भारत पर अरबों का आक्रमण: ऐतिहासिक महत्व,तुर्को का आगमन

भारत पर अरबों का आक्रमण: ऐतिहासिक महत्व

भारत पर अरबों का आक्रमण और अरब के बीच 7वीं सदी में ही संपर्क आरंभ हो गये थे। लेकिन राजनीतिक संबंध 712 ई0 में सिंध पर आक्रमण के दौरान स्थापित हुआ। भारत में अरबों के आगमन का राजनीतिक दृष्टि से उतना महत्व नहीं है, जितना अन्य पक्षों का है। अरब आक्रमणकारी भारत में उस प्रकार का साम्राज्य नहीं बना पाये जैसा कि उन्होंने एशिया, अफ्रीका और यूरोप के विभिन्न भागों में बनाया था। यहाँ तक कि सिंध में भी उनकी शक्ति अधिक दिनों तक नहीं बनी रही। किंतु दीर्घकालिक परिणामों की दृष्टि से प्रतीत होता है कि अरबों ने भारतीय जनजीवन को अत्यधिक प्रभावित किया और स्वयं भी प्रभावित हुए।

यद्यपि इससे पूर्व में भी भारत पर शक, यवन, कुषाण, हूण आदि का आक्रमण हुआ था किंतु भारतीय संस्कृति ने इन्हें आत्मसात कर लिया। उन्होंने भारतीय धर्म तथा सामाजिक आचार विचारों को ग्रहण किया और अपनी विशिष्टता खो बैठे। उनका एक-दसूरे के ऊपर प्रभाव भी पड़ा तथापि हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही भारतीय समाज में अपनी विशिष्ट संस्कृतियों के साथ विद्यमान रहे।
अरबों ने चिकित्सा, दर्शनशास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, गणित और शासन प्रबंध की शिक्षा भारतीयों से ली। ब्रह्मगुप्त की पुस्तकों का अलफ़जारी ने अरबी में अनुवाद किया। अलबरूनी कहता है कि पंचतंत्र का अनुवाद भी अरबी में हो चुका था। सूफी धार्मिक संप्रदाय का उद्भव स्थल सिंध ही था जहाँ अरब लोग रहते थे। सूफी मत पर बौद्ध धर्म का प्रभाव देखा जा सकता है। दशमलव प्रणाली अरबों ने 9वीं सदी में भारत से ही ग्रहण की थी।
यदि तात्कालिक राजनीतिक दृष्टि से देखा जाये तो कहा जा सकता है कि अरबों ने एक ऐसी चुनौती पेश की जिसका सामना करने के लिए ऐसी शक्तियाँ उदित हुई, जो भारत में आगामी तीन सौ वर्षों तक बनी रहीं। गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट, चालुक्यों की प्रतिष्ठा की स्थापना उनके द्वारा अरबों का विरोध करने के कारण हुई। अरबों का दीर्घकालिक महत्व यह था कि उन्होंने भारत में धर्म की स्थापना न करके धार्मिक सहिष्णुता का प्रदर्शन किया। हालांकि ज़जिया कर लिया जाता था।
अरबों का भारत आगमन का आर्थिक महत्व व्यापार के क्षेत्र में देखा जा सकता है। अरब व्यापारियों के समुद्री एकाधिकार के साथ भारतीय व्यापारियों ने तालमेल बनाया और पश्चिमी जगत एवं अफ्रीकी प्रदेशों में अपनी व्यापारिक गतिविधियों को गतिशील बनाये रखा।

तुर्को का आगमन

तुर्कों के आक्रमण के पूर्व अरबों ने भारत पर आक्रमण किए किंतु भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना का श्रेय तुर्कों को जाता है। मुस्लिम आक्रमण के समय भारत में एक बार पुनः विकेन्द्रीकरण तथा विभाजन की परिस्थितियाँ सक्रिय हो उठीं। तुर्की आक्रमण भारत में कई चरणों में हुआ। प्रथम चरण का आक्रमण 1000 से 1027 ई0 के बीच गजनी के शासक महमूद द्वारा किया गया। इसके पूर्व सुंबुक्तगीन (महमूद के पिता) की लड़ाई हिन्दूशाही शासकों के साथ हुई थी, किन्तु उसका क्षेत्र सीमित था भारत के गुजरात क्षेत्र तक महमूद ने अपना शासन स्थापित किया लेकिन उत्तरी भारत के शेष क्षेत्र अभी तुर्क प्रभाव से बाहर थे। कालांतर में गौर के शासक शिहाबुद्दीन मोहम्मद ने पुनः भारत में सैनिक अभियान किए। 1175 से 1206 ई0 के बीच उसने और उसके दो प्रमुख सेनापतियों (ऐबक और बख्तियार खिलजी) ने गुजरात, पंजाब से लेकर बंगाल तक के क्षेत्र को जीतकर सत्ता स्थापित की। किंतु 1206 ई0 में गोरी की मुत्यु के पश्चात् तुर्क साम्राज्य कई हिस्सों में बंट गया और आगे चलकर भारत में दिल्ली सल्तनत नाम से तुर्क साम्राज्य स्थापित हुआ।

तुर्क आक्रमणों के पूर्व भारत के राज्यों की स्थिति

 मुल्तान तथा सिंध दोनों क्षेत्र 8वीं सदी के आरंभ में ही अरबों द्वारा विजित कर लिये गये थे। सिंध में अरबों की सत्ता के अवशेष अब भी बने हुए थे।
हिन्दूशाही राजवंश उत्तर-पश्चिम भारत का विशाल हिन्दू राज्य था, जिसकी सीमा कश्मीर से मुल्तान तक तथा चिनाब नदी से लेकर हिन्दुकुश तक फैली थी। महमूद ने इसकी राजधानी वैहिंद पर आक्रमण कर दिया तथा यहां का शासक जयपाल था, जिसने पराजित होने पर आत्महत्या कर ली।
उत्तरी भारत में स्थित कश्मीर का क्षेत्र महमूद गजनवी के आक्रमण के समय से राजनैतिक अव्यवस्था से ग्रसित था। यहां की वास्तविक शासिका क्षेत्रगुप्त की पत्नी दीद्दा थीं।
उपर्युक्त राज्यों के अतिरिक्त मुस्लिम आक्रमण के समय उत्तरी भारत में अनेकों छोटे-छोटे राज्यों का अस्तित्व था।

  • तुर्क आक्रमण के समय भारत छोटे-छोटे सैकड़ों राज्यों में विभक्त था। जैसे-सिंध, मुल्तान, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बंगाल आदि।
  • भारत का इस समय बाह्य देशों के साथ कोई विशेष संबंध नहीं था।
  • राज्यों का आर्थिक आधार कमजोर था जिसके फलस्वरूप सैन्य आधार भी कमजोर हो गया।

राजनीतिक विभाजन की यह समस्या केवल राजपूत राज्यों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि इसका परिणाम देश के सामान्य जनजीवन पर भी पड़ा था। उत्तर भारत में राजनैतिक एकता का पूर्णतः अभाव था। इस समय छोटे-छोटे राज्य सारे देश में बने हुए थे, परंतु कोई भी एक राज्य या शासक इतना शक्तिशाली नहीं था, जो इन्हें जीतकर एकछत्र राज्य स्थापित कर सकें। आंतरिक कलह ने इन्हें कमजोर बना दिया था और विदेशी आक्रमण का प्रभावशाली ढंग से विरोध करना इनके लिए संभव नहीं था इस स्थिति के लिए राजपूत शासक जिम्मेदार थे, क्योंकि ये हमेशा आपस में संघर्षरत् रहते थे। आंतरिक अशांति की इस परिस्थिति ने अंततः राजपूत शासकों का अस्तित्व समाप्त कर दिया।

भारत के गर्वनर जनरल और वायसराय

भारत के गर्वनर जनरल और वायसराय

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:-

  • बंगाल का प्रथम गर्वनर-क्लाइव।
  • आत्महत्या करने वाला प्रथम गर्वनर-क्लाइव।
  • महाभियोग का सामना करने वाला गर्वनर जनरल-वारेन हेस्टिंग्स।
  • बंगाल का प्रथम गर्वनर जनरल-वारेन हेस्टिंग्स।
  • वह गर्वनर जनरल जिसकी मजार गाजीपुर में है- कार्नवालिस।
  • 1833 के अधिनियम के द्वारा भारत का प्रथम गर्वनर जनरल -लाॅर्ड विलियम बैंटिंग
  • ब्रिटिश भारत का अन्तिम गर्वनर जनरल-माउण्ट बेटेन।
  • भारत का अन्तिम गर्वनर जनरल-श्री राजगोपालाचारी।
  • भारत का प्रथम वायसराय-लार्ड कैनिंग।
  • भारत का सबसे लोकप्रिय गर्वनर जनरल-रिपन।

बंगाल के गर्वनर

प्लासी के युद्ध में विजय के बाद क्लाइव को बंगाल का गर्वनर बनाया गया।
1. क्लाइव (1757-60):- क्लाइव की ईस्ट इंडिया कम्पनी में नियुक्ति एक क्लर्क के रूप में दक्षिण भारत में हुई थी जहाँ उसने आंग्ल फ्रांसीसी युद्ध के समय अपनी सौर्य एवं बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया, फलस्वरूप उसे बंगाल में सेना नायक की हैसियत से भेजा गया। प्लासी के युद्ध में बहादुरी दिखाने के बाद उसे बंगाल का प्रथम गर्वनर बनाया गया।
2. हालवेल (1760) स्थानापन्न:- क्लाइव के वापस जाने के बाद इसे बंगाल का स्थानापन्न गर्वनर बना दिया गया। इसी ने ब्लैकहोल की घटना का वर्णन किया है।
3. बेन्सिटार्ट (1760-65 ई0):- इसके समय में बक्सर का प्रसिद्ध युद्ध हुआ।
4. क्लाइव (1765-67):- बक्सर युद्ध में अंग्रेजी विजय के बाद क्लाइव को पुनः बंगाल का गर्वनर बनाकर भेजा गया। इसने निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य किये।

  • दीवानी की प्राप्ति:- शाह आलम-द्वितीय ने 1765 ई0 के इलाहाबाद के प्रथम सन्धि के द्वारा बंगाल बिहार और उड़ीसा की दीवानी अंग्रेजों को प्रदान की।
  • द्वैध शासन:- 1765 ई0 में बंगाल में क्लाइव ने द्वैध शासन लागू किया।
  • व्यापार समिति का गठन:- सोसायटी फार टेªड का गठन क्लाइव ने 1765 में कम्पनी के कर्मचारियों की एक व्यापार समिति बनायी इन्हें नमक सुपारी, तथा तम्बाकू के व्यापार का अधिकार दिया। 1768 में यह योजना समाप्त हो गयी।
  • श्वेत विद्रोह:– क्लाइव ने बंगाल के सैनिकों को मिलने वाला दोहरा भत्ता बन्द कर दिया। मुगेर तथा इलाहाबाद के श्वेत अधिकारियों ने क्लाइव के आज्ञा का विद्रोह किया। इसे श्वेत विदोह के नाम से जाना जाता है परन्तु इस विदोह को दबा दिया गया।

इतिहासकार पर्सिवल स्पियर ने उसे भविष्य का अग्रदूत कहा। क्लाइव ने इंग्लैण्ड में जाकर आत्महत्या कर ली।
5. वेरलेस्ट (1767-69):- द्वैध शासन के समय बंगाल का गर्वनर।
6. कर्टियर (1769-72):- द्वैध शासन इसके समय में भी जारी रहा। इसके समय में आधुनिक भारत का पहला अकाल 1770 ई0 में पड़ा।
7. वारेेेेन हेस्टिंग्स (1772-74):- यह बंगाल का अन्तिम गर्वनर था। इसने क्लाइव द्वारा स्थापित द्वैध शासन को समाप्त कर दिया।
बंगाल के गर्वनर जनरल

(1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के द्वारा)

रेगुलेटिंग एक्ट के तहत पहली बार गर्वनर जनरल की नियुक्ति की गई। इस प्रकार भारत में प्रथम गर्वनर जनरल की नियुक्ति की गयी। इस प्रकार प्रथम भारत के गर्वनर जनरल वारेन हेस्टिंग्स को बनाया गया।

1. वारेन हेस्टिंग्स (1774-85)

 इसके काल की प्रमुख घटना निम्नलिखित है।

  • राजस्व बोर्ड का गठन:- 1772 में हेस्टिंग्स ने इसका गठन किया तथा राजस्व कोस को मुर्सिदाबाद से कलकत्ता ले आया।
  • भू-राजस्व बन्दोबस्त:– 1772 में पाँच वर्षीय और 1777 में एक वर्षीय भू-राजस्व बन्दोबस्त किया।
  • न्याय व्यवस्था की शुरुआत:– 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत 1774 में कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गयी। इसका मुख्य न्यायाधीश इम्पे था। इसके अन्य न्यायाधीश चैम्बर्स, लिमैस्टर एवं हाइड थे। इस प्रकार भारत में न्यायिक सेवा का यह जन्म दाता माना जाता है।
  • बनारस की सन्धि (1773):- इसी सन्धि से प्रेरित होकर अवध के नवाब सुजाऊद्दौला ने 1774 ई0 में रुहेल खण्ड पर अधिकार कर लिया।
  • फैजाबाद की सन्धि (1775):- इस संधि के द्वारा अवध के बेगमों की सम्पत्ति की सुरक्षा की गारण्टी दी गयी थी। तथा बनारस पर अंग्रेजी सर्वोच्चता स्वीकार कर ली गयी।
  • ऐसियाटिक सोसाइटी आॅफ बंगाल की स्थापना (1784) में विलियम जोन्स द्वारा:- इस सोसाइटी का मूल उद्देश्य प्राचीन भारतीय पुस्तकों का आंग्लभाषा में अनुवाद करना था। इस सोसाइटी द्वारा अनुमोदित पहली पुस्तक विलिकिंग्सन द्वारा भगवतगीता तथा दूसरी हितोपदेश एवं तीसरी जैन शाकुन्तलम थी। जिसका आंग्ल भाषा में अनुवाद विलियम जोन्स ने स्वयं किया था।
  • नन्द कुमार अभियोग (1775):- राजानन्द कुमार मुर्शिदाबाद का भूतपूर्व दीवान था। इसने हेस्टिंग्स पर आरोप लगाया कि मीर जाफर की विधवा मुन्नी बेगम ने अल्पवयस्क नवाब मुबारकउद्दौला का संरक्षक बनने के लिए वारेन हेस्टिंग्स को साढ़े तीन लाख रुपया घूस दिया। हेस्टिंग्स ने मुख्य न्यायाधीश इम्पे की मदत से नन्द कुमार को फाँसी पर लटका दिया। इस मुकदमें को न्यायिक हत्या की संज्ञा दी जाती है।
  • महाभियोग:– हेस्टिंग्स एक मात्र गर्वनर जनरल था जिस पर महाभियोग लगाया गया था। यह महाभियोग वर्क ने लगाया था परन्तु हेस्टिंग्स को बरी कर दिया गया।
  • सर जान मैक फरसन (1786) स्थानापन्न

2. कार्नवालिस (1786-93)

यही एक मात्र गर्वनर जनरल है जिसकी स्वतः मृत्यु भारत में हुई तथा गाजीपुर में समाधि बनायी गयी। इसके काल की अन्य महत्वपूर्ण घटनाएँ निम्नलिखित हैं-

  • पुलिस सेवा का जन्मदाता:- भारत में पुलिस सेवा का जन्मदाता कार्नवालिस को माना जाता है।
  • सिविल सेवा:- भारत में सिविल सेवा का जन्मदाता कार्नवालिस था। पहली बार 1833 के अधिनियम में यह कहा गया कि क्रास्ट क्रीड और कलर के आधार पर कोई भेद-भाव नही किया जायेगा। धारा 87, परन्तु 1853 ई0 से इस सेवा में परीक्षा होने लगी। 1863 में प्रथम भारतीय I.E.S. सत्येन्द्र नाथ टैगोर थे। प्रारम्भ में इस परीक्षा की आयु 23 वर्ष थी जिसे लिटन ने घटा कर 19 वर्ष कर दिया।

सुरेन्द्र नाथ बनर्जी असम के कलक्टर पद पर रहते हुए निलम्बित कर दिये गये थे। जबकि अरबिन्द घोष घुड़सवारी परीक्षक पास नही कर पाये थे। सुभाष चन्द्र बोस ने I.E.S. परीक्षा पास करने के बावजूद अपने राजनैतिक गुरु म्ण्त्ण् क्ंे के कहने पर इस्तीफा दे दिया था। प्रारम्भ में यह परीक्षा इंग्लैण्ड में होती थी लेकिन 1923 से भारत में भी होने लगी। सिविल सेवा को इस्पात का चैखट कहा जाता है।

  • स्थायी बन्दोबस्त:- 1793 में पहले बंगाल में फिर बिहार उड़ीसा में लागू हुआ। R.E. Dutt ने स्थाई बन्दोबस्त का समर्थन किया था। क्योंकि वे स्वयं जमींदार परिवार से सम्बन्धित थे।
  • कार्नवालिस संधिता (1793):– इस कोड के द्वारा कर तथा न्याय प्रशासन को पृथक कर दिया गया। इस प्रकार यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित था।
  • दास व्यापार पर रोक (1789):– कार्नवालिस ने 1789 में दासों के व्यापार पर रोक लगा दिया।

3. सर जाॅन शोर (1793-98)

जान शोर ने सुझाव दिया था कि जमींदारों के साथ भू-राजस्व बन्दोबस्त किया जाय। इसने मैसूर के प्रति अ-हस्तक्षेप की नीति अपनायी।

4. लार्ड वेलेजली (1798-1805)

1. फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना:- इस कालेज की स्थापना I.E.S. में भर्ती किये गये युवकों के प्रशिक्षण के लिए किया गया था। परन्तु बाद में इसे बन्द कर इसकी जगह इंग्लैण्ड के हेलेवरी में प्रशिक्षण दिया जाने लगा।
2. सहायक संन्धि (1798):- भारत में अंग्रेजी श्रेष्ठता को स्थापित करने के उद्देश्य से वेलेजली ने सहायक सन्धि प्रणाली को प्रचलित किया। इस संन्धि को स्वीकार करने वाले राज्यों के वैदेशिक सम्बन्ध अंग्रेजी राज्य के अधीन हो जाते थे। परन्तु उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाता था। इस सन्धि का मूल उद्देश्य बिना खर्च के सेना को संगठित करना तथा फ्रांसीसी भय को समाप्त करना था। निम्नलिखित राज्यों ने सन्धि पर हस्ताक्षर किये-

  1. हैदराबाद    -1798
  2.  मैसूर          -1799
  3. तन्जौर        -1799
  4. अवध          -1801
  5. पेशवा         -1802
  6. भोंसले        -1803
  7. सिन्धिया      -1804
  8. जोधपुर
  9. जयपुर
  10. भछेड़ी
  11. बूँदी
  12. भरत पुर

5. सर जार्ज वारलो (1805-07)

इसने होल्कर के साथ 1806 में राजपुर घाट की सन्धि की परन्तु मराठों के प्रति शान्तिपूर्ण नीति अपनायी, इस तरह इसे मराठों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति को अपनाने का श्रेय दिया जाता है।

6. मिण्टों प्रथम (1807-13)

इसी के समय में रणजीत सिंह के साथ 1809 में अमृतसर की प्रसिद्ध सन्धि की गयी, इस सन्धि पर अंग्रेजों की तरफ से हस्ताक्षर मेटकाॅफ ने किया, जबकि सिक्खों की तरफ से रणजीत सिंह ने।

7. लार्ड हेस्टिंग्स (1813-23)

इसका काल ब्रिटिश सर्वोच्चता का काल माना जाता है, इसी समय ब्रिटिश प्रभुसत्ता भारत पर पूर्ण रूप से स्थापित हो गयी, इसके काल की प्रमुख घटना निम्नलिखित है-

1. आंग्ल-नेपाल युद्ध (1814-16):- इस युद्ध की शुरुआत तब हुई जब नेपाल ने भारत के कुछ क्षेत्रों पर अपना दावा पेश किया तथा आक्रमण कर दिया, अन्ततः हेस्टिंग्स ने उनहें पराजित किया। दोनों पक्षों ने संगोली की सन्धि (1816) के द्वारा शान्ति की स्थापना हुई। इसी सन्धि से नेपालियों ने काठमाण्डु में एक ब्रिटिश रेजीडेन्ट रखना स्वीकार कर लिया।
2. मराठों पर अन्तिम विजय:- तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध में मराठों की पराजय के बाद मराठा संघ को विच्छेद कर दिया गया, उसकी जगह पर सतारा नामक एक छोटे राज्य का गठन किया गया, और उस पर प्रताप सिंह को गद्दी पर बैठा दिया गया।
3. पिण्डारियों का दमन (1817-18):- पिण्डारी मराठी भाषा का शब्द है। यह लुटेरों का एक दल था, जिसमें हिन्दु तथा मुसलमान दोनों सम्मिलित थे, इन्हें मराठों का समर्थन प्राप्त था, मराठा सरदार मल्लहार राव होल्कर ने इन्हें सुनहला झण्डा प्रदान किया था। हेस्टिंग्स ने इनके दमन के लिए थाॅमस हिस्लोप की नियुक्ति की, हिस्लोप का सहायक मैल्कम था, जिसने पिण्डारियों को ’’मराठा शिकारियों का शिकारी कुत्ता कहा’’ सेना की कमान स्वयं लार्ड हेस्टिंग्स ने अपने हाथों में ले ली, इस समय चार प्रमुख पिण्डारी सरदार थे।

  1. चीतू:- इन्हें जंगल में चीता खा गया।
  2. वासिक मुहम्मद:– इन्होंने सिन्धियां के यहाँ शरण ली, सिन्धियाँ ने इन्हें अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिया, इन्हें गाजीपुर के कारागर में बन्द कर दिया गया, जहाँ इन्होंने आत्महत्या कर ली।
  3. करीम खाँ:- इन्होंने समर्पण कर दिया, इन्हें गोरखपुर में गौंस की जागीर दी गयी।
  4. अमीर खाँ:– इन्होंने भी समर्पण कर दिया, इन्हें भरतपुर में टाक की जागीर दी गयी।

8. लार्ड एडम्स (1823)

यह स्थानापन्न गर्वनर जनरल था, इसके समय में प्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

9. लार्ड एमहस्र्ट (1823-28)

यह पहला गर्वनर जनरल था, जो मुगल शासक अकबर-द्वितीय से बराबरी के स्तर पर मिला, इसके काल की अन्य प्रमुख घटना निम्नलिखित है-

  1. आंग्ल-बर्मा प्रथम युद्ध (1824-26):- यह बर्मा के साथ पहला युद्ध था, अन्ततः दोनों पक्षों में यान्डबू की सन्धि से शान्ति स्थापित हुई।
  2. 1824 में बैरकपुर की छावनी में सैनिक विद्रोह हुआ, क्योंकि सैनिकों ने वर्मा जाने से इन्कार कर दिया, क्योंकि समुद्र पार यात्रा करने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाता है।

लार्ड विलियम बैटिंग (1828-33 या 35)

1833 का अधिनियम पहली बार भारत का गर्वनर जनरल शब्द प्रयुक्त।

कार्य 1.:- बैटिंग जब 1806 में मद्रास का गर्वनर था, तब उसने सैनिकों को जातीय चिन्ह लगाने और कानों में बालियां आदि पहनने पर प्रतिबन्ध लगा दिया, जिससे वेल्लौर में प्रथम धार्मिक विद्रोह हुआ था। बैटिंग का काल विभिन्न सामाजिक सुधारों के कारण याद किया जाता है-

  • सती प्रथा का अन्त (1829):- 1829 के 17वें अधिनियम के द्वारा सती प्रथा पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। प्रारम्भ में यह बंगाल प्रेसीडेन्सी पर लागू किया गया बाद में इसका दायरा बढ़ाकर बम्बई एवं मद्रास प्रेसीडेन्सी को भी शामिल किया गया।
  • ठगी प्रथा का अन्त:- ठगी प्रथा का का अन्त करने के लिए बेटिंग ने कर्नल स्लीमन की नियुक्ति की।
  • सरकारी सेवाओं में भेद-भाव का अन्त:- 1833 के अधिनियम के द्वारा, जाति, वर्ण, और नस्ल के आधार पर, भेद-भाव को प्रतिबन्धित कर दिया गया।
  • अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाना:- 1835 के 7वें अधिनियम द्वारा अंग्रेजी को भारत में शिक्षा का माध्यम बना लिया गया।
  • 1835 में कलकत्ता में मेडिकल कालेज की स्थापना।
  • 1831 में मैसूर तथा 1834 में कुर्ग को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया।
  • सर्वप्रथम इसी ने आयुक्तों की नियुक्ति की।

चाल्र्स मेटकाॅफ (1835-36)

इसने समाचार पत्रों पर से सारे प्रतिबन्ध हटा लिए। इसी कारण इसे समाचार पत्रों का मुक्तिदाता कहा जाता है।

लाॅर्ड आॅकलैण्ड (1836-42)

1. आंग्ल-अफगान युद्ध (1838-42):- इस युद्ध में अंग्रेजों की पराजय हुई, इतिहासकार इन्नस ने इस युद्ध को भारतीय इतिहास के सर्वाधिक मूर्खतापूर्ण युद्धों में गणना की है।
2. G.T. Road नाम इसी के समय में पड़ा।
3. रणजीत सिंह की सेना को इसने Asia की सबसे अच्छी घुड़सवार सेना कहा।

लार्ड एलनबरो (1842-44)

1. दास प्रथा पर प्रतिबन्ध:- एलनबरों ने 1843 के अधिनियम द्वारा दास प्रथा पर रोक लगा दी। इस तरह दासता समाप्त हो गयी।
2. सिन्ध का विलय (1843):- सिन्ध का विलय अफगान नीति का सीधा परिणाम था, सिन्ध के विलय को बहुत से इतिहासकारों ने अनुचित बताया और निन्दा की क्योंकि सिन्ध राज्य के साथ अंग्रेजों की सन्धि थी स्वयं सिन्ध के अंग्रेज रेजीडेन्ट चाल्र्स नेपियर ने अपने डायरी में लिखा है कि ’’हमें सिन्ध को हड़पने का कोई अधिकार नही है परन्तु हम यह कार्य करेंगे, यह एक लाभदायक, उपयोगी और मानवता पूर्ण नीचंता होगी।’’

लार्ड हार्डिंग (1844-48)

1. इसने नर बलि प्रथा को 1846 में समाप्त किया, इसके लिए एक अधिकारी कैम्पबेल की नियुक्ति की, यह नर बलि की प्रथा गोंड जनजाति में प्रचलित थी।
2. प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध:- 1845-46 इन्हीं के समय में प्रथम आंग्ल सिक्ख युद्ध हुआ जिसका समापन लाहौर की सन्धि से हुआ।

लार्ड डलहौजी (1848-56)

यह बहुत कम अवस्था में करीब 26 वर्ष की आयु में गर्वनर बना, इसके समय में प्रमुख कार्य निम्नलिखित हुए-
1. पंजाब का विलय:- 1849 में अंग्रेजी राज्य में मिला लिया।
2. द्वितीय आंग्ल वर्मा युद्ध:- डलहौजी ने 1852 में द्वितीय आंग्ल-वर्मा युद्ध में लोअर वर्मा (पींगू) को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया।
3. सिक्किम का विलय:- 1850 में सिक्किम राज्य को मिला लिया गया।
4. सैन्य सुधार:- डलहौजी ने कलकत्ता में स्थित तोपखाने का कार्यालय मेरठ में तथा सेना का प्रमुख कार्यालय शिमला में स्थापित किया।
5. इसी के समय में शिमला को ग्रीष्म कालीन राजधानी बनाया गया।
6. रेलवे लाइन:- पहली बार 1853 में प्रथम रेलवे लाइन बम्बई से थाणें के बीच चलायी गयी, जबकि दूसरी रेलवे लाइन 1854 में कलकत्ता से रानीगंज के बीच चलायी गयी।
7. विद्युत तार:– 1852 डलहौजी के समय में प्रथम विद्युत तार सेवा कलकत्ता से आगरा के बीच प्रारम्भ हुई, 1857 के विद्रोह के समय में एक विद्रोही ने मरते हुए यह कहा था कि इस तार ने हमारा गला घोंट दिया।
डाक टिकट:- 1854 में पहली बार डाक टिकटों का प्रचलन प्रारम्भ हुआ, अब 2 पैसे के टिकट से कहीं भी पत्र भेजा जा सकता था।
सार्वजनिक निर्माण विभाग:- इसी के समय में यह विभाग बनाया गया। वाणिज्य सुधार के अन्तर्गत इसने भारत के बनदरगाहों को अन्र्तराष्ट्रीय व्यापार के लिए खोल दिया।
शैक्षिक सुधार:- 1853 में टाॅमसन ने उत्तर पश्चिमी प्रान्त में हिन्दी माध्यम से अनेक स्कूल खोले। रुड़की विश्वविद्यालय भी आॅमसन ने ही खोला। यह भारत का प्रथम इंजीनियरिंग काॅलेज था। 1854 में चाल्र्स वुड का डिस्पैच पारित हुआ जो विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा से सम्बन्धित था। इसी के संस्तुति के आधार पर 1857 में लन्दन विश्वविद्यालय की नकल पर तीन विश्वविद्यालय कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में स्थापित किये गये।
1854 ई0 में लोक शिक्षा विभाग की स्थापना डलहौजी के समय में हुई।
राज्य हड़पने की नीति या व्यपगत सिद्धान्त या डाॅक्ट्रिन आॅफ लैप्स:- डलहौजी भारत में जिस कार्य के लिए सर्वाधिक चर्चित रहा, वह उसका राज्य हड़पने की नीति थी। डलहौजी में तत्कालीन भारतीय रजवाड़ों को तीन भागों में विभाजित किया।
1.    वे रजवाड़े जो किसी के नियंत्रण में नहीं थे न ही किसी को कर देते थे। वे बिना हस्तक्षेप के गोद ले सकते थे।
2.    वे रजवाड़े जो पहले मुगल सम्राट व पेशवा के अधीन थे परन्तु इस समय अंग्रेजों के अधीन थे उन्हें गोद लेने से पहले अंग्रेजों की अनुमति लेनी पड़ती थी।
3.    वे रियासतें जिनका निर्माण स्वयं अंग्रेजों ने किया था। उन्हें गोद लेने का अधिकार नहीं था। ऐसी ही रियासतों पर यह सिद्धान्त लागू था। इसी को आधार बनाकर अंग्रेजों ने निम्नलिखित राज्यों को अंग्रेजी राज्य में मिला दिया।

  • सतारा, 1848:– इस समय यहाँ का राजा अप्पा साहिब था।
  • जैतपुर, 1849:- म0प्र0 में स्थित।
  • सम्भलपुर, 1849:- उड़ीसा में स्थित, यहाँ का शासक नारायण सिंह था।
  • बघाट, 1850:– (पंजाब में) इसे कैनिंग ने बाद में वापस कर दिया।
  • ऊदेपुर 1852:- (म0प्र0) इसे कैनिंग ने बाद में वापस कर दिया।
  • झांसी (1853):- यहाँ का शासक गंगाधर राव था।
  • नागपुर (1854):- यहाँ का शासक रघु जी तृतीय था।

बोर्ड आॅफ डाइरेक्टर्स ने करौली हड़पने की आज्ञा नही दी।
अवध का विलय:- डलहौजी जब व्यपगत सिद्धान्त के आधार पर अवध का विलय नहीं कर सका तब इसने एक गैर सरकारी कमीशन आउट्रम की अध्यक्षता में बिठाया। इसकी रिपोर्ट को आधार मानकर कुशासन का आरोप लगाकर अवध राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया। इस समय यहाँ का नवाब वाजिदअलीशाह था।

1857 के विद्रोह का एक प्रमुख कारण अवध का विलय माना जाता है। क्योंकि कुशासन के आधार पर विलय से जनता में अंग्रेजों के प्रति अविश्वास की भावना बहुत तीव्र हो गयी।

राजपूत युग,प्रतिहार वंश,राष्ट्रकूट वंश,पालवंश

राजपूत युग (7 या 8वीं शताब्दी)

    राजपूत शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कर्नल टाड़ ने आठवीं शताब्दी में लिखी एक पुस्तक Annals and History Rajsthan  में किया है। राजपूत शब्द एक जाति के रूप में अरब आक्रमण के बाद ही प्रचलित हुआ। भारतीय इतिहास में 7वीं से 12वीं शताब्दी के बीच का काल राजपूत काल के नाम से विख्यात है।
ऋग्वेद में राजन् शब्द का प्रयोग मिलता है। अर्थशास्त्र में इनके लिए राजपूत शब्द का प्रयोग किया गया युवांग च्वांग ने इन्हें क्षत्रिय कहा और अरब आक्रमण के बाद राष्ट्रकूट शब्द का प्रचलन हुआ। इनकी उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है।
राजपूतों की उत्पत्ति:-

  1. प्राचीन क्षत्रियों से:-गौरी शंकर ओझा जैसे इतिहासकार राजपूतों को प्राचीन क्षत्रियों से उत्पन्न मानते हैं इनके अनुसार प्राचीन क्षत्रिय ही आगे चलकर राजपूतों के नाम से प्रसिद्ध हो गये।
  2. विदेशी उत्पत्तिः-कुछ विदेशी इतिहासकार जैसे-कर्नलययड एवं स्मिथ आदि लोग विदेशी जातियों शक, कुषाण, सीथियन आदि से इनकी उत्पत्ति मानते हैं।
  3. लक्ष्मण से:- प्रतिहारों के अभिलेखों में इनकी उत्पत्ति लक्ष्मण से दर्शायी गई है। इनके अनुसार लक्ष्मण ने जैसे द्वारपाल के रूप में रामचन्द्र की रक्षा की थी उसी तरह प्रतिहारों ने आखों से भारत की। प्रतिहार का अर्थ ही द्वारपाल होता है।
  4. अग्निकुण्ड सिद्धान्त से:-चन्द्रबरदाई द्वारा लिखी पुस्तक पृथ्वीराज रासो में अग्निकुण्ड सिद्धान्त का उल्लेख प्राप्त होता है। यह कहानी के नवसहशांक चरित सूर्यमल के वंश भास्कर आदि में भी प्राप्त होता है।

पृथ्वी राज रासो के अनुसार गौतम अगस्त, वशिष्ठ आदि तीनों में आबू पर्वत पर एक यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ से उन्होंने तीन योद्धाओं प्रतिहार, चालुक्य एवं परमार को पैदा किया। बाद में चार भुजाओं वाले एक अन्य योद्धा चाहवान की उत्पत्ति की। इस प्रकार अग्नि कुण्ड सिद्धान्त से कुल चार राजपूतों की उत्पत्ति दर्शायी गयी है।
अग्निकुंड सिद्धान्त का विशेष महत्व है क्योंकि अग्नि पवित्रता का प्रतीक है। ऐसा लगता है कि कुछ विदेशी लोगों को भी अग्नि के माध्यम से पवित्र कर राजपूतों में शामिल कर लिया गया।
त्रिपक्षीय संघर्ष:- हर्ष की मृत्यु के बाद कन्नौज पर अधिकार को लेकर प्रतिहारों, पालों और राष्ट्रकूटों के बीच 8वीं शताब्दी के मध्य से 10वी शताब्दी के मध्य एक संघर्ष प्रारम्भ होता है जो भारतीय इतिहास में त्रिपक्षीय संघर्ष के नाम से विख्यात है। इस संघर्ष में अन्ततः प्रतिहारों की विजय होती है तथा उनका कन्नौज पर अधिकार स्थापित हो जाता है। प्रतिहारों के पतन के बाद कन्नौज पर गहड़वालों का आधिपत्य हो जाता हे। ये काशी नरेश के नाम से विख्यात थे। प्रतिहारों के पतन के बाद उत्तर भारत में कुछ अन्य छिटपुट राजवंशों का उदय भी होता है। इनमें दिल्ली तथा अजमेर के चाहमान, बुन्देलखण्ड के चन्देल मालवा के परमार, और त्रिपुरी के कल्चुरी शामिल थे। इन सभी राजवंशों में परमार, राष्ट्रकूटों के सामन्त माने जाते हैं जबकि शेष अन्य प्रतिहारों के।
त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेने वाले शासक:-

प्रतिहार वंश           राष्ट्रकूट वंश               पालवंश
1. वत्सराज               1. ध्रुव                        1. धर्मपाल
2. नागभट्ट द्वितीय     2. गोविन्द तृतीय         2. देवपाल
3. रामभद्र                3. अमोघवर्ष प्रथम      3. विग्रह पाल
4. मिहिर भोज          4. कृष्ण द्वितीय           4. नारायण पाल
5. महेन्द्र पाल

हर्ष की मृत्यु के बाद कन्नौज पर आयुध शासकों का शासन था। इनमें दो भाइयों चक्रयुध एवं इन्द्रायुध को लेकर गद्दी के लिए संघर्ष चल रहा था। इसी समय प्रतिहारों पालों एवं राष्ट्रकूटों ने हस्तक्षेप किया।

प्रतिहार वंश

संस्थापक:- हरिश्चन्द्र जो ब्रहमक्षत्री था।
राजधानी:- कन्नौज परन्तु प्रारम्भिक राजधानी भिन्न माल (गुजरात में स्थित है)
1. नागभट्ट प्रथम (730-56):- इस वंश का यह वास्तविक संस्थापक था। ग्वालियर अभिलेख से पता चलता है कि इसने अरबों को पराजित किया था।
2. वत्सराज (778-805) 
3. नागभट्ट द्वितीय (805-833)
4. रामभद्र (833-836)    

5. मिहिर भोज (836-82):- यह प्रतिहार वंश का महानतम शासक था। इसके स्वर्ण सिक्के पर आदि वाराह शब्द का उल्लेख मिलता है जिससे इसका वैष्णव धर्मानुयायी पता चलता है। इसी के समय में अरब यात्री सुलेमान भारत आया जिसने इस शासक की बहुत प्रशंसा की है। इसी ने भिन्न माल से अपनी राजधानी कन्नौज स्थानान्तरित की।
6. महेन्द्र पाल प्रथम (885-910):- यह प्रतिहार वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। इसके समय में इस राजवंश का सर्वाधिक विस्तार हुआ। इसके दरबार में संस्कृत का प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर रहता था। उसने निम्नलिखित प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखे-काब्य मीमांसा, कर्पूरमंजरी, भिदूशाल भंजिका, बालरामायण, भुव कोष, हरविलास।
राजशेखर कुछ समय के लिए त्रिपुरी के कल्चुरी के वंश में चला गया था और वहाँ के शासक के यूरवर्ष या युवराज प्रथम के काल में अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ काब्य मीमांसा तथा कर्पूर मंजरी की रचना की।
7. भोज द्वितीय (910-12):-    8. महीपाल (912-44)ः-इसी के समय में ईराक का यात्री अलमसूरी भारत आया। राजशेखर इसके दरबार से भी सम्बन्धित था।
9. महेन्द्रपाल द्वितीय (944-46)  
10. देवपाल (946-49)
11. विनायक पाल (949-54 ई0)    राज्यपाल (1018):-
 इसी के समय में महमूद गजनवी ने 1018 ई0 में कन्नौज पर आक्रमण किया। राज्यपाल अपनी राजधानी छोड़कर भाग खड़ा हुआ। इस वंश का अन्तिम शासक यशपाल था। इसी के बाद कन्नौज के गहड़वालों ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया और उन्होंने गहड़वाल वंश की नींव डाली।

राष्ट्रकूट वंश

संस्थापकः– दन्तिदुर्ग
राजधानी:– मान्यखेत या  मात्यखण्ड (आ0 आन्ध्रप्रदेश)
दन्तिदुर्ग (752-56) –यह चालुक्यों का सामन्त था इसने आधुनिक आन्ध्रप्रदेश में अपने राज्य की स्थापना की। राष्ट्रकूट लोग मुख्यतः लाट्टलर (वर्तमान आन्ध्र प्रदेश) के निवासी माने जाते है। यह ब्राह्मण धर्मावलम्बी था तथा उज्जैन में अनेक यज्ञ किये।
कृष्ण प्रथम (756-73):- इसने एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मन्दिर का निर्माण करवाया।
गोविन्द द्वितीय (773-80)
ध्रुव (780-93):-
 राष्ट्रकूटों की तरफ ने त्रिपक्षीय संघर्ष में इसी शासक ने भाग लिया। इसका एक नाम धारावर्ष भी है।
गोविन्द तृतीय (793-814):- यह राष्ट्रकूट वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था।
अमोघवर्ष (814-78):- अमोघवर्ष ने एक नये नगर मान्यखेत या माल्यखण्ड का निर्माण किया और अपनी राजधानी एलिचुर अथवा बरार से यहीं स्थानान्तरित की। यह स्वयं भी विद्वान था और अन्य विद्वानों का आश्रयदाता भी था। इसने कन्नड़ भाषा में एक प्रसिद्ध ग्रन्थ कविराज मार्ग की रचना की। इसके दरबार में निम्न महत्वपूर्ण विद्वान भी थे।
1. जिनसेन    –           आदिपुराण
2. महावीराचार्य    –    गणितारा संग्रह
3. शक्तायना    –        अमोघवृत्ति
वैसे तो अमोघवर्ष जैन धर्म का उपासक था परन्तु संजन ताम्रपत्र से पता चलता है कि एक अवसर पर इसने अपने बायें हाथ की अंगुली देवी को चढ़ा दी थी।
कृष्ण द्वितीय (878-914)        
इन्द्र तृतीय (915-927):-इसके समय ही ईराकी यात्री अल-मसूरी भारत आया था। उसने इन्द्र तृतीय को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक बताया।
कृष्ण तृतीय (939-965):- कृष्ण तृतीय ने अपने समकालीन चोल शासक परान्तक प्रथम को तक्कोलम के युद्ध में पराजित किया। इसने रामेश्वरम् तक धावा बोला तथा वहीं एक विजय स्तम्भ तथा एक देवालय की स्थापना करवाई।
खोटिटग (965-72)-इसके समय में परमार नरेश सीयक ने राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया।
कर्क द्वितीय (972-74):- इसके सामन्त तैल द्वितीय ने इस पर आक्रमण कर इसे पराजित कर दिया। तैल ने जिस नये वंश की नींव रखी उसे कल्याणी के पश्चिमी चालुक्या कहा जाता है।

पालवंश

संस्थापक-गोपाल            
राजधानी-नदिया
शशांक की मृत्यु के बाद बंगाल में 100 वर्षों तक अराजक्ता ब्याप्त रही तब नागरिकों ने स्वयं इससे ऊबकर एक बौद्ध मतानुयायी गोपाल को अपना शासक बनाया। गोपाल ने जिस वंश की नींव रखी उसे पाल वंश कहा जाता है।
गोपाल (750-770):- गोपाल बौद्ध धर्म मतानुयायी था। इसे आम जनता ने गद्दी पर बैठाया (मध्य काल में फिरोज तुगलक और रजिया ऐसे दो शासक थे जो जनता द्वारा बैठाये गये)/ इसने बंगाल में ओदन्तपुरी विद्यालय की स्थापना की।
धर्मपाल (770-810 ई0):-
 1. उपाधि:- परमसौगत, अन्य उपाधियों उत्तरपथ स्वामी (यह उपाधि गुजरात कवि सोडढल ने इसे प्रदान की।
2. इसने प्रसिद्ध विद्यालय विक्रमशिला की स्थापना की।
3. नालन्दा विश्वविद्यालय के खर्च के लिए दो सौ ग्राम दान में दिये।
4. इसने बंगाल के प्रसिद्ध सोमपुरी बिहार की स्थापना की जो इसके पूर्व में पड़ता है।
प्रसिद्ध लेखक ताराचन्द्र ने लिखा है कि इसने बंगाल में 50 से अधिक धार्मिक विद्यालयों की स्थापना करवाई थी। इसके दरबार में प्रसिद्ध बौद्ध लेखक हरिभद्र निवास करता था।
देवपाल (810-50):- उपाधि,- परमसौगत
यह बंगाल के शासकों में सबसे शक्तिशाली शासक था। इसने समकालीन प्रतिहार नरेश मिहिरभोज को पराजित किया। अरब यात्री सुलेमान इसके समय में भी भारत आया था तथा इसे अत्यन्त श्रेष्ठ शासक बताया है। इसके समय में शैलेन्द्र वंशी शासक बालपुत्र देव ने नालन्दा में एक बौद्ध मठ की स्थापना की। इसके खर्च हेतु देवपाल ने पाँच ग्राम दान में दिये।
इसने अपनी राजधानी नदिया से मुगेर में स्थानान्तरित कर ली। 850 से 988 इ्र0 तक पाल वंश का इतिहास पतन का काल माना जाता है। इस समय के शासकों के नाम नहीं प्राप्त होते हैं इसी के बाद महीपाल गद्दी पर बैठता है।
महीपाल (988-1038):- चूँकि महीपाल ने दुबारा पाल वंश की शक्ति को स्थापित किया इसी लिए इसे पालवंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है। परन्तु इसके काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना चोल शासक राजेन्द्र चोल का इसके राज्य पर आक्रमण था। राजेन्द्र चोल ने इसे पराजित कर गंगइकोंडचोल चोल की उपाधि धारण की।
नयपाल (1038-55)      
रामपाल (1077-1120):- रामपाल के समय में भारतीय इतिहास का प्रथम कृषक विद्रोह हुआ। यह कैवर्त (केवट) जातियों द्वारा किया गया इसका पता सन्ध्याकर नन्दी की पुस्तक रामचरित से चलता है। (आधुनिक काल में पहला कृषक विद्रोह नील विद्रोह माना जाता है।
इसने मध्य-प्रदेश में जगदलपुर में एक विद्यालय की स्थापना की।
रामपाल के बाद मदन पाल ने 1161 ई0 तक राज किया। इसके बाद पालों की सत्ता सेन वंश के हाथों चली गई।

दिल्ली तथा अजमेर के चैहान,चंदेल वंश (बुन्देल खण्ड),परमार वंश,कलचुरिवंश,सेनवंश

दिल्ली तथा अजमेर के चैहान

संस्थापक:- वासुदेव (सातवीं शताब्दी) 

राजधानी– शाकंभरी (अजमेर) एवं दिल्ली
चैहान ने अपना मूल केन्द्र अजमेर व दिल्ली को बनाया लेकिन बाद में उन्होंने अपनी राजधानी दिल्ली में ही स्थानान्तरित कर ली।
अजमेर:– इसका प्रारम्भिक नाम शाकंभरी था। अजयराज नामक शासक ने अजमेर की स्थापना की।
दिल्लीः-दिल्ली का प्राचीनतम नाम योगिनीपुरम मिलता है। शातवी शताब्दी में तोमरों ने (अनंगपाल तोमर) दिल्लिका नामक नगर की स्थापना की। इन्हीं तोमरों के स्थान पर ही चैहान दिल्ली में प्रतिस्थापित हुए। भारत में अपना शासन स्थापित करने के बाद कुतुबद्दीन ऐबक ने अपनी राजधानी लाहौर बनाया लेकिन इल्तुतमिश ने इसे दिल्ली में स्थापित किया। बाद में दिल्ली सुल्तानों की राजधानी बनीं रही। लोदियों के काल में सिकंदर लोदी ने 1506 में एक नये नगर आगरा की स्थापना की । तब यह आगरा ही लोदियों की राजधानी बनी। मुगल शासक बाबर हुमाँयु और अकबर आगरा की ही गद्दी पर बैठे। अपनी गुजरात विजय के बाद अकबर ने फतेहपुर सीकरी की स्थापना कर अपनी राजधानी उसे ही बनाया। जहाँगीर और शाहजहां आगरा की ही गद्दी पर बैठे। शाहजहाँ ने 1638 ई0 में एक नये नगर शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) की स्थापना करवाई और अपनी राजधानी वहीं पर स्थानान्तरित कर दिया। औरंगजेब आगरा और दिल्ली दोनों की गद्दी पर बैठा। औरंगजेब के बाद के मुगलशासक दिल्ली की गद्दी पर बैठे। अंग्रेजों ने एक नये नगर कालीकाटा का निर्माण किया और उसे अपना मुख्यालय बनाया जो बाद में उनकी राजधानी बना। 1912 ई0 में लार्ड हार्डिंग के शासन काल में कलकत्ता से राजधानी दिल्ली को स्थानान्तरित कर दी गई। तब से आजतक दिल्ली ही भारत की राजधानी है।
चैहान प्रतिहारों के सामन्त थे। सर्वप्रथम सिंहराज ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित की उसके बाद विग्रहराज द्वितीय शासक बना। विग्रहराज के बाद अजयराज गद्दी पर बैठा उसने अजमेर नगर की स्थापना की तथा वहाँ अपनी राजधानी स्थानान्तरित किया। अजयराज के बाद अर्णोराज शासक बना तदोपरान्त विग्रहराज गद्दी पर बैठा।
विग्रहराज चतुर्थ (1153-63):- यह शासक वीसलदेव के नाम से विख्यात है। इसने एक ग्रन्थ हरिकेल नाटक की रचना की। यह नाटक बाद में कुतुबद्दीन ऐबक द्वारा बनवाये गये ’ढाई दिन के झोपड़ा’ के दिवारों पर अंकित है।
इसके दरबार में संस्कृति के प्रसिद्ध विद्वान सोमदेव रहते थे जिन्होंने कथासारत्सागर नामक ग्रन्थ की रचना की इसके अतिरिक्त बीसलदेव की प्रशंसा में एक अन्य ग्रन्थ ललित विग्रहराज की रचना की।
पृथ्वीराज तृतीय (1177-1192):- यह इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। कथाओं ने इसे ’रायपिथौरा’’ कहा है। इसके दरबार का प्रसिद्ध विद्वान चन्दरबरदाई था उसने पृथ्वीराज रासो नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की यह हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाब्य माना जाता है इसी के दरबार में जयनिक या जमानकभट्ट ने पृथ्वीराज विजय नामक ग्रन्थ की रचना की। जिसमें पृथ्वीराज के चन्देल शासक परमर्दिदेव (परमाल) के विरूद्ध विजय का उल्लेख है। अन्य प्रसिद्ध दरबारी विद्वानों में विद्यापति गौड़, पृथ्वीभट्ट, वागीश्वर एवं जनार्दन विश्वरूप प्रमुख हैं।
विजयें:- 1. तराइन का प्रथमयुद्ध (1191 ई0)ः- इस युद्ध में पृथ्वीराज ने मुहम्मद गोरी को पराजित किया।
2. तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई0):- इस युद्ध में मुहम्मद गोरी ने पृथ्वी राज को पराजित कर अपनी हार का बदला ले लिया।
3. चन्देल शासक परमाल से युद्ध:- इस युद्ध में पृथ्वीराज ने परमाल को एक रात्रि अभियान में पराजित किया। परमाल की तरफ से अल्हा और ऊदल नामक दो लोक प्रसिद्ध सेनानायकों ने भयंकर युद्ध किया किन्तु वे मारे गये। इस युद्ध का बड़ा ही सजीव वर्णन जगानि ने अपनी पुस्तक पृथ्वीराज विजय में किया है। इसी पुस्तक का भाग आल्हा-खण्ड है जो आज भी गाया जाता है।
तराइन के युद्ध में पराजय के बाद मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज के लड़के गोविन्द को अपनी आधीनता में अजमेर का शासक बनाया। बाद में यह राज दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।

चंदेल वंश (बुन्देल खण्ड)

संस्थापकः- नन्नुक (831 ई0 में)
राजधानी– खजुराहों
’प्रारम्भिक राजधानी-कालिंजर
बुन्देलखण्ड का प्राचीन नाम जेजाकभुक्ति था। यहाँ के एक शासक जयशक्ति के नाम पर इसका नाम जेजाकभुक्ति पड़ा था।
यशोवर्मन (925-50):- इसका एक अन्य नाम लक्ष्मण वर्मन भी मिलता है। इसने विष्णु मन्दिर का निर्माण करवाया था। इसमे इसने बैकुण्ठ की एक मूर्ति स्थापित करवाई जिसे उसने पाल शासक देवपाल से प्राप्त किया था। इसने एक बड़े जलाशय का निर्माण भी करवाया था।
धंग:- (950-1002 ई0):- खजुराहों के कालिंजर वंश का यह वास्तविक संस्थापक था इसी ने अपनी राजधानी कालिंजर से खजुराहों में स्थानान्तरित की। इसका काल खजुराहों के मन्दिरों के लिए विख्यात है।
खजुराहों के मन्दिर:- खजुराहों में कुल 30 मन्दिर हैं जो आधुनिक मध्य प्रदेश के छत्तरपुर जिले में स्थित है ये मन्दिर शैव धर्म, वैष्णव धर्म और जैन धर्म से सम्बन्धित है। इन मन्दिरों में कन्दरिया का महादेव मन्दिर सबसे विख्यात है। इसके अतिरिक्त चित्रगुप्त स्वामी का मन्दिर जगदम्बिका का मन्दिर विश्वनाथ मन्दिर आदि भी प्रसिद्ध है जैन मन्दिरों में पाश्र्वनाथ मन्दिर सबसे प्रसिद्ध है।
एक कथा के अनुसार 1002 ई0 में इसने संगम में जल समाधि ले ली।
गंडदेव (1002-1019):- यह शासक 1008 ई0 में महमूद गजनवी के विरूद्ध आनंदपाल द्वारा बनाये गये संघ में शामिल था। इसने अपने लड़के विद्याधर को राज्यपाल को दण्डित करने के लिए भेजा था। राज्यपाल की हत्या करने के बाद विद्याधर ने उसके लड़के त्रिलोचनपाल को प्रति घर शासक बनाया था।
विद्याधर (1019-29):- यह चंदेल शासकों में सर्वाधिक शक्शिाली शासक था तत्कालीन मुस्लिम लेखकों ने इसकी बहुत प्रशंसा की है इसी ने प्रतिहार शासक राज्यपाल को दण्डित किया था। जब महमूद गजनवी ने 1019-20 में इसके राज्य पर आक्रमण किया तो इसने अपनी सेना को पीछे कर लिया और जब 1022 में पुनः आक्रमण किया तो उसके साथ एक शान्ति सन्धि कर ली।
कीर्तिवर्मन (1060-1100):– इनके दरबार में कृष्ण मिश्र नामक प्रसिद्ध विद्वान थे जिन्होंने संस्कृत में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक प्रबोध चन्द्रोदय की रचना की।
मदनवर्मन (1129-63)
परमर्दिदेव या परमल (1165-1202):- यह इस वंश का अन्तिम महान शासक था इसी के काल में अल्हा और ऊदल नामक दो महान सेनानायक थे। चैहान शासक पृथ्वीराज तृतीय ने इसे एक रात्रि अभियान में पराजित कर दिया था। अन्तिम रूप से कुतुबद्दीन ऐबक ने परमर्दिदेव को पराजित कर कलिंजर पर अधिकार कर लिया और बाद में यह राज्य दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।

परमार वंश

संस्थापक:-उपेन्द्र अथवा कृष्णराज दशवीं शताब्दी के प्रारम्भ में।
राजधानी:- धारा, परन्तु प्रारम्भिक राजधानी उज्जैन।
परमार वंश का स्वतंन्त्र एवं प्रथम प्रतापी शासक सीयक अथवा श्री हर्ष था। इसी के बाद वाकपति मुंज ने कल्याणी के चालुक्य शासक तैल द्वितीय को छः बार पराजित किया परन्तु शातवीं बार स्वयं पकड़ लिया गया और उसकी हत्या कर दी गई। इसकी राजसभा में निम्नलिखित प्रमुख विद्वान थे।

  1. पद्मगुप्तः-इनकी प्रसिद्ध रचना नवसहशांक चरित है। नवसहशांक चरित का नायक मुंज का छोटा भाई सिन्धुराज था।
  2. धनंजय:- इनकी प्रसिद्ध रचना दशरूपक है।

सिन्धुराज (995-1000):- यह वाकपति मुंज का छोटा भाई था इसकी उपाधि शाहशांक थी यह नवशहसांक चरित नामक पुस्तक का नायक भी था।
भोज (1000-1055):- यह परमार वंश का महान शासक था। इसने धारा नामक नगर की स्थापना की और अपनी राजधानी उज्जैन से वहीं ले गया। इसकी उपाधि कविराज की थी। इसके बारे में जानकारी इसकी उददयपुर प्रशस्ति से मिलती है। इसके काल की प्रमुख घटनायें निम्नलिखित हैं

  1. युद्ध:- भोज ने कल्याणी के चालुक्य शासक तैल द्वितीय को पराजित कर उसकी हत्या कर दी परन्तु यह चन्देल शासक विद्याधर से पराजित हो गया। अन्हिलवाड़ या शोलंकी वंश चालुक्य शासक भीम प्रथम एवं कल्चुरी शासक कर्ण प्रथम ने एक संघ बनाकर इसके राज्य पर दोनों तरफ से आक्रमण किया और धारा नगरी को लूट लिया। इसी के बाद भोज की मृत्यु हो गई।
  2. सांस्कृति उपलब्धि:- भोज ने भोजसर नामक तालाब बनवाया तथा भोजपुर नामक नगर बसाया उसके अनेक निर्माण कार्यों का उल्लेख उदयपुर प्रशस्ति में है। इसमें कई मन्दिरों के निर्माण का उल्लेख भी है जैसे-केदारेश्वर, रामेश्वर, सोमनाथ और सुंडार।
  3. सोमनाथ मंदिर:- खम्भात की खाड़ी में यह मन्दिर स्थित था जब अन्हिलवाड़ा का शासक भीम प्रथम था तभी 1025-26 ई0 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आक्रमण किया और इस मन्दिर को नष्ट कर दिया इसके आक्रमण के तुरन्त बाद भोज ने इस मन्दिर का पुनः निर्माण करवाया बाद में भीम प्रथम ने भी इस मन्दिर का निर्माण करवाया। शोलंकी शासक कुमार पाल प्रथम ने भी इस मन्दिर का पुनर्निमाण करवाया था।
  4. विद्याप्रेम:- भोज स्वयं विद्वान था उसने ’कविराज’ की उपाधि भी धारण की कहा जाता है कि प्रत्येक श्लोक पर वह एक लाख स्वर्ण मुद्रायें दान में देता था। उसकी मृत्यु पर यह अनुश्रुति चल पड़ी थी कि विद्या और विद्वान दोनों निरासित हो गये एवं धारा निराधार हो गई। आइने अकबरी के अनुसार भोज के दरबार में करीब 500 विद्वान थे इसमें नौ विद्वानों का नाम अत्यन्त प्रसिद्ध था। जिनमें भास्कर भट्ट, दामोदर मिश्र, एवं धनपाल अत्यन्त प्रसिद्ध थे।

भोज के ग्रन्थ:- भोज को कई पुस्तकों का लेखक भी माना जाता है ये निम्नलिखित हैं –
1. समरांगण सूत्रधार             2. सरस्वती कठाभरण
3.सिद्धान्त-संग्रह                   4. राजमर्तण्ड
5. योग सूत्र वृत्ति                    6. विद्या विनोद
7. युक्त कल्पतरू                 8. चारू चर्चा
9. आदित्य प्रताप सिद्धान्त     10. आयुर्वेद
11. श्रृंगार प्रकाश                  12. प्राकृत न्याकरण
13. कूर्म-शतक                    14. श्रृंगा-मंजरी
15. भोज चंपू                       16. कृत्य कल्पतरू
17. तत्व प्रकाश                   18. शब्दानुसासन
19. राज मृगांक
अलाउद्दीन खिलजी ने 1305 ई0 में दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।

कलचुरिवंश

संस्थापक:-कोकल्लप्रथम (845 ई0)
राजधानी:- त्रिपुरी (आ0 जबलपुर)
यहाँ पर पहले चेदि वंश या जिसका प्राचीन नाम डाहलमंडल था। वर्तमान के कल्चुरी प्रतिहारों के सांमत माने जाते हैं। इस वंश का प्रथम प्रतापी शासक युवराज प्रथम अथवा केयूर वर्ष था।
युवराज प्रथम अथवा केयूर वर्ष:- इसी शासक के शासन काल में प्रसिद्ध संस्कृति विद्वान राजशेखर प्रतिहार शासक महेन्द्रपाल का राजदरबार छोड़कर केयूर वर्ष के यहाँ आ गये यही रहते हुए उसने अपनी दोनों प्रसिद्ध पुस्तकें काब्यमीमांसा तथा भिद्दशालभंजिका की रचना की। भिद्दशाल मंजिका में उसने केयूर वर्ष को ’’उज्जैनी भुजंग’’ कहा है। केयूर वर्ष ने उज्जैनी को अपने अधीन कर लिया था।
लक्ष्मण राज:- लक्ष्मण राज ने अपने उड़ीसा अभियान के दौरान वहाँ के शासक से सोने एवं मणियों से निर्मित कालियानाग को छीन लिया।
गांगेयदेव विक्रमादित्य (1019-1040 ई0)- यह कल्चुरि वंश का प्रतापी शासक था इसने भोज परमार एवं राजेन्द्र चोल के साथ एक संध बनाकर अन्हिलवाड़ के चालुक्य शासक जयसिंह पर आक्रमण किया परन्तु सफलता न मिली। कहा जाता है कि इसने उड़ीसा, काशी तथा प्रयाग को जीता। प्रयाग में ही वट वृक्ष के नीचे निवास करते हुए इसने प्राण त्याग दिये।
कर्णदेव (1041-70):-
उपाधि:- त्रिकलिंगाधिपति,
यह कल्चुरि वंश का सर्वाधिक प्रतापी शासक था। इसने काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मन्दिर का निर्माण करवाया तथा त्रिपुरी के निकट एक नये नगर पर्णवती का निर्माण किया और अपनी राजधानी त्रिपुरी से पर्णवती में ही स्थानान्तरित की।
इस वंश का अन्तिम शासक विजयसिंह था जिसको तेरहवीं शताब्दी में चंदेल शासक त्रयलोक्य वर्मन ने पराजित कर त्रिपुरी को अपने राज्य में मिला लिया।
नोट:- कल्चुरि शासक शैव धर्म के उपासक थे।

सेनवंश

संस्थापक:-सामन्त सेन
स्थानः- राढ
धर्म-शैव एवं वैष्णव
जाति:- ब्रहम-क्षत्र
सामान्य राजधानी:– लखनौती
सामन्त सेन के बाद विजयसेन शासक बना परन्तु इस वंश का पहला प्रमुख शासक बल्लालसेन था।
बल्लाल सेन (1158-78):- बंगाल से पाल वंश की सत्ता को पूर्णतः समाप्त करने का श्रेय इसे ही दिया जाता है। इसने सम्पूर्ण बंगाल तथा बिहार पर अधिकार कर लिया और पाल शासकों द्वारा धारण की जाने वाली ’गौड़ेश्वर’ की उपाधि स्वयं धारण की। बल्लालसेन ने स्मृतियों पर एक प्रसिद्ध ग्रन्थ ’’दानसागर’’ की रचना की। एक अन्य ग्रन्थ जो खगोल विज्ञान पर आधारित थी ’’अद्भुद्सागर’’ की रचना भी प्रारम्भ की। परन्तु इसे पूर्ण न कर सका। इसका आचार्य अनिरूद्ध अपने युग का प्रकाण्ड विद्वान था। यह शैव मतानुयायी था।
लक्ष्मणसेन (1178-1205):- सेनवंश का यह सबसे विख्यात शासक था। तािा 60 वर्ष की अवस्था में गद्दी पर बैठा। इसने गहड़वाल शासक जयचन्द के विरूद्ध विजय भी प्राप्त की थी। लक्ष्मणसेन ने पुरी काशी तथा प्रयाग में कई विजय स्तम्भ भी स्थापित किये।
लक्ष्मणसेन ने अपने पिता द्वारा प्रारम्भ किये गये ग्रन्थ अद्भुत सागर (खगोल विज्ञान पर आधारित) को पूरा किया। इसके दरबार में कई प्रसिद्ध विद्वान निवास करते थे। ये निम्नलिखित थे।
1. जयदेव:- इनकी प्रसिद्ध रचना गीत गोविन्द है जिसमें विष्णु के 39 अवतारों का वर्णन है। अमर कोष में भी विष्णु के 39 अवतारों का उल्लेख है।
2. धीयीः– ये पवनदूत के रचयिता थे।
3. हलायुध:- ब्राह्मण सर्वस्य के रचयिता।
4. श्रीधरदास:- सद्धिुक्ति करणामृत।
लक्ष्मण सेन ने परमभागवत की उपाधि धारण की तथा अपने पूर्वजों के शैव मत के विपरीत स्वयं वैष्णव धर्म ग्रहण किया। इसके लेखों का प्रारम्भ नारायण की स्तुति से होता है। इसे बंगाल में एक नये संम्वत् के प्रचलन का श्रेय दिया जाता है। 1203 ई0 में बख्तियार खिलजी ने आक्रमण कर नालन्दा एवं विक्रमशिला विश्व विद्यालय को नष्ट कर दिया।

दिल्ली सल्तनत,महमूद गजनवी,गोरी वंश,रजिया ,बलबन

दिल्ली सल्तनत

ईस्लाम का उदय:- इस्लाम धर्म का उदय छठी शताब्दी में हुआ इसका श्रेय मोहम्मद साहब को दिया जाता है।
मुहम्मद साहब (570-632 ई0)
पिता का नाम-अब्दुल्ला        
माता का नाम-अमीना
जन्म-570 मक्का में 
पत्नी का नाम-खदीजा
परवरिश-चाचा अबू जान
मुहम्मद साहब 622 ई0 में मक्का से मदीना चले गये इसे हिजरत कहा गया। 622 ई0 ही हिजरी सम्वत् के नाम से प्रसिद्ध है। मुहम्मद साहब ने ईश्वर को केन्द्र में रखते हुए अपना राज्य स्थापित किया। यह मुस्लिम धार्मिक पुस्तक कुरान पर आधारित है। इस पुस्तक के राजनीतिक प्रधिकार शरा अथवा शरियत् में निहित है। जो शरियत् के विरूद्ध कार्य करता है उसे फतवा जारी किया जा सकता है। कुरान में किसी विशेष प्रकार के राज्य की कल्पना नही है बल्कि समयानुसार कार्य करने की बात कही गयी है।
मुस्लिम राज्य एक धार्मिक राज्य था जिसमें खुदाही बादशाह अथवा शासक माना जाता था। परन्तु वास्तविक सत्ता मिल्लत (आम जनता अथवा सुन्नी  भातृत्त भावना में) निहित थी। मुहम्मद साहब पैगम्बर थे। पैगम्बर का अर्थ है खुदा का प्रतिनिधि। मुहम्मद साहब के साथ ही पैगम्बर की उपाधि समाप्त हो गई। पैगम्बर के बाद खलीफा का उल्लेख आता है। ये लोग भी खुदा के प्रतिनिधि माने जाते हैं। प्रथम खलीफा अबूबक्र (632-34) थे। इसके बाद उमर, उस्मान और अली का नाम आता है फिर मुबयिआ खलिफाओं का नाम मिलता है। मुबयिआ का पुत्र याजिद था। यहाँ से खलीफाओं का पद वंशानुगत हो गया। मुबयिआ के समय में राजधानी मदीना से दमिष्क (सीरिया) स्थानान्तरित हो गई। मुबयिआ वंश के पतन के बाद अब्बासी वंश का उल्लेख मिलता है। इनकी राजधानी बगदाद थी। अब्बासी खलिफाओं के पतन के बाद कई छोटे-छोटे राजवंशों का उदय हुआ। इन्हीं में एक राजवंश समानी साम्राज्य था।
समानी साम्राज्य:- इस राजवंश की स्थापना उत्तर पश्चिमी अफगानिस्तान में हुई। इनकी स्थापना का श्रेय कुछ खाना बदोश जातियों को जाता है। जिन्होंने हाल में ही इस्लाम अपनाया था। प्रारम्भ में ये लोग गुलाम थे। इन्हीं के शासकों में एक अलप्तगीन था। इसकी राजधानी गजनी थी। इसका एक गुलाम विलक्तगीन इसके बाद शासक हुआ। विलक्तगीन के बाद सुबुक्तगीन शासक बना। इसी सुबुक्तगीन का पुत्र महमूद आगे चलकर गजनी की गद्दी पर बैठा।

महमूद गजनवी (998-1030 ई0)

 राजधानी-गजनी
महमूद गजनी पहला मुस्लिम शासक था जिसने सुल्तान की उपाधि धारण की। बगदाद के खलीफा कादिर ने इसके पद की मान्यता दी। इसने यमीनुद्दौला (साम्राज्य का दाहिना हाथ) अमीन उल मिल्लत (मुसलमानों का रक्षक) गाजी (धर्म युद्ध में विजेता) बुत शिकन (मूर्ति भंजक) आदि उपाधि धारण की महमूद गजनवी ने भारत पर कुल 17 आक्रमण किये । इन आक्रमणों का मूल उद्देश्य यहाँ की धन सम्पत्ति को लूटना था।
  • 1001 ई0 में-पंजाब (पेशावर) के राजा जयपाल को पराजित था। जयपाल ने आत्महत्या कर ली।
  • 1008 ई0 में उन्द नामक स्थान पर आनन्दपाल को पराजित किया।
  • 1014 ई0 में थानेश्वर के चक्रस्वामी मन्दिर को लूटा।
बुलन्द शहर का राजा हदत्त डर के मारे मुसलमान हो गया। 1018 ई0 में कन्नौज का राजा राज्यपाल अपनी राजधानी छोड़कर भाग लिया।
सोमनाथ पर आक्रमण:-(1025-26ई0) यह महमूद गजनवी का 16वाँ आक्रमण था। इस समय यहाँ का शासक भीम प्रथम था।
महमूद गजनवी का 17वाँ एवं अन्तिम अभियान मुल्तान के पास खोखरों के विरूद्ध हुआ। 1030 ई0 में इसकी मृत्यु हो गई।
प्रसिद्ध दरबारी विद्वान
  1. अलबरूनी:- अलबरूनी मध्य एशिया के खीवा प्रान्त का रहने वाला था इसका एक नाम अबू रेहान भी था। यह 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी के साथ भारत आया। यह गणित दर्शन और ज्योतिष एवं संस्कृत का ज्ञाता था। इसने संस्कृत बनारस में रहकर सीखी। इसकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम तहकीक-हिन्द या किताबुल हिन्द है। जो अरबी भाषा में है। इसमें भारत के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि दशा का वर्णन मिलता है। उसने लिखा है ’’हिन्दुओं में यह दृढ़ विश्वास है कि उनके जैसा कोई देश नही, कोई राष्ट्र नही, कोई राजा नही, कोई विज्ञान नही’’ अलबरूनी ने ही भारत में शूद्रों की सबसे बड़ी सूची प्रस्तुत की है। उसने यह भी लिखा है कि इस समय जो निम्न कार्य करते थे वे अन्त्यज कहलाते थे। जैसे-मोची, मछुवारे, शिकारी, टोकरी बनाने वाले आदि।
  2. उत्बी:- यह एक प्रसिद्ध इतिहासकार था। जिसने तारीख-ए-यामिनी अथवा किताबुल यामिनी नामक पुस्तक अरबी भाषा में लिखी।
  3. फिरदौसी:- यह एक प्रसिद्ध इतिहासकार था। पूर्व का अमर होमर भी कहा जाता है। जिसने प्रसिद्ध पुस्तक शाहनामा फारसी में लिखी है। इसी ने कश्मीर के बारे में लिखा है कि ’’यदि पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है’’ ये पंक्तिया बाद में शाहजहाँ ने लालकिले में दीवाने खास में उत्कीर्ण करवायी। इस प्रकार फिरदौसी ने बिना भारत आये ही भारत के बारे में लिखा है।
  4. बैहाकी:- यह भी इतिहासकार था। इसने प्रसिद्ध पुस्तक तारीख-ए-सुबुक्तगीन की रचना की। लेनपूल ने इसे पूर्वीय पेप्स की उपाधि दी।
  5. फरात– दर्शन शास्त्र का प्रसिद्ध विद्वान।
  6. उजारी– फारस का कवि।
  7. तुसी – खुरासान का विद्वान।
  8. उसरी– महान शिक्षक और विद्वान।

’’गोरी वंश’’

    12वीं शताब्दी के मध्य में अफगानिस्तान में ही गोरी वंश की स्थापना हुई। इसका प्रसिद्ध शासक मुहम्मद गोरी हुआ।

मुहम्मद गोरी-(1175-1206)

    गोर राज्य भी गजनी साम्राज्य के अधीन हिन्दू कुश की पहाडि़यों में स्थित था। जब गजनी साम्राज्य कमजोर हुआ तो गोर शासकों ने न सिर्फ गजनी की अधीनता त्याग दी अपितु गजनी पर भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। इन्हीं गोर शासकों के सात भाईयों में एक भाई अलाउद्दीन हुसैन जहाँ सोच जिसने अपने भाईयों की हत्या का बदला लेने के लिए गजनी पर आक्रमण कर गजनी राज्य को जला दिया। इसी लिए इसे जहाँ सोच (विश्व को जलाने वाला) एवं विश्व दाहक के रूप में जाना जाता है। इसके पश्चात् गजनी पर गोर शासकों का अधिपत्य स्थापित हो गया और जब गोर साम्राज्य की गद्दी पर ग्यासुद्दीन मुइनुद्दीन बैठा तो उसने अपने भाई मु0 बिन साम को गजनी की गद्दी पर बैठाया। यही शासक परिवर्ती काल में मु0 गोरी के नाम से जाना गया और इसने 1175 ई0-1206 ई0 तक भारत पर अनेक आक्रमण कर तुर्की साम्राज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इसके योग्य गुलामों में ऐबक, ताजुद्दीन एल्दौज नसिरूद्दीन कुवाचा, बख्तियार खिल्जी आदि थे। जिन्होंने भारत विजय में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
जिस समय गोरी ने भारत पर आक्रमण किया उस समय उत्तर भारत में अनेक राजपूत राज्य परस्पर वैमनस्य की स्थिति में संघर्ष करते हुए शासन कर रहे थे। गोरी ने इस विकेन्द्रीकरण एवं राजपूतों के आपसी वैमनस्य का लाभ उठाया और मध्य एशिया में बढ़ते हुए फरिज्मशाह में प्रभावों से डरकर भारत की तरफ रूख किया और भारत में तुर्की राज्य स्थापित करने का सपना देखा।
गोरी के आक्रमण के समय पंजाब लाहौर पेशावर पर अन्तिम गजनी वंश के शासक खुसरों मलिक का शासन था। मुल्तान सिंधु पर शिया मतावलम्बी धर्मार्थियों का शासन था। दिल्ली पर राज पिथौरा के रूप में प्रसिद्ध चैहान वंशीय पृथ्वी राज तृतीय शासन कर रहा था। गुजरात अन्हिलवाड़ पर सोलंकियों का शासन था जहाँ भीम द्वितीय शासन कर रहा था। कन्नौज पर काशी के राज के रूप में प्रसिद्ध गहढ़वालों का शासन था और उस समय इस पर जयचन्द शासन कर रहा था।
बुन्देलखण्ड क्षेत्र में कालिंजर खजुराहों महोवा के रूप में चंदेलों का शासन था जहाँ इस वंश का प्रसिद्ध शासक परमार्दिदेव शासन कर रहा था। मालवा धारा पर परमारों का शासन था। मध्यक्षेत्र पर कल्चुरियों का शासन था। बंगाल में इस समय पाल वंश की जगह सेन वंश का प्रसिद्ध शासक लक्ष्मणसेन शासन कर रहा था। लखनौती एवं नदियाँ उसके प्रशासनिक केन्द्र थे। राजपूत राज्य परस्पर संघर्षरत थे। सामाजिक वर्णव्यवस्था अत्यधिक जटिल एवं कमजोर हो चुकी थी। धर्म में भी दक्षिण पंथ (वामपंथ) का प्रभाव बढ़ रहा था। राजपूत परस्पर वैमनस्य एवं कटुता का शिकार हो रहे थे।
गोरी ने खारिज्म शाह के बढ़ते हुए प्रभाव को ध्यान में रखकर भारत पर तुर्की साम्राज्य स्थापित करने का प्रयास किया। प्रारम्भ में उसने लाहौर पेशावर यानि खैवर दर्रे को छोड़कर गोलन दर्रे के माध्यम से गुजरात में घुसने की भूल की।
गोरी का भारत पर पहला आक्रमण 1175 ई0 में मुल्तान पर हुआ जिस पर उसने आसानी से आधिपत्य स्थापित कर लिया जो सिया मतावलम्बी धर्मार्थियों के अधीन था। 1176 ई0 में गोरी भी का आक्रमण कच्छ पर हुआ इसे भी जीत लिया गया। 1178 ई0 में गोरी का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध तत्कालीन गुजरात के शासक मूलराज द्वितीय के समय में भीम द्वितीय से हुआ। जिसमें भीम द्वितीय ने अपनी साहसी विधवा नायिका देवी के निर्देशन में गोरी को 1178 ई0 के आबू के इस युद्ध में बुरी तरह पराजित कर दिया। इसके बाद गोरी ने आक्रमण की दिशा बदल दी और हिन्दूकुश की पहाडि़यों के माध्यम से पंजाब राज्य से आक्रमण की शुरूआत की। 1179, 83, 86 ई0 तक अनेक बार पेशावर लाहौर आदि को जीता उस समय पंजाब पर अन्तिम गजनी शासक खुशरों मलिक का शासन था अन्ततः उसे पकड़कर गजनी ले जाया गया जहाँ उसकी हत्या कर दी गयी और पंजाब पर गोरी का सीधा नियन्त्रण स्थापित हो गया।
पंजाब के बाद गोरी भी अलग निशाना तवर हिन्द भटिण्डा हुआ जिसने चैहानवंशीय शासक पृथ्वीराज तृतीय को चैकन्ना कर दिया क्योंकि ये क्षेत्र उसके साम्राज्य की सीमा में आते थे। गोरी एवं पृथ्वीराज के बीच युद्ध अवश्यसम्भावी हो गया और दोनों के बीच 1191 ई0 तराइन की प्रथम युद्ध हुआ जिसमे पृथ्वीराज ने गोरी को बुरी तरह पराजित किया और वह अपने एक खिल्जी गुलाम की मदद से जीवन बचा पाया। चैहान की सेना ने उसका पीछा किया और तवर हिन्द को तुर्कों में चंगुल से मुक्त किया।
1192 ई0 में तराइन में ही मैदान में विश्व प्रसिद्ध तराइन का द्वितीय युद्ध हुआ जिसमें अन्ततः गोरी ने बाजी मार ली। पृथ्वीराज चैहान परास्त हुआ। बाद में विदोह करने कारण उसकी हत्या कर दी गयी। कुछ समय तक उसके पुत्र गोविन्दराज को गद्दी पर बैठाया गया परन्तु अन्ततः दिल्ली को तुर्की राज्य में मिला लिया गया और इस वंश के अन्तिम शासक हरिराज ने विद्रोह कर स्वतन्त्र करा पाने में असफल होने पर जौहर प्रथा अपनाकर आत्म हत्या कर ली।
गोरी का अन्य महत्वपूर्ण आक्रमण 1194ई0 में हुआ जिसमें उसने गहड़वाल वंशी शासक जयचन्द्र को चन्दावर के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया। जयचन्द्र मारा गया। कुछ समय तक उसके पुत्र हरिश्चन्द्र को गद्दी पर बैठाया गया परन्तु अन्ततः कन्नौज में तुर्की राज्य में मिला लिया गया। गोरी ने 1195-96 ई0 में अभियान चलाकर राजपूत राज्यों को परास्त करने का प्रयास किया। परिवर्ती काल में उसके इस कार्य को ऐबक ने पूरा किया।
गोरी का अन्तिम महत्वपूर्ण आक्रमण 1206 ई0 में हुआ। जिसमें उसने गोक्खरों की बढती शक्ति को नष्ट कर दिया जो लाहौर तक धावा बोलने की योजना बना रहे थे।
गोक्खरो के विद्रोह को दबाकर लौटते समय सिंधु के दमदम नामक स्थान पर एक गोक्खर सरदार द्वारा मगरिस (सायंकालीन नमाज) पढते समय गोरी की हत्या कर दी गयी।
गोरी के योग्य गुलाम इख्त्यिारूद्दीन बख्तियार खिलजी ने बंगाल विहार जीतते हुए तत्कालीन नालन्दा विक्रमशिला उदंतपुरी जैन विहारों को न सिफ नष्ट किया अपितु व्यापारी वेश में लक्ष्मणसेन की राजधानी नदिया पर आक्रमण कर लिया वह राजधानी छोड़कर भाग गया और आसानी से बंगाल पर तुर्कों का आधिपत्य स्थापित हो गया।
गोरी द्वारा 1175 ई0-1206 ई0 के बीच में उत्तर भारत में अनेक अभियानों के माध्यम से भारत में तुर्की राज्य की स्थापना हुई जिसे भारतीय इतिहास के मध्यकाल के प्रथम चरण अर्थात दिल्ली सल्तनत के नाम से जाना जाता है।
सल्तनतकाल में तुर्कों के विभिन्न वंशों सैयदों एवं लोदियों (अफगानों) ने 1206 ई0 से लेकर 1526 ई0 तक शासन किया इसके ममूलकवंश खिलजी वंश और तुगलकवंश जो तुर्कों में महत्वपूर्ण शाखा से सम्बन्धित थे वही लोदी अफगानी शासक के रूप में जाने जाते हैं।

दिल्ली सल्तनत-(1206-1526 ई0)

    सल्तनत काल में दिल्ली के तीन प्रशासनिक केन्द्र रहे। लाहौर, दिल्ली और आगरा। ऐबक ने प्रारम्भ में इन्द्रप्रस्थ को अपना केन्द्र बनाया । 1206 ई0 में तुर्की राजय की स्थापना के साथ लाहौर और दिल्ली राजधानी बनाये गये। मिश ने लाहौर से प्रशासनिक केन्द्र हटाकर दिल्ली तक तुर्की साम्राज्य को सीमित रखा। इस समय दिल्ली का एक अन्य नाम योगिनीपुर था। आगरा की स्थापना सिकन्दर लोदी ने किया और दिल्ली के साथ ही यहाँ भी प्रशासनिक केन्द्र बनाये।

ऐबक (1206-1210) (कुरान-खां)

    1206 ई0 में गोरी की मृत्यु के साथ ही भारतीय तुर्की राज्य पर उसके योग्य गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक का आधिपत्य स्थापित हो जाता है। यह अलग बात है कि फिरोज तुगलत के समय में दिल्ली सल्तनत के शासकों की जो सूची तैयार होती है उसमें ऐबक का नाम शामिल नही किया जाता है। ऐबक गोरी के अनेक योग्य गुलामों में एक था जिसने तराइन के द्वितीय युद्ध से लगातार गोरी की सेवा की। गोरी की अनुपस्थिति में भारतीय तुर्की राज्य को न सिर्फ सुरक्षित रखा अपितु उस समय हुए विद्रोहों को दबाने के साथ-साथ अनेक राजपूत राज्यों को परास्त कर दिल्ली की अधीनता स्वीकार करने हेतु बाध्य किया।
ऐबक के जीवन काल को तीन भागों में बाँटा जाता है-
(1) 1192-1206 ई0 तक कुशल सेनापति के रूप।
(2) 1206-1208 ई0 तक जब तक दासता से मुक्त नही हुआ सिपहसलार के रूप में कार्य करता रहा।
     1208 ई0 में गोरी में वंशज गयासुद्दीन ने इसे न सिर्फ दासत्व से मुक्त किया अपितु दिल्ली का स्वतन्त्र शासक बना लिया।
(3) 1208-10 ई0 तक ऐबक स्वतन्त्र शासक के रूप में शासन करता है। यह अलग बात है कि इसने सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की और न ही अपने नाम के सिक्के चलाएं, न ही अपने नाम का खुतवा पढ़ाया।
  • इसके समय की सबसे बड़ी समस्या समकालीन अन्य गुलामों यल्दौज, कुवाचा आदि से नवोदित दिल्ली राज्य को सुरक्षित करना था और मध्य एशियाई राजनीति से भारतीय राजनीति को पूर्णतया पृथक करना था।
  • इस समस्या से निपटने के लिए इसने वैवाहिक सम्बन्धों का सहारा लिया। कुवाचा से अपनी बहन का विवाह, यल्दौज से पुत्री का विवाह एवं अपने योग्य गुलाम मिश से अपनी बेटी का विवाह कर उत्तर भारत के महत्वपूर्ण इक्ता बदायूँ का इक्तादार बनाया।
  • यल्दौज की बढ़ती महत्वाकांक्षा को रोकने के लिए ऐबक ने गजनी पर आक्रमण किया और कई दिन तक उस पर अपना आधिपत्य बनाये रखा। इसके पश्चात् चल्दौज ने पुनः कभी दिल्ली की तरफ आँख उठाने की हिम्मत नहीं की। बंगाल पर आक्रमण कर वहाँ की अव्यवस्था को दूर कर तुर्की साम्राज्य के अधीन मिलाया। अनेक राजपूत राज्यों को परास्त कर दिल्ली के अधीन लाया। इसकी प्रा0 राजधानी लाहौर थी और बाद में दिल्ली को प्रशासनिक केन्द्र बनाया गया। 1210 ई0 में चैगान या पोलो खेलते हुए घोड़े से गिरकर इसकी मृत्यु हो गयी।
  • इसकी गणना दानी शासकों में की जाती है। समकालीन लोग इसे लाखवक्श और पीलवक्स के रूप में पुकारते हैं। लोग इसे हातिम के रूप में याद करते हैं। इसने हसन-ए-निजामी और फक्क-ए-मुदव्विर जैसे विद्वानों को संरक्षण दिया।
  • इसके निर्माण कार्यों में दिल्ली का कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद जो भारत की पहली मस्जिद मानी जाती है। अजमेर की अढ़ाई दिन का झोपड़ा जो मंदिर एवं मठों के ध्वांसावशेषों पर बना है इसी पर विग्रह राज चतुर्थ का प्रसिद्ध नाटक हरिकेली का कुछ अंश खुदा है। माना जाता है इसने पानीपत एवं संभल में भी मस्जिदों का निर्माण कराया था। भारत में चिश्ती संप्रदाय का पोषक था और उसके जुडे प्रसिद्ध सूफीसंत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की स्मृति में कुतुबमीनार का निर्माण कार्य कराया जिसे बाद में इल्तुतमिश ने पूरा किया।

आरामशाह (1210-1211) ई0

ऐबक के पश्चात् आरामशाह गद्दी पर बैठा। आरामाशाह से ऐबक के सम्बन्धों के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है। आरामशाह के अल्पकालीन शासन से परेशान होकर तुर्की अमीरों ने बदायूँ के इम्तादार इल्तुतमिश को निमन्त्रण दिया जिसने बदायूँ से दिल्ली आकर जद के मैदान में आरामशाह को परास्त कर दिल्ली पर अपना अधिकार स्थापित किया।

इल्तुतमिश (1212-1236) ई0

इल्तुतमिश दिल्ली के योग्य सुल्तानों में एक है जिसने पहली बार दोआब के आर्थिक महत्व को समझा तथा मध्य एशियाई राजनीति से भारतीय राजनीति को अलग किया। समकालीन संकटों का सफलतापूर्वक सामना किया और भारत में स्थायी तुर्की राज्य की फारसी पद्धति में स्थापना की और लाहौर की जगह दिल्ली को सल्तनत काल की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित किया। चंगेज खाँ जैसे बड़े संकट से कूटनीति से निपटा। तुर्कान-ए-चहलगानी का गठन कर प्रशासन पर पकड़ मजबूत की 1229 खलीफा से मानद पत्र एवं सहयोग प्राप्त कर धार्मिक उलेमाओं का सहयोग प्राप्त किया। अरबी फारसी पद्धति पर तुर्की साम्राज्य को व्यवस्थित किया। फारस से विद्वानों को बुलवाकर फारसीय प्रशासन की नींव डाली। अरबी पद्धति पर चाँदी के टंके (175 ग्रेन) एवं तांबे के जीतल जैसे सिक्के चलाए तथा अनेक वास्तुकलाओं का निर्माण कराया। भारतीय राजनीति को अनुकूल बनाकर इक्ता व्यवस्था लागू की।
इल्तुतमिश ऐबक का योग्य गुलाम था। जिसे ऐबक ने 1197 ई0 में अन्य गुलामों के साथ एक लाख टके में खरीदा था। धीरे-धीरे यह ऐबक का विश्वास पात्र बन गया। 1206 ई0 में गोरी के गोक्खर विद्रोह को दबाने के समय इसने उसकी महत्वपूर्ण सेवा की। इसके कार्यों से खुश होकर गोरी ने ऐबक से इसे दासत्व से मुफ्त करने को कहा। अतः यह अपने स्वामी से पूर्व ही दासत्व से मुक्त हो गया। ऐबक की मृत्यु के समय यह वदायूँ का इक्तादार था और अमीरों के अनुरोध पर इसने आरामशाह से दिल्ली की गद्दी छीनी।
यह दिल्ली का पहला संप्रभु शासक हुआ। तुर्की राज्य का पहला वास्तविक संस्थापक इसे ही कहा जाता है।
  • 1215 ई0 में तराईन के तृतीय युद्ध में यल्दौज को परास्त कर इस संकट से निजात पा लिया। कुवाचा इसके आक्रमण से डरकर स्वयं सिंधु नदी मूें कूदकर आत्म हत्या कर ली।
  • 1221 ई0 में चंगेजखां ख्वारिज्मशाह के राजकुमार मंगवनी का पीछा करते हुए सिंधु तक आ गया इसने न सिर्फ कूटनीति का प्रयोग करते हुए इसे शरण देने से इन्कार किया। अपितु उसके दूत की हत्या करवाकर नवोदित दिल्ली राज्य को चंगेज के चंगुल से बचा लिया।
  • 1229 ई0 में बगदाद के सभकलाी खलीफा अल्पमुस्तसिर ने इसे वस्त्र नगाडा मानदपत्र प्रदान किया।
  • इल्तुतमिश ने भारतीय एवं फारसी पद्धति पर आधारित प्रशासन का गठन किया। इसने भारत में व्यवस्थित इक्तेदारी व्यवस्था की स्थापना की।
    कुतुबमीनार का निर्माण कार्य पूरा कराया। न्याय के लिए सिंहों के गले में घण्टी बंधवाई। नागौर में मस्जिद एवं विशाल अतरकिन का दरवाजा बनाया। दिल्ली में शम्सीहौज एवं नासिरुदीन महमूद का गढ़ी का मकबरा बनवाया जो भारत का पहला मकबरा माना जाता है। वकात-ए-नासिरी के लेखक मिनहाज इस काल का प्रमुख विद्वान था।
प्रशासन में मदद के लिए तुर्कान-ए-चिहलगानी नामक दल का गठन किया। सल्तनत काल में वंशानुगत व्यवस्था चलाने का श्रेय एवं उत्तराधिकारी घोषित करने की परम्परा मिश ने चालू की। वास्तव में इस काल में उत्तराधिकार की कोई निश्चित परम्परा नही थी।
इल्तुतमिश अपने प्रिय पुत्र नसिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के पश्चात् अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी ग्वालियर अभियान से लौटने के बाद घोषित किया। नसिरुद्दीन महमूद की याद में उसने दिल्ली में पहला मकबरा जिसे गढ़ी का मकबरा कहा जाता है का निर्माण कराया।
इसका अन्तिम अभियान वमियान का माना जाता है। इसी दौरान बीमार होने के पश्चात् मृत्यु हो गयी। राजगद्दी को वंशानुगत बनाने वालों में दिल्ली का पहला शासक मिश को माना जाता है।
अमीरों ने इल्तुतमिश की मृत्यु के पश्चात् रजिया को गद्दी पर न बैठकार उसके योग्य पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज को गद्दी पर न बैठाया। यह एक कमजोर और अक्षम शासक था पूरा शासन इसकी विलासी महत्वाकांक्षा और क्रूर मां शाह तुर्कान के हाथों में था। यह कुचक्रणी थी। इतिहासकारों ने इसे दासी बताया है जो मिश के हरम में महत्वपूर्ण स्थान पाकर रुकनुद्दीन की मां बनी।
इतिहासकारों ने इसकी दान शीलता विद्वानों को संरक्षण, शिक्षा और महत्वपूर्ण संस्थाओं को प्रश्रय देने कर घूर-घूर प्रशंसा की है। परन्तु इसके क्रूर अत्याचार पूर्ण रवैये के कारण शीघ्र ही दिल्ली की जनता और तुर्की अमीर सुल्तान के खिलाफ हो गये और जिस दिन रुकनुद्दीन फिरोज दिल्ली से बाहर एक विद्रोह को दबाने गया हुआ था। रजिया ने नमाज अदा करते समय जुमा के दिन लाल वस्त्र पहनकर (जो न्याय का प्रतीक माना जाता था) दिल्ली की जनता से मदद की अपील की। तुर्की अमीरों एवं दिल्ली की जनता ने रजिया का साथ दिया। विद्रोहियों ने राजमहल पर आक्रमण कर शाह तुर्कान को मार डाला बाद में रुकनुद्दीन भी मारा गया और अन्ततः 1236 ई0 में मध्यकलीन भारत की प्रथम मुस्लिम महिला शासिका के रूप में रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठी।

’’सुल्तान रुक्नुद्दीन फिरोज शाह(1236 ई0)’’

यह इल्तुतमिश का पुत्र था। इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। परन्तु अमीरों ने उसके सबसे बड़े पुत्र रुक्नुद्दीन फिरोज को शासक बना दिया। इसके समय में शासन की बागडोर इसकी माँ शाह तुर्कान के हाथों में आ गई। यह एक तुर्की दासी थी। एक विद्रोह को दबाने के लिए जब यह राजधानी से बाहर गया हुआ था। तभी रजिया ने लाल वस्त्र पहनकर जनता से सहायता मांगी। उन दिनों लाल वस्त्र न्याय का प्रतीक माना जाता था। इस तरह जनता ने रजिया को गद्दी पर बिठा दिया।

रजिया (1236-1240)

    यह कुल 3 वर्ष 6 माह 6 दिन शासिका थी। पहली बार दिल्ली की जनता ने उत्तराधिकार के प्रश्न पर स्वयं निर्णय लिया था। रजिया ने पर्दा प्रथा त्याग दी तथा पुरुषों की तरह कुबा (कोट) एवं कुलाह (टोपी) पहन कर दरबार में आने लगी। इसके समय में चहल गानी में फूट पड़ गयी । इन अमीरों ने इख्तियाकद्दीन एतगीन के नेतृत्व में एक षडयन्त्र किया। यह उस समय अमीरे-हाजिब के पद पर था। रजिया पर एक अबीसिनियाईर सरदार मलिक याकूत से प्रेम करने का आरोप लगाया गया और वाद में उसकी हत्या कर दी गई। इस तरह रजिया का पतन हो गया। इस तरह रजिया के पतन का प्रमुख कारण तुर्की अमीरों की महत्वाकांक्षा माना जाता है अल्तुनिया से रजिया ने विवाह कर लिया।

मुइजुद्दीन बहराम शाह(1240-42 ई0)

    तुर्की अमीरों ने बहरामशाह को गद्दी पर बैठाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। अतः उन्होंने एक नये पद नाइब-ए-ममालिकात का सृजन करवाया। इस पद पर पहली नियुक्ति इक्तियारूद्दीन एतगीन की गई। इसने अपने घर नौबत और हाथी रखना शुरू किया। 1242 ई0 में बहरामशाह की हत्या कर दी गई।

’’अलाउद्दीन मशूदश्शाह’’

    बलबन ने इल्तुतमिश के प्रपौत्र नासिरूद्दीन महमूद को सुल्तान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

’’नासिरुद्दीन महमूद’’

    नासिरुद्दीन महमूद अलाउद्दीन मशुदशाह को हराकर दिल्ली की गद्दी पर बैठा था। इसी कारण यह स्त्रीवेश में दिल्ली आया। इसके बारे में कहा जाता है कि यह कुरान की प्रतिलिपियां तैयार कराता था और उसे बेचता था। इसने बलबन को अपना नाइब नियुक्ति किया। बलबन ने ही नाइब का सर्वाधिक उपभोग भी किया। भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग ने बलबन के विरूद्ध षड्यन्त्र रचकर इसे 1252-53 में नाइब के पद से हटवा दिया। इस समय नाइब के पद पर एक भारतीय मुसलमान इमादुद्दीन रेहान की नियुक्ति की गई। परन्तु अगले वर्ष ही इसे हराकर बलबन की पुनः नियुक्ति कर दी गई।
बलबन के समय में ही नासिरुद्दीन महमूद को खूब प्रतिष्ठा मिली। नासिरूद्दीन महमूद के समय का प्रसिद्ध इतिहासकार मिनहाजुद्दीन सिराज था। उसने अपनी पुस्तक तबकाते-नासिरी, नासिरुद्दीन महमूद को ही समर्पित की। इस प्रकार प्रथम इल्बारी वंश समाप्त हो गया। इसी शासक ने बलबन को उलूग खाँ की उपाधि प्रदान की।

द्वितीय इल्बारी वंश

संस्थापक-बलबन

बलबन(1266-1287)

    बलबन के राजगद्दी पर बैठने के बाद शासन का पहले वाला रूप बदल गया। इसने अपने शासन में फारसी परम्पराओं एवं नियमों को लागू किया। बलबन दिल्ली सल्तनत का पहला शासक है जिसने राजत्व का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।
बलबन का राजत्व सिद्धान्त:- बलबन का राजत्व सिद्धान्त प्रतिष्ठा शक्ति और न्याय पर आधारित था। उसने अपने दोनों पुत्रों मुहम्मद एवं महमूद को राजत्व के सम्बन्ध में निर्देश दिया है। इसके अनुसार राजा का पद ईश्वर द्वारा प्रदान किया जाता है अतः राजा का निरंकुश होना आवश्यक है। इसने दो उपाधियां नियावते खुदाई (राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिध) जिले अल्लाह (ईश्वर का प्रतिबिम्ब) धारण की।
प्रतिष्ठा-  बलबन ने स्वयं अर्थात राजा की तथा राज्य की प्रतिष्ठा को बढ़ाने का प्रयास किया इसने अपने को एक अर्द्ध पौराणिक ईरानी योद्धा अफरासियाब का वंशज बताया। बलबन ने निम्न जाति के व्यक्तियों से मिलने से इंकार कर दिया। एक भारतीय मुसलमान फख्र बाउनी के लाख प्रयत्नों के बावजूद भी बलबन ने उससे मिलने से इंकार कर दिया। राज दरबार में तुर्की प्रभाव को कम करने के लिए फारसी परम्परा पर आधारित सिजदा (घुटनों पर बैठकर सिर को झुकाना) एवं पैंगोस (पैरों को चूमना) प्रचलन अनिवार्य कर दिया। फारसी रीति-रिवाज पर आधारित नये वर्ष के त्योहार नौरोज को मनाना प्रारम्भ किया। उसने दरबार में हसने बोलने, मजाक करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया उसके इन प्रयत्नों से राज्य की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।
शक्ति:- राजा की शक्ति बढ़ाने के लिए बलबन ने अनेक कार्य किये। उसने चहलगानी को समाप्त कर दिया तथा अमीरों को अत्यन्त कड़े दण्ड दिये। पहली बार एक गुप्त चर विभाग वरीद-ए-मुमालिक की स्थापना की गई। (गुप्त चर व्यवस्था को संगठित करने वाला पहला सुल्तान अलाउद्दीन खिलाजी था) इसने एक सैन्य विभाग दीवाने अर्ज की भी स्थापना की। (पहली बार स्थाई सेना रखने वाला सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी था) इस तरह से उसकी सैनिक शक्ति में वृद्धि हुई। मंगोल आक्रमणों से सुरक्षा के लिए उसने उत्तर-पश्चिमी सीमा-प्रान्त में अनेक दुर्ग बनवाये उसका पुत्र मुहम्मद मंगोलों से लड़ता हुआ मारा गया। इसी कारण वह खाने शहीद के नाम से विख्यात हुआ। बरनी ने लिखा है कि इन्हीं सब उपायों के कारण वह दक्षिण की विजय पर ध्यान नही दे सका।
न्याय:- बलबन ने न्याय में किसी तरह का भेदभाव नही किया। उसने राजवंश से सम्बन्धित लोगों को भी अत्यधिक कड़े दण्ड दिये। बलबन के कड़े प्रयासों के कारण विद्रोहों के नगर के नाम से विख्यात लखनौती नगर के विद्रोह समाप्त हो गये। उसने यहाँ के शासक तुगरिल खाँ का कड़ाई से दमन किया।
बलबन ने पहली बार सिक (जिला) को प्रचलित किया। उसने इक्तादार पर नियंत्रण के लिए एक अन्य अधिकारी ख्वाजा की नियुक्ति की।
1287 ई0 में बलबन की मृत्यु हो गई बरनी ने लिखा है कि उसकी मृत्यु पर अमीरों ने चालीस-दिनों तक शोक मनाया और वे भूमि पर सोये। बलबन अपने सैन्य अभियानों को अन्त तक गुप्त रखता था।

कैकुबाद एवं शम्सुद्दीन क्यूमर्स (1287-90)

    बलबन की मृत्यु से पूर्व उसने स्वयं कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी निुयक्ति किया था। परन्तु दिल्ली के कोतवाल फखुरुद्दीन मोहम्मद ने कैकुबाद को गद्दी पर बैठाया। कैकुबाद ने अपना सेनापति जलालुद्दीन खिलजी को बनाया इसी बीच कैकुबाद को लकवा मार गया अतः सरदारों ने उसके तीन वर्षीय पुत्र शम्सुद्दीन क्यूमर्स को सुल्तान घोषित कर दिया। जलालुद्दीन खिलजी ने क्यूमर्स का वध करके स्वयं गद्दी हथिया ली और एक नये वंश खिलजी वंश की नींव रखी।

खिलजी वंश

 खिलजी वंश(1290-1320)

खिलजी द्वारा सत्ता स्थापित करने को क्रांति कहा जाता है। हलांकि इतिहासकारों में इस बात को लेकर मतभेद है कि खिलजी तुर्क थे या नही समकालीन इतिहासकार बरनी अपनी पुस्तक तारीखे फिरोजशाही में इन्हे तुर्क नही मानता लेकिन ऐसा माना जाता है कि तुर्कों की कुल 64 जातियों में से एक भारत आने से पूर्व यह जाति अफगानिस्तान में खिलजी नामक क्षेत्रों में रहती थी। खिलजी क्रांति इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि यह राज्य जातीय उच्चता या खलीफा की स्वीकृत पर आधारित नही थी, बल्कि शक्ति के बल पर आधारित थी।

जलालुद्दीन खिलजी(1290-96)

राजधानीः-किलोखरी (इस नगर का निर्माण कैकुबाद ने करवाया था)
अपने राज्याभिषेक के एक वर्ष बाद ही इसने दिल्ली में प्रवेश किया इसके काल की प्रमुख उपलब्धियां निम्नलिखित हैं।

  1. जलालुद्दीन खिलजी 70 वर्ष की अवस्था में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। वह दिल्ली सल्तनत का पहला शासक था जिसने स्वीकार किया कि राज्य का आधार उसकी प्रजा का समर्थन है। युद्धों के बारे में उसकी राय थी ’’उसे मुसलमानों का रक्त बहाने की आदत नही है’’
  2. इसने एक नये विभाग दिवाने-वकूफ का गठन किया जो व्यय के कागजात की देखभाल करने के लिए था।
  3. इसके समय में मंगोलों का आक्रमण अब्दुल्ला के नेतृत्व में हुआ। इसने उससे समझौता कर लिया तथा उन्हें दिल्ली में ही बसा दिया यह स्थान आज भी मंगोलपुरी के नाम से जाना जाता है। इन मंगोलों को नव मुस्लिम कहा गया।
  4. इसके समय में दिल्ली के एक सन्त सीदीमौला को फाँसी दे दी गई।

इसकी हत्या इसके भतीजे अलाउद्दीन खिलजी ने गंगा के तट पर कड़ामानिक में की और वह स्वयं शासक बन बैठा।

अलाउद्दीन खिलजी(1296-1316 ई0)

बचपन का नाम-अली गुर्शप
राज्याभिषेक-बलबन के लाल महल में।
अलाउद्दीन खिलजी विश्व विजयी सम्राट बनना चाहता था। परन्तु अपने मित्र एवं दिल्ली के कोतवाल अलाउलमुल्क की, सलाह पर पहले भारत विजय का निश्चय किया। इसने अपने सिक्कों पर सिंकन्दर द्वितीय एवं सिकन्दर-ए-सानी की उपाधि धारण की। राज्य में विद्रोहों के दमन के लिए उसने चार अध्यादेश जारी किये।

  1. दान, उपहार एवं पेंशन के रूप में दी गई भूमि को अमीरों से वापस ले लिया।
  2. गुप्तचर विभाग को संगठित कर वरीद के साथ एक अन्य अधिकारी मुनहियन की नियुक्ति की।
  3. अमीरों के अपासी मेल-जोल सार्वजनिक समारोह एवं विवाह पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
  4. मद्यपान भांग खाने एवं जुआ खेलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

राजस्व सिद्धान्त:-बलन की तरह ही अलाउद्दीन का राजत्व सिद्धान्त भी प्रतिष्ठा शक्ति और न्याय पर आधारित था। अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन के लिए विश्व का सुल्तान युग का विजेता, एवं जनता का चरवाह, आदि शब्द प्रयोग किये हैं। बलबन के विपरीत इसने अपने कुल की प्रतिष्ठा पर कोई ध्यान नही दिया परन्तु राज्य की प्रतिष्ठा इसने बहाल की यद्यपि यह खलीफा की शक्ति में विश्वास करता था परन्तु प्रशासन में उसके हस्तक्षेप को स्वीकार नही करता था। उसने स्वयं लिखा है कि ’’मैं ऐसे आदेश देता हूँ जो राज्य के लिए हितकर होते हैं मैं यह नहीं जानता की शरियत् में उनकी अनुमति है या नही। मुझे यह भी नही मालूम की न्याय के अन्तिम दिनों में अल्लाह मेरे साथ कैसा व्यवहार करेगा।’’
अलाउद्दीन की विजय:- अलाउद्दीन की विजयों को दो भागों में बांटा जा सकता है –

  1. उत्तर भारत की विजय
  2. दक्षिण भारत की विजय

1. उत्तर भारत की विजय:-इस विजय में उसके सेनानायकों उलूग खां एवं नुसरत खाँ का प्रमुख योगदान था। अलाउद्दीन ने सर्वप्रथम गुजरात की विजय की।

  1. गुजरात विजय (1298):-यह अलाउद्दीन की पहली विजय थी जो उसके सेना नायकों उलूगखाँ एवं नुसरत खाँ के सहयोग से हुई। यहाँ का राजा कर्ण अपनी पुत्री देवल देवी के साथ भाग कर देवगिरि के शासक रामचन्द्र के यहाँ शरण ली। उसकी पत्नी कमला देवी दिल्ली भेज दी गयी। गुजरात विजय के दौरान ही नुसरत खाँ ने मलिक काफूर को 1000 दीनार में खरीदा इसी कारण मलिक काफूर का एक नाम हजार दीनारी भी पड़ गया।
  2. जैसलमेर पर विजय (1299):-यहाँ का शासक द्दा था।
  3. रणथम्भौर पर विजय (1301 ई0):- यहाँ का शासक हम्मीर देव था। तारीखे अलाई नामक ग्रन्थ से पता चलता है कि हम्मीरदेव एवं उसके परिवार के लोगों ने जौहर कर लिया। यह जौहर का प्रथम उल्लेख है। इस प्रकार जौहर प्रथा सती प्रथा के विपरीत पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों द्वारा किया जाता था।
  4. चित्तौड़ की विजय (1303 ई0) शासक:- राणा रतन सिंह की रानी पद्यमिनी ने भी जौहर कर लिया। इस प्रकार मेवाण पहली बार अलाउद्दीन द्वारा जीता गया। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर ख्रिजावाद रख दिया।
  5. मालवा विजय (1305) शासक:- महलक देव

2. दक्षिण भारत विजय:-दक्षिण भारत की विजय उसके प्रसिद्ध सेनानायक मलिक काफूर के नेतृत्व में हुई। दक्षिण विजय का मूल उद्देश्य यहाँ से धन प्राप्त करना था। उसने दक्षिण के राज्यों को जीतने के बावजूद उन्हें अपने राज्य में नहीं मिलाया। इसीलिए अलाउद्दीन की दक्षिण विजय को धर्म विजय कहा जाता है इन विजयों का क्रम निम्नलिखित है।
देवगिरि (1298-1307-08-12):- देवगिरि में यादवों का शासन था। यहां का शासक राम चन्द्र देव था। मलिक काफूर ने 1298 ई0 में उसे पराजित किया परन्तु बाद में उससे सन्धि कर ली गई। अलाउद्दीन ने रामचन्द्र का राज्य वापस कर दिया तथा उसे राम-रायन की उपाधि दी गई। इसके अतिरिक्त उसे 100000 स्वर्ण टका तथा गुजरात में नौसारी की जागीर दी गई।
तिलंगाना विजय (1310):- यहाँ काकतीयों का शासन था। इस समय प्रताप रुद्रदेव शासन कर रहा था। उसने मलिक काफूर को कोहिनूर हीरा भेंट किया। इसकी राजधानी वारंगल थी।
कोहिनूर हीरा:- कोहिनूर हीरा सर्वप्रथम गोल कुण्डा की खानों से प्राप्त किया गया था। प्रताप रुद्रदेव ने पहली बार इसे अलाउद्दीन को भेंट में दिया। इसका दुबारा उल्लेख तब आता है जब मुगल शासक शाहजहाँ को गोलकुण्डा के प्रधानमंत्री मीर जुमला ने भेंट किया। जब भारत में 1739 ई0 में नादिर शाह (फारस) का आक्रमण होता है तब यह फारस चला गया वहीं से यह अफगानिस्तान पहुँच गया। अफगानिस्तान के शासक शाहशुजा ने इसे सिक्ख शासक रणजीतसिंह को भेंट में दिया। जब डलहौजी ने सिक्ख राज्य का विलय कर लिया तब अन्तिम सिक्ख शासक दिलीप सिंह से यह हीरा इग्लैंड की महारानी के पास पहुँच गया सम्प्रति यह इंग्लैंड में है।

होयसल

राजधानी-द्वारा समुद्र     
शासक-वीर वल्लाल तृतीय
होयसल अभियान मलिक काफूर ने 1311 में सम्पन्न किया। वीर वल्लाल तृतीय ने आत्म समर्पण कर दिया। अलाउद्दीन ने इसके राज्य को वापस कर दिया।

पाण्ड्य राज्य

राजधानी -मदुरा    
शासक-सुदंर पाठ्य एवं वीर पाठ्य
पाण्ड्य राज्य पर शासन के लिए दो भाइयों सुन्दर पाण्ड्य एवं वीर पाण्ड्य के बीच झगड़ा चल रहा था। काफूर ने सुन्दर पाण्ड्य का पक्ष लिया परन्तु वीर पाण्ड्य को पराजित न किया जा सका सैनिक दृष्टि से यह अभियान सफल न रहा। परन्तु धन प्राप्ति की दृष्टि से यह सर्वाधिक सफल रहा।
नोट:- यूरोपीय यात्री माॅर्को पोलो 1273 ई0 में पाण्ड्य राज्य पहुँचा था उस समय वहाँ का शासक मारवर्मन कुलशेश्वर था। उसने इस शासक की इस बात के लिए आलोचना की यह अपना सारा धन घोड़ों को खरीदने में लगा देता है। माॅर्को पोलो एक मात्र ऐसा यात्री है जिसने सबसे अधिक यात्रा की।
मंगोल आक्रमण:-अलाउद्दीन खिलजी के समय में ही सर्वाधिक मंगोल आक्रमण हुए। 1297 ई0 में कादिर के नेतृत्व में 1299 में सलदी के नेतृत्व मे। 1299 कुतलग ख्वाजा के नेतृत्व में। 1303 में तार्गी के नेतृत्व मे। 1305 में अलीबेग और तार्गी के नेतृत्व में। 1306 में इकबाल मन्द के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण हुए। मंगोलों से लड़ने का श्रेय इसके दो सेना नायकों जफर खाँ और उलूग खाँ को जाता है।

’’प्रशासनिक सुधार’’

अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सत्तनत का पहला सुल्तान था। जिसने प्रशासनिक सुधारों की ओर विशेष ध्यान दिया उसके प्रशासनिक सुधार निम्नलिखित हैं-
1. दीवान-ए-रियासत का गठन:- यह अलाउद्दीन का आर्थिक विभाग था। बाजार नीति का कार्यान्वयन इसी के जिम्मे था।
2. दीवाने-ए-मुस्त खराज:- अधिकारियों के नाम बकाया राशि वसूल करने के लिए इस विभाग की स्थापना की गई थी।
3. गुप्तचर विभाग:-गुप्तचर व्यवस्था को पूर्ण रूप से संगठित करने वाला अलाउद्दीन खिलजी ही था।
4. सैन्य संगठन:- अलाउद्दीन दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने अपनी सेना को दशमलव पद्धति पर संगठित किया हलांकि दशमलव पद्धति पर सेना को आदर्श रूप में संगठित करने वाला सुल्तान मु0 तुगलक था।
5. डाक व्यवस्था:- अलाउद्दीन ने डाक व्यवस्था की शुरूआत की। परन्तु इसे व्यवस्थित रूप से संगठित करने का श्रेय ग्यासुद्दीन तुगलक को जाता है।
अलाउद्दीन के आर्थिक सुधार
अलाउद्दीन के आर्थिक सुधारों से हमारा तात्पर्य है उसके भू-राजस्व सुधार एवं बाजार नियंत्रण नीति व्यवस्था।

भू-राजस्व सुधार

अलाउद्दीन ने सर्वप्रथम मिल्क (सम्पत्ति) ईनाम और वक्फ (उपहार) के अन्तर्गत दी गई भूमि को वापस लेकर उसे खालसा भूमि में मिला लिया। साथ ही मुकदमों (मुखिया) खूतो (जमींदार) एवं बलाहारों (किसान) के विशेष अधिकार को वापस ले लिया।

उसने भूमि की माप के आधार पर लगान निश्चित किया। माप की इकाई बिस्वा थी। इस प्रकार भूमि की माप के आधार पर लगान निर्धारित करने की प्रक्रिया को मशाहत कहा गया। अलाउद्दीन की यह भू-राजस्व व्यवस्था बाद में सिकंदर लोदी की भू-राजस्व व्यवस्था का आधार बनी। अलाउद्दीन ने भू-राजस्व की मात्रा (खराज) को 50%निर्धारित किया। यद्यपि अलाउद्दीन ने भू-राजस्व किसानों से निर्धारित किया लेकिन वह जमींदारों को पूर्णतयः समाप्त न कर सका।
अन्य कर:-अलाउद्दीन ने दो नये कर घरीकर (घरों पर) एवं चरीकर (दुधारू पशुओं पर) दो नये कर लगाये। उसने लूट के माल (खम्स) में राज्य का हिस्सा 80ः कर दिया। जबकि सैनिकों को केवल 20ः दिया गया।

’’बाजार नियंत्रण नीति’’

अलाउद्दीन के आर्थिक सुधारों में सबसे प्रमुख सुधार था उसकी बाजार नियंत्रण नीति। इसका उल्लेख बरनी ने अपनी पुस्तक तारीखे फिरोजशाही में किया है।
गद्दी पर बैठने के बाद ही अलाउद्दीन की इच्छा सम्पूर्ण भारत को जीतने की थी। इसके लिए एक बड़ी सेना की आवश्यकता थी। मोरलैण्ड ने यह अनुमान लगाया है कि यदि वह सामान्य वेतन पर भी सेना को संगठित करता तब धन मात्र पाँच वर्षों में ही समाप्त हो जाता। अतः उसने सैनिकों के वेतन को कम करने का निश्चय किया। परन्तु उन्हें किसी तरह की परेशानियों का सामना न करना पड़े इसलिए उसने उनकी आवश्यक वस्तुओं के दाम निश्चित कर दिये। इसे ही उसकी बाजार नीति नियंत्रण नीति कहा गया।
क्षेत्र:- बाजार नियंत्रण नीति के क्षेत्र को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है मोर लैण्ड के अनुसार यह केवल दिल्ली और उसके आस-पास के ही क्षेत्रों में लागू था। जबकि वी0पी0 सक्सेना का मत है कि यह पूरे भारत वर्ष में लागू था। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अलाउद्दीन ने अपनी बाजार नियंत्रण नीति को सम्पूर्ण भारत में लागू करने की कोशिश की परन्तु उसे सफलता दिल्ली और उसके आस-पास क्षेत्रों में ही मिली।
अलाउद्दीन ने बाजार नियंत्रण नीति में कुल चार बाजार स्थापित किये- गल्ला मण्डी, सराय-ए-अदल, घोड़ो दासों एवं मवेशियों का बाजार एवं सामान्य बाजार इसमें गल्ला-ए-मण्डी सबसे सफल रही।
गल्ला-ए-मण्डी अथवा गल्ला बाजार:- अलाउद्दीन ने इस बाजार को सफल बनाने के लिए किसानों से सारा अनाज दिल्ली में मंगवाया इसके लिए उसने दो तरह के व्यापारियों की नियुक्ति की प्रथम घुमक्कड़ व्यापारी एवं द्वितीय स्थायी व्यापारी। घुमक्कड़ व्यापारी किसानों का सारा अनाज निश्चित दर पर खरीद लेते थे और उसे दिल्ली में स्थित स्थाई व्यापारियों को दे देते थें इस तरह गाँव का सारा अनाज दिल्ली में आ जाता था। और इसे निश्चित कीमतों में बेंचा जाता था। अलाउद्दीन ने बाजार व्यवस्था को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित विभाग अधिकारियों की नियुक्ति की।
1. दीवान-ए-रियासत:- यह आर्थिक अधीक्षक
2. सहना-ए-मण्डी:- बाजार अधीक्षक
3. वरीद और मुनहियर:- गुप्त चर
4. नाजिर:- माप-तौल का अधिकारी
5. परवाना नवीस- परमिट का अधिकारी
6. मुहत्सिब:- सेंसर का अधिकारी या आचरण पर नजर रखने वाला अधिकारी।
इन अधिकारियों में कोतवाल शामिल नही था। क्योंकि वह नगर का प्रमुख अधिकारी होता था।
बाजार सम्बन्धी अधिनियम:- अलाउद्दीन के बाजार से सम्बन्धित आठ अधिनियम प्रमुख थे-
प्रथम अधिनियम:- यह सभी प्रकार के अनाजों का भाव निश्चित करने से सम्बन्धित था। सरकार द्वारा निश्चित प्रमुख अनाजों के प्रतिमन की दरें इस प्रकार थीं।
गेहूँ – 7.5 जीतल प्रति मन।
जौ- 4 जीतल प्रतिमान।
चावल दाले एवं चना-5 जीतल प्रति मन।
अन्य छोटे अनाज – 3 जीतल प्रतिमान।
दूसरा अधिनियम:-इस अधिनियम के द्वारा मलिक कबूल उलूग खनी को सहना-ए-मण्डी नियुक्त किया गया।
तृतीय अधिनियम:– सरकारी गोदामों में गल्ला एकत्रित करने से सम्बन्धित था।
चैथा अधिनियम:- राज्य के सभी अन्य वाहक शहना-ए मण्डी के अधीन कर दिये गये और उन्हें दिल्ली के आस-पास बसा दिया गया।
5वाँ अधिनियम:- इतिहास अर्थात जमाखोरी से सम्बन्धित था।
6ठवाँ अधिनियम:- प्रशासकीय एवं राजस्व अधिकारियों से कहा जाता था कि वे किसानों द्वारा व्यापारियों को निश्चित मूल्य पर अनाज दिलायेंगें।
7वाँ अधिनियम:- सुल्तान को प्रतिदिन मण्डी से सम्बन्धित रिपोर्ट तीन स्वतन्त्र सूत्रों से प्राप्त होती थी-शहना-ए-मण्डी, बरीद, और मुनैहियन।
8वाँ अधिनियम: सूखे का अकाल के समय अनाजों की राशनिंग से सम्बन्धित था।
सराय-ए-अदलः- इसका शाब्दिक अर्थ है न्याय का स्थान, परन्तु यह निर्मित वस्तुओं से सम्बन्धित बाजार था, इसे सरकारी अनुदान भी प्राप्त था, यहाँ 10 हजार टके के मूल्य तक की वस्तुओं बेची जा सकती थी, यहाँ बेची जाने वाली वस्तुएं में कीमती वस्त्र, मेवे, जड़ी-बुटियां, घी, चीनी इत्यादि प्रमुख थे, इस बाजार के लिए भी पाँच अधिनियम बनाये गये।
प्रथम नियम:- सराय-ए-अदल की स्थापना दिल्ली में बदाँयू गेट के पास।
दूसरा नियम:- इस अधिनियम में बरनी कुछ वस्तुओं के मूल्यों की सूची देता है। रेशमी कपड़ा 2 टका से लेकर 16 टका तक सूती कपड़ा 6 जीतल से लेकर 24 जीतल तक, मिश्री 2  1ध्2 जीतल प्रति सेर, चीनी 11ध्2 जीतल, 1 सेर देशी घी 1 जीतल में और नमक 1 जीतल में 5 सेर।
तीसरा नियमः-व्यापारियों के पंजीकरण से सम्बन्धित था। सुल्तान ने साम्राज्य के सभी व्यापारियों को आदेश दिये की वे दीवाने रियासत अथवा वाणिज्य मंत्रालय में अपना पंजीकरण करायें।
चैथा नियम:- मुल्तानी व्यापारियों से सम्बन्धित था। मुल्तानी व्यापारी कपड़े के व्यापार से सम्बन्धित थे, इन्हें सराय-ए-अदल को नियंत्रित करने का अधिकार दिया गया।
5वाँ नियम:– परवाना नवीस अथवा परमिट देने वाले अधिकारी की नियुक्ति की गई।
घोड़ो, दासों एवं मवेशियों का व्यापार:- इन तीनों बाजारों पर सामान्यतः चार नियम लागू थे।
(1) किस्म के आधार पर मूल्य निर्धारण।
(2) व्यापारियों एवं पूंजीपतियों के बहिष्कार।
(3) दलालों पर कठोर नियंत्रण।
(4) सुल्तान द्वारा वारन्ट निरीक्षण।
सेना के लिए घोड़ों की तीन श्रेणियाँ थी सबसे अच्छे किस्म का घोड़ा 80-40 टके के बीच में मिलता था। मध्यम किस्म का घोड़ा 80-90 टके के बीच में मिलता था। तृतीय श्रेणी का घोड़ा 65-70 टके के बीच। सामान्य कहूँ 12-20 टके के बीच। दासों के दाम उनकी गुणवत्ता पर निर्भर थे, अच्छे किस्म के दास 20-30 टके के बीच मिलते थे, जबकि दासियों 20-40 टके के बीच, सामान्य दास 7-8 टके तक मिल जाते थे मवेशियों की कीमत भी भिन्न-भिन्न थी, दूध देने वाली भैंस 10-12 टके तथा दूध देने वाली गाय 3-4 टके के बीच मिलती थी, बकरी या भेड़ 10-12 और 14 जीतल तक मिल जाती थी।
सामान्य बाजार:- बड़े बाजारों के अतिरिक्त छोटी-छोटी वस्तुओं के दाम भी निश्चित थे- जैसे-मिठाई, सब्जी, टोपी, मोजा, चप्पल, कंघी आदि।
अलाउद्दीन की बाजार नियंत्रण नीति अपने उद्देश्य में सफल रही, अलाउद्दीन खिलजी एक बड़ी सेना के द्वारा पूरे भारत को जीतना चाहता था। अपने इस उद्देश्य में वह सफल रहा, उसके समय में न तो वस्तुओं दाम बढ़े और न ही घटे। बरनी इसे मध्य युग का चमत्कार कहा है। इब्नबतूता 1333 में जब दिल्ली आया तो उसे अलाउद्दीन द्वारा रखा हुआ चावल खाने को मिला। परन्तु यदि समग्ररूप में देखा जाय तो यह व्यवस्था असफल रही, अलाउद्दीन के बाद किसी अन्य सुल्तान ने इस व्यवस्था को चालू नही रखा। गयासुद्दीन तुगलक गद्दी पर बैठते ही इस व्यवस्था को पलटकर पुरानी गल्ला बक्शी व्यवस्था को पुनः लागू किया वस्तुतः उनकी बाजार व्यवस्था आर्थिक सिद्धान्तों के प्रतिकूल थी, डा0 तारा चन्द ने लिखा है कि अलाउद्दीन ने सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी को ही मार डाला।
शिहाबुद्दीन उमर:- यह अलाउद्दीन की मराठा पत्नी से उत्पन्न 6 वर्षीय पुत्र था, इसका संरक्षक मलिक काफूर बना, बाद में अलाउद्दीन के पुत्र मुबारक खिलजी काफूर की हत्या कर स्वयं शासक बन बैठा।
मुबारक खिलजी (1316-20):- यह अलाउद्दीन का पुत्र था, यह दिल्ली सल्तनत का एक मात्र सुल्तान था, जिन्होंने खलीफा की सत्ता को नकार करके स्वयं को ही खलीफा कहा और-(1) अलवासिक विल्लाह (2) खलिफत-उल-लह (3) खलीफा-एक- काबुल अलीमिन (4) अमीर-उन-योमिनी।
मुबारक शाह खिलजी दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने दक्षिण भारत को प्रत्यक्ष नियन्त्रण में लाने का प्रयत्न किया तथा देवगिरि को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया, कभी-कभी यह राजदरबार में स्त्रियों का वस्त्र पहनकर आ जाता था, इसके वजीर खुसरो शाह ने इसकी हत्या कर दी।
नासिरुद्दीन खुसरो शाह (1320 ई0):- इसकी उपाधि पैगम्बर के सेनापति की थी। यह गुजरात की निम्न जाति का हिन्दू या जो मुसलमान बन गया था, इस प्रकार खुसरोशाह दिल्ली सल्तनत का एक मात्र शासक था जो मूल रूप से हिन्दू था इसके शासन को निजामुद्दीन औलिया ने भी मान्यता प्रदान की थी, इसकी हत्या इसके सेनापति गाजी मलिक ने कर दी और एक नये वंश तुगलक वंश की नींव डाली।

तुगलकवंश (1320-25 ई0),सैयद वंश (1414-50)

तुगलकवंश (1320-25 ई0)

गयासुद्दीन तुगलक

यह दिल्ली सल्तनत का पहला शासक था जिसने अपने नाम के पहले गाजी शब्द लगाया, दिल्ली की गद्दी पर बैठते ही इसने बाजार नियंत्रक नीति को समाप्त कर दिया, इसके काल की प्रमुख घटना निम्नलिखित थी।
(1) इसके काल में डाक व्यवस्था को पूर्ण रूप में सुसंगठित किया, हलांकि इसे शुरू करने का श्रेय अलाउद्दीन खिलजी को जाता है।
(2) नहरों का निर्माण करने वाला पहला सुल्तान था, परन्तु नहरों का निर्माणकर्ता फिरोज तुगलक को माना जाता है।
(3) गयासुद्दीन ने अमीरों के फवाजिल (अधिशेष लगान) को 1/10 से 1/5 तक के अन्तर को माॅफ कर दिया।
(4) 1323 में तेलंगाना के शासक प्रताप रूद्र देव को इसके पुत्र जूना खाँ ने पराजित कर दिया तथा वारंगल को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया एवं इसका नाम बदलकर सुल्तानपुर रख दिया गया।
(5) यह संगीत कला का विरोधी था, अपनी बंगाल विजय से लौटते समय इसने दिल्ली के सूफी सन्त औलिया से दिल्ली छोड़ देने के लिये कहा। औलिया ने कहा-’’हनूज दिल्ली दूरान्य’’ अर्थात दिल्ली अभी बहुत दूर है। तुगलकाबाद से 8 कि0मी0 दूर स्थित अफगानपुर में उसके लड़के जूनाखाँ द्वारा स्वागत के निर्माण हेतु निर्मित लकड़ी के महल के गिर जाने से उसकी मृत्यु हो गयी, एक सूफी सन्त रुकुनुद्दीन कुछ समय पहले ही उस दरवाजे से बाहर निकले थे। गयासुद्दीन के मरने पर विद्वानों ने अलग-अलग कारण बताये हैं, बरनी के अनुसार बिजली गिरने से मकान गिर गया, जबकि इब्नबतूता इसे एक षडयन्त्र मानता है, इसकी मृत्यु के बाद इसका पुत्र जूना खाँ मुहम्मद तुगलक के नाम से गद्दी पर बैठा।

मुहम्मद तुगलक (1325-1351ई0)

अन्य नाम -जौना खाँ

मुहम्मद तुगलक दिल्ली के सुल्तानों में सबसे अधिक विद्वान एवं पढ़ा लिखा था, इसामी और बरनी लिखते हैं कि सम्राट के योगियों से सम्बन्ध थे, इसके जैन सन्तों से भी सम्बन्ध थे, एक समय वह जिन प्रभासूरि के साथ आधी रात तक बात करता रहा, उन्हें बहुत सी वस्तुओं के साथ 1000 गाय दान में दिया, यह दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जो हिन्दुओं के त्योहारों में भी भाग लेता था, यह प्रथम सुल्तान था जिसने सती प्रथा पर रोक लगा दी। इसके समय में सरकारी सेवाओं में योग्यता के आधार पर सभी के लिए दरवाजे खुले थे, हिन्दुओं को भी बड़े-बड़े पद दिये गये

  1. जूनार शिलालेख से पता चलता है कि साईराज जो एक हिन्दू था मुहम्मद तुगलक का मंत्री थी।
  2. बरनी ने तारीखे फिरोजशाही में कई हिन्दू अधिकारियों के नाम वर्णित किये हैं- धारा नामक एक हिन्दू दक्षिण भारत का नायब वजीर था, सेहबन का सूबेदार रतन भी हिन्दू था, गुलबर्गा का सूबेदार मीरन राय भी हिन्दू था।

स्वर्गद्वारी:- यह कन्नौज के निकट गंगा के तट पर स्थित एक नगर था। जिसका निर्माण मुहम्मद तुगलक ने दिल्ली में अकाल के समय करवाया था, यह 1338 में बनवाया गया था तथा सुल्तान यहाँ 2 1ध्2 वर्ष तक रहा।
खलीफा से खिल्लतः- तुगलक ने मिश्र के खलीफा से खिल्लत प्राप्त की इन्हें अब्बासी खलीफा कहा जाता था। यह खिल्लत 1339-40 में प्राप्त की गई। इस समय अब्बासी खलीफा का नाम मुस्तकफी मिल्लाह था इसी का नाम अपने सिक्कों पर अंकित करवाया परन्तु खिल्लत वास्तविक रूप से इसके बाद के अब्बासी खलीफा अल-हमीम द्वितीय से प्राप्त की गई।
मु0 तुगलक की योजनाएँ:- मु0 तुगलक की पाँच योजनाएँ अत्यन्त प्रसिद्ध हैं जिनका उल्लेख बरनी ने अपनी पुस्तक तारीखे-फिरोजशाही में किया है। उसने इन योजनाओं का कोई क्रम नहीं लिखा है परन्तु जिस क्रम में वे योजनाएँ वर्णित हैं वे निम्नलिखित है-
1. दोआब में भू-राजस्व वृद्धि:- मु0 तुगलक ने दोआब का भू-राजस्व बढ़ाकर 50%कर दिया परन्तु इसी समय अकाल पड़ गया। अतः किसान कर देने में असफल रहे लेकिन जब उनसे जबरदस्ती किया जाने लगा तब उन्होंने अपनी फसलों को जला दिया इस प्रकार उसकी पहली योजना असफल हो गई। मध्य काल में यह पहला कृषक विद्रोह था। मु0 तुगलक को जब बाद में वस्तुस्थिति का पता चला तब उसने कृषि कर्ज के रूप में किसानों को सोढ़र ऋण दिये। मु0 तुगलक ने पहली बार किसानों को तकाबी (आपत्ति के समय) ऋण प्रदान किये। उसने कृषि के विकास के लिए दीवाने-अमीर कोही नामक एक कृषि विभाग की स्थापना भी की लेकिन उपर्युक्त कार्य बहुत देरी से किये गये इसी कारण सफल न रहे। इस प्रकार उसकी प्रथम योजना असफल हो गयी।
2. राजधानी परिवर्तन (1326-27) मु0 तुगलक की दूसरी योजना अपनी राजधानी का दिल्ली से दौलताबाद स्थानान्तरण किया। उसने देवगिरि को दौलताबाद (महाराष्ट्र में स्थित) नाम दिया। इसके पहले मुबारक खिलजी ने देवगिरि का नाम बदल कर कुतुबाबाद रख दिया था। दिल्ली से दौलताबाद की दूरी करीब 700 मील थी। विद्वानों ने इस राजधानी परिवर्तन के निम्नलिखित कारण बताये हैं-

  1. इब्नबतूता:- इसके अनुसार दिल्लीवासी सुल्तान को गाली लिखकर चिठ्ठियां लिखते थे अतः उसने राजधानी का स्थानान्तरण कर दिया।
  2. बरनी:- इसके अनुसार दक्षिण में विस्तार हो जाने के बाद दौलताबाद केन्द्र में स्थित था। अतः वह अपनी राजधानी मध्य में ले जाना चाहता था। उसने यह भी लिखा है कि सुल्तान मध्यम श्रेणी और उच्च श्रेणी का विनाश करना चाहता था।
  3. गार्डनर:- इनके अनुसार मंगोल आक्रमणों के सुरक्षा के लिए ही सुल्तान ने राजधानी का परिवर्तन किया।
  4. मेहदी हसन:- दक्षिण में मुसलमानों की कमी के कारण देवगिरि को दूसरा केन्द्र बनाया।
  5. इसामी:- सुल्तान दिल्ली के लोगों पर क्रुध रहता था। इसलिए वह उन्हें वहाँ से निकालना चाहता था।

उपरोक्त कारणों में बरनी का कारण जिसमें उसने प्रशासनिक कारणों की चर्चा की है, सर्वाधिक मान्य है। राजधानी स्थानान्तरण के 8 वर्ष बाद ही पुनः 1335 ई0 में अपनी राजधानी दिल्ली स्थानान्तरित कर ली।
3. प्रतीक मुद्रा का प्रचलन (1329-30):- 14वीं शताब्दी में संसार में चाँदी की कमी हो गई इसका उल्लेख नेल्सन राइट ने किया है। इस कारण मु0 तुगलक ने चाँदी की मुद्रा के बदले एक प्रतीक मुद्रा जारी की। बरनी के अनुसार यह ताँबे अथवा काँसे की मुद्रा थी। जबकि फरिस्ता के अनुसार यह पीतल की मुद्रा थी। इसके पहले चीन के शासक कुबलाई खाँ ने भी प्रतीक मुद्रा जारी किया था और उसे सफलता भी मिली थी। ईरान के शासक गैखात खाँ ने भी प्रतीक मुद्रा जारी किया था। परन्तु उसे असफलता मिली थी।
प्रतीक मुद्रा का जारी करना एक चतुराई भरा निर्णय था परन्तु वह जनता पर नियंत्रण न रख सका और लोगों ने अपने घरों में ही मुद्रायें छापनी शुरू कर दी। बाद में जब सुल्तान को पता चला तब उसने ताँबे की मुद्रा के बदले चाँदी की मुद्रा ले जाने के लिए आदेश जारी किया फलतः टकसालों के सामने ताँबे की नकली मुद्राओं का ढेर लग गया और इस प्रकार मु0 तुगलक की यह योजना भी असफल रही। इतिहासकार एडवर्ड थामस ने उसे सिक्के ढालने वाला सुल्तान कहा है।
4. खुरासान अभियान की योजना:- मु0 तुगलक ने ट्रांस आक्सियाना के शासक तर्माशरीन एवं मिश्र के सुल्तान के साथ एक मैत्रीय संधि की जिसके द्वारा खुरासान (अफगानिस्तान में) की विजय की योजना बनाई गई। इसके लिए मु0 तुगलक ने 3 लाख 70 हजार की एक विशाल सेना गठित की और उन्हें एक वर्ष का अग्रिम वेतन भी दिया गया लेकिन तभी ट्रांस आक्सियाना के शासक को हटा दिया गया और इस तरह उसकी यह योजना भी असफल रही।
5. कराचिल अभियान:- कराचिल संभवतः हिमांचल प्रदेश में कोई स्थान था ज्यादातर इतिहासकारों ने इसे पहाड़ी क्षेत्र कहकर पुकारा है। खुसरो मलिक के नेतृत्व में एक सेना भेजी गई जिससे प्रारम्भ में कुछ सफलता भी मिली लेकिन बाद में सेना जंगली रास्ते में भटक गई। इब्नववूता के अनुसार केवल तीन अधिकारी ही जिन्दा वापस आ सके।
प्रमुख विद्रोह:- मु0 तुगलक के समय में ही सर्वाधिक विद्रोह हुए इसके समय में दिल्ली सल्तनत का सर्वाधिक विस्तार भी हुआ। इसके काल में प्रान्तों की संख्या 23 थी। कश्मीर ब्लूचिस्तान और पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर सारा हिन्दुस्तान इसके अधीन था।
मु0 तुगलक ने दक्षिण में एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की थी जो सौ गांवों के ऊपर शासन करते थे इन्हें अमीर-ए-सदा कहा गया। दक्षिण में इन अधिकारियों ने विद्रोह कर दिया। दक्षिण में विद्रोह के परिणाम स्वरूप ही दो नये राज्यों विजय नगर (1336 ई0 कर्नाटक) एवं बहमनी (1347 महाराष्ट्र) की नींव पड़ी।
दक्षिण में सागर के सूबेदार बहारूद्दीन गुर्शप ने भी विद्रोह किया था। इसे पकड़कर दिल्ली लाया गया तथा उसकी जिन्दा चमड़ी निकाल ली गई। मुल्तान एवं सिन्ध के सूबेदार बहराम एैना ने भी विद्रोह किया था। बंगाल में गयासुद्दीन ने विद्रोह किया इस तरह विद्रोहों की एक श्रृंखला चल पड़ी। इन्हीं परिस्थितियों में सिन्ध के पास थट्टा में ज्वर से 1351 ई0 में इसकी मृत्यु हो गयी। बदाँयुनी ने लिखा है कि सुल्तान को उसकी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिल गई। जबकि स्मिथ ने लिखा है कि मु0 तुगलक विरोधी तत्वों का मिश्रण था। एड़वई थामस ने धनवानों का युवराज कहा है। जबकि एल्फिसटन ने इसे पागल कहा है।
सिक्के:- मु0 तुगलक ने कुछ नये सिक्के भी जारी किये। इन सिक्कों पर खलीफा का नाम एवं सुल्तान की उपाधि अल सुल्तान जिलि अल्लाह (सुल्तान ईश्वर की छाया है का अंकन होता था। इसके प्रमुख सिक्के निम्नलिखित हैं।

  1. दीनार:- 200 ग्रेन का सोने का सिक्का।
  2. दो कानी:- सोने का सिक्का।
  3. अदली:- 140 ग्रेन का चाँदी का सिक्का।

धार्मिक नीति:- मु0 तुगलक एक धर्म सहिष्णु शासक था। परन्तु समकालीन इतिहासकारों ने उसकी धार्मिक नीति की कटु आलोचना की है। ख्वाजा अब्दुल-मलिक-इजामी ने अपनी पुस्तक फुतुह ऊस्सलातीन में मु0 तुगलक की कटु आलोचना की है। उसने सुल्तान पर हिन्दुओं का पक्ष लेने तथा जोगियों के साथ मेल को कफिराना कारवाई बतलाया है।
विभाग

  1. दीवाने-अमीर कोही- (कृषि विभाग)
  2. दीवान-ए-सियासत-दण्ड विभाग-सुल्तान अपनी योजनाओं की विरोधियों को दण्ड देने का कार्य करता था।
  3. अमीर-ए-सदा

’’फिरोज तुगलक’’  (1351-1388 ई0)

फिरोज तुगलक दिल्ली के सुल्तानों में धार्मिक दृष्टि से सबसे अधिक कट्टर था यह मु0 तुगलक का चचेरा भाई था। इसकी माँ वीवी जैला राजपूत सरदार रणमल की पुत्री थी। मु0 तुगलक की युद्ध में मृत्यु होने के बाद वहीं पर आम जनता अमीरों आदि के कहने पर इसका राज्याभिषेक हुआ। इसके बाद वह दिल्ली पहुँचा और पुनः इसका राज्याभिषेक दिल्ली में हुआ। सिंहासन पर बैठने के बाद 21 दिन संगीत गोष्ठी का आयोजन किया गया। फिरोज तुगलक की पुस्तक फतहवाले-फिरोजशाही से उसके बारे में जानकारी मिलती है।
फिरोज तुगलक के सैनिक अभियान:- फिरोज ने दक्षिण भारत को जीतने का कोई भी प्रयास नही किया। उसके उत्तर भारत के अभियानों का विवरण निम्नलिखित है।

  1. बंगाल अभियान:- सर्व प्रथम 1353-54 में फिरोज ने बंगाल का अभियान किया इस समय यहाँ का शासक हाजी इलियास था। हाजी इलियास पराजित हुआ लेकिन बाद में फिरोज ने लखनौती किला उसे वापस कर दिया।फिरोज ने 1359-60 ई0 में पुनः बंगाल पर आक्रमण किया। इस समय यहाँ का शासक सिकन्दर खान था परन्तु इस बार बंगाल को न जीत सका अपनी निराश सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए उसने जाज नगर (उड़ीसा) पर आक्रमण किया। यहाँ का शासक गजपति वीर मान देव तृतीय पराजित हुआ और अधीनता स्वीकार की। जाज नागर से वापस आते हुए उसने जौना खाँ की स्मृति में 1359-60 में जौनपुर नगर की नींव रखी।
  2. कंगड़ा अभियान (1365):- कांगड़ा में हिन्दू-राजवंश का राज था। फिरोज तुगलक ने यहाँ के ज्वालामुखी मन्दिर को लूटा यहाँ पर बहुत सी संस्कृत की पुस्तकें रखीं थी जिसे वह दिल्ली ले गया तथा अपने राज कवि आजुद्दीन खालिद खानी द्वारा दलाइले फिरोजशाही नाम से फारसी में अनुवाद करवाया। यह पुस्तक नक्षत्र विज्ञान से सम्बन्धित है।
  3. सिन्ध अभियान (1365-67):- सिन्ध का शासक जाम बविनिया था। इसे पराजित कर सिन्ध को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।

फिरोज तुगलक के प्रशासनिक कार्य:- फिरोज तुगलक के निम्नलिखित प्रशासनिक कार्य उल्लेखनीय हैं-
1. ऋण पंजिकाओं की समाप्ति:- मु0 तुगलक ने जिन लोगों को ऋण दिये फिरोज तुगलक ने समाप्त कर दिया।
2. दंड विधान में परिवर्तन:- फिरोज तुगलक के समय में दंड विधानों ने कमी कर दी गई। मृत्युदंड करीब-करीब समाप्त कर दिये गये।
3. सरकारी सेवाओं के वंशानुगत बनाना:- फिरोज तुगलक के समय में सभी सरकारी सेवाओं को वंशानुगत बना दिया। उसने अपने पुस्तक फतहवाते-फिरोजशाही में लिखा है कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके पुत्र को अथवा दामाद को अथवा दास को सरकारी सेवा में रखा जाय।
4. राजस्व व्यवस्था में सुधार:- फिरोज तुगलक ने कुरान के नियमों का पालन करते हुए 24 करों को हटा दिया। केवल चार कर ही मुख्य थे।

  1. जाजिया:- पहली बार फिरोज तुगलक ने ब्राह्मणों से भी जजिया लेना शुरू किया।
  2. जकात:- यह एक धार्मिक कर था जो केवल धनी मुसलमानों से लिया जाता था। इसकी मात्रा 1/40 या ढाई प्रतिशत थी।
  3. खराज:- यह हिन्दुओं से लिया जाने वाला भू-राजस्व था। इसकी माला 1/3 थी।
  4. खम्स:- यह लूट का हिस्सा थ। फिरोज तुगलक ने इसका 80% भाग सैनिकों को दिया जबकि 20% भाग स्वयं लिया।
  5. उस्र:- यह मुसलमानों से लिया जाने वाला भू-राजस्व था। इसकी मात्रा 10%थी।
  6. सिंचाई करः-फिरोज तुगलक ने पहली बार सिंचाई कर लगाया इसे हक-ए-शर्ब कहा जाता है। इसकी मात्रा 1/10 अथवा 10%थी।

फिरोज तुगलक का वजीर खान-ए-जहाँ मकबूल था। फिरोज ने दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों का राजस्व 6 करोड़ 85 लाख टका निश्चित कर दिया था। जबकि दोआब का भू-राजस्व 80 लाख टका निश्चित किया गया। इसके सेना मंत्री वसीर के पास 13 करोड़ टका की संम्पत्ति थी।
नहरों का निर्माण:- फतहवाले फिरोजशाही में पाँच नहरों का निर्माण का उल्लेख मिलता है।

  1. उलूग खनी नहर-यह सर्वाधिक लम्बी नहर थी जो यमुना नदी से हिसार तक जाती थी। इसकी लम्बाई 150 मील थी।
  2. रजबाह नहर:-यह सतलज से घग्घर तक 30 मील लम्बी थी।
  3. सिरमौर की पहाड़ी से लेकर हांसी तक जाती थी।
  4. घग्घर से फिरोजाबाद।
  5. यमुना से फिरोजाबाद।

उपरोक्त नहरों के निर्माण से सर्वाधिक फायदा पंजाब राज्य को हुआ।
बागो से प्रेम:- फिरोज तुगलक ने दिल्ली और उसके आस-पास 1200 फलों के बाग लगवाये। इसमें अंगूर की खेती सर्व प्रमुख थी तथा इन बागों से यहाँ की आय 1 लाख 80 हजार टका प्रतिवर्ष बढ़ गई।
कारखानों का निर्माण:- फिरोज तुगलक के समय में 36 कारखाने स्थापित किये गये। इन कारखानों में राज परिवार से सम्बन्धित वस्तुओं का ही उत्पादन होता था। आम जनता से इसका कोई सम्बन्ध नही था। कारखानों का प्रमुख मुतसर्रिफ नामक अधिकारी था।
दास प्रेम:-फिरोज तुगलक को दासों से अधिक लगाव था। इसके समय में दासों की संख्या सर्वाधिक 1 लाख 80 हजार थी। (अलाउद्दीन के समय 50 हजार) इसने दासों की भलाई के लिए एक नये विभाग दीवाने बन्दगान की स्थापना की। फिरोज तुगलक दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने दासों के व्यापार पर रोक लगा दी।
नगर निर्माण:- फिरोज तुगलक को नये-नये नगरों के निर्माण का शौक था। उसे 800 नये नगरों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है।

  1. जौनपुर:- इसका निर्माण उसने जौना खाँ की स्मृति में किया था।
  2. फिरोजाबाद:- दिल्ली के पास यमुना नदी के किनारे बसाया गया नगर जो सुल्तान को सर्वाधिक प्रिय था।
  3. हिसार     
  4. फतेहाबाद
  5. फिरोजपुर -यह बदाँयू के निकट स्थित था।

फिरोज तुगलक ने अशोक के मेरठ और टोपरा के स्तम्भ लेखों को दिल्ली में स्थापित किया।
लोक कल्याणकारी कार्य:-

  1. रोजगार दफ्तर:– फिरोज तुगलक ने पहली बार एक रोजगार दफ्तर का निर्माण करवाया।
  2. दीवान-ए-खैरात:-मुसलमानी अनाथ स्त्रियों विधवाओं एवं लड़कियों की सहायता हेतु यह विभाग खोला गया था।
  3. निकाह दफ्तर:- इस दफ्तर के द्वारा गरीब मुस्लिम लड़कियों को विनाह के लिए 50, 30 अथवा 35 टके की सहायता की जाती थी।

दारुल शफा की स्थापना:- यहाँ लोगों को निःशुल्क चिकित्सा की सुविधा दी जाती थी एवं गरीबों को मुफ्त दवायें एवं भोज की व्यवस्था थी।
सिक्के:- फिरोज तुगलक ने कुछ नये सिक्के भी जारी किये।

  1. शरागनी:- 6 जीतल का एक विशेष सिक्का।
  2. अद्दधा:- आधा जीतल का ताँबा और चाँदी मिश्रित सिक्का।
  3. विख:- 1/4 जीतल का ताँबा और चाँदी मिश्रित सिक्का।

नोट:- फिरोज तुगलक ने शुक्रवारीय नमाज के खुतबे में दिल्ली सुल्तानों के नामों की सूची जारी की थी। इसमें ऐबक का नाम नही था। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित नाम सम्मिलित थे।
1. मुहम्मद गोरी अथवा-मुइज्जुद्दीन मुहम्मद बिन साम
2. इल्तुतमिश        

3. नासिरूद्दीन महमूद
4. बलबन            

5. जलालुद्दीन खिलजी
6. अलाउद्दीन खिलजी    

7. मुबारक शाह
8. गयासुद्दीन तुगलक    

9. मु0 तुगलक
फिरोज तुगलक की मृत्यु स्वाभाविक हुई। डाॅ0 आर0पी0 त्रिपाठी ने लिखा है ’’इतिहास की विडम्बना उस दुर्भाग्य पूर्ण तथ्य में प्रकट हुई कि जिन गषों ने फिरोज को लोकप्रिय बनाया वही उसके पतन के लिए जिम्मेदार थे।’’
दिल्ली सल्तनत का पतन फिरोज के बाद ही प्रारम्भ हो जाता है।

तुगलक शाह (1388-89)

यह शासक गयासुद्दीन तुगलक द्वितीय की उपाधि से गद्दी पर बैठा।

अबू बक्र  (1389-90)

नासिरुद्दीन मुहम्मद  (1390-1394)

एक मात्र शासक जिसकी मृत्यु अत्यधिक मद्यपान के कारण हुई।

हुमायूँ (1394)

नासिरुद्दीन महमूद (1394-1412)

यह तुगलक वंश का अन्तिम शासक था जो हुमायूँ का भाई था। इसके समय में मलिक सरबर अथवा ख्वाजा जहाँ को मलिक-उस-शर्क (पूर्व का स्वामी) की उपाधि देकर जौनपुर का प्रमुख बना दिया गया जिसने बाद में जौनपुर को स्वतन्त्र कर लिया।
नासिरुद्दीन महमूद के समय में ही 1398 ई0 में तैमूर लंग ने आक्रमण किया। इसके समय में दिल्ली सल्तनत का एक हिस्सा फिरोज तुगलक के पुत्र नुसरत शाह के अधीन था। अर्थात दिल्ली के दो शासक नुसरत शाह एवं नासिरुद्दीन महमूद थे। इसका राज्य सिकुड़ कर दिल्ली से पालम तक ही रह गया।
इसने एक नये विभाग वकील-ए-सल्तनत की स्थापना की। इसकी मृत्यु के बाद मुल्तान के प्रान्तपति खिज्रखाँ ने एक ने एक नये वंश सैयद वंश की नींव डाली।

सैयद वंश (1414-50)

सैयद भी तुर्क ही थे। इस वंश का संस्थापक मुल्तान का प्रान्तपति खिज्रखाँ था।

खिज्र खाँ (1414-21)

इसने सुल्तान की उपाधि न धारण कर रैयत-ए-आला की उपाधि धारण की। इसने तैमूर के चैथे पुत्र शाहरुन के प्रतिनिधि के रूप में शासन किया। फरिश्ता इसे एक न्यायी एवं परोपकारी राजा कहा है।

मुबारक शाह (1421-34)

इसने यमुना दनी के किनारे 1434 ई0 में मुबारक बा दनामक नगर की स्थापना की इसी के शासन काल में याहियाबिन-अहमद-सरहिन्दी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक तारीखे-मुबारक शाही लिखी। जिससे फिरोज तुगलक के बाद से लेकर मुबारक शाह तक ही घटनाओं का पता चलता है। अपने नये नगर के निरीक्षण के समय में ही इसके वजीर सरवन-उल-मुल्क ने इसकी हत्या कर दी। इसके बाद इसका भतीजा मुहम्मद बिन खरीद खाँ गद्दी पर बैठा।

मुहम्मद शाह (1434-45)

मुहम्मद बिन खरीद खाँ मुहम्मद शाह के नाम से गद्दी पर बैठा। इसने मुल्तान के सुबेदार वहलोल को खान-ए-खाना की उपाधि दी।

अलाउद्दीन आलमशाह (1445-50)

यह मुहम्मदशाह का पुत्र था। इसके समय में यह कहावत चल पड़ी थी कि शाह-ए-आलम का राज्य दिल्ली से पालम तक। इसने स्वेच्छा से अपने पद का त्याग किया था। इसी के बाद बहलोल लोदी ने एक नये वंश लोदी वंश की नींव डाली।

विजय नगर साम्राज्य

विजय नगर साम्राज्य

स्थापना:-1336 ई0 (आधुनिक कर्नाटक में)
राजधानी:-विजय नगर (आधुनिक हम्पी)
प्रारम्भिक राजधानी:- अनेगुण्डी दुर्ग।

संस्थापक:- विजय नगर साम्राज्य के संस्थापक हरिहर और बुक्का द्वारा तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में। मुहम्मद तुगलक के शासन काल में।
मुहम्मद तुगलक के समय में दिल्ली सल्तनत का सर्वाधिक विस्तार हुआ। परन्तु उसे दक्षिण भारत में सबसे अधिक विद्रोह का सामना करना पड़ा। 1325 ई0 में मुहम्मद तुगलक के चचेरे भाई बहाउद्दीन गुर्शप ने कर्नाटक में सागर नामक स्थान पर विद्रोह किया। सुल्तान स्वयं दक्षिण गया गुर्शप भागकर कर्नाटक में स्थित काम्पिल्य राज्य चला गया। फलस्वरूप मुहम्मद तुगलक ने काम्पिल पर आक्रमण कर उसे दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया।
इस राज्य के दो अधिकारियों हरिहर, और बुक्का को पकड़कर दिल्ली सल्तनत लाया गया और यहाँ पर इन्हें मुसलमान बना दिया गया। दक्षिण भारत में जब पुनः विद्रोह होने लगे तब इन दोनों भाइयों को सेनापति बनाकर पुनः दक्षिण भेजा गया। इन भाइयों को विद्रोह को समाप्त करने में सफलता मिली तभी में एक सन्त माधव विद्यारण्ड और उनके भाई वेदों के भाष्यकार सायण के प्रभाव में आ गये। सायण ने उन्हें पुनः हिन्दू धर्म में दीक्षित किया तथा एक नये राज्य की स्थापना के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में विजय नगर शहर और राज्य की नींव पड़ी। चूँकि इन भाइयों के पिता का नाम संगम था। इसी कारण इनके द्वारा स्थापित वंश संगम वंश कहलाया।
विजय नगर राज्य में कुल चार वंश संगम, सालुव, तुलुव और आरवीड वंश अस्तित्व में आये। इसके बाद विजय नगर साम्राज्य का पतन हो गया।
विजय नगर को जानने के प्रमुख स्रोत:- विजय नगर साम्राज्य के बारे में जानने के लिए साहित्यिक, अभिलेखीय एवं विदेशी विवरण प्राप्त होते हैं।
साहित्यिक स्रोतः-
1.  A forgather Emipire :- सेवेल द्वारा लिखित यह पुस्तक विजय नगर साम्राज्य को जानने का एक प्रमुख स्रोत है।
2.    आमुक्त माल्यद:-तेलगू भाषा में कृष्ण देवराय द्वारा लिखित यह पुस्तक विजय नगर प्रशासन के बारे में महत्वपूर्ण सूचनाएं देता है।
3.    अभिलेखीय साक्ष्य:-(1) बुक्का प्रथम के समय का 1354 ई0 का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है। इसमें मालागौड़ नामक महिला द्वारा सती होने का उल्लेख है।
2.    देवराय द्वितीय के समय 1424 और 25ई0 का एक अभिलेख पाया गया है जिसमें दहेज को अवैधानिक अभिलेख पाया गया है जिसमें दहेज को अवैधानिक घोषित किया गया है। दासों के क्रय विक्रय को वेस वेग कहा जाता था।

अब्दुर्रज्जाक:-(1443ई0)

शासक:-देवराय द्वितीय ।
मूल निवासी:-फारस का।

  1. विजय नगर शहर के बारे में इसने वर्णन किया है कि ’’विजय नगर जैसा नगर न इस पृथ्वी पर कहीं देखा था और न सुना था।’’
  2. इसके अनुसार विजय नगर राज्य में कुल 300 बन्दरगाह थे इनमें से प्रत्येक कालीकट के बराबर था।
  3. विजय नगर राज्य में इसने एक सचिवालय का उल्लेख किया है।

बारबोसा 1508 ई0

मूल स्थान:-पुर्तगीज
शासक:-कृष्ण देवराय के समय में।
बारबोसा ने सती प्रथा का वर्णन किया है। परन्तु इसके अनुसार यह प्रथा उच्च वर्गों जैसे लिंगायतों, चेट्टियों और ब्राह्मणों में प्रचलित नहीं थी। इसने विजय नगर के आर्थिक दशा का भी वर्णन किया है तथा लिखा है कि दक्षिण भारत के जहाज माल द्वीप में बनते हैं।

पायस (1620 से 22 ई0)

मूल स्थान:-पुर्तगीज  
शासकः-कृष्ण देवराय के दरबार में।
(1) इसने विजय नगर की तुलना रोम से की है।
(2) इसके अनुसार विजय नगर में 200 प्रान्त थे।
(3) इसने नवरात्रि पर्व के मनाये जाने का उल्लेख किया है। तथा इस पर्व के अंतिम दिन बहुत से पशुओं के वध किये जाने का उल्लेख किया है।
(4) इसके अनुसार प्रत्येक गली में मंदिर है। और वे किसी न किसी शिल्पियों से सम्बन्धित है। उसके वर्णन विजय नगर की उच्च आर्थिक स्थिति का पता चलता है।
5 नूनिज  (1535 से 37)
शासक:-अच्चुत देवराय    मूल स्थान:-पुर्तगीज
6. सीजर फेडरिक:-तालीकोटा युद्ध के बाद 1565 में
मूल स्थान:-पुर्तगीज यात्री

निकितिन (1470 से 74 ई0)

यह मूलतः रूसी यात्री था जो बहमनी शासक मुहम्मद तृतीय के समय आया था। इस समय विजय नगर का शासक विरुपाक्ष द्वितीय था। इसने विजय नगर की आर्थिक असमानता का वर्णन किया है।

’’विजय नगर साम्राज्य का राजनैतिक इतिहास’’

संगम वंश

संस्थापक:-हरिहर और बुक्का’’हरिहर’’ (1336 से 53 ई0)
प्रारम्भिक राजधानी:-अनेगुंड़ी
सात वर्ष बाद राजधानी:-विजय नगर
हरिहर के गद्दी पर आसीन हाने के साथ ही बहमनी शासक अलाउद्दीन हसन बहमन के साथ रामचूर दोआब के लिए युद्ध प्रारम्भ हो गया।
होयसल शासक बल्लाल चतुर्थ के मृत्यु के बाद हरिहर ने उनके राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

’’बुक्का’’ (1354 से 71 ई0)

उपाधियाँ:-’’वेद मार्ग प्रतिष्ठापक’’ एवं तीनों समुद्रों का स्वामी।

  1. बहमनों से युद्ध:-बुक्का प्रथम और बहमनी शासक मुहम्मद शाह प्रथम के बीच रामचूर दोआब में स्थित मुद्गल किले को लेकर 1367 ई0 में युद्ध हुआ। इस युद्ध में पहली बार तोपखानें का प्रयोग हुआ।
  2. चीन में दूतमंडल:- 1374 ई0 में बुक्का प्रथम ने चीन में एक दूत मंडल भेजा।
  3. मदुरा विजय:- 1377 ई0 में मदुरा को विजय नगर साम्राज्य में मिला लिया गया। मदुरा विजय का श्रेय बुक्का प्रथम के बेटे कुमार कम्पन को दिया जाता है। कुमार कम्पन की पत्नी गंगादेवी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ’मदुरा विजय’ में इसका उल्लेख किया है।
हरिहर द्वितीय (1379 से 1404)

उपाधि:-महाराजाधिराज एवं राजपरमेश्वर।

  1. हरिहर द्वितीय ने उत्तर श्रीलंका पर विजय किया और इसे सफलता भी मिली।
  2. इसकी सबसे बड़ी सफलता बहमनी राज्य से गोवा और बेलगाँव को छीनना था।
  3. परन्तु इसे बहमनी शासक फिरोजशाह बहमनी से पराजित होना पड़ा।
  4. इसी के समय में विद्यारण्य और सायण का उल्लेख मिलता है। इसके अभिलेखों में विद्यारण्य को ’’सर्वोच्चतम प्रकाश अवतार’’ के रूप में उल्लेख किया गया है।
  5. यह शैव मतावलम्बी था।
  6. तेलगू कवि श्री नाथ इसका दरबारी कवि था।
  7. इसने ’’हरि विलास’’ नामक ग्रंथ लिखा।

हरिहर द्वितीय के बाद इसका पुत्र विरुपाक्ष प्रथम गद्दी पर बैठा। इसके बाद हरिहर द्वितीय का दूसरा पुत्र बुक्का द्वितीय गद्दी पर बैठा। इसके बाद देवराय प्रथम गद्दी पर बैठा।

’देवराय प्रथम’ (1406 से 22 ई0)

तुर्को को सर्वप्रथम इसी ने सेना में भर्ती किये।
  1. देवराय प्रथम का युद्ध बहमनी शासक फिरोजशाह बहमनी के साथ हुआ, फिरोजशाह बहमनी ने इसे पराजित किया। इसने अपनी पुत्री की शादी फिरोजशाह बहमनी से करनी पड़ी तथा दहेज में रामचूर दोआब में स्थित बीकापुर को देना पड़ा। अपने अंतिम समय में इसने फिरोजशाह बहमनी को पराजित कियां
  2. देवराय प्रथम ने तुंगभद्रा नदी और हरिद्रा नदी पर बाँध बना कर नहरें निकालीं।
  3. इसी के समय में इटावली यात्री निकोलोकोण्टी 1420 ई0 में विजय नगर में आया।

देवराय की मृत्यु के बाद वीर विजय या बुक्का विजय तथा रामचन्द्र गद्दी पर बैठा। उसके बाद वीर विजय का पुत्र देवराय द्वितीय गद्दी पर बैठा।

देवराय द्वितीय (1422 ई0 46 ई0)

उपाधि:-इम्माडि देवराय, प्रौढत्र (प्रौध) देवराय, गजबेटकर (हाथियों का शिकारी)
यह संगम वंश का महानतम शासक था। इसने अपनी सेना में बड़ी संख्या में मुसलमानों एवं तीरंदाजों को भर्ती किया। जिसके फलस्वरूप देवराय द्वितीय को बहमनी शासक फिरोजशाह बहमनी को पराजित करने में सफलता मिली।

इसी के समय में फारस का राजदूत अब्दुर्रज्जाक (1443) में विजय नगर आया। इसकी विजयों में केरल विजय प्रमुख थी। पुर्तगीज यात्री नूनिज ने लिखा है कि क्वीलन (केरल क्षेत्र) श्रीलंका, पुलीकट (आन्ध्र) पेगू (वर्मा) तेन सिरिम (मलाया) के राजा देवराय द्वितीय को कर देते थे। तेलगू कवि श्री नाथ कुछ समय इसके यहाँ भी रहा। इसने अपने व्यापार का सारा कार्यभार लक्कना या लक्ष्मण को सौंप दिया। लक्ष्मण को इसके अभिलेखों में ’’दक्षिणी समुद्रों का स्वामी के रूप में वर्णित किया गया है।
साहित्य:-देवराय द्वितीय के काल में कन्नड़ और संस्कृत साहित्य की विशेष उन्नति हुई। कुमार व्यास ने इसी के समय में कन्नड़ भाषा का प्रसिद्ध ग्रंथ ’’भारत’’ या ’’भारतम’’ लिखा। देवराय द्वितीय स्वयं विद्वान था। उसने संस्कृत में एक ग्रंथ महा नाटक सुधा निधि लिखा। इसके अतिरिक्त ब्रम्ह सूत्र पर एक भाष्य भी लिखा।

नोट:-1424-25 ई0 के इसके समय में एक अभिलेख में दहेज को अवैधानिक घोषित कर दिया गया।

मल्लिकार्जुन (1446 से 65 ई0)

उपाधि:-प्रौढ़ देवराय
इसी के समय से संगम वंश का पतन प्रारम्भ हो गया।

विरुपाक्ष द्वितीय (1465 से 85 ई0)

संगम वंश का यह अंतिम शासक था। इसने एक ग्रंथ नारायण विलास लिखा इसी के समय में संगम वंश का पतन हुआ तथा बहमनी के प्रधानमंत्री महमूदगवाँ ने विजय नगर से गोवा, चोल, दाभुल, क्षेत्र जीत लिए। इस शासक के समय में चन्द्रगिरि के प्रान्तपति नरसिंह सालुव ने शक्ति अर्जित कर ली। और उसने विरुपाक्ष को पराजित कर एक नये वंश सालुव वंश की स्थापना की।

सालुव वंश

नरसिंह सालुव (1486 से 90 ई0)

संस्थापक:-नरसिंह सालुव
नरसिंह सालुव द्वारा विरुपाक्ष द्वितीय को सिंहासन से हटाकर गद्दी प्राप्त करने की घटना को ’’प्रथम बलो पहार’ कहा गया है। इसकी मुख्य उपलब्धि यह थी कि इसने विजय नगर की पतनावस्था को विराम दिया।

इम्माडि नरसिंह (1490 से 1506)

इसकी आयु कम होने के कारण इसका सेना नायक नरसा नायक इसका संरक्षक बना। इसने शासक को पेनुकोड़ के किले में बन्द कर दिया तथा स्वयं शासन चलाने लगा।
नरसा नायक:-यह महत्वपूर्ण सेनानायक था। इसने चोल, चेर और पाड्ण्य राज्य पर आक्रमण किये। इसने उड़ीसा के गजपत शासक प्रतापरुद्र गजपति को भी पराजित किया। इसी के काल में प्रसिद्ध कन्नड़ ग्रंथ जैमिनी भारतम की रचना की गयी। नरसा नायक के पुत्र वीर नर सिंह ने इम्माडि नरसिंह की हत्या कर एक नये वंश तुलुव वंश की नीव डाली।

तुलुव वंश

वीर नर सिंह(1505 से 09 ई0)

संस्थापक:-वीर नर सिंह
वीर नरसिंह द्वारा इस तरह गद्दी प्राप्त करने की घटना को ’द्वितीय बालेषहार’ कहा जाता है। इसने विवाह कर हटाया।

कृष्ण देवराय (1509 से 30 ई0)

कृष्ण देव राय न केवल तुलुव वंश का अपितु पूरे विजय नगर का सर्वश्रेष्ठ शासक था। इसने विजयों अपनी सांस्कृतिक उपलब्धियों से विजय नगर सम्राज्य को अपने समय में सर्वश्रेष्ठ बना दिया। यहाँ तक की बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में कृष्ण देव राय की प्रशंसा की है।

विजयें:- गजपति शासकों के विरूद्ध विजय:-गजपतियों का शासन उड़ीसा में स्थापित था। वे काफी शक्तिशाली थे कृष्ण देव राय के समकालीन गजपति नरेश प्रताप रुद्र देव गजपति था। उसे कृष्ण देवराय ने तीन बार पराजित किया तथा उसके कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। दोनों के बीच एक वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित हुआ।

पुर्तगालियों से सम्बन्ध

पुर्तगीज कृष्ण देव राय से शान्ति संधि करना चाहते थे। परन्तु प्रारम्भ में कृष्ण देव राय ने कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया। जब पुर्तगीजों ने 1510 ई0 में बीजापुर से गोवा छीन लिया तब कृष्णदेव राय ने उनसे संधि कर ली, इसका मूल उद्देश्य गोवा बन्दरगाह से घोड़ों को प्राप्त करना था।
कृष्णदेव राय की उपाधियाँ
1. यवन राज्य स्थापनाचार्य:-कृष्ण देव राय ने बहमनी शासक महमूद शाह को दक्षिण की लोमड़ी के नाम से प्रसिद्ध बीदर के चंगुल से मुक्त करवाया इसके उपलक्ष्य में उसने यवन राज्य स्थापना चार्य की उपाधि धारण की।
2. आन्ध्रभोज अथवा अभिनवभोज अथवा आन्ध्रपितामह:-कृष्ण देवराय स्वयं प्रसिद्ध विद्वान था। उसे कई पुस्तकों को लिखने का श्रेय दिया जाता है। इसके दरबार में भी तेलगू साहित्य के आठ प्रसिद्ध विद्वान रहते थे। जिन्हें अष्ट दिग्गज कहा जाता था। इसी कारण कृष्ण देवराय को आन्ध्र भोज कहा जाता है।
कृष्ण देव राय की पुस्तकें
  1. आमुक्त माल्यद:-तेलगू भाषा में यह राजनीति शास्त्र पर लिखी गई पुस्तक है। इसे विश्ववित्तीय भी कहा जाता है।
  2. ऊषा परिणय:-यह संस्कृत में लिखी पुस्तक है।
  3. जाम्बवती कल्याण:-यह भी संस्कृत में लिखी पुस्तक है।

अष्ट दिग्गज:-कृष्ण देव राय के दरबार में तेलगू साहित्य के आठ प्रसिद्ध विद्वान थे जिन्हें अष्ट दिग्गज कहा जाता था।

  1. अल्सनी पेड्डन:– ये सर्वाधिक महत्वपूर्ण विद्वान थे। इन्हें तेलगू कविता के पितामह की उपाधि दी गयी। इनकी पुस्तक मनु चरित हे। स्वारोचित्रसंभव, हरिकथा सरनसंभू, की भी रचना की।
  2. तेनाली रामकृष्ण:-इनकी पुस्तक का नाम ’’पाण्डुरंगमहात्म इसकी गणना पाँच महाकाब्यों (तेलगू भाषा के) में की जाती है।
  3. नदी तिम्मन:-इनकी पुस्तक पराजित हरण है।
  4. भट्टमूर्ति:-अलंकार शास्त्र से सम्बन्धित पुस्तक नरस भू पालियम् इनकी रचना है।
  5. धू-जोटे:-पुस्तक कल हस्ति महात्म है।
  6. भोद्यगीर मल्लनम:-पुस्तक, राजशेखर चरित,
  7. अच्युतराज रामचन्द्र:-पुस्तक, रामाभ्युदय, सकलकथा सार संग्रह
  8. जिंगली सूरत:-पुस्तक राघव पाण्डवीय,

विजय नगर कालीन कला

विजय नगर कालीन मंदिर द्रविण शैली के उदाहरण हैं। परन्तु इनकी दो अन्य विशेषताएं भी हैं।
1. कल्याण मंडप:- यह गर्भ गृह के बगल में एक खुला प्रांगण होता है। जिसमें देवी-देवताओं से सम्बन्धित समारोह एवं विवाहोत्सव आदि आयोजित किये जाते थे।
2. कृष्ण देव राय के समय में हजार स्तम्भों वाले मंडपों का निर्माण हुआ।
कृष्ण देवराय के समय के प्रमुख मंदिरों में विट्ठल स्वामी का मन्दिर एवं हजारा राम का मंदिर प्रसिद्ध है।
नगर निर्माण:- कृष्ण देव राय को नागलापुर नामक नगर निर्माण का श्रेय दिया जाता है। इसके अतिरिक्त हास्पेट नगर के निर्माण का भी श्रेय देते हैं

विदेशी यात्री

(1) बारबोसा :- 1508 में         स्थान:-पुर्तगीज
(2) पायस:-1520 ई0 से 22 ई0 में पुर्तगीज विजय नगर आये।
विजय नगर के मनोरंजन के साधन
कृष्ण देव राय को संगीत और शंतरांज का बहुत शौक था।

अच्युत देवराय (1529 से 42ई0)

कृष्ण देवराय का पुत्र सदाशिवराय केवल 18 महीने का था। इसी कारण उसने अपने चचेरे भाई अच्युत देवराय को शासक नियुक्त किया यह बात कृष्ण देव राय के जमाता (दामाद) रामराय को पसन्द नहीं आयी वह सदाशिवराय को ही गद्दी पर बिठाना चाहता था। इस तरह राज परिवार में मतभेद पैदा हो गया। इसी के समय में नूनिज यात्री भी आया था। इस शासक के लिए डरपोक या भीरु शब्द का उल्लेख मिलता है।
वेंकट प्रथम (1542 ई0):-यह मात्र 6 महीने तक शासक रहा इसे हटाकर सदाशिव राय गद्दी पर बैठा।

सदाशिवराय (1542 से 72 ई0)

सदाशिव राय के समय में वास्तविक सत्ता राम राय के हाथों में आ गयी। रामराय अत्यन्त महत्वाकांक्षी था। उसने दक्ष्णि के राज्यों को एक-एक पराजित करना प्रारम्भ कर दिया। उसकी नीति यह थी कि एक राज्य को अपनी ओर मिलाकर दूसरे राज्य को पराजित किया जाय धीरे-धीरे करके उसने विजय नगर को सर्वोच्च स्थित पर पहुँचा दिया परन्तु उसकी यह नीति जो लोहे से लोहा काटने की नीति व हीरे को हीरे से काटने की नीति नाम से विख्यात है उसके पतन का कारण बनीं। सदाशिवराय के समय में नाइयों की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। उसने उन्हें व्यवसायी करों से मुक्त कर दिया।
राक्षसी  तंगड़ी का युद्ध अथवा बन्नी हट्टी या ताली कोटा का युद्ध(23 जनवरी 1565 ई0):-विजय नगर की बढ़ती शक्ति से दक्षिण के चार राज्यों अहमद नगर, बीजापुर, इस संघ में बरार शामिल नहीं था। इस संघ का नेतृत्व बीजापुर का शासक अली आदिलशाह कर रहा था।
                                                                             युद्ध का वास्तविक कारण
1. रामराय की अनुचित नीति।
2. विजय नगर के प्रति दक्षिणी राज्यों की समान ईष्र्या एवं घृणा।
3. फरिश्ता ने तालीकोटा युद्ध का एक अलग कारण बताया है। उसके अनुसार रामराय ने अहम नगर पर आक्रमण के दौरान इस्लाम धर्म को अपमानित एवं मस्जिदों को ध्वस्त किया था। युद्ध स्थल में अहमद नगर के शासक हुसैन निजामशाह ने 70 वर्षीय रामराय को मारकर चिल्लाया। ’’अब मैंने तुझसे बदला ले लिया है अल्लाह मुझे जो चाहे सो करे’’। रामराय का भाई तिरुमल सदाशिव राय को लेकर ’पेनुकोण्डा’ चला गया और वहीं पर एक नये राज्य ’आरवीडु’ वंश की नीव डाली।

आरवीडु वंश

संस्थापक:-तिरुमल
राजधानी:-पेनुकोण्डा
रंग द्वितीय (1572-85):-यह तिरुमल का पुत्र था। इसने अपनी राजधानी पेनुकोण्डा से चन्द्रगिरि स्थानान्तरित कर ली।
वेंकट द्वितीय (1586 से 1614 ई0):-1612 ई0 में राजा बोडयार ने वेंकट द्वितीय से अनुमति लेकर एक नये राज्य मैसूर की स्थापना की।
रंग तृतीय:-(1614 से 50 ई0)
यह विजय नगर का अंतिम शासक था, इसकी मृत्यु के बाद मैसूर, तंजौर आदि छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हुई।

विजय नगर कालीन संस्कृति

प्रशासन:-प्रशासन का केन्द्र बिन्दु राजा ही था परन्तु विजय नगर काल में संयुक्त शासन के दर्शन दृष्टि गोचर होते हैं उदाहरण हरिहर और बुक्का ने साथ-साथ शासन किया राजा को राय कहा जाता था। राजा को किस तरह का व्यवहार करना चाहिए इसका उल्लेख कृष्ण देवराय की पुस्तक ’’आमुक्त माल्यद’’ में दिखाई पड़ता है। इसके अनुसार राजा को सदैव अपने प्रजा के सुख और कल्याण को आगे रखना चाहिए। जब राजा प्रजा का कल्याण करेगा तभी प्रजा भी राजा के कल्याण की कामना करेगी तभी देश प्रगतिशील एवं समृद्धशील होगा।
राजा पर नियंत्रण राज परिषद नामक संस्था करती थी। इसका सदस्य स्वयं राजा भी होता था। राजा अपना प्रशासन मंत्री परिषद के माध्यम से करता था। राजा अपना प्रशासन मंत्री परिषद के माध्यम से करता था। इसका प्रमुख अधिकारी प्रधानी अथवा महाप्रधानी होता था। मंत्री परिषद में 20 सदस्य होते थे तथा सदस्यों की आयु 50 से 70 वर्ष के बीच होती थी। प्रधानी को पेशवा का अग्रवर्तो माना जाता है। वैसे-मंत्री परिषद का अध्यक्ष सभा नायक होता था।
सचिवालय:- अब्दुर्रज्जाक ने सचिवालय का वर्णन किया है। उसने सचिवालय का नाम दीवान खाना के रूप में उल्लेख किया है। यहाँ के कुछ अधिकारियों के नाम भी मिलते हैं। जैसे-रायसम-(सचिव)

केन्द्रीय विभाजन

केन्द्र प्रान्तों में विभाजित थे जिसे राज्य या मंड्लम कहा जाता था। विजय नगर काल में कुल छः प्रान्त थे। हलांकि पायस ने 200 प्रान्तों का उल्लेख किया है। प्रान्तों के प्रमुख युवराज अथवा दंडनायक होते थे। दंडनायक एक पदसूचक शब्द था। जो विभिन्न अधिकारियों के लिए प्रयुक्त होता था। दंडनायक को सेनापति न्यायधीश गर्वनर प्रशासकीय, अधिकारी आदि कुछ भी बनाया जा सकता था।

कार्यकर्ता:-यह प्रशासकीय अधिकारियों की एक श्रेणी थी।
स्थानीय प्रशासन में विभाजन:-राज्य या मंडलम् (प्रान्त)-बलनाडु (कमिश्नरी)-नाडु (जिला) कभी-कभी तहसील भी हो जाती थी।-मेलाग्राम (50 ग्राम)-स्थल (तहसील)-उद् (ग्राम)
नायंकार व्यवस्था:- विजय नगर प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी नायंकार व्यवस्था थी। नायक वस्तुतः एक भू-सामन्त थे जो सैनिक अथवा असैनिक हो सकते थे। इन्हें वेतन के बदले एक प्रकार की भूमि प्रदान की जाती थी। जिसे अमरम कहा जाता था। अमरम् प्राप्त करने के कारण इसका एक नाम अमर नायक पड़ गया। नायकों के पद धीरे-धीरे आनुवांशिक हो गये। ये अपना एक प्रशासनिक ऐजेन्ट विजय नगर राज्य में नियुक्त करते थे जिसे स्थानपति कहा जाता था। अच्युत देवराय ने नायकों की उदण्डता को रोकने के लिए एक विशेष अधिकारी महामण्डलेश्वर (कमिश्नर) की नियुक्ति की।
आयंगार व्यवस्था:- विजय नगर प्रशासन की दूसरी प्रमुख विशेषता उसकी आयंगार व्यवस्था थी। यह मूलतः गाॅवों के प्रशासन से सम्बन्धित थी। गाँव में प्रशासन के लिए बारह व्यक्तियों का एक समूह नियुक्त किया जाता था। जिसे आयंगार कहते थे। आयंगारों का पद आनुवांशिक होता था। ये अपने पदों को गिरवी रख सकते थे अथवा बेच सकते थे। इन्हें लगान मुक्त भूमि प्रदान की जाती थी। कुछ आयंगारों के नाम भी प्राप्त होते हैं।

  1. सेनते ओवा:-यह गाँव का हिसाब किताब रखता था।
  2. तलर:- गाँव का कोतवाल अथवा पहरेदार।
  3. बेगार:- बल पूर्वक श्रम लेने का अधिकारी।

महानायकाचार्य:-इस अधिकारी के द्वारा राजा गाँव पर नियंत्रण रखता था।

’भू-राजस्व व्यवस्था

राज्य की आय का सबसे बड़ा स्रोत भू-राजस्व था। भू-राजस्व से सम्बन्धित विभाग को अष्टबने (Atthavana) कहा जाता था। भूमिकर को शिष्ट कहा गया है। भू-राजस्व की मात्रा 16%से 32% के बीच थी। भूमि को तीन भागों में विभाजित किया गया था।

  1. सिंचाई मुक्ति भूमि।
  2. सूखी जमीन।
  3. बाग एवं जंगल मुक्ति भूमि।

भूमि की माप कृष्ण देवराय ने करवाया था।

अन्य प्रमुख कर
  1. सिंचाई कर:-सामान्यतः राज्य की ओर से सिंचाई का कोई विभाग नहीं था। परन्तु कुछ शासकों ने नहरे निकालीं/विजय नगर काल में सिंचाई कर को दास बन्द कहा जाता था।
  2. बढ़ई कर:-बढ़इयों पर भी कर लगता था। जिसे कसामी गुप्त कहा गया है।
  3. विवाह कर:-वर एवं वधू दोनों से विवाह कर लिया जाता था। परन्तु कृष्ण देव राय ने विवाह कर माफ कर दिया।
  4. नाइयों पर कर:-नाइयों पर भी कर लगता था। परन्तु सदाशिव राय के शासन काल में राम राय ने इसे माॅफ कर दिया।
  5. कन्दा चार:- यह सैनिक विभाग था तथा दंड नायकों के अधीन रहता था।
  6. कवलगर:-Kavalgar यह पुलिस अधिकारियों के लिए शब्द प्रयुक्त हुआ है। पुलिस विभाग का खर्च वेश्याओं से प्राप्त आय से होता था।
भूमि के प्रकार

1. भंडार वाद ग्राम:- ऐसे ग्राम जिनकी भूमि राज्य के सीधे नियंत्रण में होती थी।
2. ब्रम्ह देय:- ब्राहमणों को दान में दी गयी कर मुक्ति भूमि।
3. देव देय:-मंदिरों को दान में दी गयी कर मुक्त भूमि।
4. मठीपुर:- मठों को दान में दी गयी कर मुक्त भूमि।
5. अमरम:– नायकों को दी गयी भूमि।
6. ऊंबलि:- ग्राम के कुछ विशेष सेवाओं के बदले में लगान मुक्ति भूमि।
7. रक्त कौड़गै अथवा ख्रन्त कोड़गै:- युद्ध में शौर्य प्रदर्शन करने वालों को दी गयी भूमि।
8. कुट्टगि:- ब्राहमणों बड़े भू-स्वामियों आदि द्वारा किसानों को पट्टे पर दी गयी भूमि।
9. वारम व्यवस्था:– पट्टेदार एवं भूस्वामी के बीच उपज की हिस्सेदारी।
10. कुदि:-कृषक मजदूर।

व्यापार

विजय नगर काल में विदेशी व्यापार उन्नति अवस्था में था पायस ने लिखा है कि प्रत्येक गली में मंदिर है क्योंकि ये सभी शिल्पियों तथा व्यापारियों से कपड़ा खानों की खुदाई इस समय के प्रमुख व्यवसायों में कपड़ा खानों की खुदाई गन्धी का पेशा (इत्र) चीनी, मशाले आदि शामिल थे। अब्दुर्रज्जाक ने 300 का कालीकट अत्यन्त महत्वपूर्ण बन्दरगाह था। भारत के जहाज मालद्वीप के द्वीपों में बनते थे।

’’प्रमुख व्यापारिक देश’’

पुर्तगाल, चीन, यूरोपीय देश, फारस, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया, वर्मा, अरब आदि।

’प्रमुख निर्यातित वस्तुएं’

कपड़ा, मसाले, चीनी, चावल, लोहा, सोना ज्ञदव3 बारूद (जहाजों के वैलेन्स बनाने के लिए रखते थे) मोती आदि।

’प्रमुख आयातित वस्तुएं’

घोड़ा, मदिरा, मोती, मूंगा, पारा, मलमल आदि।

सिक्के

1. वराह:-यह विजय नगर का सर्वाधिक प्रसिद्ध स्वर्ण सिक्का था। जो 52 ग्रेन का होता था। इसे विदेशी यात्री पगोड़ा, हूण, अथवा परदौस के रूप में उल्लेख करते हैं।
2. प्रताप:- 26 ग्रेन के या आधे वराह को प्रताप कहा जाता था।
3. फणम्:-55 ग्रेन के स्वर्ण सिक्कों को फणम् कहा जाता था।
4. तार ;चाँदी के छोटे सिक्कों को कहा जाता था। विजय नगर काल में मुख्यतः स्वर्ण एवं ताँबें के सिक्के ही प्रचलित थे। चाँदी के थोड़े ही ज्ञात है। विजय नगर के शासकों के सिक्कों पर हनमान एवं गरुण की आकृति दिखाई पड़ती है। तुलुव वंश के शासकों के सिक्कों पर बैल, गरुण, शिव, पार्वती, कृष्ण आदि की आकृतियां मिलती हैं।

सामाजिक दशा

विजय नगर कालीन अभिलेखों में सकल वर्णाश्रम धर्म मंगला-नुपालि सुन्त नामक शब्द का प्रयोग हुआ है। इससे पता चलता है कि राजा सभी वर्णों के मंगल की कामना करता था। समाज में मुख्यतः निम्नलिखित वर्ग प्रचलित थे-
1. ब्राहमण:- उत्तर भारत के विपरीत दक्षिण भारतीय ब्राहमण मांस, मदिरा, आदि का सेवन करते थे। समाज में इनका स्थान सर्वोच्च था। इन्हें किसी भी कार्य के लिए मृत्युदंड नहीं दिया जाता था। दंड नायक आदि पदों पर अधिकांशतः इन्हीं की नियुक्ति होती थी।
2. चेट्टी अथवा शेट्टी:- ब्राहमणों के बाद इस वर्ग की सामाजिक स्थिति अच्छी थी। अधिकांश व्यापार इसी वर्ग के हाथों में था।
3. वीर पंचाल:- चेट्टियों के ही समतुल्य व्यापार करने वाले ये दस्तकार वर्ग के लोग थे। इसमें लोहार, स्वर्णकार, कांस्यकार, बढ़ई, कैकोल्लार (बुनकर) कंबलत्तर (चपरासी आदि वर्ग शामिल थे) इन मध्य वर्गों में लोहारों की स्थित सबसे अच्छी थी। कैकोल्लार अथवा जुलाहे मंदिरों के आस-पास रहते थे। इनका मंदिरों के प्रशासन पर भी अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान होता था। इसके अतिरिक्त नाइयों की भी अत्यन्त प्रतिष्ठा भी थी।
बड़वा वर्ग:- ये वे लोग थे जो उत्तर भारत से आकर दक्षिण भारत में बस गये थे। इन्होंने दक्षिण के व्यापार पर अधिकार कर लिया था। इस कारण एक सामाजिक विद्वेष की भावना पनप रही थी।
निम्न वर्ग:- विजय नगर काल में कुछ निम्न वर्गों का भी उल्लेख मिलता है जैसे-डोंबर-जो बाजीगरी का कार्य करते थे। जोगी और मछुआरे की दशा भी खराब थी। कुछ अन्य वर्गों जैसे परय्यन, कल्लर आदि का भी उल्लेख है।
दास प्रथा:- दास प्रथा का उल्लेख निकालो कोण्टी ने किया है। पुरुष एवं महिला दोनों प्रकार के दास थे। दासों के क्रय-विक्रय को वेसवेंग कहा जाता था।
स्त्रियों की दशा:- स्त्रियों की दशा सामान्यतः निम्न थी। परन्तु उत्तर भारत की अपेक्षा कुछ अच्छी थी। ये अंगरंक्षिकाएं भी होती थी। विजय नगर काल में गणिकाओं की स्थित उच्च थी। वेश्याओं से प्राप्त कर से पुलिस एवं सैन्य विभाग का खर्च चलता था।
सामान्यतः विधवाओं की स्थिति सोचनीय थी। परन्तु विधवा विवाह को विवाह कर से मुक्त रखा गया था। इससे पता चलता है कि विजय नगर के शासक विधवाओं की दशा को सुधारना चाहते थे।
दहेज प्रथा:-इस काल में भी दहेज प्रथा प्रचलित थी। देव राय द्वितीय ने 1424-25 ई0 के एक अभिलेख में दहेज को अवैधानिक घोषित कर दिया था।
सती प्रथा:- विजय नगर में सती प्रथा भी प्रचलित थी। इसका वर्णन बारबोसा ने सर्वप्रथम किया है। द्वितीय बार सती प्रथा का उल्लेख करने वाले निकोलो कोण्टी था। इसका प्रमाण अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर भी दिया जा सकता है।
बुक्का प्रथम के समय के 1354 ई0 के एक अभिलेख में मालागौड़ा नामक एक महिला के सती हो जाने का उल्लेख है। परन्तु अभिलेखीय एवं विदेशी यात्रियों के वर्णन में विरोधाभास दिखाई पड़ता है। जहाँ अभिलेखीय प्रमाणों के अनुसार यह प्रथा नायकों तथा राज परिवारों तक ही सीमित थी वहीं बारबोसा के अनुसार ब्राहमणों, चेट्टियों, लिंगायतों में यह प्रथा प्रचलित नहीं थी। सती होने वाली स्त्री के स्मृति में पाषाण स्मारक लगाये जाते थे। जिसे सतीकल कहा जाता था।
वस्त्राभूषण:-सामान्य वर्ग के पुरुष धोती और सफेद कुर्ता पहनते थे। पगड़ी भी पहनने की प्रथा प्रचलित थी। परन्तु वे जूते नहीं पहनते थे। सामान्य वर्ग की स्त्रियाँ साड़ी पहनती थीं जबकि राज परिवार की स्त्रियाँ पावड़ (एक प्रकार का पेटीकोट)। स्त्री एवं पुरुष दोनों आभूषण प्रिय थे। इसी तरह उनमें इत्रों के प्रति लगाव था।
गंड पेद्र:- युद्ध में वीरता दिखाने वाले पुरुष द्वारा पैरों में धारण करने वाला कड़ा जो सम्मान का प्रतीक माना जाता था।
शिक्षा एवं मनोरंजन:- विजय नगर काल में शिक्षा का कोई विभाग नही था न ही किसी विद्यालय की स्थापना करवाई गयी थी। यह मूलतः मंदिरों मठों और अग्रहारों में दी जाती थी। लोक प्रिय विषयों में वेद पुराण, इतिहास, काव्य, नाटक, आयुर्वेद आदि प्रमुख थे।
मनोरंजन के साधनों में नाटक यक्षगान मंच पर संगीत और वाद्यों द्वारा अभिनय लोकप्रिय थे।
वोम लाट:-एक प्रकार का छाया नाटक था। शतरंज और पासा भी लोकप्रिय थे। कृष्ण देवराय स्वयं शतरंज का प्रसिद्ध खिलाड़ी था।
कुश्ती:- पायस के अनुसार (कुश्ती भी लोकप्रिय था) यह पुरुषों और महिलाओं में समान रूप से प्रचलित था।
नोट:-

  1. कुरवाई:- यह एक प्रकार का चावल था।
  2. वेंकट द्वितीय ने पुर्तगालियों को बेल्लौर में एक चर्च बनवाने की अनुमति दी।
  3. स्थानीय प्रशासन में सभाओं का उल्लेख मिलता है। नाडु की सभा को नाडुकहा तथा इसके सदस्यों को नान्तवर कहा गया।
  4. गीली भूमि को नन्जाई तथा नगद लगान को सिद्दम कहा जाता था।
  5. बैलों एवं गायों के मांस को छोड़कर सभी पशुओं के मंास खये जाते थे।
  6. पायस ने नव रात्रि पर्व का उल्लेख किया है। उसके अनुसार इस पर्व के अंतिम दिन ढाई सौ भैसों तथा साढ़े चार हजार भेड़ों की बलि चढ़ाई जाती थी।

दिल्ली सल्तनत प्रशासन,प्रमुख ऐतिहासिक कृतियां

दिल्ली सल्तनत प्रशासन

प्रशासन:-दिल्ली सल्तनत का प्रशासन अरबी-फारसी पद्धति पर आधारित थी। इस प्रशासन का केन्द्र बिन्दु राजा या सुल्तान था। यह सुल्तान खुदा के नाम पर शासन करता था। जबकि वास्तविक सत्ता सुन्नी भातृत्व भासना अथवा मिल्लत में निहित थी। चूँकि मुस्लिम शासन पद्धति धार्मिक पुस्तक कुरान पर आधारित थी और मुस्लिम जगत में पैगम्रुबर के बाद खलीफा ही सर्वोच्च धार्मिक व्यक्ति रह गया था। इसीलिए दिल्ली सल्तनत के अधिकांश शासकों ने खलीफा की सत्ता को स्वीकार किया। और उनसे खिल्लत प्राप्त करने की कोशिश की। केवल अलाउद्दीन खिलजी और मुबारक खिलजी ने किसी भी प्रकार से खलीफा के हस्तक्षेप को स्वीकार नही किया। मुबारक खिलजी ने स्वयं को ही खलीफा कहा। पहले खलीफा की सत्ता का केन्द्र बिन्दु बगदाद था। परन्तु बाद में यह मिश्र में स्थानान्तरित हो गया। तैमूर लंग ने 14वीं शताब्दी में खलीफा की सत्ता को ही समाप्त कर दिया।
सुल्तान के प्रशासनिक कार्यों में सहायता के लिए दो प्रमुख अधिकारी वजीर एवं अमीर होते थे।

वजीर:-दिल्ली सल्तनत के समय वजारत का स्वर्ण काल तुगलकों के समय विशेषकर फिरोज तुगलक के समय माना जाता है। उसके वजीर का नाम खाने जहाँ मकबूल था। जबकि इल्तुतमिश के वजीर का नाम मुहम्मद खाँ जुनेंदी था। वजारत का निम्नकाल बलबन के समय माना जाता है।
अमीर:-अमीरों का स्वर्ण काल लोदियों के समय माना जाता है क्योंकि लोदी शासकों के अपने अफगान अमीरों से सम्बन्ध भाई चारे पर आधारित थे। अमीरों का निम्नकाल बलबन और अलाउद्दीन के समय माना जाता है।
मंत्री परिषद:-सुल्तान के प्रशासनिक कार्यों में सहायता के लिए एक मंत्री परिषद होती थी जिसे मजलिस-ए-खलवत कहा जाता था।
मजलिस-ए-खास:-मजलिस-ए-सलवत की बैठक जिस स्थान पर होती थी उसे मजलिस-ए-खास कहा जाता था। यहाँ पर खास लोगों को ही बुलाया जाता था।
बार-ए-आजम:-यही पर सुल्तान राजकीय कार्यों का अधिकांश भाग पूरा करता था। यहाँ पर उसकी सहायता के लिए विद्वान, काजी मुल्ला आदि भी उपस्थित रहते थे।
बार-ए-खास:-यहाँ सुल्तान अपने प्रमुख सहयोगियों को बुलाकर उनसे मंत्रणा करता था।
मंत्री परिषद या मजलिस-ए-खलवत में चार विभाग अत्यन्त महत्वपूर्ण थे-

  1. दीवान-ए-विजारत:-यह सबसे महत्वपूर्ण विभाग था। यह आर्थिक मंत्रालय की तरह था।
  2. दीवान-ए-अर्ज:- यह सैन्य विभाग था। इसकी स्थापना बलबन ने की थी।
  3. दीवाने-ए-रसालत:- यह विदेश विभाग था।
  4. दीवाने-ए-इंशा:– यह पत्राचार विभाग था। फिरोज तुगलक के समय में इसका स्तर गिर गया था। मुल्तान के गर्वनर एलुल मुल्क मुल्तानों ने अपने पत्रों इंशा-ए-माहरु में शिकायत की है कि लोग अपनी शिकायते सीधे उसके पास न लाकर मौलवियों के पास ले जाते हैं। और ये मौलवी मुझसे जबाव मांगते हैं।

दीवाने-ए-वजारत:- यह सबसे महत्वपूर्ण विभाग था। इसका प्रमुख वजीर अथवा प्रधानमंत्री होता था। दीवाने वजारत से कई विभाग जुड़े हुए थे जिसका वर्णन निम्न लिखित है।

  1.     दीवान-ए-इशराफ:- यह लेखा परीक्षक विभाग था।
  2.     दीवान-ए-इमारत:- यह लोक निर्माण विभाग था। इसकी स्थापना फिरोज तुगलक ने की।
  3.     दीवान-ए-अमीर कोही:- कृषि विभाग, मुहम्मद तुगलक द्वारा स्थापित।
  4.     दीवान-ए-वकूफ:– व्यय की कागजात की देखभाल करना।
  5.     दीवान-ए-मुस्तखराज:- अधिकारियों के नाम बकाया राशि को वसूल करने वाला विभाग था। इसकी स्थापना अलाउद्दीन खिलजी ने की थी।

वजीर के सहयोगी:-

  1.     नायब-ए-वजीर:- वजीर का सहायक।
  2.     मुशरिफ-ए-मुबालिकः- महालेखाकार।
  3.     मुस्तौफी-ए-मुबालिक:- महालेखा परीक्षक।
  4.     मजमुआदार:- आय-व्यय का लेखा-जोखा रखने वाला।
  5.     खजीन:- खजांची
  6.     नासिर:- माप तौल का अधिकारी यह मजमुआदार का सहायक भी होता था।
  7.     वकील-ए-सल्तनत:- नासिरुद्दीन महमूद द्वारा स्थापित विभाग। इस विभाग का कार्य शासन व्यवस्था एवं सैनिक व्यवस्था की देखभाल करना था। इसने वजीर का स्थान ले लिया।
  8.     नाइब-ए-ममालिकात:- इसे बहरामशाह ने स्थापित किया था। इस पद का सर्वप्रथम उपयोग इख्तियारुद्दीन ऐतगीन ने किया। लेकिन इसका सर्वाधिक उपभोग बलबन ने किया।
  9.     मुहतसिब:- अलाउद्दीन द्वारा नियुक्त अधिकारी लोगों के आचरण की जाँच करता था। इसे सेंसर का अधिकारी भी कहा गया।
  10.     सद्र-उस-सुदूर:- धािर्मक एवं दान विभाग।
  11.     काजी-उल-कजात:- न्याय विभाग
  12.     सामान्यतः सद्र-उस-सुदूर एवं काजी उल कजात एक ही व्यक्ति के अधीन होता था तथा इस व्यक्ति का धार्मिक कर जकात पर आधारित होता था।
  13.     वरीद-ए-मुमालिक:- गुप्तचर विभाग का प्रमुख।
  14.     दीवान-ए-इस्तिहाक:– पेंशन विभाग, इसकी स्थापना फिरोज तुगलक ने की।
  15.     दीवान-ए-खैरात:– दान विभाग, फिरोज तुगलक द्वारा स्थापित।
  16.     दारुल-ए-शफा:- औषधियों से सम्बन्धित फिरोज द्वारा स्थापित।

राजदरबार से सम्बन्धित अधिकारी:-

  1.     वकील-ए-दर:- यह शाही महल एवं सुल्तान की व्यक्तिगत सेवाओं की देखभाल करता था।
  2.     बारबरः– यह दरबार की शान शौकत एवं रस्मों की देखभाल करता था।
  3.     अमीर-ए-हाजिब:- सुल्तान से मिलने वाले लोगों की जाँच पड़ताल करता था। इसे दरबारी शिष्टाचार का अधिकारी भी कहा जाता थाा।
  4.     सर-ए-जादारः- सुल्तान के अंगरक्षकों का प्रधान अधिकारी।
  5.     अमीर-ए-मजलिश:- शाही उत्सवों एवं दावतों का प्रबन्ध करने वाला प्रमुख अधिकारी।
  6.     अमीर-ए-शिकार:- सुल्तान के शिकार की व्यवस्था करने वाला।
  7.     अमीर-ए-आखूर:- अश्वशाला का प्रमुख।
  8.     शहना-ए-पील:- हस्ति-सेना का प्रमुख।

                                                                                 प्रान्तीय प्रशासन
केन्द्र-प्रान्त (इक्ता)- शिक-परगना-ग्राम
प्रान्तों को इक्ता या अक्ता कहा जाता था। भारत में इक्ता प्रथा की शुरुआत इल्तुतमिश ने की। इक्ता की परिभाषा निजामुलमुल्क की पुस्तक सियासत नाम में मिलता है। इक्ता इजारेदारी के लिये दिया गया भू-राजस्व क्षेत्र था जो सैनिक या असैनिक किसी को भी दिया जा सकता था। दिल्ली सुल्तानों में सबसे अधिक इक्ता मुहम्मद तुगलक के समय में थे। इक्ता के प्रमुख को इक्तादार या मुक्ता या वली कहा जाता था।
जिला (शिक):- बलबन के समय में इक्ता को जिले अथवा शिकों में विभाजित किया गया शिकों के प्रमुख को शिकदार कहा जाता था।
परगना:- जिले (परगनों) तहसील में विभाजित थे। यहाँ आमिल अथवा नजीम प्रमुख अधिकारी था। इसकी सहायता खजीन मुश्तशरिरफ् आदि लोग करते थे।
ग्राम:- ग्राम के मुखिया को मुकद्दम कहा जाता था जबकि गाँव के जमींदारों को खूत कहा जाता था। साधारण किसानों को बलाहार कहा जाता था।
सैन्य संगठन:– दिल्ली की केन्द्रीय सेना को हश्म-ए-वल्ब कहा जाता था जबकि प्रान्तीय सेना को हश्म-ए-अतरफ कहा जाता था। शाही घुड़सवार सेना को सवार-ए-कल्ब कहते थे। प्रान्तीय घुड़सवार सेना को सवार-ए-अतरफ कहते थे।
सल्तनत कालीन सेना में तुर्क अमीर, ईरानी मंगोल, अफगानी एवं भारतीय मुसलमान सम्मिलित थे।
खास-खेल:– सल्तनत की स्थायी सेना को खास खेल कहा जाता था। पहली बार सैन्य विभाग की स्थापना बलबन के समय में हुयी। इसका नाम दीवार-ए-अर्ज था तथा इसका प्रमुख आरिज-ए-मुमालिक होता था परन्तु पहली बार स्थायी सेना अथवा खड़ी सेना अलाउद्दीन के समय में गठित की गयी। उसने सैनिकों की हुलिया एवं घोड़ों को दागने की प्रथा की भी शुरूआत की।
सेना का आधार:- सेना का संगठन मंगोलों की दशमलव प्रणाली पर किया गया था। सर्वप्रथम इस प्रणाली के आधार पर अलाउद्दीन ने अपनी सेना संगठित की मुहम्मद तुगलक ने आदर्श रूप में दशमलव प्रणाली के आधार पर अपनी सेना गठित की।
दशमलव प्रणाली:- दशमलव प्रणाली के आधार पर निम्नलिखित प्रकार से सेना संगठित की थी-
10 सैनिकों पर एक सर-ए-खेला।
10 सर-ए-खेल पर एक सिपहसालार।
10 सिपहसालार पर एक अमीर।
10 अमीर पर एक मलिक।
10 मलिक पर एक खान।
तुले अह एवं यज्की:- यह सैन्य गुप्तचर थे जो शत्रु सेना की गतिविधियों की सूचना देते थे।
विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र:-
मंजनिक एवं अर्रादा        किलों को तोड़ने वाले अस्त्र।
यर्ख                               शिला प्रक्षेपास्त्र।
फलासून                        गुलेल।
गरगज                           चलायमान मंचा।
संवत्                             सुरक्षित गाड़ी।
न्याय व्यवस्था:- सुल्तान राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश था। इस समय इस्लामी कानून शरियत् कुरान एवं हदीस पर आधारित होते थे। मुस्लिम कानून के चार प्रमुख स्रोत थे-
(1)     कुरान:- मुसलमानों का पवित्र ग्रन्थ एवं मुस्लिम कानून का प्रमुख स्रोत।
(2)    हदीस:- पैगम्बर के कथनों एवं कार्यों का उल्लेख। कुरान द्वारा समस्या का समाधान न होने पर हदीस का सहारा लिया जाता था।
(3)    इज्मा:- मुस्लिम धार्मिक विद्वानों द्वारा व्याख्यायित कानून जो अल्लाह की इच्छा माना जाता था।
(4)     कयास:- तर्क के आधार पर व्याख्यायित कानून।
न्याय का प्रमुख अधिकारी काजी होता था। इसके विभाग को दीवाने कजा कहा जाता था।
अमीर-ए-दाद:- यह काजी के मुकदमों में सहायता करते थे।
नायब-ए-दादबक:- यह अमीर-ए-दाद की सहायता करता था।
फिकह:- इस्लामी धर्म शास्त्र।
मुस्लिम दण्ड विधि को फिकह में बताये गये नियमों के अनुसार कठोरता से लागू किया जाता था। कुरान के नियमों के अनुसार मुस्लिम शासक के निम्नलिखित महत्वपूर्ण कर्तव्य थे।

  1.     मूर्ति पूजकों को नष्ट करना।
  2.     जिहाद (धर्म युद्ध)
  3.     दारुल हर्ब (काफिरो का देश) को दारुल इस्लाम में परिवर्तित करना।

वित व्यवस्था:- सुल्तान कालीन वित्त व्यवस्था सुन्नी विधि की हनकी शाखा के वित सिद्धान्तों पर आधारित थी।
सल्तनत कालीन प्रमुख कर निम्नलिखित थे-
(1) जजिया:– जजिया शब्द जिम्मी शब्द से बना है यह गैर मुस्लिमों को इसलिये देना पड़ता था। क्योंकि वे सैनिक सेवा से मुक्त थे। उनकी जिम्मेदारी मुस्लिम शासक अपने ऊपर लेते थे। इस कर की शुरूआत सिंध पर आक्रमण के बाद से ही हो गयी परन्तु इस कर से ब्राम्हण, स्त्रियां, वृद्ध, अपंग, बच्चे, दास एवं सन्यासी मुक्त थे अर्थात से सामान्यतः वयस्क पुरुषों से लिया जाता था। फिरोज तुगलक ने पहली बार ब्राम्हणों पर भी जजिया लगाया। जजिया एक प्रकार का विभेद कर था। लेकिन इसे धार्मिक कर नहीं माना जा सकता। जजिया से कोई विशेष आय नहीं होती थी। सामान्य वर्ग से 10 टका, मध्यम वर्ग से 20 टका एवं उच्च वर्ग से 40 टका प्रतिवर्ष लिया जाता था।
मध्यकाल में कश्मीर के बड़शाह के नाम से प्रसिद्ध जैनुल अबादीन ने सर्वप्रथम जजिया हटा दिया। बहमनी के शासक अलाउद्दीन हसन बहमनशाह ने भी जजिया हटा दिया था। मुगल काल में इसे अकबर ने हटाया लेकिन औरंगजेब ने पुनः लागू कर दिया। परंन्तु इसका विरोध मेवाड़ के शासक राजसिंह ने किया था। उत्तर कालीन मुगल शासकों में सर्वप्रथम जहाँदारशाह ने इसे हटाया इसके बाद फरुखसियर ने भी उसी नीति को जारी रखा।
(2) जकात:- यह एक धार्मिक कर था। इसकी मात्रा 1/40 अथवा ढाई प्रतिशत होती थी। इस पर काजी का अधिकार होता था। यह केवल धनी मुसलमानों से लिया जाता था।
(3) सदका:- यह भी धार्मिक कर था जिसे कभी-कभी जकात ही मान लिया जाता है।
(4) निसाब:- सम्पत्ति की वह न्यूनतम मात्रा जिसके ऊपर जकात लिया जाता था।
(5) खराज:- यह भू-राजस्व था इसकी मात्रा 1/3 होती थी। अलाउद्दीन जैसे-शासकों ने 50% तक खराज लिया।
(6) उर्स:– मुस्लिमों से लिया गया भू-राजस्व जिसकी मात्रा 10%होती थी।
(7) खम्स:- यह लूट का हिस्सा था कुरान के अनुसार इसका 80ः भाग सेना को मिलना चाहिए जबकि 20% राजा को/अलाउद्दीन ने इसे पलट दिया दिया तथा 80%भाग स्वयं लिया जबकि 20% भाग सेना के लिए छोड़ा। फिरोज तुगलक ने कुरान के अनुसार ही इसका बंटवारा किया।
(8) हाब-ए-सर्ब:- यह सिंचाई कर था। जिसे फिरोज तुगलक ने लागू किया इसकी मात्रा 10% थी।
(9) व्यापारिक कर:- यह मुस्लिमों से 2.5% जबकि गैर मुस्लिमों से 5%लिया जाता था।
(10) घरीकर अथवा चरीकर:- अलाउद्दीन द्वारा शुरुआत क्रमशः मकानों और चारागाह पर कर।

भूमि के प्रकार:-

(1) इक्ता की भूमि:- इस भूमि का मालिक इक्तादार था मुक्ता कहलाता था। बलबन ने ख्वाजा नामक अधिकारी की नियुक्ति की थी जो मुक्ता एवं बली के कार्यों की देखभाल करता था।
(2) खालसा की भूमि:– यह सीधे केन्द्र के नियन्त्रण में होती थी। यहाँ का भू-राजसव आमिल वसूलता था।
(3) उर्सी भूमि:– इस भूमि के मालिक तुर्की मुसलमान होते थे।
(4) इनाम व वक्फ की भूमि:– यह कर मुक्त भूमि होती थी इस पर वंशानुगत अधिकार भी होता था।

लगान व्यवस्था:– 
सल्तनत काल में लगान व्यवस्था के लिए किस्मत-ए-गल्ला, गल्ला बक्शी, बटाई आदि शब्द प्रयुक्त किये गये हैं। यह लगान निर्धारण की ऐसी प्रणाली थी जिसमें राज्य की ओर से प्रत्यक्ष रूप से जमीन की पैदावार से हिस्सा ले लिया जाता था। सल्तनत काल में निम्नलिखित 3 प्रकार की बटाई की व्यवस्था प्रचलित थी।

(1) खेत बटाई:- खड़ी फसल या बुआई के बाद ही खेत को बांटकर कर निर्धारण करना।
(2) लंक बटाई:– खेत काटने के बाद खलियान में लाये गये अनाज से बिना भूसा निकाले कृषक एवं सरकार के बीच बंटवारा।
(3) राशि बटाई:- खलिहान में अनाज से भूसा अलग करने के बाद उसका बंटवारा।
(4) मसाहत:– भूमि के माप के आधार पर लगान निश्चित करने को मसाहत कहा गया। इस प्रणाली की शुरूआत अलाउद्दीन खिलजी ने की।
(5) मुक्ताई:– यह कर निर्धारण (लगान) की मिश्रित प्रणाली थी। इसमें कर ठेकेदार पर लगाया जाता था और ठेकेदार किसानों पर कर लगाता था।
                                                                      प्रमुख ऐतिहासिक कृतियां:-
चचनामाः– अली अहमद द्वारा अरबी में लिखित पुस्तक जो सिन्ध पर अरब आक्रमण का उल्लेख करती है।
तारीखे सिन्ध या तारीखे मासूमी:- लेखक मीर-मुहम्मद मासूम।
अरबों की विजय से लेकर अकबगर के शासन काल तक का इतिहास।
किताबुल यामिनी:- उत्बी –
इस पुस्तक में सुबुक्तगीन एवं गजनवी के शासन काल का वर्णन हे।
जैनुल-अखबार:- अबु सईद-
इस पुस्तक में ईरान का इतिहास एवं महमूद गजनवी के जीवन के विषय में जानकारी मिलती है।
तारीखे मसूदी:- अबुल फजल मुहम्मद बिन हुसैन अल बहरी-
महमूद गजनवी के विषय में जानकारी मिलती है।
तारीख-उल-हिन्द या किताबुल हिन्द या तहकीके हिन्द:-
अलबरुनी 11वीं शताब्दी।
तबकाते नासिरी:- मिनहाजुद्दीन सिराज
मुहम्मद गोरी से लेकर नासिरुद्दीन महमूद तक का इतिहास। मिनहाज ने अपनी कृति को प्रथम इल्बरी वंश के अन्तिम शासक महमूद को समर्पित की थी। इस पुस्तक में नासिरुद्दीन महमूद को दिल्ली सल्तनत का आदर्श सुल्तान बताया गया है। मिनहाज को दिल्ली का मुख्य काजी भी बनााया गया था। (इल्तुतमिश ने)
तारीखे फिरोजशाही:- जियाउद्दीन बरनी –
मिनहाज अपना इतिहास जहाँ खत्म करता है उसके आगे का इतिहास बरनी की पुस्तक से प्राप्त होता है। इसमें बलबन के राज्याभिषेक से लेकर फिरोज तुगलक के शासन के छठें वर्ष तक की जानकारी प्राप्त होती है।
फतवा-ए-जहांदारी:- बरनी-
इस पुस्तक में बर्नी के राजनीतिक सम्बन्धी विचार धाराएं हैं।
अमीर खुसरों की पुस्तकें:-
(1) खजाइन-उल-फतूह:– अलाउद्दीन के काल की प्रथम 15 वर्ष घटनाओं वर्णन है।
(2) किरान-उस-सार्दोन:- इसमें बुगरा खाँ और उसके बेटे कैकुबाद के मिलन का वर्णन है।
(3) मिफ्ता-उल-फतूह:- इसमें जलालुद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों का वर्णन है।
(4) इश्किया आशिका या खिज्र खाँ व देवल रानी की कहानी:- इस पुस्तक में गुजरात के राजा कर्ण की पुत्री देवल रानी और अलाउद्दीन के पुत्र खिज्र खाँ के बीच प्रेम का उल्लेख है। यह पुस्तक अमीर खुसरों ने खिज्र खाँ के कहने पर लिखी। इसी पुस्तक में अमीर खुसरो द्वारा स्वयं को मंगोलो द्वारा कैद किये जाने की भी जानकारी मिलती है।
(5) नूर सिपिहर:- मुबारक खिलजी के समय की जानकारी।
(6) तुगलकनामा:- इस पुस्तक में गयासुद्दीन तुगलक के विजयों आदि का वर्णन है।
(7) फुतुह-उस-सलातीन:– ख्वाजा अबुबक्र इजामी- इस पुस्तक में मुहम्मद तुगलक की धार्मिक नीति की कटु आलोचना की गयी है। यह पुस्तक बहमनी वंश के संस्थापक (शासक) बहमन शाह को समर्पित है।
(8) किताबुल रेहला:- अरबी भाषा में इब्नबतूता की यात्रा वृतान्त। इस पुस्तक में 1333 से 42 ई0 तक भारत की राजनीति व सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख है। इब्नबतूता को मुहम्मद तुगलक ने दिल्ली का काजी भी नियुक्त किया गया था। इसे 1342 में राजदूत बनाकर चीन भी भेजा गया था परन्तु वहाँ पहुँच न सका।
(9) तारीखे-फिरोजशाही:- शम्सेसिराज अफीम
(10) फतुहाते फिरोजशाही:- फिरोज तुगलक
(11) तारीखे मुबारक शाही:- यहिया बिन अहमद सरहिन्दी-
यह सैय्यद वंश के शासक मुबारक शाह को समर्पित है।
(12) गुलरुखी:– सिकन्दर लोदी ने गुलरुख के नाम से फारसी में कवितायें लिखीं।
                                                                                    अनुपात पुस्तकें:-
(1) दुलाईले फिरोजशाही:- फिरोज तुगलक के समय में एंजुद्दीन खालिद खानी द्वारा संस्कृत से फारसी में अनुदित, पुस्तक । यह नक्षय विज्ञान से सम्बन्धित है।
(2) तिब्बे या फरहगे सिकन्दरी:- सिकन्दर लोदी के वजीर मियां भुआ द्वारा संस्कृत से फारसी में अनुवार की गयी। यह पुस्तक चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित है।

सल्तनत कालीन स्थापत्य कला

सल्तनत कालीन स्थापत्य कला

    भारत और तुर्कों के आपसी मिलन से स्थापत्य के क्षेत्र में एक नयी शैली का उदय हुआ जिसे इन्डो-इस्लामिक शैली कहा जाता है। इस शैली की प्रमुख विशिष्टता मेहराब एवं गुम्बद का प्रयोग है। इस शिल्प को अरबों ने रोम से ग्रहण किया था। मेहराबों एवं गुम्बदों के निर्माण से अब स्तम्भों के निर्माण की आवश्यकता नही रह गई। तुर्क अपनी इमारतों में बढि़या किस्म का चूना इस्तेमाल करते थे। इस प्रकार तुर्काें के आगमन से उत्तर-भारत में एक नई स्थापत्य शैली और बढि़या किस्म के चूने का प्रयोग हुआ। अलंकरण के क्षेत्र में तुर्क मानव और पशु आकृतियों का चित्रण नहीं करते थे क्योंकि कुरान में इसकी मनाही थी उनके स्थान पर ज्यामितीय और फूलों के नमूने बनाते थे। इसके साथ ही कुरान की आयतें भी उत्कीर्ण करते थे। इस प्रकार अरबी लिपि भी कला का नमूना बन गई। अलंकरण की संयुक्त विधि ’’अरबस्क’’ कहलाती थी। प्रमुख इमारतों का वर्णन निम्नलिखित है।

1. कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद:- तराइन के युद्ध में सफलता के बाद इस मस्जिद का निर्माण दिल्ली में कुतुबद्दीन-ऐबक ने करवाया। पहले यहाँ पर एक जैन मन्दिर था जो कालान्तर में विष्णु मन्दिर में परिवर्तित कर दिया गया था। इसी विष्णु मन्दिर के ध्वंसावशेषों पर कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण करवाया गया। यह भारत में निर्मित पहली मस्जिद है। इल्तुतमिश एवं अलाउद्दीन के समय में मस्जिद के क्षेत्रफल को बढ़ाया गया।
2. अढाई दिन का झोपड़ा:- कुतुबद्दीन-ऐबक द्वारा अजमेर में निर्मित यह दूसरी मस्जिद है। इसके पहले यहाँ एक मठ था जो कालान्तर में संस्कृत विद्यालय में परिवर्तित हो गया था। एक मस्जिद की दीवारों पर बीसल देव द्वारा रचित हरिकेल नाटक के कुछ अंश उद्धृत हैं।
3. कुतुबमीनार:- यह दिल्ली से 12 मील की दूरी पर मेहरौली गाँव में स्थित है। 1206 ई0 में ऐबक ने इसकी एक मंजिल का निर्माण करवाया था। इसका निर्माण इल्तुतमिश ने दिल्ली के प्रसिद्ध सूफी सन्त कुतुबद्दीन बख्तियार काकी के स्मृति में करवाया था। प्रारम्भ में इसमें कुल चार मंजिले थी। परन्तु फिरोज तुगलक के समय में इसकी चैथी मंजिल क्षतिग्रस्त हो गई तब उसने न केवल इसकी मरम्मत करवाई अपितु पाँचवी मंजिल का निर्माण करवाया। सिकन्दर लोदी ने भी ऊपर की मंजिल की मरम्मत करवाई थी। यह मूलतः लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। परन्तु फिरोज के काल में इसमें संगमरमर भी लगवाया गया इसकी ऊँचाई 71.4 मीटर है तथा इसमें 375 सीढि़यां हैं।
4. नासिरुद्दीन का मकबरा अथवा सुल्तान गढ़ी:- नासिरुद्दीन महमूद इल्तुतमिश का पुत्र था। यह भारत में निर्मित पहला मकबरा है। इसी कारण इल्तुतमिश को मकबरा निर्माण शैली का जन्मदाता माना जाता है। इसमें पहली बार संगमरमर का प्रयोग किया गया सुल्तानगढ़ी में ही पहली बार मेहराब का प्रयोग भी मिलता है।
5. इल्तुतमिश का मकबरा:- निर्माण-इल्तुतमिश द्वारा दिल्ली में।
6. अतर-किन का दरवाजा:– इस दरवाजे का निर्माण इल्तुतमिश ने राजस्थान के नागौर में करवाया। मुहम्मद तुगलक ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। अकबर ने इसी दरवाजे से प्रेरणा लेकर बुलन्द दरवाजे का निर्माण करवाया।
7. मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह:- निर्माण-इल्तुतमिश द्वारा अजमेर में-अलाउद्दीन ने इसे विस्तृत करवाया।
8. लाल महल:- इसका निर्माण बलबन ने दिल्ली के समीप करवाया था।

अलाउद्दीन खिलजी की इमारतें

1. सीरी का नगर:- दिल्ली से कुछ दूरी पर सीरी नामक गाँव में इस नगर का निर्माण करवाया गया। इस नगर में एक तालाब का निर्माण भी करवाया गया जिसे हौज-ए-खास कहा जाता है। इस नगर के अन्तर्गत ही हजार सितून अथवा हजार स्तम्भों वाले महल का निर्माण करवाया।
2. अलाई-दरवाजा:- यह दरवाजा कुतुबमीनार के साथ एक प्रवेश द्वार है। इस दरवाजे में लाल पत्थर एवं संगमरमर का सुन्दर प्रयोग देखने को मिलता है। इस दरवाजे के ऊपर एक गुम्बद भी है जिसके निर्माण में पहली बार सही व वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया गया है। अलाई दरवाजा की साज-सज्जा में बौद्ध तत्वों के मिश्रण का आभास होता है। मार्शल के अनुसार अलाई-दरवाजा इस्लामी स्थापत्य कला के खजाने का सबसे सुन्दर हीरा है।
3. जमैयत खाँ का मस्जिद:– यह पूर्णतः इस्लामी शैली पर आधारित भारत में निर्मित पहली मस्जिद है तथा अलाउद्दीन की सबसे सुन्दर इमारत है।
ऊखा मस्जिद:- कुतुबद्दीन मुबारकशाह द्वारा भरतपुर में निर्मित मस्जिद।
निजामुद्दीन औलिया की दरगाह:- खिज्र खाँ द्वारा निर्मित।
तुगलक कालीन इमारतें:– तुगलक स्थापत्य की प्रमुख विशेषता ढलवा दीवारें हैं इसे सलामी कहा जाता है इसमें इमारते मजबूत और ठोस बनती थी परन्तु फिरोज द्वारा बनवायी इमारतों में सलामी का प्रयोग नही मिलता। तुगलक अपनी इमारतों में मंहगा लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल नही करते थे बल्कि वे सस्ते-मटमैले पत्थर का प्रयोग करते थे। इसको तरासना आसान काम न था। इसी कारण तुगलक कालीन इमारतों में बहुत कम अलंकरण मिलता है लेकिन फिरोज तुगलक की सभी इमारतों में अलंकरण के लिए कमल का प्रयोग हुआ है। प्रमुख इमारतों का वर्णन निम्नलिखित है-
1. तुगलकाबाद:- गयासुद्दीन तुगलक द्वारा दिल्ली के समीप स्थापित एक नया नगर यहीं पर एक दुर्ग 56 कोट का निर्माण किया गया।
2. गयासुद्दीन का मकबरा:- इसका निर्माण गयासुद्दीन तुगलक द्वारा दिल्ली में किया गया।
3. बेगम पुरी मस्जिद:– दिल्ली में मुहम्मद तुगलक द्वारा निर्मित।
4. आदिलबाद का किला:- मु0 तुगलक द्वारा दिल्ली के निकट।
5. जहाँपनाह:- मुहम्मद तुगलक द्वारा दिल्ली के निकट स्थापित नवीन नगर।
6. स्वर्गद्वारी:- कन्नौज के निकट गंगा तट पर मुहम्मद तुगलक द्वारा बनवाया गया नवीन नगर जहाँ मुहम्मद तुगलक ने दुर्भिक्ष के समय में ढाई वर्षों तक निवास किया।
7. बरह खम्भा:- यह मुहम्मद तुगलक के समय में सामन्तों के निवास के समय में बनवाई गई इमारत थी। इस ईमारत की प्रमुख विशेषता सुरक्षा तथा गुप्त निवास है।
8. सथपलाह बाघ और विजाई मण्डल:- ये दोनों दौलताबाद की इमारतें थी जिसका निर्माण मुहम्मद तुगलक ने करवाया था।
फिरोज तुगलक:- इसके समय में सर्वप्रथम दीवान-ए-विजारत विभाग में भवन निर्माण की योजना प्रस्तुत की जाती थी फिरोज ने अपने भवनों का निर्माण मलिक गाजी और अब्दुल हक की देख-रेख में करवाया। प्रसिद्ध विधि इतिहासकार फरिश्ता फिरोज तुगलक को 200 नगरों 20 महलों 30 पाठशालाओं 40 मस्जिदों 100 अस्पतालों 100 स्नानगृहों 150 पुलों और 5 मकबरों के निर्माण का श्रेय देता है। फिरोज तुगलक के समय में प्रमुख निर्माण कार्य निम्नलिखित है।
1. कोटला फिरोजशाह:- दिल्ली में कोटला फिरोजशाह दुर्ग का निर्माण फिरोज तुगलक ने करवाया। दुर्ग के अन्दर निर्मित जामा मस्जिद के सामने अशोक का टोपरा गाँव से लाया गया स्तम्भ गड़ा है।
2. कुश्क-ए-शिकार:- यह मुख्यतः शिकार के लिए बनवाया गया भवन था इसका एक अन्य नाम शाहनुमा मिलता है। इसी भवन के सामने अशोक का दूसरा स्तम्भ लेख दिल्ली-मेरठ स्तम्भ लेख गड़ा है।
3. फिरोज शाह का मकबरा:– इसका निर्माण फिरोज तुगलक ने करवाया। यह एक वर्गाकार इमारत है।
4. खाने जहाँ-तिलंगानी का मकबरा:- खानेजहाँ एक तेलंग ब्राहमण था। वह फिरोज का प्रधानमंत्री भी था। यह मकबरा भारत का पहला अष्टकोणी मकबरा हे। इस मकबरे में लाल पत्थर एवं सफेद संगमरमर का प्रयोग हुआ है। इस मकबरे की तुलना येरुसलम में निर्मित उमर के मस्जिद से की जाती है।
वैसे अण्टकोणी मकबरे लोदी काल की प्रमुख विशिष्टता है।
5. खिड़की मस्जिद:- यह मस्जिद खानेजहाँ द्वारा जहाँपनाह नगर में बनवाया गया। यह वर्गाकार है।
6. काली मस्जिद:- यह दो मंजिली मस्जिद है। इसमें अर्द्ध वृत्तीय मेहराबों का प्रयोग हुआ है।
7. कलम-मस्जिद:- यह मस्जिद शाहजहाँबाद में स्थित है।

कबीरुद्दीन औलिया का मकबरा या लाल गुम्बद:- दिल्ली में स्थित इस मकबरे का निर्माण गयासुद्दीन द्वितीय समय में प्रारम्भ हुआ परन्तु यह नासिरुद्दीन मोहम्मद के समय में पूरा हुआ। इसे लाल गुम्बद भी कहा जाता है।

लोदियों की स्थापत्य
लोदियों के स्थापत्य की प्रमुख विशिष्टता विभिन्न प्रकार के मकबरों का निर्माण है। ये मकबरे विशेषता ऊँचें चबूतरों पर बनाये गये हैं ताकि वे बड़ी और ऊँची लगे। कुछ मकबरें उद्यानों के बीच में बनाये गये हैं। कई मकबरें अष्टकोणीय मकबरे हैं इनका वर्णन निम्नलिखित हैं-
(1) बहलोल लोदी का मकबरा:- यह सिकन्दर लोदी द्वारा बनवाया गया। इसमें लाल पत्थर का प्रयोग हुआ है तथा इसमें कुल पाँच गुम्बद हैं।
(2) सिकन्दर लोदी का मकबरा:- यह इब्राहिम लोदी द्वारा बनवाया गया। यह उद्यान के बीच में निर्मित है। मुगलों ने अपने मकबरों का निर्माण इसी तरह विशाल उद्यानों में करवाया है।
(3) मोठ की मस्जिद:- इसका निर्माण सिकन्दर लोदी के वजीर मिया भुआ द्वारा किया गया।    प्रसिद्ध स्थापत्य कार पर्सी ब्राउन ने लोदियों के काल को मकबरों का युग कहा है। इसमें कई मकबरे अष्टकोणी मकबरे हैं।

संगीत कला

दिल्ली सल्तनत के अधिकांश शासकों ने संगीत को संरक्षण प्रदान किया। बलबन जलालुद्दीन खिलजी अलाउद्दीन खिलजी और मु0 तुगलक ने संगीत को संरक्षण प्रदान किया। बलबन का पुत्र बुगराखाँ भी संगीत का प्रेमी था। जलालुद्दीन खिलजी ने दरबार में संगीतज्ञों का एक समूह तैयार करवाया था। अलाउद्दीन खिलजी से दक्षिण भारत के संगीतज्ञ गोपाल नायक को अपने दरबार में बुलवाया था। उसके समय का अमीर खुसरो महान संगीतज्ञ था। गयासुद्दीन तुगलक संगीत कला का विरोधी था। मु0 तुगलक ने संगीत कला में रुचि ली तथा अनेक संगीत गोष्ठियां आयोजित की। फिरोज तुगलक भी संगीत में रुचि रखता था। उसने सिंहासन पर बैठने के बाद 21 दिन संगीत गोष्ठी का आयोजन करवाया।
जौनपुर में प्रायः सभी शासकों ने संगीत कला को संरक्षण दिया। हुसैन शाह शर्की एक अच्छा संगीतज्ञ था। उसे ’’ख्याल’’ गायिकी के अविष्कार का श्रेय दिया जाता है। उसके संरक्षण में कई विद्वानों ने मिलकर संगीत शिरोमणि नामक ग्रन्थ की रचना की। मालवा के शासक बाज बहादुर और उसकी पत्नी रुपमती संगीत कला के अच्छे ज्ञाता थे। कश्मीर का जैनुल अबादीन भी स्वयं एक योग्य संगीतकार था। बिहार में चिन्तामणि नामक एक महान संगीतज्ञ हुए। इन्हें बिहारी बुलबुल की उपाधि दी गई। ग्वालियर के राजा मानसिंह ने मान कुतबल नामक संगीत ग्रन्थ लिखा। उन्हें ही भारतीय संगीत कला को ध्रुपद राग देने का श्रेय दिया जाता है। उन्हीं के समय में बैजू बावरा जैसे प्रसिद्ध संगीतकार थे।

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