Polity – Articles and Amendments (राजनीति – अनुच्छेद और संशोधन)

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Polity - Articles and Amendments (राजनीति - अनुच्छेद और संशोधन)

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भारत के संविधान के अनुच्छेद 51A के तहत प्रावधान इस से संबंधित है:

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भारतीय संविधान का कौन सा भाग पंचायतों के बारे में बात करता है?

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भारत के संविधान के अनुच्छेद 371 G में विशेष प्रावधान किस राज्य की स्थिति से संबंधित हैं?

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कौन सा संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने सिक्किम को भारतीय संघ के पूर्ण राज्य का दर्जा दिया था?

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भारत के संविधान के अनुच्छेद 350A के तहत प्रावधान किस से संबंधित है:

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‘लघु संविधान’ के रूप में जाना जाने वाला सबसे लंबा (या सबसे बड़ा) संवैधानिक संशोधन अधिनियम कौन सा है?

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निम्नलिखित में से कौन सा अनुच्छेद 'धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता' से संबंधित है?

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निम्नलिखित में से किस संशोधन अधिनियम के माध्यम से "समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता को प्रस्तावना में जोड़ा गया"?

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भारतीय संविधान के निम्नलिखित में से कौन सा अनुच्छेद राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार प्रदान करता है?

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किस संशोधन में भारतीय संविधान में नौवीं अनुसूची जोड़ी गयी?

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कौन सा अनुच्छेद भारतीय संविधान के 11वें मौलिक कर्तव्य का पूरक है?

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74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने _________ जोड़कर नगर पालिकाओं को संवैधानिक मान्यता दी थी।

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_____ 14 वर्ष की आयु तक बच्चों को खतरनाक रोजगार से बचाता है।

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61वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम किससे सम्बन्धित है?

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______ और ______ अल्पसंख्यकों को सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की गारंटी देते हैं।

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संविधान सभा के स्रोत (Source of Constitution)

संविधान सभा के स्रोत


संविधान सभा के स्रोत अन्य देशो से ग्रहण किए गए कुछ प्रमुख प्रावधान
 इस प्रकार है –

  • ब्रिटेन :सरकार का संसदीय स्वरुप,एकल नागरिकता,कानून का शासन,विधि निर्माण की प्रक्रिया,संसदीय विशेषाधिकार,सर्वाधिक मत के आधार पर चुनावों मेंजीत का फैसला |
  • अमेरिका : मौलिक अधिकार,संविधान की सर्वोच्चता,स्वतंत्र न्यायपालिका और न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति,निर्वाचित राष्ट्रपति और महाभियोग,उपराष्ट्रपति का पद,वित्तीय आपात |
  • कनाडा : अर्ध संघात्मक सरकार,सशक्त केंद्र,अवशिष्ट शक्तियों का सिद्धांत 
  • आयरलैंड: नीति निदेशक तत्व,राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल की व्यवस्था,राज्य सभा में मनोनयन, आपातकाल |
  • आस्ट्रेलिया : प्रस्तावना,समवर्ती सूची का प्रावधान,केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों का बिभाजन |
  • जर्मनी : आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति की शक्तियां |
  • दक्षिण अफ्रीका : संविधान संशोधन की प्रक्रिया |
  • रूस : मौलिक कर्तव्य |
  • जापान: विधि द्धारा स्थापित प्रक्रिया |
  • फ्रांस : गणतंत्र,सवतंत्रता,समानता और बंधुत्व का सिद्धांत | 

संविधान की अनुसूचियां एंव व्यवस्था

संविधान की अनुसूचियां

भारतीय संविधान के मूल पाठ में 8 अनुसूचियां थी, लेकिन वर्तमान समय में भारतीय संविधान में 12 अनुसूचियां हैं।  अग्र वर्तमान में संविधान की अनुसूचियां प्रकार है:

प्रथम अनुसूची:-

इसमें भारतीय संघ के घटक राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों का उल्लेख है।

द्वितीय अनुसूची:

इसमें भारतीय राज-व्यवस्था के विभिन्न पदाधिकारियों (राष्ट्रपति, राज्यपाल, लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति और उप-सभापति, विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, विधानपरिषद् के सभापति और उप-सभापति, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और भारत के नियन्त्रक महालेखा परीक्षक, आदि) को प्राप्त होने वाले वेतन, भत्ते और पेन्शन आदि का उल्लेख किया गया है। द्वितीय अनुसूची में इन पदो के उल्लेख का आशय यह है कि इन पदों की संवैधानिक स्थिति प्राप्त है।

तृतीय अनुसूची:-

इसमें विभिन्न पद धारियों (राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, मन्त्री, संसद सदस्य, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, आदि) द्वारा पद ग्रहण के समय ली जाने वाली शपथ का उल्लेख है।

चतुर्थ अनुसूची:-

इसमें विभिनन राज्यों तथा संघीय क्षेत्रों के राज्यसभा में प्रतिनिधित्व का विवरण दिया गया है।

पांचवी अनुसूची:-

इसमें विभिन्न अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियन्त्रण के बारे में उल्लेख है।

छठी अनुसूची:-

इसमें असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में प्रावधान है।

सतवीं अनुसूची:-

इसमें संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों का उल्लेख किया गया है।

आठवीं अनुसूची:

इसमें भारत की 22 भाषाओं का उल्लेख किया गया है। मूल रूप से आठवीं अनुसूची में 14 भाषाएं थीं, 1967 में सिंधी की ओर 1992 में कोंकणी, मणिपुरी तथा नेपाली इन तीन भाषाओं को आठवीं अनुसूची में स्थान दिया गया।

नवीं अनुसूची:-

संविधान में यह अनुसूची प्रथम ’संविधान संशोधन अधिनियम’ (1951) द्वारा जोड़ी गई। इसके अन्तर्गत राज्य द्वारा सम्पत्ति के अधिग्रहण की विधियों का उल्लेख किया गया है। इस अनुसूची में सम्मिलित विधियों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। इस अनुसूची में विभिन्न अधिनियमों को शामिल किया जाना जारी रहा और आज इस अनुसूची में 284 अधिनियमों ने स्थान पा लिया है।

दसवीं अनुसूची:-

यह संविधान में 52वें संवैधानिक संशोधन (1985) द्वारा जोड़ी गई है। इसमें दल-बदल से सम्बन्धित प्रावधानों का उल्लेख है। पिछले अनेक वर्षों से इन बात की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी कि स्थानीय स्वशासन (ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्र) की व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया जाना चाहिए: अतः 1992 में संविधान में 11वीं और 12वीं अनुसूचियां जोड़ी गई हैं।

ग्यारहवी अनुसूची:-

संविधान में यह अनुसूची 73वें संवैधानिक संशोधन (1993) से जुड़ी है। इस अनुसूची के आधार पर ’पंचायती राज-संस्थाओं’ की कार्य करने के लिए 29 विषय प्रदान किये गये हैं।

बारहवीं अनुसूची:-

संविधान में यह अनुसूची 74वें संवैधानिक संशोधन (1993) के आधार पर जुड़ी है। इस अनुसूची में शहरी क्षेत्र की स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को कार्य करने के लिए 18 विषय प्रदान किये गये हैं।

भारतीय नागरिकता (Indian Citizenship)

भारतीय नागरिकता

नागरिकता मनुष्य की उस स्थिति का नाम है, जिसमें मनुष्य को नागरिक का स्तर प्राप्त होता है और नागरिक केवल ऐसे ही व्यक्तियों को कहा जा सकता है जिन्हें राज्य की ओर से सभी राजनीतिक और नागरिक अधिकार प्रदान किये गये हों, और जो उस राज्य के प्रति विशेष भक्ति रखते हों। नागरिक के उपर्युक्त लक्षण को दृष्टि में रखते हुए ही हमारे संविधान में नागरिकता सम्बन्धी कुछ बातों का उल्लेख किया गया है।

भारतीय नागरिकता के कुछ विशेष लक्षण

भारतीय संविधान द्वारा नागरिकता के सम्बन्ध में जो व्यवस्था की गयी है, उसके कुछ विशेष लक्षण इस प्रकार हैं: (1) इकहरी नागरिकता:-सामान्यतया संघात्मक शासन व्यवस्था में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था की जाती है: प्रथम, संघ की नागरिकता और द्वितीय, राज्य की नागरिकता। भारतीय संविधान द्वारा भारत में संघात्मक शासन की व्यवस्था की गयी है, किन्तु अमरीका आदि अन्य संघ राज्यों की भांति भारत में दोहरी नागरिकता की नहीं वरन् एक ही नागरिकता (भारतीय नागरिकता) की व्यवस्था की गयी है। (2) नागरिकता संघीय विषय:-भारतीय संविधान के अनुसार नागरिकता एक संघीय विषय है और राज्य सरकारों को इस सम्बन्ध में कार्य करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। नागरिकता के सम्बन्ध में नियम बनाने और उन्हें संचालित करने का अधिकार केन्द्रीय संसद को ही प्राप्त है। (3) नागरिकता के सम्बनध में अपेक्षाकृत उदार दृष्टिकोण:- साधारणतया अन्य देशों में नागरिकता प्रदान करने के सम्बन्ध में या तो जन्म के सिद्धान्त को अपनाया जाता है अथवा वंश या रक्त के सिद्धानत को, किन्तु भारतीय संविधान के अन्तर्गत नागरिकता प्रदान करने के सम्बन्ध में जन्म के सिद्धान्त और वंश के सिद्धान्त दोनों को ही अपनाया गया था। 1985 तक व्यवस्था यह थी कि 26 जनवरी, 1950 के बाद जो व्यक्ति भारत भूमि पर उत्पन्न हुए हों या जो व्यक्ति चाहे भारत के बाहर उत्पन्न हुए हों, किन्तु जिनके माता-पिता भारत के नागरिक हों, भारत के नागरिक समझे जायेंगे। यह सोचा जा रहा था कि नागरिकता सम्बन्धी इन उदार प्रावधानों का दुरुपयोग किया जा सकता है। अतः ’नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986’ के आधार पर अब यह व्यवस्था की गयी है कि इस देश में जन्म लेने वाले किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता तभी प्राप्त होगी, जबकि उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक होगा। इस प्रकार नागरिकता के सम्बनध में प्रमुख रूप से वंश के सिद्धान्त को अपनाया गया है। नागरिकता के सम्बन्ध में यह व्यवस्था ही व्यावहारिक है।

नागरिकता की व्यवस्था

भारतीय संविधान के 5 से 11 तक के अनुच्छेदों में नागरिकता सम्बन्धी व्यवस्था की गयी है। संविधान अग्रांकित श्रेणी के व्यक्तियों को नागरिकता प्रदान करता है: (1) जन्मजात नागरिक:-संविधान लागू होने के समय (26 जनवरी, 1950 ई.) निम्न तीन श्रेणियों के व्यक्ति भारत के जन्मजात नागरिक माने गये: प्रथम श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जो भारत भूमि में पैदा हुए हों, दूसरी श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जिनके माता-पिता या इन दोनों में से कोई एक भारत की भूमि में पैदा हुए हों, तथा तृतीय श्रेणी में वे व्यक्ति आते हैं जो भारतीय संविधान के घोषित होने के पूर्व कम-से-कम 5 वर्ष से भारत भूमि पर निवास कर रहे हों। (2) शरणार्थी नागरिक:-संविधान में उन व्यक्तियों की नागरिकता का भी विवेचन किया गया है जो पाकिस्तान से भारत आये हैं। संविधान के अनुसार वे व्यक्ति जो 19 जुलाई, 1948 के पूर्व पाकिस्तान से भारत आये हैं, भारत के नागरिक समझे जायेंगे। जो व्यक्ति 19 जुलाई, 1948 के बाद पाकिस्तान से भारत आये और जिन्होंने भारत में कम-से-कम 6 मास रहने के बाद उचित अधिकारी के समक्ष नागरिक बनने के लिए प्रार्थना-पत्र देकर संविधान लागू होने के पूर्व अपना नाम रजिस्टर्ड करा लिया, उन्हें भी नागरिकता का अधिकार प्रदान कर दिया गया। 1 मार्च, 1947 के बाद जो व्यक्ति भारत से पाकिस्तान चले गये हैं, सामान्यतया उन्हें भारतीय नागरिकता से वंचित कर दिया गया है, लेकिन इनमें से भी उन लोगों को, जो भारत में स्थायी निवास का परमिट लेकर पाकिस्तान से भारत में चले आये हैं, 6 महीने भारत में रहने के बाद प्रार्थना-पत्र देकर रजिस्टेªशन करवा लेने पर भारत की नागरिकता मिल सकती है। (3) विदेशों में रहने वाले भारतीय:-विदेशों में जो भारतीय रहते हैं, यदि वे निम्न दो शर्तें पूरी करते हों तो भारतीय नागरिक बन सकते हैं: ;पद्ध उनका या उनके माता-पिता या उनके दादा-दादी का जन्म अविभाजित भारत में हुआ हो, ;पपद्ध उन्होंने विदेश में स्थित भारतीय राजदूत के पास भारत का नागरिक बनने के लिए आवेदन-पत्र देकर अपना नाम रजिस्टर में लिखा लिया हो। संविधान लागू होने के बाद नागरिकता की व्यवस्था

भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955

हमारे संविधान ने संसद को यह अधिकार दिया है कि वह भारतीय नागरिकता से सम्बन्धित सभी विषयों के सम्बन्ध में व्यवस्था करे। अतः संसद ने 1955 ई0 में ’भारतीय नागरिकता अधिनियम’ पारित किया। इस अधिनियम में स्पष्ट किया गया है कि भारतीय नागरिकता की प्राप्ति किस प्रकार होगी तथा किन परिस्थितियों में भारतीय नागरिकता का अन्त हो जाएगा।

नागरिकता की प्राप्ति:-

उपर्युक्त अधिनियम के अनुसार निम्न में से किसी एक आधार पर नागरिकता प्राप्त की जा सकती है: (1) जन्म से-प्रत्येक व्यक्ति जिसका जन्म संविधान लागू होने अर्थात् 26 जनवरी, 1950 को या उसके पश्चात् भारत में हुआ हो वह जन्म से भारत का नागरिक होगा। (कुछ अपवादों जैसे राजनयिकों तथा शत्रु विदेशियों के बच्चे भारत के नागरिक नहीं माने जायेंगे)। (2) रक्त सम्बन्ध या वंशाधिकार से-26 जनवरी, 1950 को या उसके पश्चात् भारत के बाहर जन्मा कोई भी व्यक्ति, कतिपय अपेक्षाओं के अधीन रहते हुए भारत का नागरिक होगा, यदि उसके जन्म के समय उसकी माता या पिता भारत का नागरिक था। (3) पंजीकरण द्वारा-निम्न श्रेणी के व्यक्ति पंजीकरण के आधार पर भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं:   ऐसे व्यक्ति जो 26 जुलाई, 1947 के बाद पाकिस्तान से आए हैं, उस दशा में भारतीय नागरिक माने जायेंगे जब वे आवेदन-पत्र देकर अपना नाम ’भारतीय नियुक्ति अधिकारी’ के पास नागरिकता के रजिस्टर में दर्ज करा लें। परन्तु ऐसे लोगों के लिए शर्त यह होगी कि आवेदन-पत्र देने से पूर्व कम-से-कम 6 माह से भारत में रहते हों तथा उनका या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का जन्म अविभाजित भारत में हुआ हो।

  1. ऐसे भारतीय जो विदेशों में जाकर बस गए हैं, भारतीय दूतावासों में आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे।
  2. विदेशी स्त्रियां, जिन्होंने भारतीय नागरिकों से विवाह कर लिया हो, आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगी।
  3. भारतीय नागरिकों के नाबालिग बच्चे।
  4. राष्ट्रमण्डलीय देशों के नागरिक, यदि वे भारत में ही रहते हों या भारत सरकार की नौकरी कर रहे हों। आवेदन पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।

(4) देशीकरण द्वारा-विदेशी नागरिक भी निम्न शर्तों को पूरा करने पर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं:

  1. वह किसी ऐसे देश का नागरिक न हो जहां भारतीय देशीयकरण द्वारा नागरिक बनने से रोक दिए जाते हों।
  2. वह अपने देश की नागरिकता का परित्याग कर चुका हो और केन्द्रीय सरकार को इस बात की सूचना दे दी हो।
  3.  वह आवेदन देने के पूर्व कम-से-कम एक वर्ष से लगातार भारत में रह रहा हो
  4. वह उपरोक्त एक वर्ष से पहले कम-से-कम 5 वर्षों तक भारत में रह चुका हो या भारत सरकार की नौकरी में रह चुका हो अथवा दोनों मिलाकर 7 वर्ष हो पर किसी हालत में 4 वर्ष से कम समय न हो।
  5. उसका आचरण अच्छा हो।
  6. वह भारत की किसी प्रादेशिक भाषा या राजभाषा का अच्छा जानकार हो।

संविधान में ऐसे व्यक्ति को विशेष छूट दी गई है जो दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य विश्वशान्ति या मानव विकास के क्षेत्र में विशेष कार्य कर चुका हो। उपरोक्त श्रेणी के व्यक्तियों को संविधान में निर्दिष्ट शर्तों को पूरा किए बिना भी नागरिकता प्रदान की जा सकती है। (5) भूमि विस्तार द्वारा-यदि किसी नवीन क्षेत्र को भारत में शामिल किया जाए तो वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। जैसे 1961 ई0 में गोवा को भारत में शामिल किए जाने पर वहां की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो गई।

नागरिकता का अन्त

भारत नागरिकता का अन्त निम्न प्रकार से हो सकता है: (1) नागरिकता परित्याग करने से:-यदि कोई वयस्क व्यक्ति भारतीय नागरिकता के परित्याग की घोषणा करता है तो वह घोषणा विशेष अधिकारी द्वारा पंजीकृत कर ली जायेगी और वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं रहेगा। इसके साथ ही उस व्यक्ति के नाबालिग बच्चों की भारतीय नागरिकता भी समाप्त हो जायेगी। (2) स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार कर लेने से :- यदि भारत का कोई नागरिक पंजीकरण देशीयकरण या अन्य किसी प्रकार से किसी दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो ऐसी स्थिति में वह भारत का नागरिक नहीं रहेगा। (3) संघ सरकार द्वारा नागरिकता का अपहरण:- भारत की संघ सरकार निम्नलिखित कारणों के आधार पर नागरिकता का अपहरण कर सकती है:

  1. असत्य अभिलेख:-यदि किसी व्यक्ति ने धोखा देकर या गलत बयान देकर या आवश्यक बातों को छिपाकर नागरिकता प्राप्त कर ली है तो सही जानकारी प्राप्त होने पर उसकी नागरिकता समाप्त की जा सकती है।
  2. देशद्रोह से:-यदि किसी व्यक्ति ने भारत के प्रति देशद्रोह किया है, या युद्ध के समय शत्रु की सहायता की है।
  3. दीर्घ प्रवास से:-यदि कोई व्यक्ति भारत सरकार की अनुमति के बिना लगातार सात वर्ष तक विदेश में रहे और विदेश के भारतीय दूतावास में अपनी भारतीय नागरिकता बनाये रखने की इच्छा से प्रतिवर्ष पंजीकरण भी न कराये तो उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त की जा सकती है।
  4. अपराध से:- यदि किसी व्यक्ति ने पंजीकरण या देशीयकरण से नागरिकता प्राप्त की है और नागरिकता प्राप्त करने के पांच वर्ष के भीतर किसी देश में उसे कम-से-कम दो वर्ष की सजा हुई है, तो उसकी नागरिकता समाप्त की जा सकती है।

संघ सरकार किसी व्यक्ति की नागरिकता का अन्त करे, इसके पहले उसे अपनी सफाई देने का पूरा अवसर दिया जायेगा। राष्ट्रमण्डलीय नागरिकता:-नागरिकता अधिनियम की एक प्रमुख विशेषता यह है कि राष्ट्रमण्डल के सदस्य देशों के नागरिकों को भारत की राष्ट्रमण्डलीय नागरिकता प्राप्त होगी। केन्द्रीय सरकार पारस्परिक के आधार पर राष्ट्रमण्डलीय देशों के नागरिकों को भारतीय नागरिकता के कुछ अधिकार प्रदान कर सकती है।

नागरिकों को प्राप्त विशेषाधिकार (नागरिकता का महत्व)

निम्नलिखित मूल अधिकार और अधिकार संविधान में केवल नागरिकों को ही प्रदान किए गए हैं: (1) राज्य नागरिकों के बीच केवल मूल वंश जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा-अनुच्छेद 15 (2) राज्य द्वारा प्रदत्त नौकरियों के विषय में अवसर की समानता का अधिकार-अनुच्छेद 16 (3) अनुच्छेद 19 में उल्लिखित मूल स्वतन्त्रताएं, जैसे भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, सभा, संघ, आवास, सम्पत्ति तथा पेशे की स्वतन्त्रता। (4) अनुच्छेद 29 एवं 30 द्वारा प्रदत्त सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार। (5) राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीश, राज्यपाल, महान्यायवादी, महाधिवक्ता, आदि पद केवल नागरिकों द्वारा ही प्राप्त किए जा सकते हैं। (6) केन्द्रीय विधानमण्डल और राज्य विधानमण्डलों के प्रतिनिधियों के चुनने का मताधिकार और इन संस्थाओं के सदस्य बनने के अधिकार केवल नागरिकों को ही प्रदान किए गए हैं। (7) भारत में इन अधिकारों के साथ नागरिकों के कर्तव्य भी निर्धारित किए गए हैं।

मूल अधिकार ( संविधान )

मूल अधिकार

   मूल अधिकारों की आवश्यकता और महत्व:-व्यक्ति और राज्य के आपसी सम्बन्धों की समस्या सदैव से ही बहुत अधिक जटिल रही है और वर्तमान समय की प्रजातन्त्रीय व्यवस्था में इस समस्या ने विशेष महत्व प्राप्त कर लिया है। यदि एक ओर शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए नागरिकों के जीवन पर राज्य का नियन्त्रण आवश्यक है तो दूसरी ओर राज्य की शक्ति पर भी कुछ ऐसी सीमाएं लगा देना आवश्यक है जिससे राज्य मनमाने तरीके से आचरण करते हुए व्यक्तियों की स्वतन्त्रता और अधिकारों के विरूद्ध कार्य न कर सकें। मूल अधिकार व्यक्ति स्वातन्त्र और अधिकारों के हित में राज्य की शक्ति पर प्रतिबन्ध लगाने के श्रेष्ठ उपाय हैं।

मूल अधिकार का अर्थ

वे अधिकार जो व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक तथा अनिवार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किए जाते हैं और जिन अधिकारों में राज्य द्वारा भी हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, मूल अधिकार कहलाते हैं।
व्यक्ति के इन अधिकारों को निम्न आधारों पर मूल अधिकार कहा जाता है। प्रथम, व्यक्ति के पूर्ण मानसिक, भौतिक और नैतिक विकास के लिए ये अधिकार बहुत आवश्यक हैं। इनके अभाव में उनके व्यक्तित्व का विकास रुक जाएगा। इसलिए लोकतन्त्रात्मक राज्य में प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मूल अधिकार प्रदान किए जाते हैं। इन अधिकारों को मूल कहने का द्वितीय कारण यह है कि इन्हें देश का मूल विधि अर्थात् संविधान में स्थान दिया जाता है और साधारणतया संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया के अलावा इनमें और किसी प्रकार से परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। गोपालन बनाम मद्रास राज्य के विवाद में मुख्य न्यायाधीश पातंजलि शास्त्री ने कहा था, ’’मौलिक अधिकारों की मुख्य विशेषता यह है कि वे राज्य द्वारा पारित विधियों से ऊपर हैं।’’ तृतीय, मूल अधिकार साधारणतया अनुल्लंघनीय हैं अर्थात् व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, या बहुमत दल द्वारा उनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है। चतुर्थ, मूल अधिकार न्याय-योग्य ;श्रनेजपबपंइसमद्ध होते हैं अर्थात् न्यायापालिका इन अधिकारों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठा सकती है।

संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार

भारतीय संविधान द्वारा भारतीय नागरिकों को 7 मूल अधिकार प्रदान किए गए थे, किन्तु 44वें संवैधानिक संशोधन (1979) द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में समाप्त कर दिया गया है। अब सम्पत्ति का अधिकार केवल एक कानूनी-अधिकार के रूप में है। इस प्रकार अब भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित 6 मूल अधिकार प्राप्त हैं:
(1) समानता का अधिकार, (2) स्वतन्त्रता का अधिकार, (3) शोषण के विरूद्ध अधिकार, (4) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार, (5) संस्कृति तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार, (6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

(1) समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)

  (i) कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14):-अनुच्छेद 14 के अनुसार भारत के राजय क्षेत्र में राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या कानून से समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। इसके द्वारा राज्य पर बन्धन लगाया गया है कि वह सभी व्यक्तियों के लिए एक-सा कानून बनाएगा तथा उन्हें एकसमान लागू करेगा।
कानून के समक्ष समानता का तात्पर्य यह नहीं है कि औचित्यपूर्ण आधार पर और कानून द्वारा मान्य किसी भेदभाव की भी व्यवस्था नहीं की जा सकती है। यदि कानून कर लगाने के सम्बन्ध में धनी और गरीब में और सुविधाएं प्रदान करने में स्त्रियों और पुरुषों में, भेद करता है तो इसे कानून के समक्ष समानता का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।
 (ii)धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15):-अनुच्छेद 15 में कहा गया है कि ’’राज्य के द्वारा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान, आदि के आधार पर नागरिकों के प्रति जीवन के किसी क्षेत्र में भेदभाव नहीं किया जाएगा।’’ कानून के द्वारा निश्चित किया गया है कि सब नागरिकों के साथ दुकानों, होटलों तथा सार्वजनिक स्थानों, जैसे कुओं, तालाबों, स्नानगृहों, सड़कों, आदि के प्रयोग के सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।
(iii) राज्य के अधीन नौकरियों का समान अवसर (अनुच्छेद 16):- अनुच्छेद 16 के अनुसार, ’’सब नागरिकों को सरकारी पदों पर नियुक्ति के समान अवसर प्राप्त होंगे और इस सम्बन्ध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर सरकारी नौकरी या पद प्रदान करने में भेदभाव नहीं किया जाएगा।’’ इसके अन्तर्गत राज्य को यह अधिकार है कि वह राजकीय सेवाओं के लिए आवश्यक योग्यताएं निर्धारित कर दे। संसद कानून द्वारा संघ में सम्मिलित राज्यों को अधिकार दे सकती है कि वे उस पद के उम्मीदवार के लिए राजय का निवासी होना आवश्यक ठहरा दें। इसी प्रकार सेवा में पिछड़े हुए वर्गों के लिए भी स्थान आरक्षित किये जा सकते हैं।
(iv)अस्पृश्यता का निषेध (अनुच्छेद 17):-सामाजिक समानता को और अधिक पूर्णता देने के लिए अस्पृश्यता का निषेध किया गया है। अनुच्छेद 17 में कहा गया है कि ’’अस्पृश्यता का अन्त किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी अयोग्यता को लागू करना एक दण्डनीय अपराध होगा।’’ हिन्दू समाज से अस्पृश्यता के विष को समाप्त करने के लिए संसद द्वारा 1955 में ’अस्पृश्यता अपराध अधिनियम’(Untouchability Offences Act)  पारित किया गया जो पूरे भारत में लागू होता है। इस कानून के अनुसार अस्पृश्यता एक दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है।
’अस्पृश्यता अपराध अधिनियम’ को 1976 में संशोधित कर इसका नाम ’नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955’ कर दिया गया है। 1989 में इस कानून को और अधिक कठोर बनाते हुए इसे ’अनुसूचित जाति व जनजाति निरोधक कानून 89’ का नाम दे दिया गया। यह कानून अस्पृश्यता के अन्त के लिए अब तक बनाये गये कानूनों में सबसे अधिक कठोर है। आवश्यकता इस बात की है कि इस कानून का उपयोग अवश्य हो, लेकिन कोई दुरुपयोग न हो।
(v)उपाधियों का निषेध (अनुच्छेद 18):- ब्रिटिश शासनकाल में सम्पत्ति आदि के आधार पर उपाधियां प्रदान की जाती थीं, जो सामाजिक जीवन में भेद उत्पन्न करती थीं। अतः नवीन संविधान में इनका निषेध कर दिया गया है। अनुच्छेद 18 में व्यवस्था की गई है कि ’’सेना अथवा विद्या सम्बन्धी उपाधियों के अलावा राज्य अन्य कोई उपाधियां प्रदान नहीं कर सकता।’’ इसके साथ ही भारत का कोई नागरिक बिना राष्ट्रपति की आज्ञा के विदेशी राज्य से भी कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 18 की उपर्युक्त व्यवस्था के बावजूद भारत में 1950 से ही भारत सरकार द्वारा भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पदम् श्री की उपाधियां प्रदान की जाती रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस सम्बन्ध में कहा है कि, ’उपाधियां प्रदान करने की यह व्यवस्था संविधान के प्रतिकूल नहीं है, लेकिन इस सम्बन्ध में शासन की समस्त कार्य विवके संगत रूप में और उचित मापदण्डों पर आधारित होना चाहिए।’

(2) स्वतन्त्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22):-

भारतीय संविधान का उद्देश्य विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वाधीनता सुनिश्चित करना है अतः संविधान के द्वारा नागरिकों को विविध स्वतन्त्रताएं प्रदान की गई हैं। इस सम्बन्ध में अनुच्छेद 19 सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
मूल संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को 7 स्वतन्त्रताएं प्रदान की गई थीं और इसमें छठी स्वतन्त्रता, ’सम्पत्ति की स्वतन्त्रता’ थी। 44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा सम्पत्ति के मौलिक अधिकार के साथ-साथ ’सम्पत्ति की स्वतन्त्रता’ भी समाप्त कर दी गई है और अब 19वें अनुच्छेद के अन्तर्गत नागरिकों को 6 स्वतन्त्रताएं ही प्राप्त हैं।
(i)  विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता:-भारत के सभी नागरिकों के विचार करने, भाषण देने और          अपने    तथा अन्य व्यक्तियों के विचारों के प्रचार की स्वतन्त्रता प्राप्त है। प्रेस भी विचारों के प्रचार का एक साधन होने के कारण इसी में प्रेस की स्वतन्त्रता भी शामिल है।
44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा व्यवस्था की गई है कि प्रेस संसद तथा राज्य विधान मण्डलों की कार्यवाही के प्रकाशन के सम्बन्ध में पूर्ण स्वतन्त्र है और राजय के द्वारा इस सम्बन्ध में प्रेस पर प्रतिबनध नहीं लगाया जा सकेगा। मुम्बई उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने जून 88 में एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए कहा है कि ’अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार दूरदर्शन पर भी लागू होता है।’ न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में कहा, ’’दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों में विशेष तौर पर बातचीत, साक्षत्कार या इसी तरह के कार्यक्रमों में यदि बिना किसी कानूनी आधार के कोई काट-छांट की जाए तो इस प्रकार की कार्यवाही को अवैध घोषित किया जा सकता है।’’सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 10 फरवरी, ’95 के ऐतिहासिक निर्णय में कहा है कि ’’विचार और अभिव्यक्ति के अधिकार में शिक्षित करने, सूचना देने और मनोरंजन करने का अधिकार सम्मिलित है। खेल-कूद गतिविधियों के प्रसारण का अधिकार भी इसमें सम्मिलित है।’’ सर्वाेच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि ’भारतीय आकाश पर राज्य को एकाधिकार प्राप्त नहीं है, लेकिन अन्य एजेन्सियों के प्रसारण अधिकार की सीमाएं हैं।’
(ii)अस्त्र-शस्त्र रहित तथा शान्तिपूर्वक सम्मेलन की स्वतन्त्रता:-व्यक्तियों के द्वारा अपने विचारों के प्रचार के लिए शान्तिपूर्वक और बिना किन्हीं शस्त्रों के सभा या सम्मेलन किया जा सकता है तथा उनके द्वारा जुलूस या प्रदर्शन का आयोजन भी किया जा सकता है। यह स्वतन्त्रता भी असीमित नहीं है और राज्य के द्वारा सार्वजनिक सुरक्षा के हित में इस स्वतन्त्रता को सीमित किया जा सकता है।
(iii)समुदाय और संघ के निर्माण की स्वतन्त्रता:-संविधान के द्वारा सभी नागरिकों को समुदायों और संघ के निर्माण की स्वतन्त्रता प्रदान की गई है, परन्तु यह स्वतन्त्रता भी उन प्रतिबन्धों के अधीन है, जिन्हें राज्य साधारण जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए लगा सकता है। इस स्वतन्त्रता की आउत्र में व्यक्ति ऐसे समुदायों का निर्माण नहीं कर सकता जो षडयन्त्र करें अथवा शान्ति और व्यवस्था को भंग करें।
(iv)भारत राज्य क्षेत्र में अबाध भ्रमण की स्वतन्त्रता:-भारत के सभी नागरिक बिना किसी प्रतिबन्ध या विशेष अधिकार-पत्र के सम्पूर्ण भारत के क्षेत्र में घूम सकते हैं। इस अधिकार पर राज्य सामान्य जनता के हित और अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के हित में उचित प्रतिबनध लगा सकता है।
 (v)भारत राज्य क्षेत्र में अबाध निवास की स्वतन्त्रता:- भारत के सभी नागरिक अपनी इच्छानुसार स्थाई या अस्थाई रूप में किसी भी स्थान पर बस सकते हैं। किन्तु राज्य के द्वारा सामान्य जनता के हित और अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के हित में इन पर उचित प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।
 (vi)वृत्ति, उपजीविका या कारोबार की स्वतन्त्रता:-संविधान ने सभी नागरिकों को वृत्ति, उपजीविका, व्यापार अथवा व्यवसाय की स्वतन्त्रता प्रदान की है, किन्तु राज्य जनता के हित में इन स्वतन्त्रताओं पर उचित प्रतिबन्ध लगा सकता है। राज्य किन्हीं व्यवसायों को करने के लिए आवश्यक योग्यताएं निर्धारित कर सकता है अथवा किसी कारोबार या उद्योग को पूर्ण अथवा आंशिक रूप से स्वयं अपने हाथ में ले सकता है।
इस प्रकार संविधान द्वारा प्रदान की गई उपर्युक्त स्वतन्त्रताएं असीमित नहीं है और इनमें से प्रत्येक पर प्रतिबन्ध लगा दिए गए हैं। इन प्रतिबन्धों के होते हुए भी ये स्वतन्त्रताएं इस दृष्टि से सुरक्षित हैं कि इन स्वतन्त्रताओं पर केवल युक्ति-युक्त प्रतिबन्ध ही लगाए जा सकेंगे और प्रतिबन्ध की युक्तियुक्तता या औचित्य का निर्णय न्यायालय ही करेगा।
अपराध को दोष सिद्धि के विषय में संरक्षण (अनुच्छेद 20):- अनुच्छेद 20 में कहा गया है कि ’’किसी व्यक्ति को उस समय तक अपराधी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि उसने अपराध के समय में लागू किसी कानून का उल्लंघन न किया हो।’’ इसके साथ ही एक अपराध के लिए व्यक्ति को एक ही बार दण्ड दिया जा सकता है सकता है और किसी अपराध में अभियुक्त व्यक्ति को स्वयं अपने विरूद्ध गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा जीवन की सुरक्षा (अनुच्छेद 21):-अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार को मान्यता प्रदान की गई है। इसमें कहा गया है कि ’’किसी व्यक्ति को उसके जीवन तथा दैहिक स्वाधीनता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर अन्य किसी प्रकार से वंचित नहीं किया जा सकता।’’ सर्वोच्च न्यायालय ने 1997 में अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि ’जीवन के अधिकार’ में आवास का अधिकार सम्मिलित है।
44वें संवैधानिक संशोधन (1979) द्वारा जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार को और अधिक महत्व प्रदान किया गया है। अब आपातकाल में भी जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार को समाप्त या सीमित नहीं किया जा सकता है।
बन्दीकरण की अवस्था में संरक्षण (अनुच्छेद 22):-अनुच्छेद 22 के द्वारा बन्दी बनाए जाने वाले व्यक्ति को कुछ अधिकार प्रदान किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि उसके अपराध के बारे में अथवा बन्दी बनाने के कारणों को बतलाए बिना किसी व्यक्ति को अधिक समय तक बन्दीगृह में नहीं रखा जाएगा। उसे वकील से परामर्श करने और अपने बचाव के लिए प्रबन्ध करने का अधिकार होगा तथा बन्दी बनाए जाने के बाद 24 घण्टे के अन्दर-अन्दर (इसमें बन्दीगृह से न्यायालय तक जाने का समय शामिल नहीं है) उसे निकटतम न्यायाधीश के सामने उपस्थित किया जाएगा। अनुच्छेद 22 के द्वारा बन्दी बनाए जाने वाले व्यक्तियों को जो अधिकार प्रदान किए गए हैं वे दो प्रकार के अपराधियों पर लागू नहीं होंगे। प्रथम, शत्रु देश के निवासियों पर और द्वितीय, ’निवारक निरोध अधिनियम के अन्तर्गत गिरफ्तार व्यक्तियों पर।
निवारक निरोध
अनुच्छेद 22 के खण्ड 4 में निवारक निरोध की चर्चा की गई है और यह भारतीय संविधान की सबसे अधिक विवादस्पद धारा है। यद्यपि संविधान में निवारक निरोध की परिभाषा नहीं दी गई है, फिर भी यह कहा जा सकता है कि निवारक निरोध का तात्पर्य वास्तव में, किसी प्रकार का अपराध किए जाने से पूर्व और बिना किसी प्रकार की न्यायिक प्रक्रिया के ही नजरबन्दी है। निवारक निरोध का उद्देश्य व्यक्ति को अपराध के लिए दण्ड देना नहीं, वरन् उसे अपराध करने से रोकना है।
सामान्य काल और संकट काल दोनों में लागू:-निवारक निरोध के सम्बन्ध में विशेष बात यह है कि भारतीय संविधान के अनुसार निवारक निरोध सामान्य काल तथा संकट काल दोनों में लागू होगा। विश्व में अन्य किसी भी प्रजातन्त्रात्मक राज्य में ऐसी व्यवस्था नहीं पाई जाती है।
निवारक निरोध अधिनियम, 1950:-अनुच्छेद 22 के भाग 4, 5 और 6 के अन्तर्गत निवारक निरोध का जो उल्लेख किया गया है, उसके अन्तर्गत संसद के द्वारा 1950 ई0 में निवारक नजरबन्दी अधिनियम पारित किया गया। समय-समय पर इस अधिनियम की अवधि बढ़ाई जाती रही है और यह अधिनियम 31 दिसम्बर, 1969 तक चला।

(3) शोषण के विरूद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 और 24):-

अनुच्छेद 23 के द्वारा बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य जबरदस्ती लिया हुआ श्रम निषिद्ध ठहराया गया है जिसका उल्लंघन विधि के अनुसार दण्डनीय अपराध है। इस अधिकार का एक महत्वपूर्ण अपवाद है। राज्य सार्वजनिक उद्देश्य से अनिवार्य श्रम की योजना लागू कर सकता है, लेकिन ऐसा करते समय राज्य नागरिकों के बीच धर्म, मूलवंश, जाति, वर्ण या सामाजिक स्तर के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा।
बाल श्रम का निषेध:-अनुच्छेद 24 में कहा गया है कि 14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानों, खानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन बच्चों को अन्य प्रकार के कार्यों में लगाया जा सकता है।

(4) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

अन्तःकरण की स्वतन्त्रता:- अनुच्छेद 25 में कहा गया है कि सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए सभी व्यक्तियों को अन्तःकण की स्वतन्त्रता तथा कोई भी धर्म अंगीकार करने, उसका अनुसरण एवं प्रचार करने का अधिकार प्राप्त होगा। सिखों द्वारा कृपाण धारण करना और लेकर चलना धार्मिक स्वतन्त्रता का अंग माना गया है।
अनुच्छेद 25 में व्यवस्था की गई है कि सार्वजनिक प्रकृति की हिन्दू धार्मिक संस्थाओं (मन्दिरों और अन्य स्थानों) में हिन्दू समाज के सभी वर्गों को समान रूप से प्रवेश करने का अधिकार होगा अर्थात् इन संस्थाओं में हिन्दू समाज के किसी भी व्यक्ति को प्रवेश करने से नहीं रोका जा सकेगा।
धार्मिक मामलों का प्रबन्ध करने की स्वतन्त्रता:- अनुच्छेद 26 प्रत्येक धर्म के अनुयायिओं को निम्न अधिकार प्रदान करना है:
(क)    धार्मिक संस्थाओं तथा दान से स्थापित सार्वजनिक सेवा संस्थाओं की स्थापना तथा उनके पोषण का अधिकार।
(ख)    धर्म सम्बन्धी निजी मामलों को स्वयं प्रबन्ध करने का अधिकार।
(ग)    चल और अचल सम्पत्ति के अर्जन और स्वामित्व का अधिकार।
(घ)    उस सम्पत्ति का विधि के अनुसार संचालन करने का अधिकार।
धार्मिक व्यय के लिए निश्चित धन पर कर की अदायगी से छूट:-
अनुच्छेद 27 में कहा गया है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे कर देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है, जिसकी आय किसी विशेष धर्म अथवा धार्मिक सम्प्रदाय के उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विशेष रूप से निश्चित कर दी गई हो।
राजकीय शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा निषिद्ध:- अनु0 28 भारत राज्य का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष राज्य का है, जिसे धार्मिक क्षेत्र में निष्पक्ष रहना है। अतः अनुच्छेद 28 में कहा गया है कि ’’राजकीय निधि से संचालित किसी भी शिक्षण संस्था में किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जाएगी। इसके साथ ही राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त या आर्थिक सहायता प्राप्त शिक्षण संस्था में किसी व्यक्ति को किसी धर्म विशेष की शिक्षा ग्रहण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा।’’
किन्तु अन्य अधिकारों की भांति ही धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार भी प्रतिबन्धरहित नहीं है। राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता एवं स्वास्थ्य इत्यादि के हित में इसके प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा सकता है।

(5) संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनुच्छेद 29 और 30):-

हमारे संविधान के द्वारा भारत में सभी नागरिकों को संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी स्वतन्त्रता का अधिकार भी प्रदान किया गया है। अनुच्छेद 29 के अनुसार, ’’नागरिकों के प्रत्येक वर्ग को अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।’’ यह भी कह दिया गया है कि किसी राजकीय या राजकीय सहायता से संचालित शिक्षण संस्था में प्रवेश के सम्बन्ध में मूलवंश, जाति, धर्म और भाषा या इनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 30 के अनुसार धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शैक्षणिक संस्थाओं की संस्थापना तथा उनके प्रशासन का अधिकार होगा। यह भी व्यवस्था की गई है कि शिक्षण संस्थाओं को अनुदान देने में राज्य इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि वे धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक वर्ग के अधीन है।
44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा सम्पत्ति के मूल अधिकार को समाप्त करने का जो कार्य किया गया है उसके सम्बन्ध में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इससे अल्पसंख्यकों को अपनी रुचि की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना तथा इन शिक्षण संस्थाओं के प्रशासन के अधिकार पर कोई आघात नहीं पहुंचेगा।

(6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32):-

संविधान में मूल अधिकारों के उल्लेख से अधिक महत्वपूर्ण बात उन्हें क्रियान्वयन करने की व्यवस्था है, जिसके बिना मूल अधिकार अर्थहीन सिद्ध होंगे। संविधान निर्माताओं ने इस उद्देश्य से संवैधानिक उपचारों के अधिकार को भी संविधान में स्थान दिया है, जिसका तात्पर्य यह है कि नागरिक अधिकारों को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की शरण ले सकते हैं। इन न्यायालयों के द्वारा व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित उन सभी कानूनों और कार्यपालिका के कार्यों को अवैधानिक घोषित कर दिया जाएगा जो मौलिक अधिकारों के विरूद्ध हों। संवैधानिक उपचारों के अधिकारों की व्यवस्था के महत्व को दृष्टि में रखते हुए डाॅ. अम्बेडकर ने कहा था, ’’यदि कोई मुझसे यह पूछे कि संविधान का वह कौन-सा अनुच्देद है जिसके बिना संविधान शून्यप्राय हो जाएगा, तो इस अनुच्छेद (अनुच्छेद 32) को छोड़कर मैं और किसी अनुच्छेद की ओर संकेत नहीं कर सकता। यह तो संविधान का हृदय तथा आत्मा है। भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर ने इसे ’भारतीय संविधान का सबसे प्रमुख लक्षण’ और संविधान द्वारा स्थापित ’प्रजातान्त्रिक भवन की आधारशिला’ कहा है।
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए निम्न पांच प्रकार के लेख जारी किए जा सकते हैं:
(अ) बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) –व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लिए यह लेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह उस व्यक्ति की प्रार्थना पर जारी किया जाता है जो यह समझता है कि उसे अवैध रूप से बन्दी बनाया गया है। इसके द्वारा न्यायालय बन्दीकरण करने वाले अधिकारी को आदेश देता है कि वह बन्दी बनाए गए व्यक्ति को निश्चित समय और स्थान पर उपस्थित करे, जिससे न्यायालय बन्दी बनाए जाने के कारणों पर विचार कर सके। दोनों पक्षों की बात सुनकर न्यायालय इस बात का निर्णय करता है कि नजरबन्दी वैध है या अवैध, और यदि अवैध होती है तो न्यायालय बन्दी को फौरन मुक्त करने की आज्ञा दे देता है। इस प्रकार अनुचित एवं गैर-कानूनी रूप से बन्दी बनाए गए व्यक्ति बन्दी प्रत्यक्षीकरण के लेख के आधार पर स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं।
(ब) परमादेश (Mandamus)  :-परमादेश का लेख उस समय जारी किया जाता है जब कोई पदाधिकारी अपने सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वाह नहीं करता। इस प्रकार के आज्ञापत्र के आधार पर पदाधिकारी को उसके कर्तव्य का पालन करने का आदेश जारी किया जाता है।
(स) प्रतिषेध (Prohibition) :-यह आज्ञापत्र सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों द्वारा निम्न न्यायालयों तथा अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरणों को जारी करते हुए आदेश दिया जाता है कि इस मामले में अपने यहां कार्यवाही न करें, क्योंकि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है।
(द) उत्प्रेषण (Certiorari)  :-यह आज्ञापत्र अधिकांशतः किसी विवाद को निम्न न्यायालय से उच्च न्यायालय में भेजने के लिए जारी किया जाता है, जिससे वह अपनी शक्ति से अधिक अधिकारों का उपभोग न करे या अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए न्याय के प्राकृतिक सिद्धान्तों को भंग न करे। इस आज्ञापत्र के आधार पर उच्च न्यायालय निम्न न्यायाधीशों से किन्हीं विवादों के सम्बन्ध में सूचना भी प्राप्त कर सकते हैं।
(य) अधिकार-पृच्छा (Quo-warranto)-जब कोई व्यक्ति ऐसे पदाधिकारी के रूप में कार्य करने लगता है, जिसके रूप में कार्य करने का उसे वैधानिक रूप से अधिकार नहीं है तो न्यायालय अधिकार-पृच्छा के आदेश द्वारा उस व्यक्ति से पूछता है कि वह किस आधार पर इस पद पर कार्य कर रहा है और जब तक वह इस प्रश्न पर सन्तोषजनक उत्तर नहीं देता, वह कार्य नहीं कर सकता।
व्यक्तियों के द्वारा साधारण परिस्थितियों में ही न्यायालयों की शरण लेकर अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा की जा सकती है, लेकिन युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह जैसी परिस्थितियों में जबकि राष्ट्रपति के द्वारा संकटकाल की घोषणा कर दी गई हो, मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोई व्यक्ति किसी न्यायालय से प्रार्थना नहीं कर सकेगा। इस प्रकार संविधान के द्वारा संकटकाल में नागरिकों के मौलिक अधिकारों (जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार को छोड़कर) को स्थगित करने की व्यवस्था की गई है।

सम्पत्ति का अधिकार

भारतीय नागरिकों को वर्तमान समय में (1979 और इसके बाद) सम्पत्ति का अधिकार मूल अधिकार के रूप में प्राप्त नहीं है, लेकिन 44वें संवैधानिक संशोधन (30 अप्रैल, 1979) के पूर्व तक सम्पत्ति का अधिकार मूल अधिकार के रूप में प्राप्त था। 1950 से लेकर 1978 तक इस अधिकार के सम्बन्ध में अनेक संवैधानिक संशोधन हुए और यह अधिकार बहुत विवाद का विषय रहा।

मूल कर्तव्य (भारतीय संविधान)

मूल कर्तव्य

1950 में लागू किए गए भारतीय संविधान में नागरिकों के केवल अधिकारों का ही उल्लेख किया गया था, मूल कर्तव्यों का नहीं। लेकिन 1976 में संविधान में व्यापक संशोधन करते समय यह अनुभव किया गया कि संविधान में नागरिकों के मूल कर्तव्यों का भी उल्लेख किया जाना चाहिए। अतः संविधान के चतुर्थ भाग के बाद भाग ’चतुर्थ अ’ जोड़ा गया, जिसमें मूल कर्तव्यों की व्यवस्था की गई है। ये 11 मूल कर्तव्य इस प्रकार हैं:

1. संविधान का पालन तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान:-

भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।

2. राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रेरक आदर्शों का पालन:-

प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वह स्वतन्त्रता के लिए हमारे राट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखे और उनका पालन करे।

3. भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा:-

प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण बनाये रखे। इसे भारतीय नागरिकों के सर्वोच्च कर्तव्य की संज्ञा दी जा सकती है।

4. देश की रक्षा और राष्ट्र सेवा:-

प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह देश की रक्षा करे और बुलाये जाने पर राष्ट्र की सेवा करे।

5. भारत के लोगों में समरसता और भ्रातृत्व की भावना का विकास:-

भारत के सभी भागों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का विकास करे, जो धर्म, भाषा, प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो और ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध हैं। इस प्रकार दो कर्तव्यों का बोध कराया गया है: (i) समस्त भारतीयों के मध्य समरसता और भ्रातृत्व की भावना का विकास और(ii) स्त्रियों का सम्मान करना।

6. समन्वित संस्कृति की गौरवशाली परम्परा की रक्षा:

हमारी समन्वित संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्व समझे और संरक्षण करे।

7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सभी प्राणियों के प्रति दया भाव:-

प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव भी हैं रक्षा करे और उनका सम्वर्द्धन करे तथा प्राणी-मात्र के प्रति दयाभाव रखे।

8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन का विकास:-

प्रत्येक नागरिक की कर्तव्य है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार का भावना का विकास करे।

9. सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा व हिंसा से दूर रहना:-

प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखे व हिंसा से दूर रहे।

10. व्यक्तिगत तथा सामूहिक उत्कर्ष का प्रयास:-

प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरन्तर बढ़ते हुए प्रगति और उपलब्धि की नवीन ऊंचाइयों को छू सके।

11. जो माता-पिता व संरक्षक हों

 वे छः से चैदह वर्ष के बीच की आयु के, यथास्थिति, अपने बच्चे अथवा पतित्र प्रतिवाल्य को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करेगा।

राज्य के नीति निदेशक तत्व [DIRECTIVE PRINCIPLES]

राज्य के नीति निदेशक तत्व [DIRECTIVE PRINCIPLES OF STATE POLICY]

हमारे संविधान की एक प्रमुख विशेषता नीति निर्देशक तत्व हैं। विश्व के अन्य देशों के संविधानों में आयरलैण्ड के संविधान को छोड़कर अन्य किसी देश के संविधान में इस प्रकार के तत्व नहीं हैं। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने संविधान में केवल राज्य के संगठन की व्यवस्था एवं अधिकार-पत्र का वर्णन ही नहीं किया है, वरन् वह दिशा भी निश्चित की है जिसकी ओर बढ़ने का प्रयत्न भविष्य में भारत राज्य को करना है। संविधान-निर्माताओं का लक्ष्य भारत में लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना था, और इसलिए उन्होंने नीति निर्देशक तत्वों में ऐसी बातों का समावेश किया, जिन्हें कार्य रूप में परिणत किये जाने पर एक लोककल्याण राज्य की स्थापना सम्भव हो सकती है।

नीति निदेशक तत्व

संविधान की धारा 36 से 51 तक में राज्य नीति के निर्देशक तत्वों का वर्णन किया गया है। अध्ययन की सुविधा के लिए इन तत्वों को निम्न वर्गों में बांटा जा सकता है:
1. आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी निर्देशक तत्व:-भारतीय संविधान के निर्माताओं का उद्देश्य भारत में एक लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना करना था और इस दृष्टि से अधिकांश निर्देशक तत्वों द्वारा आर्थिक सुरक्षा और आर्थिक न्याय के सम्बन्ध में व्यवस्था की गयी है। संविधान में इस प्रकार के निम्न तत्वों का उल्लेख है:
(1) राज्य प्रत्येक स्त्री और पुरुष को समान रूप से जीविका के साधन प्रदान करने का प्रयत्न करेगा।
(2) राज्य देश के भौतिक साधनों के स्वामित्व और नियन्त्रण की ऐसी व्यवस्था करेगा कि अधिक से अधिक सार्वजनिक हित हो सके।
(3) राज्य इस बात का भी ध्यान रखेगा कि सम्पत्ति और उत्पादन के साधनों का इस प्रकार केन्द्रीकरण न हो कि सार्वजनिक हित की को किसी प्रकार की हानि पहुंचे।
(4) राज्य प्रत्येक नागरिक को चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, समान कार्य के लिए समान वेतन प्रदान करेगा।
(5) राज्य श्रमिक पुरुषों और स्त्रियों के स्वास्थ्य और शक्ति तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न होने देगा।
(6) मूल संविधान में कहा गया था कि ’राज्य बच्चों तथा युवकों की शोषण से तथा भौतिक या नैतिक परित्याग से रक्षा करेगा।’ 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा उसे इस प्रकार संशोधित किया गया है: ’’राज्य के द्वारा बच्चों को स्वस्थ रूप में विकास के लिए अवसर और सुविधाएं प्रदान की जायेंगी, उन्हें स्वतन्त्रता और सम्मान की स्थिति प्राप्त होगी, बच्चों तथा युवकों की शोषण से तथा भौतिक या नैतिक परित्याग से रक्षा की जायेगी। ’’
(7) राज्य अपने आर्थिक साधनों के अनुसार और विकास की सीमाओं के भीतर यह प्रयास करेगा कि सभी नागरिक अपनी योग्यता के अनुसार रोजगार पा सकें, शिक्षा पा सकें एवं बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और अंगहीनता, आदि दशाओं में सार्वजनिक सहायता प्राप्त कर सकें।
(8) राज्य ऐसा प्रयत्न करेगा कि व्यक्तियों को अपनी अनुकूल अवस्थाओं में ही कार्य करना पड़े तथा स्त्रियों को प्रसूतावस्था में कार्य न करना पड़े।
(9) राज्य इस बात का प्रयत्न करेगा कि कृषि और उद्योग में लगे हुए सभी मजदूरों को अपने जीवन-निर्वाह के लिए यथोचित वेतन मिल सके, उनका जीवन-सतर ऊपर उठ सके, वे अवकाश के समय का उचित उपयोग कर सकें तथा उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति का अवसर प्राप्त हो सके।
(10) राज्य का कर्तव्य होगा कि गांवों में व्यक्तिगत अथवा सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन दे।
(11) वैज्ञानिक आधार पर कृषि का संचालन करना भी राज्य का कर्तव्य होगा।
(12) राज्य पशुपालन की अच्छी प्रणालियों का प्रचलन करेगा और गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्ल सुधारने और उनके वध को रोकने का प्रयत्न करेगा।
(13) नवीन अनुच्छेद 39। के अनुसार, ’’राज्य इस बात का प्रयत्न करेगा कि कानूनी व्यवस्था का संचालन समान अवसर तथा नयाय की प्राप्ति में सहायक हो और उचित व्यवस्थापन, योजना या अन्य किसी प्रकार से समाज के कमजोर वर्गों के लिए निःशुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था करेगा, जिससे आर्थिक असामथ्र्य या अन्य किसी प्रकार से व्यक्ति न्याय प्राप्त करने से वंचित न रहें।’’
(14) नवीन ‘A’के अनुसार, ’’राज्य उचित व्यवस्थापन या अन्य प्रकार से औद्योगिक संस्थानों के प्रबन्ध में कर्मचारियों के भागीदार बनाने के लिए कदम उठायेगा।’’
44वें संवैधानिक संशोधन (अप्रैल 1979) द्वारा आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी निर्देशक तत्वों में एक और तत्व जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है कि ’’राज्य न केवल व्यक्तियों की आय और उनके सामाजिक स्तर, सुविधाओं और अवसरों सम्बनधी भेदभाव को कम से कम करने का प्रयत्न करेगा, वरन् विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए व्यक्तियों के समुदायों के बीच विद्यमान आय, सामाजिक स्तर, सुविधाओं और अवसरों सम्बन्धी भेदभाव को भी कम से कम करने का प्रयत्न करेगा।’’
2. सामाजिक हित सम्बन्धी निर्देशक तत्व:- इस सम्बन्ध में राज्य के अधोलिखित कर्तव्य निश्चित किये गये हैं:
(1) राज्य लोगों के जीवन-स्तर को सुधारने और स्वास्थ्य सुधारने के लिए प्रयत्न करेगा। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए औषधि में प्रयोग किये जाने के अतिरिक्त स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक द्रव्यों तथा अन्य पदार्थों के सेवन पर प्रतिबनध लगायेगा।
(2) राज्य जनता के दुर्बलतर अंगों के, विशेषतया अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के, शिक्षा तथा अर्थ सम्बन्धी हितों की विशेष सावधानी से उन्नति करेगा और सामाजिक अन्याय तथा सभी प्रकार के शोधण से उनकी रक्षा करेगा।
3. न्याय, शिक्षा और प्रजातन्त्र सम्बन्धी निर्देशक तत्व:- भारत में सुगम और सुलभ न्याय व्यवस्था, शिक्षा के प्रचार और प्रसार तथा प्रजातन्त्र की भावना के विकास के लिए भी कुछ निर्देशक तत्वों का वर्णन किया गया है, जो इस प्रकार हैं:
(1) न्याय की प्राप्ति हेतु राज्य सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनायेगा और अपनी सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने का प्रयत्न करेगा।
(2) शिक्षा के सम्बनध में यह प्रस्तावित किया गया है कि विधान के लागू होने के 10 वर्ष के समय में राज्य 14 वर्ष तक के बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करेगा।
(3) प्रजातन्त्र की भावना के विकास के लिए निर्देशक तत्वों में कहा गया है कि राज्य ग्राम पंचायतों के संगठन की ओर कदम उठायेगा और इन्हें उतने अधिकार प्रदान किये जायेंगे कि वे स्वायत्ता शासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर सकें।
(4) प्राचीन स्मारकों की रक्षा सम्बन्धी निर्देशक तत्व:- इन तत्वों द्वारा प्राचीन स्मारकों, कलात्मक महत्व के स्थानों और राष्ट्रीय महत्व के भवनों की रक्षा का कार्य भी राज्य को सौंपा गया है। राज्य का कर्तव्य निश्चित किया गया है कि वह प्रत्येक स्मारक, कलात्मक या ऐतिहासिक रुचि के स्थानों को, जिसे संसद ने राष्ट्रीय महत्व का घोषित कर दिया हो, रक्षा करने का प्रयत्न करेगा।
42वें संवैधानिक संशोधन में कहा गया है कि राज्य ’देश के पर्यावरण
(Environment) की रक्षा और उसमें सुधार का प्रयास करेगा। (अनुच्छेद 48’A’)
5. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा सम्बन्धी तत्व:- हमारे देश का आदर्श सदैव ही ’वसुधैव कुटुम्बकम्’ का रहा है और हमने सदैव ही शान्ति तथा ’जीओ और जीने दो’ के सिद्धान्त को अपनाया है। इसी आदर्श को हमारे संविधान के अन्तिम निर्देशक तत्व में इस प्रकार बताया है:
राज्य अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में निम्नलिखित आदर्शों को लेकर चलने का प्रयत्न करेगा:
(अ) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा में वृद्धि,
(ब) राष्ट्रों के बीच न्याय और सम्मानूपूर्ण सम्बन्ध स्थापित रखना,
(स) राष्ट्रों के आपसी व्यवहार में अन्तर्राष्ट्रीय कानून और सन्धियों के प्रति आदर का भाव बढ़ाना,
(द) अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को मध्यस्थता द्वारा सुलझाने के लिए प्रोत्साहित करना।
निर्देशक तत्वों के इस वर्णन के आधार पर कहा जा सकता है कि इन तत्वों के आधार पर भारत में वास्तविकता प्रजातन्त्र की स्थापना हो सकेगी और हमारा देश एक ऐसा लोककल्याणकारी राज्य बन सकेगा जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को स्वतन्त्रता, समता तथा सामाजिक न्याय प्राप्त हो सके।
राज्य की नीति के निदेशक तत्व 
  • अनुच्छेद 38:-राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा।
  • अनुच्छेद 39 क:-समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता
  • अनुच्छेद 40:-ग्राम पंचायतों का संगठन
  • अनुच्छेद 41:-कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार
  • अनुच्छेद 42:-काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबन्ध
  • अनुच्छेद 43:-कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि
  • 43क:-उद्योगों के प्रबन्ध में श्रमिकों का भाग लेना
  • अनुच्छेद 44:-नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता
  • अनुच्छेद 45:-बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबन्ध
  • अनुच्छेद 46:-अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी हितों की अभिवृद्धि
  • अनुच्छेद 47:-पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्तव्य
  • अनुच्छेद 48:-कृषि और पशुपालन का संगठन
  • 48क:-पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन एवं वन्य जीवों की रक्षा
  • अनुच्छेद 49:-राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण
  • अनुच्छेद 50:-कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण
  • अनुच्छेद 51:-अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि

भारतीय संघ व्यवस्था (संविधान)

भारतीय संघ व्यवस्था

 भारतीय संघ व्यवस्था के संविधान द्वारा क्षेत्र के आधार पर शक्तियों का जो विभाजन या केन्द्रीकरण किया जाता है उस दृष्टि से दो प्रकार की शासन व्यवस्थाएं होती हैं: एकात्मक शासन और संघात्मक शासन। भारत क्षेत्र और जनसंख्या की दृष्टि से अत्यधिक विशाल और बहुत अधिक विविधताओं से परिपूर्ण है, ऐसी स्थिति में भारत के लिए संघात्मक शासन व्यवस्था को ही अपनाना स्वाभाविक था और भारतीय संविधान के द्वारा ऐसा ही किया गया है। संविधान के प्रथम अनुच्छेद में कहा गया है कि ’’भारत, राज्यों का एक संघ होगा।’ लेकिन संविधान-निर्माता संघीय शासन को अपनाते हुए भी भारतीय संघ व्यवस्था की दुर्बलताओं को दूर रखने के लिए उत्सुक थे और इस कारण भारत के संघीय शासन में एकात्मक शासन के कुछ लक्षणों को अपना लिया गया है। वास्तव में, भारतीय संघ व्यवस्था में संघीय-शासन के लक्षण प्रमुख रूप से और एकात्मक शासन के लक्षण गौण रूप से विद्यमान हैं।

भारतीय संविधान के संघात्मक लक्षण

भारतीय संघ व्यवस्था में संघात्मक शासन के प्रमुख रूप से चार लक्षण कहे जा सकते हैं: (1) संविधान की सर्वाेच्चता, (2) संविधान के द्वारा केन्द्रीय सरकार और इकाइयों की सरकारों में शक्तियों का विभाजन, (3) लिखित और कठोर संविधान, (4) स्वतन्त्र उच्चतम न्यायालय। भारतीय संविधान में संघात्मक शासन के ये सभी प्रमुख लक्षण विद्यमान हैं।
(1) संविधान की सर्वोच्चता:-भारतीय संविधान इस देश का सर्वोच्च कानून है। इस संविधान की व्यवस्थाएं केन्द्रीय सरकार और सभी रज्य सरकारों पर बन्धनकारी हैं और किसी भी सरकार द्वारा इनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। इस देश में कोई भी शक्ति संविधान से ऊपर नहीं है।
(2) शक्तियों का विभाजन:-विश्व के अन्य संघात्मक संविधानों की तरह भारतीय संविधान द्वारा भी संघ और राज्यों के बीच शक्ति विभाजन किया गया है। संघ सूची में 99 विषय हैं जिन पर संघीय शासन को क्षेत्राधिकार प्राप्त है। राज्य सूची के विषयों की संख्या 61 हैं। ये विषय सामान्य परिस्थितियों में राज्य सरकारों के अधिकार में हैं। समवर्ती सूची में विषयों की संख्या 52 है जिन पर संघ तथा राज्य दोनों को क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं।
(3) लिखित और कठोर संविधान:-भारतीय संविधान एक लिखित संविधान है और संविधान में संशोधन की दृष्टि से कठोर भी है, क्योंकि इस संविधान में साधारण कानून बनाने की पद्धति से भिन्न पद्धति के आधार पर परिवर्तन किया जा सकता है।
(4) स्वतन्त्र उच्चतम न्यायालय:-भारतीय संविधान के द्वारा संविधान के संरक्षण के रूप में कार्य करने के लिए एक स्वतन्त्र उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था की गयी है। संविधान ने एक सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की स्थापना की हे, जिन्हें संघीय संसद या राज्यों की व्यवस्थापिकाओं द्वारा पारित किसी भी ऐसे कानून को अवैधानिक घोषित करने का अधिकार प्राप्त है, जो संविधान की व्यवस्थाओं के विरूद्ध हों। न्यायालयों की जो व्यवस्था संघात्मक शासन के पूर्णतया अनुकूल है।
स्ंविधान की उपर्युक्त व्यवस्थाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान एक पूर्ण संघात्मक व्यवस्था की स्थापना करता है।  

भारतीय संघ व्यवस्था में  एकात्मक लक्षण अथवा भारतीय संघ की विषेषताएं

भारतीय संघ व्यवस्था भारत एक अत्यन्त विशाल और विविधतापूर्ण देश होने के कारण संविधान-निर्माताओं के द्वारा भारत में संघात्मक शासन की स्थापना करना उपयुक्त समझा गया, लेकिन संविधान-निर्माता भारतीय इतिहास के इस तथ्य से भी परिचित थे कि भारत में जब-जब केन्द्रीय सत्ता दुर्बल हो गयी, तब-तब भारत की एकता भंग हो गयी और उसे पराधीन होना पड़ा। इसके अतिरिक्त, संविधान-निर्माता इस बात से भी परिचित थे कि वर्तमान समय के सभी संघात्मक राज्यों में विविध उपायों से केन्द्रीय सत्ता को पहले से अधिक शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है। अतः संघात्मक व्यवस्था को अपनाते हुए भी संविधान-निर्माताओं ने केन्द्रीय सत्ता को अधिक शक्तिशाली बनाना उचित समझा। अतः भारती संविधान द्वारा स्थापित संघात्मक व्यवस्था में अनेक एकात्मक लक्षणों को भी यथास्थान देखा जा सकता है। इन्हें ही भारतीय संघ की विशेषताएं कहा जा सकता है। संविधान के ये एकात्मक लक्षण प्रमुख रूप से निम्नलिखित हैं:
(1) शक्ति का विभाजन केन्द्र के पक्ष में:-  भारतीय संघ व्यवस्था में भारतीय संविधान द्वारा संघ और राजयों के बीच शक्ति विभाजन तो किया गया है, लेकिन शक्ति विभाजन की इस सम्पूर्ण योजना में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति बहुत अधिक प्रबल है। इस शक्ति विभाजन का रूप है: केन्द्रीय सूची में 99 विषय, राज्य सूची में 61 विषय और समवर्ती सूची में 51 विषय। समवर्ती सूची के विषयों पर संघ और राज्य दोनों को ही कानून निर्माण की शक्ति प्राप्त है, लेकिन इन दोनों द्वारा निर्मित कानून में पारस्परिक विरोध की स्थिति में संघीय सरकार के कानून ही मानय होंगे। इस प्रकार संघीय सरकार को राज्य सरकारों की तुलना में बहुत अधिक शक्तियां प्राप्त हैं। इसके अतिरिक्त, सुरक्षा, जल-थल और वायु शक्ति, रेलवे, मुद्रा और वैदेशिक सम्बन्ध, आदि सभी महत्वपूर्ण विषय अकेली संघीय सरकार के अधिकार में हैं और कनाडा के संघ की तरह अवशेष शक्तियां भी केन्द्रीय सरकार को प्राप्त हैं।
(2) इकहरी नागरिकता:- भारत में संयुक्त राज्य अमरीका आदि राज्यों की तरह दोहरी नागरिकता नहीं, वरन् एक ही भारतीय नागरिकता की व्यवस्था है। इकहरी नागरिकता की यह व्यवस्था भारत की एकता को बनाये रखने की दृष्टि से उचित होते हुए भी उसे संघात्मक शासन के सिद्धान्त के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।
(3) संघ और राज्यों के लिए एक ही संविधान:- साधारणतया संघात्मक व्यवस्था के अन्तर्गत राज्यों के संविधान संघ से पृथक् होते हैं, लेकिन भारत में भारतीय संविधान के अन्तर्गत संघ के संविधान के साथ-साथ राज्यों के संविधान भी सम्मिलित हैं।
(4) एकीकृत न्याय-व्यवस्था:-भारतीय संघ में अमरीका या आस्ट्रेलिया के संघ की तरह दोहरी न्याय व्यवस्था का प्रबन्ध करने के स्थान पर न्यायपालिका को बहुत अधिक सीमा तक एकीकृत कर दिया गया है। राज्यों के उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय की ही शाखाएं हैं, सर्वोच्च न्यायालय को उन उच्च न्यायालयों पर व्यापक क्षेत्राधिकार प्रदान किया गया है और उच्च न्यायालयों का निर्माण तथा गठन संघीय सत्ता के द्वारा ही किया जाता है। दिल्ली स्थिति सर्वोच्च न्यायालय देश की सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था के शिखर पर स्थित है और यह केवल एक संघीय न्यायालय ही नहीं, वरन् सर्वोचच अपीलीय न्यायालय है।
(5) संसद राज्यों की सीमाओं के परिवर्तन में समर्थ:-भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार संसद को यह अधिकार प्राप्त है कि उसे द्वारा वर्तमान राज्यों के क्षेत्र में कमी या वृद्धि की जा सकती है, राज्यों के नामों में परिवर्तन किया जा सकता है अथवा दो या दो से अधिक राज्यों को मिलाकर किसी नवीन राज्य का निर्माण किया जा सकता है।
(6) भारतीय संविधान संकटकाल में एकात्मक:-भारतीय संघ व्यवस्था में संघात्मक व्यवस्थाएं शान्तिकाल और संकटकाल दोनों में ही संघात्मक बनी रहती हैं, लेकिन भारतीय संविधान की विशेषता यह है कि सामान्य काल में तो संघात्मक बना रहेगा, लेकिन संकट के समय इसे बिना किसी प्रकार के औपचारिक संशोधन के एकात्मक व्यवस्था का रूप दिया जा सकता है। संकटकाल की घोषणा के क्रियाशील रहने के समय संघीय संसद द्वारा राज्य सूची के विषयों पर भी कानूनों का निर्माण किया जा सकेगा और संघीय शासन के द्वारा राज्य सरकारों को उनके निश्चित क्षेत्र में भी आवश्यक निर्देश दिये जा सकेंगे। इस प्रकार संकटकाल में राज्यों की स्वतन्त्रता का पूर्णतया अन्त हो जाएगा।
(7) सामान्य काल में भी संघीय सरकार की असाधारण शक्तियां:- संविधान द्वारा सामानय काल में भी संघीय सरकार को असाधारण शक्तियां प्रदान की गयी हैं। अनुच्छेद 249 के अनुसार राज्य सभा दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके राष्ट्रीय हित में अल्पकाल के लिए संघीय संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून निर्माण का अधिकार दे सकती है। अनुच्छेद 252 के अनुसार संघीय संसद को इस प्रकार का अधिकार दो या अधिक राज्यों की व्यवस्थापिकाओं द्वारा प्रस्ताव पास करके भी दिया जा सकता है, इसके अतिरिक्त, किसी अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि या समझौते के पालन के लिए भी संघ को सामान्य काल में भी राज्य सूची के विषयों में हस्तक्षेप करने का अधिकार प्राप्त है जो निश्चित रूप में एकात्मक शासन व्यवस्था का ही एक लक्षण है।
(8) मूलभूत विषयों में एकरूपता:- भारतीय संघ व्यवस्था मेंसामान्यतया संघात्मक राज्यों में दोहरा कानूनी प्रशासन तथा दोहरी न्यायिक व्यवस्था होती है, किनतु भारत में उन समस्त मूलभूत विषयों के सम्बन्ध मेंख् जो राष्ट्र की एकता बनाये रखने के लिए आवश्यक हैं, एकरूपता स्थापित करने का प्रयत्न किया गया है। इस सम्बन्ध में प्रमुख रूप से तीन उपाय अपनाये गये हैं: (क) न्यायपालिका का एकीकृत ढांचा, (ख) सारे देश में फौजदारी और दीवानी कानूनों में समानता, (ग) संघ और विभिन्न राज्यों के प्रमुख पदों के लिए सामान्य अखिल भारतीय सेवाएं।
इसी प्रकार सम्पूर्ण भारत के लिए एक ही चुनाव आयोग तथा वित्तीय प्रशासन के लिए एक ही ’नियन्त्रक और महालेखा परीक्षक’ के पद की व्यवस्था है।
(9) राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा:-भारतीय संघ व्यवस्था में भारत में राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और राज्यपाल बहुत कुछ सीमा तक राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में ही कार्य करता है। राज्यपाल की नियुक्ति और कार्य की यह विधि संघात्मक व्यवस्था के सिद्धान्तों के अनुसार नहीं है।
(10) राज्य सभा में इकाईयों को समान प्रतिनिधित्व नहीं:-संयुक्त राज्य अमरीका, स्विट्जरलैण्उ, आस्ट्रेलिया और अन्य संघात्मक राज्यों में संघ की छोटी-बड़ी इकाइयों को संघीय व्यवस्थापिका के द्वितीय सदन में समान प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया है, लेकिन भारतीय संविधान के अन्तर्गत राज्य सभा में इकाइयों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं किया गया है। भारतीय संविधान में इकाइयों की समान स्थिति को स्वीकार न किये जाने के कारण भी इसे संघात्मक व्यवस्था के अनुरूप नहीं कहा जा सकता है।
(11) आर्थिक दृष्टि से राज्यों की केन्द्र पर निर्भरता:-राज्य वित्तीय दृष्टि से आत्मनिर्भर होने के स्थान पर केन्द्र पर निर्भर हैं। केन्द्र के द्वारा राज्यों को विभिन्न प्रकार के अनुदान आदि दिये जाते हैं और आर्थिक सहायता के कारण केन्द्र राज्य पर छाया रहता है। वित्तीय क्षेत्र में आत्मनिर्भर न होने के कारण राज्यों की स्वायत्तता नाममात्र की ही है।
(12) संविधान के संशोधन में संघ को अधिक शक्तियां प्राप्त होना:- भारतीय संघ व्यवस्था में संशोधन से सम्बन्धित उपबन्ध भी राज्य सरकारों पर संघ की सर्वोच्चता के सिद्धान्त पर बल देते हैं। संविधान के अनेक उपबन्धों को तो संघीय संसद के द्वारा साधारण कानूनों के निर्माण की प्रक्रिया से ही संशोधित किया जा सकता है और दूसरे कुछ महत्वपूर्ण उपबन्धों को अकेली संघीय संसद के दोनों सदनों द्वारा अपने दो-तिहाई बहुमत से संशोधित किया जा सकता है। संविधान के केवल कुद ही ऐसे उपबन्ध हैं, जिनके संशोधन के लिए आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति भी आवश्यकता होती है। राज्यों के विधानमण्डलों द्वारा संवैधानिक संशोधन का कोई विधेयक प्रस्तावित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार अन्य किसी भी सध के राज्यों की तुलना में भारतीय संघ व्यवस्था में राज्यों को संवैधानिक संशोधन की बहुत कम शक्ति प्राप्त है।
(13) अन्तर्राज्य परिषद् और क्षेत्रीय परिषदें:-  भारतीय संघ व्यवस्था में  संविधान के अनुच्छेद 263 के अनुसार राष्ट्रपति को अन्तर्राज्य परिषद की नियुक्ति का अधिकार है जिसका कार्य राज्यों के आपसी विवादों की जांच करना और सामान्य हित के विषयों पर विचार करना होगा। इसके अलावा 1956 के ’राज्य पुनर्गठन अधिनियम’ के अन्तर्गत ’क्षेत्रीय परिषदों’ र्;वदंस ब्वनदबपसेद्ध की स्थापना की गयी थी और 1971 में उत्तरी-पूर्वी सीमा के 5 राज्यों और 2 केन्द्र-शासित क्षेत्रों के लिए, ’पूर्वाेत्तर सीमान्त परिषद’ की स्थापना की गयी है। वास्तव में अन्तर्राज्य परिषद् और क्षेत्रीय परिषदें राज्यों के कार्य में समन्वय की दिशा में ही उठाये गये कदम हैं।
(14) भारतीय संघ व्यवस्था में संघीय क्षेत्र:- भारतीय संघ में दो प्रकार की इकाइयां हैं-(क) राज्य, और (ख) संघीय क्षेत्र। वर्तमान समय में 7 संघीय क्षेत्र हैं। संघ के राज्यों को तो राज्य सूची के विषयों पर लगभग पूर्ण अधिकार प्राप्त है, किन्तु संघीय क्षेत्रों के सम्बनध में केन्द्र को नियन्त्रण की प्रभावशाली शक्तियां प्राप्त हैं। संसद को इन क्षेत्रों के सम्बन्ध में कानून निर्माण की शक्ति प्राप्त है और इन क्षेत्रों के सम्बन्ध में कानून निर्माण की शक्ति प्राप्त है और इन क्षेत्रों का प्रशासन राष्ट्रपति अपने द्वारा नियुक्त अधिकारियों की सहायता से करता है।

केन्द्र-राज्य सम्बन्ध (संविधान)

केन्द्र-राज्य सम्बन्ध- सांविधानिक प्रावधान

अनुच्छेद 246:-संसद को सातवीं अनुसूची की सूची 1 में प्रगणित विषयों पर विधि बनाने की शक्ति।
अनुच्छेद 248:-अवशिष्ट शक्तियां संसद के पास
अनुच्छेद 249:-राज्य सूची के विषय के सम्बन्ध में राष्ट्रीय हित में विधि बनाने की शक्ति संसद के पास
अनुच्छेद 250:-यदि आपातकाल की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो तो राज्य सूची के विषय के सम्बन्ध में विधि बनाने की संसद की शक्ति
अनुच्छेद 252:-दो या अधिक राज्यों के लिए उनकी सहमति से विधि बनाने की संसद की शक्ति
अनुच्छेद 257:-संघ की कार्यपालिका किसी राज्य को निदेश दे सकती है
अनुच्छेद 257 क:-संघ के सशस्त्र बलों या अन्य बलों के अभिनियोजन द्वारा राज्यों की सहायता
अनुच्छेद 263:-अन्तर्राज्य परिषद का प्रावधान
भारत के संविधान ने केन्द्र-राज्य सम्बन्ध के बीच शक्तियों के वितरण की निश्चित और सुस्पष्ट योजना अपनायी है। संविधान के आधार पर संघ तथा राज्यों के सम्बन्धों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:
1.    केन्द्र तथा राज्यों के बीच विधायी सम्बन्ध।
2.    केन्द्र तथा राज्यों के बीच प्रशासनिक सम्बन्ध।
3.    केन्द्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय सम्बन्ध।
1.भारतीय संघ में केन्द्र-राज्य विधायी सम्बन्धकेन्द्र-राज्य सम्बन्ध के विधायी सम्बन्धों का संचालन उन तीन सूचियों के आधार पर होता है जिन्हें 

  1. संघ सूची (Union List)
  2. राज्य सूची (State List)
  3. समवर्ती सूची(Concurrent List)

का नाम दिया गया है। इन सूचियों को सातवीं अनुसूची में रखा गया है।
संघ सूची:-इस सूची में राष्ट्रीय महत्व के ऐसे विषयों को रखा गया है जिनके सम्बन्ध में सम्पूर्ण देश में एक ही प्रकार की नीति को अपनाना आवश्यक कहा जा सकता है। इस सूची के सभी विषयों में विधि निर्माण का अधिकार संघीय संसद को प्राप्त है। इस सूची में कुल 99 विषय हैं जिनमें से कुछ प्रमुख ये हैं-रक्षा, वैदेशिक मामले, युद्ध व सन्धि, देशीकरण व नागरिकता, विदेशियों का आना-जाना, रेल, बन्दरगाह, हवाई मार्ग, डाकतार, टेलीफोन व बेतार, मुद्रा निर्माण, बैंक, बीमा, खानें व खनिज, आदि।
राज्य सूची:-इस सूची में साधारणतया वे विषय रखे गये हैं जो क्षेत्रीय महत्व के हैं। इस सूची के विषयों पर विधि निर्माण का अधिकार सामान्यतया राजयों की व्यवस्थापिकाओं को प्राप्त है। इस सूची में 61 विषय हैं, जिनमें कुछ प्रमुख हैं: पुलिस, न्याय, जेल, स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई और सड़कें आदि।
समवर्ती सूची:-औपचारिक रूप में और कानूनी दृष्टि से इन तीनों सूचियों के विषयों की संख्या वही बनी हुई है, जो मूल संविधान में थी। लेकिन 42वें संवैधानिक संशोधन (1976) द्वारा राज्य सूची के चार विषय (शिक्षा, वन, जंगली जानवर तथा पक्षियों की रक्षा और नाप-तौल) समवर्ती सूची में कर दिए गए हैं और समवर्ती सूची में एक नवीन विषय ’जनसंख्या नियन्त्रण और परिवार नियोजन’ शामिल किया गया है। इस प्रकार आज स्थिति यह है कि गणना की दृष्टि से समवर्ती सूची के विषयों की संख्या 52 हो गई है, लेकिन संवैधानिक दृष्टि से समवर्ती सूची के विषयों की संख्या आज भी 47 ही है। इस सूची में साधारणतया वे विषय रखे गए हैं, जिनका महत्व संघीय और क्षेत्रीय, दोनों ही दृष्टियों से है। इस सूची के विषयों पर संघ तथा राज्यों दोनों को ही कानून निर्माण का अधिकार प्राप्त है। यदि इस सूची के किसी विषय पर संघ तथा राज्य सरकार द्वारा निर्मित कानून परस्पर विरोधी हों, तो सामान्यतः संघ का कानून मान्य होगा। इस सूची में कुल 47 विषय हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख विषय हैं: फौजदारी, विधि तथा प्रक्रिया, निवारक निरोध, विवाह और विवाह-विच्छेद, दत्तक और उत्तराधिकार, कारखाने, श्रमिक संघ, औद्योगिक विवाद, सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा, पुनर्वास और पुरातत्व, शिक्षा और वन, आदि।
अवशेष विषय:-भारतीय संघ में कनाडा के संघ की तरह अवशेष विषयों के सम्बन्ध में कानून निर्माण की शक्ति संघीय व्यवस्थापिका को प्रदान की गयी है।
                                           राज्य सूची के विषयों पर संसद की व्यवस्थापन की शक्ति:-
सामान्यतया संविधान द्वारा किए गए इस शक्ति विभाजन का उल्लंघन किसी भी सत्ता द्वारा नहीं किया जा सकता। संसद द्वारा राज्य सूची के किसी विषय पर और किसी राज्य की व्यवस्थापिका द्वारा संघ सूची के किसी विषय पर निर्मित कानून अवैध होगा। लेकिन संसद के द्वारा कुद विशेष परिस्थितियों के अन्तर्गत राष्ट्रीय हित तथा राष्ट्रीय एकता हेतु राज्य सूची के विषयों पर भी कानूनों का निर्माण किया जा सकता है। संसद को इस प्रकार की शक्ति प्रदान करने वाले संविधान के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं:

  1. राज्य सूची का विषय राष्ट्रीय महत्व का होने पर:- संविधान के अनुच्छेद 249 के अनुसार यदि राज्यसभा अपने दो-तिहाई बहुमत से यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेती है कि राज्य सूची में उल्लिखित कोई विषय राष्ट्रीय महत्व का हो गया है, तो संसद को उस विषय पर विधि निर्माण का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इसकी मान्यता केवल एक वर्ष तक रहती है। राज्यसभा द्वारा प्रस्ताव पुनः स्वीकृत करने पर इसकी अवधि में एक वर्ष की वृद्धि और हो जाएगी। इसकी अवधि समाप्त हो जाने के उपरान्त भी यह 6 माह तक प्रयोग में आ सकता है।
  2. राज्यों के विधानमण्डलों द्वारा इच्छा प्रकट करने पर:- अनुच्छेद 252 के अनुसार यदि दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमण्डल प्रस्ताव पास कर यह इच्छा व्यक्त करते हें कि राज्य सूची के किन्हीं विषयों पर संसद द्वारा कानून का निर्माण किया जाए, तो उन राज्यों के लिए उन विषयों पर अधिनियम बनाने का अधिकार संसद को प्राप्त हो जाता है। राज्यों के विधानमण्डल न तो इन्हें संशोधित कर सकते हैं और न ही इन्हें पूर्ण रूप से समाप्त कर सकते है
  3. संकटकालीन घोषणा होने पर (अनुच्छेद 250):-संकटकालीन घोषणा की स्थिति में राज्य की समस्त विधायिनी शक्ति पर भारतीय संसद का अधिकार हो जाता है। इस घोषणा की समाप्ति के 6 माह बाद तक संसद द्वारा निर्मित कानून पूर्ववत् चलते रहेंगे
  4. विदेशी राज्यों से हुई सन्धियों के पालन हेतु (अनुच्छेद 253):-यदि सरकार ने विदेशी राज्यों से किसी प्रकार की सन्धि की है अथवा उनके सहयोग के आधार पर किसी नवीन योजना का निर्माण किया है तो इस सन्धि के पालन हेतु संघ सरकार को सम्पूर्ण भारत की सीमा क्षेत्र के अन्तर्गत पूर्णतया हस्तक्षेप और व्यवस्था करने का अधिकार होगा। इस प्रकार इस स्थिति में भी संसद को राज्य सूची के विषय पर कानून निर्माण का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
  5. राज्य में संवैधानिक व्यवस्था भंग होने पर (अनुच्छेद 356):-यदि किसी राज्य में संवैधानिक संकट उत्पन्न हो जाए या संवैधानिक संकट उत्पन्न हो जाए या संवैधानिक तन्त्र विफल हो जाए तो राष्ट्रपति राज्य विधानमण्डल के समस्त अधिकार भारतीय संसद को प्रदान करता है।
  6. कुछ विधेयकों को प्रस्तावित करने और कुछ की अन्तिम स्वीकृति के लिए केन्द्र का अनुमोदन आवश्यक:-अनुच्छेद 304(ख) के अनुसार कुछ विधेयक ऐसे होते हैं, जिनके राज्य विधानमण्डल में प्रस्तावित किए जाने के पूर्व राष्ट्रपति की पूर्व-स्वीकृति की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, वे विधयक, जिनके द्वारा सार्वजनिक हित की दृष्टि से उस राज्य के अन्दर या उसके बाहर व्यापार, वाणिज्य या मेलजोल पर कोई प्रतिबन्ध लगाए जाने हों।

अनुच्छेद 31(ग) के अनुसार राज्य सूची के ही कुछ विषयों पर राज्यों की व्यवस्थापिकाओं द्वारा पारित विधेयक उस दशा में अमान्य होंगे, यदि उन्हें राष्ट्रपति के विचारार्थ न रोके रखा हो और उन पर राष्ट्रपति की स्वीकृति न प्राप्त कर ली गयी हो। उदाहरण के लिए, किसी राज्य द्वारा सम्पत्ति के अधिग्रहण के लिए बनाए गए कानूनों या समवर्ती सूची के विषयों के बारे में ऐसे कानूनों, जो संसद के उससे पहले बनाए गए कानून के प्रतिकूल हों या उन पर जिनके द्वारा ऐसी वस्तुओं की खरीद और बिक्री पर लगाया जाने वाला हो, जिन्हें संसद ने समाज के जीवन के लिए आवश्यक घोषित कर दिया है, राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है।
राज्य-सूची के विषयों पर केन्द्रीय हस्तक्षेप:-राज्यों द्वारा यह भी शिकायत की गयी है कि केन्द्र उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य जैसे विषयों पर कानून बनाने लग गया है, जबकि ये विषय राज्य सूची में उल्लिखित हैं। सन् 1951 में संसद ने उद्योग विकास एवं नियन्त्रण अधिनियम पारित किया, जिसमें उन उद्योगों का उल्लेख किया गया, जिन पर जनहित में केन्द्र द्वारा नियन्त्रण करना आवश्यक था। धीरे-धीरे अनेक उद्योगों को इस अधिनियम के अन्तर्गत ले लिया गया। इस प्रकार राज्य सूची में वर्णित 24, 26 तथा 27 क्रम वाले विषयों पर केन्द्र का अधिकार स्थापित हो गया। यही नहीं, रेजन पत्ती, कागज, गोंद, जूते, माचिस, साबुन, आदि से सम्बन्धित उद्योगों पर भी केन्द्रीय सरकार का नियन्त्रण स्थापित हो गया। राज्यों के नेताओं का कहना है कि इस प्रकार के अत्यधिक केन्द्रीकरण से राज्यों का आर्थिक विकास अवरूद्ध हो रहा है।
2. भारतीय संघ में केन्द्र-राज्य

प्रशासनिक सम्बन्ध

प्रशासनिक सम्बन्ध: संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में
भारतीय संविधान के ग्यारहवें भाग के दूसरे अध्याय में केन्द्र तथा राज्यों के बीच प्रशासनिक सम्बन्धों की चर्चा की गयी है। संविधान के अनुच्छेद 73 के अनुसार केन्द्र की प्रशासकीय शक्ति उन विषयों तक सीमित है जिन पर संसद को विधि निर्माण का अधिकार प्राप्त है। इसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 162 के अनुसार राज्यों की प्रशासकीय शक्तियां उन विषयों तक सीमित हैं जिन पर राज्य विधानसभाओं को कानून बनाने का अधिकार है। समवर्ती सूची के विषयों के सम्बन्ध में प्रशासनिक अधिकार साधारणतया राज्यों में निहित हैं, किन्तु इन विषयों पर राज्य की प्रशासकीय शक्तियों को संघ की ऐसी प्रशासनिक शक्तियों द्वारा सीमित रखा गया है जो या तो संविधान द्वारा या संसदीय विधि द्वारा प्रदत्त हैं।
प्रशासनिक सम्बन्ध
(क) राज्यों के ऊपर संघीय नियन्त्रण के उपाय:-संकटकाल में केन्द्रीय सरकार का राज्य सरकार के ऊपर पूर्ण नियन्त्रण रहता है। साधारण काल में यद्यपि राज्य सरकारों को सामान्यतया अपने क्षेत्र में पूर्ण सत्ता प्राप्त रहती है फिर भी केन्द्रीय सरकार कुछ सीमा तक उन्हें नियन्त्रित करती है। नियन्त्रण के अग्रलिखित साधनों को अपनाया गया है:

  • राज्य सरकारों को निर्देश:- अनुच्छेद 256 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार होगा कि संसद द्वारा निर्मित कानूनों का पालन सुनिश्चित रहे। संघीय कार्यपालिका को यदि वह आवश्यक समझे तो इस सम्बन्ध में राज्य सरकारों को आवश्यक निर्देश द्वारा पारित विधियों के क्रियान्वयन के मार्ग में कोई बाधा न पहुंचे।

अनुच्छेद 257 में उपबन्धित किया गया है कि प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का इस प्रकार प्रयोग होना चाहिए जिससे संघ की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में बाधा या प्रतिकूल प्रभाव न पड़े तथा संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य को ऐसे निर्देश देने तक विस्तृत होगा, जो भारत सरकार को इस प्रयोग के लिए आवश्यक दिखायी दे। यह देखना भी संघ की कार्यपालिका का कर्तव्य है कि राज्य सरकारें सामरिक महत्व की सड़कों और अन्य संचार साधनों की उचित देखभाल करें।
संघीय कार्यपालिका किसी राज्य क्षेत्र के अन्तर्गत रेल-पथ की रक्षा के लिए उस राज्य की सरकार को निर्देश दे सकती है। संचार साधनों तथा रेल-पथों के निर्माण, देखभाल तथा संरक्षण के सम्बन्ध में संघीय कार्यपालिका के निर्देश के कारण जो अतिरिक्त व्यय होगा, उस अतिरिक्त धनराशि का वहन संघीय सरकार को करना होगा।
उल्लेखनीय यह है कि अनुच्छेद 256 संघीय कार्यपालिका को उसके निर्देशों को लागू करने के लिए बाध्यकारी शक्ति प्रदान करता है। इसके अन्तर्गत राज्य सरकार द्वारा निर्देशों का पालन न किए जाने पर राष्ट्रपति संकटकाल की उद्घोषणा कर राज्य के शासन को अपने हाथ में ले सकता है।

  • राज्य सरकारों को संघीय कृत्य सौंपना:- अनुच्छेद 258 में निर्धारित शर्तों के अनुसार संघ राज्यों को अपने कुछ प्रशासनिक कृत्य हस्तान्तरित कर सकता है तथा राज्य संघ को अपने कुछ प्रशासनिक कृत्य सौंप सकते हैं। संघ सरकार द्वारा राज्य सरकारों को अपने प्रशासनिक कृत्य सौंपे जाने पर इन कृत्यों को सम्पन्न करने में जो भी खर्च होगा उसका वहन संघीय सरकार करेगी।
  • अखिल भारतीय सेवाएं:- अनुच्छेद 312 के अनुसार राज्यसभा उपस्थित तथा मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा प्रस्ताव पास कर किसी नवीन अखिल भारतीय सेवा का निर्माण कर सकती है। यद्यपि इन सेवाओं के सदस्यों द्वारा वेतन, भत्ते, आदि राज्य सरकारों से प्राप्त किए जाते हैं, लेकिन उनकी वेतन शृंखला और अन्य उपलब्धियां केन्द्र सरकार द्वारा ही निश्चित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, इन सेवाओं के सदस्यों के विरूद्ध कोई भी अनुशासन सम्बन्धी कार्यवाही संघीय गृह मन्त्रालय द्वारा संघ लोक सेवा आयोग के परामर्श के आधार पर ही की जा सकती है। ये अखिल भारतीय सेवाएं राज्य सरकारों पर केन्द्रीय नियन्त्रण के बहुत अधिक महत्वपूर्ण उपाय हैं।
  • सहायता अनुदान:-अनुच्छेद 275 के अनुसार संसद राज्यों को आवश्यकतानुसार सहायता व अनुदान भी दे सकती हे। अनुदान देते समय संसद राज्यों पर कुछ शर्तें लगाकर उनके व्यय को भी नियन्त्रित कर सकती है।
  • आपातकाल की घोषणा:-इन सबके अतिरिक्त जब राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत आपातकाल की घोषणा करते हैं तब राज्यों पर संघीय सरकार का पूर्ण नियन्त्रण स्थापित हो जाता है।

(ख) केन्द्र-राज्य मतभेदों के निवारण की विधियां:-संघीय शासन प्रणाली में पारस्परिक सहयोग होना आवश्यक है। यद्यपि राज्यों को पृथक क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं तथापि संविधान में निम्नलिखित विषयों पर राज्यों के पारस्परिक सहयोग पर बल दिया गया है:

  1. संघीय क्रियाओं, अभिलेखों तथा न्यायिक कार्यवाहियों को मान्यता प्रदान करना:-अनुच्छेद 261 के अनुसार, भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र संघ की तथा प्रत्येक राज्य की सार्वजनिक क्रियाओं, अभिलेखों तथा न्यायिक कार्यवाहियों को पूरी मान्यता दी जाएगी। इनकी प्राथमिकता सिद्ध करने की रीति और शर्तें तथा उनके प्रभाव का निर्धारण संसद द्वारा उपबन्धित रीति के अनुसार होगा। यह भी आयोजित किया गया है कि भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भाग के दीवानी न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णय तथा आदेश उस राज्य क्षेत्र के अन्दर सभी स्थानों पर निष्पादित किए जाएंगे।
  2. अन्तर्राज्यीय नदियों या नदी के जल सम्बन्धी विवादों का निर्णय:- अनुच्छेद 262 के अनुसार, किसी अन्तर्राज्यीय नदी तथा घाटी के या जलाशयों के प्रयोग, वितरण, विवाद या फरियाद के न्याय निर्णय के बारे में संसद विधि द्वारा व्यवस्था करेगी। ऐसे विवाद के सम्बन्ध में संसद यह निर्णय भी कर सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय या अन्य कोई न्यायालय इस सम्बन्ध में क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करेगा।
  3. अन्तर्राज्य परिषद की व्यवस्था:- अनुच्छेद 263 के अन्तर्गत, राज्यों के पारस्परिक सहयोग के लिए एक अन्तर्राज्यीय परिषद का प्रावधान किया गया है। इस परिषद का प्रमुख कार्य राज्यों के मध्य विवादों का परीक्षण करना तथा उन पर परामर्श देना है। भारतीय राज व्यवस्था में पहली बार जून 1990 में अन्तर्राज्य परिषद की स्थापना की गई है।
  4. क्षेत्रीय परिषदों  का निर्णय(Zonal Councils):-क्षेत्रीय परिषदों का निर्माण भी किया जा सकता है। व्यवहार में सम्पूर्ण भारत को पांच क्षेत्रों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक क्षेत्रीय परिषद है। क्षेत्रीय परिषदों के कार्य उन विषयों से सम्बन्धित होंगे जिनमें क्षेत्र के सभी या कुछ राज्य या संघ और एक या अधिक राज्य रुचि रखते हैं।
  5. अन्तर्राज्यीय व्यापार-वाणिज्य से सम्बन्धित संविधान के प्रावधानों के क्रियान्वयन के लिए अनुच्छेद 307 के अनुसार संसद एक प्राधिकारी की नियुक्ति करेगी तथा उसको ऐसी शक्तियां और कर्तव्य सौंप सकती है जो वह आवश्यक समझे।
  6. इसके अतिरिक्त कतिपय ऐसे भी विषय हैं जिनका सम्बन्ध यद्यपि दोनों सरकारों से है तथापि इनका निर्धारण केन्द्रीय सरकार ही करती है। उदाहरण के लिए, निर्वाचन, लेखा परीक्षण, राज्यपाल की नियुक्ति, आदि।

3. भारतीय संघ में केन्द्र-राज्य वित्तीय सम्बन्ध
केन्द्र-राज्य वित्तीय सम्बन्ध: संवैधानिक प्रावधान
केन्द्र तथा राज्यों के मध्य राजस्व के साधनों के विभाजन के आधारभूत सिद्धान्त हैं-कार्यक्षमता, पर्याप्तता तथा उपयुक्तता। इन तीनों उद्देश्यों की एक साथ ही प्राप्ति अत्यन्त कठिन थी, अतः भारतीय संविधान में समझौतें की चेष्टा की गयी। संविधान द्वारा केन्द्र तथा राज्यों के मध्य वित्तीय सम्बन्धों को निरूपण इस प्रकार किया जाता है:
1. कर निर्धारण, शक्ति का वितरण और करों से प्राप्त आय का विभाजन:- भारतीय संविधान में वित्तीय प्रावधानों की दो विशेषताएं हैं: प्रथम, संघ तथा राज्यों के मध्य कर-निर्धारण की शक्ति का पूर्ण विभाजन कर दिया गया है और द्वितीय, करों से प्राप्त आय का बंटवारा होता है।
संघ के प्रमुख राजस्व स्रोत इस प्रकार हैं-निगम कर, सीमा शुल्क, निर्यात शुल्क, कृषि भूमि को छोड़कर अन्य सम्पत्ति पर सम्पदा शुल्क, विदेश ऋण, रेलें, रिजर्व बैंक, शेयर, बाजार, आदि। राज्यों के राजस्व स्रोत हैं-प्रति व्यक्ति कर, कृषि भूमि पर कर, सम्पदा शुल्क, भूमि और भवनों पर कर, पशुओं तथा नौकाओं पर कर, बिजली के उपयोग तथा विक्रय पर कर, वाहनों पर चुंगी कर, आदि।
संघ द्वारा आरोपित तथा संग्रहीत तथा विनियोजित किए जाने वाले शुल्कों के उदाहरण हैं: बिल, विनिमयों, प्रोमिसरी नोटों, हुण्डियों, चैकों, आदि पर मुद्रांक शुल्क और दवा, मादक द्रव्य पर कर, शौक-श्रंगार की चीजों पर कर तथा उत्पादन शुल्क।
संघ द्वारा आरोपित तथा संग्रहीत किन्तु राज्यों को सौंपे जाने वाले करों के उदाहरण हैं: कृषि भूमि के अतिरिक्त अन्य सम्पत्ति के उत्तराधिकार पर कर, कृषि भूमि के अतिरिक्त अन्य सम्पत्ति पर सम्पदा शुल्क, रेल, समुद्र, वायु द्वारा ले जाने वाले माल तथा यात्रियों पर सीमान्त कर, रेल भाड़ों तथा वस्तु भाड़ों पर कर, शेयर बाजार तथा सट्टा बाजार के आदान-प्रदान पर मुद्रांक शुल्क के अतिरिक्त कर, समाचार-पत्रों के क्रय-विक्रय तथा उसमें प्रकाशित किए गए विज्ञापनों पर और समाचार-पत्रों के अन्य अन्तर्राज्यीय व्यापार तथा वाणिज्य से माल के क्रय-विक्रय पर कर।
कतिपय कर संघ द्वारा आरोपित तथा संग्रहीत किए जाते हैं, पर उनका विभाजन संघ तथा राज्यों के बीच होता है। आय-कर का विभाजन संघीय भू-भागों के लिए निर्धारित निधि तथा संघीय खर्च को काटकर शेष राशि में से किया जाता है। आय-कर के अतिरिक्त दावा तथा शौक-शंृगार सम्बन्धी चीजों के अतिरिक्त अन्य चीजों पर लगाया गया उत्पादन शुल्क इसके अन्तर्गत आता है।
2. सहायता अनुदान तथा अन्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए दिया जाने वाला अनुदान:- संविधान के अन्तर्गत केन्द्र द्वारा राज्यों को चार तरह के सहायक अनुदान प्रदान करने की व्यवस्था की गयी है। प्रथम पटसन व उससे बनी वस्तुओं के निर्यात से जो शुल्क प्राप्त होता है उसमें से कुछ भाग अनुदान के रूप में जूट पैदा करने वाले राज्यों-बिहार , पं0 बंगाल, असम व उड़ीसा-को दे दिया जाता है। द्वितीय, बाढ़, भूकम्प व सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पीडि़तों की सहायता के लिए भी केन्द्रीय सरकार राज्यों को अनुदान दे सकती है। तृतीय, जनजातियों व कबीलों की उन्नति व उनके कल्याण की योजनाओं के लिए भी सहायक अनुदान दिया जाता है। चतुर्थ, राज्यों को आर्थिक कठिनाइयों से उबारने के लिए केन्द्र राज्यों की वित्तीय सहायता कर सकता है।
3. ऋण लेने सम्बन्धी उपबन्ध:- संविधान केन्द्र को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह अपनी संचित निधि की साख पर देशवासियों व विदेशी सरकारों से ऋण ले सके। ऋण लेने का अधिकार राज्यों को भी प्राप्त है, परन्तु वे विदेशों से उधार नहीं ले सकते। यदि किसी राज्य सरकार पर संघ सरकार का कोई कर्ज बाकी है तो राज्य सरकार अन्य कर्ज संघ सरकार की अनुमति से ही ले सकती है। इस प्रकार का कर्ज देते समय संघ सरकार किसी भी प्रकार की शर्त लगा सकती है।
4. करों की विमुक्ति:- राज्यों द्वारा संघ की सम्पत्ति पर कोई कर तब तक नहीं लगाया जा सकता जब तक संसद विधि द्वारा कोई प्रावधान न कर दे। भारत सरकार या रेलवे द्वारा प्रयोग में आने वाली बिजली पर संसद की अनुमति के अभाव में राज्य किसी प्रकार का शुल्क नहीं लगा सकते। इसी प्रकार संघ सरकार भी राज्य की सम्पत्ति और आय पर कर नहीं लगा सकती।
5. भारत के नियन्त्रक-महालेखा परीक्षक द्वारा नियन्त्रण:- भारत के नियन्त्रक-महालेखा परीक्षक की नियुक्ति केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल के परामर्श से राष्ट्रपति करता है। यह भारत सरकार तथा राज्य सरकारों के हिसाब का लेखा रखने के ढंग और उनकी निष्पक्ष रूप से जांच करता है। नियन्त्रक तथा महालेखा परीक्षक के माध्यम से ही भारतीय संसद राज्यों की आय पर अपना नियन्त्रण रखती है।
6. वित्तीय संकटकाल:- वित्तीय संकटकालीन घोषणा की स्थिति में राज्यों की आय सीमा राज्य सूची में चर्चित करों तक ही सीमित रहती है। वित्तीय संकट के प्रवर्तन काल में राष्ट्रपति को संविधान के उन सभी प्रावधानों को स्थगित करने का अधिकार है जो सहायता अनुदान अथवा संघ के करों को आय में भाग बंटाने से सम्बन्धित हों। केन्द्रीय सरकार वित्तीय मामलों में राज्यों को निर्देश भी दे सकती है।
राज्यपाल:- आयोग का सुझाव है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के अलावा किसी अन्य दल द्वारा शासित राज्य में केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के किसी व्यक्ति को राज्यपाल नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए। राज्य के पद से निवृत्त होने के बाद किसी व्यक्ति को लाभ का कोई भी पद नहीं देना चाहिए। वह राष्ट्रपति पद या उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ सकता है, पर दलगत राजनीति में सक्रिय भाग नहीं ले सकता। आयोग का सुझाव है कि संविधान के अनुच्छेद 155 में संशोधन कर राज्यपाल की नियुक्ति के बारे में राज्य के मुख्यमंत्री से सलाह-मशविरे की व्यवस्था अनिवार्य कर दी जानी चाहिए।
राज्यपाल के पद पर ऐेसे व्यक्ति को ही नियुक्त किया जाना चाहिए जो किसी क्षेत्र में जानी-मानी हस्ती हो। वह ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जिसने दलीय राजनीति में सक्रिय भाग, विशेषकर नियुक्ति के तत्काल पहले सक्रिय भाग न लिया हो।
जांच आयेाग:- केन्द्र सरकार को किसी राज्य के मुख्यमन्त्री या पूर्व मुख्यमंत्री के विरूद्ध पद के दुरुपयोग के आरोपों की जांच के लिए जांच आयोग नियुक्त करने का अधिकार है। इस अधिकार का दुरुपयोग न किया जा सके, इसके लिए व्यवस्था होनी चाहिए कि केन्द्र सरकार के ऐसे किसी प्रस्ताव पर संसद के दोनों सदनों का अनुसमर्थन आवश्यक हो।

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