सत्य है
D ना कथन 1 और ना ही कथन 2 सत्य हैं

व्याख्या:- गोलीय दर्पण में प्रतिबिंब बनने के कुल 4 नियम है
1 जब किरण मुख्य अक्ष के समांतर आती है तो परावर्तन के बाद मुख्य फोकस से गुजरती है अथवा आती हुई प्रतीत होती है
2 जब किरण मुख्य फोकस से आती है तो मुख्य अक्ष के समांतर हो जाती है
3 जो किरण ध्रुव से टकराती हैं वह उतना ही कोण बना कर निकल जाती है
4 जो किरण वक्रता केंद्र से गुजरती है वह पुनः उसी दिशा में लौट आती है

Q10 = एक बच्चा एक जादुई दर्पण के सामने खड़ा है वह अपना सर छोटा धड़ उसी आकार का तथा पैरों को बढ़ा महसूस करता है ऊपर से नीचे दर्पणओं का क्रम है
A समतल अवतल उत्तल
B समतल उत्तल अवतल
C उत्तल समतल अवतल✔
D उत्तल अवतल समतल

व्याख्या:- उत्तल दर्पण में सदैव वस्तु का छोटा और सीधा प्रतिबिंब प्राप्त होता है
समतल दर्पण में वस्तु का समान तथा सीधा प्रतिबिंब प्राप्त होता है
अवतल दर्पण में वस्तु का बड़ा और सीधा प्रतिबिंब (एक स्थिति में) प्राप्त होता है

कार्य और ऊर्जा पर आधारित प्रश्न उत्तर

कार्य और ऊर्जा पर आधारित प्रश्न उत्तर

कार्य और ऊर्जा पर आधारित प्रश्न उत्तर

Science : Work and Energy

प्रश्न=1- जब वस्तु का विस्थापन बल की दिशा में हो तो किया गया कार्य = होता है  
【अ】 बल ×दूरी ✔
【ब】 दूरी ×बल
【स】 बल ×बल
【द】दूरी ×दूरी
 
प्रश्न=2- एक न्यूटन बल लगाने पर यदि वस्तु का विस्थापन 1 मीटर हो तो बल द्वारा किया गया कार्य होता है  
【अ】 1 जूल ✔
【ब】 संवेग
【स】 डाइन
【द】 पाउंड
 
प्रश्न=3- न्यूटन मीटर को ब्रिटेन के वैज्ञानिक जेम्स जुल के सम्मान में क्या लिखते हैं  
【अ】 जूल (z)
【ब】 जूल (j) ✔
【स】 जूल (g)
【द】 उपरोक्त कोई नहीं
 
प्रश्न=4- जब बल वस्तु की गति की दिशा में कार्य करता है किया गया कार्य होता है  
【अ】 धनात्मक ✔
【ब】 गुणात्मक
【स】 ऋणात्मक
【द】 उपरोक्त सभी
 
प्रश्न=5- यदि किसी वस्तु पर बहुत सारे बल लग रहे हो तथा यदि वस्तु स्तर अवस्था में हो तो भी उन सब बलों द्वारा किए गए कार्य का मान होता है ❓
【अ】 शून्य ✔
【ब】 धनात्मक
【स】 बराबर
【द】 ऋणात्मक
 
प्रश्न=6- ऊर्जा संरक्षण का नियम है  
【अ】 ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है
【ब】 ऊर्जा को न नष्ट किया जा सकता है
【स】 एक ऊर्जा को दूसरी ऊर्जा में रूपांतरित किया जा सकता है ✔
【द】 उपरोक्त कोई नहीं
 
प्रश्न=7-निम्न में से उर्जा का प्रकार है 
【अ】 यांत्रिक ऊर्जा
【ब】 रासायनिक उर्जा
【स】 प्रकाश ऊर्जा
【द】 उपरोक्त सभी ✔
 
प्रश्न=8- यांत्रिक ऊर्जा बराबर होता है 
【अ】 गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा ✔
【ब】 रासायनिक उर्जा+ प्रकाश ऊर्जा
【स】 गतिज ऊर्जा +प्रकाश ऊर्जा
【द】 ध्वनि ऊर्जा +चुंबकीय ऊर्जा
 
प्रश्न=9- गिरता हुआ नारियल, गतिशील कार, लुढ़कता हुआ पत्थर ,दौड़ता हुआ खिलाड़ी आदि किस ऊर्जा के उदाहरण है  
【अ】 स्थितिज ऊर्जा
【ब】 गतिज ऊर्जा ✔
【स】 प्रकाश ऊर्जा
【द】 रासायनिक उर्जा
 
प्रश्न=10-निम्न में से रासायनिक ऊर्जा का उदाहरण नहीं है  
【अ】 रसोई गैस
【ब】 लकड़ी
【स】 कोयला
【द】 दीपक ✔
 
प्रश्न=11-जब पंखा बिजली से चलता है तो विद्युत ऊर्जा का किस ऊर्जा में रूपांतरण होता है  
【अ】 यांत्रिक ऊर्जा में ✔
【ब】 प्रकाश ऊर्जा में
【स】 चुंबकीय ऊर्जा में
【द】 ध्वनि ऊर्जा में
 
प्रश्न=12-निम्न में से परंपरागत ऊर्जा स्त्रोत है  
【अ】 पवन ऊर्जा
【ब】 सौर ऊर्जा
【स】 कोयला ✔
【द】 बायोमास ऊर्जा
 
प्रश्न=13- जीवाश्म ईंधन की श्रेणी में आते हैं  
【अ】 कोयला
【ब】 पेट्रोलियम
【स】 प्राकृतिक गैस
【द】 उपरोक्त सभी ✔
 
प्रश्न=14- निम्न में से गैर परंपरागत ऊर्जा स्त्रोत है  
【अ】 पवन ऊर्जा
【ब】 सौर ऊर्जा
【स】 भूतापीय ऊर्जा
【द】 उपरोक्त सभी ✔
 
प्रश्न=15- निम्न में से समुद्री ऊर्जा है  
【अ】 समुद्री तापीय ऊर्जा
【ब】 तरंग ऊर्जा
【स】 ज्वारीय ऊर्जा
【द】 उपरोक्त सभी ✔
 
प्रश्न=16. निम्न में से कौन सा जैव मात्रा ऊर्जा स्त्रोत का उदाहरण नहीं है
(अ) लकड़ी
(ब) गोबर गैस
(स) नाभिकीय ऊर्जा ✔
(द) कोयला

प्रश्न=17. स्वतंत्रता पूर्वक गिरती हुई वस्तु की गतिज ऊर्जा का मान-
(अ) नियत रहता है
(ब) बढ़ता रहता है ✔
(स) घटता रहता है
(द) शून्य रहता है

प्रश्न=18. m द्रव्यमान का पत्थर मुक्त रूप से d दूरी तक गिरता है उसकी गतिज ऊर्जा का मान होगा-
(अ) mgd ✔
(ब) 1/2md2
(स) mg/d
(द) शून्य

प्रश्न=19. एक वस्तु का द्रव्यमान आधा तथा वेग दुगना कर दिया जाए तो उसकी गतिज ऊर्जा का मान पहले की अपेक्षा होगा-
(अ) चार गुना
(ब) दुगुना ✔
(स) आधा
(द) आठ गुना

प्रश्न=20. बंदूक से दागी गई गोली में ऊर्जा होती है
(अ) केवल उसके द्रव्यमान के कारण
(ब) उसके वेग एवं द्रव्यमान के कारण ✔
(स) उस पर कार्यरत द्रव्यमान बल के कारण
(द) केवल स्थिति के कारण

प्रश्न=21. किसी गेंद को पृथ्वी तल से v वेग से ऊपर फेंकते हैं तो उसमें केवल स्थितिज ऊर्जा होती है जब वह+
(अ) अधिकतम ऊंचाई पर पहुंचती है ✔
(ब) वापिस पृथ्वी तल पर पहुंचती है
(स) ऊपर की ओर जाते समय पृथ्वी तल और अधिकतम ऊंचाई की मध्य होती है
(द) नीचे गिरते समय अधिकतम ऊंचाई तथा पृथ्वी तल के मध्य होती है

प्रश्न=22. निम्न में से जीवाशम ईंधन नहीं है
(अ) Petrol
(ब) लकड़ी ✔
(स) प्रकृतिक गैस
(द) Diesel

प्रश्न=23. अणुओ की गतिज ऊर्जा-
(अ) द्रव में ठोस की अपेक्षा कम होती है
(ब) द्रव में गैस की अपेक्षा अधिक होती है
(स) गैस में ठोस की अपेक्षा अधिक होती है ✔
(द) गैस में द्रव की अपेक्षा कम होती है

प्रश्न=24. गतिज ऊर्जा का मान निर्भर करता है
(अ) केवल वस्तु के द्रव्यमान पर
(ब) केवल वस्तु के वेग पर
(स) द्रव्यमान और वेग दोनों पर ✔
(द) कोई नहीं

प्रश्न=25. निम्न में से कौन सी मात्रा उर्जा स्त्रोत का उदाहरण नहीं है।
(अ) लकड़ी
(ब) नाभिकीय ऊर्जा ✔
(स) गोबर गैस
(द) कोयला

प्रमुख खोज और आविष्कार ( QUIZ QUESTION )

प्रमुख खोज और आविष्कार ( QUIZ QUESTION )

Major discovery and invention (QUIZ QUESTION)

Q.1 कागज का आविष्कार किसने किया था ?
A. साईलुन ✔?
B. मैक्स मूलर
C. केपलर
D. मैक्स प्लैंक

Q.2 ऑक्सीजन की खोज किसने की थी ?
A. जोसेफ प्रिस्टले✔?
B. माइकल फैराडे
C. जे जे थॉमसन
D. मैडम क्यूरी

Q.3 AC की खोज किसने की थी ?
A. अर्नेस्ट रदरफोर्ड
B. माइकल फैराडे ✔?
C. बेटेसन
D. मैक्सप्लैंक

Q.4 एयरप्लेन का आविष्कार किसने किया था ?
A. वेनिस करियर
B. मुस्तफा कमाल पाशा
C. राइट ब्रदर्स, बिलपुर राइट, औरबिल्ले राइट ✔?
D. रॉबर्ट हुक ने

Q.5 एयर कंडीशनिंग की खोज किसने की थी ?
A. जेनर
B. अर्नेस्ट रदरफोर्ड
C. विलिस कैरियर✔?
D. मैकियावेली

Q.6 एक्सरे का आविष्कारक कौन था ?
A. रॉबर्ट कोच
B. मैक्स मूलर
C. पिनकस
D. विलियम रोंजन ✔?

Q.7 इलेक्ट्रॉनिक्स के पिता कहलाते है ?
A. जे जे थॉमसन
B. रे टॉमलिंसन ✔?
C. अर्नेस्ट रदरफोर्ड
D. इनमें से कोई नहीं

Q.8 इतिहास के पिता कहलाते हैं ?
A. राल्फ वेजबुड
B. डॉक्टर हरगोविंद खुराना
C. बैटेसन
D. हीरोडोरस ✔?

Q.9 आवर्धक लेंस की खोज किसने की थी ?
A. रोजर बेकन ✔?
B. माइकल फैराडे
C. मैकियावेली
D. विक्टर हैस

Q.10 आयुर्वेद के पिता कहलाते हैं ?
A. मैक्स मूलर
B. चार्ल्स डार्विन
C. धन्वंतरि ✔?
D. अरनेस्ट रदरफोर्ड

Q.11 आधुनिक भारत का पिता /जन्मदाता एवं भारतीय पुनर्जागरण का मसीहा माना जाता है ?
A. डॉक्टर हरगोविंद खुराना
B. पंडित जवाहरलाल नेहरू
C. राजा राममोहन राय ✔?
D. जेंनर

Q.12 आधुनिक ओलंपिक खेलों का जनक किसे कहा जाता है ?
A. मेरी क्यूरी
B. वाल्टर हंट
C. पियरे डी कुबर्तिन ✔?
D. ईयान विल्मुट

Q.13 अमेरिकी क्रांति के जन्मदाता कौन हैं ?
A. मैकियावेली
B. जे जे थॉमसन
C. जॉर्ज वॉशिंगटन✔?
D. इनमें से कोई नहीं

Q.14 TV वैक्ट्रीया का आविष्कार किसने किया ?
A. रॉबर्ट कोच ✔?
B. मैकियावेली
C. वाल्टर हंट
D. विक्टर हेस

Q.15 E=mc2 की खोज किसने की थी ?
A. जेम्स मेडिसन
B. विलियम रोंजन
C. अल्बर्ट आइंस्टाइन✔?
D. रॉबर्ट हुक

ELECTRICITY ( इलेक्ट्रिकल )

ELECTRICITY ( इलेक्ट्रिकल )

ELECTRICITY ( इलेक्ट्रिकल )

➡Q…1– इलेक्ट्रान वोल्ट में क्या माप जाता है?

A. – धारा
B. – ऊर्जा ✅
C. – आवेश
D. – विभवान्तर

➡Q..2 जिस धारा का मान दिशा और समय के साथ आवर्ती रूप से परिवर्तित होता रहता हे , वह धारा कहलाती है ?

A. -दिष्ठ धारा
B. – चालन धारा
C. – प्रत्यवर्ती धारा✅
D. – ज्या धारा

➡Q..3  किसी चालक में एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक आवेश प्रवाहित होता है,तो वह कहलाता है..?

A. –  विद्युत वाहक बल
B. – विभवान्तर
C. – विद्युत धरा✅
D. –  प्रतिरोध

➡Q..4 पदार्थ का वह गुण जिसके कारण वः अपने में से विद्युत धारा प्रवाह का विरोध करता है, कहलाता है?
A. – प्रतिरोध✅
B. – विशिष्ट प्रतिरोध
C. – प्रतिबाधा
D. – प्रतिघात

➡Q..5 किसी चालक तार के प्रति ईकाई अनुप्रथ काट के क्षेत्रफल में गुजरने वाली धारा का मात्रा कहलाती है-?

A. – दिष्ठ धारा
B. – धारा घनत्व ✅
C. – धारा गुणांक
D. – संवहन धारा

➡Q..6 ?बल्ब?का प्रकाशित होना विद्युत धारा के……………प्रभाव का उदाहरण है ?

A. –  रासायनिक प्रभाव
B. –  किरण प्रभाव
C. –  चुम्बकीय प्रभाव
D. –   उष्मीय प्रभाव✅

➡Q..7 किसी चालक तार में विद्युत धारा प्रवाह के लिए उत्तरदायी कारक है?

A. – तार में अंतर
B. –  प्रतिरोध में अंतर
C. –  विभव में अंतर✅
D. –  इनमे से कोई नही

➡Q..8  ओम के नियम के अनुसार किसी प्रतिरोधक के सिरों पर पैदा होने वाला विभवान्तर★अनुक्रमनुपाती★ होता है ?

A. –  विद्युत वाहक बल के
B. – धारा के ✅
C. –  प्रतिरोध के
D. –  वोल्टेज के

➡Q..9 विद्युत परिपथ का वह गुण जो विद्युत ऊर्जा को ऊष्मा में परिवर्तित करता है, कहलाता है ?

A. – धारा
B. – वॉल्टत्ता
C. – विद्युत वाहक बल
D. –   प्रतिरोध   ✅

➡Q..10 निम्न लिखित में से कोनसी डी. सी. मोटर ★उच्च स्टार्टिंग टॉर्क★ के लिए उपयुक्त है ?
A.- शन्ट मोटर
B. – कंपोउंड मोटर
C. – संचयी कंपाउंड मोटर
D. – श्रेणी मोटर✅

➡Q..11 फ्लक्स की इकाई हे–

A. – वेबर✅
B. – एम्पियर
C. –  मैक्सवेल
D. – एम्पियर टर्न वेबर

➡Q..12 PNP ट्रांज़िस्टर में आधार(Base) होता है

A. – न N, न P
B. – p – पदार्थ
C. – N -पदार्थ✅
D. – p और N दोनों पदार्थ

➡Q..13 100 मेगा ओम के प्रतिरोध के मापन के उपयुक्त यंत्र हे..?

A. –  ओम मीटर
B. –  वाल्ट मीटर
C. –  VTVM
D. –  मैगर✅

➡Q..14   1 HP (Horse पावर) =……………?

A. – 746W✅
B. –  742W
C . – 748W
D. –  756W

➡Q..15 विद्युत चूल्हे (हीटर) के लिए कोनसी धातु सर्वाधिक उपयोगी है..?

A. – नाइक्रोम✅
B. – टँगस्टन
C. – कांस्टेटन
D. –  तांबा

गति एवं गुरुत्वाकर्षण (Speed ​​and gravity) one Liner

गति एवं गुरुत्वाकर्षण(Speed ​​and gravity)

गति एवं गुरुत्वाकर्षण

Ques.1बालपेन कौनसे सिद्धांत पर कार्य करता है?
1.श्यानता
2.गुरुत्वाकर्षण ✅
3.सरफ़ेस टेन्शन
4.केशिकात्व

Ques.2 किसी कृत्रिम उपग्रह में रामनिवास पानी से भरे गिलास को टेढा करता है तो पानी….
1.गिलास मे ही रहता है
2.धारा के रूप में नीचे गिरता है
3.बून्दो के रूप में तैरने लगता है ✅
4.भाप बन जाता है

Ques.3 एक लिफ़्ट त्वरित गति से उपर की ओर जा रही है इसमें खड़े व्यक्ति का आभासी भार…..
1.बढ़ेगा ✅
2.घटेगा
3.स्थिर रहेगा
4.भारहीन

Ques.4 सोना एक पत्थर को उपर की ओर उछलती है तो पत्थर वापिस नीचे आता है क्योंकि…
1.गुरुत्व बल के कारण ✅
2.श्यानता के कारण
3.घरषण के कारण
4.कोई नहीं

Ques.5 पृथ्वी की त्रिज्या 6400 km है तो गुरुत्वीय त्वरण का मान कितनी ऊचाई पर आधा रह जायेगा?
1.3000km
2.3200km
3.2650km ✅
4.2500km

Ques.6गतिशील बाइक पर अचानक ब्रेक लगाने पर व्यक्ति….
1.पीछे की ओर झुक जाता है
2.आगे की ओर झुक जाता है ✅
3.दायी ओर झुक जाता है
4.बायी ओर झुक जाता है

Ques.7 पृथ्वी पर किसी पिण्ड का भार 36 kg है तो चन्द्रमा पर पिण्ड का भार होगा?
1.1/4 भाग
2.1/2 भाग
3.नियत
4.1/6 भाग ✅

Ques.8 कोई वस्तु पृथ्वी के केन्द्र मे है तो वस्तु का भार….
1.शून्य ✅
2.अनंत
3.पृथ्वी की सतह के समान
4.इनमे से कोई नहीं

Ques.9 साधारणत; अंतरिक्ष रॉकेट पश्चिम से पूर्व की ओर छोड़े जाते हैं क्योन्कि…
1.पृथ्वी सदैव पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है
2.रॉकेट छोड़ने के लिए कम वेग की आवश्यकता पडती है
3.दोनों सही (1व2)✅
4.सिर्फ 1 सही

Ques.10 विषुवत रेखा पर अगर तोला गया सोना 10 ग्राम है तो इसी सोने को जब ध्रुवों पर तोला जाता है तो भार अधिक आता है क्यों
1. ध्रुवों पर पृथ्वी की त्रिज्या कम है
2. विषुवत रेखा  पर त्रिज्या ज्यादा है
3. 1 व 2 दोनों सही✅
4. 1 व 2 दोनों गलत

Ques.11 मोहन गतिशील रेल गाड़ी में बैठा है और गेंद ऊपर उछालता है तो गेंद नीचे आते समय…..
1. मोहन के पीछे गिरेगी
2. मोहन के हाथ में गिरेगी✅
3. मोहन के दाए गिरेगी
4. मोहन के बाए गिरेगी

Ques.12 स्वतंत्र गिरती हुई लिफ्ट में व्यक्ति महसूस करता है….
1. भारी
2. शून्य भार
3. भारहीन
विकल्प चुने…
1.1 व 2 दोनों
2.2 व 3दोनों✅
3.सिर्फ 1

Ques.13 एक समान चाल से गिरती हुई वर्षा की किसी बूंद पर नेट बल होगा….
1. 9.8 ms-²
2. शून्य ✅
3. 9.8 न्यूटन
4. कह नहीं सकते

Ques.14 समुद्र मे उत्पन्न ज्वार भाटे का प्रमुख कारण है..
1.चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल
2.सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल
3.दोनों का सम्मिलित प्रभाव ✅
4.इनमे से कोई नहीं

Ques.15पेड़ को हिलाने पर फ़ल नीचे गिरते है क्योंकि …
1. लटके हुये है
2.गतिशील अवस्था के जड़त्व के कारण
3.स्थिर अवस्था के जड़त्व के कारण ✅
4.कोई नहीं

Light in Hindi | प्रकाश सामान्य ज्ञान

GK on Light in Hindi | प्रकाश सामान्य ज्ञान | Important Fact Light

 

  • ज्योति तीव्रता का मात्रक केन्डिला एवं लेंस की क्षमता डायप्टर होता है।
  • तराशा हुआ हीरा अपने उच्च उपवर्तनांक के कारण पूर्ण आन्तरिक परावर्तन से चमकता है।
  • भारत का सबसे बड़ा सौर दूरदर्शी कोडाईकनाल (तमिलनाडु) में स्थित है।
  • अपवर्तन की क्रिया में प्रकाश का वेगआयामतरंगदैर्ध्य तो बदल जाता है लेकिन आवृत्ति अपरिवर्तित रहती है।
  • यदि किसी लेंस को ऐसे माध्यम में रखा जाए जिसका अपवर्तनांक लेंस के पदार्थ के अपवर्तनांक से अधिक होतो लेंस की फोकस दूरी बदलने के साथ-साथ उसकी प्रकृति भी उलट जाती है और अवतल लेंसउत्तल लेंस की भाँति व्यवहार करने लगता है।
  • व्यतिकरण प्रारूप (इंटरफ्रेंस पैटर्न) में ऊर्जा का पुनर्वितरण होता है कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है।
  • पनडुब्बी के अन्दर से बाहर की वस्तुओं को देखने के लिए पेरिस्कोप का प्रयोग किया।
  • बुनकरों द्वारा विभिन्न प्रकार के रंगीन डिज़ाइन देखने के लिए कैलिडोस्कोप का उपयोग किया जाता है।
  • कुछ वस्तुएं एक प्रकार से प्रकाश का शोषण करती हैं और दूसरे रंग के प्रकाश की किरणें निकालती हैं। कैल्सियम क्लोराइड बैंगनी किरणों का शोषण करता है परंतु नीली किरणे निकालता है। इस प्रकार की घटना को प्रतिदीप्ति कहा जाता है।
  • भारत के नरेन्द्र सिंह कपानी को ऑप्टिकल फाइबर के खोजकर्ताओं में से एक के रूप में माना जाता है।
  • जब प्रकाश की किरण वायु से कांच में प्रवेश करती है तो उसका तरंगदैर्ध्य घट जाता है।
  • नेत्र की वह क्षमताजिसके कारण वह अपनी फोकस दूरी को समायोजित करके निकट तथा दूरस्थ वस्तुओं को फोकसित कर लेता हैनेत्र की समंजन क्षमता कहलाती है।
  • वह अल्पतम दूरीजिस पर रखी वस्तु को नेत्र बिना किसी तनाव के सुस्पष्ट देख सकता हैउसे नेत्र का निकट बिंदु अथवा सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी कहते हैं। सामान्य दृष्टि के वयस्क के लिए यह दूरी लगभग 25 से.मी. होती है।
  • दृष्टि से सामान्य अपवर्तक दोष हैं- निकट-दृष्टिदीर्घ-दृष्टि तथा जरा-दूरदृष्टिता। निकट-दृष्टि को उचित क्षमता के अवतल लेंस द्वारा संशोधित किया जाता है। दीर्घ-दृष्टि दोष को उचित क्षमता के उत्तल लेंस द्वारा संशोधित किया जाता है। वृद्धावस्था में नेत्र की समंजन क्षमता घट जाती है।
  • यदि किसी पारदर्शी गुटक को किसी द्रव में डुबाने पर दिखाई नहीं पड़े तो दोनों का अवर्तनांक बराबर होता है।
  • हेरनर ने 1876 में सर्वप्रथम मनुष्यों में वर्णान्धता का वर्णन किया।
  • नॉल और रस्का (1933) ने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का आविष्कार किया।
  • मनुष्य उस विद्युत चुम्बकीय विकिरण को देख सकता हैजिसका तरंगदैर्ध्य 400 मिमी. से 700 मिमी. के बीच हो।
  • स्पैक्ट्रम के दृश्य प्रकाश में तरंगदैर्ध्य होता है।
  • प्रकाश उर्जा का एक रूप है। प्रकाश तरंगेंविद्युत चुंबकीय तरंगें हैंजिनके नाम के लिए भौतिक माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
  • प्रकाश के परावर्तन के दो नियम हैं- आपतित किरणपरावर्तित किरण और आपतन बिंदु पर अभिलंबसभी एक ही समतल में होते हैं, 2. आपतन कोण और परावर्तन कोण बराबर होते हैं।
  • समतल दर्पण के बिना प्रतिबिम्ब सीधा एवं काल्पनिक होता है तथा दर्पण से उतना ही पीछे बनता हैजितनी वस्तु दर्पण से आगे रहती है।
  • गोलीय दर्पण के मुख्य अक्ष समांतर और निकट आपतित सभी किरणेदर्पण से परावर्तन के बाद मुख्य अक्ष पर जिस बिंदु पर अभिसारित होती हैं या जिस बिंदु से अपसारित होती प्रतीत होती हैंवह बिंदु गोलीय दर्पण का मुख्य फोकस कहा जाता है।
  • अवतल दर्पण से वास्तविक और काल्पनिकदोनों प्रकार के प्रतिबिम्ब बन सकते है। वास्तविक प्रतिबिम्ब बड़ा या छोटा हो सकता हैकिन्तु काल्पनिक प्रतिबिम्ब बड़ा होता है।
  • उत्तल दर्पण से हमेशा सीधाछोटा और काल्पनिक प्रतिबिम्ब बनता है।
  • प्रतिबिम्ब की उंचाईआकार और वस्तु की उँचाई या आकार के अनुपात को आवर्धन कहते हैं।
  • जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करता हैतब प्रकाश की दिशा में परिवर्तन को प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं।
  • प्रकाश के अपवर्तन के दो नियम हैं- आपतित किरणअपवर्तित किरण और आपतन बिंदु पर अभिलंब सभी एक समान ही समतल में होते हैं। 2. प्रकाश के किसी विशेष वर्ण के लिए आपतन कोण की ज्या (Sine) तथा आपर्वन कोण की ज्या (Sine) का अनुपात किन्ही दो माध्यमों के लिए एक नियतांक होता हैइस नियम को स्नेल का नियम भी कहते हैं।
  • एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती हुई एक प्रकाश-किरण के लिऐ अनुपात का मानपहले माध्यम की अपेक्षा दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक कहलाता है।
  • आयताकार कांच के स्लैब से प्रकाश का अपवर्तनांक दो बार होता हैपहला हवा-कांच अंतरा पृष्ठ पर और दूसरा कांच हवा अंतरापृष्ठ पर निर्गत किरणआपतित किरण के समांतर तो होती हैपरंतु वह पार्श्विक रूप से विस्थापित हो जाती है।
  • पूर्ण आतरिक परावर्तन के लिए दो शर्ते हैं- प्रकाश की किरणों को सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाना चाहिए और 2. सघन माध्यम से आपतन कोणक्रांतिक कोण से बड़ा होना चाहिए।
  • उत्तल लेंस द्वारा वास्तविक और काल्पनिक या आभासीदोनों प्रकार के प्रतिबिंब बनते हैंजबकि अवतल लेंस द्वारा केवल आभासी प्रतिबिम्ब ही बनते हैं।
  • निकट दृष्टितानेत्रगोलक के लंबा हो जाने के कारण होता है और बहुत दूर स्थित वस्तु बिम्ब नेत्र लेंस द्वारा रेटिना के आगे बनाता है। इस दोष का सुधार लेंस द्वारा होता है।
  • प्रकाश सरल रेखाओं में गमन करता प्रतीत होता है।
  • दर्पण तथा लेंस वस्तुओं के प्रतिबिंब बनाते हैं बिंब की स्थिति के अनुसार प्रतिबिंब वास्तविक अथवा आभासी हो सकते हैं।
  • सभी प्रकार के परावर्ती पृष्ठपरावर्तन के नियमों का पालन करते हैं। अपवर्ती पृष्ठअपवर्तन के नियमों का पालन करते हैं।
  • गोलीय दर्पणों तथा लेंसों के लिए नयी कार्तीय चिन्ह-परिपाटी अपनाई जाती है।
  • किसी गोलीय दर्पण की फोकस दूरीउसकी वक्रता त्रिज्या की आधी होती है।
  • किसी गोलीय दर्पण द्वारा उत्पन्न आवर्धनप्रतिबिंब की ऊँचाई तथा बिंब की ऊँचाई का अनुपात होता है।
  • सघन माध्यम से विरल माध्यम में तिरछी गमन करने वाली कोई प्रकाश किरणअभिलंब से परे झुक जाती है। विरल माध्यम से सघन माध्यम में तिरछी गमन करने वाली प्रकाश किरण अभिलंब की ओर झुक जाती है।
  • निर्वात में प्रकाश 3 × 108ms-1 की अत्यधिक चाल से गमन करता है। विभिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल भिन्न-भिन्न होती है।
  • किसी पारदर्शी माध्यम का अपवर्तनांकप्रकाश की निर्वात में चाल तथा प्रकाश की माध्यम में चाल का अनुपात होता है।
  • किसी आयताकार काँच के स्लैब के प्रकरण मेंअपवर्तन वायु-काँच अंतरापृष्ठ एवं काँच-वायु अंतरापृष्ठ दोनों पर होता है। निर्गत किरणआपतित किरण की दिशा के समांतर होती है।
  • किसी लेंस की क्षमताउसकी फोकस दूरी का व्युत्क्रम होती है। लेंस की क्षमता का SI मात्रक डाइऑप्टर है।
  • दूर दृष्टितानेत्रगोलक के छोटा हो जाने के कारण होता है और सामान्य निकट बिंदु (25 mm की दूरी) पर स्थित वस्तु का प्रतिबिम्ब नेत्र लेंस द्वारा रेटिना के पीछे बनाता है। इस दोष का सुधार उत्तल लेन्स द्वारा होता है।
  • जरा दूरदर्शितावृद्धावस्था में होती है और इसे दूर करने के लिए बेलनाकार लेंस का उपयोग किया जाता है।
  • सरल सूक्ष्मदर्शी छोटी फोकस दूर का एक उत्तल लेंस होता है जो अपनी फोकस दूरी से कम दूरी पर रखे वस्तु का सीधाआवर्धित तथा काल्पनिक प्रतिबिम्ब बनाता है।
  • संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में कम फोकस दूर के दो समाक्षीय उत्तल लेन्स होते हैंजिनके बीच की दूरी बदली जा सकती है। अभिदृश्यक अपने निकट रखी छोटी वस्तु का उलटाबड़ा तथा वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाता है और नेत्रिका इस प्रतिविंब का और भी आवर्धित तथा काल्पनिक प्रतिबिम्ब बनाती है।
  • प्रतिबिम्ब की ऊंचाई और वस्तु की ऊंचाई के अनुपात को आवर्धक कहते हैं। लेन्स की क्षमता उसकी फोकस दूरी के व्युत्क्रम द्वारा व्यक्त की जाती है और इसका मात्रक डाई आक्साईट संकेत में होता है।
  • उत्तल या अभिसारी लेंस की क्षमता धनात्मक और अब तक या अपसारी लेंस की क्षमता ऋणात्मक होती है।
  • नेत्र-लेंस द्वारा किसी वस्तु का उल्टा एवं वास्तविक प्रतिबिम्ब रेटिना पर बनता है। दृक तंत्रिका द्वारा मष्तिष्क तक संचारित होता है।
  • आंख की व क्षमता जिस कारण नेत्र-लेंस की आकृति अर्थात फोकस दूरी स्वत: नियंत्रित होती रहती हैनेत्र की समंजन क्षमता कही जाती है।
  • उस दूरस्थ बिंदु कोजहां तक आंख साफ-साफ देख सकती हैदूर बिंदु कहा जाता है। सामान्य आंख के लिए दूर बिंदु अनंत पर होना चाहिए।
  • खगोलीय दर बीच में समाक्षीय उत्तल लेन्स होते हैंजिनके बीच की दूरी बदली जा सकती है। अभिदृष्यात्मक बहुत दूर की वस्तु का उलटाछोटा और वास्वविक प्रतिबिम्ब अपने फोकसी समतल पर बनाता है। नेत्रिका इस प्रतिबिम्ब को अनंत पर बनाती है।
  • किसी अपारदर्शी वस्तु का वर्ण jas उसके द्वारा लौटाए गए अर्थात परावर्तित प्रकाश पर निर्भर करता है।
  • बैंगनी वर्ण के प्रकाश का तरंगदैर्ध्य सबसे कम तथा लाल वर्ण के प्रकाश का तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक होता है।
  • पिरामेंट बहुत छोटे कण होते हैंजो किसी वस्तु को रंगीन रूप देते हैं। पिरामेंट के तीन प्राथमिक वर्ण हैं- स्यानमैजेण्टा और पीला समुचित अनुपात में स्यानमैजेण्टा और पीला तथा काला मिलाने पर किसी भी प्रकार का वर्ण उत्पन्न किया जा सकता है।
  • तराशा हुआ हीरा अपने उच्च अपवर्तनांक के कारण पूर्ण आन्तरिक परावर्तन से चमकता है।
  • भारत का सबसे बड़ा सौर दूरदर्शी कोडाईकनालतमिलनाडु में स्थित है।

आधुनिक भौतिकी (Modern Physics)

आधुनिक भौतिकी (Modern Physics) 

एक्स किरणें ( X.rays) :- किरणों की खोज सन् 1885 में प्रोफेसर रूंटगेन ने किया था। रूंटगेन के नाम पर ही इन्हें रूंटगेन किरण भी कहते हैं। एक्स किरणों का उत्पादन करने के लिये कूलिज नलिका काम मे लायी जाती है। इसे सन् 1913 में डा0 कूजिल ने बनाया था। एक्स किरणें आॅख से दिखायी नहीं देती हैं परन्तु फोटोग्राफिक प्लेट पर प्रकाश किरणों की भाॅति की क्रिया करती है। ऐसी किरणों की तरंग दैध्र्य 1Aº से 100Aº तक होती है। इनमें छोटी तरंग दैध्र्य (1Aº) की किरणों में अधिक ऊर्जा होती है जिससे इनकी भेदन क्षमता भी अधिक होती है। अधिक भेदन क्षमता वाली किरणों को कठोर एक्स किरण कहते हैं। अधिक तरंग दैध्र्य वाली किरणों की ऊर्जा कम होती है जिससे इनकी भेदन क्षमता कम होती है अतः इन्हें कोमल अथवा अल्पभेदी एक्स किरण कहते हैं। एक्स किरणें कम घनत्व के पदार्थों में आसानी से प्रवेश कर जाती है परन्तु अधिक घनत्व के पदार्थों जैसे लोहा, पत्थर आदि में नहीं प्रवेश कर पाती हैं। इनके इसी गुण का उपयोग शरीर के भीतर टूटी हुयी हड्डी, धॅसी हुयी गोली, पथरी या फेफडों के विकारों को ज्ञात करने में किया जाता है। इस सबके अतिरिक्त इनका उपयोग विकिरण चिकित्सा में, इंजीनियरिंग में, पदार्थों के अणुओं की संरचना आदि ज्ञात करने में किया जाता है।

अर्द्ध चालक (Semiconductor) :- इन पदार्थों की चालकता चालक तथा पदार्थों के बीच की होती है। अर्द्धचालकों की विद्युत चालकता ताप बढ़ाने पर बढ़ती है तथा ताप घटने पर घटती है। अर्द्ध चालकों के उदाहरण हैं- सिलिकान, जर्मेनियम, कार्बन आदि।

ट्रांजिस्टर(Transistor) :- यह अर्द्धचालकों से बनी ऐसी इलेक्ट्रानिक युक्ति होती है जो ट्रायोड वाल्व के स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। इसका आविष्कार सन्- 1948 में अमेरिकी वैज्ञानिकों बर्डीन शाॅकले तथा बै्रटन ने किया था। ट्रांजिस्टर ट्रायोड वाल्व की अपेक्षाकृत अधिक मजबूत, सस्ते तथा आकार में छोटे होते हैं ट्राजिस्टटर वाल्व की अपेक्षा कम वोल्टेज पर ही कार्य करते हैं इसलिये इनमें शक्ति क्षय कम होता है। ट्रांजिस्टर युक्त यंत्र स्विच आन करते ही क्रियाशील हो जाते हैं जबकि वाल्व में ऐसा नहीं होता है। ट्रांजिस्टरों में यांत्रिक आघात सहने की क्षमता अधिक होती है तथा इनकी आयु असीमित होती है। ट्राजिस्टरों के इन्हीं गुणों के कारण इनका उपयोग रेडियो, टेलीविजन, कम्प्यूटर आदि में किया जाता है।

प्रतिदीप्ति तथा स्फुरदीप्ति (Flour-rescenne and Phosphoresence) :- कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जिन पर यदि उच्च आवृत्ति का प्रकाश डाला जाये तो वे उसे अवशोषित कर नीची आवृत्ति का प्रकाश उत्सर्जित करने लगते है। यह उत्सर्जन तब तक ही होता है जब तक वस्तु पर प्रकाश पड़ता रहता है। ऐसे पदार्थों को प्रतिदीप्ति पदार्थ तथा इस घटना को प्रतिदीप्ति कहते हैं। उदाहरणस्वरूप जब फ्लोरोसीन, बेरियम प्लाटीनोसाइनाड के पर्दे पर प्रकाश डाला जाता है तो हरे रंग की प्रतिदीप्ति निकलती है। घरों में प्रयोग होने वाली ट्यूबलाइट वास्तव में पराबैगनी प्रकाश का उत्सर्जन करती है।

प्रतिदीप्त पदार्थ प्रकाश का उत्सर्जन तभी तक करते हैं जब तक उन पर प्रकाश डाला जाता है परन्तु कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जिन पर प्रकाश के बन्द करने के बाद भी प्रकाश उत्सर्जित होता रहता है। ऐसे पदार्थों को स्फुरदीप्त पदार्थ तथा इस घटना को स्फुरदीप्ति कहते हैं। उदाहरणस्वरूप कैल्श्यिम सल्फाइड तथा बेरियम सलफाइड सूर्य के प्रकाश का अवशोषण कर नीले रंग का प्रकाश उत्सर्जित करते हैं।

मेंसर (Maser)  :-  मेंसर शब्द का अर्थ है विकिरण के उदीपित उत्सर्जन द्वारा प्रकाश प्रवर्धन (Microwave Amplification by Stimulated Emission of Radiation)  लेसर एक ऐसा यंत्र है जिसके द्वारा एक तीव्र, एकवर्णी समान्तर तथा उच्च कला सम्बद्ध प्रकाश पुंज प्राप्त किया जाता है। लेसर कई प्रकार के होते हैं जैसे- गैसे लेसर, अर्द्धचालक लेसर तथा रूसी लेसर आदि। लेसर का उपयोग विभिन्न कार्यों हेतु किया जाता है जैसे युद्ध क्षेत्र में प्रक्षेपास्त्रों का पता लगाने में राकेट तथा उपग्रहों को नियंत्रित करने में, कठोर पदार्थों जैसे हीरा आदि को काटने में, चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों की दूरियाॅ नापने में आदि। चिकित्सा विज्ञान में भी लेसर का प्रयोग जैसे आॅख की कार्निया ग्राफ्टिंग तथा पथरी, ट्यूमर तथा कैंसर के उपचार में किया जाता है।

मंदक :- रिएक्टर में नयूट्रानों की गति मंद करने के लिए मंदक के रूप में भारी जल, गे्रफाइट या बेरेलियम आक्साइड का प्रयोग किया जाता है।

परमाणु पाइल :-. यह एक प्रकार की परमाणु भट्टी होती है जिसमें परमाणुओं का नियंत्रित दायरे में कृत्रिम तरीके से विखंडन कराया जाता है और अपार ऊर्जा मुक्त होती है।

नियंत्रक (Controller) :- विखंडन क्रिया की गति पर नियंत्रण के लिए कैडमियम की छडों का प्रयोग किया जाता है। रिएक्टर की दीवार में इन छड़ों को लगा दिया जाता है और आवश्युक्तानुसार इन्हें अन्दर-बाहर खिसका कर विखंडन की गति को नियंत्रित किया जाता है।

परिक्षक (Shield) :- सुरक्षा की दृष्टि से रिएक्टर के चारों ओर कंकरीट की मोटी दीवार परिक्षक का कार्य करती है।

परमाणु क्रमांक (Atomic Number) :- किसी परमाणु के नाभिक में विद्यमान प्रोटानों की संख्या अथवा इलेक्ट्रानों की संख्या ही परमाणु क्रमांक है। परमाणु क्रमांक के कारण ही रासायनिक तत्वों के गुणों में भिन्नता होती है।

परमाणु भार (Atomic weight) :- नाभिक में विद्यमान प्रोटानों तथा न्यूट्रानों की संख्या के योग को परमाणु भार कहते हैं।
इलेक्ट्रानः- इसकी खोज 1897 में जे0जे0 थामसन ने की थी। यह ऋणावेशित कण है। इसका द्रव्यमान9-1×10-31 किग्रा तथा इस पर1-69×10-27 कूलाम का आवेश होता है।

प्रोटान :-  यह एक धनावेशित कण है जिसकी खोज 1919 में रदरफोर्ड ने की थी। इलेक्ट्रान के बराबर आवेश तथा इसका द्रव्यमान 1.69×10-27 किग्रा है।

न्यूट्रान :- आवेश रहित (उदासीन) मूल कण जिसकी खोज 1932 में जेम्स चैडविक ने की थी। प्रोटान के बराबर इनका द्रव्यमान तथा इनका जीवन काल 17 मिनट होता है।

पाजिस्ट्रान :-  इलेक्ट्रान का एन्टीकरण (प्रतिकरण) द्रव्यमान तथा आवेश इलेक्ट्रान के बाराबर यह धनावेशित मूल कण हैं।
पाई मैसाॅनः- इसकी खोज 1935 में वैज्ञानिक युकावा ने की थी। धनात्मक तथा ऋणात्मक अस्थायी कण, द्रव्यमान इलेक्ट्रान के द्रव्यमान का 874 गुना तथा जीवनकाल 10-8 सेकेण्ड हाता है।

फोटान :-  ऊर्जा के बण्डल जो प्रकाश की चाल से आगे बढ़ते हेै तथा सभी प्रकार की विद्युत चुम्बकीय किरणों का निर्माण इन्हीं मूल कणों द्वारा होता है।
अर्द्ध आयुः- वह समय जिसमें कोई रेडियो ऐक्टिव तत्व की मात्रा विघटित होकर अपने प्रारम्भिक मात्रा की आधी रह जाती है। इसे ही अर्द्ध आयु (Half life) कहते हैं।

रेडियो एक्टिव क्षय :-  किसी रेडियो एक्टिव तत्व से α,β,γ किरणों के उत्सर्जन से उस तत्व के परमाणु क्रमांक तथा परमाणु भारों में परिवर्तन हो जाता है तथा नये तत्व का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया को ही रेडियो ऐक्टिव क्षय कहते हैं।

चुम्बकत्व (Magnets)

चुम्बकत्व (Magnets)

चुम्बकत्व (Magnets) :-  लोहे का एक अयस्क मैग्नेटाइट (Fe3O4) प्रकृति में मुक्त रूप से पाया जाता है इसे प्राकृतिक चुम्बक कहते हैं। प्राकृतिक चुम्बकों में आकर्षण बल बहुत कम होता है तथा इनकी कोई निश्चित आकृति नहीं होती है अतः ये कम उपयोगी होती हैं। आजकल लोहे, निकिल व फौलाद से कृत्रिम चुम्बक बनाये जाते हैं जो काफी शक्तिशाली होतें हैं तथा इन्हें कोई भी आकार दिया जा सकता है। स्वतंत्रतापूर्वक लटका हुआ चुम्बक सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरता है। चुम्बक का जो सिरा सदैव उत्तर की ओर रहता है उसे उत्तर खोजी ध्रुव या उत्तरी ध्रुव कहतें हैं तथा दक्षिण में रहने वाले सिरे को दक्षिणी  ध्रुव कहतें हैं। चुम्बक के इन्हीं ध्रुवों पर चुम्बकत्व सबसे अधिक होता है। यदि दो चुम्बकों को पास लाया जाये तो उनके समान ध्रुवों के बीच प्रतिकर्षण होता है तथा असमान ध्रुवों के बीच आकर्षण होता है। किसी शक्तिशाली चुम्बक को नर्म लोहे के समीप ले जाने पर नर्म लोहा एक चुम्बक की तरह व्यवहार करने लगता है। इस घटना को चुम्बकीय प्रेरण (Magnets Induction) कहतें हैं। चुम्बक में हमेशा दो ध्रुव उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव पाये जाते हैं। एक विलग चुम्बकीय ध्रुव का कोई अस्तित्व नहीं होता है। जैसे यदि हम किसी दण्ड चुम्बक को बीच से तोड़ दे तो उसके उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव अलग-अलग नहीं जायेगें बल्कि प्रत्येक भाग एक पूर्ण चुम्बक होगा जिसमें दोनों ध्रुव होगें।

 विघुत चुम्बक (Electro magnate) :-  विघुत चुम्बक एक कार्ड-बोर्ड अथवा मोटे कागज की नलिका के ऊपर ताॅबें के  विघुत-रूद्ध (धागा लिपटा अथवा प्लास्टिक चढ़ा) तार के बहुत से फेेरे लपेट कर बनाया जाता है। जब इस कुण्डलनी पर किसी सेल के द्वारा धारा प्रवाहित की जाती है तो यह एक दण्ड चुम्बक की भाॅति व्यवहार करने लगती है।

चुम्बकीय क्षेत्र एवं चुम्बकीय बल रेखायें (Magnetic field & Magnetic Lines of force) :-  किसी चुम्बक के चाारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें किसी चुम्बकीय सुई पर एक बल आघूर्ण आरोपित होता है जिसके कारण वह घूमकर एक निश्चित दिशा में ठहरता है, चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है। चुम्बकीय क्षेत्र का मात्रक न्यटन प्रति एम्पियर प्रति या गाॅस होता है। चुम्बकीय बल रेखायें चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता तथा दिशा को प्रदर्शित करती हैं। ये सदैव चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से निकल कर वक्र बनाती हुई दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं और चुम्बक के अन्दर से होती हुई पुनः उत्तरी ध्रुव से निकल जाती हैं। चुम्बक के ध्रुव के समीप जहाॅ चुम्बकीय क्षेत्र तीव्र होता है ये पास-पास होती हैं तथा ध्रुवों से दूर जाने पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता घटने के कारण ये दूर हो जाती हैं। इन रेखाओं की एक अन्य विशेषता है कि ये दूसरे को कभी काटती नहीं हैं।

चुम्बकीय क्षेत्र में आवेशित कण की गति एवं उस पर लगने वाला बल चुम्बकीय क्षेत्र में कोई आवेशित कण वृत्ताकार कक्षा में गति करता है और उस पर एक बल F कार्य करता है जिसे लारेंज बल भी कहते हैं। लगने वाले बल का परिमाण निम्न सूत्र से ज्ञात करते हैं-

                                 F = q v B Sinθ

v – कण का वेग
q – कण पर आवेश
B – चुम्बकीय क्षेत्र
Sinθ  वेग तथा चुम्बकीय क्षेत्र के बीच बनने वाला कोण

चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर लगने वाला बल चुम्बकीय क्षेत्र में यदि कोई धारावाही चालक जिसकी लम्बाई L है तथा उसमें I धारा प्रवाहित हो रही है तो उस पर लगने वाला बल होगा।

F = I B L Sinθ

चुम्बकीय पदार्थ :- फैराडे ने विभिन्न पदार्थों के चुम्बकीय गुणों का अध्ययन कर उन्हें तीन वर्गोंं में विभाजित किया है। ये चुम्बकीय पदार्थ निम्नलिखित हैं-

प्रति चुम्बकीय पदार्थ (Dia Magnetic material ) :- वे पदार्थ जो चुम्बकीय क्षेत्र में रखे जाने पर क्षेत्र की विपरीत दिशा में थोड़ा सा चुम्बकित होते हैं तथा किसी शक्तिशाली चुम्बक के समीप लाने पर थोड़ा सा प्रतिकर्षित होते हैं। प्रतिचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। जैसे जस्ता, ताॅबा चाॅदी, हीरा, सोना, नमक, जल पारा, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, विस्मथ आदि।

अनुचुम्बकीय पदार्थ (Para Magnetic material)  :- वे पदार्थ जो चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में रखे जाने पर क्षेत्र की दिशा में ही थोड़ा सा चुम्बकित हो जाते हैं तथा किसी शक्तिशाली चुम्बक के समीप लाने पर सिरे की ओर आकर्षित होते हैं, अनुचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। जैसे सोडियम, एल्युमीनियम, आक्सीजन, प्लैटिनम, मैंगनीज, काॅपर क्लोराइड आदि।

लौह चुम्बकीय पदार्थ (Eerro Magnetic material)  :- वे पदार्थ जो चुम्बकीय क्षेत्र में रखे जाने पर क्षेत्र की दिशा में प्रबल रूप से चुम्बकित हो जाते हैं तथा किसी चुम्बक के समीप लाने पर सिरे की ओर तेजी से आकर्षित होते हैं लौह चुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। जैसे लोहा कोबाल्ट, निकिल, मैग्नेटाइट    (Fe3O4) आदि। लौह चुम्बकत्व का कारण लौह चुम्बकीय पदार्थों के परमाणुओं में होने वाली कुछ ऐसी जटिल क्रियायें हैं जिनके कारण पदार्थ के परमाणुओं के असंख्य अति सूक्ष्म आकार के प्रभावी क्षेत्र बन जाते हैं जिन्हें डोमेन कहतें (Domains) हैं। प्रत्येक डोमेन में 1017 से 10²¹ तक परमाणु होते हैं। लौह चुम्बकीय पदार्थों का चुम्बकीय गुण इन्हीं डोमेनों के परस्पर प्रतिस्थापन व घूर्णन से होता है।

क्यूरी ताप (Curie temperature) :- वह ताप जिस पर किसी लौह चुम्बकीय पदार्थ को गरम करने पर उसका लौह चुम्बकीय गुण एकाएक लुप्त हो जाता है तथा पदार्थ अनुचुम्बकीय हो जाता है और ठंडा करने पर पुनः लौह चुम्बकीय हो जाता है, क्यूरी ताप कहलाता है। लोहे का क्यूरी ताप 770ºC तथा निकिल 360ºC होता है।

नर्म लोहा एवं फौलाद का चुम्बकीय गुण :- यदि हम दो समान आकार की नर्म लोहे एवं फौलाद की छडें लेकर उन्हें बारी-बारी से एक परिनलिका में रख कर चुम्बकित करें तो देखते हैं कि नर्म लोहे की छड़ आसानी से चुम्बकित हो जाती है परन्तु फौलाद की छड़ कम चुम्बकित हो जाती है लेकिन परिनलिका में धारा प्रवाह बन्द करने पर नर्म लोहे की छड़ तुरन्त विचुम्बकित हो जाती है लेकिन फौलाद की छड़ में चुम्बकीय गुण बना रहता है। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि नर्म लोहे के डोमेन चुम्बकीय क्षेत्र में आसानी से संरेखित हो जाते हैं तथा चुम्बकीय क्षेत्र हटाने पर तुरन्त डोमेन अपने पुराने क्रम में व्यवस्थित हो जाते हैं लेकिन फौलाद में डोमेन जल्दी संरेखित नहीं होते हैं और एक बार संरेखित हो जाने के बाद वे आसानी से (चुम्बकीय क्षेत्र हटाने के बाद) अपने पुराने क्रम में व्यवस्थित नहीं होते हैं। नर्म लोहे से अस्थायी चुम्बकों का निर्माण किया जाता है जिनका उपयोग बिली की घंटी में, टेलीफोन अभिग्राही व रिले में तथा ट्रांसफार्मर व डायनमो के क्रोड में किया जाता है। फौलाद से स्थायी चुम्बकों का निर्माण किया जाता है जिनका उपयोग दिक्सूचक, लाउडस्पीकर तथा विद्युत मापक यंत्रों के स्थायी चुम्बक बनाने में किया जाता है।

भू-चुम्बकत्व (Earth’s Magnetism) :-  हमारी पृथ्वी इस प्रकार व्यवहार करती है जैसे उसके अन्दर कोई बहुत बड़ा चुम्बक रखा हो इसकी पुष्टि करने वाले तथ्य हैं जैसे चुम्बकीय सुई का सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरना, पृथ्वी में गड़े लोहे के टुकड़े का चुम्बक बन जाना आदि। पृथ्वी के चुम्बकत्व के बारे में अभी तक कई विचार प्रतिपादित किये गये हैं परन्तु वैज्ञानिक अभी तक इसका कोई निश्चित कारण नहीं बता पाये हैं। पृथ्वी के चुम्बकत्व के निम्नलिखित तीन अवयव होतें हैं-

(1) दिक्पात का कोण (Angle of Declination) :- यह किसी स्थान पर चुम्बकीय यामोत्तर तथा भौगोलिक यामोत्तर के बीच का कोण है।

(2) नति या नमन कोण (Angle of Declination) :-पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा तथा क्षैतिज दिशा के बीच बनने वाले कोण को कहतें हैं।

(3) पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक  :-  किसी स्थान पर चुम्बकीय यामोत्तर में कार्य करने वाले पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक H =Be Cos θ होता है।

विघुत चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) :-  जब किसी कुण्डली तथा चुम्बक के बीच सापेक्ष गति होती है कुण्डली में एक विघुत वाहक बल उत्पन्न होता है जिसे प्रेरित विघुत वाहक बल कहतें हैं तथा इस घटना को विघुत चुम्बकीय प्रेरण कहते हैं। यदि कुण्डली एक बन्द परिपथ में है तो इस प्रेरित विघुत वाहक बल के कारण कुण्डली में धारा प्रवाहित होने लगती है जिसे प्रेरित धारा कहते हैं।

भंवर धारायें (Eddy current) :- जब कोई धातु का टुकड़ा किसी परिवर्ती चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित होता है तो धातु के सम्पूर्ण आयतन में प्रेरित धारायें उत्पन्न हो जाती हैं जो कि धातु के टुकड़े की गति का विरोध करती हैं। इन धाराओं को भॅवर धारा कहा जाता है। ये धारायें इतनी प्रबल हो सकती है कि धातु के टुकड़े को पिघला सकती हैं।

विद्युत ( Electricity)

विद्युत ( Electricity)

विद्युत आवेष  (Electric Charge) :-  प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक थेल्स के अनुसार जब अम्बर नामक पदार्थ को ऊन से रगड़ा जाता है तो उसमें हल्की वस्तुओं जैसे कागज आदि को आकर्षित करने का गुण आ जाता है। सन् 1600 में इंग्लैण्ड के डा0 गिवर्ट ने भी यह पाया कि अम्बर की भाॅति कुछ अन्य पदार्थों में भी रगड़ने के बाद आकर्षण का गुण आ जाता है। इस गुण को प्राप्त कर लेने पर पदार्थ वैद्युतमय हो जाते हैं तथा वह कारण जिससे यह गुण उत्पन्न होता है, विद्युत कहलाता है। किसी पदार्थ के वैद्युतमय हो जाने पर विद्युत आवेश कहा जाता है कि पदार्थ ने आवेश प्राप्त कर लिया। आवेश दो प्रकार के होते हैं- धनात्मक व ऋणात्मक। ये आवेश पदार्थ में उपस्थित धनावेशित तथा ऋण आवेशित कणों की संख्या पर निर्भर करते हैं। उदासीन पदार्थ में इनकी संख्या समान होती है परन्तु धनावेशित पदार्थ ऋण आवेशित (इलेक्ट्रान) कणों की संख्या कम और धनावेशित कणों की संख्या अधिक होती है। इसी तरह से ऋणावेशित पदार्थों में इनकी संख्या धनावेशित पदार्थों के विपरीत होती हैं। किसी पदार्थ में आवेशों का स्थानान्तरण इलेक्ट्रानों के द्वारा होता है। आवेश का मात्रक कूलाॅम होता है।

कूलाॅम का नियम( Coulomb’SLaw) :-  इस नियम के अनुसार दो स्थिर बिन्दु आवेशों के बीच लगने वाला आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण बल दोनों आवेशों की मात्राओं के गुणनफल के अनुक्रमानुपती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के ब्युत्क्रमानुपाती होता है। यदि दो बिन्दु आवेश q¹ तथा q² एक दूसरे से त दूरी पर रखे गये हों तो उनके बीच लगने वाला बल r होगा।

                    F = 1 / 4πεο q¹ q²/r²  न्यूटन

                    जहाॅ – 1/4πϵ∪ =9.0×109 न्यूटन/मीटर2/कूलाम2

वैद्युत क्षेत्र ( Electric field) :- किसी आवेश के चारों ओर वह क्षेत्र जिसमें कोई अन्य आवेश आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण बल का अनुभव करता है, वैद्युत क्षेत्र कहलाता है तथा वैद्युत क्षेत्र में किसी स्वतंत्र धन आवेश के चलने के मार्ग को वैद्युत बल रेखा कहतें हैं। ये बल रेखायें धन आवेश से चलकर ऋण आवेश पर समाप्त होती हैं। वैद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर रखे परीक्षण आवेश पर लगने वाले बल तथा परीक्षण आवेश के मान की निष्पत्ति को उस बिन्दु पर वैद्यत क्षेत्र की तीव्रता कहतें हें। जैसे यदि किसी क्षेत्र में किसी बिन्दु पर परीक्षण आवेश qº पर लगने वाला बल F हो तो उस क्षेत्र पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता निम्न सूत्र से ज्ञात की जा सकती है-

                                 E=F /qº = 1/4πεº q/r² न्यूटन/कूलाॅम

वैद्युत विभव और वैद्युत विभवान्तर ‘‘वैद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर वैद्युत विभव किसी परीक्षण आवेश को अनन्त से उस बिन्दु तक लाने में किये गये कार्य तथा परीक्षण आवेश के मान के निष्पत्ति के बराबर होता है। यदि किसी परीक्षण आवेश को अनन्त से वैद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में एक जूल प्रति कूलाॅम कार्य करना पड़े तो उस बिन्दु पर विभव एक वोल्ट होगा। वैद्युत क्षेत्र में किसी परीक्षण आवेश को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में किये गये कार्य तथा परीक्षण आवेश के मान की निष्पत्ति को उन बिन्दुओं के बीच विभवान्तर कहतें हैं, इन दोनों का मात्रक वोल्ट होता है।

विद्युत धारा (Electric Current) :- आवेश के प्रवाह को विद्युत धारा कहतें हैं विद्युत धारा की दिशा इलेक्ट्रान या ऋण आवेश के प्रवाह के विपरीत मानी जाती है। विद्युत अपघटनी पदार्थों जैसे अम्ल, क्षार लवण के जलीय विलयन में विद्युत धारा का प्रवाह ऋणात्मक तथा धनात्मक आयनों के द्वारा होता है परन्तु ठोस पदार्थों में इसका प्रवाह इलेक्ट्रानों के द्वारा होता है। विद्युत धारा दो प्रकार की होती है दिष्ट धारा जिसमें धारा की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं होता अर्थात् धारा एक ही दिशा में बहती है तथा प्रत्यावर्ती धारा जिसमें धारा की दिशा लगातार बदलती रहती है। घरों में विद्युत की सप्लाई प्रत्यावर्ती धारा के रूप में ही की जाती है। धारा का मात्रक एम्पियर होता है।

विद्युत धारा के प्रभाव (Efect of electric current) :-  विद्युत धारा ऊष्मीय, चुम्बकीय तथा रासायनिक प्रभाव उत्पन्न करती हैं। विद्युत धारा का उष्मीय प्रवाह गतिशील इलेक्ट्रानों के चालक के परमाणुओं से टकराने से उत्पन्न होता है। बल्ब, प्रेस, ट्यूबलाइट, विद्युत हीटर आदि। यंत्र इसी प्रभाव के अन्तर्गत कार्य करते हैं। जब किसी लवण के विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तब उस विलयन का आयनांे के रूप में अपघटन शुरू हो जाता है जिसे विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव कहतें हैं। विद्युत लेपन धातु का वैद्युत परिष्करण विद्युत मुद्रण आदि क्रियायें विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव पर ही आधारित है। जब किसी चालक में विद्युत में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो उसके चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है, जिसे विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव कहतें हैं। टेलीग्राफ, टेलीफोन, विद्युत घंटी, विद्युत मोटर, पंखा आदि यंत्र इसी प्रभाव के अन्तर्गत कार्य करते हैं।

संधारित्र (Capacitor) :-  यह एक ऐसा समायोजन है जिसमें किसी चालक के आकार में परिवर्तन किये बिना उस पर आवेश की पर्याप्त मात्रा संचित की जा सकती है। संधारित्र में किसी भी आकार की दो चालक प्लेटें लगी रहती हैं जो एक दूसरे के समीप लगी रहती हैं तथा उन पर बराबर व विपरीत आवेश होता है। संधारित्र का उपयोग आवेशों को संचित करके किसी परिपथ  में क्षणिक विद्युत धारा उत्पन्न करने में, ऊर्जा संचित करने में किया जाता है- जैसे सिन्क्रोसाइक्लोट्रान नामक इलेक्ट्रानों को त्वरित करने वालें यंत्र में ऊर्जा प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रोनों का एक बड़ा बैंक होता है।, उपकरणों को चिंगारी विमुक्त करने के लिए, इलेक्ट्रानिक परिपथों में वोल्टता के उच्चावचन कम करने में तथा रेडियो व टेलीविजन के कार्यक्रमों के प्रसारण व अभिग्रहण में भी इसका प्रयोग किया जाता है।

वैद्युत प्रतिरोध (Electric resistance) :- किसी चालक में धारा प्रवाहित करने पर उसके सिरों के बीच एक विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है। इस विभवान्तर तथा धारा के अनुपात को वैद्युत प्रतिरोध (R) कहतें हैं।

              वैद्युत प्रतिरोध (R) =     चालक के सिरों के बीच उत्पन्न  विभवान्तर / प्रवाहित धारा (i)

वैद्युत प्रतिरोध किसी पदार्थ का वह गुण होता है जिसके द्वारा वह धारा के प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करता है। चालकों का प्रतिरोध कम परन्तु कुचालकों का प्रतिरोध बहुत अधिक होता है तथा गर्म करने से चालकों का प्रतिरोध बढ़ता है लेकिन अर्धचालकों का प्रतिरोध घटता है। जिन पदार्थों का प्रतिरोध शून्य होता है उन्हें अतिचालक कहतें हैं। पारा निम्न ताप 4ºK पर अतिचालक की भाॅति कार्य करता है। प्रतिरोध का मात्रक ओम (Ω) होता है।

ओम का नियम (Ohm ‘S  Law) :- इस नियम का प्रतिपादन सन्- 1826 में डाॅ0 जार्ज साइमन ओम ने किया था। इस नियम के अनुसार यदि किसी चालक की भौतिक अवस्था (जैसे ताप) में कोई परिवर्तन न हो तो उसके सिरों पर लगाये गये विभवान्तर तथा उसमें बहने वाली धारा का अनुपात नियत होता है।

                                                      v/i = नियतांक = R (प्रतिरोध)

विषिश्ट प्रतिरोध Specificity  resistance) :- किसी चालक का प्रतिरोध उसकी लम्बाई के अनुक्रमानुपाती तथा उसके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यदि चालक की लम्बाई हो तथा उसकी अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A हो तो प्रतिरोध होगा।
 R= ρ 1/A

यहाॅ ρ एक नियतांक है जिसे चालक का विशिष्ट प्रतिरोध कहतें हैं। इसका मात्रक ओम मीटर होता है।

विद्युत सामथ्र्य (Electric Power) :- कार्य करने की दर को सामथ्र्य कहतें हैं और विद्युत सामथ्र्य किसी चालक में विद्युत ऊर्जा के व्यय के दर को विद्युत सामथ्र्य कहते हैं। विद्युत सामथ्र्य का मात्रक वाॅट होता है।

विद्युत सामथ्र्य( P) =  व्यय  हुयी ऊर्जा (W) वाॅट / व्यय समय (t)

1वाॅट = 1जूल / सेकेड

वाॅट चॅूकि बहुत छोटा मात्रक है अतः इसके स्थान पर एक बड़े मात्रक किलोवाॅट का प्रयोग करते हैं। 1 किलोवाॅट =10³ वाॅट = 1000 वाॅट,       1 अश्वशक्ति = 746 वाॅट

यदि किसी बल पर 100w -.220v लिखा हो तो इसका अर्थ है कि यदि 220 वोल्ट पर जलाये तो इसमें 100 वाॅट की शक्ति क्षय होगी अर्थात 1 सकेंड में 40 जूल विद्युत ऊर्जा प्रकाश तथा उष्मा में बदल जायेगी।

घरेलू कार्यों में विद्युत (Electric in domesic uses)  :-  घरों में विद्युत का वितरण दे तारों के द्वारा किया जाता है जिसमें से एक तार को जीवित तार या फेज तार तथा दूसरे को उदासीन तार कहतें हैं। इन तारों में विद्युत के वितरण से पहले एक फ्यूज लगा रहता हैं। जो शीशा, टिन तथा ताॅबा की मिश्र घातु से बना रहता है। इसका गलनांक निम्न होता है। फ्यूज अधिक पावर सप्लाई होने या शार्ट-सर्किट होने पर पिघलकर नष्ट हो जाता है जिससे विद्युुत का प्रवाह घरेलू पउकरणों में बन्द हो जाता है और उपकरण सुरक्षित रहते हैं। घरेलू उपकरणों जैसे बल्ब, पंखा हीटर, इन तारों से समान्तर क्रम में जोड़ा जाता है जिससे इनमें समान वोल्टता की धारा प्रवाहित हो। व्यापारिक कार्यों तथा मकानों में व्यय होने वाली बिजली का मूल्य वैद्युत ऊर्जा के आधार पर निकाला जाता है तथा इसे किलोवाॅट-घंटा अथवा बोर्ड आॅफ यूनियन (B.T.U) में मापते हैं। साधारण बोलचाल में इसे यूनिट कहतें हैं।
खर्च हुयी यूनिटों की संख्या =

 विभवान्तर (वो0) × प्रवाहित धारा (ए0) × समय (घं0) /1000

 जहां वो0 = वोल्ट
                            ए0 = एम्यिर
                            घं0 = घंटा
                          

विद्युत वेल्डिंग :-   इसमें धातु की दो छड़ों को एक दूसरे से सम्पर्क में लाकर तेजी के साथ विद्युत प्रवाहित की जाती है। चॅूकि दोनों छडों के सम्पर्क बिन्दु पर प्रतिरोध शक्ति बहुत अधिक होती है जिससे वेल्डिंग के लिए अपेक्षित अत्यधिक ताप शीघ्र ही उत्पन्न हो जाता है।

ओटेक तकनीक :-  यह ओसन थर्मल इनर्जी कनवर्जन का संक्षिप्त नाम है। यह तकनीक समुद्र जल द्वारा ग्रहीत ऊर्जा के विद्युत ऊर्जा में परिणत करने की एक प्रणाली है।

सेफ्टी फ्यूज :- यह टिन और सीसा की मिश्र धातु से बना निम्न द्रवणांक और उच्च प्रतिरोध शक्ति वाला तार होता है जिसका प्रयोग मुख्य विद्युत प्रतिष्ठापन को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए किया जाता है।

प्रकाश (Light)

प्रकाश (Light)

प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है जो आखों को संवेदित कर वस्तुओं के रंग रूप आदि का ज्ञान कराती है। प्रकाश के सन्दर्भ में सर्वप्रथम न्यूटन ने ’कणिका सिद्धान्त’ प्रतिपादित किया था। उसके अनुसार प्रकाश छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना होता है लेकिन बाद में हाइगेन्स ने अपने सिद्धान्त में कहा कि प्रकाश तरंगों के रूप में गमन करता है जिसकी पुष्टि यंग ने अपने व्यतिकरण प्रयोगों द्वारा की परन्तु उसके द्वारा प्रकाश वैद्युत प्रभाव की व्याख्या नहीं की जा सकती। सन्- 1973 में मैक्सवेल ने बताया प्रकाश एक प्रकार की विद्युत चुम्बकीय तरंगे हैं परन्तु उसके द्वारा भी प्रकाश वैद्युत प्रभाव की व्याख्या नहीं की जा सकी। बाद में सन् 1905 में आइंस्टाइन ने बताया कि प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे बंडलों का समुच्चय है। इन बंडलों को फोटाॅन कहते हैं। आज के समय में प्रकाश के कुछ गुणों जैसे विवर्तन, व्यतिकरण ध्रुवीकरण आदि की व्याख्या तरंग प्रकृति के आधार पर तथा कुछ गुणों जैसे प्रकाश वैद्युत प्रभाव की व्याख्या प्रकाश के आइंस्टाइन के सिद्धान्त के आधार पर की जाती है। इस प्रकार से प्रकाश दो प्रकार के गुणों को प्रदर्शित करता है।

प्रकाश का वेग एवं रेखीय संचरण (Veloc ity of light and Rectilinear Propagation) :-  प्रकाश की चाल सर्वप्रथम फोकाल्ट नामक वैज्ञानिक ने ज्ञात किया और बताया कि निर्वात या वायु में प्रकाश की चाल तीन लाख किलो मीटर प्रति सेकेंड होती है। प्रकाश की चाल माध्यम के अपवर्तनंाक पर भी निर्भर करती है। किसी माध्यम में प्रकाश की चाल को निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जा सकता है- v = μc

          जहाॅ v = माध्यम में प्रकाश की चाल।
               μ = माध्यम का अपवर्तनांक।
              c = निर्वात में प्रकाश की चाल।

प्रकाश की तरंगे सीधी रेखा में चलती हैं परन्तु रास्ते में कोई अवरोध पर ये अवरोधों के किनारों पर मुड़ जाती हैं। इस घटना को प्रकाश का विवर्तन कहतें हैं।

प्रिज्म द्वारा प्रकाश का वर्णविक्षेपण (Dispersion of light by Prism) :- सूर्य के प्रकाश की किरणें किसी प्रिज्म पर पड़ने के बाद सात रंगों में बट जाती हैं। इस प्रकार से प्राप्त रंगों के समूह को वर्णक्रम कहतें हैं। वर्णक्रम को परदे पर लेने पर ऊपर से नीचे की ओर जो क्रम प्राप्त होता है, वह इस प्रकार है लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी तथा बैगनी। प्रिज्म द्वारा बैगनी रंग का विक्षेपण सबसे अधिक तथा लाल रंग का विक्षेपण सबसे कम होता है क्योंकि लाल रंग के प्रकाश की तरंग दैध्र्य सबसे अधिक तथा बैगनी रंग की तरंग दैध्र्य सबसे कम होती है। बरसात के दिनों में आसमान में दिखायी देने वाला इन्द्रधनुष पूर्ण आन्तरिक परावर्तन तथा अपवर्तन द्वारा वर्ण विक्षेपण का एक अच्छा उदाहरण है।

प्रकाश का प्रकीर्णन(Scattering of light) :- प्रकाश जब वायुमंडल से होकर गुजरता है तो रास्ते में पड़ने वाले धूल, धुएँ आदि के कणों से टकराने के कारण इसका प्रकीर्णन हो जाता है। जिस रंग के प्रकाश की तरंग दैध्र्य सबसे कम होती है, उसका प्रकीर्णन सबसे अधिक तथा जिस रंग के प्रकाश की तरंग दैध्र्य अधिक होती है, उसका प्रकीर्णन सबसे कम होता है। आकाश का नीला दिखायी देना प्रकीर्णन के कारण ही होता है क्योंकि बैगनी रंग का तरंग दैध्र्य कम होने के कारण इसका प्रकीर्णन सर्वाधिक होता है। अन्य रंग भी कुछ न कुछ प्रकीर्णित होते हैं। अतः हल्के नीले रंग का मिश्रित रंग आकाश का हो जाता है। प्रकाश के रंगों का प्रकीर्णन निम्न क्रम में होता है।
 बैगनी-जामुनी-नीला-हरा-पीला-नारंगी-लाल / प्रकीर्णन घटते हुए क्रम में

परन्तु सूर्य के डूबते या उगते समय प्रकाश अधिक दूरी तय कर हम तक पहुॅचता है। अतः अन्य रंगों का प्रकीर्णन हो जाता है और लाल रंग जिसका प्रकीर्णन सबसे कम होता है सिर्फ वही बचता है जिससे उस समय सूर्य लाल दिखायी देता है। खतरे के सिग्नलों में लाल रंग का उपयोग इसीलिए करते हैं। क्योंकि लाल रंग का प्रकीर्णन कम होने के कारण यह हमें दूर से ही दिखायी देता है।

प्रकाश तरंगों का व्यतिकरण (Interference of light Waves) :- व्यतिकरण की खोज थाॅमस यंग नामक वैज्ञानिक ने किया था। व्यतिकरण से प्रकाश के तरंग प्रवृत्ति की पुष्टि होती है। जब किसी स्रोत से समान आवृत्ति तथा समान आयाम की तंरगें चलती हैं तो माध्यम में कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश की तीव्रता अधिक तथा कुछ पर कम होती है। इस घटना को व्यतिकरण कहतें हैं। जिन स्थानों पर प्रकाश की तीव्रता अधिकतम होती है। उन बिन्दुओं पर व्यतिकरण को संपोषी व्यतिकरण तथा जिन स्थानों पर प्रकाश की तीव्रता न्यूनतम होती है, उन स्थानों पर हुए व्यतिकरण को विनाशी व्यतिकरण कहतें हैं। जल की सतह पर फैले हुए मिट्टी के तेल की परतों का रंगीन दिखायी देना तथा साबुन के बुलबुलों का रंगीन दिखायी देना व्यतिकरण के कारण ही होता है।

प्रकाश तरंगों का ध्रुवण (Polarisation of light)  :-  प्रकाश तरंगें विद्युत चुम्बकीय अनुप्रस्थ तरंगे होती हैं। इनमें विद्युत व चुम्बकीय क्षेत्र एक दूसरे के परस्पर लम्बवत् होते हैं व तरंग के संचरण की दिशा में परस्पर लम्बवत कम्पन करतें हैं। जब ये कम्पन तल में स्थिर हर दिशा में अनियमित रूप से वितरित होते हैं तो इस प्रकार की तरंग को अधु्रवित तरंग कहतें हैं। विद्युत वल्ब, ट्यूबलाइट दीपक, आदि से निकलने वाली तरंगे अधु्रवित तरंगें होती है। यदि ये कम्पन सभी दिशाओं में वितरित न होकर एक ही दिशा में हों तो ऐसी प्रकाश तरंगों को घु्रवीय तरंगे कहतें हैं। घु्रवीय प्रकाश उत्पन्न करने के लिए पोलेराइडों का उपयोग किया जाता है। गाड़ियों के हेड लाइटों के प्रकाश की चकाचैंध को रोकने के लिए पोलेराइडों का उपयोग किया जाता है तथा 3 -D फिल्मों को देखने के लिए पोलेराइड ग्लास युक्त चश्मों का प्रयोग किया जाता है।

वस्तुओं का रंग (Colour of  object ) :- कोई वस्तु हमें तभी दिखाई देती है जब वह अपने ऊपर पड़ने वाली प्रकाश की किरणों को परावर्तित करती हैं और किसी वस्तु का रंग भी इसी बात पर निर्भर करता है कि वह किस रंग की किरणों को परावर्तित करती है जैसे यदि कोई वस्तु हमें लाल दिखायी दे रही है तो इसका अर्थ है कि वह प्रकाश किरणों में उपस्थित अन्य रंगों को तो अवशेषित कर ले रही है और वह सिर्फ लाल रंग वाले भाग को परावर्तित कर रही है। यदि कोई वस्तु काली दिखायी दे रही है तो इसका मतलब है कि वह अपने ऊपर पड़ने वाली सभी किरणों को अवशोषित कर ले रही है। जबकि किसी वस्तु का सफेद दिखाई देने का अर्थ है कि वह अपने ऊपर पड़ने वाली सभी रंग के प्रकाश की किरणों को परावर्तित कर दे रही है।

प्रकाश  का परावर्तन (Reflection of light) :-  जब प्रकाश की किरणें किसी समतल पृष्ठ पर पड़ती हैं तो इसका अधिकांश भाग पृष्ठ से टकराकर वापस आ जाती है, इस घटना को प्रकाश का परावर्तन कहतें हैं। दर्पण एक अच्छा परावर्तक पृष्ठ होता है। परावर्तन में दर्पण पर पड़ने वाली किरण को आपतित किरण, परावर्तक पृष्ठ के लम्बवत् सीधी रेखा को अभिलम्ब दर्पण के पृष्ठ से टकराकर लौटने वाली किरण को परावर्तित किरण, आपतित किरण तथा अभिलम्ब के बीच कोण को आपतन-कोण तथा अभिलम्ब व परावर्तित किरण के बीच के कोण को परावर्तन कोण कहतें हैं। प्रकाश का परार्वतन दो नियमों के अन्तर्गत होता है।

(a) आपतित किरण, अभिलम्ब व परावर्तित किरण एक ही समतल में होती हैं।
(b) आपतन कोण का मान परावर्तन कोण के बराबर होता है।

दर्पण तीन प्रकार के होतें हैं। समतल, अवतल तथा उत्तल दर्पण।

 1 – समतल दर्पण (Plane of mirror) :- समतल दर्पण से बनने वाला प्रतिबिम्ब आकार में वस्तु के बराबर होता है और आभासी होता है क्योंकि इससे बनने वाले प्रतिबिम्ब को पर्दें पर नहीं लिया जा सकता है। इस दर्पण से बने प्रतिबिम्ब में पाश्र्व उत्क्रमण होता है अर्थात् दर्पण के सामने खडे़ होने पर प्रतिबिम्ब मे शरीर का बांया भाग दाहिने तरफ तथा दायां भाग बायीं तरफ दिखायी पड़ता है। समतल दर्पण से बना वस्तु का प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे उतनी ही दूर बनता है जितनी दूर दर्पण से वस्तु होती है। समतल दर्पण से अपना पूरा प्रतिबिम्ब देखने के लिए दर्पण की लम्बाई शरीर की लम्बाई की आधी होनी चाहिए। यदि किसी दर्पण की तरफ V वेग से जाया जाये तो प्रतिबिम्ब दुगुने वेग 2V से आता दिखायी पड़ता है। समतल दर्पण का उपयोग चेहरा देखने के लिए तथा बहुमूर्तिदर्शी जैसे यंत्रों में किया जाता है।

2 – अवतल दर्पण (Convave mirror) :- इस दर्पण का एक तल उभरा हुआ होता है, उभरे हुए तल पर पाॅलिस कर दी जाती है। इस दर्पण पर पड़ने वाली किरणें फोकस से होकर वापस लौटती हैं। इस दर्पण का उपयोग सोलर कुकर, कान व नाक की जाॅच करने वाले यंत्रों में, सर्चलाइट में तथा गाड़ियों के हेडलाइट में करते हैं।

 3 – उत्तल दर्पण (Convex mirror) :-  इस दर्पण में उभरे हुए तल को परावर्तक पृष्ठ की तरह प्रयोग करते हैं तथा दबे हुए सतह पर पाॅलिश करते हैं। उत्तल दर्पण से बनने वाले प्रतिबिम्ब वस्तु से छोटे सीधे तथा आभासी होते हैं। इस दर्पण का उपयोग गाड़ियों में पीछे की वस्तुओं को देखने के लिए बेैक मिरॅर के रूप में करते हैं।

प्रकाश का प्रवर्तन Refraction of light) :- प्रकाश  की किरणें जब एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करती हैं तो अपने पथ से विचलित हो जाती हैं। प्रकाश का इस प्रकार एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करते समय अपने पथ से विचलित होना ही प्रकाश का अपवर्तन कहलाता है। प्रकाश का अपवर्तन निम्नलिखत नियमों के अन्तर्गत होता है।

(a) आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा अभिलम्ब एक ही समतल में स्थित होते हैं।
(b) किन्हीं दो माध्यमों के लिए आपतन कोण के  Sine तथा अपवर्तन कोण  के Sine पदम का अनुपात एक नियतांक होता है। इसे स्नैल का नियम भी कहतें हैं।

      Sine/Sine = नियतांक = μ (माध्यम का अपवर्तनांक) प्रकाश की किरणें

जब सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती हैं तो अभिलम्ब से दूर हट जाती हैं इसी प्रकार विरल माध्यम से सघन माध्यम मे प्रवेश करने पर अभिलम्ब के पास आ जाती हैं। पानी में पड़ी मछली, या कोई वस्तु अपवर्तन के कारण ही ऊपर दिखायी देती है, यदि किसी चम्मच को पानी में आधा बाहर और आधा अन्दर रखा जाये तो चम्मच तिरक्षा दिखायी देता है। यह भी अपवर्तन के कारण ही होता है। इसी तरह तारों का टिमटिमाना भी अपवर्तन के कारण होता है क्योकि वायुमंडल में सघनता भिन्न-भिन्न स्थानो पर अलग-अलग होती है जिससे तारों से आने वाले प्रकाश का अपवर्तन होता रहता है और तारे हमें टिमटिमाते हुए दिखायी देते हैं। यदि कोई वस्तु μ अपवर्तनांक वाले द्रव में रखी है तथा द्रव में आभासी गहराई x¹ मीटर है तो उसकी वास्तविक गहराई होगीः वास्तविक गहराई (x) = आभासी गहराई (x¹)x अपवर्तनांक μ

पूर्ण आन्तरिक परावर्तन (Total internal reflection) :-  जब प्रकाश की किरणें सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती हैं तो अभिलम्ब से दूर हटती जाती हैं। यदि आपतन कोण का मान बढ़ाते जाये तो एक स्थिति ऐसी आती है जिसके लिए परवर्तन कोण का मान 90º हो जाता है। आपतन कोण के इस मान को क्रान्तिक कोण कहतें हैं। क्रान्तिक कोण का मान जल के लिए 48.5º तथा हीरे के लिए 24.4º होता है। यदि आपतन कोण का मान क्रान्तिक कोण से थोड़ा अधिक करदें तो प्रकाश की किरणें विरल माध्यम में न जाकर सघन माध्यम में वापस आ जायेंगी। इस घटना को पूर्ण परावर्तन कहतें हैं। हीरे का चमकना तथा अप्टिकल फाइबर की कार्यप्रणाली इसी सिद्धान्त के अन्तर्गत आती हैं। आप्टिल फाइबर का प्रयोग प्रकाशीय तथा विद्युत सिग्नलों को भेजने के लिए मेडिकल व टेलीफोन के क्षेत्र में किया जाता है। मृग मरीचिका रेगिस्तानी क्षेत्रों मे गर्मी के दिनों में पानी का भ्रम पैदा करती है। इसका कारण भी पूर्ण आन्तरिक परावर्तन ही है।

लेंन्स (Lenses) :- लेंस मुख्यतया दो प्रकार के होते हैं अवतल तथा उत्तल। अवतल लेंस बीच में पतला तथा किनारों पर मोटा होता है। इसे अपसारी लेंस भी कहतें हैं क्योंकि यह अनंत से आने वाली किरणों को फैलाता है और उत्तल में मोटा तथा किनारों पर पतला होता है। इसे अभिसारी लेंस भी कहतें हैं कयोंकि यह अनन्त से आने वाली किरणों को एक जगह केन्द्रित करता है। लेंस के दोनो वक्रता केन्द्रों को जोड़ने वाली रेखा को उसका मुख्य अक्ष कहतें हैं। लेंस के मध्य बिन्दु को लेंस का प्रकाशिक केन्द्र कहतें हैं। अवतल लेंस में जिस बिन्दु से चलने वाली किरणें अपवर्तन के पश्चात् मुख्य अक्ष के समांतर हो जाती है, उसे लेंस का फोकस कहतें हैं और उत्तल लेंस में मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली किरणें जिस बिन्दु पर आकर केन्द्रित हो जाती हैं उसे उत्तल लेंस का फोकस कहतें हैं। प्रकाशिक केन्द्र से फोकस की दूरी को फोकस दूरी कहतें हैं।

लेंसो की क्षमता (Power of Lenses) :- किसी लेंस की क्षमता उसके फोकस दूरी के व्युत्क्रमानुपाती जब फोकस दूरी मीटर में मापी जाये।

              लेंस की क्षमता (P) =  1/फोकस दूरी (मी0 में)

लेंसों की क्षमता का मात्रक डायोप्टर होता है। समतल काॅच की क्षमता शून्य होती है। उत्तल लेंस की क्षमता को धनात्मक तथा अवतल लेंस की क्षमता को ऋणात्मक डायोप्टर में मापते हैं। यदि दो लेंसों को आपस में जोड़ दिया जाये तो उसकी क्षमता दोनों लेंसो की क्षमता के योग के बराबर होगी।

यदि लेंसो को द्रव में  डुबोया जाये तो उनकी क्षमता तथा प्रकृति परावर्तित हो सकती है जैसे यदि किसी लेंस को लेंस के पर्दा से कम अपवर्तनांक वाले द्रव में डुबोया जाये तो लेंस के पदार्थ से कम अपवर्तनांक वाले द्रव में डुबोया जाये तो लेंस की प्रकृति तो नहीं बदलती है परन्तु लेंस की क्षमता घट जाती है। इसी तरह से लेंस को समान अपवर्तनांक वाले द्रव में डुबाने पर लेंस समतल प्लेट की भाॅति व्यवहार करने लगता है। परन्तु यदि किसी लेंस को उसके पदार्थ के अपवर्तनांक से अधिक अपवर्तनांक वाले द्रव में डुबोया जाय तो लेंस की प्रकृति बदल जाती है अतः उत्तल लेंस अवतल लेंस की भाॅति व्यवहार करने लगता है तथा अवतल उत्तल की भाॅति। इसी कारण से पानी में हवा का बुलबुला अवतल लेंस की भाॅति व्यवहार करता है।

लेंस द्वारा आवर्धनः- लेंस द्वारा बने किसी वस्तु के प्रतिबिम्ब की लम्बाई तथा वस्तु की लम्बाई के अनुपात को रेखीय आवर्धन कहतें हैं।

             रेखीय m = प्रतिबिम्ब की लम्बाई / वस्तु की लम्बाई 

प्रदीप्त वस्तुएँ :- वे वस्तुएं जो स्वयं प्रकाश उत्पन्न करती हैं। जैसे सूर्य, तारे, विद्युत वल्ब आदि।

अप्रदीप्त वस्तुएँ :-  स्वयं प्रकाश उत्पन्न नहीं करती हैं। जैसे मेज, कुर्सी, दीवारें, चन्द्रमा आदि।

स्नैल का नियम – इनकेे अनुसार किन्हीं दो माध्यमों के लिए तथा एक ही रंग के प्रकाश के लिए आपतन कोण की ज्या (Sine) तथा अपवर्तन कोण की ज्या (Sine) का अनुपात एक नियतांक होता है।

 Sine i /Sin r = नियतांक

मुख्य फोकस :- जब किसी दर्पण पर मुख्य अक्ष के समान्तर प्रकाश-किरणें आपतित होती हैं, तब परावर्तन के पश्चात् वे जिस बिन्दु से होकर जाती हैं या जिस बिन्दु से आती हुई प्रतीत होती है उसे दर्पण का मुख्य फोकस कहतें हैं।

मुख्य अक्ष :- दर्पण के वक्रता केन्द्र तथा धु्रव अक्ष को मिलाने वाली रेखा को दर्पण का मुख्य अक्ष कहतें हैं।

प्रकाशिक केन्द्र :- लेंस के मुख्य अक्ष पर स्थित वह बिन्दु जिससे होकर जाने वाली प्रकाश किरण अपवर्तन के बाद आपतित किरण के समानान्तर निकलती है, प्रकाशिक केन्द्र कहलाता है।

क्रांतिक कोण :-  सघन माध्यम में वह आपतन कोण है जिसके लिए विरल माध्यम में अपवर्तन कोण  90ºC होता है। इसका मान दोनों माध्यमों तथा प्रकाश के रंग पर निर्भर करता है।

लेंसो की अभिसारी एवं अपसारी क्रियाएं :-  उत्तल लेंस प्रकाश किरणो को एक बिन्दु पर एकत्रित करता है। इस कारण इस लेन्स को अभिसारी लेंस कहतें हैं। इसके विपरीत अवतल लेंस इसके विपरीत अवतल लेंस पर गिरने वाली किरणें लेंस के दोनों पृष्ठों से अपवर्तित होकर मुख्य अक्ष से बाहर की ओर विभिन्न कोणों से मुड़ जाती हैं तथा फैलकर अधिक दूर-दूर हो जाती हैं। अतः इन्हें अपसारी लेंस कहतें हैं।

फोटो मीटर :- यह एक प्रकार का उपकरण है जिसका प्रयोग प्रकाश के दो स्रोतों की प्रदीप्त क्षमता की तुलना में किया जाता है। सामान्यतः रम्फोर्ड फोटोमीटर और बुन्सेन का ग्रीज स्पाॅट फोटोमीटर का प्रयोग किया जाता है।

अवरक्त किरण :-  दृश्य वर्णकपट के दोनों ओर अदृश्य विकिरण रहता है, जो दृष्टि संवेदना उत्पन्न नहीं करता है। दृश्य वर्णपट के लाल छोर के बाहर जो विकिरण रहता है, उसे ही अवरक्त विकिरण कहा जाता है। इसका तंरग दैध्र्य 40000,000 Aº  तक होता है।

पराबैगनी किरण :-  द्श्य वर्णपट के बैगनी रंग वाले छोर के बाहर 1000 Aº तरंग दैध्र्य के विकिरण को पराबैगनी विकिरण कहा जाता है।

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