भूगोल का परिचय – ब्रह्माण्ड एवं तारे

ब्रह्माण्ड  (THE UNIVERSE)

1. ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संदर्भ में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त सिद्धान्त बिग बैंग (Big Bang) सिद्धांत है। इसका प्रतिपादन बेल्जियम के खगोलशास्त्री जार्ज लेमेन्तेयर ने किया था।

2. बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार आज से 15 अरब वर्ष पूर्व सभी आकाशगंगायें (तारों के पुंज) एक गर्म मूलभूत बिन्दु पर धनीभूत थी जिसमें विस्फोट से ब्रह्माण्ड की रचना हुई।

ब्रह्माण्ड ( Universe ) – अंतरिक्ष में मौजूद समस्त आकाशीय पिण्डों की सुव्यवस्था है। ब्रह्मांड में सभी आकाशीय पिण्ड एक निश्चित दिशा, निश्चित दूरी तथा एक निश्चित गति से गतिमान पाये जाते हैं।

अंतरिक्ष ( Space ) : पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर स्थित असीमित एवं अनंत आकाश को अंतरिक्ष कहा जाता है। यह वायुरहित क्षेत्र होता है।

आंकाशगंगा/मंदाकिनी:- मंदाकिनी असंख्य तारों का पुंज या जमाव होता है।

हमारी मंदाकिनी का नाम आकाशगंगा है। यूनानी भाषा में आकाशगंगा को गलेक्सी (Galaxy) कहा गया है। आकाशगंगा की आकृति तीन प्रकार की होती है-

  1. दीर्घवृत्ताकार
  2. सर्पिलाकार
  3.  विषम आकार

हमारी आकाशगंगा (मंदाकिनी) का आकार सर्पिलाकार है। प्रत्येक आकाशगंगा में करीब 100 अरब तारे पाये जाते हैं।

  • सूर्य की हमारे आकाशगंगा से दूरी 32 हजार प्रकाश वर्ष है।
  • सूर्य की आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमण गति 250 किमी/से0 है।
  • सूर्य आकाशगंगा के केन्द्र की एक परिक्रमा 221/2 करोड़ वर्ष में पूरा करता है।
  • हमारी आकाशगंगा के सर्पिलाकार आकृति में तीन भुजाएं पाई जाती है।
  • हमारी आकाशगंगा की पहली भुजा पर पुराने लाल नारंगी तारे पाये जाते हैं।
  • इसकी दूसरी भुजा पर युवा पीले तारे पाए जाते हैं।
  • सूर्य की स्थिति इसी दूसरी भुजा पर पायी जाती है।
  • हमारी आकाशगंगा की तीसरी भुजा पर नवजात तारे पाए जाते हैं।

मिल्की वे/दुधिया मेखला (Milkyway)

पृथ्वी से हमारी आकाशगंगा की जो भुजा दृश्यमान होती है उसे मिल्की वे कहा जाता है।

तारा (Stars)

  • तारे चमकदार गैसों के पिण्ड होते है। तारांे में सबसे अधिक हाइड्रोजन गैस 70% की मात्रा पाई जाती है। तत्पश्चात् हीलियम 25% कार्बन, नाइट्रोजन, आक्सीजन 1.5% एवं आयरन 0.5% पाया जाता है।
  • आकाश में सबसे तेज चमकने वाला तारा साइरस है।
  • सूर्य के पश्चात् सबसे निकटवर्ती तारे का नाम प्राक्सिमा सैंटोरी है जिसका प्रकाश पृथ्वी पर लगभग 4 वर्ष में पहुंच पाता है।
  • पृथ्वी के निकटतम् तारे क्रमशः है-प्राॅक्सिमा सैंटोरी, अल्फा, बनार्ड तारा।

पोल स्टार (Pole Star) –पृथ्वी के ध्रुव पर 90 अंश  का कोण बनाने वाला तारा पोल स्टार कहलाता है।

आदि तारा-आदि तारा हाइड्रोज एवं हीलियम गैसों के पिण्ड होते हैं। जिनके अणु परस्पर गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण संघनित होने लगते हैं। तारे की यह प्रारंभिक अवस्था ही आदि तारा कहलाती है।

लाल भ्रूण तारा-तारे के विकास की यह दूसरी अवस्था होती है। इस अवस्था में हाइड्रोजन तथा हीलियम गैस के अणु-परमाणु के परस्पर टकराव एवं स्ंाघनन की प्रक्रिया के कारण तारों में अत्यधिक ताप वृद्धि हो जाती है। जिससे तारे का रंग लाल सा दिखाई पड़ने लगता है तारे की यह अवस्था ही लाल भू्रण तारा कहलाती है।

युवा पीला तारा-तारे की इस तीसरी अवस्था में तारे में मौजूद हाइड्रोजन गैस का हीलियम गैस के रूप में संलयन प्रारंभ हो जाता है। तारे की यह अवस्था युवा पीला तारा है।

लाल दानव तारा-तारे के विकास की यह अंतिम अवस्था है। इस अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते तारे के केंद्र में मौजूद संपूर्ण हाइड्रोजन का हीलियम में संलयन हो चुका होता है, जिससे तारे का रंग लाल हो जाता है। पर तारे के वाह्य कवच में अभी भी हाइड्रोजन का हीलियम में संलयन जारी होता है तो उसका प्रसार होता जाता है।

श्वेत वामन (White dwarf) लाल दावन की अवस्था में पहुंचने के उपरांत तारे के बाह्य कवच का प्रसरण अंतरिक्ष में क्रमशः हो जाता है तो लाल दानव तारे का क्रोड शेष मात्र रह जाता है जिसे श्वेत वामन कहते हैं।

नोवा तथा सुपरनोवा-लाल दानव तारे की अवस्था के पश्चात् जब तारे के केवल बाह्य कवच में विस्फोट की स्थिति उत्पन्न होती है तो उसे नोवा कहते हैं। नोवा की यह घटना तब घटित होती है जब तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से अधिक हो जाता है। उसके विपरीत जब कभी संपूर्ण तारे में विस्फोट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो उस घटना को सुपरनोवा कहा जाता है।

चन्द्रशेखर सीमा (Chandrashekhar limit) जब तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के 1.4 गुना से अधिक होता है तो तारा में विस्फोट की घटना होती है। इसी सीमा को चन्द्रशेखर सीमा कहते हैं।

न्युट्रान तारा (Neutron Star) – तारा में विस्फोट के पश्चात् न्युट्रान की मात्रा शेष रह जाती है (अधिकतम पाई जाती है)। इस न्युट्रान युक्त तारा को ही न्युट्रान तारा कहा जाता है।

पल्सर (Pulsors) – पल्सर की खोज एंथनी हैविस तथा बेल महोदय ने 1974 ई0 में की थी। घूमता हुआ या प्रचक्रण करता हुआ न्यूट्रान तारा ही पल्सर कहलाता है।

क्वासर्स (Quasers) – तारीय पदार्थ होता है। जिनसे प्रकाश के साथ-साथ रेडियों तरंगे निकलती है। वस्तुतः क्वासर्स ही रेडियों तरंगों की उत्पत्ति के स्रोत माने जाते हैं।

ब्लैक होल/कृष्ण विवर (Black Hole)- तारा के क्रोड का घनत्व अत्यधिक हो जाता है तो उसकी गुरूत्वाकर्षण शक्ति अत्यधिक उच्च हो जाती है, फलस्वरूप जब भी वहां से कोई प्रकाश की किरण गुजरती है तो वह उसमें समाविष्ट हो जाती है, उसका परावर्तन नहीं हो पाता तो इसी तारे को ब्लैक होल कहा जाता है।

न्यूट्रिनों-ब्रह्मांड या अंतरिक्ष में मौजूद द्रव्यमानहीन कण कहलाते हैं। ऐसी मान्यता है कि खगोलय पिंडों का निर्माण इन्हीं से हुआ।

सौरमण्डल सूर्य और उनके चारों ओर पाये जाने वाले ग्रहों, उपग्रहों तथा अन्य खगोलीय पिण्डो को सम्मिलित रूप से सौरमण्डल कहा जाता है।
सौर मण्डल की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत तथा प्रतिपादक-

  • वायक्य राशि परिकल्पना-काण्ट
  • निहारिका परिकल्पना-लाप्लास
  • ग्रहाणु परिकल्पना-चेम्बरलिन तथा मोल्टन
  •  ज्वारीय परिकल्पना-जेम्स जिन्स तथा जेफरीज
  • द्वयतारक परिकल्पना-होयल एवं लिटिलटन
  • अन्तरतारक धूल परिकल्पना आटोसिमीड
  • अन्तरतारक मेघ धूल परिकल्पना-अल्फाबेन
  • परिभ्रमण एवं ज्वारीय परिकल्पना-रासगन
  • सिफिड परिकल्पना-बनर्जी

सूर्य एवं ग्रह – बुध एवं शुक्र

सूर्य(Sun)

सूर्य एक तारा है। सूर्य के धरातल का तापमान 6000अंश से0 पाया जाता है। सूर्य के केन्द्र का तापमान 15 मिलियन डिग्री से0 से अधिक होता है। पृथ्वी से सूर्य की औसत दूरी 14.96 (15) करोड़ किलोमीटर है। सूर्य के प्रकाश की गति 3 लाख कि0मी/से0 है। सूर्य का प्रकाश पृथ्वी के करीब 8 मिनट 30 सेकेण्ड में पहुंचता है।

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सूर्य में हाइड्रोजन का हीलियम के रूप में संलयन होता है। सूर्य के धरातल को फोटोस्फेयर कहते हैं। फोटो स्फेयर की सतह पर काले, ठण्डे धब्बे पाये जाते है जिसे Sun Sptot सूर्य के वायुमंडल को क्रोमोस्फेयर कहते हैं।

सौर्य कलंक की खोज का श्रेय गैलेलियों महोदय को प्राप्त है। सौर्य कलंक के आंतरिक अधिक काले भाग को अम्ब्रा (Umbra) कहा जाता है तथा इसके अपेक्षाकृत कम काले बाह्य भाग को पेन अम्ब्रा (Pan-Umbra) कहते हैं। सौर्य कलंक की अधिकतम अवधि 11 साल मानी जाती है।

सूर्य पृथ्वी से 109 गुना बड़ा है। पृथ्वी से 3 लाख 30 हजार गुना भारी है। सूर्य से निकलने वाले ऊष्मा एवं प्रकाश की दर 1026 जूल/सेकेण्ड है। सूर्य का कक्षीय वेग 250 कि0मी0/सेकेण्ड है। सूर्य की संवहनीय मेखला सौर्य कोशिकाओं से बनी होती है, जिससे सौर ऊर्जा निरंतर निकलती रहती है। सूर्य में प्रकाश रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप सौर्य कोशिकाओं की संरचना विकसित होती है।

  • हाइड्रोजन 73.46%  हीलियम 24.85% आक्सीजन 0.77%.
  • कोरोना सूर्य के वायुमंडल का बाह्य भाग है जो सूर्य ग्रहण के समय दिखता है।

ग्रह (Planet)

ग्रह वैसे खगोलीय या आकाशीय पिंड होते हैं जो सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। ये सूर्य या अन्य तारे के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं।

  • ग्रहों की संख्या 8 है।

सूर्य से दूरी के अनुसार ग्रहों के नाम है-

दूरी के अनुसार  आकार के अनुसार
  1. बुध
  2. शुक्र
  3. पृथ्वी
  4. मंगल
  5. बृहस्पति
  6. शनि
  7. यूरेनस
  8. वरूण
  1. बृहस्पति
  2. शनि
  3. अरूण
  4. वरूण
  5. पृथ्वी
  6. शुक्र
  7. मंगल
  8. बुध

बुध(Mercury)

बुध सौरमण्डल का दूसरा सर्वाधिक गर्म ग्रह है। सूर्य की न्यूनतम समय में (88 दिन) परिक्रमा करने वाला भी ग्रह है। बुध का कक्षीय वेग सर्वाधिक होता है (48 कि.मी./से)

बुध को युनानी भाषा में अपोलों कहा जाता है। बुध एक मात्र ग्रह है जिस पर अपने नाम का खनिज (मर्करी) पाया जाता है। इस ग्रह का तापांतर सर्वाधिक होता है। यह लगभग 430cअंश तथा 170cअंश  होता है। शुक्र की तरह बुध ग्रह के कोई उपग्रह नहीं होते हैं।

बुद्ध का व्यास 4880 कि.मी. है। इसकी सूर्य से औसत दूरी 58 मिलियन कि.मी. ;0ण्39 ।न्द्ध है। यह सूर्य का चक्कर 88 दिनों में पूरा करता है। बुध अपने अक्ष के चारों ओर 59 दिन में चक्कर लगाता है। बुध पर वायुमंडल का अभाव है, इस पर दिन और रात के तापमान में काफी अन्तर रहता है। बुध पर चन्द्रमा की तरह बड़े-बड़े पहाड़ व क्रेटर है। बुध परिमाण में पृथ्वी का 18वाँ भाग है। बुद्ध का गुरूत्वाकार्षण पृथ्वी का 3/8 है।

शुक्र(Venus)

बुध को सुबह का तारा एवं शाम का तारा कहा जाता है।शुक्र ग्रह को पृथ्वी से आकार एवं भार में समानता के कारण पृथ्वी की बहन ग्रह कहते हैं। शुक्र पृथ्वी का निकटतम् ग्रह है। शुक्र अधिक तापमान तथा ऊर्जा के अधिकतम् परावर्तन के कारण सर्वाधिक चमकीला ग्रह है। शुक्र का वायुमंडल अधिक cO2 संघन है, अतः यह अत्यधिक गर्म है। (480cअंश)  शुक्र ग्रह को प्रेशर कुकर सदृश ग्रह कहा जाता है। शुक्र ग्रह का कोई उपग्रह नहीं होता। इसे यूनानी भाषा में फास्फोरस (सुबह का तारा) तथा हेसपेरस (शाम का तारा) कहा जाता है। शुक्र का परिभ्रमण दिशा अन्य ग्रहों की अपेक्षा विपरीत (पूर्व से पश्चिम) होती है। इसका सर्वोच्च बिंदु मैक्सवेल हैं। शुक्र ग्रह के पश्चिम भाग में विस्तृत चैरस पठार पाया जाता है जिसे लक्ष्मी पठार कहते हैं। शुक्र ग्रह के उत्तर में स्थित पर्वतीय क्षेत्र को बेटा क्षेत्र कहते हैं। शुक्र के दक्षिण में अल्फा ज्वालामुखी शील्ड पाये जाते हैं।

  • सूर्य से इसकी दूरी 10.82 करोड़ कि.मी. है।
  • इसका व्यास 12,104 कि.मी. है।
  • इसके वायुमण्डल में 95ः कार्बन डाइआक्साइड पायी जाती है।

पृथ्वी देशांतर अपसौर उपसौर क्षुद्र ग्रह

पृथ्वी (Earth)

पृथ्वी आकार में सौरमंडल का 5वाँ सबसे बड़ा ग्रह है जबकि सूर्य से दूरी के अनुसार इसका क्रम तीसरा है। पृथ्वी का भूमध्यरेखीय व्यास 12,755 किमी. है। पृथ्वी की भूमध्यरेखीय परिधि 40,076 किमी0 है। पृथ्वी का  ध्रुवीय व्यास 12,712 किमी है। पृथ्वी का ध्रुवीय परिधि 40,008 किमी. है।

  •  पृथ्वी को नीला ग्रह भी कहते हैं क्योंकि अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी की जलीय स्थिति के कारण पृथ्वी का रंग नीला दिखाई देता है। इसके वायुमण्डल में 78% नाइट्रोजन तथा 21% आॅक्सीजन पाई जाती है। इसका एक मात्र उपग्रह चन्द्रमा है। पृथ्वी की कक्षा अण्डाकार है।
  •   पृथ्वी से 4 बड़े अवरोही क्रम के ग्रह है-बृहस्पति, शनि, अरूण वरूण। पृथ्वी से 4 छोटे अवरोही क्रम के ग्रह है-शुक्र, मंगल, बुध, यम।
  •   पृथ्वी की आकृति लघ्वक्ष गोलाभ( Oblate Sheorid) है।

  पृथ्वी का अक्ष (Axis)

उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को पृथ्वी का अक्ष कहते हैं।

  •   पृथ्वी का अक्षीय झुकाव 23.5अंश है। पृथ्वी का कक्षीय झुकाव 66.5 अंश है।

ध्रुव(Pole)-  पृथ्वी के अक्ष (काल्पनिक रेखा) के दोनों सिरों को ध्रुव कहा जाता है।

अक्षांश(Latitude)-  किसी स्थान या बिंदु का विषुवत रेखा से उत्तर या दक्षिण की कोणीय दूरी अक्षांश कहलाती है, जो पृथ्वी के केन्द्र से मापी जाती है।

  •   कुछ प्रमुख अक्षांश रेखाएं इस प्रकार हैं-
  1.  विषुवत रेखा (0अंश अक्षांश रेखा)-पृथ्वी को बीचों बीच विभाजित करने वाली रेखा जहाँ सूर्य की किरणें वर्ष भर लंबवत् चमकती है।
  2. कर्क रेखा(Cancear)- .23 .5अंश उत्तरी अक्षांश रेखा को कर्क रेखा कहा जाता है।
  3.   मकर रेखा(Capcricorn)- 23.5अंश दक्षिणी अक्षांश  रेखा को मकर रेखा कहा जाता है।
  4.  आर्कटिक रेखा 66 .5अंश उत्तरी अंक्षाश रेखा।
  5.  अंटार्कटिक रेखा-66 .5अंश दक्षिणी  रेखा।

 अक्षांश रेखा की विशेषताएं-

  •  अक्षांश रेखाएं वृत्ताकार होती है। अक्षांश रेखाएँ पूरब से पश्चिम की ओर खींची जाती है। अक्षांश रेखाओं की लंबाई असमान होती है।
  •   विषुवत रेखा से धु्रवों की ओर बढ़ने पर अक्षांश रेखाओं की लंबाई में कमी की प्रवृत्ति पाई जाती है। अक्षांश रेखाएं समानांतर होती है। कुल 180 अक्षांश रेखाएं होती है।
  •  अक्षांश रेखाओं का महत्व किसी स्थान की स्थिति निर्धारित करने में होती है। 0अंश अक्षांश रेखा सबसे बड़ी अक्षांश रेखा होती है। इसे बृहद वृत्त कहते है। अक्षांश को अंश, मिनट, सेकेंड में मापा जाता है। अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी 111.13 किमी. होती है।

 देशांतर (Longitude).

किसी स्थान की केंद्रीय मध्यान रेखा से पूर्व या पश्चिम की कोणीय दूरी उस स्थान का देशांतर है। इसकी माप भी पृथ्वी के केंद्र से की जाती है।

केंद्रीय मध्यान रेखा-0अंश देशांतर रेखा को जो ग्लोब पर लंदन के समीप ग्रीनविच वेधशाला से गुजरती है तथा पृथ्वी को बीचों-बीच पूर्वी और पश्चिमी दो गोलाद्धों में विभाजित करती है, केंद्रीय मध्यान रेखा कहते हैं।

 देशांतर रेखा की विशेषताएं-
  •  सभी देशांतर रेखाओं की लंबाई समान होती है। सभी देशांतर रेखाएं धु्रवों पर मिलती हैं। देशांतर रेखाएं अर्धवृत्ताकार होती है। कुल 360 देशांतर रेखाएं होती है।
  •  देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी 111.3 किमी. होती है। दो देशांतरों के मध्य का क्षेत्र गोरे(Gore)कहलाता है।
  •   विषुवत रेखा पर दो देशांतरों के मध्य सर्वाधिक दूरी सर्वाधिक भूमध्यरेखा पर होती है। देशांतर रेखाओं का महत्व समय निर्धारण में होती है। 1अंश देशांतर = 4 मिनट होता है।

घूर्णन/परिभ्रमण(Rotation)-पृथ्वी का अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमना ही घूर्णन कहलाता है। पृथ्वी अपने अक्ष पर 23 घंटे 56 मिनट तथा 4 सेकेंड में एक बार घूम जाती है। पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण दिन-रात की घटनाएं घटित होती है।

परिक्रमण(Revolution)- पृथ्वी का अपने अंडाकार पथ पर सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना ही पृथ्वी की परिक्रमण गति कहलाती है। पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा 365.6 (365 दिन 5 घंटा, 45 मिनट, 48 सेकेण्ड) दिन में पूरा करती है। परिक्रमण गति के कारण ऋतु परिवर्तन होते हैं।

अयन रेखा- कर्क रेखा एवं मकर रेखा को अयन रेखा कहते हैं।

 विषुव(Equniox)- 21 मार्च और 23 सितम्बर को सूर्य की स्थिति विषुवत रेखा पर लंबवत होती है, फलतः दोनों गोलाद्धों में दिन-रात की अवधि समान होती है। सूर्य की यह स्थिति विषुव कहलाती है। 21 मार्च को बसंत विषुव तथा 23 सितम्बर को शरद विषुव कहते हैं।

संक्राति/अयंनात(Solstice)- 21 जून और 22 दिसंबर को सूर्य की क्रमशः कर्क और मकर रेखा पर लंबवत स्थिति को संक्राति या अयंनात कहते हैं। 21 जून को ग्रीष्म संक्रान्ति कहा जाता है। जबकि 22 दिसम्बर को शीत संक्राति कहते हैं।

अपसौर (Aphilon)

अपसौर को सूर्योच्च या रविउच्च भी कहा जाता है। जब पृथ्वी अपने अंडाकार पथ पर सूर्य की परिक्रमा के दौरान सूर्य से अधिकतम दूरी पर होती है तो इस घटना को अपसौर/सूर्योच्च/रविउच्च कहा जाता है। अपसौर के दौरान सूर्य और पृथ्वी के मध्य 15.2 करोड़ किमी. की दूरी होती है। अपसौर की घटना 4 जुलाई को घटित होती है।

उपसौर (Perihelion)

3 जनवरी को जब पृथ्वी अपने अंडाकार पथ पर सूर्य की परिक्रमा के दौरान सूर्य के निकटतम् दूरी पर होती है तो इस खगोलीय परिघटना को उपसौर कहा जाता है। उपसौर के दौरान पृथ्वी और सूर्य के मध्य की दूरी 14.7 करोड़ किमी. होती है।

स्थानीय समय(Local Time) सूर्य की स्थिति से किसी स्थान का परिकल्पित समय ही स्थानीय समय कहलाता है। अर्थात जब किसी स्थान पर दोपहर के समय सूर्य सर्वाधिक ऊँचाई पर होता है तो वहाँ मान लिया जाता है कि उस स्थान पर दोपहर के 12 बजे हैं।

मानक समय/प्रमाणिक समय(Standerd Time)-  किसी स्थान, देश या क्षेत्र के केंद्रीय देशांतर रेखा के आधार पर गणना किया जाने वाला समय उनका मानक समय या प्रमाणिक समय कहलाता है।

  •   भारत में 82 1/2अंश केन्द्रीय देशांतर रेखा के आधार पर मानक समय की गणना होती है जो इलाहाबाद के पास से गुजरती है।

अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा

प्रोफेसर डेविडसन ने विश्व के समय समायोजन के लिए अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा का निर्धारण किया। 1800 देशांतर रेखा को, जो ग्लोब पर द्वीपों को छोड़ते हुए खींची गई है, यह 9 बर मुड़ी है, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहा जाता है। इस रेखा को पूरब से पश्चिम पार करते समय एक दिन जोड़ लिया जाता है तथा पश्चिम से पूर्व पार करते समय एक दिन घटा लिया जाता है।

 सिजगी(Syzygv) सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी की एक रेखीय स्थिति को सिजगी कहते हैं। सिजगी की अवस्था में दो परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं-

  1.  युति(Conguction)- जब सूर्य और पृथ्वी के मध्य चंद्रमा की स्थिति पाई जाती है तो इस घटना को युति कहा जाता है। युति की अवस्था में सूर्यग्रहण जैसी परिघटना होती है। यह परिघटना अमावस्या को होती है।
  2.  व्युति(Opposition)- जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच पृथ्वी की स्थिति होती है तो उस घटना को व्युति कहते हैं इस घटना के दौरान चंद्रग्रहण जैसी परिघटना घटित होती है। चंद्रग्रहण की स्थिति पूर्णिमा को संभव होती है।

 चन्द्रमा

  •  चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है। चन्द्रमा के वैज्ञानिक अध्ययन को सेलिनोग्राफी(Selenography) कहते हैं। पृथ्वी से चंद्रमा की औसत दूरी, 3,84,000 किमी. है।
  •   चन्द्रमा का प्रकाश पृथ्वी तक सवा सेंकेण्ड में पहुंच पाता है। चन्द्रमा पर Sea of Tranquility पाए जाते हैं। ये चंद्रमा के वे अदृश्य भाग होते हैं जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देते।
  •   चन्द्रमा की गुरूत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी से 1/6 होती है। चन्द्रमा को जीवाश्म ग्रह (Fossils Planet) कहते हैं। चन्द्रमा पर वायुमण्डल का अभाव है।
  •   चन्द्रमा का व्यास पृथ्वी के व्यास का एक चैथाई है। चन्द्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा 27 दिन और आठ घंटे में पूरी करता है। चन्द्रमा का घूर्णन समय भी यही है।
  •   चन्द्रमा का सर्वोच्च पर्वत शिखर ’’लीबिनिट्ज’’ पर्वत है जो कि चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित है। 21 जुलाई 1969 को अमेरिकन अंतरिक्षयात्री नील आर्मस्ट्राँग ने चन्द्रमा पर कदम रखा था। चन्द्रमा पर कोपरनिकस, केपलर, प्लूटो, क्लेवियस आदि कई क्रेटर पाये जाते हैं।
  •  मंगल (Mars)
    मंगल ग्रह को लाल ग्रह( Red Planet) कहा जाता है क्योंकि इस पर लाल बंजर भूमि पाई जाती है। मंगल का अक्षीय झुकाव पृथ्वी सदृश है। मंगल का सर्वोच्च शिखर निक्स ओलंपिया है।
  •  मंगल के दो प्रमुख उपग्रह-फोबोस तथा डिमोस है। यहाँ का वायुमण्डल अत्यन्त बिरल है जिसमें कार्बन डाई अक्साइड पायी जाती है एवं कुछ मात्रा में जलवाष्प, अमोनिया एवं मिथेन भी है। इसका व्यास करीब 16,70 किमी. है।
  •   यहाँ पृथ्वी के समान दो ध्रुव है तथा पृथ्वी के समान ऋतु परिवर्तन होता है। इसे पृथ्वी का छोटा भाई कहते हैं।

 क्षुद्र ग्रह (Astorid)

मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच पाए जाने वाले उन लघु ग्रहों को जो भ्रमणशील होते हैं, लघु/क्षुद्र/अवांतर ग्रह कहा जाता है।

  •   प्रमुख क्षुद्र ग्रह है-सिरस, पलास, जूनों तथा वेस्टा । सिरस की खोज इटली के पियाजी नामक खगोलशास्त्री ने की थी। ये सभी आवंतर ग्रह अन्य ग्रहों की भांति सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
    बृहस्पति (Jupiter)
  • बृहस्पति आकार में सबसे बड़ा ग्रहा है। Master of Gods कहा जाता है। बृहस्पति के सर्वाधिक उपग्रह पाए जाते (63) हैं-जिनमें गैनमिड सबसे बडा है।
  •   बृहस्पति का भूमध्यरेखीय व्यास पृथ्वी से अधिक (11 गुना) होता है। इसका व्यास 1,42,800 किमी. है। सूर्य से औसत दूरी 77.83 मिलियन किमी. है। यह सूर्य की परिक्रमा 11.9 वर्ष में पूरा करता है। अपने अक्षपर 9 घंटे 55 मिनट में एकबार घूम जाता है।
  •  इसका द्रव्यमान पृथ्वी की अपेक्षा 3/8 गुना अधिक है। इसका द्रव्यमान सौरमण्डल के सभी ग्रहों का 71ः एवं आयतन डेढ़ गुना है। इसके वायुमंडल में हाइड्रोजन, हीलियम, मिथेन तथा अमोनिया आदि गैसें हैं
  •  इसका आन्तरिक तापमान 25000 सेल्सियस है।
  •  इसका घनत्व 1.3 ग्राम प्रति घन सेमी. है।
  •   इसकी सतह का तापमान-1800 सेल्सियस है।
  •  अन्य उपग्रहों में आशा, यूरोपा, कैलिसटो, अलमथिया आदि है।
  •  बृहस्पति पर लाल रंग के तूफान ग्रेट रेड स्पाॅट पाये जाते हैं।

 शनि (Saturn)

  •  शनि ग्रह को बृहस्पति का पिता (Father of Jupiter) तथा रोमन कृषि का भगवान (Roman of Agriculture) ;त्वउंद ळवक व ि।हतपबनसजनतमद्ध कहा जाता है।
  •   शनि सूर्य से दूरी के अनुसार छठे नम्बर का ग्रह है।
  •   इसका व्यास 1,20,000 किमी. है। यह सूर्य से 142.7 करोड़ किमी. दूर है। यह सूर्य की परिक्रमा 29.5 वर्ष में पूरा करता है। इसका द्रव्यमान 5.6 * 10 26 किग्रा है।
  •   इसका सबसे बड़ा उपग्रह टाइटन है। जो बुध के बराबर है। अन्य उपग्रहों में मीमास, एनसीलाड, टेथिस, डीआँन, रीया, हाईपोरियन, इयोपट्स और फोबे उल्लेखनीय है। शनि सूर्य के प्रकाश का 1/100वाँ भाग प्राप्त करता है।
  •   शनि ग्रह के चारों ओर वलय पाये जाते हैं। शनि तीव्र घूर्णन के कारण सौरमण्डल का सर्वाधिक चपटा ग्रह है।

अरूण(Uranus)

  • अरूण की खोज विलियम हर्सेल महोदय ने की थी। यूरेनस/अरूण ग्रह का रंग हरा होता है क्योंकि इसके वायुमण्डल में मिथेन की अधिकता है। इस ग्रह का नामकरण ग्रीक देवता यूरेनस के आधार पर किया गया है।
  •   सूर्य से इसकी दूरी 287.50 करोड़ कि.मी. है और व्यास 52,096 किमी. है। अरूण सूर्य की परिक्रमा 84 वर्ष में पूरा करता है।
  •   इसके 27 उपग्रह है-एरियल, एम्ब्रियल, टिटनिया, ओबेराॅन मिराण्डा आदि।
  •   इसका सबसे बड़ा उपग्रह है-टिटानिया।
  • इसका सबसे छोटा उपग्रह है-कार्डीलिया।
  •  अरूण को लेटा हुआ ग्रह भी कहा जाता है।
  •   शुक्र की भाॅति यह भी पूर्व पश्चिम सूर्य का चक्कर लगाता है।

 वरूण(Neptune)

  •   यह दूरी के अनुसार सौरमंडल का आठवां ग्रह है। 1999 ई0 तक यह सौरमंडल का सबसे दूरस्थ ग्रह रहा। इसकी खोज 1846 ई0 में जर्मन खगोलशास्त्री जोहानगाले ने की।
  •  इसका व्यास 49,500 किमी. है। यह सूर्य की परिक्रमा 164 वर्षों में पूरा करता है। यह अपनी धुरी पर 16 घंटे में पूरा चक्कर लगाता है।
  •   इसका रंग हल्का-पीला दिखाई पड़ता है।
  •   इसका प्रमुख उपग्रह ट्रिटान है जो आकार में पृथ्वी के चन्द्रमा से बड़ा और वरूण की सतह से अधिक निकट है।
  •   इसका सबसे छोटा उपग्रह है-नयाद

धूमकेतु/पुच्छल तारा(Comets)

  •  आकाशीय गैस, धूलकण तथा हिमानी पिण्ड जो परिक्रमण के दौरान सूर्य के समीप होते हैं तो सूर्य के गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण उनसे गैसों की एक फुहार निकलती है इसका शीर्ष अत्यधिक चमकीला होता है जिसे कोमा (Coma) कहते हैं।
  •  हेली पुच्छल तारा प्रत्येक 76 वर्ष के उपरांत दिखाई देता है।

उल्का तथा उल्काश्म (Meteors /Shooting Stars)

  •  अंतरिक्ष में मौजूद छोटे-छोटे आकाशीय पिण्ड जो अपनी भ्रमणशीलता के दौरान पृथ्वी के समीप पहुंचते हैं तथा पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो वे वायुमंडलीय घर्षण से जल उठते हैं। जो आकाशीय पिण्ड पूर्ण रूप से वायुमंडल में जल का राख हो जाते हैं उन्हें उल्का कहा जाता है पर वैसे आकाशीय पिंड जो जलते हुए अर्धजले रूप में पृथ्वी के धरातल पर गिरते हैं उन्हें अर्धजले रूप में पृथ्वी के धरातल पर गिरते हैं उन्हें उल्काश्म कहा जाता है।
  •   उल्का एवं उल्काश्म के अध्ययन के आधार पर यह प्रमाणित हुआ है कि लोहे और निकेल की मात्रा उसमें सर्वाधिक रही।
  •  उल्का एवं उल्काश्म की सर्वाधिक उपलब्धि प्रशांत महासागर में होती है।

पृथ्वी की आन्तरिक सरंचना तथा रासायनिक संगठन

पृथ्वी की आन्तरिक सरंचना

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के बारे में जिन साधनों से जानकरी प्राप्त की जाती है, वे इस प्रकार है-

1. अप्राकृतिक साधन-
  1.  घनत्व  (Density) – पृथ्वी के ऊपरी भाग का निर्माण परतदार शैलों से हुआ है जिसकी औसत मोटाई लगभग 800 मीटर है। इस भाग का घनत्व 2.9 ग्राम घन सेमी. है तथा स्पष्ट है कि पृथ्वी का औसत घनत्व 5.617 ग्राम घन सेमी0 है। अतः स्पष्ट है कि नीचे स्थित भाग का धनत्व 5517 ग्राम घन  सेमी.  से अधिक होगा जिसे सामान्यता 100 माना जाता है इस प्रकार स्पष्ट होता है कि पृथ्वी का घनत्व ऊपर से नीचे उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। तथा (Core) कोर भाग का घनत्व सर्वाधिक होता है।
  2.   दाब (Pressue) – घनत्व के नीचे ज्यों-ज्यों बढ़ते है दबाव भी बढ़ता जाता है पृथ्वी के अन्तरतम भाग में स्थित पदार्थ स्वयं ही ऐसी धातुओं के रूप में हैं जो अत्यधिक घनत्व वाली तथा भारी है।
  3.  तापमान (Temperature):– सामान्यतया पृथ्वी के अन्दर प्रवेश करने पर प्रति 32 मीटर पर 1ब0 ताप की वृद्धि होती है। जिससे यह स्पष्ट है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग का तापमान बहुत अधिक होगा ऐसी दशा में पृथ्वी का अधिकांश भाग पिघल गया होता किन्तु ऐसा नहीं है क्यांकि पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत में रेडियो सक्रिय तत्व होते है जिनसे ऊष्मा निकलती है। गहराई के बढ़ने के साथ रेडियो सक्रिय पदार्थों की उपलब्धता में कमी होती जाती है जिससे तापमान भी कम होता जाता है।
 2. पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बंधित सिद्धन्तो के साक्ष्य:

विभिन्न विद्वानों द्वारा समय समय पर प्रस्तुत की गयी पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी परिकल्पनाओं के आधार पर उसके आन्तरिक भाग के विषय में निम्न तथ्य उभरकर सामने आते है।

  1.   चैम्बरलिन ने 1905 ई. में अपनी ग्रहाणु परिकल्पना प्रस्तुत की जिसके अनुसार पृथ्वी का निर्माण ठोस ग्रहाणुओं के एकत्रीकरण से हुआ है अतः उसके अन्तरम को ठोस अवस्था में होना चाहिए।
  2. जेम्स जीन्स द्वारा 1919 में ज्वरीय परिकल्पना से यह निष्कर्ष निकलता है कि उसकी केन्द्र की अवस्था तरल हो।
  3.  लाप्लास (1776ई.) की वायत्य निहरिका परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति गैस से बी निहारिका से मानी जाती है।

3. प्रकृतिक साधन

1. ज्वालामुखी क्रिया के साक्ष्य-

ज्वालामुखी उद्भेदन के समय पृथ्वी के आन्तरिक भाग से गर्म तथा तरल लावा निकलकर धरातल पर प्रवाहित होता है जो कि वहाॅ विशाल मैग्मा भण्डार के रूप में स्थित है। इससे यह निष्कर्ष निकालना आसान है कि पृथ्वी के अन्दर कुछ भाग अवस्य ही द्रव अवस्था में होना चाहिए।

 2. भूकम्प विज्ञान के साक्ष्य-

भूकम्प विज्ञान को सीस्मोलाॅजी तथा भूकम्प मापने के यंत्र को भूकम्पमापी यंत्र या सीस्मोग्राफ कहतें है। जस स्थान से भूकम्प का प्रारम्भ होता है उसे भू- कम्प मूल (Foeus) तथा धरातल पर जहाॅ सबसे पहले भू-कम्प का अध्ययन किया जाता है उसे अधिकेन्द्र (Epicenter)) कहा जाता है। भू-कम्प के समय उत्पन्न होने वाली लहरों या तरंगों को तीन प्रमुख श्रेणियों में रखा जाता है जो निम्नलिखि है-

(a) प्राथमिक अथवा लम्बात्मक लहरें (Primari or lonitdanal Waves)
(b)गौड़ अथवा आड़ी लहरें (Transvery orDistortional Waves)

इनकी प्रकृति प्रकाश तरंगों से मिलती जुलती है। इनमें कणों की गति लहर की दिशा के समकोण पर काटती है। इसकी सबसे मुख्य विशेषता यह है कि ये प्रायः द्रव अवस्था में लुप्त हो जाती है। इनकी गति 4-5 किमी0 होती हैं।

(c)धरातलीय लहरें(Surpace Waves):

ये लहरें पृथ्वी के ऊपरी भाग पर चलती हैं तथा अत्यन्त विनष्टकारी होती हैं। ये लहर अन्य लहरों की अपेक्षा सबसे लम्बा मार्ग तय करती है। इनकी गति सबसे कम लगभग 3-4Km/s  होती है इन्हें Lon Period L Waves कहते हैं। भू-गर्भ में भूकम्पनीय लहरों का भ्रमण पथ इन भूकम्पीय तरंगों के आधार पर पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तीन प्रकार की परतों का पता लगाया गया है जो निम्नलिखित हैं_

  1. . ऊपरी परत (Upper Layer)
  2. मध्यवर्ती परत (Intermediate Layer)
  3.  निचली परत (Lawe Layer)

 भौगोलिक  पृथ्वी के आन्तरिक भाग का रासायनिक संगठन:-

जगत में एडवर्ड स्वेस के विचार काफी हद तक मान्य है। उन्होंने यह बताया है कि भू-पटल का सबसे ऊपरी भाग परतदार अवसादी शैलों का बना है, जिसकी गहराई बहुत कम है जिसकी संरचना सिलिवेट से बनी है जिसमें अभ्रक तथा फेल्सपार अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। स्वेस ने इस परत के नीचे निम्न तीन परतों की उपस्थिति स्वीकार की है-

1. सियाल (Sial-Silica+Aluminium):-

यह ग्रेनाइट से बनी होती है तथा इसका निर्माण सिलिका व एल्युमिनियम जैसी हल्की धातुओं से हुआ है। ैपंस का घनत्व 2.99 घन सेमी है। इसकी गहराई लगभग 50-300 कि0मी0 है। अम्लीय प्रवृत्ति की चट्टानें पायी जाती हैं। माना जाता है कि महाद्वीपों की रचना में इन्हीं परतों का सर्वाधिक योगदान है।

 2. सीमा(Silica+Manesium):-

यह सियाल के नीचे की परत है और ठंेंसजपब आग्नेय शैलों से इसकी रचना हुई है। इसका घनत्व 2.9 से 4.7 ग्राम/घन सेमी. होता है तथा गहराई 1000 से 2000 किमी0 की है। क्षारीय प्रवृत्ति की चट्टानें पायी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि सीमा तरलावस्था में है तथा सियाल सीमा पर तैर रहा है। ज्वालामुखी का उद्गार इसी परत से होता है।

 3. निफे (Niekel+Ferium):-

यह पृथ्वी के आन्तरिक भाग की परत है जो निकेल और लोहे जैसी कठोर धातुओं से बनी है तथा इसका घनत्व सर्वाधिक 11 ग्राम/घन सेमी. है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण का कारण निकेल और लोहे का केन्द्र में पाया जाना है।

वर्तमान भूकम्पीय लहरों की गति या उनके भ्रमण पथ में आने वाले परिवर्तनों आसान वैज्ञानिक अध्ययन एवं विशेषण के आधार पर पृथ्वी की आन्तरिक संरचना से सम्बन्धित अभिनव मत के अनुसार इसके आन्तरिक भाग को तीन वृहत मण्डलों में विभाजित किया गया है।

  1.  Crust (क्रस्ट)
  2.  Mantle (मैण्टिल)
  3. Eare (अन्तरम)

ज्वालामुखी (VALCANO) क्या है, और इसके प्रकार

ज्वालामुखी (VALCANO) क्या है, और इसके प्रकार

ज्वालामुखी (Valcano)

ज्वालामुखी का अर्थ है-जिसके मुख से आग निकलती हो। ज्वालामुखी का संबंध उस गोल छिद्र से है, जिसके द्वारा पृथ्वी के भू-गर्भ से तप्त तरल लावा या मैग्मा, गैस, जल तथा चट्टानों के टुकड़े जो गर्म पदार्थ के रूप में धरातल की सतह पर प्रकट होते हैं ज्वालामुखी कहलाते हैं। जबकि ज्वालामुखी क्रिया के अन्तर्गत पृथ्वी के भू-गर्भ में स्थित लावा एवं गैस की उत्पत्ति से लेकर आन्तरिक एवं वाह्य दोनों क्रियायें सम्मिलित हैं। ज्वालामुखी क्रियाओं का अध्ययन Valcanology के अन्तर्गत होता है।

Magna,Vent से बाहर निकलता है और Magna निकलने के बाद जब vent का विस्तार होता है तब उसे Creater कहते हैं और Creater का विस्तृत रूप  कहलाता है।

Creater का आकार कीपाकार होता है जबकि Coldera का आकार कड़ाहानुमा होता है।

ज्वालामुखी छिद्र (Vent) से पृथ्वी के भतीर के पदार्थ बाहर निकलकर धरातल पर जमा होते रहते हैं जिससे शंकु के आकार का ढेर बन जाता है इसे ज्वालामुखी शंकु(Valcariecone) कहते हैं और Volcanic Coneके बृहद रूप से निर्मित स्थलाकृति को ज्वालामुखी पर्वत कहते हैं।

ज्वालामुखी उदगार का कारण

  1.  भू-गर्भ में ताप की वृद्धि।
  2.   लावा की उत्पत्ति।
  3.   पृथ्वी के भू-गर्भ में गैसों और जलवाष्प का पाया जाना।
  4.  प्लेट विवर्तनिकी।

 ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थ

  1. . गैस (CO2 SO2,  N2 ,)और जलवाष्प, सर्वाधिक मात्रा जलवाष्प ;60.65% की होती हैं।
  2.   विखण्डित पदार्थ:- बम्म, ब्रेसिया, स्कोरिया, लैपिली, टफ, ट्रैप और झमक।  इनके सम्मिलित रूप को पाइरोक्लास्ट कहा जाता है।
  3.  लावा: अम्लीय लावा and  क्षारीय लावा

अम्लीय लावा:- ये लावा अधिक ताप पर अपक्षरित (विस्तार) होगें और कम समय में Solid हो जाते हैं।  कम समय में Solid होने के कारण इनका विस्तार कम होता है। अम्लीय लावा का रंग पीला होता है। ये मोटा होता है।

 क्षारीय लावा:- ये कम ताप पर अपक्षरित होते हैं और ये पतले होते हैं इसलिए इनका फैलाव ज्यादा होता है।

इनका रंग काला होता है। हवाई द्वीप का मोनालोआ शंकु इसका उदाहरण है।

 ज्वालामुखी के प्रकार

  1. उदगार के आधार पर
  2.  केन्द्रीय उद्भेदन
  3.  दरारी उदगार

केन्द्रीय उद्भेदन:– जब केन्द्र से डंहउं किसी छिद्र के माध्यम से बाहर निकलता है तो इससे निर्मित ज्वालामुखी को केन्द्रीय उद्भेदन द्वारा निर्मित ज्वालामुखी कहते हैं।

केन्द्रीय उद्भेदन द्वारा जो ज्वालामुखी का रूप बन वह रहा है तीव्रता के आधार पर इस प्रकार है-

  1.  हवायन तुल्य ज्वालामुखी
  2.  स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी
  3.  बालकैनो तुल्य ज्वालामुखी
  4.  विसुवियस तुल्य ज्वालामुखी
  5.  पीलियन तुल्य ज्वालामुखी

(1) हवायन तुल्य- ज्वालामुखी सबसे कम तीव्रता का ज्वालामुखी है जबकि पीलियन तुल्य ज्वालामुखी सबसे तीव्र और विनाशकारी तीव्रता का ज्वालामुखी है।  हवायन तुल्य ज्वालामुखी का उदाहरण मोनालोवा ज्वालामुखी है जो हवाई द्वीप में हैं।

(2) स्ट्राम्बोली तुल्य- ज्वालामुखी का उदाहरण स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी ही है जो भू-मध्य सागर पर लिपारी द्वीप पर है।  बालकैनो तुल्य ज्वालामुखी का उदाहरण बालकैनो ज्वालामुखी है जो भू-मध्य सागर के लिपारी द्वीप पर है।

(3) विसुवियस तुल्य- ज्वालामुखी का उदाहरण क्सिुवियस ज्वालामुखी ही है जो इटली में है।

(4) पीलियन तुल्य- ज्वालामुखी का उदाहरण क्राकाटोआ ज्वालामुखी है जो इण्डोनेशिया में जावा और सुमात्रा को अलग करने वाला सुण्डा जलसंधि में पाया जाता है।

 6. दादरी उद्गार द्वारा निर्मित ज्वालामुखी:- जब Magma केन्द्र से न निकल कर कई दरारों से निकलता है तो इससे निर्मित ज्वालामुखी को दरारी उद्गार निर्मित ज्वालामुखी कहते हैं।

दरारी उद्गार द्वारा निर्मित ज्वालामुखी पठार का उदाहरण हैI

  1.  कोलम्बिया का पठार (U.S.A)
  2.  दक्कन का पठार (India)

 उद्गार की अवधि के आधार पर ज्वालामुखी के प्रकार

1. जागृत (सक्रिय) ज्वालामुखी:- जागृत ज्वालामुखी हमेशा क्रियाशील रहते हैं। इनसे लावा निकलता रहता है।

 उदाहरण:-स्ट्राम्बोली (लिपारी द्वीप) एटना   (इटली)

नोट– स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी को भू-मध्य सागर का प्रकाश स्तम्भ कहा जाता है।

 2. सुषुप्त ज्वालामुखी:– ऐसा ज्वालामुखी काफी समय तक शान्त रहने के बाद अचानक लावा उगलने लगता है।

उदाहरण:-देवबन्ध कोह सुल्तान (ईरान), वर्मा (म्याँमार) का पोया तथा U.S.A के ओरेगन राज्य की क्रेटर झील विसुवियस (इटली)।

ज्वालामुखी का वितरण 

(A) परिप्रशान्त मेखला (पेटी):- द0 अमेरिका में चिली के पास से एण्डीज, उ0 अमेरिका में राॅकी, अलास्का होते हुए पूर्वी एशिया की तरफ-जापान फिलीपीन्स तक का पूरा क्षेत्र अर्थात प्रशान्त महासागर के चारो तरफ का क्षेत्र में परिप्रशान्त मेखला पायी जाती है।

प्रशान्त महासागर को Ring of Fire (ज्वाला वृत्त) और Pacigic Gridle कहते हैं।

सभी प्रमुख ज्वालामुखी यही पाये जाते हैं।

उदाहरण:- इक्वाडोर में कोटापैक्सी (सबसे प्रसिद्ध और ऊँची) ज्वालामुखी, चिली में चिम्बारजो, अमेरिका में माउन्ट सस्ता और रेनरियर, जापान में फ्यूजीयामा, फिलीपीन्स में माउन्टताल आदि ज्वालामुखी है।

  (B) मध्य महाद्वीपीय पेटी:- Ice Land के पर्वत से लेकर स्पेन और फिलीपीन्स के पास उत्तरी प्रशान्त महासागर से मिल जाती है। मध्य महाद्वीपीय पेटी।

 (C) अटलांटिक पेटी:-Ice Land से लेकर अन्र्टाकटिक तक

मध्य महासागरीय कटक पर पाये जाने वाले ज्वालामुखी। अर्थात् मध्य महासागरीय कटक के निर्माण के माध्यम से अटलांटिक पेटी पर ज्वालामुखी पाये जाते हैं।

 उदाहरण:- हेकला, हेलाफेल ;(Lee Land के ज्वालामुखी द्वीप है)

अजोर्स द्वीप (अ0 महासागर में):-पुर्तगाल के अधिकार में आदि ज्वालामुखी द्वीप हैं।

दरारी उद्गार, द्वारा निकले लावा से निर्मित पठार के अपरदन के पश्चात् उसके छोटी आकृति को ’मेसा’ कहा जाता है और मेसा के अपरदन के पश्चात् मेसा की छोटी आकृति को ’बूंटी’ कहा जाता है।

 उदाहरण:-मैहर( M.P) के पास मेसा और बूटी दिखती है।

ज्वालामुखी के द्वारा उत्पन्न स्थलाकृति 2 प्रकार की है-

1. आन्तरिक स्थलकृति 2. बाह्य स्थलाकृति

बाह्य स्थलाकृति 2 प्रकार की है-

  1.  उत्थान द्वारा
  2.  धसाव द्वारा

  उत्थान द्वारा:-उत्थान द्वारा विभिन्न प्रकार के ज्वालामुखी शंकु बनते हैं और लावा, मैदान, पठार, गुम्बद पर्वत, मेसा और बूटी आदि स्थलाकृति बनते हैं।

 धसवा द्वारा:- धसाँव द्वारा Crea और ब्वसकमतं स्थलाकृति का निर्माण होता है। 2ण् आन्तरिक स्थलाकृति:- बैथोलिथ, फैकोलिथ, लोपोलिथ, लैकोलिथ सिल, शीट, और डाईक आदि स्थलाकृति बनते हैं। धारवाड़ युग में ’डालमा’ की श्रेणी’ में (बिहार) सर्वप्रथम ज्वालामुखी का उद्गार हुआ-भारत में सर्वाधिक लावा का उद्गार दक्कन क्षेत्र में हुआ है। ज्मतजपंतल युग के पहले ब्तमंजेपने काल में दक्कन क्षेत्र में सर्वाधिक लावा का विस्तार हुआ।

भूकम्प के कारक तथा प्रकार (Causes and types of earthquakes)

भूकम्प'(Earth Quakes)

ज्ञात या अज्ञात, वाह्य अथवा अन्तर्जात कारणों से उत्पन्न पृथ्वी में कम्पन को ही भूकम्प कहते हैं। जहाँ से भू-कम्प तरंग की उत्पत्ति या पादुर्भाव होता है उसको भूकम्प केन्द्र या भूकम्प मूल या Focus कहा जाता है और सर्वप्रथम भूकम्प की तरंगें जहाँ पहुँचती है उसको अधिकेन्द्र (Epicenter) कहा जाता है। Epicenter पर ही Seismogrphie Center (भूकम्प लेखन केन्द्र) की स्थापना की जाती है। भारत में प्रमुख भू-कम्प लेखन केन्द्र (Easnographie Center) पाँच हैं।

  1. . कोलकाता  सर्वप्रथम कलकत्ता में भूकम्प लेखन केन्द्र की
  2.  . पूना
  3.   देहरादून स्थापना हुई।
  4.  मुम्बई. दिल्लीै

Seismology –. भूकम्पीय तरंगों या भूकम्पनीय आघात क्षेत्रों का अध्ययन करने वाला विज्ञान Seismology कहलाता है।

भूकम्प को नापने के स्केल:-

  1.  मारकेली स्केल
  2.  रियक्टर स्केल

1. मारकेली स्केल:-

  1.  तीव्रता के आधार पर यह स्केल है।
  2.  मानक 1-12 माना गया है।
  3.   अनुभव के आधार पर निर्माण किया गया है।
  4.  उत्पन्न तरंगों से कितनी हानि हुई इस आधार पर इस स्केल से नापा जाता है।

 2. रियक्टर स्केल:-ं

  1.  ज्यामितीय है।
  2.  मानक 1-9 है।
  3.   इसका आधार ऊर्जा है।
  •   कितने Force से तरंगे या ऊर्जा बाहर निकल रही हैं।
  •   रियक्टर स्केल के अगले क्रम में 1ः10 की वृद्धि होती है।
  •   भूकम्प केन्द्र से निकलने वाली तरंगे कई प्रकार की होती हैं।
  1.  P-Waves
  2. S-Waves
  3. L-Waves

1. P- Waves:-इन्हें प्राथमिक तरंगें भी कहते हैं। Pull And Push Waves भी कहते हैं। इन्हें Compresional Waves (अनुर्दध्र्य तरंग) भी कहते हैं। ये तरंगे ध्वनि तरंगों के समान होती हैं। 8 किमी0/सेकण्ड से अधिक इनकी गति होती है। ठोस, द्रव, गैस तीनों माध्यम में चलती हैं। लहरें के समानान्तर चलती हैं।

 2 S-Waves- इन्हें अनुप्रस्थ या आड़ी तरंगें (∴ 90 का कोण बनाती हैं) भी कहते हैं। इन तरंगों की गति धीमी 4-5 किमी0/सेकण्ड होती हैं। प्रकाश या जल के तरंगों के समान इसकी समानता पायी जाती है। ये तरल अवस्था में नही चलती हैं।

 3.L-Waves(Longitudinal-Waves)- ये सबसे भयंकर और विनाशकारी तरंग हैं।

  •   2-3 किमी0/सेकण्ड की गति से चलती है।
  •   सबसे अधिक दूरी तय करती है।
  •   पृथ्वी की सतह (surface) पर चलने वाली तरंग है।

 भूकम्प का कारण:- भू-पटल के सन्तुलन में अव्यवस्था ही भूकम्प का कारण है।

 भूकम्प की उत्पत्ति में कारक तत्व:-

  1.  ज्वालामुखी क्रिया-1833 ई0 में क्राकाटोआ ज्वालामुखी में।
  2.   भू-पटल में भं्रशन-उदाहरण-असम का भूकम्प।
  1.   1967 में कोयना (महाराष्ट्र) का भूकम्प ये माना जाता है कि भू-पटल भ्रन्शन के कारण ही आया।
  2. H.F Ried ने प्रत्यास्थ पुन्श्चलन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया और वर्तमान में भू-कम्प की उत्पत्ति में यह सिद्धान्त सही सिद्धि है।
  3.  भू-पटल में असन्तुलन।
  4.   जलीय भार का दबाव-मानव निर्मित जलाशयों से पृथ्वी की सतह पर दबाव पड़ता है जिससे भूकम्प की उत्पत्ति होती है।
  5.   भू-पटल के सिकुड़न।

 6. गैसों का दबाव:-किसी भी रूप में जब जल पृथ्वी के अन्दर प्रवेश करता है तब जल, जलवाष्प या गैस में बदलता है और तप्त होकर गैस की तीव्रता में वृद्धि होती है जो भू-पटल को प्रभावित करता है।

 7. प्लेट टेक्टानिक:- प्लेटों की क्रिया द्वारा भू-कम्पन का आना।

अवस्थतिकी (स्थिति) के आधार पर भू-कम्पन के प्रकार:-

  1.  स्थलीय भू-कम्प
  2.  सागरीय भू-कम्प उदा0- सुनामी

कारकों के आधार पर भू-कम्प को 4 भागों में बाॅटा गया है।

  1.  ज्वालामुखी क्रिया
  2.  भ्रशन
  3.  भू-अंसन्तुलन
  4.  प्लेट टक्टानिक

भूकम्प मूलके आधार पर या भू-कम्प को गहराई के आधार पर 3 भागों में विभाजित किया गया है-

सामान्य भू-कम्प:- सतह से 50 किमी0 तक की गहराई वाले भू-कम्प को सामान्य भू-कम्प कहते है।

मध्यवर्ती भू-कम्प या मध्यम गहराई भू-कम्प:- 50 किमी0 250 किमी0 तक।

पातालीय या गहरे भू-कम्प अधिक गहराई भू-कम्प:- 250 से 700 कमी0 तक सबसे विनाश कारी यही भू-कम्प होते है।

भू-कम्प का विवरण

 1. परिप्रशान्त तटीय पेटी – यह विश्व का सबसे विस्तृत भू-कम्प क्षेत्र है जहां पर सम्पूर्ण विश्व का 63 प्रतिशत भू-कम्प आता है। इस क्षेत्र में चिली, कैलिकोर्निया, अलास्का, जापान फिलीपींस न्यूजीलैंड आदि आते है।

2. मध्य महाद्वीपीय पेटी (भू-कम्प सागरीय पेटी):- यूरोप का आल्पस भारत का हिमालय और बर्मा का अराकानयोमा, चीन का कुनलुन और त्योनसाॅग पर्वत भारत में यह पेटी पायी जा रही है।

3. अटलांटिक कटक पेटी:- Icekand से बोवेट द्वीप तक। भू-मघ्य रेखा के पास सर्वाधिक भू-कम्प क्षेत्र पाया जाता है।

भारत को भू-कम्पीय क्षेत्रों के आधार पर 3 भागों में बाॅटा गया है।

  1.   हिमालय का पर्वतीय क्षेत्र।
  2. सिन्ध गांगा का मैदान।
  3. प्रायद्वीपीय भारत।

हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में सबसे अधिक भू-कम्प आता है। जबकि प्रायाद्विपीय भारत में आता है।

Isoceismal Line (सम-भूकम्प रेखा):- समान आघातीय क्षेत्रों को मिलाने वाली तरंगों को Isoceismal Line(सम-भूकम्पीय रेखा) कहा जाता है।

Homaseimal Line – एक ही समय मे समान आघातीय क्षेत्रों को मिलाने वाली तरंगों को या रेखा को  Homaseimal Line कहते है।

नोट:-

  • भारत में सबसे विनाशकारी भू-कम्प 1787 ई0 में कलकत्ता में आया था।
  •   1956 में कच्छ (गुजरात में आया था)
  • 1967 में कोयना (महाराष्ट्र) में आया था।
  • 1993 में लातूर (महाराष्ट्र) में भू-कम्प आया था।
  • 25 अप्रैल 2015 का नेपाल में भूकम्प I

Seismograph :- जिन संवेदनशील यंत्रों द्वारा भूकम्पीय तरंगों तीव्रता मापी जाती है उसे भू-कम्प लेखीय या Seismograph कहते है।

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (continental drift theory)

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Theory of Continental Drift)

महाद्वीपों के प्रवाहित होने की संभावना का सुझाव सर्वप्रथम फ्राँसीसी विद्वान एन्टोनियो स्नाइडर ने 1858 ई0 में दिया किन्तु वैज्ञानिकता के अभाव में इस संभावना को नकार दिया गया। 1910 में टेलर ने स्थल भाग के क्षैतिज स्थानान्तरण को मोड़दार पर्वतों की व्याख्या के क्रम में प्रस्तुत किया किन्तु कई कारणों से इनकी संकल्पना भी मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी। इसके बाद अल्फ्रेड वेगनर ने 1912 में महाद्वीपीय प्रवाह को सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया तथा 1915 में इसकी विस्तृत विवेचना की।

वेगनर के अनुसार कार्बोनीफेरस युग में संसार के सभी महादेश एक साथ एकत्रित थे और एक स्थलखण्ड के रूप में विद्यमान थे। वेगनर ने इसे पैंजिया कहा। पैंजिया में विभाजन कार्बोनीफेरस युग में प्रारंम्भ हुआ और महाद्वीपों का वर्तमान स्वरूप पैन्जिया के विखण्डन तथा इन विखण्डित हुए स्थलखण्डों के प्रवाहित होकर अलग होने के फलस्वरूप हुआ। वेगनर के अनुसार पैंजिया चारों तरफ से जल से घिरा हुआ था जिसे उसने पैंथालासा कहा। उनके अनुसार महाद्वीपीय ठोस भाग सियाल तथा महासागरीय भू भाग सीमा का बना हुआ है तािा सियाल सीमा पर तैर रहा है। सीमा के ऊपर तैरते हुए पैन्जिया का विखण्डन और प्रवाह मुख्यतः गुरुत्वाकर्षण शक्तियों की असमानता के कारण हुआ। वेगनर के अनुसार जब पैंजिया में विभाजन हुआ तब दो दिशाओं में प्रवाह हुआ-उत्तर या विषुवत रेखा की ओर तथा पश्चिम की ओर।

  1.  विषुवत रेखा की ओर प्रवाह गुरुत्व बल तथा प्लवनशीलता के बल (Force to buoyancy के कारण हुआ।

2.  महाद्वीपों का पश्चिम दिशा की ओर प्रवाह सूर्य तथा चन्द्रमा के ज्वारीय बल के कारण हुआ।पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर घूमती है और ज्वारीय बल पृथ्वी के भ्रमण पर ब्रेक लगाते हैं इस कारण महाद्वीपीय भाग पीछे छूट जाते हैं तथा स्थल भाग पश्चिम की ओर प्रवाहित होने लगते हैं तथा स्थल भाग पश्चिम की ओर प्रवाहित होने लगते हैं। पैंजिया का गुरुत्व बल व प्लवनशीलता के बल के कारण दो भागों में विखण्डन हुआ। उत्तरी भाग लाॅरेंशिया या अंगारालैण्ड तथा दक्षिणी भाग गोंडवानालैण्ड कहलाया। बीच का भाग टेथिज सागर के रूप में बदल गया। जुरैसिक काल में गोण्डवानालैड का विभाजन हुआ तथा ज्वारीय बल के कारण प्रायद्वीपीय भारत, मेंडागास्कर, आॅस्ट्रेलिया तथा अण्टार्कटिका गोंडवाना लैंड से अलग होकर प्रवाहित हो गये। इसी समय उत्तरी व दक्षिण अमेरिका ज्वारीय बल के कारण पश्चिम की ओर प्रवाहित हो गये। पश्चिम दिशा में प्रवाहित होने के क्रम में सीमा का रुकावट के कारण प0 भाग में राॅकी तथा एंडीज पर्वतों का निर्माण हुआ। प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर की ओर प्रवाहित होने के कारण हिन्द महासागर तथा दोनों अमेरिकी महाद्वीपों के पश्चिम की ओर प्रवाहित होने के कारण अटलांटिक महासागर का निर्माण हुआ। आर्कटिक सागर तथा उत्तरी ध्रुव सागर का निर्माण महाद्वीपों के उत्तरी ध्रुवों से हटने के फलस्वरूप हुआ। कई दिशाओं से महाद्वीपों के, अतिक्रमण के कारण पेंथालासा का आकार संकुचित हो गया

सिद्धांत के पक्ष में प्रमाण-

वेगनर के अनुसार आरंभ में सभी स्थलीय भाग पैंजिया के रूप में थे। इसके लिए उन्होंने कई प्रमाण प्रस्तुत किये। वेगनर के अनुसार अटलांटिक महासागर के दोनों तटों में भौगोलिक एकरूपता पायी जाती है। इस एकरूपता के कारण उन्हें आसानी से जोड़ा जा सकता है। दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट को अफ्रीका के पश्चिमी तट से मिलाया जा सकता है और इसी प्रकार उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट को यूरोप के पश्चिमी तट से जोड़ा जा सकता है। इस स्थिति को Jig saw Fit कहते हैं।

भूगर्भिक प्रमाणों के आधार पर अटलांटिक महासागर के दोनों तटों के कैलिडोनियन तथा हर्सीनियन पर्वत क्रमों में समानता पायी जाती है। दक्षिणी अटलांटिक महासागरों के तटों पर स्थित अफ्रीका व ब्राजील की संरचना और चट्टानों में भी समानता है।

दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तथा अफ्रीका के पश्चिमी तटों का गहन अध्ययन यह प्रमाणित करता है कि दोनों तटों की संरचना में पर्याप्त साम्यता है। इसके अलावा भारत, दक्षिण अफ्रीका, फाॅकलैण्ड, आॅस्ट्रेलिया तथा अण्टार्कटिका में ग्लोसाॅप्टेरिस वनस्पति का पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि कभी ये स्थल भाग एक साथ जुड़े हुए थे।

आलोचना:- इस सिद्धान्त की सबसे बड़ी आलोचना प्रवाह की शक्तियों के सन्दर्भ में की गयी है। वेगनर ने जिन बलों को महाद्वीपों के प्रवाह के लिए उत्तरदायी बताया है, वह उपयुक्त नहीं है। इसके अलावा वेगनर के सिद्धांत में परस्पर विरोधी बातें भी दिखाई देती हैं। पहले उन्होंने कहा कि सियाल, सीमा पर बिना रूकावट के तैर रहा है और फिर कहा कि सीमा से सियाल पर रुकावट आयी। वेगनर ने उस बल के बारे में भी नही बताया, जिससे कार्बोनिफेरस युग से पहले पैंजिया स्थिरावस्था में था।

अटलांटिक तटों के आकार की एकरूपता (Jig-Saw-Fit) पर वेगनर ने जितना जोर दिया है, वास्तव में यह बहुत हद तक सही नहीं है क्योंकि दोनों तटों की भूगर्भिक बनावट सभी जगह मेल नहीं खाती हैं।  लेकिन इन आलोचनाओं के बावजूद भी वेगनर के सिद्धान्त का अपना अलग महत्व है। इस सिद्धान्त के द्वारा अनेक भौगोलिक और भू-वैज्ञानिक समस्याओं को सुलझाने में मदद मिली है। समय के साथ नये अनुसंधानों ने इसकी पुष्टि की है और प्लेट विवर्तनिका व पुरा-चुम्बकत्व द्वारा भी इस सिद्धान्त के समान में कई प्रमाण मिले हैं।

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory)

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त(Plate Tectonic Theory)

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत प्लेटों के स्वभाव एवं प्रवाह से सम्बन्धित अध्ययन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन 1960 के दशक में किया गया। हैरी हेस, विल्सन, माॅर्गन, मैकेन्जी तथा पार्कर आदि विद्वानों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत द्वारा समुद्री तल प्रसार, महाद्वीपीय विस्थापन, भूपटलीय संरचना, भूकम्प एवं ज्वालामुखी क्रिया आदि की व्याख्या की जा सकती है। यह संकल्पना समुद्री नितल प्रसार की परिकल्पना का विस्तारित एवं परिष्कृत रूप है। इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का भू-पटल मुख्यतः छः बड़े और छः छोटे प्लेटों में विभाजित है तथा ये प्लेटें लगातार गति कर रही हैं ये प्लेटें एक-दूसरे के संदर्भ में तथा पृथ्वी के घूर्णन-अक्ष के संदर्भ में निरंतर गति कर रही है।

नोट:- कुछ विद्वान अमेरिकन प्लेट को उत्तरी तथा दक्षिणी दो अलग-अलग प्लेट मानते हुए मुख्य प्लेटों की संख्या 7 बताते हैं। प्लेटों में यह गति तीन प्रकार से संचालित होती है-

  1.  अपसारी गति
  2.  अभिसारी गति
  3.  संरक्षी गति अपसारी गति

अपसारी गति (Divergent Movement)

अपसारी गति में प्लेटें एक दूसरे से विपरीत दिशा में गतिशील होती हैं। इसमें दोनों प्लेटों के मध्य भ्रंश का निर्माण होता है जिसके सहारे मैग्मा का प्रवाह पृथ्वी की सतह पर होता है। इससे नवीन भूपर्पटी का निर्माण होता है। मध्य अटलान्टिक कटक इस गति का सर्वोत्तम उदाहरण है जहाँ कटक निर्माण के साथ ज्वालामुखी क्रिया व समुद्री नितल प्रसार की क्रिया हो रही है।

 अभिसारी गति (Convergent Movement)

अभिसारी गति में दो प्लेटें अभिसरित होकर आपस में टकराती है तथा इस प्रक्रिया में अधिक घनत्व वाला प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट के नीचे क्षेपित हो जाता है एवं अधिक गहराई पर पहुँचने के पश्चात ताप के प्रभाव से पिघल जाता हैं विश्व के वलित पर्वत, ज्वालामुखी, भूंकप व द्वीपीय चाप की व्याख्या इसी गति के द्वारा संभव है। यह अभिसरण तीन प्रकार से होता है-

  1.  महासागरीय-महाद्वीपीय प्लेट
  2.  महासागरीय-महासागरीय प्लेट
  3.  महाद्वीपीय-महाद्वीपीय प्लेट
 अभिसारी गति के सन्दर्भ में निम्न तथ्य महत्वपूर्ण हैं-
  •  अधिक घनत्व वाला प्लेट नीचे क्षेपित होता है तथा कम घनत्व वाला प्लेट संपीडित होने के कारण वलित हो जाता है।
  •  प्लेटो का क्षेपण लगभग 450 पर होता है तथा अधिक गहराई में ’’बेनी आॅफ जोन’’ में जाकर प्लेटें पिघल जाती हैं।
  •  जब दो प्लेटें समान घनत्व की होती हैं तो मोटे भूपृष्ठ का निर्माण होता है।

महाद्वीपीय-महाद्वीपीय प्लेट अभिसरण की स्थिति में अन्तः महाद्वीपीय पर्वतों का निर्माण होता है, जैसे हिमालय व आल्प्स पर्वत का निर्माण। हिमालय पर्वत शृंखला का निर्माण भारतीय प्लेट तथा यूरेशियाई प्लेटों की अभिसरण गति के फलस्वरूप टेथिस सागर के मलबों एवं भूपटल में मोड़ के फलस्वरूप हुआ। अफ्रीकी एवं यूरेशियाई प्लेट के अभिसरण के फलस्वरूप आल्प्स एवं एटलस पर्वत का निर्माण हुआ।

राॅकी एवं एण्डीज पर्वत का निर्माण महाद्वीपीय-महासागरीय गति के परिणामस्वरूप हुआ है। महाद्वीपीय-महासागरीय प्लेटों के अभिसरण में अधिक घनत्व वाली महासागरीय प्लेट का महाद्वीपीय प्लेट के नीचे क्षेपण हो जाता है तथा अत्यधिक संपीडन के कारण प्लेट के किनारे के पदार्थों का वलन होता है। जिससे मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति होती है। अधिक घनत्व वाली प्लेट के नीचे धँसने से गर्त का निर्माण होता है। अधिक गहराई में महासागरीय प्लेट बेनी आॅफ जोन में जाकर पिघल जाती है। ये पिघली हुई चट्टानें मैग्मा के रूप में धरातल पर उद्गमित होती हैं। एण्डीज पर्वत श्रेणी पर ज्वालामुखी की उपस्थित तथा पेरु टेªन्च की व्याख्या इस गति के द्वारा होती है।

जब दोनों प्लेटें महासागरीय होती हें तो टकराव की स्थिति में एक प्लेट का अग्रभाग दूसरे प्लेट के नीचे क्षेपित हो जाता है एवं उत्पन्न संपीडन से द्वीपीय तोरण एवं द्वीपीय चाप की उत्पत्ति होती हे। जापान द्वीप व चाप का निर्माण इसी गति के फलस्वरूप हुआ है। इस गति में क्षेपित प्लेट अधिक गहराई में जाकर पिघलती है जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है एवं ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण होता है।

 संरक्षी गति (Transtform Movement)

संरक्षी गति में प्लेटें एक-दूसरे के साथ क्षैतिज दिशा में प्रवाहित होती हैं। इस प्रक्रिया में न तो नये क्रस्ट का निर्माण होता है और न ही विनाश। प्लेटों के घर्षण के कारण इन क्षेत्रों में भूकंप उत्पन्न होता है। सेन एंड्रियाज भं्रश (कैलिफोर्निया) का निर्माण इसी गति के कारण हुआ है।

सिद्धांत की आलोचना (Criticism of Theory)

  • प्लेटों की दिशा व गतिशीलता को प्रमाणित करना कठिन है।
  •   कभी-कभी एक ही प्लेट दो दिशाओं में एक साथ गति करती हैं।
  •  प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त प्राचीन पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या करने में असमर्थ है।
  •  प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त यह स्पष्ट करने में असमर्थ है कि जहाँ प्रसार सभी महासागरों में होता है वहाँ प्रत्यावर्तन के क्षेत्र (Subduction)प्रशान्त महासागर के तटों तक ही सीमित क्यों है।

इसके बावजूद प्लेटें विवर्तनिकी सिद्धान्त का अपना महत्व है। यह सिद्धान्त विभिन्न भूगर्भिक क्रियाओं की व्याख्या वैज्ञानिक ढंग से करने में सक्षम है। इसके माध्यम से ज्वालामुखी व भूकंप की व्याख्या एवं वितरण प्रारूप की स्थिति को समझा जा सकता है। साथ ही नवीन वलित पर्वतों के निर्माण की प्रक्रिया की स्पष्ट व्याख्या संभव है। इस सिद्धान्त ने भू-वैज्ञानिक तथा भू-आकृतिक विचारधारा को एक नया मोड़ व नई दिशा प्रदान की है। इस सिद्धान्त की सहायता से भूपटल की संरचना व उसके अन्य प्रक्रमों को एक व्यापक दृष्टिकोण से समझा जा सकता है।

प्लेटों की तीनों गति (अपसारी, अभिसारी तथा संरक्षी) के आधार पर तीन प्रकार के प्लेट सीमांत होते हैं-

  1.  अपसारी गति – रचनात्मक प्लेट सीमांत (नये क्रस्ट का निर्माण)।
  2.  अभिसारी गति – विनाशी प्लेट सीमांत (क्रस्ट का क्षय)।
  3. संरक्षी गति – संरक्षी प्लेअ सीमांत (न तो क्रस्ट का निर्माण और न ही क्षय)।

चट्टान (Rocks) की उत्पत्ति तथा विशेषताएं

चट्टान (Rocks)

भूपटल के सभी कठोर एवं मुलायम पदार्थ चट्टान (Rocks) कहलाते हैं, उदारणार्थ- पत्थर, बालू, मिट्टी आदि। अर्थात् भूपटल के वे सभी पदार्थ, जो खनिज नहीं हैं, चट्टानें कहलाती हैं। ये ग्रेनाइट के समान कठोर हो सकती हैं और मिट्टी जैसी मुलायम भी हो सकती है। सामान्यतः वनस्पति एवं जैविक पदार्थों को चट्टानों से अलग माना जाता है। यद्यपि खनिज चट्टानों में ही पाये जाते हैं, फिर भी खनिजों को भी चट्टान (Rocks) से अलग माना जाता है।

चट्टानों एवं खनिजों का निर्माण पृथ्वी की उत्पत्ति के समय हुआ था। इसी कारण ये दोनों तत्व मिश्रित रूप में पाये जाते हैं। अधिकांश चट्टानों में एक या अनेक खनिज पाये जाते हैं। उदाहरण के लिए ग्रेनाइट चट्टानों में कई खनिज मिले रहते हैं। जैसे-स्फटिक, फेल्सपार, अभ्रक आदि। जबकि संगमरमर में एक ही खनिज कैल्साइट(Calcite) मिला रहता है। इस प्रकार चट्टानों में एक या एक से अधिक खनिज उपलब्ध हो सकते हैं। इसके अलावा चट्टानों का अधिकतम भाग खनिज पदार्थों का मिश्रण होता है।

(a) चट्टानों की उत्पत्ति या निर्माण (Formation of Rocks) 

पृथ्वी अपनी उत्पत्ति के समय अत्यधिक गर्म थी। उसके क्रमशः ठंडे होने के कारण आग्नेय चट्टानों का निर्माण हुआ था। इन चट्टानों के टूटने-फूटने से एवं नदी, वायु और सागरीय तरंग आदि के द्वारा परतदार चट्टानें बनीं। आग्नेय और परतदार चट्टानें दबाव एवं अधिक ताप के कारण रूपांतरित चट्टानों में रूपांतरित हो गई। इस प्रकार रूपांतरित चट्टानों की उत्पत्ति आग्नेय एवं परतदार चट्टानों से हुई है। भूपटल में पाई जाने वाली चट्टानों में 75% परतदार चट्टाने हैं तथा 25% आग्नेय और रूपांतरित चट्टानें। लेकिन घनत्व की दृष्टि से लगभग 95% भाग आग्नेय चट्टानों से बना है, शेष 5 प्रतिशत में अन्य चट्टान है।

(b) उत्पत्ति के आधार पर चट्टानें तीन प्रकार की होती हैं-

  1.  आग्नेय चट्टानें Igneous Rocks
  2.  परतदार चट्टानें Sendimentaty Rocks
  3.  रूपांतरित चट्टानेंMatamorphic Rocks

 आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks)

 (Igneous Rocks)आग्नेय चट्टानों को प्रारंभिक चट्टानें(Primary Rocks)  अथवा मूल चट्टानें (basic Rocks) भी कहते है, क्योंकि इनकी रचना सबसे पहले हुई थी। इन चट्टानों की उत्पत्ति लावा (Leva) या मैग्मा (Magma) के ठंडे होने से हुई है। इसलिए कहा जाता है कि ’वे चट्टाने जिनकी उत्पत्ति लावा या मैग्मा के ठंडे होने से होती है, आग्नेय चट्टानें है।’ प्रमुख आग्नेय चट्टानें ग्रेनाइट (Granite) गैब्रो (Gabro) बेसाल्ट (Basalt) आदि है।

पृथ्वी का आन्तरिक भाग अत्यधिक गर्म है, कई भागों में अत्यधिक ताप के कारण वहाँ सभी तत्व पिघली हुई अवस्था में हैं। इस पिघले पदार्थ को मैग्मा कहते हैं। जब मैग्मा ज्वालामुखी द्वारा सतह पर आता है तो इसे ही लावा कहते हैं। लावा में खनिज एवं अन्य तत्व पिघली हुई अवस्था में रहते हैं इसलिए लावा से बनने वाली चट्टान में अनेक खनिज मिले हुए रहते हैं।

आग्नेय चट्टानों की विशेषताएँ (Characteristics of Igneous Rocks)

  1.  आग्नेय चट्टानें पिघले हुए गर्म पदार्थ से बनती हैं, इसलिए ये अत्यधिक कठोर और ठोस होती हैं।
  2.  ये रवेदार होती हैं रवों (Crystals) की संख्या और आकार निश्चित नहीं होता। सामान्यतः अंतर्भेदी चट्टानें (Intrustive Rocks) बड़े रवों वाली होती हैं तथा बाहरी चट्टानों (Extursive Rocks) में छोटे-छोटे रवे पाये जाते हैं।
  3.  इनमें परतें नहीं होतीं, लेकिन एक चट्टान में अनेक जोड़ (Joints) हो सकते हैं।
  4. . इन चट्टानों में जैविक अवशेष(Fossils) नहीं मिलते।
  5. . आग्नेय चट्टानों में रन्ध्र या छिद्र नहीं होते जैसे कि परतदार चट्टानों में होते हैं।
  6.  ये चट्टाने ज्वालामुखी क्षेत्रों में सतह पर ही मिलती हैं।

उपरोक्त विशेषताओं के कारण ही आग्नेय चट्टानें, परतदार या रूपांतरित चट्टानों से पूर्णतः भिन्न होती हैं।

 आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण (Callsification of Igneous Rocks)

यद्यपि सभी आग्नेय चट्टानें गर्म एवं पिघले हुए मैग्मा एवं लावा के ठंडे होने से बनी हैं, लेकिन भूपटल की सभी आग्नेय चट्टानें एक जैसी नहीं हैं। उनकी बनावट, संरचना और स्वरूप में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। सामान्यतः आग्नेय चट्टानें अनेक प्रकारों में प्राप्त होती हैं। उत्पत्ति के आधार पर इन चट्टानों के दो प्रकार होते हैं।

  1.  अंतर्भेदी चट्टानें या अंतः निर्मित चट्टानें (Intrusive Rocks)
  2.  बाह्य निर्मित चट्टानें (Extrusive Rocks)
    1- अंतर्भेदी चट्टानें:- पृथ्वी के आंतरिक भाग के कई स्थान पर सभी पदार्थ अत्यंत गर्म एवं पिघली अवस्था में होते हैं। इन्हें मैग्मा कहते हैं। जब कभी यह अत्यंत गर्म एवं पिघला पदार्थ (मैग्मा) भूपटल के सतह की ओर गतिशील होता है, तब इस मैग्मा का कुछ भाग भूपटल में स्थित दरारों आदि में ठंडा होकर एकत्र हो जाता है। धरातल के नीचे इस प्रकार से बनने वाली चट्टानों को अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहते हैं। इन चट्टानों के ठंडे होने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है, इसीलिए इनके रवे (Crysrals) बड़े आकार के होते हैं। उदाहरणार्थ-गे्रनाइट, फेल्सपार आदि।

सामान्यतः अंतर्भेदी चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

  1.  पातालीय अंतर्भेदी (Plutonic Intrusive Rocks)
  2.  मध्यवर्ती अंतर्भेदी (Hypabyssal Intrusive Rocks)

1. पातालीय अंतर्भेदी चट्टानें:- भूपटल में अधिक गहराई पर पाई जाने वाली आग्नेय चट्टानें हैं। जब मैग्मा ऊपर जाते समय भूपटल के नीचे काफी गहराई में चट्टानों के रूप में जम जाता है तो उन चट्टानों को पातालीय चट्टानें कहते हैं। ग्रेनाइट इस प्रकार की चट्टानों का उदाहरण है।

 2. मध्यवर्ती अंतर्भेदी चट्टानें:- ये भूपटल में बहुत कम गहराई पर पाई जाती है। इनका निर्माण मैग्मा के अपेक्षाकृत कम गहराई पर ठंडे हो जाने के कारण होता है। पातालीय चट्टानों की अपेक्षा ये चट्टानें कुछ जल्दी बनती हैं, इसीलिए इनके रवे ;ब्तलेजंसेद्ध छोटे-छोटे हैं। मध्यवर्ती चट्टानें भूपटल में स्थित विभिन्न दरारों एवं खाली स्थानों में पाई जाती हैं। इन चट्टानों में लैकोलिथ बैथोलिथ फैकोलिथ लैपोलिथ आदि प्रमुख हैं।

मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के इन विभिन्न रूपों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है-

1. लैकोलिथ:- इन चट्टानों की आकृति छत्रक के समान गुम्बदाकार रूप में होती है। ऊपरी परत सैकड़ों फुट से हजारों फुट तक मुड़ जाती है।

 2. बैथोलिथ:- ये चट्टानें गुम्बदाकार एवं खड़े ढाल वाली होती हैं। इनका आधार तल बहुत अधिक गहराई पर रहता है। ये ज्वालामुखी उद्गार वाले पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

 3. फैकोलिथ:- मोड़दार पर्वतों की अपनति और अभिनति  में जमने वाले लावा स्वरूपों को फैकोलिथ कहते हैं।

 4. लैपोलिथ:- लावा के छिछले रूप में तश्तरी के आकार का जमाव लैपोलिथ कहलाता है। ट्रांसवाॅल में चार सौ किलोमीटर लंबा लैपोलिथ का जमाव पाया जाता है।

 5. सिल:- जब भूपटल के भीतर मैग्मा प्रवाहित होता है, तो उसमें कुछ भाग परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों के बीच स्थित दरारों आदि में भर जाता है। जब इस जमाव की मोटाई अधिक या स्पष्ट होती है, तो उस आकृति को सिल कहते हैं। सिल की सामान्य मोटाई कुछ सेंमी. से कई मीटर तक हो सकती है। यह प्रायः क्षैतिज होता है।

 6. डाइक:- सिल के समान लम्बी एवं पतली परतों को डाइक कहते हैं। डाइक एक दीवाल की तरह होती है। इसकी मोटाई कुछ सेमी. से सैकड़ों मीटर तक होती है तथा लम्बाई कुछ मी. से कई किमी. तक होती है।

(2) बाह्य चट्टानें:- मैग्मा या लावा के भूपटल पर आकर ठंडे होने से बनने वाली चट्टानें बाह्य या निःस्रावी  आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इस प्रकार की चट्टानें अधिकतर ज्वालामुखी के विस्फोट के समय बनती हैं, इसलिए इन्हें ज्वालामुखी चट्टानें भी कहते हैं। ज्वालामुखी से निकलने वाला लावा धरातल पर आकर फैल जाता है और बाहर के वातावरण में ठंडा होकर चट्टान बन जाता है। भूपटल की ये चट्टानें लावा के बहुत जल्दी ठंडे होने से बनती हैं। इस कारण इनमें रवे अत्यधिक छोटे-छोटे होते हैं। बेसाल्ट इस चट्टान का अच्छा उदाहरण है।

 अवसादी (परतदार) चट्टानें (Sendimentary Rocks) 

अवसादी (परतदार) चट्टानें (Sendimentary Rocks) भूपृष्ठ के जिन चट्टानों में व्यवस्थित परतें होती हैं, उन्हें अवसादी (परतदार) चट्टानें कहते हैं। इनका निर्माण अपरदन के तत्वों, जैसे-नदियों आदि के द्वारा बहाकर लाये गये पदार्थों के जमाव से होता है। आग्नेय चट्टानों का नदियों, हवा सागरीय तरंग, हिमनदी, भूमिगत जल आदि के द्वारा अपरदन होता रहता है। अपरदन से प्राप्त पदार्थ को तलहट या अवसाद (Seximent) कहते हैं। यह अवसाद समुद्रों, झीलों आदि की तली में जमा होता रहता है। यह अवसाद परतों के रूप में प्रतिवर्ष जमा होता है। कई वर्षों की परतों को अलग पहचाना जा सकता है। हजारों वर्षों के बाद अत्यधिक दबाव और ताप के कारण ये परतें चट्टानों के रूप में परिणत हो जाती हैं। इन्हें ही अवसादी या परतदार चट्टानें (Sendimentaty Rocks) कहते हैं। परतदार चट्टानों के उदाहरण-बलुआ पत्थर (Sendstone) चूना पत्थर (Limestone) चाॅक(Chalk) क्ले (Clay) शेल (Shale)आदि हैं।

अवसादी (परतदार) चट्टानों की विशेषताएं (Chaaracterisrics of Sendimentary Rocks)

  1. . इन चट्टानों का निर्माण नदियों आदि द्वारा परतों के रूप में निक्षेपण से हुआ है, इसलिए इनमें परते पायी जाती हैं। यह इनकी प्रमुख विशेषता है, क्योंकि अन्य चट्टानों में परतें नहीं होती।
  2.   परतदार चट्टानों का निर्माण आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों के टुकड़ों एवं धूल, वनस्पति, जीव जन्तुओं के अवशेष आदि से हुआ है इसलिए इनमें जीव-जन्तुओं के अवशेष तथा मूल चट्टानों के टुकड़े मिलते हैं।
  3.  अधिकांश परतदार चट्टानों का निर्माण समुद्र की तली में हुआ है, इसलिए इनमें समुद्री लहरों आदि के चिह्न मिलते हैं।
  4. ये चट्टानें अपेक्षाकृत कम कठोर होती हे इसलिए अपक्षय एवं अपरदन जल्दी हो जाता है।
  5.  इनमें रवे ;ब्तलेजंसेद्ध नहीं होते, जैसे कि आग्नेय चट्टानों में होते हैं।
  6. ये छिद्रयुक्त और प्रवेश्य ;च्वतवने ंदक च्मतअपवनेद्ध होती है। इसीलिए इनमें पानी एवं खनिज तेल का जमाव भी मिलता है।
  7.  अधिकांश परतदार चट्टानें क्षैतिज (Horizontal)रूप में पायी जाती है।
  8. . परतदार चट्टानों में दरारें (Cracks)जोड़ (Joints)आदि होते हैं, इसीलिए इनका विखण्डन आसानी से हो जाता है।

परिवर्तित या रूपान्तरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)

जब आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों के रंग, स्वरूप और संगठन में अत्यधिक दबाव के कारण परिवर्तन हो जाता है, तो इन नवीन चट्टानों को रूपांतरित चट्टानें कहते हैं। इन चट्टानों का अधिक ताप के कारण केवल रंग और स्वरूप बदलता है, उनका विघटन (Decomposition)अथवा वियोजन (Disintagration नहीं होता। इन चट्टानों में स्थित खनिजों के गुणों में परिवर्तन हो जाता है, इसके साथ-साथ चट्टान की कठोरता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। जब कभी अत्यधिक परिवर्तन हो जाता है, तो उसके मूल रूप को पहचानना भी कठिन हो जाता है। चट्टानों में रूपांतरण शीघ्रता से तथा धीरे-धीरे भी हो सकता है। रूपांतरित चट्टानों के उदाहरणों में चूना पत्थर (Limestone) से संगमरमर (Marbale) शेल (Shale) से स्लेट (Slate)उल्लेखनीय है।

मूल चट्टानों में परिवर्तन पाँच प्रकार से होता है-

  1. . तापीय रूपांतरण (Thermal Matanorphism)
  2. जलीय रूपांतरण (Hydro-Matanorphism)
  3. ताप-जलीय रूपांतरण (Hydro-Thermal Matanorphism)
  4. . गतिक रूपांतरण (Dynamic Matanorphism)
  5.  स्थैतिक रूपांतरण (Statics Matanorphism)

1. तापीय रूपांतरण:- पृथ्वी के आंतरिक भाग में स्थित मैग्मा के संपर्क से चट्टानों का स्वरूप बदल जाता है। इसे तापीय रूपांतरण कहते हैं। इस प्रकार का परिवर्तन सामान्यतः ज्वालामुखी उद्भेदन के समय होता है। चूना पत्थर का रूपांतरण मैग्मा के संपर्क के कारण ही होता है। इसी प्रकार बलुआ पत्थर (Sandstone) से क्वार्टजाइट का निर्माण होता है। चट्टान का जो भाग मैग्मा के अधिक संपर्क में रहता है, उसका परिवर्तन अधिक होता है, मैग्मा से जैसे-जैसे दूरी बढ़ती है, परिवर्तन भी क्रमशः घटता जाता है।

 2. जलीय रूपांतरण:– महासागरों में स्थित जल की विशाल मात्रा के भार के कारण तली में स्थित चट्टानों में परिवर्तन हो जाता है, इसे जलीय रूपांतरण कहते हैं। इस प्रकार का परिवर्तन सीमित क्षेत्रों में तथा बहुत कम होता है।

 3. ताप-जलीय रूपांतरण:- यह रूपांतरण ताप एवं जलीय भार के कारण होता है। सामान्यतः इस रूपांतरण का प्रभाव कम ही दिखाई देता है।

 4. गत्यात्मक रूपांतरण:- भूपटल के भीतर चट्टानों के क्षैतिज अथवा ऊध्र्वाधर खिसकने से उत्पन्न घर्षण एवं ताप के कारण यह रूपांतरण होता है। इस रूपांतरण में समय बहुत अधिक लगता है। उदाहरण-शेल (Shale)से स्लेट (Slate) कोयला  से ग्रेनाइट का बनना। सामान्यतः यह रूपांतरण पर्वतीय क्षेत्रों में ही होता है।

 5. स्थैतिक रूपांतरण:- ऊपरी चट्टानों के दबाव के कारण नीचे स्थित चट्टानों में परिवर्तन होता है, तो उसे स्थैतिक रूपांतरण कहते हैं। इसे दाब रूपांतरण भी कह सकते हैं। भूपटल की बहुत सी चट्टानें इस प्रकार रूपांतरित हो जाती है।

 रूपांतरण के कारण (Agents  Matanorphism)

अधिकांश चट्टानों का रूपांतरण दबाव एवं ताप के कारण ही होता है, लेकिन इस प्रक्रिया में अन्य तत्वों का भी प्रभाव देखा गया है, जैसे-रासायनिक प्रक्रिया, घर्षण आदि। इनका विवरण इस प्रकार है,

 1. ताप(Heate)- . यही एक तत्व है, जिसके प्रभाव से भूपटल की अधिकांश रूपांतरित चट्टानें बनी हैं। ताप के कारण मूल चट्टान पिघल जाती है, जिससे उसके स्वरूप और संरचना में पूर्ण परिवर्तन हो जाता है। भूपटल के अंदर ताप का स्रोत मैग्मा होता है। जब ज्वालामुखी विस्फोट होता है, तब इस तत्व का प्रभाव अधिक दिखाई देता है।

 2. दबाव (Compression)- अत्यधिक दबाव के कारण नीचे स्थित चट्टानों में रूपांतरण हो जाता है। इसके अलावा जब दोनों ओर से दबाव पड़ता है, तो बीच का चट्टानी भाग रूपांतरित हो जाता है। इस प्रकार का परिवर्तन महाद्वीपीय निर्माणकारी (Epierogenic- Mocement) और पर्वत निर्माणकारी हलचलों (ogenic- Mocement)के कारण होता है।

 3. घोल (Solution)- विभिन्न रासायनिक पदार्थों के संपर्क के कारण चट्टानों में स्थित पदार्थ घुल जाते हैं और उनमें परिवर्तन हो जाता है। उदाहरण के लिए जल में कार्बन डाईआॅक्साइड और आॅक्सीजन गैस मिल जाने से उसकी रासायनिक क्रियाएँ बढ़ जाती हैं। इस जल के संपर्क में आने पर चट्टानों का स्वरूप एवं संगठन बदल जाता है।

 प्रमुख रूपांतरित चट्टानें

(a) आग्नेय चट्टानों के रूपांतरित रूप:-
  1.  ग्रेनाइट(Granite) से नीस (Gneiss)
  2. . गेब्रो (Grabo)से गेब्रोनीस (Grabo -Gneiss)  एवं सर्पेन्टाइन
  (b) अवसादी चट्टानों के रूपांतरित रूप:-
  1.   बलुआ पत्थर (Sandstone) से क्वार्टजाईट (Quartzite)
  2. . शेल (Shale) से स्लेट (Slate)
  3.  शेल  (Shale)  से सिस्ट एवं अभ्रक
  4.  चूना पत्थर (Limestone) से संगमरमर (Marble)
  5. . कोयला (Coal) से हीरा (Diamond)
  6.  बिटुमीनस से एन्थ्रेसाइट
  7. . डोलोमाइट एवं खड़िया से संगमरमर

 खनिज(Minrals)

.विभिन्न रासायनिक तत्वों (Chemical Elements) से बनने वाले पदार्थों को खनिज कहते हैं। लोंगवेल (Longwell) के अनुसार, खनिज प्राकृतिक रूप से उपलब्ध वह पदार्थ, है जिसमें एक प्रकार के भौतिक गुण होतें हैं और उनकी रचना को रासायनिक सूत्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। सामान्यतः खनिज की निम्नलिखित विशेषताए होती हैं-

  1. . इनका एक निश्चित रासायनिक संगठन होता है।
  2. इनकी उत्पत्ति प्राकृतिक रूप से हुई है।.
  3. इनका स्वरूप एक सामान्य होता है।
  4.  इनकी उत्पत्ति पूर्णतः अजैविक तत्वों से होती है।
  5. . इनका निर्माण प्रायः भूपृष्ठीय तत्वों द्वारा ही होता है।

पृथ्वी की संरचना तीन परतों में विभाजित है। पृथ्वी का ऊपरी भाग, भूपटल (Earth Crust) कहलाता है, इसे ही भू-पृष्ठ भू-पर्पटी आदि भी कहते हैं। पृथ्वी पर स्थित पर्वत, पठार, मैदान, समुद्र सभी भूपटल के अंग है। भूपटल की औसत गहराई 10 से 25 मील तक है। इसका निर्माण खनिजों एवं चट्टानों से हुआ है। भूपटल की रचना में लगभग दो हजार खनिजों का योगदान है।

पर्वत, पठार, मैदान तथा झील (Mountain Plane And Lake)

पर्वत, पठार, मैदान तथा झील (Mountain Plane And Lake)

पर्वत वैसे ऊँचे स्थल हैं जिनका आधार, विस्तृत शिखर संकुचित तथा ढाल तीव्र होता है। पर्वत अपने निकटवर्ती क्षेत्रों की तुलना में 1000 मी0 से अधिक ऊॅचे होतें है। पर्वत के विभिन्न रूप हैं जिन्हें पर्वत कटक, पर्वत श्रेणी, पर्वत श्रृंखला आदि में वर्गीकृत किया जात है।

 पर्वत के रूप (Forms of Mountain) 

  •  पर्वत कटक,
  •  पर्वत श्रेणी,
  •  पर्वत श्रृंखला,
  •  पर्वत प्रणाली,
  •  पर्वत वर्ग,
  •  पर्वत समूह

1- पर्वत कटक (Mountain Ridge):  लंबे सॅकरें एवं ऊॅचे पर्वत को पर्वत कटक कहते है।

2- पर्वत श्रेणी (Mountain series):  पर्वतों एवं पहाडियों के क्रम को पर्वत श्रेणी कहते है। ये पर्वत एक ही काल एवं प्रक्रिया से निर्मित होते हैं। इनका विस्तार एक संॅकरी पट्टी में एक रेखा के रूप में होता है। जैसे- हिमालय पर्वत श्रेणी।

3- पर्वत श्रृंखला (Mountain Chain): जब लंबे सॅकरे पर्वतों का विस्तार समानान्तर रूप में पाया जाता है तो उसे पर्वत या पर्वत माला कहते हैं। ये पर्वत श्रृंखलाएं विभिन्न भागों में निर्मित होती है। जैसे अप्लेशियन पर्वत माला।

4- पर्वत तंत्र या पर्वत प्रणाली (Mountain Seriez):  विभिन्न पर्वत श्रेणियों का समूह जो एक ही युग में निर्मित होते हैं। पर्वत प्रणाली या पर्वत तंत्र कहलाते हैं।

5- पर्वत वर्ग (Mountain Group):  जब किसी प्रदेश की कटक तथा श्रेणियाॅ पर्वत श्रेणी की तरह समानान्तर न होकर असमान रूप से विस्तृत होती है तो उन्हें पर्वत वर्ग कहते हैं।

6- पर्वत समूह (Cordillera) :  पर्वत वर्ग या पर्वत प्रणालियों का समूह पर्वत समूह कहलाता है। इन पर्वत समूहों का निर्माण विभिन्न युगों में हुआ है। जैसे-उत्तरी अमेरिका का पश्चिमी कार्डिलेरा।

1. पर्वत निर्माणकारी युग के आधार पर वर्गीकरण

(1) प्रीकैम्ब्रियन पर्वतः इस युग के पर्वतों का निर्माण लगभग 500 मिलियन वर्ष पूर्व अति रूपांतरित चट्टानों द्वारा हुआ है। अधिक अनावृत्तिकरण के कारण इनका पर्वतीय रूप समाप्त हो चुका है। उत्तरी अमेरिका के लाॅरेंशियन एवं एलगोमन पर्वत यूरोप में फेनो-स्कैण्डिनेविया के पर्वत आदि प्रीकैम्ब्रियन पर्वत के उदाहरण हैं।

 (2) कैलिडोनियन पर्वतः स्काॅटलैंड के प्राचीन पर्वत कैलिडोनिया के नाम पर इस युग के पर्वतों को कैलिडोनियन पर्वत कहा जाता है। सिलुरियन एवं डेवोनयन काल के पर्वतो को इस युग में रखा जाता है। भारत के विध्यांचल, महादेव व सतपुड़ा तथा दक्षिण अमेरिका के ब्राजीलाइड्स इस युग के प्रमुख पर्वत हैं।

 (3) हर्सीनियन पर्वतः हर्सीनियन पर्वतों का उद्गम पर्मियन व कार्बोनिफेरस युग में हुआ। उतरी अमेरिका में अप्लेशियन, यूरोप में सेंट्रल मेसिफ, वाॅस्ज्ेाज एवं ब्लैक फाॅरेस्ट, आइबेरियन प्रायद्वीप, यूराल पर्वत आदि इसके उदाहरण हैं। एशिया में अल्टाई, तिएनशान नानशान आदि हर्सीनियन पर्वत के उदाहरण हैं।

 (4) अल्पाइन पर्वतः इस युग के पर्वतीकरण का नाम यूरोप के आल्प्स पर्वत के आधार पर किया गया। इसके अंतर्गत टर्शियरी काल में निर्मित पर्वतों को रखा हैजो विश्व के सर्वोंच एवं नवीन मोड़दार पर्वत हैं। इस युग के अधिकांश पर्वतों पर्वतों का निर्माण इओसीन, ओलिगोसीन प्लायोसीन तथा प्लीस्टोसीन काल में हुआ। उत्तरी अमेरिका में राॅकी दक्षिण अमेरिका में  एण्डीज यूरोप में आल्प्स अफ्रीका में एटलस एशिया में हिमालय आदि पर्वत का निर्माण इसी काल हुआ।

2. निर्माण विधि के आधार पर पर्वतः

विश्व के पर्वतों का निर्माण विभिन्न कालो मे तथा भिन्न-भिन्न रूप से हुआ है। पर्वतों के निर्माण में संपीडन व खिंचाव शक्ति के साथ ज्वालामुखी से निःसृत पदार्थों का जमाव तथा स्थल के उभारो का योगदान होता है। पर्वत निर्माण में एक से  अधिक शक्तियाॅ कार्य कारती हैं परन्तु उनमें से कोई एक कारक सर्वाधिक शक्तिशाली होता हैं इस आधार पर पर्वतों को निम्न रूप में विभाजित किया है।

  वलित पर्वतः पृथ्वी के अन्तर्जात बल के कारण चट्टानों में संपीडन की क्रिया से वलित पर्वतों की उत्पत्ति हुई है। ये विश्व के सबसे ऊॅचे तथा विस्तृत पर्वत हैं। वलित पर्वतों का विस्तार प्रायः सभी महाद्वीपों में हैं। हिमालय अराकानयोमा, जैग्रोस एलवुर्ज एशिया में हैं। अफ्रीका में एटलस यूरोप में आल्प्स, उत्तरी अमेरिका मे राॅकी व दक्षिण अमेरिका में एण्डीज विश्व के प्रमुख वलित पर्वत हैं।

वलित पर्वतो का निर्माण अवसादी चट्टानो में वलन के फलस्वरूप हुआ है। अधिकांश वलित पर्वतों का निर्माण भूसन्नति में हुआ है। भूसन्नति से तात्पर्य लम्बे, सॅकरे तथा उथले जलीय भाग से है जिनमें तलछटीय निक्षेप के साथ-साथ तलीय में धॅसाव होता है। ये पर्वत चाप के आकार में पाये जोते हैं जिनका एक ढाल अवतल तथा दूसरा उत्तल होता है।

 ब्लाॅक पर्वतः धरातलीय भागों में तनाव बल के कारण भ्रंश या दरारें पड जाती है इस कारण धरातल का कुछ भाग ऊपर तथा कुछ भाग नीचे धॅस जाता है। भ्रंश के समीप ऊॅचे उठे भाग को ब्लाक पर्वत कहते हैं। दरार या भ्रंश से निर्माण के कारण इसे भ्रंशोत्थ पर्वत भी कहते हैं। सतपुड़ा वाॅसजेस, ब्लेकफाॅरेस्ट सियरा नेवादा आदि ब्लाॅक पर्वत के उदाहरण हैं।

 ज्वालामुखी पर्वतः इनका निर्माण ज्वालामुखी उद्गार से निःसृत लावा तथा अन्य पदार्थाें के जमाव के फलस्वरूप हुआ है। विश्व का सबसे ऊॅचा ज्वालामुखी पर्वत एकांकागुआ है। कोटोपैक्सी विश्व का सबसे ऊॅचा सक्रिय ज्वालामुखी पर्वत है। समुद्री नितल पर भी अनेक ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण हुआ है जिनकी चोटियां द्वीप के रूप में समुद्र से बाहर दिखाई देती हैं जैसे हवाई द्वीप एल्यूशियन द्वीप आदि।

 अवशिष्ट पर्वत:- ये पर्वतों के सभी प्रकारो का अपरादित व घिसा-पिटा रूप है। अपरदन की शक्तियों द्वारा पर्वत अपरदित होकर अवशिष्ट पर्वत के रूप में दृश्यगत होेते हैं। भारत में अरावली, विध्यन पूर्वीघट तथा यूरोप में यूराल पेनाइन श्रेणी आदि अवशिष्ट पर्वत के उदाहरण हैं।

 पर्वत निर्माण की अवस्थाएँ (Phases od Mounrain)%

पर्वत निर्माण की तीन अवस्थाएॅ हैं-

  1. . भॅू-सन्नति में निक्षेप की मात्रा
  2.  पर्वत निर्माण की अवस्था
  3. . विकास की अवस्था

पर्वत निर्माण के प्रमुख सिद्धांतः

  1.  भॅू-सन्नति सिद्धांत- कोबर
  2.  तापीय संकुचन सिद्धांत- जेफरीज
  3.  संवहन तरंग सिद्धांत-होम्स
  4.  रेडियो सक्रियता सिद्धांत तथा तापीय चक्र सिद्धांत-जौली
  5.  प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत वर्तमान में पर्वत निर्माण के संबंध में सर्वाधिक मान्य सिद्धांत

 विश्व के प्रमुख पर्वत (Important Mountaion of World)%

 उत्तरी अमेरिका- ब्रुक्स श्रेणी- के अलास्का के उत्तरी भाग में स्थित पश्चिम से पूर्व की ओर फैली हुई पर्वत श्रेणी।

अलास्का श्रेणी-। के अलास्का स्थित राॅकी का ही उत्तरी विस्तार, वलित पर्वत श्रेणी जहाॅ उ0अमेरिकी महाद्वीप की सर्वोच्च चोटी मा. मैकिले है।

 मैकेजी श्रेणी- उ0प0 कनाड़ा में स्थित पर्वत राॅकी का उत्तरी विस्तार।

 तटीय (Coast)  श्रेणी- U.S.A व कनाडा के पश्चिम तटीय भागों में राॅकी का ही विस्तार। इसी के कारण राॅकी मध्य में अधिक चैड़ा है।

 काॅस्केड श्रेणी- राॅकी व कोस्ट श्रेणी के मध्य स्थित वलित पर्वत। इसके पदीय भागों में कई अंर्तपर्वतीय पठार एवं बेसिन अवस्थित हैं।

 ब्लू माउन्टेन(Blue Mountain)%-  राॅकी व कास्केड श्रेणी के मध्य वलित पर्वत।

सियारा नेवादाः U.S.A के कैलिफोर्निया प्रदेश में स्थित विश्व का सबसे बड़ा ब्लाॅक पर्वत।

 राॅकीः उ0 अमेरिका में पश्चिम में तट के समानांतर स्थित उत्तर से दक्षिण में विस्तृत अल्पाइन क्रम का वलित पर्वत।

 अल्पेशियन श्रेणी:- अत्यधिक प्राचीन वलित मोड़दार पर्वत न्ण्ैण्। के उ0प0 भाग में स्थित खनिज संसाधन संपन्न।

 एलेघनी श्रेणीः- अप्लेशियन व वृहत झील प्रदेशों के मध्य स्थित मोड़दार पर्वत।

 वासाच श्रेणीः-U.S.A में स्थित ब्लाॅंक पर्वत, खनिज हेतु प्रसिद्ध।

 पश्चिमी सियरा माद्रेः- मौक्सिको के पश्चिमी भाग में वलित पर्वत श्रेणी।

पूर्वी सियरा माद्रेः मैक्सिको के पूर्वी भाग में स्थित वलित पर्वत श्रेणी।

एंडीज श्रेणीः- उत्तर से दक्षिण में विस्तृत विश्व की सबसे लंबी पर्वतमाला। सर्वाेच्च चोटी- एकांगुआ।

 पश्चिमी कार्डिलेरा:- यह दक्षिणी अमेरिका के ऊपर पश्चिमी भाग में तट के समानान्तर वलित पर्वतों का एक जटिल क्रम है, जहाॅ अनेक ज्वालमुखी पर्वत भी मिलते हैं।

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