भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन (Arrival of European Companies in India)

भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन (Arrival of European Companies in India)

यूरोप के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्ध बहुत पुराने, यूनानियों के जमाने से है।
भारत-यूरोपीय व्यापारिक मार्ग जहां से भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन (Arrival of European Companies in India) हुआ |
प्रायः तीन मार्गो से यूरोपीय देशों के साथ व्यापार होता था-

उत्तरीमार्ग अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया से होता हुआ कैस्पियन सागर, काला सागर की ओर जाता था और कुस्तुन्तुनिया जाकर समाप्त होता था।
मध्यम मार्ग – फारस तथा सीरिया से होता हुआ भूमध्य सागर के तट पर लेवान्त तक पहुंचता था
दक्षिणी मार्ग – यह अरब सागर, फारस की खाड़ी तथा लाल सागर से मिस्र होता हुआ भूमध्य सागर के तट पर स्थित सिकन्दरिया तक जाता था

– बेनिस अथवा जेनेवा के व्यापारी यहाँ से भारतीय माल को खरीदकर यूरोपीय देशेां में पहुँचाते थे।

पुर्तगालियों का भारत आगमन : (Arrival of Portuguese in India)

भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, आर्थिक सम्पन्नता, आध्यात्मिक उपलब्धियाँ, दर्शन, कला आदि से प्रभावित होकर मध्यकाल में बहुत से व्यापारियों एवं यात्रियों का यहाँ आगमन हुआ। किंतु 15वीं शताब्दियों के उत्तरार्ध एवं 17वीं शताब्दी के पूर्वार्ध के मध्य भारत में व्यापार के प्रारंभिक उद्देश्यों से प्रवेश करने वाली यूरोपीय कम्पनियों ने यहाँ की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक नियति को लगभग 350 वर्षों तक प्रभावित किया। इन विदेशी शक्तियों में पुर्तगाली प्रथम थे। इनके पश्चात् डच, अंग्रेज, डेनिश तथा फ्रांसीसी आए।

यूरोपीय शक्तियों में पुर्तगाली कंपनी ने भारत में सबसे पहले प्रवेश किया। भारत के लिए नए समुद्री मार्ग की खोज पुर्तगाली व्यापारी वास्कोडिगामा ने 17 मई, 1498 को भारत के पश्चिमी तट पर अवस्थित बंदरगाह कालीकट पहुँचकर की। वास्कोडिगामा का स्वागत कालीकट के तत्कालीन हिन्दू शासक जमोरिन द्वारा किया गया। तत्कालीन भारतीय व्यापार पर अधिकार रखने वाले अरब व्यापारियों को जमोरिन का यह व्यवहार पसंद नहीं आया, अतः उनके द्वारा पुर्तगालियों का विरोध किया गया भारत आने और जाने में हुए यात्रा-वयय के बदले में वास्कोडिगामा ने करीब 60 गुना अधिक धन कमाया।

इसके बाद धीरे-धीरे पुर्तगालियों ने भारत आना आरम्भ कर दिया। भारत में कालीकट, गोवा, दमन, दीव एवं हुगली के बंदरगाहों में पुर्तगालियों ने अपनी व्यापारिक कोठियों की स्थापना की। भारत में द्वितीय पुर्तगाली अभियान पेड्रो अल्वरेज़ कैब्राल के नेतृत्व में सन् 1500 ई0 में छेड़ा गया। कैब्राल ने कालीकट बंदरगाह में एक अरबी जहाज को पकड़कर जमोरिन को उपहारस्वरूप भेंट किया। 1502 ई0 में वास्कोडिगामा का पुनः भारत आगमन हुआ। भारत में प्रथम पुर्तगाली फैक्ट्री की स्थापना 1503 ई0 में कोचीन में की गई तथा द्वितीय फैक्ट्री की स्थापना 1505 ई0 में कन्नूर में की गयी।

पुर्तगाल से प्रथम वायसराय के रूप में ’फ्रासिस्को द अल्मेडा’ का आगमन सन् 1505 ई0 में हुआ। यह 1509 ई0 तक भारत में रहा। उसके द्वारा अपनाई गयी यह नीति’नीले या शांत जल की नीति’ कहलाई 1508 ई0 में अल्मेड़ा संयुक्त मुस्लिम नौसैनिक बेड़े (मिश्र , तुर्की , गुजरात) के साथ चौल के युद्ध (War of Chaul, 1508) में पराजित हुआ। अगले वर्ष अर्थात् 1509 ई0 में अल्मेडा ने इसी संयुक्त मुस्लिम बेड़े को पराजित किया। इसने हिन्द महासागर में पुर्तगालियों की स्थति को मजबूत करने के लिए सामुद्रिक नीति को अधिक महत्व दिया।

सन् 1509 ई0 में भारत में अगले पुर्तगाली वायसराय के रूप में अल्फांसो द अल्बुकर्क का आगमन हुआ। इसे भारत में पुर्तगाल शक्ति का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। इसने कोचीन को अपना मुख्या बनाया। अल्बुकर्क ने 1510 ई0 में गोवा को बीजापुर के शासक युसुफ आदिलशाह से छीनकर अपने अधिकार क्षेत्र में कर लिया। इसने 1511 ई0 में दक्षिण-पूर्व एशिया की महत्वपूर्ण मंडी ’मलक्का’ तथा 1515 ई0 में फारस की खाड़ी में अवस्थित होरमुज पर अधिकार कर लिया। अल्बुकर्क ने पुर्तगाली पुरुषों को पुर्तगालियों की आबादी बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय स्त्रियों से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया तथा पुर्तगाली सत्ता एवं संस्कृतिक के महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में गोवा को स्थापित किया। यह वह समय था जब पुर्तगालियों ने प्रत्यक्ष रूप से भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया।

नीनो-डी-कुन्हा अगला प्रमुख पुर्तगाली गवर्नर था। इसका प्रमुख कार्य गोवा को पुर्तगालियों की औपचारिक राजधानी (1530ई0) के रूप में परिवर्तित करना था। 1530 ई0 में कुन्हा ने सरकारी कार्यालय कोचीन से गोवा स्थानान्तरित कर दिया कुन्हा ने हुगली (बंगाल) और सेन्थोमा (मद्रास के निकट) में पुर्तगाली बस्तियों को स्थापित किया एवं 1534 ई0 में बेसीन तथा 1535 ई0 में दीव पर अधिकार कर लिया। बेसीन के प्रश्न पर उसने गुजरात के शासक बहादुरशाह से युद्ध किया। इसमें बहादुरशाह की पराजय हुई तथा समुद्र में डूब जाने से उसकी मृत्यु हो गयी।

पश्चिम भारत के बंबई चैल, दीव, सालसेट एवं बेसीन नामक क्षेत्र पर पुर्तगाली वायसराय जोवा-डी-कैस्ट्रो द्वारा नियंत्रण स्थापित किया गया। भारत में प्रथम पादरी फ्रांसिस्कों जेवियर का आगमन अन्य पुर्तगाली गवर्नर अल्फांसो डिसूजा (1542-1545 ई.) के समय हुआ। पुर्तगाली एशियाई देशों से व्यापार के लिए भारत में अवस्थित नागपट्टनम बंदरगाह का प्रयोग करते थे। वे कोरोमण्डल तट पर मसुलीपट्टनम और पुलिकट शहरों से वस्त्रों को एकत्रित कर उनका निर्यात करते थे। पुर्तगाली चटगाँव (बंगाल) के बंदरगाह को महान बंदरगाह की संज्ञा देते थे।

पुर्तगालियों ने हिन्द महासागर से होने वाले आयात-निर्यात पर एकाधिकार स्थापित कर लिया था। उन्होंने यहाँ काॅट्र्ज-आर्मेडा काफिला पद्धति ;ब्वतजमे.।तउंकम ब्ंतंअंद ैलेजमउद्ध का प्रयोग किया जिसके अंतर्गत हिन्द महासागर का प्रयोग करने वाले प्रत्येक जहाज को शुल्क अदा करना होता था। पुर्तगालियों ने बिना परमिट (या काॅट्र्ज) के भारतीय एवं अरबी जहाजों को अरब सागर में प्रवेश करने से वर्जित कर दिया। पुर्तगालियों ने शुल्क लेकर छोटे स्थानीय व्यापारियों के जहाजों को संरक्षण प्रदान किया। जिन जहाजों को परमिट प्रापत होता था उन्हें गोला बारूद और काली मिर्च का व्यापार करने की अनुमति नहीं थी। मुगल सम्राट अकबर को भी पुर्तगालियों से काॅट्र्ज (परमिट) लेना पड़ा। मुगल शासक अकबर के दरबार में दो पुर्तगाली ईसाई पादरियों माॅन्सरेट तथा फादर एकाबियवा का आगमन हुआ। शाहजहाँ ने 1632 ई0 में हुगली को पुर्तगालियों के अधिकार क्षेत्र से छीन लिया। तत्पश्चात् औरंगजेब ने सन् 1686 ई0 में चटगाँव से समुद्री लुटेरों का सफाया कर दिया।

भारत में तंबाकू की खेती, जहाज निर्माण (कालीकट एवं गुजरात) तथा प्रिटिंग प्रेस की शुरूआत पुर्तगालियों के आगमन पश्चात् हुई। पुर्तगालियों ने ही सन् 1956 ई0 में गोवा में प्रथम प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की। भारत में गोथिक स्थापत्य कला (Gothic Architecutre) पुर्तगालियों की ही देन है।
18वीं सदी की शुरूआत तक भारतीय व्यापार के क्षेत्र में पुर्तगालियों का प्रभाव कम हो गया था। यद्यपि पुर्तगालियों ने भारत में सर्वप्रथम प्रवेश किया, किंतु उनकी धार्मिक असहिष्णुता की नीति, बर्बरतापूर्ण समुद्री लूटपाट की नीति, अल्बुकर्क के अयोग्य उत्तराधिकारी, अंग्रेजी तथा डच शक्तियों (Cortes-Armade Caravan System) का विरोध, विजयनगर साम्राज्य का पतन तथा स्पेन द्वारा पुर्तगाल की स्वतन्त्रता का हरण इत्यादि अनेक कारणों से भारतीय व्यापार के क्षेत्र से उनका पतन हो गया।

भारत में डचों का आगमन (Arrival of the Dutch in India)

पुर्तगालियों के पश्चात् डच भारत आये। ये नीदरलैण्ड या हाॅलैण्ड के निवासी थे। डचों की नीयत दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला बाजारों में सीधा प्रवेश कर नियंत्रण स्थापित करने की थी। 1596 ई0 में कारनेलिस डि हाउटमैन (Cornelis de Houtman) भारत अपने वाला प्रथम डच नागरिक था। डचों ने सन् 1602 ई0 में एक विशाल व्यापारिक कम्पनी की स्थापना ’यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी आॅफ नीदरलैण्ड’ के नाम से की। इसका गठन विभिन्न व्यापारिक कम्पनियों को मिलाकर किया गया था। इसका वास्तविक नाम ’वेरिंगदे ओस्टइण्डिशे कंपनी’ (Verenigde Oostindische Compagnie-VOC) था।

डचों ने पुर्तगालियों से संघर्ष कर उनकी शक्ति को क्षीण कर दिया तथा भारत के सभी महत्वपूर्ण मसाला उत्पादन के क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। डचों ने गुजरात, बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में अपने व्यापारिक कोठियों की स्थापना की। भारत में प्रथम डच फैक्ट्री की स्थापना मसुलीपट्टनम् में सन् 1605 ई0 में हुई। इसके अतिरिक्त डचों द्वारा स्थापित अन्य महत्वपूर्ण फैक्ट्रियाँ पुलिकट (1610), सूरत (1616), चिन्सुरा, विमलीपट्टनम्, कासिम बाजार, पटना, बालासोर, नागपट्टनम तथा कोचीन में अवस्थित थीं। बंगाल में प्रथम डच फैक्ट्री की स्थापना पीपली में सन् 1627 ई0 में की गयी। भारत से डच व्यापारियों ने मुख्यतः मसालों, नील, कच्चे रेशम, शीशा, चावल व अफीम का व्यापार किया। डचों द्वारा मसालो के निर्यात के स्थान पर कपड़ों को प्राथमिकता दी गयी। ये कपड़े कोरोमंडल तट (बंगाल) एवं गुजरात से निर्यात किए जाते थे। भारत को भारतीय वस्त्रों के निर्यात का केन्द्र बनाने का श्रेय डचों को जाता है।

विदेशी कंपनियाँ-

  1. एस्तादो द इंडिया (पुर्तगाली कंपनी)-1498
  2. वेरिंगिदे ओस्त इण्डिशे कंपनी (डच ईस्ट इंडिया कंपनी)-1602
  3. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी-1600 (1599)
  4. डेन ईस्ट इंडिया कंपनी -1616
  5. कम्पने देस इण्देस ओरियंतलेस (फ्रांसीसी कंपनी) -1664

1759 ई0 में ’बेदरा के युद्ध (बंगाल) में अंग्रेजों द्वारा हुई पराजय के उपरांत भारत में अंतिम रूप से डचों का पतन हो गया। ’बेदरा के युद्ध’ में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व क्लाइव द्वारा किया गया। अंग्रेजों की तुलना में नौ-सैनिक शक्ति का कमजोर होना, अत्यधिक केन्द्रीकरण की नीति, बिगडती हुई आर्थिक स्थिति, मसालों के द्वीपों पर अत्यधिक ध्यान देना आदि को डचों के पतन के कारणों में गिना जाता है। डचों की व्यापारिक व्यवस्था का उल्लेख 1722 ई0 के दस्तावेजों में मिलता है। यह कार्टेल ;ब्ंतजमसद्ध अर्थात् सहकारिता पर आधारित व्यवस्था थी।
डच कम्पनी ने लगभग 200 वर्षों तक अपने साझेदारों को जितना लाभांश दिया ;18ःद्ध वह वाणिज्य के इतिहास में एक रिकाॅर्ड माना जाता है।

यूरोपीय व्यापारिक कंपनी से संबद्ध व्यक्ति

  • वास्कोडिगामा – भारत आने वाला प्रथम यूरोपीय यात्री
  • पेड्रो अल्वरेज कैब्राल भारत आने वाला द्वितीय पुर्तगाली।
  • फ्रांसिस्को डि अल्मेडा -भारत का प्रथम पुर्तगाली गवर्नर
  • जाॅन मिंल्डेनहाल -भारत आने वाला प्रथम ब्रिटिश नागरिक।
  • कैप्टन हाॅकिन्स – प्रथम अंग्रेज दूत जिसने सम्राट जहाँगीर से भेंट की।
  • जैराॅल्ड आॅन्गियान – बम्बई का संस्थापक।
  • जाॅब चाॅरनाक – कलकत्ता का संस्थापक।
  • चाल्र्स आयर – फोर्ट विलियम (कलकत्ता) का प्रथम प्रशासक।
  • विलियम नाॅरिस – 1638 में स्थापित नई ब्रिटिश कंपनी ’टेªडिंग इन द ईस्ट’ का दूत जो व्यापारिक विशेषाधिकार हेतु
  • औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हुआ।
  • फ्रैंकोइस मार्टिन – पण्डिचेरी का प्रथम फ्रांसीसी गवर्नर।
  • फ्रांसिस डे – मद्रास का संस्थापक।
  • शोभा सिंह – बर्धमान का जमींदार, जिसने 1690 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया।
  • इब्राहिम खाँ – कालीकाता, गोबिन्दपुर तथा सुतानटी का जमींदार।
  • जाॅन सुरमन – मुगल सम्राट फर्रुखसियर से विशेष व्यापारिक सुविधा प्राप्त करने वाले शिष्टमंडल का मुखिया।
  • फादर माॅन्सरेट – अकबर के दरबार में पहुँचने वाले प्रथम शिष्टमंडल का अध्यक्ष।
  • कैरोन फ्रैंक – इसने भारत में प्रथम फ्रांसीसी फैक्ट्री की सूरत में स्थापना की।

ब्रिटिश, डच, फ्रांस की कंपनी (Company of the British, Duch, France)

भारत में अंग्रेजों की कम्पनी की स्थापना (Establishment of the British company in India)

31 दिसम्बर 1600 को ब्रिटेन की महारानी एलिजावेथ प्रथम ने एक अंग्रेज कम्पनी को 15 वर्ष के लिए पूर्व के साथ व्यापार करने की अनुमति प्रदान की। इस कम्पनी का प्रारम्भिक नाम The Governer and Company of Marchants of Landon Trading into the East Indies था। 1688 में एक और कम्पनी न्यू कम्पनी का उदय हुआ 1702 ई0 में इन दोनों कम्पनियों ने आपस में मिलने का फैसला किया और 1708 में मिल गयी तब इसका नाम The Governer and Company of Marchants of Landon Trading into the East Indies रखा गया। 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा इसका नाम ईस्ट इंण्डिया कम्पनी पड़ गया।

अंग्रेजी फैक्ट्रियां

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना के बाद 1601 ई0 में इन्होंने अपने पहले अभियान दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में किये। 1608 ई0 में जेम्स-प्रथम ने सर्वप्रथम हाॅकिन्स को राजदूत बनाकर अकबर के नाम का पत्र देकर भारत भेजा परन्तु वह मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में पहुँचा। वह तुर्की और फारसी दोनों भाषायें बोल सकता था। उसने फारसी भाषा में वात भी किया। जहाँगीर ने खुश होकर उसे 400 का मनसब प्रदान किया और 1608 ई0 में ही सूरत में एक Factory खोलने की अनुमति दी परन्तु पुर्तगीज दबाव के कारण यह अनुमति शीघ्र ही रद्द कर दी गयी। इस प्रकार हाॅकिन्स को व्यापारिक रियासत प्राप्त करने में सफलता नहीं मिली। अब अंग्रेजों ने दक्षिण भारत की ओर रुख किया और उन्होंने 1611 ई0 में मसूली पट्टम में एक व्यापारिक कोठी खोली। 1611ई0 में गुजरात के तट पर स्वाल्ली के युद्ध में पुर्तगीजों को अंग्रेजों ने परास्त कर दिया तब इन्हें 1612 ई0 में सूरत में Factory खोलने की अनुमति दी गयी जो इनकी किले-बन्द फैक्ट्री थी।1623 ई0 तक इन्होंने सूरत भड़ौच अहमदाबाद, आगरा, आदि क्षेत्रों में भी फैक्ट्रियां स्थापित कर लीं।

  • 1608    –    सूरत-प्रथम फैक्ट्री
  • 1611    –    मसूली पट्टम-प्रथम दक्षिण भारत में फैक्ट्री
  • 1612    –    सूरत प्रथम किलेबन्द फैक्ट्री।

दक्षिण में पूर्वी तट पर फैक्ट्रियां

1611 मसूली पट्टम (मछलीपट्टम) गोलकुण्डा राज्य का प्रसिद्ध बन्दरगाह था। यहाँ से अंग्रेज फुटकर कपड़े फारस आदि देशों को भेजते थे।
1632 सुनहला फरमान:- इस फरमान के द्वारा गोलकुण्डा के सुल्तान ने 500 पगोड़ा वार्षिक कर के बदले में व्यापारिक छूट प्रदान की। इसे ही Golden Farmer कहा गया।
1639:- एक अंग्रेज फांसिसडे ने चन्द्रगिरि के राजा से एक क्षेत्र किराये पर लिया जहाँ पर एक किलेबन्द फैक्ट्री फोर्टसेंट जार्ज की स्थापना की गई।
उत्तर-पूर्व तट पर फैक्ट्री:-  1633:- उड़ीसा में हरिहरपुर तथा बाला सोर में फैक्ट्रियां स्थापित की गयी।
1651:- ब्रिजमैन ने हुगली में व्यापारिक कोठी स्थापित की। फिर उसी वर्ष पटने और कासिम बाजार में भी व्यापारिक कोठियां स्थापित हुई।
1658:- बंगाल बिहार उड़ीसा और कोरोमण्डल तट की सभी प्रमुख फैक्ट्रियाँ फोर्टसेंट जार्ज के अधीन कर दी गयी।
बंगाल में अंग्रेजी व्यापार की प्रमुख वस्तुयें रेशमी कपड़े, सूती कपड़े, शोरा, और चीनी थी।
1669:- इस वर्ष सूरत के गर्वनर औगियान (एवं बम्बई के प्रमुख) ने प्रसिद्ध वक्तब्य दिया ’’अब समय का तकाजा है कि हम अपने एक हाथ में तलवार लेकर अपने व्यापार का प्र्बन्ध करें’’।
बम्बई:- बम्बई का द्वीप पुर्तगीज राजकुमारी कैथरीन की ब्रिटिश राजकुमार चाल्र्स के साथ विवाह के उपलक्ष्य में पुर्तगालियों ने अंग्रेजों को 1661 ई0 में दिया, जिसे 1668 ई0 में चाल्र्स ने ईस्ट-इंण्डिया कम्पनी को 10 पौंड वार्षिक किराये पर प्रदान किया।
1687:- इस वर्ष तक आते-आते सूरत की जगह बम्बई अंग्रेजों की प्रमुख व्यापारी बस्ती बन गयी।
1688:- बम्बई के प्रमुख सरजाॅन चाइल्ड ने बम्बई और पश्चिमी समुद्र तट पर कई मुगल जहाजों को पकड़ लिया परन्तु औरंगजेब ने उनका कठोरता से दमन किया। डेढ़ लाख रूपये हर्जाना के एवज में उन्हें आम माॅफी दे दी गयी।

बंगाल में अंग्रेजी शक्ति का विकास

1651:- बंगाल के सूबेदार सुजा ने एक फरमान के जरिये अंग्रेजों को 3000 वार्षिक कर के बदले बंगाल से व्यापार करने की छूट प्रदान की। ऐसा इसलिए किया गया था कि एक अंग्रेज चिकित्सक ग्रेबियन ब्रांटन ने राज परिवार की किसी महिला का इलाज किया था।
1651:- बंगाल के सूबेदार सुजा ने एक फरमान के जरिये अंग्रेजों को 3000 वार्षिक कर के बदले बंगाल से व्यापार करने की छूट प्रदान की। ऐसा इसलिए किया गया था कि एक अंग्रेज चिकित्सक ग्रेबियन ब्रांटन ने राज परिवार की किसी महिला का इलाज किया था।
1656:- उपरोक्त व्यापारिक छूट की पुनः पुष्टि की गयी।
1672:- साइस्ता खाँ ने पुनः छूट की पुष्टि की।
1680:- औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर अंग्रेजों से 2% चुंगी और 1.5 %जजिया कर वसूलने की आज्ञा जारी की।
1688:- अंग्रेजों ने हुगली को लूटा। बाद में अनुनय विनय के कारण उन्हें पुनः व्यापार करने की छूट प्रदान की गयी।
1690:- सूतानाती में जाब चार्नोक ने अंगे्रज कोठी की स्थापना की यहीं पर बाद में अंग्रेजों की भावी राजधानी कलकत्ता की नींव पड़ी। इसी कारण चार्नोक को कलकत्ता का जन्मदाता माना जाता है।
1688:- बंगाल के सूबेदार अजीमुशान ने अंग्रेजों को तीन गाँव-सूतानाती, कलिकाता और गोविन्दपुर की जमींदारी प्रदान की यहीं पर फोर्ट विलियम की नींव पड़ी। सर चाल्र्स आयर यह फोर्ट विलियम का पहला गर्वनर बना। 1774 ई0 से 1911 ई0 तक यह फोर्ट विलियम अथवा कलकत्ता ब्रिटिश काल की राजधानी बनी रही।
नारिश मिशन (1698):- यह मिशन औरंगजेब के दरबार में व्यापारिक रियासत प्राप्त करने के उद्देश्य से गया था। परन्तु इसे प्राप्त करने में ये असफल रहा।
जाॅन सरमन मिशन (1715):- जाॅन सरमन की अध्यक्षता में कलकत्ता से एक मिशन फर्रुखसियर के दरबार में 1715 में पहुँचा।
1 हैमिल्टन:- एक चिकित्सक जिसने फरुखसियार की एक बीमारी का इलाज किया था।
2. ख्वाजा सहूर्द:- इसमें एक आरमेनियन दु भाषिया भी सम्मिलित था। फरुखसियार ने प्रसन्न होकर 1717 ई0 में एक शाही फरमान जारी किया जिसके द्वारा 3000रू0 वार्षिक कर के बदले में कम्पनी को बंगाल से व्यापार करने की छूट प्राप्त हो गयी तथा बम्बई में कम्पनी के द्वारा ढाले गये सिक्कों को सारे मुगल राज्य में चलाने की अनुमति मिल गयी।
ब्रिटिश इतिहासकार ओर्म (Aurm) ने इसे कम्पनी का मैग्नाकार्टा कहा।

डेन अथवा डेनिश

अंग्रेजों के बाद डेन 1616 में भारत आये। इन्होंने 1620 में तंजौर के ट्रांके बोर में पहली फैक्ट्री स्थापित की। इनकी दूसरी फैक्ट्र 1676 में बंगाल के सीरमपुर में स्थापित हुई। 1745 ई0 में इन्होंने अपनी फैक्ट्रियां अग्रेजों को बेंच दी और ये भारत से चले गये।

फ्रांसीसी

फ्रांस के सम्राट लुई चैदहवाँ के समय में उसके प्रसिद्ध प्रधानमंत्री कोल्बर्ट ने फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की। प्रारम्भ में इसका नाम कम्पनी द इण्ड ओरियण्टल था। फ्रांसीसियों ने अपनी प्रारम्भिक समुद्री मात्रायें द

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, व्यपगत का सिद्धात

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था से तात्पर्य है कि किसी दूसरे देश की अर्थव्यवस्था का उपयोग अपने हित के लिए प्रयोग करना। भारत में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की शुरुआत 1757 ई0 में प्लासी युद्ध से हुई, जो विभिन्न चरणों में अपने बदलते स्वरूप के साथ स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलती रही।
भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के बारे में सर्वप्रथम दादा भाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक ’द पावर्टी एण्ड अन ब्रिटिश रूल इन इण्डिया’ में उल्लेख किया। इनके अलावा रजनी पाम दत्त, कार्ल माक्र्स, रमेश चन्द्र दत्त, वी.के.आर.वी राव आदि ने भी ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के बारे में अपने विचार प्रगट किये हैं।
रजनी पाम दत्त ने अपनी पुस्तक ’इण्डिया टुडे’ में ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को तीन चरणों में विभाजित किया है-

  1. वाणिज्यिक चरण -1757-1813
  2. औद्योगिक मुक्त व्यापार- 1813-1858
  3. वित्तीय पूंजीवाद -1858 के बाद

ध्यातव्य है कि उपरोक्त चरणों में ऐसा नहीं है कि एक चरण समाप्त होने के बाद दूसरा चरण चला अपितु शोषण के पुराने रूप समाप्त नहीं हुए बल्कि नए रूपों में अगले चरण में चलते रहे।
वाणिज्यिक चरण की शुरूआत 1757 के प्लासी युद्ध के विजय के साथ प्रारम्भ होता है। इस चरण में कम्पनी का मुख्य लक्ष्य अधिकाधिक व्यापार में लाभ प्राप्त करना था। यद्यपि इसके पहले भी ब्रिटिश व्यापार को महत्व देते थे, किन्तु तब इनका व्यापार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी था। किन्तु प्लासी की विजय ने इस व्यवस्था को उलट दिया, इस विजय के बाद बंगाल का राजस्व इनके अधिकार में आ गया। बक्सर विजय के बाद बंगाल, बिहार, उड़ीसा की दिवानी मिल गयी, जिससे इनके पास ढेर सारा भारतीय पैसा राजस्व के रूप में कम्पनी को मिलने लगा। अब ये इसी पैसे से भारतीय माल खरीदते और ब्रिटेन भेज देते।
इस व्यापारिक प्रक्रिया से भारत को अपनी वस्तु के बदले विदेशी मुद्रा न प्राप्त होकर भारतीय मुद्रा की प्राप्त होती, जो कि सामान्य व्यापारिक सिद्धान्त के प्रतिकूल था। इस तरह भारतीय पूँजी भारत से निकलने लगी, यही से धन निष्कासन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।
औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का दूसरा चरण 1813 में व्यापारिक एकाधिकार समाप्त होने के साथ शुरू होता है। इस चरण का मुख्य प्रभाव विऔद्योगीकरण के रूप में दिखता है।

यही वह काल था जब ब्रिटेन में औद्योगिक क्रान्ति हो रही थी। अतः भारतीय अर्थव्यवस्था का दोहन औद्योगिक क्रान्ति को सफल बनाने के लिए होने लगा। औद्योगिक क्रान्ति की सफलता निम्न तीन बिन्दुओं पर निर्भर थी।

  • विनिर्मित उत्पादों के लिए विशाल बाजार।
  • कच्चे माल की सतत आपूर्ति।
  • खाद्यान्न की आपूर्ति।

उपरोक्त आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था एवं प्रशासनिक संरचना में अमूल-चूल परिवर्तन किए गये।
बाजार प्राप्ति के लिए भारतीय राज्यों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया जाने लगा। जिसे बैंटिग एवं डलहौजी के कार्य-काल में देखा जा सकता है।
कच्चे माल की बंदरगाहों तक पहुँच एवं तैयार माल को सुदूर गाँवों एवं छोटे बाजारों तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए रेल परिवहन, सड़क परिवहन का विकास किया।
दूसरी तरफ भारतीय उद्योगों से प्रतिस्पर्धा को कम करने के लिए विऔद्योगीकरण पर बल दिया गया। इससे इनके सभी उद्देश्यों की पूर्ति दिखाई पड़ती है।
भारतीय पारम्परिक उद्योगों के पतन के कारण ब्रिटेन को विशाल बाजार के साथ-साथ कच्चे माल की सतत् आपूर्ति होती रही।
विऔद्योगीकरण के कारण श्रम-बल कृषि कार्यों में लग गया। जिससे ब्रिटेन को कच्चे माल के साथ-साथ खाद्यान्न आपूर्ति भी होती रही।
इस चरण तक भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से टूट गयीं। देश की पारंपरिक हस्तकलाओं को उखाड़ फेंका। कुटीर उद्योगों के पतन एवं अधिकाधिक खाद्यान्न निर्यात के साथ-साथ वाणिज्यक उत्पादन से भारत में गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी का संकट बढ़ता गया। इस दुर्दशा का वर्णन स्वयं वैंटिंग तथा माक्र्स ने किया है-
’’इस आर्थिक दुर्दशा का व्यापार के इतिहास में कोई जोड़ नहीं, भारतीय बुनकरो  की हड्डियां भारत के मैदान में विखरी पड़ी हैं।’’  बिलियम बैंटिंग।

’’यह अंगेे्रज घुसपैठिए थे जिसने भारतीय खड्डी एवं चरखे को तोड़ दिये।’’   -माक्र्स

उपनिवेशवाद का तीसरा चरण 1858 के बाद प्रारम्भ होता है, जिसे वित्तीय पूँजीवादी चरण के नाम से जाना जाता है।
इस चरण तक आते-आते अन्य यूरोपीय देशों में भी औद्योगिक क्रान्ति प्रारम्भ हो चुकी थी। जिससे बाजार एवं कच्चे माल की प्रतिस्पर्धा बढ़ गयी।
ब्रिटेन के पूँजीवादी वर्ग ने औद्योगिक क्रान्ति जिसका निवेश वे अधिक लाभ हेतु अन्यत्र करना चाहते थे। जिसके लिए भारत एक लाभकारी एवं सुरक्षित था। क्योंकि-

  • 1857 की क्रान्ति के बाद, प्रशानिक व्यवस्था में व्यापार परिवर्तन किया गया था।
  • चूँकि भारत ब्रिटिश प्रशासन के अधीन था, अतः यहाँ ब्रिटिश हितों के अनुकूल नीतियाँ बनायी जा सकती थीं।
  • भारत में कच्चा माल तथा सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध था।
  • ब्रिटिश प्रशासन द्वारा पूँजीपति को सस्ता ऋण भी उपलब्ध कराया गया।

उपरोक्त परिस्थितियों ने ब्रिटिश पूँजीपतियों को अनेक क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रेरित किया। अब ब्रिटिश पूँजी के अन्तर्गत अनेक उद्योग धन्धों, चाय, काफी नील तथा जूट के बगानों, बैंंकिंग, बीमा आदि क्षेत्र आ गये।
उपरोक्त चरणों के अध्ययन से पता चलता है कि औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। कृषि, उद्योग, हस्तशिल्प कुटीर उद्योग पर इसके दूरगामी प्रभाव पड़े, जिसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं के तहत समझ सकते है-

  • व्यापार एवं कुटीर उद्योग पूर्णतया समाप्त हो गये जिससे कृषि पर दबाव बढ़ गया।
  • वाणिज्यक फसलें उगाने के कारण देशमें दुर्भिक्ष, अकाल आदि आम बात हो गये, जिससे देश में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में धन-जन की हानि हुई।
  • ब्रिटिश उद्योगों को प्रोत्साहन तथा भारतीय उद्योग को हतोत्साहित कियागया, जिससे भारत के हस्त-शिल्प एवं परम्परागत कपड़ा उद्योग पूर्णतयः नष्ट हो गये।
  • अंगे्रजों ने भारतीय जुलाहों को इतना कम मूल्य देना आरम्भ कर दिया कि उन्होंने बढि़या कपड़ा बनाना ही बन्द कर दिया।
  • भारतीय माल पर अंग्रेजों द्वारा इतना कर लगा दिया जाता जिससे उसकी कीमत बाजारमें दोगुनी हो गई, जिससे बाजार प्रतिस्पर्धा में वे मशीनी उत्पादन का मुकाबला न कर सके।

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के कुछ सकारात्मक प्रभाव भी पड़े, किन्तु नकारात्मक प्रभाव के सामने ये बहुत कम हैं। जो सकारात्मक प्रभाव पड़े भी उनके पीछे अंगेे्रजों की कोई सद्भावना नहीं थी। सकारात्मक परिणामों का विवरण निम्नलिखित:-

  • अंग्रेजों द्वारा उद्योग लगाने के कम में आधारभूत संरचना का विकास किया गया, जिसका लाभ भारत को भी मिला।
    सीमित मात्रा में लोगों को रोजगार मिला लेकिन मजदूरों को शोषण का शिकार होना पड़ा।
  • औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के परिणाम स्वरूप सबसे बड़ा लाभ भारत में राष्ट्रवाद का उदय के रूप में मिला।
  • अंग्रेजों के न चाहते हुए भी अपनी शोषणवादी प्रक्रिया में वे अपने इस अनैच्छिक संतान को जन्म दे गये। जो अन्ततः उनके विनाश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया।

उपरोक्त तीनों चरणों में ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थवस्था ने भारतीय अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। भारतीय कृषि व्यापार, उद्योग, हस्त-शिल्प पूरी तरह नष्ट हो गये। विश्व की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश अब सबसे गरीब देश की श्रेणी में आ गया। ’सोने की चिडि़या कहलाने वाला भारत अब भुखमरी, अकाल, दरिद्रता वाला देश कहलाने लगा।

व्यपगत का सिद्धात

डलहौजी का ब्यपगत सिद्धांत कम्पनी के साम्राज्यवादी नीति के चरमोत्कर्ष को दर्शाती है। इस नीति का कोई नैतिक आधार नहीं था, वरन यह पूरी तरह ब्रिटिश औपनिवेशिक हित से परिचालित था। इसका उद्देश्य मुगल शर्वशक्ति के मुखौटे को समाप्त करके एक विस्तृत भारतीय सामान्य का निर्माण कसा जिससे ब्रिटिश आर्थिक हित संचालित हो सके।
व्यपगत सिद्धांत के क्रियान्वयन के क्रम में डलहौजी ने भारतीय राज्यों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया।

  • वे रियासतें जो कभी भी उच्चतर शक्ति के अधीन नहीं थी और न ही कर देती थीं।
  • वे रियासतें जो मुगल सम्राट अथवा पेशवा के अधीन थीं और उन्हें कर देती थी, परन्तु अब वे अंग्रेजों के अधीनस्त थी।
  • वे रियासतें जो अंग्रेजों ने सनदों द्वारा स्थापित की थीं अथवा पुनर्जीवित की थी।  डलहौजी का मानना था कि-’’प्रथम श्रेणी के रियासतों को गोद लेने के मामले में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं हैं।
  • दूसरी श्रेणी के रियासतों को गोद लेने के लिए हमारी अनुमति आवश्यक है। हम मनाही कर सकते है, परन्तु हम प्रायः अनुमति दे देंगे।
  • तीसरी श्रेणी की रियासतों में मेरा विश्वास है कि उत्ताराधिकार में गोद लेने की आज्ञा दी ही नहीं जानी चाहिए।
    डलहौजी ने यह सिद्धान्त नया नहीं बनाया था। 1834 में कोर्ट आफ डायरेक्टर्स ने कहा था कि-’’गोद लेने का अधिकार हमारी ओर से एक अनुग्रह है, जो एक अपवाद के रूप में देनी चाहिए।’’

इसी आधार पर 1839 में माण्डवी राज्य 1840 में कोलाबा और जालौर राज्य और 1842 में सूरत की नबाबी समाप्त कर दी गयी।
डलहौजी ने ब्यापगत सिद्धांत के क्रियान्वयन के क्रम में-

  • सतारा-        1848
  • जैतपुर-        1849
  • सम्भलपुर-    1849
  • बघाट-         1850
  • ऊदेपुर-        1852
  • झाँसी-         1853
  • नागपुर-        1854
    का बिलय कर लिया।

डलहौजी ने अपनी इस नीति का औचित्य सिद्ध करते हुए इस बात पर बल दिया कि ’’इन कृत्रिम मध्यस्थ राज्यों को समाप्त कर जनता से प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित किया जाना चाहिए।’’ इसके परिणामस्वरूप उन राज्यों में पुरानी प्रशासनिक पद्धति समाप्त हो जायेगी तथा ब्रिटिश के अधीन एक अधिक विकसित पद्धति लागू होगी।

किन्तु गहराई से अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि डलहौजी का यह कदम ब्रिटिश औपनिवेशिक हित में उठाया गया। अगर भारत में एक विस्तृत बाजार का निर्माण किया जाना था तो न केवल अधिक से अधिक भारतीय राज्यों को प्रत्यक्ष नियंत्रण में लेने की जरूरत थी वरन एक उन्नत यातायात एक संचार व्यवस्था का विकास भी आवश्यक था। उदाहरणके लिए बम्बई तथा मद्रास के बीच संचार व्यवस्था विकास करने के लिए सतारा तथा बंबई एवं कलकत्ता के बीच संचार व्यवस्था के विकास के लिए नागपुर को प्रत्यक्ष नियंत्रण में लेना अनिवार्य था।

वस्तुतः कोर्ट आफ डायरेक्टर्स के द्वारा प्रतिपादित एवं डलहौजी के द्वारा विकसित एवं कार्यान्वित व्यपगत का सिद्धांत अनैतिक एवं औचित्यहीन था। विश्लेषण करने पर इस पद्धति की कई खामियां स्पष्ट हो जाती हैं। कम्पनी के द्वारा व्यपगत सिद्धान्त की उद्घोषणा भारतीय रीति-रिवाज एवं सामाजिक, पंरपरा की अवहेलना थी, क्योंकि भारत में सदा से ही गोद लेने का अधिकार स्वीकृत रहा था और इसे एक धार्मिक कृत्व में भी शामिल किया गया था।

ब्रिटिश से पूर्व मुगल एवं मराठे राज्य के द्वारा अधीनस्थ शासकों को नजराने के बदले गोद लेने का अधिकार प्राप्त था। दूसरे कम्पनी द्वारा किये गये भारतीय राज्यों का श्रेणीकरण अथवा वर्गीकरण अस्पष्ट था, क्योंकि अधिनस्थ एवं आश्रित दोनों राज्यों के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा खींचा जाना बहुत ही कठिन था। तथा उस समय ऐसी कोई नायिक संस्था भी नही था जो इस बात का निपटारा हो सके।

इसके अतिरिक्त इस सिद्धांत के पीछे कोई नैतिक अथवा कानूनी अवधारणा काम नहीं कर रही थी, वरन यह एक अवसरवादी नीति पर आधारित थी। उदाहरण के लिए अवध राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया जाना ब्रिटिश औपनिवेशिक हितों के लिए एक आवश्यक कदम था। चूँकि अवध पर व्यपगत का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता था, इसलिए अवध को कुशासन के आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। अतः एक दृष्टि से यह शाक्ति का व्यपगत न होकर नैतिकता का व्यपगत था।

सहायक संधि प्रणाली और उससे भारत की दशा

सहायक संधि प्रणाली और भारत पर इसका प्रभाव

साम्राज्यवादी विचारधारा का पोषक लार्ड बेलेजली1798 में भारत का गर्वनर जनरल बना। उसके पद प्राप्ति के समय भारत की राजनीतिक स्थिति अत्यंत संकट पूर्ण थी। शोर की अहस्तक्षेप की नीति के कारण कम्पनी कई खतरों से घिरी थी। यूरोप में हो रही फ्रांसीसी क्रांति से परिस्थितियां गम्भीर हो गई थी। टीपू फ्रांसीसियों से गठबंधन कर रहा था और नेपोलियन भारत पर हमला करने के लिए मिश्र पर आधिपत्य स्थापित करने का प्रयत्न कर रहा था। अमेरिकी उपनिवेश इंग्लैंड के हाथों से निकल चुका था।
उपरोक्त परिस्थितियों से निपटने के लिए उसने सहायक संधि प्रणाली का उपयोग किया तथा अपनी नीति के संचालन के क्रम में कुछ उद्देश्य निर्धारित किये-

  • भारतीय राजनीति को अपने अनुकूल बनाने एवं कम्पनी की सीमा विस्तार के लिए हस्तक्षेप एवं सक्रिय नीति का संचालन करना।
  • कम्पनी को सर्वोच्च शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करना।
  • फ्रांसीसियों के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करना।

सहायक संधि का अविष्कारक वेल्जली नहीं था। इस प्रणाली का विकास शनैः शनैः हुआ था। सर्वप्रथम डूप्ले ने भारतीय नरेशों को धन के बदले अपने सैनिकों को किराये पर देने की परिपाटी चलाई। बाद में क्लाइव एवं कार्नवालिस ने भी डूप्ले की इस नीति को अपनाया। वेल्जली ने इसे सुनिश्चित एवं व्यापक स्वरूप प्रदान किया।
सहायक सन्धि कम्पनी और देशी राज्यों के बीच होती थी। सन्धि के अनुसार कम्पनी देशी राज्यों को सैनिक सहायता देने का वचन देती थी। और उसके बदले में उससे निश्चित आर्थिक सहायता लेती थी। सहायक संधि को स्वीकार करने वाले रियासत को निम्न शर्तों को स्वीकार करना पड़ता था-

  • भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध कम्पनी के अधीन होंगे। वे कोई युद्ध नहीं करेंगे तथा अन्य राज्यों से बात-चीत कम्पनी के द्वारा ही होगी।
  • देशी राज्यों को अपने यहाँ एक ऐसी सेना रखनी होगी जिसकी कमान अंग्रेज अधिकारियों के हाथ में होगी। इस सेना का मुख्य कार्य सार्वजनिक शान्ति बनाये रखना होगा। इस सेना के खर्च हेतु बड़े राज्य को ’पूर्व प्रभुसत्ता युक्त प्रदेश’ तथा छोटे राज्यों को नकद धन देना पड़ेगा।
  • राज्यों को अपनी राजधानी में एक अंग्रेज रेजीडेण्ट रखना होता था।
  • राज्यों को कम्पनी के अनुमति के बिना किसी यूरोपीय को सेवा में नहीं रखना होता था।
  • कम्पनी राज्यों के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी।
  • कम्पनी राज्यों की प्रत्येक प्रकार के शत्रुओं से रक्षा करेगी।

इस प्रकार अचूक अस्त्र सहायक संधि ने अंग्रेजी सत्ता की सर्वश्रेष्ठता स्थापित कर दी तथा नेवोलियन का भय भी समाप्त हो गया।
कम्पनी की दृष्टि से सहायक संधि एक वरदान सिद्ध हुई। सहायक संधि से कम्पनी को निम्नलिखित लाभ प्राप्त हुए-

  • कम्पनी का भारत में प्रभुत्व स्थापित हो गया। कम्पनी की प्रतिष्ठा एवं शाक्ति में वृद्धि हुई।
  • इससे कम्पनी को भारतीय राज्यों के खर्च पर एक महान सेना मिल गयी। जो अल्प सूचना पर किसी भी समय किसी भी दिशा में लड़ने के लिए प्रस्तुत थी।
  • सहायक संधि के माध्यम से कम्पनी की सेना राजनीतिक सीमा से बहुत आगे जाने में सफल रही।
  • इस प्रणाली से कम्पनी भारत में फ्रांसीसी चालों को, जिनका उस समय बहुत भय था, विफल करने में पूर्णतया सफल हो गयी।
  • अंग्रेजों के विरूद्ध भारतीय राज्य कोई संघ नहीं बना सकते थे।
  • कम्पनी का सामरिक महत्व के स्थानों पर नियंत्रण स्थापित हो गया।
  • इन राज्यों में स्थित रेजीडेन्ट कालान्तर में आन्तरिक मामले में भी हस्तक्षेप करने लगे।
  • कम्पनी को बहुत सा ’पूर्ण प्रभुसत्तापूर्ण प्रदेश’ मिल गया।

कम्पनी उपरोक्त लाभों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित राज्यों से सहायक संधियाँ की-
हैदराबाद – 1798 तथा 1800
मैसूर    –     1799
तंजोर     –     1799
अवध     –     1801
पेशवा    –     1801
बराड़ के भोसले – 1803
सिन्धिया     –     1804
इनके अतिरिक्त जोधपुर, जयपुर, मच्छेड़ी बूंदी, तथा भरतपुर से भी सहायक संधियां की गई।
सहायक संधि प्रणाली जहाँ एक ओर अंग्रेजी साम्राज्य के लिए लाभदायक रही वही देशी राज्यों को इस प्रणाली ने अत्यधिक हानि पहुँचायी।

  • भारतीय राजाओं का मानसिक बल कम हो गया जो अन्ततोगत्वा उनके लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हुआ।
  • राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता, राष्ट्रीय चरित्र अथवा वह सब जो देश को प्रतिष्ठत बनाते है, बेचकर सुरक्षा मोल ले ली।
  • सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्य शीघ्र ही दिवालिया हो गये। अंग्रेजों की धन की मांग निरंतर बढ़ती जाती थी, जिसे देने में राज्य सक्षम नहीं थे। फलतः किसानों पर अत्यधिक कर का बोझ बढ़ता गया।
  • संरक्षित राज्यों के सैनिक बेराजगार हो गये, क्योंकि उन्हें सेना रखने का अधिकार नहीं रहा। बेकार हो जाने से वे चोरी, डकैती, करने लगे, कुछ पिण्डारियों के दल में शामिल हो गये।
  • प्रत्येक निर्बल तथा उत्पीड़क राजा की रक्षा की और इस प्रकार वहां की जनता को अपनी अवस्था सुधारने के अवसर से वंचित रखा।

अंग्रेजी रेजीडेन्टों ने राज्यों के प्रशासन में अत्यधिक हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया।
इस तरह सहायक संधि की नीति भारतीय नरेशों एवं भारतीय जनता के लिए बड़ी घातक सिद्ध हुई। कार्ल माक्र्स ने सहायक संधि प्रणाली का वर्णन करते हुए कहा कि-
’’ यदि आप किसी भी राज्य की आय को दो सरकारेां के बीच बांट दे तो आप निश्चय ही एक के साधनों का तथा दोनों के प्रशासन के पंगु बना देगें।’’
एक अंग्रेजी टीकाकार ने सहायक संधि की तुलना एक ऐसी नीति से की है, ’’जिसमें मित्रों को उस समय तक मोटा करो जब तक वे हड़पने योग्य न हो जाय।’’ निश्चय ही यह प्रणाली भारतीय राज्यों के लिए मीठा विष थी।

भारत से धन की निकासी (Drain of Wealth From India)

धन का बहिर्गमन (Drain of Wealth)

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उपर्युक्त सभी व्यवस्थाओं के मूल में कम्पनी की वाणिज्य वादी प्रकृति व्याप्त थी। धन की निकासी की अवधारणा वाणिज्यवादी सोच के क्रम में विकसित हुई। अन्य शब्दों में, वाणिज्यवादी व्यवस्था के अतंर्गत धन की निकासी (Drain of Wealth)उसस्थिति को कहाजाता है जब प्रतिकूल व्यापार संतुलन के कारण किसी देश से सोने, चाँदी जैसी कीमती धातुएँ देश से बाहर चली जाएँ। माना यह जाता है कि प्लासी की लड़ाई से 50 वर्ष पहले तक ब्रिटिश कंपनी द्वारा भारतीय वस्तुओं की खरीद के लिए दो करोड़ रूपये की कीमती धातु लाई थी। ब्रिटिश सरकार द्वारा कंपनी के इस कदम की आलोचना की गयी थी किंतु कर्नाटक युद्धों एवं प्लासी तथा बक्सर के युद्धों के पश्चात् स्थिति में नाटकीय पविर्तन आया।

बंगाल दीवानी ब्रिटिश कंपनी को प्राप्त होन के साथ कंपनी ने अपने निवेश की समस्या को सुलझा लिया। अब आंतरिक व्यापार से प्राप्त रकम बंगाल की लूट प्राप्त रकम तथा बंगाल की दीवानी से प्राप्त रकम के योग के एक भाग का निवेश भारतीय वस्तुओं की खरीद केलिए होने लगा। ऐसे में धनकी समस्या उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। अन्य शब्दों में, भारत ने ब्रिटेन को जो निर्यात किया उसके बदले भारत को कोई आर्थिक, भौतिक अथवा वित्तीय लाभ प्राप्त नहीं हुआ। इस प्रकार, बंगाल की दीवानी से प्राप्त राजस्व का एक भाग वस्तुओं के रूप में भारत से ब्रिटेन हस्तांतरित होता रहा। इसे ब्रिटेन के पक्ष में भारत से धन का हस्तांतरण कहा जा सकता है। यह प्रक्रिया 1813 तक चलती रही, किंतु 1813 ई0 चार्टर के तहत कंपनी का राजस्व खाता तथा कंपनी का व्यापारिक खाता अलग- अलग हो गया। इस परिवर्तन के आधारपर ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि 18वीं सदी के अन्त में लगभग 4 मिलियन पौण्ड स्टर्लिंग रकम भारत से ब्रिटेन की ओर हस्तान्तरित हुई। इस प्रकार भारत के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि 1813 ई. तक कंपनी की नीति मुख्तः वाणिज्यवादी उद्देश्य सेपरिचालित रही जिसका बल इस बात पर रहा कि उपनिवेश मातृदेश के हित की दृष्टि से महत्व रखते हैं।
1813 ई. के चार्टर के तहत भारत का रास्ता ब्रिटिश वस्तुओं के लिए खोल दिया गया तथा भारत में कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया। इसे एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। स्थिति उस समय और भी चिंताजनक रही जब ब्रिटेन तथा यूरोप में भी कंपनी के द्वारा भारत से निर्यात किए जाने वाले तैयार माल को हतोत्साहित किया जाने लगा। परिणाम यह निकला कि अब कंपनी के समक्ष अपने शेयर धारकों को देने के लिए रकम की समस्या उत्पन्न हो गई। आरम्भ में कंपनी ने नील और कपास का निर्यात कर इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया, किंतु भारतीय नील और कपास कैरिबियाई देशों के उत्पाद तथा सस्ते श्रम के कारण कम लागत में तैयार अमेरिकी उत्पादों के सामने नहीं टिक सके। अतः निर्यात एजेसियों को घाटा उठाना पडा। यही कारण रहा कि कंपनी ने विकल्प के रूप में भारत में अफीम के उत्पादन पर बल दिया। फिर बड़ी मात्रा में अफीम से चीन को निर्यात की जाने लगी। अफीम अफीम का निर्यात चीनी लोगों के स्वास्थ के लिए जितना घातक था उतना ही कंपनी के व्यावसायिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक था। अफीम व्यापार का विरोध किये जाने पर भी ब्रिटिश कंपनी ने चीन पर जबरन यह घातक जहर थोप दिया। ब्रिटेन भारत से चीन को अफीम निर्यात करता और बदले रेशम और चाय की उगाही करता और मुनाफा कमाता। इस प्रकार, भारत से निर्यात तो जारी रहा किन्तु बदले में उस अनुपात में आयात नहीं हो पाया।
अपने परिवर्तन स्वरूप के साथ 1858 ई. के पश्चात् भी यह समस्या बनी रही। 1858 ई में भारत का प्रशासन ब्रिटिश ने अपने हाथों में ले लिया। इस परिवर्तन के प्रावधानों के तहत भारत के प्रशासन के लिए भारत सचिव के पद का सृजन किया गया। भारत सचिव तथा उसकी परिषद का खर्च भारतीय खाते में डाल दिया गया। 1857 ई. के विद्रोह को दबाने में जो रकम चार्च हुई थी, उसे भी भारतीय खाते में डाला गया। इससे भी अधिक ध्यान देने योग्यबात यह है कि भारतीय सरकार एक निश्चित रकम प्रतिवर्ष गृह-व्यय के रूप में ब्रिटेन भेजती थी। व्यय की इस रकम में कई मदें शामिल होती थीं, यथा-रेलवे पर प्रत्याभूत ब्याज, सरकारी कर्ज पर ब्याज, भारत के लिए ब्रिटेन में की जाने वाली सैनिक सामग्रियों की खरीद, भारत से सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारियों के पेंशन की रकम इत्यादि। इस प्रकार गृह- व्ययकी राशि की गणना धन की निकासी के रूप में की जाती थी। उल्लेखनीय है कि 19वीं सदी में धन के अपवाह में केवल गृह-व्यय ही शामिल नहीं था वरन् इसमें कुछ अन्यमदें भी जोड़ी जाती थीं। उदाहरण के लिए-भारत में कार्यरत ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन का वह भाग जो वह भारत से बचाकर ब्रिटेन भेजा जाता था तथा निजी ब्रिटिश व्यापारियों का वह मुनाफा जो भारत से ब्रिटेन भेजा जाता था। फिरजब सन् 1870 के दशक में ब्रिटिश पोण्ड स्टालिंग की तुलना में रूपया का अवमूलयन हुआ तो इसके साथ ही निकासी किए गए धन की वास्तविक राशि में पहले की अपेक्षा और भी अधिक वृद्धि हो गई।

गृह-व्यय अधिक हो जाने के कारण इसकी राशि को पूरा करने के लिए भारत निर्यात अधिशेश बरकरार रखा गया। गृह-व्यय की राशि अदा करने के लिए एक विशेष तरीका अपनाया गया। उदाहरणार्थ भारत सचिव लंदन में कौंसिल बिल जारी जारी करता था तथा इस कौंसिल बिल के खरीददार वे व्यपारी होते थे जो भारतीय वस्तुओं के भावी खरीदार भी थे। इस खरीददार के बदले भारत सचिव को पौण्ड स्टर्लिंग प्राप्त होता जिससे वह गृह-व्यय की राशि की व्यवस्था करता था। इसके बाद इस कौंसिल बिल को लेकर ब्रिटिश व्यापारी भारत आते और इनके वे भारतीय खाते से रूपया निकाल कर उसका उपयोग भारतीय वस्तुओं को खरीद के लिए करते थे। इसके बाद भारत में काम करने के लिए ब्रिटिश अधिकारी इस कौंसिल बिल को खरीदते। केवल ब्रिटिश अधिकारी ही नहीं बल्कि भारत में व्यापार करने वाले वाले निजी ब्रिटिश व्यापारी भी अपने लाभ को ब्रिटेन भेजेन के लिए कौंसिंल बिल की खरीद करते। लंदन में उन्हें इन कौसिंल बिलों के बदले में पौण्ड स्टर्लिंग प्राप्त होता था।
गृह व्यय के रूप में भारत द्वारा प्रतिवर्ष ब्रिटेन भेजी जाने वाली राशि के कारण भुगतान संतुलन भारत के पक्ष में नहीं था। यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि शेष विश्व के साथ व्यापार में संतुलन भारत के पक्ष में बना रहा। चॅंूकि निर्यात अधिशेष उस संपूर्ण रकम को पूरा नहीं कर पाता, इसलिए उसकी पूर्ति हेतु भारत को अतिरिक्त राशि कर्ज के रूप में प्राप्त करनी होती थी। फलतः भारत पर गृह-व्यय का अधिभार भी बढ़ जाता। इस तरह अर्थिक संबंधों को लेकर एक ऐसा जाल बनता जा रहा था जिसमें भारत ब्रिटेन के साथ बॅधता जा रहा था।
दादाभाई नौरोजी वच आर.सी. दत्त जैसे राष्ट्रवादी चितंकों ने धनकी निकासीकी कटु आलोचना की और इसे उन्होंने भारत के दरिद्रीकरण का एक कारण माता। दूसरी ओर, माॅरिसन जैसे ब्रिटिश का एक कारण माना। दूसरी ओर माॅरिसन जैसे ब्रिटिश पक्षधर विद्वान निकासी की स्थिति को अस्वीकार करते हैं। उपनके द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया। कि गृह-व्यय की राशि बहुत अधिक नहीं थी और फिर यह रकम भारत के विकास के लिए जरूरी था। उन्होंने यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया कि अंगे्रजो ने भारत में अच्छी सरकार दी तथा यहाॅ यातायात और संचार व्यवस्था एवं उद्योग का विकास किया और फिर ब्रिटेन ने बहुत कम ब्याज पर अंतराष्ट्रीय मुद्रा बाजार से एक बड़ी रकम को भारत को उपलब्ध करवायी।

जहाँ तक राष्ट्रवादी चिंतकों की बात हैतो उनका कहना है कि भारत को उस पूॅजी की जरूरत ही नहीं थी जो अेंग्रेजों ने उस समय उसे उपलब्ध कराई। दूसरे, यदि भारत में स्वयं पूॅजी का संचय हुआ होता तो फिर उसे कर्ज लेने की जरूरत की क्यों पड़ती। आगे धन की निकासी की व्याख्या करते हुए इन्होंने इसबात पर जोर दिया कि भरत उस लाभ से भी वंचित रहा गया जो उस रकम के निवेश से उसे प्राप्त होता। साथ ही धन के निकाशी ने निवेश को अन्य तरीकों से भी प्रभावित किया। उपर्युक्त विवेचन की समीक्षा करने से हम इस निष्कार्ष पर पहुंचते है कि राष्ट्रवादी आलोचना की भी कुछ सीमाएॅ थी। उदाहरण लिए दादाभाई नौरोजी जैसे राष्ट्रवादी चिंतकों ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया हैकि भारत से जिस धन की निकासी हुई वह महज धन नहीं था, बल्कि पूँजी थी। दूसरे उन्होंने भारत में कार्यारत ब्रिटिश अधिकारियों को भारत के आर्थिक दोहन के लिए उत्तरदायी माना। लेकिन फिर भी यह कहा जा सकता है कि हमारे राष्ट्रवादी चिंतकों ने औपनिवेशक अर्थतन्त्र की क्रमबद्ध आलोचना कर ब्रिटिश शासन के वास्तविक चरित्र को उजागर किया। अतः भावी जागरूकता की दृृष्टि से उनका चिंतन सराहनीय माना जाना चाहिए।

विऔद्योगीकरण (De industrialization)

किसी भी देश के उद्योगों के क्रमिक हास अथवा विघटन को ही विऔद्योगीकारण कहा जाता है। भारत में ब्रिटिश शासन के अंतर्गत हस्ताशिल्प उद्योगों का पतन सामने आया, जिसके परिणामस्वरूप कृषि पर जनसंख्या का बोझ बढता गया। ब्रिटिश शासन के अंतर्गत विऔद्योगीकरण को पे्ररित करने वाले निम्नलिखित घटक माने जाते हैं-

  • प्लासी और बक्सर के युद्ध के बाद ब्रिटिश कंपनी द्वारा गुमाश्तों के माध्यम से बंगाल के हस्तशिल्पियों पर नियंत्रण स्थापित करना अर्थात् उत्पाद प्रक्रिया में उनके द्वारा हस्ताक्षेप करना।
  • 1813 ई. के चार्टर एक्ट के द्वारा भारत का रास्ता ब्रिटिश वस्तुओं के लिए खोल दिया गया।
  • भारतीय वस्तुओं पर ब्रिटेन में अत्यधिक प्रतिबंध लगाये गये, अर्थात् भारतीय वस्तुओं के लिए ब्रिटेन का द्वार बंद किया जा रहा था।
  • भारत में दूरस्थ क्षेत्रों का भेदन रेलवे के माध्यम से किया गया। दूसरे शब्दों में, एक ओर जहाॅ दूरवर्ती द्वोेत्रों में भी बिटिश फैक्ट्री उत्पादों को पहुँचाया गया, वहीं दूसरी ओर कच्चे माल को बंदरगाहों तक लाया गया।
  • भारतीय राज्य भारतीय हस्तशिल्प उद्योंगों के बडे़ संरक्षक रहे थे, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवादी प्रसार के कारण राजा लुप्त हो गये। इसके साथ ही भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों ने अपना बाजार खो दिया।
  • हस्तशिल्पि उद्योगों के लुप्तप्राय होने के कारण ब्रिटिश सामाजिक व शैक्षिणिक नीति को भी जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसने एक ऐसे वर्ग को जन्म दिया जिसका रूझान और दृष्टिकोण भारतीय न होकर ब्रिटिश था। अतः अंगे्रजी शिक्षाप्राप्त इन भारतीयों ने ब्रिटिश वस्तुओं को ही संरक्षण प्रदान किया।

भारत में 18वीं सदी में दो प्रकार के हस्तशिल्प उद्योग अस्तित्व में थे-ग्रामीण उद्योग और नगरीय दस्तकारी। भारत में ग्रामीण हस्तशिल्प उद्योग यजमानी व्यवस्था (Yajamani System) के अन्र्तगत संगठित था। नगरीय हस्तशिल्प उद्योग अपेक्षाकृत अत्यधिक विकसित थे। इतना ही नहीं पश्चिमी देशों में इन उत्पादों की अच्छी-खासी माॅग थी। ब्रिटिश आर्थिक नीति ने दोनों प्रकार के हस्तशिल्प उद्योगों को प्रभावित किया। नगरीय हस्तशिल्प उद्योगों में सूती वस्त्र उद्योग अत्यधिक विकसित था। कृषि के बाद भारत में सबसे अधिक लोगों को रोजगार सूती वस्तु उद्योग द्वारा ही प्राप्त होता था। उत्पादन की दृष्टि से भी कृषि के बाद इसी क्षेत्र का स्थान था, किन्तु ब्रिटिश माल की प्रतिस्पर्धा तथा भेदभावपूर्ण ब्रिटिश नीति के कारण सूती वस्त्र उद्योग का पतन हुआ। अंग्रेजों केे आने से पूर्व बंगाल में जूट के वस्त्र जूट वस्त्र की बुनाई भी होती थी। लेकिन 1835 ई. के बाद बंगाल में की, हस्तशिल्पि की भी ब्रिटिश मशीनीकृत उद्योग के उत्पादन के साथ प्रतिस्पर्धा हुई जिससे बंगाल में जूट हस्तशिल्प उद्योग को धक्का लगा। उसी प्रकार कश्मीर शाल एवं चादर के लिए प्रसिद्ध था। उसके उत्पादों की माॅग पूरे विश्व में भी थी, किंतु 19वीं सदी में स्कॅटिश उत्पादकों की प्रतिस्पर्धा के कारण कश्मीर में शाल उत्पादन को भी धक्का लगा। ब्रिटिश शक्ति की स्थापना से पूर्व भारत में कागज उद्योग का भी प्रचलन हुआ था, किंतु 19वीं सदी के उत्तरार्ध में चार्स वुड की घोषणा से स्थिति में नाटकीय परिवर्तन आया। इस घोषणा के तहत स्पष्ट रूप से आदेश जारी किया गया था कि भारत में सभी प्रकार के सरकारी कामकाज के लिए कागज की खरीद ब्रिटेन से ही होगी। ऐसी स्थिति में भारत में कागज उद्योग को धक्का लगना स्वाभाविक था। प्राचीन काल से ही भारत बेहतर किस्म के लोहे और इस्पात के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था, किंतु ब्रिटेन से लौह उपकरणों के आयात के कारण यह उद्योग भी प्रभावित हुए बिना न रहा सका।
भारत में विऔद्योगीकरण की अवधारणा को औपनिवेशिक इतिहासकार स्वीकार नहीं करते। उदाहरणार्थ, सूती वस्त्र उद्योग पर ब्रिटिश नीति के प्रभाव की व्याख्या करते हुए माॅरिस डी-माॅरिस जैसे ब्रिटिश विद्वान औद्योगीकरण की अवधारणा को अस्वीकार करते हुए कहते हैं कि ब्रिटिश नीति ने भारत में हस्तशिल्प उद्योग को प्रोत्साहन दिया। उनका तर्क है कि ब्रिटेन के द्वारा भारत में यातायात और संचार व्यवस्था का विकास किया गया तथा अच्छी सरकार दी गयी, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि हुई। अतः भारत के बाजार का विस्तार हुआ। ऐसे में भारतीय हस्तशिल्प उद्योग उस माॅग को पूरा नहीं कर सकता था। मुद्रास्फीति और मूल्य वृद्धि केरूप में इसका स्वाभाविक परिणाम देखने में आता है। ऐसी स्थिति में ब्रिटेन से अतिरिक्त वस्तुएॅ लाकर इस बाजार की जरूरतों को पूरा किया गया। इस संबंध में दूसरा तर्क यह भी दिया जाता है। कि ब्रिटेन ने भारत में ब्रिटेन सेकेवल वस्त्रों का ही आयात नहीं किया वरन् सूत का भी आयात किया। इसके परिणामस्वरूप शिल्पियों को सस्ती दर पर सूत उपलब्ध हुआ, जिससे सूती वस्त्र उद्योग को बढ़ावा मिला। लेकिन, माॅरिस डी-माॅरिस के इस तर्क से सहमत नहीं हुआ जा सकता है।
हमारे पास कोई निश्चित आॅकड़े नहीं है, जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि उस काल में भारत में प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि हुई। हालांकि यह सत्य है कि ब्रिटेन से भारत में वस्त्र के साथ-साथ सूत भी लाया गया, लेकिन यह भी सही है कि सूत से भी सस्ती दर पर वस्त्र लाये गये। अतः भारतीय शिल्पियों के हित-लाभ का तो प्रश्न ही नहीं उठता है।
विऔद्योगीकरण की समीक्षा करने पर इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि इस काल में सभी प्रकार के हस्तश्ल्पि उद्योगों का पतन नहीं हुआ। तथा कुछ उद्योग ब्रिटिश नीति के दबाव के बावजूद भी बने रहे। इसके निम्नलिखित करण थेः
(1) भारत में कुछ हस्तशिल्प उत्पाद ऐसे थे जिनका ब्रिटिश उत्पादन हो ही नहीं सकते थे। उदाहरण के लिए बढ़ईगिरी, कुंभकारी, लुहारगिरी आदि।
(2) उस काल में भारतीय बाजार एकीकृत नहीं था, अतः कुछ क्षेत्रों में चाहकर भी ब्रिटिश उत्पाद नहीं पहुॅच सके।
(3) बढ़ती हुई बेरोजगारी के कारण आर्थिक रूप से लाभकारी न हाने पर भी कुछ हस्तशिल्प उोद्योग अस्तित्व बने रहे। यदि हम विश्व के संम्पूर्ण औद्योगिक उत्पाद में भारत के अंशदान पर नजर डालें तो ज्ञात होगा कि 1800 ई. में यह 19.6ः था। 1860 ई. में यह कम होकर 8.6ः तथा 1931 में यह मात्र 1.4ः रह गया। इस गिरावट का कारण पश्चिमी देशों में होने वाला औद्योगीकरण भी था, क्यांेकि हस्तशिल्प उद्योगों से संगठित फैक्ट्री का उत्पादन कहीं अधिक था। लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण के रूप में भारत में प्रतिव्यक्ति औद्योगिक उत्पादन की औसत दर में गिरावट माना जाता है।
जहाँ हस्तशिल्प उद्योगों के पतन का सवाल है तो हम यह जानते हैं कि हस्तशिल्प उद्योग एक प्राक्-पूॅजीवादी उत्पाद प्रणाली (Pr-capitalist Production System) है। अतः पूॅजीवादी उत्पादन प्रणाली (Capitalist Production System) के विकास के बाद इसका कमजोर पड़ जाना स्वाभाविक है। इस पूरी प्रक्रिया का एक दुःखद पहलू यह भी है कि पश्चिम में तो हस्तशिल्प उद्योगों के पतन की क्षतिपूर्ति आधुनिक उद्योगों की स्थापना के द्वारा कर दी गयी, लकिन भारत में ऐसा नहीं हो सका। अतः जहाॅ पश्चिम में बेरोजगार शिल्पी आधुनिक कारखानों में काम में लाए, वहीं भारत में बेरोजगार शिल्पी ग्रामीण क्षेत्र में पलायन कर गये। परिणामतः कृषि पर जनसंख्या का अधिभार बढ़ता चला गया। निष्कर्षतः ग्रामीण और ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ती गई। कुल मिलाकर भारत का पारंपरिक ढाॅचा टूट ही गया और पूॅजीवादी सरंचना ने किसी प्रकार से उसकी भरपाई नहीं की।

कृषि का व्यवसायीकरण (Commercialization of Agriculture) :-

एडम स्मिथ के अनुसार व्यावसायीकरण उत्पादन को प्रोत्साहन देता है तथा इसके परिणामस्वरूप समाज में समृद्धि आती है, किंतु औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत लाये गये व्यवसायीकरण ने जहाँ ब्रिटेन को समृद्ध बनाया वहीं भारत में गरीबी बढ़ी। कृषि के क्षेत्र में व्यावसायिक संबंधों तथा मौद्रिक अर्थव्यवस्था के प्रसार को ही कृषि के व्यावसायीकरण संज्ञा दी जाती है। गौर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि कृषि में व्यवसायिक संबंध कृषि का मौद्रीकरण (Monetization of Agriculture) कोई नई घटना नहीं थी। क्योंकि मुगलकाल में भी कृषि अर्थव्यवस्था में ये कारक विद्यमान थे। राज्य तथा जागीरदार दानों के द्वारा राजस्व की वसूली में अनाजों के बदले नगद वसूली पर बल दिए जाने के इसके कारण के रूप में देखा जाता है। बात अलग है ब्रिटिश शासन में इस प्रक्रिया और भी बढ़ावा मिला। रेलवे का विकास तथा भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ जाना भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कारक सिद्ध हुआ। ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत कृषि के व्यवसायीकरण को जिन कारणों ने प्रेरित किया वे निम्नलिखित थे-

(क) भारत में भूू-राजस्व की रकम अधिकतम निर्धारितकी गयी थी। परम्परागत फसलों के उत्पादन के आधार पर भू-राजस्व की इस रकम को चुका पाना किसानों के लिए संभव नहीं था। यऐसे में नकदी फसल के उत्पादन की ओर उनका उन्मुख होना स्वाभाविक ही था।
(ख) ब्रिटेन में औद्यौगिक क्रांति आरंभ हो गई थी तथा ब्रिटिश उद्योगों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे माल की जरूरत थी। यह सर्वविदित है कि औद्योगीकरण के लिए एक सशक्तक कृषि आधार का होना जरूरी है। ब्रिटेन में यह आधार न मौजूद हो पाने के कारण ब्रिटेन में होने वाले औद्योगीकरण के लिए भारतीय कृषि अर्थ व्यवस्था का व्यापक दोहन किया गया।
(ग) औद्योगीकरण के साथ ब्रिटेन में नगरीकरण की प्रक्रिया को भी बढ़ावा मिला था। नगरीय जनसंख्या की आवश्यक्ताओं को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में खाद्यान्न की आवश्यकता थी, जबकि खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं था। अतः भारतसे खाद्यान्न के निर्यात को भी इसके एक कारण के रूप में देखा जा सकता है।
(घ) किसानों में मुनाफा प्राप्त करने की उत्प्रेरणा भी व्यवसायिक खेती को प्रेरित करने वाला एक कारक माना जाता है। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि औपनिवेशिक सरकार ने भारत में उन्हीें फसलों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जो उनकी औपनिवेशिक माॅग के अनुरूप थी। उदाहरण के लिए- कैरिबियाई देशों पर नील के आयात की निर्भरता को कम करने के लिए उन्होंने भारत में नील के उत्पादन को प्रोत्साहन दिया। इस उत्पादन को तब तक बढ़ावा दिया जाता रहा जब तक नील की माॅग कम नहीं हो गयी। नील की माॅग मे कमी सिथेटिक रंग के विकास के कारण आई थी। उसी प्रकार, चीन को निर्यात करने के लिए भारत में अफीम के उत्पादन पर जोर दिया। इसी प्रकार, इटैलियन रेशम पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए बंगानल में मलबरी रेशम के उत्पादन को बढ़ावा दिया गया। भारत में छोटे रेशे वाले कपास का उत्पादन होता था जबकि ब्रिटेन और यूरोप में बड़े रेशे वाले कपास की माॅग थी। इस माँग की पूर्ति के लिए महाराष्ट्र में बडे़ रेशे वाले कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित किया गया। उसी तरह ब्रिटेन में औद्योगीकरण और नगरीकरण की आवश्यकताओं को देखतेेेे हुए कई प्रकार की फसलों के उत्पादन पर बल दियागया। उदाहरणार्थ, चाय और काॅफी बागानों का विकास किया गया। पंजाब में गेहॅू, बंगाल मे पटसन तथा दक्षिण भरत में तिलहन के उत्पादन पर जोर देने को इसी क्रम से जोड़कर देखा जाता है। कृषि के व्यावसायीकरण के प्रभाव पर एक दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है भले ही सीमित रूप में ही सही, किंतु भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका सकारात्मक प्रभाव भी देखा गया। इससे स्वालंबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ी लेकिन इसी के परिणामस्वरूप अखिल भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। किसानों को इस व्यावसायीकरण से कुछ खास क्षेत्रों में, उदाहरण के लिए दक्कन कपास उत्पादन क्षेत्र तथा कृष्णा, गोदावरी डेल्टा क्षेत्र में,लाभ भी प्राप्त हुआ।
यदि हम इसके व्यापक प्रभाव पर दृष्टिपात करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अधिकांश भारतीय किसानों पर थोपी गयी प्रक्रिया थी। औपनिवेशिक सत्ता के अंतर्गत लायी गई इस व्यवसायीकरण की प्रक्रिया ने भारत को अकाल और भुखमरी के अलावा कुछ नहीं दिया। वस्तुतः भारतीय किसान मध्यस्थ और बिचैलयों के माध्यम से एक अन्तराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर थे। इस व्यवस्था का एक अन्य पहलू यह भी था कि व्यावसायिक (Commercial Crops) से लाभ प्राप्त करने वाला व्यवसायी अपनी जिम्मेदारी अपने नीचे वाले पर डालने का प्रयास करता और अंततः यह सारा दवाब किसानों के ऊपर पड़ती। दूसरे शब्दों में जब अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में व्यावसायिक फसलों की माॅग में तेज वृद्धि होती तो इसका लाभ मध्यस्थ और बिचैलियोंको प्राप्त होता, लेकिन इसके विपरीत जब बाजार में मंदी आती तो इसकी मार किसानों को झेलनी पड़ती अर्थात् लाभ बिचैलियों को और नुकसान हर स्थिति में किसानों को। दूसरे व्यावसायिक फसलों की खेती से गरीबों के आहार यानी मोटे अनाजों का उत्पादन कम हो गया। इसके परिणामस्वरूप भुखमरी में कोयम्बटूरके एक किसान ने तो यह तक कह डाला कि हम कपास इसलिए उपजाते है क्योंकि इसे हम खा नहीं सकते। दूसरी ओर, नगद फसलों (Cash Crops) की खेती के लिए निवेश की भी आवश्यकता पड़ती थी। किसान इस आवश्यकता को पूरा करने के साहूकारों व महाजनों से कर्ज थे, जिसके परिणामस्वरूप ग्रामीणों पर ऋण बोझ बढ़ता गया। इसी लिए माना जाता है कि भारतीय किसानों ने ठीक वैसा दुःख भोगा जैसा कि हम जावा (Dutch Culture System में देखते हैं। जावा में किसानों को अपनी भूमि के एक खास भागमें काॅफी और गन्ने की खेती करनी पड़ी तथा पूरा उत्पादन राजस्व के रूप में सरकार को देना पड़ा।

ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था का भारतीय ग्रामीण जीवन पर प्रभाव (Impact of British Land Revenue System on Indian Rural Life)

आरम्भ से ही कंपनी भू-राजस्व के रूप में अधिकतम राशि निर्धारित करना चाहती थी। अतः आरम्भ में वारेन हेस्टिग्स के द्वारा फर्मिग पद्धति की शुरूआत की गयी, जिसके तहत भू-राजस्व की वसूली का अधिकार ठेके के रूप में दिया जाने लगा था। इसका परिणाम यह निकला कि बंगाल में किसानों को शोषण हुआ तथा कृषि उत्पादन मे हास हुआ। आगे कार्नवालिस के द्वारा एक नवीन प्रयोग स्वतन्त्र बंदोबस्ती (Permanent Settlement) के रूप किया गया। इसके माध्यम से जमीदार मध्यस्थों को भूमि का स्वामी तथा स्वतन्त्र किसानों को अधीनस्थ रैय्यतों के रूप में तब्दील कर दिया गया। सबसे बढ़कर, सरकार की राशि सदा के लिए निश्चित कर दी गयी तथा रैय्यतों को जमींदारों के रूप में तब्दील कर दिया गया। राजस्व के अधिकतम निर्धारण ने ग्रामीण समुदाय को कई तरह से प्रभावित किया। इनमें से कुछ प्रभाव इस प्रकार है-

(1) वेनकदी फसलों के उत्पाद की और उन्मुख हुये, परन्तु कृषि के व्यवसायीकरण के बावजूद भी कोई सुधार नहीं हुआ। क्योंकि इसका मुख्य अंश जमीदार और बिचैलियों को प्राप्त हुआ।

(2) भू-राजस्व की राशि अधिकतम रूप में होने के कारण किसानों के पास ऐसा कोई अधिशेष नहीं बच पाता था जिसका कि फसल नष्ट होने के पश्चात् उपयोग कर सकें। अतः ग्रामीण क्षेत्रों में अकाल एवं भुखमरी और भी बढ़ती गई।

(3) जमींदारों कृषि क्षेत्र निवेश करने कोई रूचि नहीं थी तथा कृषक निवेश करने की स्थिति में नहीं थे। अतः कृषि पिछड़ती चली गयी। उत्तर भारत के ग्रामीण जीवन पर स्थायी बन्दोबस्त के परिणामस्वरूप पड़ने वाले प्रभाव का बड़ा ही मर्मस्पर्शी चित्रण प्रेमचंद अपने उपन्यास गोदानमें किया।
स्थायी बंदोस्त की तरह रैय्यतवाड़ी भू-राजस्व प्रबंधन भी तत्कालीन ग्रामीण ग्रामीण समुदाय दुष्प्रभावित हुआ। उपर्युक्त भू-राजस्व प्रबंधनों पर यूरोपीय विचारधारा तथा दृष्टिकोण का व्यापक प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है उपर्युक्त सभी पद्धतियाॅ ब्रिटिश औपनिवेसिक हितों तथा भारतीय परिस्थितियों एवं अनुभव पर आधारित है। कुछ ब्रिटिश पक्षधर ग्रामीण क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों को पूंजी वादी रूपान्तरण से जोड़ कर देखते हैं परन्तु ब्रिटिश नीती ने गांव को ऋण के बोझ तले कुचला और ग्रामीण लोगों को और निर्धन बनाया ब्रिटिश भू-राजस्व नीति के करण कृषि कुछ इस तरह पिछड़ी की स्वतन्त्रा के पश्चात भारत में औद्योगीकरण को कृषि का समर्थन प्राप्त नहीं हो सका। अतः हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए स्वतंत्रता के 60 वर्षों पश्चात भी भारतीय ग्रामीण जीवन पर ब्रिटिश भू-राजस्व नीति का अप्रत्यक्ष रूप से द्रष्टिगत होता है।

भारत में आधुनिक उद्योगों का विकास (Development of Modern Industries in India) :-

भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना का प्रारंभ 1850 ई0 से माना जाता है। इससे पूर्व जहाँ एक ओर भारतीय हस्त उद्योगों का पतन हो रहा था वहीं दूसरी ओर कुछ नये उद्योगों का जन्म भी हो रहा था। नये प्रकार के उद्योगों का विकास दो रूपों में दिखाई दिया-बागान उद्योग एवं कारखाना उद्योग। अंग्रेजों ने यहाँ सबसे पहले नगदी फसलों पर आधारित बागान उद्योगों जैसे-नील, चाय, कहवा आदि में खास दिलचस्पी ली। 1875 ई0 के बाद कारखाना-आधारित उद्योगों का विकास हुआ, जिनमें ये उद्योग शामिल थे-कपास, चमड़ा, लोहा, चीनी, सीमेंट, कागज, लकड़ी, काँच आदि।
देश में पहले सूती वस्त्र उद्योग ’बाॅम्बे स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी’ की स्थापना एक पारसी उद्योगपति कावसजी डाबर ने 1854 ई0 में की। भारत में पहला चीनी कारखाना 1909 ई0 में और पहला जूट कारखाना 1855 ई0 में बंगाल में खोला गया। पहली बार आधुनिक इस्पात तैयार करने का प्रयास 1830 ई0 में मद्रास के दक्षिण में स्थित आर्कट जिले में जोशिया मार्शल हीथ द्वारा किया गया। 1907 ई0 में जमशेदजी नौसेरवानजी टाटा के प्रयास से ’टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी’ की स्थापना हुई। इस प्रकार इन उद्योगों का क्रमशः विकास होता रहा।
अंग्रेजों द्वारा उपेक्षा किए जाने के बावजूद भारत का न्यूनाधिक औद्योगीकरण अनिवार्य ही था और काफी हद तक यह विकास प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ही शुरू हुआ। भारत का औद्योगिक विकास एकदम विपरीत क्रम में कपड़ा-उद्योग से शुरू हुआ, जबकि किसी भी देश के औद्योगिक विकास के लिए सबसे पहले भारी उद्योगों को विकसित किया जाना आवश्यक होता है। वस्तुतः अंग्रेजी शासन भारत का औद्योगिक अपने हितों की पूर्ति हेतु ही करना चाहता था। भारत में 20वीं शताब्दी में जो भी कल-कारखाने खुले उनका उद्देश्य भारत का औद्योगिक विकास ही नहीं बल्कि शोषण में कुछ और लोगों को भागीदार बनाकर शोषण प्रक्रिया को बदस्तूर उनका उद्देश्य भारत का औद्योगिक विकास नहीं, बल्कि शोंषण में कुछ और लोगों को भागीदार बनाकर शोषण प्रक्रिया को बदस्तूर जारी रखना था।

1857 का विद्रोह

ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध विद्रोह 1857 (Revolts Against British Empire) भारत के इतिहास में 1857 का विद्रोह एक युगांतकारी घटना मानी जाती है। सन् 1757 की प्लासी की लड़ाई और 1857 के विद्रोह के बीच ब्रिटिश शासन ने अपने 100 वर्ष पूरे कर लिये थे। इन 100 वर्षों में कई बार ब्रिटिश सत्ता को चुनौतियाँ मिलीं, किंतु 1857 का विद्रोह एक ऐसी चुनौती थी जिसने भारत में अंग्रेजों शासन की जड़ों को हिलाकर रख दिया। विद्रोह का स्वरूप (Nature of the Revolt) सन् 1857 के विद्रोह के संबंध में भिन्न-भिन्न विचार व्यक्त किए गए हैं। साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने एकपक्षीय तर्क देते हुए इसे सिर्फ ’सैनिक विद्रोह’ की संज्ञा दी है तो कुछ ने इसे दो नस्लों अथवा दो धर्मों का युद्ध बताया है। इस मत के विरूद्ध राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने इसे ’राष्ट्रीय विद्रोह’ की संज्ञा दी है तो किसी ने इसे ’स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम युद्ध’ बताया है। तथापि, इस विद्रोह के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए तथा किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व इन सभी अवधारणों की तथ्यों के साथ तार्किक व्याख्या आवश्यक होगी। वस्तुतः 1857 का विद्रोह एक सिपाही विद्रोह के रूप में प्रारम्भ हुआ। अतः साम्राज्यवादी विचारधारा के इतिहासकार सर जाॅन लारेंस एवं सर जाॅन सीले ने इसे सैनिक विद्रोह की संज्ञा दी है, परंतु यह व्याख्या तार्किक प्रतीत नहीं होती। निःसंदेह, इस विद्रोह का प्रारंभ सिपाहियों ने किया, परंतु सभी स्थानों पर यह सिर्फ सेना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें जनता के हर तबके की हिस्सेदारी रही। अवध और बिहार के कुछ इलाकों में तो इसे पूरा जन-समर्थन मिला। इंग्लैण्ड के रूढ़िवादी नेता बैंजामिन डिजरायली ने इस विद्रोह को एक राष्ट्रीय विद्रोह कहा, किंतु उनका यह मानना भी तर्कसंगत नहीं लगता क्योंकि उस समय भारत किसी राष्ट्र के रूप में संगठित नहीं था, बल्कि वह जन-असंतोष, निष्ठा एवं उद्देश्यों के आधार पर विभाजित था। एक अन्य साम्राज्यवादी इतिहासकार एल0आर0 रीस ने इसे धर्मांधों का ईसाई धर्म के विरूद्ध युद्ध बताया है, किन्तु उनके इस तथ्य में सत्य का अंश ढूँढ़ना मुश्किल ही होगा। यद्यपि इस संघर्ष में भिन्न-भिन्न धर्म के मानने वालों ने दोनों ओर से युद्ध किया तथा अपनी कमियों एवं अन्यायों को छुपाने के लिए धर्म का सहारा लिया, तथापि विद्रोह के अंत में निश्चय ही ईसाई जीते, न कि ईसाई धर्म। एक अन्य विद्वान टी0आर0 होम्स की अवधारणा, जिसके अनुसार उन्होंने इस युद्ध को बर्बरता और सभ्यता के बीच युद्ध कहा है, भी तार्किक प्रतीत नहीं होती क्योंकि इसमें संकीर्ण जाति-भेद झलकता है। दूसरी ओर, 1857 के संघर्ष में अंग्रेजी सेना नायक सर जेम्स आउट्रम और टेलर ने इस विद्रोह को हिन्दू-मुस्लिम षड्यंत्र का परिणाम बताया है। इनका मानना था कि यह विद्रोह मूलतः मुस्लिम षडयंत्र था, जिसमें हिन्दुओं की शिकायतों का लाभ उठाया गया। बहरहाल, विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि यह व्याख्या तर्कसंगत नहीं हैं क्योंकि बहादुरशाह जफर ने तो इस विद्रोह को केवल नेतृत्व प्रदान किया था, जिसका कारण महज इतना था कि वे मुगल साम्राज्य के सांकेतिक प्रतीक थे। इस विद्रोह को भारत के राष्ट्रीय नेताओं एवं राष्ट्रीय इतिहासकारों ने राष्ट्रीय विद्रोह बताने की कोशिश की, ताकि इसके माध्यम से राष्ट्रवादी विचार को जाग्रत किया जा सके। इस दिशा में शुरुआत वी. डी. सावरकर द्वारा की गई, जिन्होंने इसका वर्णन ’सुनियोजित राष्ट्रीयता स्वतंत्रता संग्राम’ के रूप में किया तथा इसे सिद्ध करने का प्रयास किया। उनके अनुसार 1826-1827, 1830-31 और 1848 के विद्रोहों की श्रृंखला 1857 में होने वाली घटना का पूर्व-संकेत मात्र थी। डाॅ. एस. एन. सेन अपनी पुस्तक ’एट्टीन फिफ्टी सेवन’ (Eighteen Fifty Seven) में आंशिक रूप से इस मत से सहमत होते हुए कहते हैं-’’जो कुछ धर्म के लिए लड़ाई के रूप में शुरू हुआ, वह स्वतंत्रता संग्राम के रूप में समाप्त हुआ।’’ दूसरी ओर, इस मत के प्रति असहमति व्यक्त करते हुए डाॅ. आर. सी. मजूमदार कहते हैं-’’तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय संग्राम ने तो पहला, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।’’ बरहाल, सभी मतों का विश्लेषण करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि निश्चित रूप से यह स्वतंत्रता संग्राम नहीं था क्योंकि देश का बहुत बड़ा हिस्सा तथा जनता के अनेक वर्गों ने इसमें भाग नहीं लिया था। इसके अतिरिक्त, विद्रोह में शामिल विभिन्न नेताओं के उद्देश्य समान नहीं थे और 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में राष्ट्रवाद एवं स्वतंत्रता के बीज प्रस्फुटित नहीं हो पाये थे। सन् 1857 के विद्रोह की व्याख्या माक्र्सवादी इतिहासकारों ने ब्रिटिश एवं सामंती के आधिपत्य के विरूद्ध सैनिकों एवं किसानों के संयुक्त विद्रोह के रूप में की है। यह मत भी तथ्यों के विपरीत है, विशेष रूप से इसलिए कि विद्रोह के नेता स्वयं सामंत वर्ग के थे। यदि हम इस विद्रोह का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि इसके स्वरूप को स्पष्टतः वर्गीकृत करना संभव नहीं है। निस्संदेह, यह साम्राज्य-विरोधी और राष्ट्रवादी स्वरूप का था क्योंकि हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों ने इसमें एक साथ भाग लिया था। इस प्रकार, इसे एक सामान्य सैनिक असंतोष, कृषक आंदोलन अथवा अभिजात्य विद्रोह करार देकर इसके महत्व को कम नहीं किया जा सकता। वस्तुतः यह माना जा सकता है कि 1857 का विद्रोह भारतीय राष्ट्रवाद की शुरुआती अभिव्यक्ति थी, जो आगे चलकर पूर्णतः भारतीय राष्ट्रवाद के रूप में परिणत हो गयी। विद्रोह के कारण (Causes of the Revolt) इतिहासकारों में 1857 के विद्रोह के कारणों के बारे में भी काफी विवाद है। अधिकांश इतिहासकारों, जिनमें भारतीय तथा साम्राज्यवादी इतिहासकार दोनों हैं, ने इस विद्रोह के कारणों का एकपक्षीय विश्लेषण करते हुए, इस विद्रोह के कारणों को सैनिक की शिकायतों अथवा चर्बीयुक्त कारतूसों जैसी घटना के बीच किसी एक कारण के रूप में ढूँढ़ना उचित नहीं होगा। समग्र रूप से विश्लेषण करने के उपरांत हम इस विद्रोह के पीछे अनेक कारण पाते हैं। इस विद्रोह के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: राजनीतिक कारण (Political Causes): डलहौजी की ’व्यपगत नीति तथा वेलेजली की ’सहायक संधि’ ने विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लाॅर्ड डलहौजी ने व्यपगत नीति के द्वारा सँभलपुर, जैतपुर, नागपुर, झाँसी, सतारा आदि राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया। साथ ही, अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से उतार देना, तंजौर और कर्नाटक के नवाबों की राजकीय उपाधियाँ जब्त कर लेना, मुगल बादशाह को अपमानित करने के लिए उन्हें नजराना देना, सिक्कों पर नाम खुदवाना आदि परंपराओं को डलहौजी द्वारा समाप्त करवा दिया जाना तथा बादशाह को लालकिला छोड़कर कुतुबमीनार में रहने का हुक्म दिया जाना आदि घटनाओं ने 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की। मुगल बादशाह भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व करता था, इसलिए उसके अपमान में जनता ने अपना अपमान समझा और विद्रोह के लिए तैयार हो गए। भारतीय जनता यह समझने लगी थी कि भारतीय क्षेत्रीय राज्यों का अस्तित्व खतरे में हैं। वे यह भी अनुमान लगाने लगे थे कि उनकी स्वतंत्रता केवल कुछ ही समय की बात है। भारतीय जनता यह महसूस करने लगी थी कि उन पर ब्रिटेन से शासन किया जा रहा है और देश का धन इंग्लैंड भेजा जा रहा है। प्रशासनिक कारण (Administrative Cause): अनेक राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक दुष्परिणाम भारतीय राज्यों के ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने के फलस्वरूप सामने आये थे। अंग्रेजों की कुटिल नीति के कारण दरबारों में रहने वाले परंपरागत एवं वंशानुगत कर्मचारियों एवं अधिकारियों को उच्च पद पाने से रोका ही नहीं गया, बल्कि सभी उच्च प्रशासनिक एवं सैनिक पद यूरोपीय लोगों के लिए आरक्षित कर दिये गये। इसने व्यापक जन-असंतोष को जन्म दिया। चूँकि ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन को भारतीय सामाजिक संरचना के बारे में जानकारी नहीं थी, अतः कंपनी की वाणिज्यिक नीतियों का परंपरागत भारतीय सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के साथ टकराव होता रहता था। कंपनी की भू-राजस्व व्यवस्था ने अधिकांश अभिजात वर्ग को निर्धन बना दिया। कंपनी की भिन्न-भिन्न भू-राजस्व व्यवस्थाओं, यथा-स्थायी बंदोबस्त, रैय्यतवाड़ी व्यवस्था और महालवाड़ी व्यवस्था द्वारा किसानों का जबर्दस्त शोषण किया गया जिससे वे निर्धनता के शिकार हो गये। नई व्यवस्था द्वारा कई तालुकदारों (बड़े जमींदारों) से उनका पद और जमीन छीन लिये गये। अंग्रेजों की व्यवस्था ने अभिजात वर्ग को निर्धन बना दिया तथा किसानों को ऋण के दुष्चक्र में फँसा दिया। इन सारी बातों ने असंतोष पैदा करने में अपनी महत्व भूमिका निभायी। सामाजिक और धार्मिक कारण (Social and Religious Causes) : ब्रिटिश प्रशासन द्वारा किए जा रहे सुधारवादी उपायों ने परंपरागत भारतीय जीवन-प्रणाली को झकझोर कर रख दिया। इससे भारतीय संस्कृति पर संकट के बादल मंडराने लगे, जिसका रूढ़िवादियों ने जमकर विरोध किया। ईसाई मिशनरियों को सन् 1813 के चार्टर अधिनियम (Charter Act, 1813) द्वारा भारत में धर्म-प्रचार की अनुमति मिल गई। ऐसे में ईसाई धर्म-प्रचारकों द्वारा अपनाये जाने वाले उपाय, यथा बलपूर्वक धर्मांतरण तथा भारतीय संस्कृति पर किये जाने वाले भावनात्मक हमलों ने भारतीय जनमानस की संवेदनाओं एवं भावनाओं को आहत किया। उन्होंने उत्तराधिकार एवं दायभाग जैसे संवेदनशील विषयों पर भी पंडितों एवं मौलवियों के विचारों को चुनौती दी। हिन्दू रीति-रिवाजों में सन् 1856 के धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम (Religious Disabilities Act, 1856) द्वारा संशोधन किया गया। इसके द्वारा ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले लोगों को अपनी पैतृक संपत्ति का हकदार माना गया, साथ ही उन्हें नौकरियों में पदोन्नति तथा शिक्षण संस्थानों में प्रवेश की सुविधा प्रदान की गई। अंग्रेजों द्वारा अपनायी जाने वाली इन भेदभावपूर्ण नीतियों ने भारतीयों को अंततोगत्वा विद्रोह के लिए मानसिक रूप से तैयार कर दिया। सैनिक कारण (Military Causes) : सन् 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि में सैनिक कारण भी मौजूद थे। अंग्रेजी सेना में कार्यरत भारतीय सैनिकों में अधिकांश भारतीय या तो जवान थे अथवा सूबेदार से ऊपर किसी भी पद पर नहीं थे। पदोन्नति से वंचित वेतन की न्यून मात्रा, भारत की सीमाओं से बाहर युद्ध के लिए भेजा जाना तथा समुद्र पार जाने पर भी भत्ता न देना आदि ऐसे प्रमुख कारण थे जिन्होंने भारतीय सैनिकों में असंतोष को बढ़ावा दिया। सन् 1854 में डाकघर अधिनियम (Post Office Act, 1854) पारित कर सैनिकों को प्राप्त निःशुल्क डाक सुविधा समाप्त कर दी गयी तथा सन् 1856 में लाॅर्ड कैनिंग द्वारा सेना भर्ती अधिनियम पारित कर सैनिकों को समुद्र पर ब्रिटिश उपनिवेशों में सेवा करना अनिवार्य कर दिया गया। चूँकि समुद्र पार जाना तत्कालीन भारतीय समाज में धर्म के विरूद्ध समझा जाता था, इसलिए इससे सैनिकों का गुस्सा भड़क उठा। तत्कालिक कारण एवं विद्रोह की शुरुआत (Immediate Causes and Beginning of the Revolt) : – ब्रिटिश शासन ने 1856 में सैनिकों के लिए ब्राउनबैस की जगह एनफील्ड रायफ़ल के प्रयोग का फैसला किया। प्रयोग करने से पूर्व कारतूस के ऊपरी भाग को मुँह से खींचना पड़ता था। जनवरी 1857 में यह अफ़वाह फैल गई कि कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी लगी है। इस अफ़वाह से हिन्दू और मुसलमान दोनों भड़क गये। फलतः 29 मार्च, 1857 को 34वीं रेजीमेंट बैैरकपुर के सैनिक मंगल पांडे ने विद्रोह की शुरुआत कर दी। उसने लेफ्टिनेंट वाघ तथा मेजर सार्जेण्ट ह्यूसन की मुर्शिदाबाद के निकट गोली मार दी। इस घटना में लेफ्टिनेंट वाघ की मृत्यु हो गई। अतः मंगल पांडे को 8 अप्रैल, 1857 को फाँसी पर चढ़ा दिया गया और 34वीं रेजीमेंट को भंग कर दिया गया। 24 अप्रैल, 1857 को मेरठ में तैनात घुड़सवार सेना के लगीाग 90 सिपाहियों ने चर्बी लगे कारतूसों का इस्तेमाल करने से मना कर दिया। इनमें से 9 मई, 1857 को 85 सिपाहियों को बर्खास्त कर 10 वर्ष की सजा सुनाई गई। इसके विरोध-स्वरूप मेरठ में तैनात ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाहियों ने 10 मई, 1857 को विद्रोह कर दिया। तदोपरांत, 11 मई को मेरठ के विद्रोही दिल्ली पहुँचे और 12 मई, 1857 को उन्होंने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। विद्रोह का प्रसार (Expansion of the Revolt) : 10 मई, 1857 को मेरठ स्थित छावनी के 20-NI तथा 3-LC की पैदल सैन्य टुकड़ी ने विद्रोह का आरम्भ किया। शीघ्र ही उसने देश के अन्य क्षेत्रों को अपने प्रभाव में ले लिया। उत्तर-मध्य प्रांत और अवध (आधुनिक उत्तर प्रदेश) में विद्रोह ने विकट रूप धारण कर लिया। देश के लगभग प्रत्येक भाग में इसका प्रभाव देखा गया, किंतु मद्रास इससे अछूता ही रहा। 12 मई, 1857 को विद्रोहियों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। यह घटना विद्रोहियों के लिए मनोबल बढ़ाने वाली थी। विद्रोहियों के लिए दिल्ली पर अधिकार मनौवैज्ञानिक बढ़ती गई, वहीं अंग्रेजों के लिये यह भारत में उनके अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न था। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम दिल्ली पर अधिकार करने के लिये प्रयास आरंभ किये। आरंभ में विद्रोहियों का नेतृत्व मुगल शहजादे कर रहे थे, परंतु 3 जुलाई, 1857 को नेतृत्व की कमान बख्त खाँ के हाथों में आ गई, किंतु वास्तविक सत्ता सिपाहियों के हाथ में ही रही। दिल्ली पर अंग्रेजों का अधिकार 20 सितंबर, 1857 को पूरी तरह हो गया। इस संघर्ष में ब्रिटिश सेनानायक जाॅन निकोलसन मारा गया। लेफ्टिनेंट हडसन ने मुगल सम्राट के दो पुत्रों मिर्जा मुगल एवं मिर्जा खिज्र सुल्तान और पोते मिर्जा अबुबक्र को दिल्ली के लालकिले के सामने गोली मार दी। फिर उसने हुमायूँ के मकबरे से बहादुरशाह द्वितीय को गिरफ्तार कर लिया तथा निर्वासित कर रंगून भेज दिया, जहाँ 1862 में उनकी मृत्यु हो गई। 4 जून, 1857 को लखनऊ में विद्रोह आरंभ हुआ। ब्रिटिश रेजिडेण्ट हेनरी लारेंस, जिसने यूरोपीय नागरिकों के साथ रेजीडेंसी में शरण ली थी, विद्रोहियों द्वारा मारा गया। लखनऊ को पुनः जीतने के हैबलाक और आउट्रम के प्रयास निष्फल रहे, परंतु नवंबर 1857 में नये सेनापति सर काॅलेन कैम्पबेल ने गोरखा रेजीमेंट की सहायता से लखनऊ पर पुनः कब्जा कर लिया। 5 जून, 1857 को कानपुर में विद्रोह की शुरुआत हुई। यहाँ पर पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब (धोंधूपंत) ने विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया, जिसमें उनकी सहायता तात्या टोपे (रामचंद्र पांडुरंग) ने की। 16 दिसंबर, 1857 को जनरल हैबलाॅक तथा जनरल नील ने कानपुर पर अधिकार कर लिया। नाना साहब अंततः नेपाल चले गये तथा तात्या टोपे को ग्वालियर के सिंधिया महाराज के सामंत मानसिंह ने अप्रैल 1859 में धोखे से अंग्रेजों को पकड़वा दिया और ग्वालियर में इन्हें फाँसी दे दी गई। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (गंगाधर राव की विधवा) अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को अंग्रेजों द्वारा वैधता न दिए जाने से गुस्से में थीं। अंतः उन्होंने 5 जून, 1857 को विद्रोह आरंभ कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई का सामना पर ह्यूरोज ने किया। लक्ष्मीबाई युद्ध करती हुई कालपी जा पहुँचीं। यहाँ भी वे ह्यूरोज की सेना से पराजित हुईं तथा यहाँ से चलकर ग्वालियर पहुँचीं। सिंधिया, जो कि अंग्रेज समर्थक था, की सेना विद्रोहियों से मिल गई, जिसकी सहायता से रानी ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। अंग्रेज सेनापति स्मिथ तथा ह्यूरोज की सम्मिलित सेनाओं ने ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया और यहीं 17 जून 1858 को रानी की वीरगति प्राप्त हुई। अंततः ग्वालियर पर अंग्रेजों का आधिपत्य स्थापित हो गया। खान बहादुर खान ने बरेली में विद्रोहियों का नेतृत्व किया और अपने आपको नवाब घोषित कर दिया। यहाँ के विद्रोह का दमन केम्पबेल ने किया और खान बहादुर खान को फाँसी की सजा हुई। फैजाबाद में विद्रोह का नेतृत्व मौलवी अहमदुल्ला ने किया। अहमदुल्ला का विद्रोह इतना आघातकारी था कि अंग्रेजों ने इसे पकड़ने के लिए 50 हजार रूपये का नकद इनाम घोषित कर दिया। रोहेलखण्ड की सीमा पोबायाँ में 5 जून, 1858 को अहमदुल्ला की गोली मारकर हत्या कर दी गई। जगदीशपुर (आरा, बिहार) में वहाँ के प्रमुख जमींदार कुँवर सिंह ने विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया। इन्होंने अंग्रेजों को बहुत हानि पहुँचायी, किन्तु जख्मी हो जाने के कारण 26 अप्रैल, 1858 को इनकी मृत्यु हो गई। असम में विद्र्रोह की शुरुआत वहाँ के दीवान मणिराम दत्त को फाँसी हो गई। उड़ीसा में संभलपुर के राजकुमार सुरेन्द्रशाही और उज्ज्वल शाही विद्रोहियों के नेता बने। सन् 1862 में सुरेन्द्रशाही ने आत्म-समर्पण कर दिया। राजस्थान में कोटा ब्रिटिश-विरोधियों का प्रमुख केन्द्र था, जहाँ जयदयाल और उसके भाई हरदयाल ने विदोह का नेतृत्व किया, बाद में जयदयाल को तोप से बाँधकर उड़ा दिया गया। व्यापक जन-समर्थन पाकर 1857 का विद्रोह भारत के बहुत बड़े भू-क्षेत्र में फैल गया था। समाज के लगभग सभी वर्गों की भागीदारी इसमें थी, फिर भी यह संपूर्ण देश या समाज के सभी वर्गों को अपने प्रभाव में नही ला सका। दक्षिणी भारत, पूर्वी तथा पश्चिमी भारत के अधिकांश भागों में यह नहीं फैल सका। इन क्षेत्रों में पहले भी कई विद्रोह हो चुके थे तथा अंग्रेजों ने उनका बर्बरतापूर्व दमन किया था। भारतीय रजवाड़ों के अधिकांश शासकों तथा बड़े जमींदार वर्ग ने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया। उल्टे उन्होंने इस विद्रोह को कुचलने में अंग्रेजों की सक्रिय मदद की। इन शासकों में सिंधिया होल्कर, निजाम, जोधपुर के राजा, भोपाल के शासक, पटियाला के जिन्द व नाभा के शासक आदि मुख्य थे। कैनिंग ने इनकी प्रशंसा करते हुए कहा ’’इन शासकों ने तूफान के आगे बाँध का काम किया, वरना यह तूफान एक ही लहर में हमें बहा ले जाता।’’ मद्रास, बंगाल और बाॅम्बे इस विदोह से प्रभावित नहीं हुए, परन्तु वहाँ की जनता को विद्रोहियांे से सहानुभूति थी। बेदखल जमींदारों को छोड़कर उच्च तथा मध्यमवर्ग के अधिकांश लोग विद्रोहियों के आलोचक बने रहे। संपन्न वर्गों के अधिकांश लोगों ने उनका सक्रिय विरोध किया। बंगाल के जमींदार भी अंग्रेजों के प्रति स्वामीभक्त बने रहे क्योंकि उनका सृजन ही अंग्रेजों द्वारा किया गया था। महाजनों ने भी विद्रोह का विरोध किया क्योंकि वे ग्रामीण जनता और विद्रोहियों के हमले के मुख्य निशाना थे। कलकत्ता, बाॅम्बे और मद्रास के बड़े व्यापारियों ने भी विद्रोह का विरोध किया क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों की सहायता से व्यावसायिक लाभ कमाना था। भारत में उच्च शिक्षित व्यक्तियों ने भी विद्रोहियों का साथ नहीं दिया। वे भारत के पिछड़ेपन को समाप्त करना चाहते थे और उनके मन में यह भ्रम था कि अंग्रेज आधुनिकीकरण के माध्यम से इस काम को पूरा करेंगे। वे यह मानते थे कि जमींदारों सरदारों और सामंतों तत्वों के नेतृत्व में लड़ने वाले विद्रोही देश को सामंतवादी व्यवस्था की ओर ले जाएँगे। अतः इन सभी आधारों पर विद्रोह के दौरान भारतीय समाज में एकता का नितांत अभाव रहा, जो कि विद्रोह के लिए घातक सिद्ध हुआ।

ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध विद्रोह 1857 (Revolts Against British Empire)

भारत के इतिहास में 1857 का विद्रोह एक युगांतकारी घटना मानी जाती है। सन् 1757 की प्लासी की लड़ाई और 1857 के विद्रोह के बीच ब्रिटिश शासन ने अपने 100 वर्ष पूरे कर लिये थे। इन 100 वर्षों में कई बार ब्रिटिश सत्ता को चुनौतियाँ मिलीं, किंतु 1857 का विद्रोह एक ऐसी चुनौती थी जिसने भारत में अंग्रेजों शासन की जड़ों को हिलाकर रख दिया।

विद्रोह का स्वरूप (Nature of the Revolt)

सन् 1857 के विद्रोह के संबंध में भिन्न-भिन्न विचार व्यक्त किए गए हैं। साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने एकपक्षीय तर्क देते हुए इसे सिर्फ ’सैनिक विद्रोह’ की संज्ञा दी है तो कुछ ने इसे दो नस्लों अथवा दो धर्मों का युद्ध बताया है। इस मत के विरूद्ध राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने इसे ’राष्ट्रीय विद्रोह’ की संज्ञा दी है तो किसी ने इसे ’स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम युद्ध’ बताया है। तथापि, इस विद्रोह के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए तथा किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व इन सभी अवधारणों की तथ्यों के साथ तार्किक व्याख्या आवश्यक होगी।

वस्तुतः 1857 का विद्रोह एक सिपाही विद्रोह के रूप में प्रारम्भ हुआ। अतः साम्राज्यवादी विचारधारा के इतिहासकार सर जाॅन लारेंस एवं सर जाॅन सीले ने इसे सैनिक विद्रोह की संज्ञा दी है, परंतु यह व्याख्या तार्किक प्रतीत नहीं होती। निःसंदेह, इस विद्रोह का प्रारंभ सिपाहियों ने किया, परंतु सभी स्थानों पर यह सिर्फ सेना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें जनता के हर तबके की हिस्सेदारी रही। अवध और बिहार के कुछ इलाकों में तो इसे पूरा जन-समर्थन मिला। इंग्लैण्ड के रूढ़िवादी नेता बैंजामिन डिजरायली ने इस विद्रोह को एक राष्ट्रीय विद्रोह कहा, किंतु उनका यह मानना भी तर्कसंगत नहीं लगता क्योंकि उस समय भारत किसी राष्ट्र के रूप में संगठित नहीं था, बल्कि वह जन-असंतोष, निष्ठा एवं उद्देश्यों के आधार पर विभाजित था।

एक अन्य साम्राज्यवादी इतिहासकार एल0आर0 रीस ने इसे धर्मांधों का ईसाई धर्म के विरूद्ध युद्ध बताया है, किन्तु उनके इस तथ्य में सत्य का अंश ढूँढ़ना मुश्किल ही होगा। यद्यपि इस संघर्ष में भिन्न-भिन्न धर्म के मानने वालों ने दोनों ओर से युद्ध किया तथा अपनी कमियों एवं अन्यायों को छुपाने के लिए धर्म का सहारा लिया, तथापि विद्रोह के अंत में निश्चय ही ईसाई जीते, न कि ईसाई धर्म। एक अन्य विद्वान टी0आर0 होम्स की अवधारणा, जिसके अनुसार उन्होंने इस युद्ध को बर्बरता और सभ्यता के बीच युद्ध कहा है, भी तार्किक प्रतीत नहीं होती क्योंकि इसमें संकीर्ण जाति-भेद झलकता है। दूसरी ओर, 1857 के संघर्ष में अंग्रेजी सेना नायक सर जेम्स आउट्रम और टेलर ने इस विद्रोह को हिन्दू-मुस्लिम षड्यंत्र का परिणाम बताया है। इनका मानना था कि यह विद्रोह मूलतः मुस्लिम षडयंत्र था, जिसमें हिन्दुओं की
शिकायतों का लाभ उठाया गया। बहरहाल, विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि यह व्याख्या तर्कसंगत नहीं हैं क्योंकि बहादुरशाह जफर ने तो इस विद्रोह को केवल नेतृत्व प्रदान किया था, जिसका कारण महज इतना था कि वे मुगल साम्राज्य के सांकेतिक प्रतीक थे।
इस विद्रोह को भारत के राष्ट्रीय नेताओं एवं राष्ट्रीय इतिहासकारों ने राष्ट्रीय विद्रोह बताने की कोशिश की, ताकि इसके माध्यम से राष्ट्रवादी विचार को जाग्रत किया जा सके। इस दिशा में शुरुआत वी. डी. सावरकर द्वारा की गई, जिन्होंने इसका वर्णन ’सुनियोजित राष्ट्रीयता स्वतंत्रता संग्राम’ के रूप में किया तथा इसे सिद्ध करने का प्रयास किया। उनके अनुसार 1826-1827, 1830-31 और 1848 के विद्रोहों की श्रृंखला 1857 में होने वाली घटना का पूर्व-संकेत मात्र थी। डाॅ. एस. एन. सेन अपनी पुस्तक ’एट्टीन फिफ्टी सेवन’ (Eighteen Fifty Seven) में आंशिक रूप से इस मत से सहमत होते हुए कहते हैं-’’जो कुछ धर्म के लिए लड़ाई के रूप में शुरू हुआ, वह स्वतंत्रता संग्राम के रूप में समाप्त हुआ।’’ दूसरी ओर, इस मत के प्रति असहमति व्यक्त करते हुए डाॅ. आर. सी. मजूमदार कहते हैं-’’तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय संग्राम ने तो पहला, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।’’ बरहाल, सभी मतों का विश्लेषण करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि निश्चित रूप से यह स्वतंत्रता संग्राम नहीं था क्योंकि देश का बहुत बड़ा हिस्सा तथा जनता के अनेक वर्गों ने इसमें भाग नहीं लिया था। इसके अतिरिक्त, विद्रोह में शामिल विभिन्न नेताओं के उद्देश्य समान नहीं थे और 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में राष्ट्रवाद एवं स्वतंत्रता के बीज प्रस्फुटित नहीं हो पाये थे।

सन् 1857 के विद्रोह की व्याख्या माक्र्सवादी इतिहासकारों ने ब्रिटिश एवं सामंती के आधिपत्य के विरूद्ध सैनिकों एवं किसानों के संयुक्त विद्रोह के रूप में की है। यह मत भी तथ्यों के विपरीत है, विशेष रूप से इसलिए कि विद्रोह के नेता स्वयं सामंत वर्ग के थे।
यदि हम इस विद्रोह का विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि इसके स्वरूप को स्पष्टतः वर्गीकृत करना संभव नहीं है। निस्संदेह, यह साम्राज्य-विरोधी और राष्ट्रवादी स्वरूप का था क्योंकि हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों ने इसमें एक साथ भाग लिया था। इस प्रकार, इसे एक सामान्य सैनिक असंतोष, कृषक आंदोलन अथवा अभिजात्य विद्रोह करार देकर इसके महत्व को कम नहीं किया जा सकता। वस्तुतः यह माना जा सकता है कि 1857 का विद्रोह भारतीय राष्ट्रवाद की शुरुआती अभिव्यक्ति थी, जो आगे चलकर पूर्णतः भारतीय राष्ट्रवाद के रूप में परिणत हो गयी।

विद्रोह के कारण (Causes of the Revolt)

इतिहासकारों में 1857 के विद्रोह के कारणों के बारे में भी काफी विवाद है। अधिकांश इतिहासकारों, जिनमें भारतीय तथा साम्राज्यवादी इतिहासकार दोनों हैं, ने इस विद्रोह के कारणों का एकपक्षीय विश्लेषण करते हुए, इस विद्रोह के कारणों को सैनिक की शिकायतों अथवा चर्बीयुक्त कारतूसों जैसी घटना के बीच किसी एक कारण के रूप में ढूँढ़ना उचित नहीं होगा। समग्र रूप से विश्लेषण करने के उपरांत हम इस विद्रोह के पीछे अनेक कारण पाते हैं। इस विद्रोह के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

राजनीतिक कारण (Political Causes):

डलहौजी की ’व्यपगत नीति तथा वेलेजली की ’सहायक संधि’ ने विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लाॅर्ड डलहौजी ने व्यपगत नीति के द्वारा सँभलपुर, जैतपुर, नागपुर, झाँसी, सतारा आदि राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया। साथ ही, अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से उतार देना, तंजौर और कर्नाटक के नवाबों की राजकीय उपाधियाँ जब्त कर लेना, मुगल बादशाह को अपमानित करने के लिए उन्हें नजराना देना, सिक्कों पर नाम खुदवाना आदि परंपराओं को डलहौजी द्वारा समाप्त करवा दिया जाना तथा बादशाह को लालकिला छोड़कर कुतुबमीनार में रहने का हुक्म दिया जाना आदि घटनाओं ने 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की। मुगल बादशाह भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व करता था, इसलिए उसके अपमान में जनता ने अपना अपमान समझा और विद्रोह के लिए तैयार हो गए।
भारतीय जनता यह समझने लगी थी कि भारतीय क्षेत्रीय राज्यों का अस्तित्व खतरे में हैं। वे यह भी अनुमान लगाने लगे थे कि उनकी स्वतंत्रता केवल कुछ ही समय की बात है। भारतीय जनता यह महसूस करने लगी थी कि उन पर ब्रिटेन से शासन किया जा रहा है और देश का धन इंग्लैंड भेजा जा रहा है।

प्रशासनिक कारण (Administrative Cause):

अनेक राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक दुष्परिणाम भारतीय राज्यों के ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने के फलस्वरूप सामने आये थे। अंग्रेजों की कुटिल नीति के कारण दरबारों में रहने वाले परंपरागत एवं वंशानुगत कर्मचारियों एवं अधिकारियों को उच्च पद पाने से रोका ही नहीं गया, बल्कि सभी उच्च प्रशासनिक एवं सैनिक पद यूरोपीय लोगों के लिए आरक्षित कर दिये गये। इसने व्यापक जन-असंतोष को जन्म दिया। चूँकि ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन को भारतीय सामाजिक संरचना के बारे में जानकारी नहीं थी, अतः कंपनी की वाणिज्यिक नीतियों का परंपरागत भारतीय सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के साथ टकराव होता रहता था। कंपनी की भू-राजस्व व्यवस्था ने अधिकांश अभिजात वर्ग को निर्धन बना दिया। कंपनी की भिन्न-भिन्न भू-राजस्व व्यवस्थाओं, यथा-स्थायी बंदोबस्त, रैय्यतवाड़ी व्यवस्था और महालवाड़ी व्यवस्था द्वारा किसानों का जबर्दस्त शोषण किया गया जिससे वे निर्धनता के शिकार हो गये। नई व्यवस्था द्वारा कई तालुकदारों (बड़े जमींदारों) से उनका पद और जमीन छीन लिये गये। अंग्रेजों की व्यवस्था ने अभिजात वर्ग को निर्धन बना दिया तथा किसानों को ऋण के दुष्चक्र में फँसा दिया। इन सारी बातों ने असंतोष पैदा करने में अपनी महत्व भूमिका निभायी।

सामाजिक और धार्मिक कारण (Social and Religious Causes) :

ब्रिटिश प्रशासन द्वारा किए जा रहे सुधारवादी उपायों ने परंपरागत भारतीय जीवन-प्रणाली को झकझोर कर रख दिया। इससे भारतीय संस्कृति पर संकट के बादल मंडराने लगे, जिसका रूढ़िवादियों ने जमकर विरोध किया। ईसाई मिशनरियों को सन् 1813 के चार्टर अधिनियम (Charter Act, 1813) द्वारा भारत में धर्म-प्रचार की अनुमति मिल गई। ऐसे में ईसाई धर्म-प्रचारकों द्वारा अपनाये जाने वाले उपाय, यथा बलपूर्वक धर्मांतरण तथा भारतीय संस्कृति पर किये जाने वाले भावनात्मक हमलों ने भारतीय जनमानस की संवेदनाओं एवं भावनाओं को आहत किया। उन्होंने उत्तराधिकार एवं दायभाग जैसे संवेदनशील विषयों पर भी पंडितों एवं मौलवियों के विचारों को चुनौती दी। हिन्दू रीति-रिवाजों में सन् 1856 के धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम (Religious Disabilities Act, 1856) द्वारा संशोधन किया गया। इसके द्वारा ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले लोगों को अपनी पैतृक संपत्ति का हकदार माना गया, साथ ही उन्हें नौकरियों में पदोन्नति तथा शिक्षण संस्थानों में प्रवेश की सुविधा प्रदान की गई। अंग्रेजों द्वारा अपनायी जाने वाली इन भेदभावपूर्ण नीतियों ने भारतीयों को अंततोगत्वा विद्रोह के लिए मानसिक रूप से तैयार कर दिया।

सैनिक कारण (Military Causes) :

सन् 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि में सैनिक कारण भी मौजूद थे। अंग्रेजी सेना में कार्यरत भारतीय सैनिकों में अधिकांश भारतीय या तो जवान थे अथवा सूबेदार से ऊपर किसी भी पद पर नहीं थे। पदोन्नति से वंचित वेतन की न्यून मात्रा, भारत की सीमाओं से बाहर युद्ध के लिए भेजा जाना तथा समुद्र पार जाने पर भी भत्ता न देना आदि ऐसे प्रमुख कारण थे जिन्होंने भारतीय सैनिकों में असंतोष को बढ़ावा दिया। सन् 1854 में डाकघर अधिनियम (Post Office Act, 1854) पारित कर सैनिकों को प्राप्त निःशुल्क डाक सुविधा समाप्त कर दी गयी तथा सन् 1856 में लाॅर्ड कैनिंग द्वारा सेना भर्ती अधिनियम पारित कर सैनिकों को समुद्र पर ब्रिटिश उपनिवेशों में सेवा करना अनिवार्य कर दिया गया। चूँकि समुद्र पार जाना तत्कालीन भारतीय समाज में धर्म के विरूद्ध समझा जाता था, इसलिए इससे सैनिकों का गुस्सा भड़क उठा।

तत्कालिक कारण एवं विद्रोह की शुरुआत (Immediate Causes and Beginning of the Revolt) :

– ब्रिटिश शासन ने 1856 में सैनिकों के लिए ब्राउनबैस की जगह एनफील्ड रायफ़ल के प्रयोग का फैसला किया। प्रयोग करने से पूर्व कारतूस के ऊपरी भाग को मुँह से खींचना पड़ता था। जनवरी 1857 में यह अफ़वाह फैल गई कि कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी लगी है। इस अफ़वाह से हिन्दू और मुसलमान दोनों भड़क गये। फलतः 29 मार्च, 1857 को 34वीं रेजीमेंट बैैरकपुर के सैनिक मंगल पांडे ने विद्रोह की शुरुआत कर दी। उसने लेफ्टिनेंट वाघ तथा मेजर सार्जेण्ट ह्यूसन की मुर्शिदाबाद के निकट गोली मार दी। इस घटना में लेफ्टिनेंट वाघ की मृत्यु हो गई। अतः मंगल पांडे को 8 अप्रैल, 1857 को फाँसी पर चढ़ा दिया गया और 34वीं रेजीमेंट को भंग कर दिया गया। 24 अप्रैल, 1857 को मेरठ में तैनात घुड़सवार सेना के लगीाग 90 सिपाहियों ने चर्बी लगे कारतूसों का इस्तेमाल करने से मना कर दिया। इनमें से 9 मई, 1857 को 85 सिपाहियों को बर्खास्त कर 10 वर्ष की सजा सुनाई गई। इसके विरोध-स्वरूप मेरठ में तैनात ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाहियों ने 10 मई, 1857 को विद्रोह कर दिया। तदोपरांत, 11 मई को मेरठ के विद्रोही दिल्ली पहुँचे और 12 मई, 1857 को उन्होंने दिल्ली पर अधिकार कर लिया।

विद्रोह का प्रसार (Expansion of the Revolt) :

10 मई, 1857 को मेरठ स्थित छावनी के 20-NI तथा 3-LC  की पैदल सैन्य टुकड़ी ने विद्रोह का आरम्भ किया। शीघ्र ही उसने देश के अन्य क्षेत्रों को अपने प्रभाव में ले लिया। उत्तर-मध्य प्रांत और अवध (आधुनिक उत्तर प्रदेश) में विद्रोह ने विकट रूप धारण कर लिया। देश के लगभग प्रत्येक भाग में इसका प्रभाव देखा गया, किंतु मद्रास इससे अछूता ही रहा। 12 मई, 1857 को विद्रोहियों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। यह घटना विद्रोहियों के लिए मनोबल बढ़ाने वाली थी। विद्रोहियों के लिए दिल्ली पर अधिकार मनौवैज्ञानिक बढ़ती गई, वहीं अंग्रेजों के लिये यह भारत में उनके अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न था। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम दिल्ली पर अधिकार करने के लिये प्रयास आरंभ किये। आरंभ में विद्रोहियों का नेतृत्व मुगल शहजादे कर रहे थे, परंतु 3 जुलाई, 1857 को नेतृत्व की कमान बख्त खाँ के हाथों में आ गई, किंतु वास्तविक सत्ता सिपाहियों के हाथ में ही रही। दिल्ली पर अंग्रेजों का अधिकार 20 सितंबर, 1857 को पूरी तरह हो गया। इस संघर्ष में ब्रिटिश सेनानायक जाॅन निकोलसन मारा गया। लेफ्टिनेंट हडसन ने मुगल सम्राट के दो पुत्रों मिर्जा मुगल एवं मिर्जा खिज्र सुल्तान और पोते मिर्जा अबुबक्र को दिल्ली के लालकिले के सामने गोली मार दी। फिर उसने हुमायूँ के मकबरे से बहादुरशाह द्वितीय को गिरफ्तार कर लिया तथा निर्वासित कर रंगून भेज दिया, जहाँ 1862 में उनकी मृत्यु हो गई।
4 जून, 1857 को लखनऊ में विद्रोह आरंभ हुआ। ब्रिटिश रेजिडेण्ट हेनरी लारेंस, जिसने यूरोपीय नागरिकों के साथ रेजीडेंसी में शरण ली थी, विद्रोहियों द्वारा मारा गया। लखनऊ को पुनः जीतने के हैबलाक और आउट्रम के प्रयास निष्फल रहे, परंतु नवंबर 1857 में नये सेनापति सर काॅलेन कैम्पबेल ने गोरखा रेजीमेंट की सहायता से लखनऊ पर पुनः कब्जा कर लिया।
5 जून, 1857 को कानपुर में विद्रोह की शुरुआत हुई। यहाँ पर पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब (धोंधूपंत) ने विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया, जिसमें उनकी सहायता तात्या टोपे (रामचंद्र पांडुरंग) ने की। 16 दिसंबर, 1857 को जनरल हैबलाॅक तथा जनरल नील ने कानपुर पर अधिकार कर लिया। नाना साहब अंततः नेपाल चले गये तथा तात्या टोपे को ग्वालियर के सिंधिया महाराज के सामंत मानसिंह ने अप्रैल 1859 में धोखे से अंग्रेजों को पकड़वा दिया और ग्वालियर में इन्हें फाँसी दे दी गई।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (गंगाधर राव की विधवा) अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को अंग्रेजों द्वारा वैधता न दिए जाने से गुस्से में थीं। अंतः उन्होंने 5 जून, 1857 को विद्रोह आरंभ कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई का सामना पर ह्यूरोज ने किया। लक्ष्मीबाई युद्ध करती हुई कालपी जा पहुँचीं। यहाँ भी वे ह्यूरोज की सेना से पराजित हुईं तथा यहाँ से चलकर ग्वालियर पहुँचीं। सिंधिया, जो कि अंग्रेज समर्थक था, की सेना विद्रोहियों से मिल गई, जिसकी सहायता से रानी ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। अंग्रेज सेनापति स्मिथ तथा ह्यूरोज की सम्मिलित सेनाओं ने ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया और यहीं 17 जून 1858 को रानी की वीरगति प्राप्त हुई। अंततः ग्वालियर पर अंग्रेजों का आधिपत्य स्थापित हो गया।

खान बहादुर खान ने बरेली में विद्रोहियों का नेतृत्व किया और अपने आपको नवाब घोषित कर दिया। यहाँ के विद्रोह का दमन केम्पबेल ने किया और खान बहादुर खान को फाँसी की सजा हुई। फैजाबाद में विद्रोह का नेतृत्व मौलवी अहमदुल्ला ने किया। अहमदुल्ला का विद्रोह इतना आघातकारी था कि अंग्रेजों ने इसे पकड़ने के लिए 50 हजार रूपये का नकद इनाम घोषित कर दिया। रोहेलखण्ड की सीमा पोबायाँ में 5 जून, 1858 को अहमदुल्ला की गोली मारकर हत्या कर दी गई। जगदीशपुर (आरा, बिहार) में वहाँ के प्रमुख जमींदार कुँवर सिंह ने विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया। इन्होंने अंग्रेजों को बहुत हानि पहुँचायी, किन्तु जख्मी हो जाने के कारण 26 अप्रैल, 1858 को इनकी मृत्यु हो गई। असम में विद्र्रोह की शुरुआत वहाँ के दीवान मणिराम दत्त को फाँसी हो गई। उड़ीसा में संभलपुर के राजकुमार सुरेन्द्रशाही और उज्ज्वल शाही विद्रोहियों के नेता बने। सन् 1862 में सुरेन्द्रशाही ने आत्म-समर्पण कर दिया। राजस्थान में कोटा ब्रिटिश-विरोधियों का प्रमुख केन्द्र था, जहाँ जयदयाल और उसके भाई हरदयाल ने विदोह का नेतृत्व किया, बाद में जयदयाल को तोप से बाँधकर उड़ा दिया गया।
व्यापक जन-समर्थन पाकर 1857 का विद्रोह भारत के बहुत बड़े भू-क्षेत्र में फैल गया था। समाज के लगभग सभी वर्गों की भागीदारी इसमें थी, फिर भी यह संपूर्ण देश या समाज के सभी वर्गों को अपने प्रभाव में नही ला सका। दक्षिणी भारत, पूर्वी तथा पश्चिमी भारत के अधिकांश भागों में यह नहीं फैल सका। इन क्षेत्रों में पहले भी कई विद्रोह हो चुके थे तथा अंग्रेजों ने उनका बर्बरतापूर्व दमन किया था। भारतीय रजवाड़ों के अधिकांश शासकों तथा बड़े जमींदार वर्ग ने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया। उल्टे उन्होंने इस विद्रोह को कुचलने में अंग्रेजों की सक्रिय मदद की। इन शासकों में सिंधिया होल्कर, निजाम, जोधपुर के राजा, भोपाल के शासक, पटियाला के जिन्द व नाभा के शासक आदि मुख्य थे। कैनिंग ने इनकी प्रशंसा करते हुए कहा ’’इन शासकों ने तूफान के आगे बाँध का काम किया, वरना यह तूफान एक ही लहर में हमें बहा ले जाता।’’ मद्रास, बंगाल और बाॅम्बे इस विदोह से प्रभावित नहीं हुए, परन्तु वहाँ की जनता को विद्रोहियांे से सहानुभूति थी। बेदखल जमींदारों को छोड़कर उच्च तथा मध्यमवर्ग के अधिकांश लोग विद्रोहियों के आलोचक बने रहे। संपन्न वर्गों के अधिकांश लोगों ने उनका सक्रिय विरोध किया। बंगाल के जमींदार भी अंग्रेजों के प्रति स्वामीभक्त बने रहे क्योंकि उनका सृजन ही अंग्रेजों द्वारा किया गया था। महाजनों ने भी विद्रोह का विरोध किया क्योंकि वे ग्रामीण जनता और विद्रोहियों के हमले के मुख्य निशाना थे। कलकत्ता, बाॅम्बे और मद्रास के बड़े व्यापारियों ने भी विद्रोह का विरोध किया क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों की सहायता से व्यावसायिक लाभ कमाना था।
भारत में उच्च शिक्षित व्यक्तियों ने भी विद्रोहियों का साथ नहीं दिया। वे भारत के पिछड़ेपन को समाप्त करना चाहते थे और उनके मन में यह भ्रम था कि अंग्रेज आधुनिकीकरण के माध्यम से इस काम को पूरा करेंगे। वे यह मानते थे कि जमींदारों सरदारों और सामंतों तत्वों के नेतृत्व में लड़ने वाले विद्रोही देश को सामंतवादी व्यवस्था की ओर ले जाएँगे। अतः इन सभी आधारों पर विद्रोह के दौरान भारतीय समाज में एकता का नितांत अभाव रहा, जो कि विद्रोह के लिए घातक सिद्ध हुआ।

1857 के विद्रोह की विफलता का कारण (Causes for the Failure of the Revolt)

सन् 1857 के विद्रोह की विफलता का विश्लेषण करने पर हमें निम्नलिखित कारण दिखाई पड़ते हैं-

  • यह विद्रोह स्थानीय, सीमित तथा असंगठित था। बिना किसी पूर्व योजना के शुरू होने के कारण यह विद्रोह अखिल भारतीय स्वरूप धारण नहीं कर सका और भारत के कुछ ही वर्गों तक सीमित रहा।
  • देखा जाए तो विद्रोह की प्रकृति के मूल में सामंतवादी लक्षण थे। एक तरफ अवध, रुहेलखण्ड तथा उत्तर भारत के सामंतो ने विद्रोह का नेतृत्व किया, तो दूसरी ओर पटियाला, जींद, ग्वालियर तथा हैदराबाद के राजाओं ने विद्रोह के दमन में भरपूर सहयोग दिया। इसका प्रमाण कैनिंग के इस बयान से मिलता है-’’यदि सिंधिया विद्रोह में सम्मिलित हो जाए तो ,मुझे कल ही बोरिया-बिसतर समेटकर वापस लौट जाना होगा।’’
  • अंग्रेजों के साधन विद्रोहियों के साधनों की अपेक्षा बहुत अधिक मात्रा में तथा उन्नत किस्म के थे। जहाँ भारतीय विद्रोही परंपरागत हथियारों, तलवार और भालों से लड़े, वहीं दूसरी ओर अंग्रेज सेना आधुनिकतम हथियारों से लैस थी। तार-व्यवस्था जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग ने अंग्रेजों की ताकत कई गुना बढ़ा दी।
  • विद्रोहियों के पास ठोस लक्ष्य एवं स्पष्ट योजना का अभाव था। विद्रोहियों के सामने ब्रिटिश सत्ता के विरोध के अतिरिक्त कोई अन्य समान उद्देश्य नहीं थाा। उन्हें आगे क्या कराना होगा, यह निश्चित नहीं था। वे तो भावावेश एवं परिस्थितिवश आगे बढ़े जा रहा रहे थे।
  • विद्रोहियों के पास जहाँ सक्षम नेतृत्व का अभाव था, वहीं कंपनी का लाॅरेंस बंधु, निकोलसन, आउट्रम, हैबलाॅक एवं एडवड्र्स जैसे योग्य सैन्य अधिकारियों की सेवाएँ प्राप्त थीं। विद्रोह में आधुनिक शिक्षाप्राप्त भारतीयों का सहयोग विद्रोहियों को नहीं मिला। वे भारत के पिछड़ेपन को समाप्त करना चाहते थे तथा उनके मन में यह भ्रम था कि अंग्रेज आधुनिकीकरण के माध्यम से इस काम को पूरा करने में उनकी मदद करेंगे। वे यह मानते थे कि विद्रोही देश में सामंतवादी व्यवस्था पुनः स्थापित कर देंगे।
  • विद्रोहियों को उपनिवेशवाद की कोई विशेष समझ नहीं थी जो कि एक ऐसी विचारधारा थी जिसके सहारे ब्रिटेन पूरे विश्व में अपनी जड़ें फैला चुका था। अतः इस विद्रोह का असफल होना अवश्यंभावी था।
  • विद्रोहियों के पास भविष्योन्मुख कार्यक्रम, सुसंगत विचारधारा या भावी समाज की कोई रूपरेखा नहीं थी। किसी निश्चित योजना के अभाव के साथ ही ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकनें के पश्चात् वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था के बारे में उन्हें कोई ज्ञान नहीं था। इसके अलावा, वे आपस में भी एक-दूसरे को शंका की दृष्टि से देखा करते थे।

विद्रोह के परिणाम (Consequences of the Revolt):

 

भले ही 1857 का विद्रोह असफल रहा, किंतु भारत में अंग्रेजी शासन के लिए यह पहली बार एक प्रबल और प्रत्यक्ष संकट के रूप में प्रकट हुआ। विद्रोह के दमन के दौरान एवं बाद में विद्रोही भारतीय सैनिकों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। दंडस्वरूप उनकी स्वतंत्रता और संपत्ति छीन ली गई। विजेता अंग्रेजी सेनाओं ने भारतीय लोगों पर अमानवीय उत्पीड़न किए। छद्म मुकदमा चलाने के बाद कई विद्रोहियों को मनमाने तरीके से फाँसी दे दी गई। दंड देते समय उन्हें अपमानित एवं प्रताड़ित किया गया। अनेक गाँव नष्ट कर दिए गए। भारतीय लोग अब अपने अंग्रेज शासकों से पहले से कहीं अधिक दूर हो गए। दूसरी ओर, 1857 के क्रांति से सबक लेते हुए अंग्रेजों ने अपने प्रशासनिक ढाँचे में आमूलचूल परिवर्तन किए जो कि इस प्रकार हैं-

  • विद्रोह के सबसे महत्वपूर्ण परिणाम के रूप में महारानी की उद्घोषणा 1 नवंबर, 1858 को लाॅर्ड कैनिंग द्वारा उद्घोषित की गयी। उद्घोषणा में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की समाप्ति और भारत के शासन को सीधे ब्रिटिश ताज ;ठतपजपेी ब्तवूदद्ध के अंतर्गत लाए जाने की घोषणा की गई।
  • 1858 ई0 के अधिनियम के तहत ब्रिटेन में एक ’भारतीय राज्य सचिव’ का पद सृजित किया गया। इसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक ’मंत्रणा परिषद्’ बनाई गयी। इन 15 सदस्यों में 8 की नियुक्ति सरकार द्वारा करने तथा 7 की कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स द्वारा चुनने की व्यवस्था की गई।
  • सैन्य पुनर्गठन के तहत यूरोपीय सैनिकों की संख्या को बढ़ा दिया गया। उच्च सैन्य पदों पर भारतीय सेनिकों की नियुक्ति को बंद कर दिया गया। तोपखाने पर पूर्णतः अंग्रेजी सेना का अधिकार हो गया। अब सेना में भारतीयों एवं अंग्रेजों का अनुपात 2:1 का हो गया। विदा्रेह के पूर्व यह अनुपात 5ः1 था। बम्बई और मद्रास में सेना 2ः5 के अनुपात में रखी गई। उच्च जाति के लोगों का सेना में भर्ती किया जाना बंद कर दिया गया।
  • सन् 1858 के अधिनियम के अंतर्गत भारत के गर्वनर जनरल को वायसराय कहा जाने लगा। इसके अनुसार लाॅर्ड कैनिंग ब्रिटिश भारत के प्रथम वायसराय बने। विद्रोह के फलस्वरूप सामंतवादी व्यवस्था चरमरा गयी। आम भारतीयों के बीच सामंतवादिता की छवि देशद्रोहियों की हो गई क्योंकि सामंतों ने विदोह को दबाने में अंग्रेजों को सहयोग दिया था।
  • 857 के विदोह के पश्चात् अंग्रेजों की साम्राज्य विस्तार की नीति का तो अंत हो गया, परंतु इसके स्थान पर उनकी आर्थिक शोषण की नीति आरंभ हो गयी।
  • भारतीयों के प्रशासन में प्रतिनिधित्व के लिए अल्प प्रयास के तहत 1861 ई0 में भारतीय परिषद अधिनियम पारित किया गया। इसके अतिरिक्त ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में कमी आई, श्वेत जाति की उच्चता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया तथा मुगल साम्राज्य के अस्तित्व को सदा े लिए समाप्त कर दिया गया।
  • स्थानीय लोगों को उनके सम्मान एवं अधिकारों को पुनः वापस दिलाने की बात कही गयी। भारतीय नरेशों को महारानी विक्टोरिया ने अपनी ओर से समस्त संधियों के पालन किए जाने का भरोसा दिलाया, लेकिन साथ ही, नरेशों से भी उसी प्रकार के पालन की इच्छा व्यक्त की। अपने राज्यक्षेत्र के विस्तार की अनिच्छा जताने के साथ-साथ उन्होंने अपने राज्यक्षेत्र अथवा अधिकारों का अतिक्रमण बर्दास्त न करने तथा दूसरों पर अतिक्रमण न करने के प्रति अपनी वचनबद्धता व्यक्त की ओर साथ ही धार्मिक शोषण समाप्त करने एवं नौकरियों में भेदभावरहित नियुक्ति की बात कही।
  • सन् 1861 में भारतीय नागरिक सेवा अधिनियम (Indian Civil Services Act, 1861) पास हुआ। इसके अंतर्गत लंदन में प्रत्येक वर्ष एक प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करने की बात कही गई।
    दूसरी ओर भारत के संदर्भ में, विद्रोह के परिणामस्वरूप भारतीयों में राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास हुआ और हिन्दू-मुस्लिम एकता नये रूप में दृष्टिगत हुई, जिसका आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा।

विद्रोह का महत्व (Importance of the Revolt):

 

सन् 1857 के विद्रोह का योगदान इस रूप में है कि इसने भारत को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने तथा राष्ट्रीय भावना विकसित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस विद्रोह ने भारतीयों को एकता और संगठन का पाठ पढ़ाया जो कि भविष्य में उनका प्रेरणा-सा्रेत बना। विद्रोह के पश्चात ब्रिटिश शासन ने भारत के प्रति अपने उत्तरदायित्व को महसूस किया तथा वह भारत की स्थिति सुधारने की ओर अग्रसर हुआ। यह विद्रोह ही भारत के संवैधानिक विकास का उद्गम बिंदु बना जिसने भारतीयों को शासन में भागीदारी का प्रशिक्षण दिया।

1857 के विद्रोह से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तकें

पुस्तक लेखक
1. फस्र्ट वाॅर आॅफ इंडियन इंडिपेंडेंस वी.डी. सावारकर
2. द सिपाॅइ म्यूनिटी एंड द रिवोल्ट आॅफ1857 आर. सी. मजूमदार
3. एट्टीन फिफ्टी सेवन (Eighteen Fifty seven) एस. एन. मजूमदार

1857 के विद्रोह के बारे में इतिहासकारों के मत

 

इतिहासकार मत
सर जाॅन लारेन्स, सीले पूर्णतया सैनिक विद्रोह
आर.सी.मजूमदार 1857 का विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम नहीं था।
सावरकर, अशोक मेहता राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए सुनियोजित युद्ध
टी आर. होम्स सभ्यता एवं बर्बरता का संघर्ष
एल.आर.रीज. ईसाई धर्म के विरूद्ध एक धर्म युद्ध
जेम्स आउट्रम, डब्ल्यू टेलर अंगे्रजों के विरूद्ध हिन्दू-मुसलमानों का षड्यंत्र
डिजरायली राष्ट्रीय विद्रोह
डाॅ. राम विलास शर्मा जन क्रांति
डाॅ. ईश्वरी प्रसाद स्वतंत्रता संग्राम

1857 का विद्रोहः एक नजर में

 

 केन्द्र  विद्रोही नेता  विद्रोह का दिन विद्रोह को कुचलने वाले सेनानायक  समर्पण का दिन 
 दिल्ली  बहादुरशाह जफर, बख्त खाॅ  11 मई. 1857  निकोलस, हडसन  20 सितम्बर, 1857
 लखनऊ   बेगम हजरत महल  4 जून. 1857  काॅलिन कैम्पबेल  31 मार्च. 1857
 कानपुर   नानासाहब, तात्या टोपे  5 जून. 1857  काॅलिन कैम्पबेल  दिसम्बर, 1857
 झाॅसी, ग्वालियर    रानी लक्ष्मीबाई, तत्या टोपे  जून 1857  जनरल ह्यूरोज  17 जून. 1858
 जगदीशपुर  कुॅवर सिंह, अमर सिंह  12 जून, 1857  मेजर विलियम टेलर  दिसम्बर, 1858
 फैजाबाद  मौलवी अहमदुल्ला  जून, 1857    जनरल रेनार्ड  5 जून, 1858
 इलाहाबाद   लियाकत अली  जून 1857  कर्नल नील  1858
  बरेली  खान बहादुर खान  जून, 1857  बिसेंट आयर  1858

भारतीय जन आंदोलन (Indian Mass Movements)

अन्य जन-आंदोलन (Indian Mass Movements)

यदि आंदोलन और विद्रोहों की क्रमबद्धता का विश्लेषण किया जाए तो प्लासी के युद्ध (1757) और 1857 के विद्रोह के बीच ऐसे अनेक विद्रोह एवं आंदोलन हुए जिनमें किसानों, शासकों, सैनिकों, जमींदारों, साधुओं और अपदस्थ भारतीय शासकों ने भाग लिया। इनमें से अधिकांश विद्रोहियों का संबंध निम्न वर्ग से था। इसलिए इन विद्रोहों एवं आंदोलनों को आधारभूत इतिहास या नीचे से उभरते इतिहास ;भ्पेजवतल तिवउ ठमसवूद्ध की संज्ञा दी गई। इन आंदोलनों को विभिन्न वर्गों में बांटकर देखा जा सकता है। जो निम्न है |

राजनीतिक – धार्मिक आंदोलन (Politico – Social Movements)

राजनीतिक-धार्मिक आंदोलनों के अंतर्गत हम निम्नलिखित आंदोलनों एवं विद्रोहों को रख सकते हैः-

फकीर विद्रोह (Fakir Resistance,1776-77)

यह विद्रोह बंगाल में बिचारणशील मुसलमान धार्मिक फकीरों द्वारा किया गया। इस विद्रोह के नेता मजनू शाह ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देते हुए जमींदारों और किसानों से धन इकट्ठा करना प्रारंाभर कर दिया। मजनू शाह की मृत्यु के बाद चिराग अली शाह ने आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया। पठानों, राजपूतों, और सेना से निकाले गये भारतीय सैनिकों ने उसकी मदद की। भवानी पाठक एवं देवी चैधरानी इस आंदोलन से जुड़े प्रसिद्ध हिन्दू नेता थे।

संन्यासी विद्रोह (Sannyasi Rebellion, 1770-1820)

बंगाल में 1770 में पड़े भीषण अकाल और अंगे्रजों की शोषणकारी नीति ने बंगाल में अस्त-व्यस्तता पैदा कर दी। इस अकाल के बाद हिन्दू नागा और गिरी सश्स्त्र संन्यासी, जो कभी मराठा और राजपूत सेनाओं का हिस्सा होतेथे, ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह के प्रमुख कारणों में तीर्थ-यात्रियों पर प्रतिबंध लगाया जाना था। वारेन हेस्टिंग्स ने एक कठोर सैन्य अभियान के बाद इस विद्रोह को कुचलने में सफलता पाई। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ’आनन्दमठ’ में इस विद्रोह का विस्तृत वर्णन किया है।

पागलपंथी विद्रोह (Pagal Pantbis Uprising, 1813-33)

उत्तर-पूर्वी भारत में प्रभावी पागलपंथी एक धार्मिक पंथ था। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में हिन्दू, मुसलमान और गारों तथा जांग आदिवासी इस पंथ के समर्थक थे। इस क्षेत्र में अंग्रेजों द्वारा क्रियान्वित भू-राजस्व तथा प्राशासनिक व्यवस्था के कारण व्यापक असंतोष था, जिसके परिणामस्वरूप 1813 ई. में पागलपंथियों के नेता टीपू ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह लगभग दो दशकों (1813-33) तक चला। इस विद्रोह के दौरान टीपू इतना प्रभावशाली हो गया कि उसने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में औपनिवेशिक प्रशासन के सामांनातर एक और प्रशासनिक तंत्र का गठन कर लिया। इस विद्रोह को सन् 1833 में दबा दिया गया।

वहाबी आंदोलन (Wahabi Uprisign, 1820-1870)

वहाबी आंदोलन मूलतः एक इस्लामिक सुधारवादी आंदोलन था, जिसने कालंातर में मुस्लिम समाज में व्याप्त अंधविश्वासों एवं कुरीतियों के उन्मूलन को अपना उद्देश्य बनाया। इस आंदोलन के संस्थापक अब्दुल वहाब के नाम पर इसका नाम वहाबी आंदोलन पड़ा। सैय्यद अहमद बरेलवी ने भारत में इस आंदोलन को प्रेरणा प्रदान की।
इस आंदोलन का मुख्य लक्ष्य पंजाब में सिखों और बंगाल में अंग्रेजों को अपदस्थ करके भारत में मुस्लिम सत्ता पुनस्र्थापित करना था। इन्होंने अपने अनुयायियोंका सैन्य शिक्षा दी। इस आंदोलन के तहत सैय्यद अहमद ने सन् 1830में पेशावर पर नियत्रंण कर लिया और अपने नाम से सिक्के चलवाये, किंतु 1831 में बालाकोट के युद्ध में इनकी मृत्यु हो गई। सैय्यद अहमद की अचानक मृत्यु के उपरांत वहाबी आंदोलन का वहाबी आन्दोलन का मुख्य केन्द्र पटना हो गया। इस दौरान मौलवी कासिम इनायत अली बिलायत अली तथा अहमदुल्ला ने आदोलन का नेतृत्व किया। वहाबी आंदोलन 1857 के विद्रोह की तुलना में अधिक नियोजित तथा संगठित था तथापि इस आंदोलन की अनेक कमजोरियाॅ थी, जेसे सांप्रदायिक उन्माद तथा धर्माधता। इसके बावजूद वहाबियों ने हिन्दुओं विरोध कभी नहीं किया वहाबी आंदोलन निःसदेंह भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराना चाहता था। परंतु इस आंदोलन का उद्देश्य भारत के लिए स्वतत्रंता प्राप्त करना नहीं बल्कि मुस्लिम शासन की पुनस्र्थापना करना था। सन् 1870 के आसपास अंगे्रजों द्वारा इस आंदोलन का दमन कर दिया गया।

कूका विद्रोह (Kuka Revolt, 1860-70)

कूका आंदोलन तथा वहाबी आंदोलन में समानता इन अर्थों में थी कि दोनो ही धार्मिक आंदोलन के रूप में आरम्भ हुए और दानों ही बाद में ऐसे राजनीतिक आंदोलनों में परिवर्तित हो गये जिनका एकसमान उद्देश्य अंगे्रेजों को भारत से बाहर निकालना था। सन् 1840 में भगत जवाहर मल (सियान साहब) ने कूका आदोलन की शुरूआत पश्चिम पंजाब से की। इस आन्दोलन का उदेश्य सिख धर्म में व्याप्त बुराइयों का उन्मूलन कर उसे शुद्ध करना था। सियान साहब और उनके शिष्य बालक सिंह ने उत्तर-पश्चिमी सीमा पं्रात में हाजरों को अपना मुख्यालय बनाया। कालंातर में सिख प्रभुसत्ता को पुनस्र्थापित करना ही कूका आंदोलन का प्रमुख उदेश्य बन गया। सन् 1863-72 के बीच अंग्रेजों ने इस आंदोलन को दबा दिया तथा आंदोलन के प्रमुख नेता रामसिंह को रंगून भेज दिया।

अपदस्थ षासकों का आंदोलन (Movements of the Dismissed Rulers)

अंग्रेजो की साम्राज्यवादी नीतियो, यथा वेलेजली की सहायक संधि डलहौजी के राज्य विलय की नीति एवं ब्रिटिश राज्य प्रणाी का विवरण निम्नलिखित है-

वंलूथप्पी का विद्रोह (Veluthampi Revolt, 1808-1809) 

वंलूथप्पी त्रावणकोर (केरल) का दीवान था। पद से हटाए जाने और राज्य पर भारी वित्तीय बोझ डाले जाने के खिलाफ उसने विद्रोह कर दिया। अंगे्रजोंसे हुई लड़ाई में वंलूथप्पी घायल हो गया और जंगल की ओर भाग गया जहाॅ उसकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद अंगेे्रजी सेपा ने उसे सार्वजनिक रूप से फाॅसी पर लटका दिया।

किट्टूर चेन्नमा का विद्रोह (Kottur Chennamma Rebellion, 1824-1829)

सन् 1824 में किट्टूर (आधुनि कर्नाटक में स्थित) के स्थानीय शासक की मृत्यु केबाद अंगे्रेजों ने गोद लिये गये किट्टूर के उत्तराधिकारी शासक को मान्यता नहीं दी और प्रशासन अपने नियंत्रण में ले लिया। राजा की विधवा चेन्नमाने रायप्पा नामक स्थानीय सरदार की मदद से विद्रोह कर दिया। अंगेजों ने विद्रोह को बर्बरतापूर्ण तरीके से दबा दिया और रायप्पा को फाॅसी देदी तथा चेन्नमा को कैद कर लिया जहाॅ जेल में उसकी मृत्यु हो गई |

विशाखापत्तनम का विद्रोह (Visakahapatnam Revolt, 1827-30)

विशाखापत्तनम जिले में अपनी संपत्ति जब्तकर लिए जाने तथा लगान का भुगतान न किये जाने के कारण सरकार द्वारा कठोर तरीके अपनाये जाने के विरोध में स्थानीय जमीदारों ने सन् 1827-30 के बीच अनेक विद्रोह किए। कालांतर में सरकार ने इन सभी विद्रोहों को दबा दिया।

अपदस्थ शासकों के आश्रितों के विद्रोह (Revolts by Dependents of the Dismissed Rulers)

ब्रिटिश भारत में अपदस्थ शासकों के आश्रितों ने भी राज्य की पुनप्र्राप्ति के लिए विद्रोह किए। इनमें प्रमुख विद्रोह निम्नलिखित है-

रामोसी विद्रोह (Remosi Revolt, 1822-1826):

रामोसी मराठा राज्य के अधीनस्थ कर्मचारी थे, जिन्हें मराठा राज्य के पतन के उपरांत कृषि को रोजगार के रूप में अपना लिया था। अत्यधिक लगान-निर्धारण तथा वसूली के कष्टदायी तरीकों के विरोध में उन्होेंने 1822 में विद्रोह कर दिया। इसी बीच सन् 1825-26 में अकाल पड़ने के कारण उमा जी के नेतृत्व में उन्होंने पुनः विद्रोह किया। ब्रिटिश सरकार ने उनके अपराधों को माफ कर दिया तथा भूमि-अनुदान देने के साथ-साथ उन्हें पर्वतीय पुलिस में भर्ती भी किया।

गड़कारी विद्रोह (Godkari Revolt) (1844)

गड़कारी विद्रोह मराठों के दरबार में काम करने वाले पुश्तैनी कर्मचारी थे। मराठा सेना से सेवा मुक्त किये जाने तथा कृषि भूमि को मामलतदारों के परीक्षण में रखे जाने के विरूद्ध गड़कारी लोगों ने सन् 1844 में कोल्हापुर में विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों ने क्रूरतापूर्ण तरीकों द्वारा इस विद्रोह का दमन किया।

सावंतवादी विद्रोह (Savantwadi Revolt) (1844):

मराठा सामंत सावंत ने सन् 1844 दक्कन में विद्रोह कर दिया। अंग्रेजी सेनओ ने इस विद्रोह के विरूद्ध कठोर कार्रवाई की जिसके परिणामस्वरूप ये लोग गोवा चले गये। कालांतर में सांवतवादी विद्रोहियों पर राजद्रोह चलाकर उन्हें कठोर सजाएॅ दी गई।

जनजातीय आंदोलन (Tribal Movements)

भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद यहाॅ की जनजातियों का औपनिवेशिक सत्ता के साथ अनेक बार सशस्त्र संघर्ष हुआ। इन संघर्षों का मुख्य कारण ब्रिटिश शासन द्वारा उनकी विशिष्ट भौगोलिक समाजिक आर्थिक एवं संस्कृतिक पंरम्पराओं में हस्ताक्षेप किया जाना था। इन जनजातीय आंदोलनोंका चरित्र अन्य समुदायिक आंदोलनों से इस अर्थ में भिन्न था कि ये अत्यधिक हिंसक बिल्कुल अलग-अलग और एकाकी थे। आलदोलनों विश्लेषण करने पर इस निष्कर्ष पर पहुॅचते है कि इन आन्दोलनों के पीछे कुछ कारण निहित थे, जो इस प्रकार हैं-

  • ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद लागू नई भू-राजस्व तथा प्राशासनिक व्यवस्था ने कबीलाई तथा विभिन्न विशिष्ट सामाजिक आर्थिक व्यवस्थाओं को औपनिवेशिक व्यवस्था शामिल कर दिया। इस नई व्यवस्था नें आदिवासियों के शोषण का एक नया तंत्र स्थापित कर दिया जिसके कारण इन जन जातियों में जबरदस्त असंतोष फैला।
  • औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था ने अपने हितों के उन्नयन के लिए जमीदारों तथा बिचैलियों वर्ग को बढ़ावा दिया। इस वर्ग ने आदिवासियों को कर के जटिल ढाॅचे में उलझाकर उन्हें उनकी ही भूमि से बेदखल कर दिया। इससे वे औपनिवेशिक शोषण के अंतहीन जाल में फॅस गये।
  • आदिवासियों का जंगलों के साथ गहरा भावनात्मक संबंध जनजातीय लोग ने केवल आवश्यक चीजों के लिए जंगलों पर निर्भर थे, बल्कि उनके धार्मिक देवता भी जंगलों में ही निवास करते थे। वे स्थानांतरित खेती भी करते थे। ब्रिटिश की स्थापना तथा उनके द्वारा लागू की गई जंगल नीति से आदिवासियों का यह संबंध समाप्त हो गया। इस कारण ये आदिवासी आक्रोश से भर गये।
  • ब्रिटिश शासन की स्थापना के उपरांत आदिवासी क्षेत्रों में इसाई मिशनरियों की गतिविधियाॅ शुरू हो गई, जिसे ब्रिटिश प्रशासन ने भी प्रोत्साहित किया।ये मिशनरियाॅ समाज सुधार, शिक्षा-प्रसार आदि के नाम पर जनजातीय इलाकों में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया करती थीं। अतः मिशनरियों की इन गतिविधियों के कारण उनके पारंपरिक धर्म और संस्कृति को क्षति पहुंची जिसके फलस्वरूप आदिवासियों ने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की।
  • ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत पुलिस एवं अन्य छोट-छोटे अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों, शोषण और जबरन वसूली के कारण आदिवासियों का जीना कष्टप्रद हो गया था। लगान वसूलनेवाले महाजन, सरकारी आधिकारी आदि ने उनका जमकर शोषण किया तथा उन्हें बेगार ;थ्वतबमक संइवनतद्ध करने के लिए मजबूर किया, जिसकी परिणति अंततः विद्रोह के रूप में प्रकट हुई।

जनजातीय आंदोलन का स्वरूप (Nature of Tribal Movements)

यद्यपि सभी जनजातीय अथवा आदिवासी आंदोलनों की पृष्ठभूमि एकसमान थी, किन्तु इन आन्दोलनों के समय तथा इनके द्वारा उठाये गये मुद्दों में पर्याप्त भिन्नता थी। कुॅवर सुरेश सिंहने इन आदोलनों को तीन चरणों में विभाजित किया है- प्रथम चरण 1795 से 1820 के बीच का था। इस समय अंग्रेजी शासन- व्यवस्था युवावस्था की ओर बढ़ रही थी। दूसरा चरण 1860ण् से 1920 तक रहा। इस चरण के दौरान आदिवासी आंदोलनों की प्रवत्ति अलगाववादी आंदोलनों की बजाय राष्ट्रवादी तथा कृषक आंदोलनों में भाग लेने की रही। इसके अलावा दोनों चरणों में नेतृत्व के स्तर पर भी भिन्नता थी। जहाॅ प्रथम चरण के नेता आदिवासी समाज के ऊपरी वर्गोें के थे, वहीं दूसरे चरण के नेता इसके निचले वर्गाें के थे। तीसरे चरण में प्रथम तथा द्वितीय चरण की बजाय अधिक परिपक्वता दिखाई पड़ती है। इस दौरान आदिवासी आंदोलनों में राष्ट्रीय आंदोलन के साथ मिलकर काम करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। साथ ही, इन आंदोलनों का नेतृत्व शिक्षित आदिवासियों तथा गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर गैर-जनजातीय लोगों यथ उल्लूरी सीता राम राजू जैसे व्यक्तियों ने किया। जनजातीय मुद्दों के आधार पर इनको चार शीर्षकों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

  1. जतीय आंदोलन (Ethnic Movements) 
  2. सुधारवादी आंदोलन (Reform Movements)
  3. कृषि और वन-आधारित आंदोलन (Agriculture and Forest-baseds Movements)
  4. राजनीतिक आंदोलन (Political Movements)

मोटे तौर पर देखने पर उक्त वर्गीकरण विशिष्ट तथा अलग-अलग मुद्दों एवं भिन्न वर्गोंे को समेटे हुए दिखाता है, किंतु सूक्ष्म विश्लेषण करनेपर हम पाते हैं कि आंदोलनों का यह चरण क्रमिक विकास को दर्शाता है। निष्कर्ष है। निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है वर्गीकरण के बावजूद ये सभी आंदोलन एक-दूसरे से संबद्ध हैं। हर हाल, ये सभी अपने उद्देश्यों की पूर्ति में स्थूलतः विफल ही रहे।

जनजातीय आंदोलनों की कमजोरियाॅ (Weaknesses of Tribal Movements)

जनजातीय आंदोलनों का असफलता के कारणों का अध्ययन करने पर हम इनमें अनेक खामियाॅ और कमजोरियाॅ पाते हैं। जो कि निम्नलिखित है।

  • दूर-दृष्टि या भविष्यगत का आभाव।
  • राजनीतिक और सामाजिक विकल्प का आभाव।
  • औपनिवेशिक व्यवस्था की वास्तविक समझ का आभाव।
  • विद्रोह का स्थानीय स्वरूप।
  • राष्ट्रीय नेतृत्व का अभाव।
  • अंग्रेजों द्वारा बर्बरतापूर्वक दमन।
  • इन विद्रोहों का तत्कालिक उद्देश्य केवल शोषणकारी औपनिवेशिक व्यवस्था के अंत तक ही सीमित था। इसके आगे की व्यवस्था की कोई योजना उनके पास नहीं थी।

उपरोक्त सभी कमियों के बावजूद भी ये जनजातीय विद्रोह किसी साम्राज्यवादी शक्ति के विरूद्ध परंपरागत विद्रोह का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते है। यद्यपि ये अंगे्रजों द्वारा कुचल दिये गये, किंतु आदिवासियों के इस संघर्ष ने राष्ट्रीय आंदोलन को न केवल व्यापक सामाजिक आधार दिया, बल्कि उसकी ऊर्जा को भी सही दिशा में निर्देशित किया।

जनजातीय आंदोलनों से जुडे़ कुछ महत्वपूर्ण तथ्य (Some Important Facts Relted to Tribal Movements)
  • पहाड़िया विद्रोह(Paharia Revolt): 1770 दशक में राजमहल के पहाड़ी क्षेत्रों (वर्तमान झारखंड) में ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था के विरोध में पहाड़िया विद्रोह हुआ। आदिवासियों के छापामार संघर्ष से परेशान अंग्रेजी सरकार ने सन् में इनसे समझौते कर इनके क्षेत्र को दामनी कोल’ क्षेत्र घोषित कर दिया।
  • खोंड विद्रोह (Khond Revolt): चक्रबिसोई के नेतृत्व में सन् 1837-1856 के बीच खोंड विद्रोह हुआ। इसका कारण सरकार की भी भू-राजस्व नीति, आदिवासी क्षेत्रों मे जमींदारों औार साहूकारों की घुसपैठ तथा सरकार द्वारा आदिवासियों पर विभिन्न तरह के प्रतिबंध लगाना था। आगे चलकर राधाकृष्ण दंड ने इसका नेतृत्व किया।
  • संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion): बिहार और उड़ीसा के वीरभूमि सिंह भूमि बाकॅूडा मुॅगेर, हजारीबाग और भागलपुर में सन् 1855-56 का संथाल विद्रोह हुआ। इसका प्रमुख कारण साहूकारों, औपनिवेशिक प्रशासकों, बाहरी लोगों (दिकू) तथा व्यापारियों द्वारा उनका शोषण एवं उत्पीड़न था। इस विद्रोह का नेतृत्व सिद्धू नामक दो संथाल भाइयों ने किया। इस विद्रोह की तीव्रता इतनी अधिक थी कि इस क्षेत्र में ब्रिटिश नियंत्रण लगभग समाप्त हो गया। सरकार को संथालों के विद्रोह पर नियंत्रण रखने के लिये मार्शल लाॅ लागू करना पड़ा तथा इनके विद्रोही नेताओं के लिए 10 बजार का इनाम घोषित किया गया। सिद्धूको अगस्त 1855 और कान्हू को फरवरी 1856 में पकड़े जाने के बाद मार डाला गया।
  • भील विद्रोह(Bhil Revolt): राजस्थान की भील जनजाति ने बधुआ मजदूरी ;ठंदकमक स्ंइवनद्ध के खिलाफ गोविन्द गुरू के नेत्रत्व में विद्रोह किया। सन् 1913 तक यह आंदोलन इना प्रचंड हो गया कि विद्रोही भलों ने भीलराज स्थापित करने का संकल्प ले लिया। ब्रिटिश सेना के काफी प्रयत्न के बाद ही इस विद्रोह को कुचला जा सका।
  • बस्तर का विद्रोह (Bastar Revolt): सन् 1910 में बस्तर के राजा के विरूद्ध जगदलपुर क्षेत्र में विद्रोह हुआ, जिसका दमन ब्रिटिश सेना ने किया। इस विद्रोह का मुख्य कारण वन अधिनियमों का क्रियान्वयन और सामन्ती करों का करारोपण था।
  • कोया विद्रोह (Koya Revolt) : आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी में कोया विद्रोह आरंभ हुआ तथा उड़ीसा के मल्लकागिरी जिले तक फैला। सन् 1879-80 में टोम्मा-सोरा ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया। पुलिस ने सोरा को गोली मार दी, जिससे यह विद्रोह खत्म हो गया। सन् 1886 में दूसरा कोया विद्रोह राजा अनंतशय्या के नेत्त्व में हुआ। इस विद्रोह में अनंतशय्या ने रामसंडु राम की सेना का गठन किया तथा जयपुर के महाराज से अंग्रेजों का शासन खत्म करनेके लिए सहायता माॅगी।
  • मुंडा विद्रोह(Munda Rebellion): छोटानागपुर क्षेत्र में बिरसा मुंडा के नेतृत्व सन् 1899-1900 में उल्गुलन (महाविद्रोह) हुआ। मुंडारी भूमि-व्यवस्था की गैर-सामंतवादी, दमींदारी या व्यक्तिगत भू-स्वामित्व वाली भूमि-व्यवस्था में परिवर्तन के विरूद्ध विद्रोह की शुरूआत हुई और बाद में इसका परिवर्तन बिरसा के धार्मिक व राजनीतिक आंदोलन के रूप में हो गया। बिरसा की लोकप्रियता का मूल कारण उसकी औषधीय चिकित्सीय शक्तियाॅ थी, जिनके द्वाराअपने समर्थकों को अमर बना देने का दावा करता था। अंगे्रजों के बर्बरतापूर्ण दमन के द्वारा ही इस विद्रोह को समाप्त किया जा सका। अंततः बिरसा मुंडा पराजित हुआ तथा कैद कर लिया गया, जहाॅ जेल में उसकी मृत्यु हो गई। इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों द्वारा छोटानागपुर काश्तकारी कानून बनाकर कृषकों के अधिकारों को मान्यता दे दी गई और बेगारीया बंधुआ मजदूरी प्रतिबंध दिया गया।
  • ताना भगत आन्दोलन (Tana Bhagat Movement): प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् छोटानागपुर (झारखण्ड) क्षेत्र में ताना भगत आंदोलन की शुरूआत हुई। आदिवासी नेत्त्व में यह आन्दोन एक प्रकार का संस्कृतिकरण आंदोलन था। इन आदिवासी आंदोलनकारियों को गांधीवादी समर्थकों ने अपने रचनात्मकों ने अपने रचनात्मक कार्यों के माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया। सरकार ने इस आंदोलन के विरूद्ध प्रायः दमनकारी तरीके अपनाए।
  • रम्पा विद्रोह(Rampa Revolt): आंध्रप्रदेश के गोदावारी जिले के उत्तर में स्थित रम्पा क्षेत्र में साहूकारों के शोषण और वन कानूनों के खिलाफ आदिवासियों ने विद्रोह किया। इस विद्रोह के नेता अल्लूरी सीताराम राजू थे,जो एक गै-आदिवासी थे और जिन्होंने ज्योतिश और चिकित्सीय उपचार संबंधी शक्तियों से युक्त होने का दावा किया इन्होनें शीघ्र ही लोकनायक की छवि धारण कर ली। राजू गांधीवादी थे, लेकिन आदिवासी कल्याण के लिए हिंसा को जरूरी समझतेे थे। वे बंदूक की गोलियों की बौछार से स्वयं के अभेद्य होने का दावा करते थे। मई 1924 में पुलिस द्वारा अल्लूरी सीताराम राजू की हत्या के साथ ही विद्रेाह को शांत किया गया।
  • खासी विद्रोह (Khasi Revolt): बर्मा युद्ध के परिणामस्वरूप कंपनी द्वारा खासी और जयंतिया पहाड़ी पर नियंत्रण के बाद ब्रम्हपुत्र और सिलहट को जोड़ने के लिए एक सड़क बनाने की योजना बनाई गई। सड़क निर्माण के लिये मजदूरों की बलपूर्वक भर्ती किये जाने के कारण खासियों ने अपने सरदार तीरत सिंह के नेतृत्व में विद्रोह शुरू कर दिया। आखिरकार, 1833 में इस विद्रोह को दबा दिया गया।
  • अहोम विद्रोह (Ahom Revolt): असम के अहोम जनजाति ने बर्मा युद्ध के बाद सन् 1828 में कंपनी द्वारा उनके क्षेत्र वापस न किये जाने के कारण गोमधर कुॅवर नेतृत्व में विद्रोह कर दिया।
  • नागा आन्दोलन (Naga Movment): रूढिवादिता, अंधविश्वास तथा अतार्किक रीति-रिवाजों को समाप्त करके प्राचीन धर्म के उन्नति के लिए नागालैंड के एक युवा नेता रोंगमेई जदोनांग ने एक शक्तिशाली नागा आंदोलन का संगठन किया, जिसका लक्ष्य नागा राज्य की स्थापना करना था। अगस्त 1931 में जदोनांग को गिरफ्तार कर उसे फाॅसी पर चढ़ा दिया गया। जदोनांग को फांसी देने के पश्चात् इस आन्दोलन का नेतृत्व सन्- 1932 तक 17 वर्षीय नागा बालिका गौडिनलियू ने,किया इस आन्दोलन को गौडिनलियू ने सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) के साथ जोड़कर इसे राष्ट्रीय स्वरूप दे दिया। गौडिनलियू को जवाहर लाल नेहरू एवं आजाद हिन्द फौजने ’रानी’ की उपाधि देकर सम्मानित किया। गौडिलियू ने जदोनांग के धार्मिक विचारों के आधार पर हेर्का पंथ की स्थापना की।

भारत के गवर्नर जनरल (Indian Governor General)

भारत के गवर्नर जनरल (Indian Governor General)

1772-85:- वरेन हेस्टिंग्ज-बंगाल का गर्वनर (1772) और गर्वनर जनरल (1773-85) के रूप में। बंगाल में द्वैध प्रशासन व्यवस्था का अंत और बंगाल,बिहार व उड़ीसा को कम्पनी के सीधे प्रशासन के अंतर्गत लाया गया, जिसके परिणामस्वरूप ईस्ट इण्डिया कम्पनी का एक राजनीतिक शक्ति के रूप मे भारत में उदय।

राजस्व संबंधी सुधार:- भू-राजस्व का पंचवर्षीय बन्दोबस्त, जिसके अंतर्गत लगान की नीलामी की जाने लगी और सबसे ऊॅची बोली बोलने को लगान वसूलने का ठेका दिया जानेलगा। इस पंचवर्षीय बन्दोबस्त को बाद में वार्षिक कर दिया गया। प्रशासनिक इकाई के रूप में जिलों का गठन 1777 में जिला कलेक्टरों और अन्य राजस्व अधिकारियों की नियुक्ति न्यायिक सुधार भारतीय न्यायिक व्यवस्था में द्वैधवाद का प्रचलन। जिला स्तर पर दीवानी और फौजदारी अदालतों एवं कलत्ता में अपीलीय सदर दीवानी और निजामत अदालतों की स्थापना।हिन्दू और मुसलमान कानूनों का संहिताकरण। नन्द कुमार पर मुकदमा और उनकी न्यायिक हत्या, (1775)। हेस्टिंग्ज द्वारा रूहेला युद्ध 1774, प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध 1776-82, द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध 1780-84।

1786-93:- गर्वनर जनरल लाॅर्ड कार्नवालिस-प्रशासनिक सुधार सुधार-भारतीय न्यायधीशों की अध्यक्षता वाली जिला फौजदारी अदालतों कोसमाप्त कर दिया गया और स्थान पर यूरोपियन न्यायधीशों की अध्यक्षता वाली दौर अदालतो की स्थापना की गई। 1793 में शक्तियों के विभाजन के सिद्धान्त पर आधारित कार्नवासि कोड का प्रचलन किया गया। इस कोड के द्वारा जिला कलेक्टरों को न्यायिक और न्यायधिकारियों के अधिकारों से वंचित कर दिया जिला दीवानी अदालतों की अध्यक्षता के लिए जिला न्यायधीशों के नये पद का सृजन किया गया। न्यायालयों की श्रेणीबद्ध रूप से स्थापना की गई, जिनमें मुशिफ सबसे छोटे न्यायाधिकारी होते थे। मामूली प्रकरणों का निर्णय जिला न्यायाधीश करता था, जबकि गंभीर प्रकरणों को अदालतों को सौंप दिया जाता था। गवर्नर जनरल को सजा माफी और सजाओं को कम करने का अधिकार प्रदान किया गया।

पुलिस सुधार:- जमींदारों को समस्त पुलिस अधिकारों से वंचित कर दिया गया। प्रत्येक 1,000 वर्ग कि0मी0 क्षेत्र पर एक पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) को नियुक्त किया गया। 1791 के अधिनियम के द्वारा पुलिस अधीक्षक के अधिकारों का निर्धारण किया गया।

भू-राजस्व या लगान व्यवस्था संबंधी सुधार:- बांगाल के प्रात को कलेक्टरों के अधीन के अधीन वित्तीय खण्डों में विभाजित किया गय। 1790 में वास्तविक कृषक भू-स्वामियों के स्थान पर कम्पनी द्वारा जमीदारों को इस पर जमींदारी क्षेत्र का भू-स्वामी स्वीकार किया गया कि वे कंपनी को भू-राजस्व की अदायगी करते रहेगें। 1790 में जमींदारों के साथ किए गए द वर्षीय बन्दोबस्त को1793 में स्थायी बना दिया गया। 1793 का बंगाल का स्थायी बन्दोबस्त या जमींदारी व्यवस्था।

सम्राज्य विस्तार:- तृतीय आंगल मसूर युद्ध (1790-92) में अंग्रेजों ने मराठों और निजाम के साथ सैनिक समझौता करके टीपू सुल्तान को हराया और उससे श्रीरगपत्तनम की संधि (1792) कार्नवालिस ने उच्च प्राशासकीय पदों पर भारतीयों की नियुक्ति को बंद कर दिया।

1793-98 गवर्नर जनरल सर जाॅन शोर-1793 में ब्रिटिश संसद द्वारा चार्टर एक्ट पारित किया गया। मराठों एवं निजाम के मध्य खर्दा के युद्ध में निजाम की पराजय 1795। अहमद शाह अब्दाली के पौत्र जमान शाह द्वारा भारत पर आक्रमण

1798-1805 गवर्नर जनरल लाॅर्ड वेलेजली:- उसकी नीतियों का लक्ष्य भारत में ब्रिटिश प्रभुसत्ता की स्थापना करना था। उसने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सहायक संधि (Subsidiary Alliance) व्यव्स्था को भारतीय राज्यों पर बलात आरोपित किया। इस भारतीय संधि व्यवस्था मंे शामिल होेने भारतीय राज्य अंग्रेजोंकी प्रभुसत्ता स्वीकार करता था और उनका अधीनस्थ मित्र राज्य हो जाता था एवं अपनी सैन्य सुरक्षा एवं वैदेशिक संबंध कम्पनी को समर्पित कर देता था। तदनुसार सहायक संधि में शामिल होने वाले राज्य में कंपनी एक सहायक सेना रखती थी एवं संबंधित राज्य मे एक ब्रिटिश रेजीडेन्ट को नियुक्त करती थी। उक्त सहायक सेना के रखरखाव था व्यय संबंधित राज्य कोे वहन करना पड़ता का व्यय संबधित राज्य को वहन करना पड़ता था। जिसके लिए संबंधित राज्य को अपने कुछ प्रदेश कम्पनी को सौंपने पड़ते थे। कुछ राज्य जो सहायक संधि व्यवस्था में शामिल हुए थे- हैदराबाद का निजाम, मैसूर का राजा तंजौर, अवध, जोधपुर,जैतपुर, मछेरी,बूंदी, भरतपुर बरार के शासक और पेशवा। चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध (1799) टीपू सुल्तान की पराजय और मृत्यु। द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध 1803-06 में सिन्धिया भोसले और होल्कर की पराजय। यह पराजय मराठा शक्ति के लिए भयंकर क्षति थी।

1805-7 गवर्नर जनरल जार्ज बार्लों – उसने अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण किया और सिन्धिया भोसले एवं होल्कर मराठा नरेशों के साथ शान्तिपूर्ण संबंधों की पुनस्र्थापना की, क्योंकि अंाग्ल-मराठा युद्ध के कारण वे अंग्रेजों से बहुत क्रुद्ध थे। वेल्लोर में अंग्रेज सैनिकों द्वारा सैनिक विद्रोह ।

1807-13 गवर्नर जनरल लार्ड-मिंटो प्रथम- कार्यकाल में एक पठान सरदार अमीर खां ने बरार पर आक्रमण कर दिया, पर 1809में उसे पराजित करके बरार से खदेड़ दिया गया। उसके कार्यकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना पंजाब के सिख राजा रणजीत सिंह के साथ अमृतसर की संधि थी, (1809 ई0) जिसके द्वारा अंाग्ल-सिख संबंधों के इतिहास में एक नवीन अध्याय का सूत्रपात हुआ।

1813-23 गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंगज:- उसने बार्लों की हस्ताक्षेप की निजी का परित्याग कर दिया और उसके स्थान पर हस्ताक्षेप एवं युद्ध की नीति का अनुसरण किया। आंग्ल-नेपाल युद्ध (1813-23) के द्वारा गोरखा शासक अमरसिंह को पराजित किया गया। इस युद्ध का अंत सगौल की संधि के द्वारा हुआ। गोरखों ने गढ़वाल और कुमायू के प्रदेश तथा आधुनिक शिमला कंपनी को समर्पित कर दिए। तृतीय-अंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18) हेस्टिग ने बड़ी सुनियोजित योजना के द्वारा नागपुर के मराठा राजा पेशवा और सिंधिया को अपमान जनक संधियां स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। पुणे के पेशवाई प्रदेशों का बम्बई प्रेसीडेंसी में विलय कर लिया गया। इस प्रकार ब्रिटिश प्रभुत्ता की स्थापना की दिशा अंतिम अवरोध भी समीप्त हो गया और मराठा शक्ति को पूरी तरह से कुचल दिया गया।

आंतरिक सुधार:- अदालतों में लम्बे समय से पडे़ अनिर्णीत मुकदमों के निपटारने के लिए मुंशिफों को नियुक्त किया गया और अनिर्णीत प्रकरणों की संख्या करने के लिए कुछ मामलों मे अपील के अधिकार को समाप्त कर दिया गया। भारत में पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के भी प्रयास किए गए।
गवर्नर जनरल लार्ड एमहस्र्ट:- उसके कार्यकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना आंग्ल-बर्मी युद्ध (1824-26) था। अन्य प्रमुख घटनाओं में बैरकपुर में सैनिकों का विद्रोह भरतपुर में विद्रोह, नागपुर के साथ संधि, मलय प्रायद्वीप में कुछ प्रदेशों पर अधिकार और स्याम के साथ संधि था।

1828-35 गर्वनर जनरल लाॅर्ड विलियम बैंटिग:- उनके संबंध परस्पर-विरोधी विचार व्यक्त किए गए हैं। उनके प्रशानिक कार्याें का भी विभिन्न प्रकार से मूल्यांकन किया गया है। मैकले ने बैटिंक की अतिशय करते हुए लिखा हैकि ’’उन्होेंने पूर्वी निरंकुशता’’ में ब्रिटिश स्वतंत्रता की भावना का संचार किया और वे (बैटिंक) यह कभी नहीं भूले कि सरकार का लक्ष्य शासित लोगों का कल्याण हैं। निस्सदेह रूप से बैटिंक ने सती प्रथा का अतं, बाल-हत्या पर प्रतिबंध आदि जैसे अनेक सामाजिक सुधार परंतु उन्होंने प्रशासन के उदारीकरण एवं भारत में राजनीतिक स्वंतत्रता के वरदहस्त को प्रदान करने की दिशा में कुछ भी नहीं किया। इस दृष्टि से मैकाले द्वारा उन पर प्रशंसा की आविृष्टि अर्थहीन लगती है। तथापि बैंटिग को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने सामाजिक समस्याओं का बहुुुुत साहस के साथ निदान किया।

सामाजिक सुधार:- राजा राम मोहन राय जैसे भारतीय सामाजिक सुधारकों ने विलियम बेंटिक से सती प्रथा को अवैध घोषित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए निवेदन किया। दिसम्बर 1829 में एक अधिनियम पारित किया गया, जिसके द्वारा सती प्रथा या हिन्दू विधवाओं को जीवित जलाने को अवैध घोषित कर दिया गया और इसे फौजदारी अदालत द्वारा दण्डनीय अपराध माना गया। ठगों (जो अनुवांशिक) लुटेरों का गिरोह थे का 1830 मे दमन किया गया। ठगों के विरूद्ध अभियान का उत्तरदायित्व कार्नल विलियम स्लीमैन को सौंपा गया।

प्रशासनिक सुधार:-बैंटिक ने कंपनी की सेवा में भारतीयों की नियुक्त से संबंधित कार्नवालिस की नीति को उलट दिया। 1833 के चार्टर अधिनियम मे यह व्यवस्था थी कि ’’कम्पनी में किसी भी भारतीय व्यक्ति को उसके धर्म जन्मस्थान, जाति और रंग के आधार पर कम्पनी के अधीन किसी पर नियुक्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।

न्याययिक सुधार:- कार्नवालिस द्वारा स्थापित अपीलीय प्रान्तीय न्यायालयों तथा दौरा न्यायालयों को समाप्त कर दिया गया। और उनके स्थान पर राजस्व और दौर अदालतों के संभागीय आयुक्त नियुक्त किए गए। ऊपरी प्रान्तों की जनता की सुविधा के लिए इलाहाबाद में सदर दीवानी और निजाम अदालतें स्थापित की गई। मुकदमें दायर करने के लिए देशी भाषाओं के प्रयोग करने का विकल्प दिया गया। शहरी और जिला-न्यायालयों में भारतीय न्यायाधीशों को मुशिफों के रूप में जाना जाता है।

शैक्षिक सुधार:-बैंटिक की सरकार का सबसे महत्वपूर्ण योगदान भारत में ब्रिटिश सरकार की शैक्षिक नीति के उद्देश्यों और लक्ष्यों को परिभाषित करना था। मैकाले सार्वजनिक शिक्षा समिति (ब्वउउपजजमक व िच्नइसपब प्देजतनबजपवदे) का अध्यक्ष नियुक्ति किया गया, जिसमें भारत में बिंटिश शिक्षा नीति के प्रचलन को भारत में ब्रिटिश शैक्षिक नीतियों का लक्ष्य घोषित किया गया। मार्च 1835 मैंकाले के सुझावों को स्वीकृति प्रदान की गई और उनका क्रियान्वयन किया गया।
वित्तीय सुधार:- कंपनी की वित्तीय व्यवस्था, जो आंग्ल-बर्मी युद्धों में भयंकर व्ययों के कारण दयनीय स्थिति में पहुॅच गई थी। में सुधार लाने के प्रयास किए गए। अनेक निरर्थक पदों को समाप्त कर दिया गया और कंपनी के कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में कटौती की गई।

देशी रियासतो के सम्बन्ध में नीति:- जहां तक सम्भव हो सका देशी रियासतों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण किया। परन्तु मैसूर 1831 कुर्ग 1834 आदि के आदिके सम्बन्ध में उसने इस नीति का अनुसरण नहीं किया और कुप्रशासन के आधार पर इन राज्यों को ब्रिटिश सम्राज्य में विलय कर लिया गया।

1835-36 गर्वनर जनरल सर चाल्र्स मैटकाफ:- उसका एक वर्ष का संक्षिप्त कार्याकाल नवीन प्रेस कानून के कारण स्मरणीय है। उसने भारतीय समाचार-पत्रों पर या प्रेस पर आरोपित नियंत्रणो को समाप्त कर दिया।

1836-42 गवर्नर जनरल लाॅर्ड आॅकलैंड:- उसका कार्यकाल भारत में ब्रिटिश शासन के सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण और अपमानजनक प्रथम अफगान युद्ध के लिए स्मरणीय है। इस युद्ध में ब्रिटिश सेना का विनाश मैटकाफ की सेवा निवृत्ति के समय हुआ।

1842-44 गर्वनर जनरल लाॅर्ड एलेनबरो:-उसने अफगान युद्ध को बन्द किया और काबुल के विरूद्ध सफल सैनिक अभियान के द्वारा ब्रिटिश सम्मान और शक्ति को पुनस्र्थापित किया। उसके कार्याकाल मे दो भयंकर अन्यायपूर्ण कार्य हुए अर्थात सिंध का ब्रिटिश साम्राज्य मे विलय और सिंधिया को एक अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया। ईस्ट इण्डिया कंपनी के कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स (निदशक मण्डल) के आदेशों की अवहेलना करने के कारण एलेनबरों को 1844 में पदमुक्त करके इंग्लैण्ड वापस बुला लिया गया।

1844-48 गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिग:- भारत में इसका कार्यकाल मुख्यतः प्रथम सिखयुद्ध (1845) के लिए स्मरणीय है। अंगे्रजी सेना ने लाहौर पर अधिकार कर लिया और सिखों पर (1848 की लाहौर की संधि) अपनी शर्तों पर आधारित एक संधि को थोपा। हर्डिग ने प्रशानिक पदों पर नियुक्ति के मामले में पश्चिमी अंगे्रजी शिक्षा प्राप्त लोगों को वरीयता प्रदान की। इस नीति के परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेजी शिक्षा को पर्याप्त प्रोत्साहन मिला पर इसके कारण शिक्षा का स्वरूप बदल गया आर्थात् सरकारी नौकरी के हेतु अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण की जाने लगी। हंर्डिग द्वारा खोंड जनजाति द्वारा नरबलि देने की कुप्रथा का दमन किया जो उनकी एक अन्य उपलब्धि थी।

भारत के गवर्नर जनरल (Indian Governor General) Up To 1848-76

1848-56- गवर्नर जनरल लाॅर्ड डलहौजी:-

भारत का महानतम गवर्नर जनरल माना जाता है। भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के विस्तार एवं उसको शक्तिशाली बनाने में उनका अपरिमित योगदान था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का जितना अधिक विस्तार डलहौजी के शासनकाल में हुआ, उसका आधा भी किसी अन्य गवर्नर जनरल के कार्याकाल में नहीं हुआ। उसके द्वारा भारत में ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल किए गए प्रदेशों का विस्तार या आकार इंग्लैण्ड और वेल्स से दोगुना था।

डलहौजी ने व्यपगत के सिद्धांत (Doctrine of Lapes)या विलय के सिद्धान्त, जिसे उसने शान्तिपूर्ण विलय की नीति नाम दिया, का मुक्त रूप से प्रयोग करके भारतीय राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय किया। भारतीय राज्यों या देशी रियाशतों को यह मानता था कि उनके राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय व्यपगत या विलय के सिद्धांत के द्वारा नहीं अपितु इण्डिया कम्पनी के नैतिक मानदण्डों (Lapes of Morals) के कारण किया गया। जिन भारतीय राज्यों का इस सिद्धात के द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया गया, उसमे से कुछ थे-सातारा 148, जैतपुर और सम्भलपुर 1849, बघ 1850, उदयपुर 1852, झांसी 1853 और नागपुर 1854।

डलहौजी ने द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध 1845-49 लड़ा और सम्पूर्ण पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया। उसने सिक्किम और बर्मा के विरूद्ध भी युद्ध लड़े। इस प्रकार संपूर्ण पंजाब निचले बर्मा (म्यांमार) एवं सिक्किम के कुछ भागों को शस्त्रों के द्वारा विलय किया गया। उसने कर्नाटक के नवाब एवं तंजौर के राजा राजपद (Royal titles) को समाप्त कर दिया और भूतपूर्व पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के उपरान्त उसके परिवार एवं उत्तराधिकारी की पेंशन को बन्द कर दिया।

प्रशासनिक सुधार:– उसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के आंतरिक प्रशासन मे भी अनेक और विविध प्रकार के सुधार किए। अंग्ल प्रान्त का लेफटीनेट गवर्नर के प्रशासनधीन गठन किया गया और कलकत्ता को इस प्रान्त का मुख्यालय बनाया गया। इसके साथ ही कलकत्ता भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी भी बना रहा, चंूकि अब तक ब्रिटिश साम्राज्य में विशाल भारतीय भू-भाग का विलय किया जा चुका था। अतः यह निर्णय लिया गया क प्रत्येक वर्ष कुछ महीनों के लिए शाही ब्रिटिश राजधानी को शिमला में स्थानान्तरित किया जाए और ब्रिटिश सैनिक मुख्यालय को भारत के अन्तर्वर्तीय प्रदेश में स्थानान्तरित किया जाए। जिन भारतीय प्रदेशों का ब्रिटिश साम्राज्य में हाल ही में विलय किया गया था, उनकी देखरेख के लिए विशेष आयुक्तों को नियुक्त किया गया, जो सीधे गवर्ननर जनरल के प्रति उत्तरदायी थे।

सैनिक सुधार:- बंगाल के तोपखाने के मुख्यालय को कलकत्ता से मेरठ स्थानान्तरित कर दिया गया और धीरे-धीरे सेना के स्थायी मुख्यालय को शिमला में स्थानान्तरित कर दिया डलहौजी ने सेना में भारतीयों की संख्या को मारने का प्रस्ताव किया ताकि अंगेजी और भारतीय सैन्य छुकड़ियों के बीच संतुलन बनाए रख जा सके।

शैक्षिक सुधार:– शिक्षा के क्षेत्र में दूरगामी परिणामों वाले अनेक सुधार लागू किए गए। प्रसिद्ध बुड्स डिस्पैच (1854) चाल्र्स बुड नियंत्रक बोर्ड आॅफ कंट्रोल का अध्यक्ष था के सुझावों के अंतर्गत प्राथमिक स्तर से विश्विद्यालय स्तर तक की शिक्षा व्यवस्था की एक सुविचारित योजना को प्रस्तावित किया गया। इस वुड्स डिस्पैच में सुझाव दिया गया कि प्रत्येक जिले में एंग्लों वर्नक्यूलॅर विद्यालय एवं महत्वपूर्ण नगरों में कालेजों की स्थापना की जाए। तीनों प्रेसीडेस्ी नगरों (कलकत्ता, बम्बई, और मद्रास) में लंदन विश्वविद्यालय के नमूने पर विश्वविद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की गई। बुड्स डिस्पैच को भारत में पश्चिमी शिक्षा का मैग्ना कार्टा कहा जाता है। इन शिक्षा संबंधी प्रस्तावों में यह भी प्रस्तावित किया गया कि भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाया गया जाए और राजकीय अनुदान सहायता प्रदान करके शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाए।

रेलवे, डाक और तार व्यवस्था का विस्तार:- भारत में ब्रिटिश की सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने, भारत में ब्रिटिश पूंजी निवेश को प्रोत्साहित करने और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के विकास के लिए भारतीय आर्थिक संसाधनों को अधिकाधिक दोहन करने के लिए भारत में रेलवे परिवहन व्यवस्था के विकास को आवश्क माना गया। परिणामस्वरूप भारत मे रेलवे लाइनों के निर्माण को विशेष महत्व प्रदान किया गया और इन रेलवे लाइनों के निर्माण का कार्य ब्रिटिश निगमों को ठेके पर दिया गया। बंबई से थाडे़ कोे जोड़ने वाली प्रथम रेलवे लाइन को 1853 में चालू किया गया और 1854 मे कलकत्ता को रानीगंज की कोयला खानों से जोड़ने वाली दूसरी रेलवे लाइन को चालू किया गया। कलकत्ता को पेशावर से जोड़ने वाली विद्युत तार संचार लाइनों को बिछाया गया। इसी प्रकार बम्बई, कलकत्ता, मद्रास और देश के अन्य सहत्वपूर्ण स्थानों को भी तार संचार प्रणाली से जोड़ा गया।

1854 में एक नयी पोस्ट आॅफिस एक्ट पारित किया गया। इस नवीन डाक व्यवस्था के अंतर्गत समस्त प्रेसिडंेसी नगरों की डाक व्यवस्था की देखरेख के लिए डायरेक्टर जनरल को नियुक्त किया गया। डाक टिकटों का समान मूल्य निधारित किया गया और 1854 में प्रथम डाक टिकट का प्रचालन किया गया। संचार क क्षेत्र में इन प्रगतिशील कार्याें के द्वारा सामजिक, आर्थिक वएवं वाणिज्यिक जीवन को एक नई दिशा प्राप्त हुई। इस प्रकार डलहौजी को भारत में रेल, तार एवं डाक व्यवस्था का संस्थापक कहा जा सकता है।

सार्वजनिक निर्माण विभग:- डलहौजी से पूर्व सार्वजनिक विभाग एक सैनिक अधीन था। उसने एक सार्वजनिक निर्माण विभाग का गठन किया और उनके सिंचाई परियोजनाओं को प्रारम्भ किया, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण गंगा नहर थी, जिसे 1854 में पूरा किया गया।

आर्थिक सुधार:- कराची, बम्बई और कलकत्ता के बन्दरगाहों को विकसित किया गया और जहाजरानी को सुगम बनाने के लिए अनेक दीपस्तम्भों का निर्माण कराया। मुक्त व्यापार नीति का और अधिक विकास किया गया। और ब्रिटिश उत्पादों को कच्चे माल की आपूर्ति के लिए भारतीय संसाधनों का खूब दोहन किया एवं साथ ही ब्रिटिश कारखाने मे उत्पादित मालका भारत में मुक्त रूप से आयात किया गय।

1857 का विद्रोह:- डलहौजी के द्वारा व्यपगत य विलय के सिद्धांत के माध्यम से ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्यवादी नीतियों के अनुसरण तथा खास तौर पर अपने विस्तारवादी हथकण्डों के प्रयोग के विरूद्ध तूफान उठ खड़ा हुआ, जिसने डलहौजी के उत्तराधिकारी कैंनिंग के कार्यकाल में प्रचण्ड बवण्डर का रूप धारण कर लिया।

1856-62 लार्ड कैंनिग:-

ईस्ट इण्डिया के अंतिम गवर्नर जनरल एवं ब्रिटिश भारत को शाही ताज के अन्तर्गत लाए जाने के बाद प्रथम वायसराय गवर्नर जनरल। कैंनिग गवर्नर जनरल के रूप में सत्ता ग्रहण करने के बाद ही भारतीय स्थिति के सम्बन्ध में आशंकित हो गए उन्होंने इस स्थिति का मूल्यांकन करते हुए कहा कि ’’भारतीय’’ आकाश पर एक बादल का उदय हो सकता है। जो बढ़ते-बढ़ते इतना बड़ा हो सकता कि हमें सर्वनाश के कगार पर ले आएगा। उनकी आशंका निर्मूल नहीं थी। इस वृश्टिस्फोट ने 1857 के विद्रोह के रूप में बवण्डर का रूप धारण कर लिया। कैंनिग के ही कार्याकाल में 1857 के विद्रोह विस्फोट हुआ और उसका दमन किया गया।
1857 के विद्रोह के दमन के उपरान्त प्रद्धि साम्राज्ञी की घोषणा की गई जिसके द्वारा भारत से ईस्ट इंडिया कम्पी के शासन को समाप्त कर दिया गया और भारत को ब्रिटिश शाही ताज से सीधे प्रशासन के अंतर्गत ले आया गया। इस साम्राज्ञी की घोशणा को 1858 के एक्ट के द्वारा वैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया। इस एक्ट में प्रस्तावित किया गया कि भारत को (ब्रिटिश) शाही ताज के नाम पर उसके एक प्रमुख सचिव मंत्री (भारत) (विषयक मंत्री या सचिव) एवं उसकी 15 सदस्यों वाली, परिषद के द्वारा शासित किया जाएगा। इसप्रकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन का अंत हो गया और भारत में ब्रिटिश गवर्नर जनरल को वायासराय प्रदान किया गया। परन्तु 1858 के एक्ट के द्वारा कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ। अपितु यह औपचारिकता मात्र थी। क्योंकि शाही ताज का पहले से ही कम्पनी के मामलों पर काफी सशक्त नियंत्रण था।

भारतीय परिषद अधिनियम, 1858-1858 के एक्ट ने भारतीय प्रशासनिक ढाचे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था। 1857-58 के विद्रोह का मुख्य कारण शासक और शासितों के मध्य संपर्क का आभाव था। इसी कमी को देर करने के लिए 1661 के अधिनियम में प्रेसिडेंसी प्रान्तों में विधायिका (काउन्सिल) की स्थापना एवं वाइसराय की का काउन्सिल या परिषद के विस्तार का प्रावधान रखा गया। भारत के संवैधानिक इतिहास में यह अधिनियम एक युगप्रवर्तक था क्योंकि इसने भारत की शासन व्यवस्था के साथ भारतीयों को सम्बद्ध करने का वाइसराय को अधिकार प्रदान किया। इसके अधिनियम के द्वारा स्थापित विधायिका परिषदों (केन्द्रीय एवं प्रनतीय दोनों) को उनके स्वरूप और कार्यप्रणाली के आधार पर वास्तविक व्यवस्थापिका नहीं कहा जा सकता है। इस अधिनियम के द्वारा स्थापित परिषदों को दरबार मात्र कहा जा सकता है, जिन्हें भारतीय शासकगण अपनी प्रजा की राय जाननेके लिए आयोजित करते थे।

कैंनिग के ही कार्यकाल में कुख्यात व्यपगत या विलय के सिद्धांत को अधिकारिक रूप से वापस ले लिया गया (1859)। भारतीय दण्ड सहिता (Indian penal Code, 1858), दण्ड व्यवहार संहिता (Code of Criminal Procedure, 1859) और भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम (Indian high Court Act, 1861), को पारित किया गया। आयकर को प्रयोगात्मक आधार पर क्रियान्वित किया गया। कैनिंग के कार्यालय में बंगाल मे नील खेतिहरों के उपद्रव एवं श्वेत विद्रोह हुए तथा उत्तर- पश्चिमी में भयंकर अकाल पड़ा।

1862-63 वायसराय एवं जनरल लाॅर्ड एल्गिन-

उसका शासनकाल बहाबी आन्दोलन के लिए स्मरणीय है। वहाबी मुसलमानों का एक धर्मान्धतापूर्ण सम्प्रदाय था, सम्प्रदाय था, जिसने उत्तर-पिश्चमी सीमान्त प्रदेश में उग्र उपद्रव किए। ब्रिटिश शासन ने नलम्बी और कठिन सैनिक कार्यवाही के द्वारा वहाबियों को पराजित किया और उनके गढ़ों को नष्ट कर दिया। सर्वाेच्च एवं सदर न्यायलयों को उच्च न्यायालय के साथ शामिल कर दिया गया।

1864-69 वायसराय एवं गवर्नर जनरल सर जान लारेंस:- इस काल में भारत का बहुत बड़ा भाग विशेषतः 1866 में उड़ीसा और राजपूताना एवं 1868-69में बुन्देलखंड भयंकर आकल की चपेट में रहे। प्रायिक अकालों से निपटने के लिए आवश्यक उपाय प्रस्तावित करने के लिए एक अकाल कमीशन नियुक्त किया गया। इस काल में अनेक रेलवे लाइनों, नहरों एवं सार्वजनिक निर्माण कार्यों को प्रारभ किया गया। यूरोप के साथ तार संचार को चालू किया गया। पंजाब भूधृति (Tenancy) अधिनियम पारित किया गया, जिसके द्वारा पंजाब और अवध में बहुत बड़ी संख्या में बटाईदारों को मालिकाना अधिकार प्रदान किए गए।

1869-72 वायसराय एवं गवर्नर जनरल लाॅर्ड मेयो:-

उसने भारत में वित्त व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण किया और प्रान्तोय बन्दोबस्त किया वह भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे, जिनकी उनके कार्यकाल में हत्या कर दी गई। अण्डमान मेंएक कैदी ने उनकी हत्या कर डाली। उनके प्रयासों से भारतीय साशक वर्ग या राजा महाराजाओं के राजकुमारों के अध्ययन एवं प्रशिक्षण के लिए प्रसिद्ध मेओं कालेज की अजमेर में व्यवस्था की गई।

1872-76 वाईसराय एवं गवर्नर जनरल लाॅर्ड नाथबुक उसके कार्यकाल में भारत में प्र्रिंस आॅफ वेल्स (जो बाद में एडवर्ड सप्तम के नाम से प्रसिद्ध हुए) का भारत में आगमन हुआ और ब्रिटिश रेजीडेण्ट को जहर देने के आरोप में बड़ौदा (वडोदरा) के गायकवाड़ शासक पर मुकदमा चलाया गया परन्तु लार्ड नार्थबुक ने अफगानिस्तान के साथ राजनीतिक संबंधों के निर्धारण से संबंधित सर्वाधिक महत्वपूर्ण समस्या का इस कारण सामना किया क्योंकि रूस केन्द्रीय एशिया की ओर तेजी से बढ़ रहा था। इसी अवधि में पंजाब मे सिखों के कूका आन्दोलन ने विद्रोहात्मक रूप ग्रहण कर दिया। बिहार भयंकर अकाल की चपेट में आ गया।

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