अर्थव्यवस्था का एक परिचय (प्रकार) an introduction to the economy

अर्थव्यवस्था का एक परिचय (प्रकार)

एक परिचय (Introduction) 

एक परिचय मनुष्य की समस्त आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन और विश्लेषण करने वाली विधा अर्थशास्त्र कहलाती है। अर्थशास्त्र का व्यवहारिक पक्ष अर्थव्यवस्था है। अर्थव्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जिसकी सहायता से देश में उपलब्ध संसाधनों का दोहन और नये संसाधनों का निर्माण किया जाता है। अर्थव्यवस्था के माध्यम से असीमित आवश्यकता और सीमित संसाधन के बीच की खाईं को पाटने की कोशिश की जाती है ताकि उपभोक्ता अधिक सन्तुष्ट हो सके, उत्पादक को अधिक लाभ मिल सके और समाज के लिए अधिकतम सामाजिक कल्याण को सुनिश्चित किया जा सके।

अर्थव्यवस्था का महत्व:- किसी देश की आर्थिक गतिविधियों का सम्बन्ध अर्थव्यवस्था से होता है। जिससे वह अपने संसाधनों का समुचित उपयोग करते हुये विकास के उच्चतम बिन्दु को प्राप्त करना चाहता है। वर्तमान परिस्थिति में अर्थव्यवस्था एवं आर्थिक गतिविधियों का महत्व बढ़ गया है। आर्थिक उदारीकरण के इस युग में अर्थ मनुष्य की तमाम गतिविधियों के नियामक तथ्य के रूप में उभरकर सामने आया है। किसी देश की नीतियों को समझने के लिये उस देश की अर्थव्यवस्था और आर्थिक प्रणाली को समझना आवश्यक है। सुदृढ़ एवं सक्षम आधार के बिना शक्तिशाली राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। किसी भी राष्ट्र का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्र की एकता, अखण्डता को सुनिश्चित रखते हुये राष्ट्र को विकास के मार्ग पर अग्रसर करना और समस्त जनता का कल्याण करना होता है।

अर्थव्यवस्था के प्रकार (Types of Economy)

अर्थव्यवस्था का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है जो निम्नलिखित हैं-

  1. . विकास की रणनीति के आधार पर।
  2.  राज्य व सरकार की भूमिका के आधार पर।
  3.  विकास की अवस्था के आधार पर।
  4. . निर्भरता की प्रकृति के आधार पर।
  5. शेष विश्व के साथ अन्तर सम्बन्ध के आधार पर।

निजी क्षेत्र और बाजार के सापेक्ष राज्य व सरकार की भूमिका के आधार पर अर्थव्यवस्था की तीन श्रेणियां हैं-

1. समाजवादी अर्थव्यवस्थाः– ये अर्थव्यवस्था समाजवादी, समाज की स्थापना की उद्देश्य से प्रेरित होती है। ऐसी अर्थव्यवस्था में संसाधनों पर सार्वजनिक स्वामित्व की अवधारणा लागू होती है। अतः ऐसी अर्थव्यवस्था में राज्य व सरकार का हस्तक्षेप ज्यादा होता है। माँग और पूर्ति (निजी क्षेत्र के साथ बाजार कारक) की भूमिका नगण्य होती है। अपनी नियंत्रणकारी प्रकृति के कारण समाजवादी अर्थव्यवस्था नियंत्रित अर्थव्यवस्था कहलाती है। चीन, क्यूबा, उत्तर कोरिया, समाजवादी अर्थव्यवस्था के उदाहरण हैं।

 2. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था:- पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में माँग व पूर्ति (निजी क्षेत्र व बाजार) कारकों की भूमिका प्रभावकारी होती है। ऐसी अर्थव्यवस्था में राज्य व सरकार की भूमिका सीमित होती है। ऐसी अर्थव्यवस्था अहस्तक्षेप के सिद्धान्त पर आधारित होती है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में जहां लाभ पर जोर होता है वहीं समाजवादी अर्थव्यवस्था कल्याणकारी राज्य की संकल्पना से प्रेरित होती है।

3. मिश्रित अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्था में समाजवादी एवं पंूजीवादी दोनों के लक्षण पाये जाते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था मिश्रित अर्थव्यवस्था का उदाहरण है।

विकास की रणनीति के आधार पर अर्थव्यवस्था की दो श्रेणियां हैं-

1.-योजनाबद्ध श्रेणी:- एक व्यवस्थित रणनीति के साथ विकास की संकल्पना को स्वीकार करने वाले अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आती है।

 2-गैर योजनाबद्ध श्रेणी:- ऐसी अर्थव्यवस्था जो आयोजन की संकल्पना को स्वीकार नहीं करती, गैर योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था कहलाती है।

 वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में सभी अर्थव्यवस्थायें योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आती हैं। विकास के विभिन्न अवस्थाओं के आधार पर अर्थव्यवस्था की तीन श्रेणियां हैं- 

1. विकसित अर्थव्यवस्था:- जहाँ औद्योगीकरण की प्रक्रिया औद्योगिक क्रान्ति के पहले व दूसरे चरण में शुरू हुई थी और आज विकास की उच्च अवस्था तक पहुँच चुकी हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आती हैं। अमेरिका व अधिकांश यूरोपीय देशों की

अर्थव्यवस्थायें विकसित अर्थव्यवस्था की श्रेणी में रखी जाती हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं की जी0डी0पी0 में सेवा क्षेत्र का महत्व अधिक होता है और ये आर्थिक विकास के तीसरे चरण में प्रवेश कर चुकी हैं।

2. विकासशील अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्थायें अपने संसाधनों का समुचित दोहन नही कर पायी। यहाँ पर औद्योगीकरण की प्रक्रिया देर से शुरू हुई। 1940-50 के दशक में औपनिवेशिक स्वतंत्रता प्राप्त करने वाली अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्थायें इसी श्रेणी की हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था के जी0डी0पी0 में कृषि क्षेत्र का भाग कम हो रहा होता है और औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र का भाग बढ़ रहा होता है। ये अर्थव्यवस्थायें आर्थिक विकास के दूसरे चरण में हैं।

3. अल्प विकसित अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्थायें जो अपने संसाधनों का दोहन अभी तक नहीं कर पायी हैं तथा अभी वे विकास के आरम्भिक चरण में हैं, अल्प विकसित अर्थव्यवस्था कहलाती हैं। ऐसी अर्थव्यवस्थायें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य देशों व अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के अनुदान पर निर्भर होती हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था वाले देशों के जी0डी0पी0 में प्राथमिक क्षेत्र की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

 निर्भरता के आधार पर अर्थव्यवस्था की तीन श्रेणियां हैं-

1. आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्थायें जो अपनी आवश्यकता की आपूर्ति स्वयं के उत्पादन से कर लेती हैं। सामान्यतः ऐसी अर्थव्यवस्था का स्वरूप बन्द अर्थव्यवस्था वाला होता है।

2. आश्रित अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्था जो अपनी आवश्यकता की पूर्ति स्वयं के उत्पादन से न करके दूसरी अर्थव्यवस्था के अनुदान या सहायता से पूरा करती हैं।

 3. परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्था:- जिन अर्थव्यवस्थाओं में आत्मनिर्भर एवं आश्रित दोनों के गुण मौजूद होते हैं। परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आती हैं। वर्तमान परिदृश्य में अधिकांश अर्थव्यवथायें इसी श्रेणी में आती हैं।

 शेष विश्व के साथ अन्तर सम्बन्धों के आधार पर अर्थव्यवस्था की दो श्रेणियां हैं-

1. बन्द अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्था जो आत्मनिर्भरता पर बल देती हैं और शेष विश्व के साथ आर्थिक क्रियाओं के प्रति उदासीन रहती हैं। बन्द अर्थव्यवस्था कहलाती हैं। 1991 के पूर्व भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत हद तक इसी श्रेणी में थी।

2. खुली अर्थव्यवस्था:- ऐसी अर्थव्यवस्था प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था को प्रोत्साहन एवं संरक्षणवाद को हतोत्साहित करती है। खुली अर्थव्यवस्था वाले देश शेष विश्व के साथ आर्थिक क्रियाओं को प्रोत्साहित करते हैं। इनका स्वरूप बहुत हद तक नियंत्रण मुक्त होता है। 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था खुली अर्थव्यवस्था के रूप में अग्रसर हुई।

आर्थिक गतिविधियों का वर्गीकरण  आर्थिक क्रियाकलापों का वर्गीकरण तीन श्रेणियों में किया गया है-

 1. प्राथमिक क्षेत्र:- प्राथमिक क्षेत्र में उन आर्थिक गतिविधियों को शामिल किया जाता है जो प्रत्यक्षतः पर्यावरण पर निर्भर होती हैं। प्राथमिक क्षेत्र का सम्बन्ध भूमि, जल, वनस्पति और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों से होता है। इसमें वे क्रियायें सम्मिलित की जाती हैं जो मानव को जीवित रखने के लिए आवश्यक होती हैं। कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वन उत्पाद, खनन आदि गतिविधियां प्राथमिक क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं।

2. द्वितीयक क्षेत्र:- द्वितीयक क्षेत्र में उन क्रिया-कलापों को सम्मिलित किया जाता है जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का स्वरूप बदलकर मूल्यवान बना देती हैं। द्वितीयक क्रियाओं में उत्पादन सम्बन्धी क्रियाएं सम्मिलित की जाती हैं। द्वितीय क्षेत्र में तीन प्रकार के क्षेत्र सम्मिलित किये जाते हैं।

  1.  विनिर्माण उद्योग
  2.  लघु एवं कुटीर उद्योग
  3. . खनिज उद्योग

3. तृतीयक क्षेत्र:- तृतीयक क्षेत्र का सम्बन्ध क्षेत्र सेवा सम्बन्धी गतिविधियों से जुड़ा होता है। इस क्षेत्र में मानव श्रमशक्ति की  भूमिका अहम होती है। परिवहन संचार व्यापार आदि से सम्बद्धित गतिविधियों को इसके अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है, कारण यह है कि अधिकांश सेवाओं का निष्पादन कुशल श्रमिक को व्यवसायिक दृष्टि से प्रशिक्षित विशेषज्ञों और परामर्शदाताओं के द्वारा किया जाता है। विकास अर्थशास्त्रियों ने तृतीयक क्रियाओं वाले क्षेत्र को सेवा उद्योग कहा है।

आर्थिक संवृद्धि एवं विकास (economic growth and development)

आर्थिक संवृद्धि एवं विकास (economic growth and development)

निश्चित समयावधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय की वृद्धि, आर्थिक समृद्धि है। यह एक भौतिक अवधारणा है। यदि, राष्ट्रीय उत्पाद, सकल घरेलू उत्पाद तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो रही है, तो माना जाता है कि आर्थिक संवृद्धि हो रही है।

आर्थिक विकास की धारणा आर्थिक संवृद्धि की धारणा से अधिक व्यापक है। आर्थिक संवृद्धि उत्पादन की वृद्धि से संबंधित है, जबकि आर्थिक विकास उत्पादन की वृद्धि के साथ-साथ, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक गुणात्मक एवं परिणात्मक सभी परिवर्तनों से सम्बन्धित है। आर्थिक संवृद्धि वस्तुनिष्ट है जबकि आर्थिक विकास व्यक्तिनिष्ठ।

आर्थिक विकास के माप में प्रति व्यक्ति आय के जीवन की गुणवत्ता को सही माप नही माना जाता है। इसकी माप में अनेक चारों को सम्मिलित किया जाता है जैसे-आर्थिक, राजनैतिक तथा सामाजिक संस्थाओं के स्वरूप में परिवर्तन, शिक्षा तथा साक्षरता दर, जीवन प्रत्याशा, पोषण का स्तर, स्वास्थ्य सेवायें प्रति व्यक्ति टिकाऊ उपभोग वस्तु आदि।

  •      आर्थिक संवृद्धि = केवल परिमाणात्मक परिवर्तन
  •     आर्थिक विकास = परिणात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तन

आर्थिक विकास की माप 

विभिन्न देशों के आर्थिक विकास की तुलनात्मक स्थिति ज्ञात करने के लिए पाँच दृष्टिकोण हैं-;

(A) आधारभूत आवश्यक प्रत्यागम – (Basic Needs Approaches) इस दृष्टिकोण का प्रतिवादन-1970 में विश्व बैंक ने किया।

(B) जीवन की भौतिक गुणवत्ता निर्देशांक (Physical Quality of Life Indext -PQLI)  इस Index के जान टिनवर्जन एवं मारिश डी0 माॅरिश ने प्रस्तुत किया। च्फस्प् के अन्तर्गत आर्थिक विकास के मापन के लिए तीन सूचकांक का प्रयोग किया जाता है।

  1.  जीवन प्रत्याशा(Life Expectancy)
  2. बाल मृत्युदर (Infant Mortality)
  3.  साक्षरता (Literary)

(C) निवल आर्थिक कल्याण (Net Economic Welfare) मापक -विलियम नोरधस तथा जेम्स टोबिन ने जीवन की गुणवत्ता में सुधार जो आर्थिक विकास की मापक है, की माप के लिए मंजर आॅफ इकनामिक वेलफेयर (MEW) की धारणा विकसित की जिसे बाद में सेमुएलसन और संशोधित किया तथा इसे  (NEW) मापक रहा।

NEW =G.N.P (सकल राष्ट्रीय उत्पाद)-(उत्पादन भप्रत्यक्ष लागत तथा आधुनिक नागरिक की हानियां ़ तथा गृहणियों की सीमायें।

(D) क्रय शक्ति समता विधि (Purchasing Power Parity Method):-  इस विधि का प्रतिपादन जी0आर0 कैसेल ने किया। इसके अन्तर्गत किसी देश की सकल राष्ट्रीय आय के किसी पूर्व निश्चित अन्तर्राष्ट्रीय विदेशाी विनिमय दर पर व्यक्त न करे, उस देश के भीतर मुद्रा की क्रयशक्ति के आधार पर व्यक्त किया जाता है। वर्तमान के विश्व बैंक इसी विधि का प्रयोग विभिन्न देशों के रहन-सहन की तुलना के लिए कर रहा है।

(E) मानव विकास सूचकांक (Human Ebullient India):-  इस सूचकांक की अवधारण यूनाइटेड नेशन्स से जुड़े प्रोग्राम से जुड़े प्रसिद्ध अर्थशास्त्री महबूत उल हक एवं उनके अन्य सहयोगी ए0के0 सेन तथा सिंगर हंस ने 1990 में किया।

 इनके द्वारा विकसित मानव विकास सूचकांक तीन चरों पर आधारित है-

  1.  दीर्घ एवं स्वस्थ्य जीवन
  2.  ज्ञान अथवा शिक्षा
  3. . जीवन निर्वाह स्तर

वर्ष 2010 में इन तीनों आयामों को परिभाषित किया गया तथा मानव विकास के आफलय के तरीके में बदलाव लाया गया। अब मानव विकास के स्तर का पता निम्न चार सूचकांकों के सदंर्भ में लगाया जाता है।

  1.  मानव विकास सूचकांक (HDI)
  2.  इनइक्वलिटी एडजस्टेड मानव विकास सूचकांक(THDI)
  3. लैगिंक विषमता सूचकांक (GII)
  4.   मल्टी डायमेंसनल प्राॅपर्टी इंडेक्स (MPI)

(a) मानव विकास सूचकांक –

2010 के पहले मानव विकास का आकलन जीवन-प्रकाश, साक्षरता और प्रति व्यक्ति आय पर की जाती थी, जबकि 2010 के बाद यह आकलन दीर्घ आयु और स्वस्थ्य जीवन, ज्ञान तक पहुँच और सम्मानजनक जीवन स्तर के आधार पर की जाती है।

(b) इनइक्वलिटी एडजस्टेड मानव विकास सूचकांक (IHDI) :-

यह मानव विकास के प्रत्येक आयामों में असाम्यता को समायोजित करता है। IHDI मानव-विकास सूचकांक असमाम्यता के वास्तविक स्तर को दर्शाता है जबकि मानव-विकास सूचकांक संभावित विकास स्तर को।

लैंगिक विषमता सूचकांक (GII) :-

यह सूचकांक महिलाओं की बंचना के दर्शाता है। इसमें प्रजनन-स्वास्थ्य, सशक्तीकरण और श्रम-बाजार जैसी चीजों को शामिल किया जाता है। GII पुरुषों और महिलाओं के बीच विषमता के कारण मानव विकास के हृास को दर्शाता है। यह 0 से 1 के बीच विचरण करता है। शून्य पूर्ण समता तथा 1 पूर्ण विषमता की स्थिति को दर्शाता है। इसमें निम्नलिखित संदर्भों के सम्मिलित किया जाता है।

  1.  मातृ मृत्यु (प्रति लाख जीवित प्रसव)
  2.  वयस्क (15-19)
  3.  सेकेंडरीय हायर सेकेंडरी स्तर की हासिल करना।
  4.  लेबसर फोर्स पार्टिसीयेशन रेट (LFPS)

बहुआयमी निर्धनता सूचकांक (M.P.I) :-

यह सूचकांक व्यक्तिगत स्तर पर स्वास्थ्य शिक्षा और जीवन-स्तर में बचाना की पहचान करता है। डच्प् जनसंख्या के उस हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, जो बहु आयमी निर्धनता का शिकार है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन सतर से संबंधित कुल दस उप मानक हैं-

 शिक्षा से संबंधितः-

  •  पाँच साल की स्कूली शिक्षा से वंचित लोग।
  •  स्कूल में जाने-योग्य बच्चों का स्कूल में नामांकन नहीं।

स्वास्थ्य से संबंधित:-

  •  कुपोषण
  •  शिशु मृत्यु-दर (प्रति हजार जीवित-प्रसव)’ब्ण्

जीवन स्तर में संबंधित:-

  •  बिजली नहीं।
  •  स्वच्छ पेयजल की कमी।
  •  स्वच्छता की व्यवस्था नहीं।
  •  स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त ’ईंधन का अभाव।
  • कार (चार पहिया वाहन) नहीं।

मानव विकास का अधिकतम मान 1 और न्यूनतम मान 0 होता है। अर्थात 1 अधिकतम मानव विकास की स्थिति को दर्शाता है और शून्य न्यूनतम मानव विकास की स्थिति को।

सतत् विकास(Sustainable development):-

सतत् विकास की अवधारणा 1987 में पर्यावरण एवं विकास के विश्व आयोग की रिपोर्ट में आंवर काॅमन फ्यूचर’ नाम से प्रकाशित रिपोर्ट में सर्वप्रथम उभरकर आती है। जिसमें कहा गया है कि-’’वह विकास जो वर्तमान की जरूरतों को, भावी पीढ़ी की अपनी जरूरतों की क्षमता से समझौता किए बिना, पूरा करता है। 1992 के रियो डी जेनेरियो के पृथ्वी सम्मेलन में जहाँ इसके महत्व को स्वीकार किया गया वहीं 2002 में 1 सतत् विकास पर आयोजितविश्व सम्मेलन में जोड़ा संघर्ष प्लाॅन आॅफ इम्पली मेंटेशन को अंतिम रूप दिया गया। दिल्ली उद्घोषणा 2002 में सतत् विकास पर अन्तर्राष्ट्रीय विधि के सात मूल सिद्धांत पहचाने गये:-

  1.  प्राकृतिक संसाधनों के सत्त इस्तेमाल को सुनिश्चित करने का राज्यों का कर्तव्य।
  2.  गरीबी-उन्मूलन और साम्यता
  3.  मानव-स्वास्थ्य, प्राकृतिक संसाधन एवं परिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में सतर्क नजरिया।
  4.  जन-भागीदारी एक सूचना व न्यायालय हुआ।
  5. सुशासन
  6.  समान, किन्तु विभेदकारी दायित्व सिद्धांत
  7.  मानव संसाधन के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक पर्यावरणीय तथ्यों के बीच तालमेल पर जो।

राष्ट्रीय आय (National Income)

राष्ट्रीय आय (National Income)

राष्ट्रीय आय (National Income)

राष्ट्रीय आय से तात्पर्य किसी देश की अर्थव्यवस्था द्वारा पूरे वर्ष के दौरान उत्पादित अन्तिम वस्तुओं व सेवाओं के शुद्ध मूल्य के योग से होता है, इसमें विदेशों से अर्जित शुद्ध आय भी शामिल होती है।

 मार्शल के अनुसार-’’किसी देश की श्रम एवं पूंजी उस देश के प्राकृतिक संसाधनों के साथ मिलकर प्रतिवर्ष कुछ भौतिक एवं अभौतिक वस्तुओं का उत्पादन करता है जिसमें सेवाएँ भी शामिल होती है इसी के बाजार मूल्य को राष्ट्रीय आय कहते हैं जिसमें विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय भी शामिल होती हैं।’’

A.C. पीगू के अनुसार-’’राष्ट्रीय आय किसी समुदाय के आय का वह हिस्सा होता है जिसमें विदेशों से प्राप्त आय सम्मिलित रहती हैं और जिसे मुद्रा के रुप में लाया जा सकता है।’’

प्रो0 साइमन कुजनेट्स के अनुसार-’’ राष्ट्रीय आय का तात्पर्य किसी एक वर्ष के दौरान देश में उत्पादित समस्त अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं में बाजार मूल्य से होता है जिसमें विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय सम्मिलित रहती है।

राष्ट्रीय आय के अध्ययन के कारण:- किसी भी देश में राष्ट्रीय आय का विश्लेषण अथवा राष्ट्रीय आय का लेखांकन कई कारणों से महत्वपूर्ण होता है-

  1.  देश की आर्थिक विकास की गति की माप के लिए राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में होने वाली वृद्धि का विश्लेषण किया जाता है।
  2.  दो या दो से अधिक देशों के बीच आर्थिक विकास की गति की तुलना करने के लिए राष्ट्रीय आय का विश्लेषण अनिवार्य होता है।
  3.  राष्ट्रीय आय विश्लेषण के माध्यम से क्षेत्रीय विकास की समीक्षा की जा सकती है और यह पता लगाया जा सकता है कि कौन सा क्षेत्र अधिक विकसित है और कौन सा कम विकसित है।
  4. . राष्ट्रीय आय के विश्लेषण द्वारा किसी अर्थव्यवस्था में प्राथमिक क्षेत्र, द्वितीयक क्षेत्र और तृतीयक क्षेत्र के योगदान का विश्लेषण किया जा सकता है।
  5.  किसी देश की समष्टिभावी आर्थिक नीति का निर्धारण राष्ट्रीय आय विश्लेषण के आधार पर ही किया जा है।

 राष्ट्रीय आय की अवधारणा (Concepts of National Income)

राष्ट्रीय आय की माप-करने के लिए अनेक धारणाओं का प्रयोग किया जाता हैं जिसमें से महत्वपूर्ण अवधारणाएं निम्नलिखित हैं-

सकल राष्ट्रीय उत्पादन (G.N.P) :-  किसी देश में एक वर्ष के भीतर उस देश के नागरिकों द्वारा उत्पादित समस्त अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं में मौद्रिक मूल्य जिसमें विदेशों से मिलने वाली शुद्ध आय भी शामिल हो, सकल राष्ट्रीय उत्पादन कहलाती हैं।

GNP = C+I +G+ (X-M)

यहाँ C= उपभोक्ता वस्तुओं एवं सेवाओं को

I= घरेलू निवेश

G= सरकारी व्यय

(X-M) = शुद्ध विदेशी आय के निर्यातों एवं आयातों के अन्तर को

शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (Net National Product) (NNP) :-

इसकी गणना के लिए सकल राष्ट्रीय उत्पाद में से मूल्य ह्नास (घिसावट व्यय) को घटा देते हैं।

NNP = GNP- मूल्य ह्नास

GNP = NNP मूल्य ह्नास

सकल घरेलू उत्पादन (Gross Domestic Product -GDP) :- 

रू.इसके अन्तर्गत किसी देश की सीमा के भीतर एक वर्ष के दौरान उत्पादित समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं के बाजार या मौद्रिक मूल्य को शामिल किया जाता है।

GDP = GNP – विदेशो से प्राप्त शुद्ध आय

GNP = GDP विदेशों से प्राप्त शुद्ध आय

GDP के अन्तर्गत मजदूरी और वेतन लगान एवं किराया व्याज लाभ एवं लाभांस अवितरित कम्पनी काम, मिश्रित आय इत्यादि को शामिल किया जाता है।

 शुद्ध घरेलू उत्पादन(Net Domestic Product – NDP) :-.

सकल घरेलू उत्पादन में से मूल्य ह्नास (घिसावट व्यय) को घटा देते हैं।

NDP = GDP- मूल्य ह्नास

GDP = NDP मूल्य ह्नास

निजी आय (Personal Income) :- ;च्मतेवदंस प्दबवउमद्धरू. निजी आय के अंतर्गत किसी व्यक्ति को विभिन्न स्रोतों से मिलने वाली समस्त आय को सम्मिलित किया जाता है। वैयक्तिक आय को ज्ञात करने के लिए राष्ट्रीय आय (साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद) में से निगम करों तथा सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के लिए किए गए भुगतानों को घटाते हैं तथा सरकारी हस्तान्तरण भुगतानों, व्यापारिक हस्तान्तरण भुगतानों तथा सरकार से प्राप्त शुद्ध ब्याज को जोड़ देते हैं।

व्यय योग्य आय ( Disposable Personal Income) :- करों का भुगतान करने के बाद शेष बची हुयी आय व्यय योग्य आय कहलाती है। और इसे Yd द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

व्यय योग्य आय Yd = PI- प्रत्यक्ष कर

PI = Yd प्रत्यक्ष कर

प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income -P.C.I.) :-.प्रति व्यक्ति आय किसी वर्ष देश की औसत आय होती है। इसकी गणना के लिये देश की राष्ट्रीय आय में उस वर्ष की जनसंख्या से भाग दे देते हैंI

  •  प्रति व्यक्ति आय किसी निश्चित वर्ष से सम्बन्धित होती है।

 साधन लागत और बाजार कीमत पर GDP की गणना :- किसी वस्तु के उत्पादन में विभिन्न साधनों द्वारा किए गए मूल्यवर्धक के योग को साधन लागत कहते हैं। अर्थात वस्तु को उत्पादित करने की वास्तविक लागत साधन लागत कहलाती है। परन्तु साधन लागतों में कर को जोड़ लें तथा अनुदान को घटा दे तो बाजार कीमत प्राप्त होती है।

GDP mp = GDPpc  करारोपण – अनुदान

GDP fc = GDPmp – करारोपण

अनुदान राष्ट्रीय आय गणना की विधियाँ :— राष्ट्रीय आय आंकलन के लिये मुख्य रूप से तीन विधियों का प्रयोग किया जाता है-

  1. . उत्पाद विधि
  2. . आय विधि
  3. . व्यय विधि
  •  भारत में राष्ट्रीय आय की गणना के लिये व्यय विधि का प्रयोग नहीं किया जाता है। केवल उत्पाद एवं आय विधि का प्रयोग किया जाता है।

 उत्पाद विधि :-

  1.  प्राथमिक क्षेत्र
  2.  द्वितीयक क्षेत्र
  3.  तृतीयक क्षेत्र

Total & GNP

आय विधि :-

  1.  मजदूरी वेतन
  2.  लगान, किराया
  3.  ब्याज
  4.  लाभ

Total  & GNI

  व्यय विधि :-

  1. उपभोग व्यय
  2.  निवेश व्यय
  3.  सरकारी व्यय
  4.  आयातों पर किया गया व्यय

Total   &  GNE

 गणना विधि में-

GNP = GNI = GNE

उत्पाद विधि — उत्पाद विधि द्वारा राष्ट्रीय आय की गणना करते समय 1 वर्ष के भीतर विभिन्न क्षेत्रों जैसे प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक क्षेत्र में उत्पादित समस्त वस्तुओं के बाजार मूल्य की गणना करते हैं और इसे ळछच् द्वारा प्रदर्शित करते हैं। यहाँ प्राथमिक क्षेत्र में कृषि वानिकी, मत्स्य पालन, खनन को शामिल किया जाता है। द्वितीयक क्षेत्र में निर्माण एवं विनिर्माण में बिजली गैस एवं जलापूर्ति को शामिल किया जाता है। जबकि तृतीयक क्षेत्र के अन्तर्गत परिवहन संचार सेवा क्षेत्र इत्यादि को शामिल किया जाता है।

 आय विधि — आय विधि के अन्तर्गत राष्ट्रीय आय की गणना करते समय किसी दिये गये वर्ष में मजदूरी एवं वेतन लगान एवं किराया ब्याज, लाभ, लाभांश एवं रायल्टी के समग्र योग को ज्ञात कर लिया जाता है। जिसमें समग्र योग आय को सकल राष्ट्रीय आय (GNI) कहते हैं।

 व्यय विधि — इसके अन्तर्गत राष्ट्रीय आय की गणना करते समय उपभोग व्यय, निवेश व्यय, सरकारी व्यय तथा विदेशी व्यापार पर किये जाने वाले व्यय के योग को ज्ञात किया जाता है और इसे सकल राष्ट्रीय व्यय (GNE) कहते हैं।

राष्ट्रीय आय की गणना में समस्यायें :-

1. राष्ट्रीय आय विश्लेषण में सबसे महत्वपूर्ण समस्या दोहरी गणना की होती है जो अन्तिम वस्तुओं एवं मध्यवर्ती वस्तुओं के बीच भेद न कर पाने से होती है। राष्ट्रीय आय विश्लेषण में अवैध आय को अथवा काली कमाई को शामिल नहीं किया जाता है जो किसी देश में बहुत अधिक मात्रा में पायी जाता है।

 2. देश की सीमायें — किसी देश की सीमा के अन्तर्गत केवल देश की भौगोलिक सीमा नहीं आती है। घरेलू अथवा आर्थिक सीमा में भौगोलिक क्षेत्र के साथ-साथ मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों को शामिल किया जाता है।

  1. अन्य देशों में स्थित दूतावास, मिलिट्री बेस प्रवजन कार्यालय।
  2.  वायुमण्डल सीमान्तर्गत जल क्षेत्र में जहाँ खनिज निकालने और मछली पकड़ने का अधिकार देश के पास है।
  3.  मुक्त क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले उद्योग आर्थिक सीमा के अन्तर्गत आते हैं। जैसे- मुक्त व्यापार क्षेत्र।
  •   भारतीय नागरिक के अन्तर्गत देश में रहने वाले नागरिकों के अतिरिक्त कुछ अन्य लोगों को शामिल किया जाता है-
  1.  अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के कर्मचारी जो विदेशी क्षेत्र में कार्यरत हैं।
  2.  ऐसे लोग जो पर्यटन शिक्षा अथवा स्वास्थ्य सेवाओं के लिए विदेश में रह रहे हों। परन्तु इसकी अवधि 1 वर्ष से कम हो।
  3.  किसी जहाज, वायुयान इत्यादि में कार्यरत कर्मचारी जो देश की सीमा से बाहर हों वे भी देश के निवासी कहलाते हैं।
  4.  ऐसे कर्मचारी या श्रमिक जो कुछ वर्षों के लिए अन्य देशों में जाते हैं और बाद में अपने घर वापस लौट आते हैं। देश के निवासी कहे जाते हैं।
  5.   सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले श्रमिक जो दोनों देशों में आवागमन करते रहते हैं उन्हें भी देश के निवासियों में शामिल किया जाता है।

भारत में राष्ट्रीय आय:- भारत में राष्ट्रीय आय का अनुमान सर्वप्रथम वर्ष 1868 ई0 में दादाभाई नौरोजी ने लगाया था और इनके अनुसार तत्कालीन भारत में प्रति व्यक्ति आय 20 रू0 वार्षिक थी।

  •  भारत में राष्ट्रीय आय का सर्वप्रथम वैज्ञानिक अनुमान प्रो0 बी0के0आर0वी0 राव द्वारा 1925 ई0 एवं 1931 में किया था। वर्ष 1899 में विलियम डिग्बोई, 1911 और 1922ई0 में फिण्डले शिराज ने जबकि 1921 ई0 में शाह एवं खम्बाटा ने भारत में राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाया था। ये सभी विश्लेषण स्वतंत्रता से पूर्व थे।
  •   स्वतंत्रता के बाद 1950 ई0 में पी0सी0 महालोबिस की अध्यक्षता में राष्ट्रीय प्रतिदर्स सर्वेक्षण (एनएसएस) की स्थापना की गयी। जिसे अब एनएसओ के नाम से जाना जाता है।
  •   वर्ष 1949 ई0 में एक राष्ट्रीय आय समिति का भी गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष पी0सी0 महालोबिस थे। जबकि बी0के0 आर0बी0 राव और गाडगिल इसके सदस्य थे। इस समिति ने 1951 से 1954 तक भारत में राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाया था। इसके बाद केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) भारत मेे राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाता है और वर्तमान समय में भी यही संस्था राष्ट्रीय आय सम्बन्धी आंकड़े प्रस्तुत करती हैं।
  •   केन्द्रीय साख्यिकी संगठन साख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय का एक भाग है।

 राष्ट्रीय आय विश्लेषण:-वर्ष 2014-15 की आर्थिक समीक्षा में कई परिवर्तन किये गये। जिसमें कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन निम्नलिखित हैं-

  •  राष्ट्रीय आय विश्लेषण में आधार वर्ष 2004-05 के स्थान पर 2011-12 कर दिया गया और इसी के अनुरूप नवीन संसोधित आकंड़ो को प्रस्तुत किया गया।
  •   विभिन्न क्षेत्रों के मूल्यांकन के लिए सकल मूल्यवर्धन ;ळट।द्ध का निर्धारण आधारभूत कीमतों के आधार पर किया जायेगा न कि साधन लागत के आधार पर।

GVA = CE+OS / MI+CFC+dj & –  अनुदान जहाँ CE- नियुक्त लोगों को मिलने वाली क्षतिपूर्ति।

  1.  OS  क्रियात्मक अतिरेक
  2. MI – मिश्रित आय
  3. CFC- स्थिर पूंजी का उपभोग
  •  2004-05 आधारवर्ष के अनुसार वर्ष 2011-12 से 2013-14 के बीच की राष्ट्रीय आय में कृषि एवं सम्बन्धित वस्तुओं का योगदान 17.9 प्रतिशत था जबकि उद्योगों का योगदान 26 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र का 56.1 प्रतिशत था।
  •  यदि आधार वर्ष को 2011-12 मान लें तो राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान 18.7 प्रतिशत उद्योग क्षेत्र का 31.7 प्रतिशत तथा सेवा का 49.6 प्रतिशत माना जा सकता है।
  •   विभिन्न योजनाकाल के दौरान यदि आर्थिक विकास की दर तुलना करें तो पहली पंचवर्षीय योजना एवं द्वितीय पंचवर्षीय योजना विकास की दर 4.2 प्रतिशत थी जो तीसरी पंचवर्षीय योजना में कम होकर 2.6 प्रतिशत और चैथी योजना में 3.2 प्रतिशत पायी गयी। इसी न्यूनतम विकासदर को हिन्दू विकास दर या हिन्दू ग्रोथरेट कहते हैं।
  •   तीसरी एवं चैथी पंचवर्षीय योजना के बीच तीन वार्षिक योजनाएं 1966-1969 के बीच चलाई गयी। जिसमें औसत वृद्धिदर 3.7 प्रतिशत पायी गयी।
  •   पांचवी योजना में वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत 〉
  •   छठी योजना में वृद्धि दर 5.4 प्रतिशत 〉       विकास दर रही
  • सातवी योजना में वृद्धि दर 5.5 प्रतिशत〉
  • आठवीं पंचवर्षीय योजना में विकास की दर 6.7 प्रतिशत नौवी में 5.5 प्रतिशत और दसवी में 7.5 प्रतिशत और 11वीं योजना 7.8 प्रतिशत विकास की दर प्राप्त किया गया।
  •   यदि वर्ष 2014-15 में भारत की ळण्क्ण्च् में वृद्धि का एक अनुमान प्रस्तुत करें तो अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के अनुसार वृद्धि दर 5.4 प्रतिशत विश्व बैंक वृद्धि दर 6 प्रतिशत अनुमानित की गयी है जबकि 12वीं पंचवर्षीय योजना में आर्थिक विकास दर में संशोधित लक्ष्य को 8 प्रतिशत निर्धारित किया गया।
  •  यदि राष्ट्रीय आय का विश्लेषण विभिन्न क्षेत्रों के आधार पर किया जाय तो भारत में राष्ट्रीय आय में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान जो वर्ष 2010-11 में 21 प्रतिशत था वर्ष 2011-12 में 20.5 प्रतिशत था और 2012-13 में 19.9 प्रतिशत पाया गया।
  •   भारतीय की राष्ट्रीय आय में द्वितीयक क्षेत्र का हिस्सा वर्ष 2010-11 में 24.3 प्रतिशत था वर्ष 2011-12 में 24.6 प्रतिशत और वर्ष 2012-13 में 23.8 प्रतिशत पाया गया।
  •   राष्ट्रीय आय में तृतीयक क्षेत्र का हिस्सा वर्ष 2010-11 में 54.6 प्रतिशत, 2011-12 में 54.9 प्रतिशत, 2012-13 में 56.3 प्रतिशत पाया गया।
  • यह सभी आंकड़े 2004-05 के आधार वर्ष पर आधारित थे जिन्हें विगत आर्थिक समीक्षा 2013-14 में प्रस्तुत किया गया।

वृद्धिदर के रूप में-

यदि विभिन्न क्षेत्रों में वृद्धिदर का मूल्यांकन करें तो वर्ष

प्राथमिक क्षेत्र में वृद्धि दर

  • 2010-11———-4.3 प्रतिशत
  •  2011-12 ——— 4.4 प्रतिशत
  • 2012-13 ——— 1.0 प्रतिशत पायी गयी

  ़िद्वतीयक क्षेत्र में वृद्धि दर

  • 2010-2011 ——— 7.6 प्रतिशत
  • 2011-2012 ——— 8.5 प्रतिशत
  • 2012-2013 ——— 1.2 प्रतिशत पायी गयी।

 भारत के तृतीयक क्षेत्र में 

  • 2010-11 में वृद्धि दर – 9.7 प्रतिशत
  • 2011-12 में वृद्धि दर – 6.6 प्रतिशत
  • 2012-13 में वृद्धि दर – 7.0 प्रतिशत

भारत में बेरोजगारी की समस्या (unemployment problem in india)

भारत में बेरोजगारी की समस्या (unemployment problem in india)

सामान्य रूप से बेरोजगारी का आशय उत्पादन कार्य में न लगा होना है। बेरोजगारी की समस्या एक सामान्य समस्या है जो विकसित या अल्प विकसित सभी प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं में पायी जाती है।परम्परावादी अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पूर्ण रोजगार एक सामान्य अवस्था है और बेरोजगारी सामान्यतः नहीं पायी जाती है। कीन्स का विचार था कि पूर्ण मांग की कमी के कारण बेरोजगारी की समस्या पायी जाती थी और और इसे दूर करने के लिए समग्र माँग और प्रभाव पूर्ण मांग को बढ़ाना चाहिए। इस संदर्भ में कीन्स ने घाटे की वित व्यवस्था को महत्व दिया था। इसे हीनार्थ प्रबन्ध नाम दिया गया। भारत में बेरोजगारी का स्वरूप पश्चिमी देशों से भिन्न है यहाँ संरचात्मक बेरोजगारी पायी जाती है जिसे बिना संरचात्मक सुधार के कम नहीं किया जा सकता है। किसी भी देश में श्रम-शक्ति का तात्पर्य 15-65 आयु वर्ग की होती है जो रोजगार प्राप्त करना चाहता हैं-

  • बेरोजगार लोगों की संख्या
  • बेरोजगारी की दर = ×100      श्रम शक्ति

यदि 8 घंटे प्रतिदिन काम करने के साथ किसी व्यक्ति को वर्ष में 273 दिन का रोजगार प्राप्त हो तो उसे पूर्ण रोजगार में कहा जायेगा।

बेरोजगारी का वर्गीकरणः-  बेरोजगारी का वर्गीकरण दो रूपों में किया जा सकता हे।

  1. एच्छिक बेरोजगारी
  2.  अनैच्छिक बेरोजगारी

 1. एच्छिक बेरोजगारी (Voluntary Unemployment) :- जब कार्यशील जनसंख्या उत्पादन कार्य करना ही न चाहती हो या उनको रोजगार प्राप्त करने की इच्छा न हो अथवा वे प्रचलित मजदूरी पर   काम न चाहते हों तो ऐसे बेरोजगारों को ऐच्छिक बेरोजगार कहा जाता है।

 2. अनैच्छिक बेरोजगार (Involuntary Unemployment) :-   यदि अर्थव्यवस्था में श्रमिक चालू मजबूरी दर पर कार्य करने के लिए तैयार हो परन्तु उस मजदूरी दर पर उन्हें कार्य न मिले तो ऐसे लोगों को अनैच्छिक बेरोजगार कहा जाता है और इस स्थिति को अनैच्छिक बेरोजगारी।

  • बेरोजगारी का वर्गीकरण इस प्रकार भी कर सकते हैं।

 (A) शहरी बेरोजगार

  1.   शिक्षित बेरोजगार
  2.  श्रमिक बेरोजगार

(B) ग्रामीण बेरोजगार

  1.  मौसमी बेरोजगार
  2.  चक्रीय बेरोजगार
  3.  प्रच्छन्न बेरोजगार
  4.  खुली बेरोजगारी

 प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) :- . इसे अदृश्य या छिपी हुई बेरोजगारी की संज्ञा दी जाती है। इस अवधारणा का सर्वप्रथम उल्लेख जाॅन राबिन्सन ने 1936 में किया था। इसके अन्तर्गत श्रमिक बाहर से तो काम पर लगे हुए दिखाई देते हैं परन्तु वास्तव में उन श्रमिकों की उस कार्य में आवश्यकता नहीं होती है। अर्थात यदि उस कार्य से श्रमिकों को निकाल दिया जाये तो कुल उत्पादन पर कोई प्रभाव नही पड़ता। इन श्रमिकों की सीमांत उत्पादकता शून्य अथवा नगण्य होती है। इस प्रकार की बेरोजगारी की प्रधानता कृषि क्षेत्र में पायी जाती है। भारतीय बेरोजगारी की सबसे बड़ी समस्या प्रच्छन्न बेरोजगारी की है। कुल ग्रामीण बेरोजगारी का 70 प्रतिशत से अधिक प्रच्छन्न रूप से बेरोजगार हैं।

भारत में बेरोजगारी सम्बन्धी नीतियाँ :-

इस समस्या के अध्ययन एवं समाधान के सम्बन्ध में सन 1973 में बी0 भगवती की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया जिसने तीन अवधारणायें प्रस्तुत की।

 1. सामान्य स्थिति (Usual Status) :- इसमें वह श्रमशक्ति सम्मिलित है जिसे पूरे वर्ष रोजगार नहीं मिलता। वास्तव में यह दीर्घकालिक बेरोजगारी का सूचक है।

 2. चालू साप्ताहिक स्थिति (Current Weekly Status) :- इसमें उन बेरोजगारों को शामिल किया जाता है जिन्हें सर्वेक्षण सप्ताह के अन्तर्गत एक घण्टे भी कार्य नहीं मिलता। यह सप्ताह में औसत बेरोजगारों की संख्या को दर्शाता है।

3. चालू दैनिक स्तर (Current Daily Status) :- जब किसी व्यक्ति के रोजगार का सर्वेक्षण प्रतिदिन के आधार पर किया जाय तो उसे चालू दैनिक स्थिति कहते हैं। दैनिक बेरोजगारी का स्तर बेरोजगारी की समस्या का व्यापक एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण सूचक है।

यदि भारत के सन्दर्भ में देखें तो प्रथम चार पंचवर्षीय योजनाओं तक रोजगार में वृद्धि को केन्द्रीय स्थान नहीं प्राप्त हुआ। यद्यपि एक लक्ष्य के रूप में इसे रखा गया था। छठीं पंचवर्षीय योजना में रोजगार आधारित विकास प्रक्रिया पर बल देते हुए कई रोजगार कार्यक्रम चलाये गये।

भारत में गरीबी एवं बेरोजगारी निवारण कार्यक्रम :- भारत में बेरोजगारी एवं गरीबी निवारण कार्यक्रमों को दो भागों में बांट सकते हैं-

  1.  ग्रामीण बेरोजगारी निवारण कार्यक्रम
  2.  शहरी बेरोजगारी निवारण कार्यक्रम

भारत में गरीबी एवं बेरोजगारी के निवारण के लिए जो कार्यक्रम चालए गये उन्हें ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इन कार्यक्रमों का वर्गीकरण चार अन्य भागों में भी किया जा सकता है-

  1. . बेरोजगारी निवारण एवं गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम
  2.   सामाजिक तथा आर्थिक सुरक्षा कार्यक्रम
  3.  महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास कार्यक्रम
  4. सामाजिक अवस्थापना से सम्बन्धित कार्यक्रम

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (NREP) :- यह योजना अक्टूबर 1980 में प्रारम्भ हुई। यह केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम था जिसमें केन्द्र एवं राज्य की वित्तीय भागीदारी 50-50 प्रतिशत थी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नये अवसर उपलब्ध कराना था। वर्ष 1989 ई0 में जवाहर रोजगार योजना में इसको शामिल कर दिया गया।

समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) :- यह योजना वर्ष 1978-79 में देश के कुछ भागों में प्रारम्भ की गयी। फलतः इसकी सफलता को देखते हुये इस पूरे देश में 1980 ई0 में विस्तार किया गया। यह एक गरीबी निवारक स्व रोजगार योजना थी। सन् 1999 ई0 में इसे स्वर्ण जयन्ती स्व रोजगार योजना में शामिल किया गया।

ग्रामीण नवयुवकों का स्वतः प्रशिक्षण कार्यक्रम (TRYSEM) :- यह योजना वर्ष 1979 ई0 में प्रारम्भ की गयी। जिसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण नवयुवकों को स्वतः प्रशिक्षण देना था जो बेरोजगार थे और जिनकी आय साढ़े तीन हजार रूपये वार्षिक से कम थी। अप्रैल 1999 ई0 में इस योजना को स्वर्ण जयन्ती स्व रोजगार योजना में मिला दिया गया।

ग्रामीण भूमिहीन श्रमिक रोजगार गारण्टी कार्यक्रम (RLEGP) :- ;त्स्म्ळच्द्ध रू. योजना का शुभारम्भ 15 अगस्त 1983 ई0 को किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य भूमिहीन श्रमिकों एवं सीमान्त किसानों को रोजगार के लाभप्रद अवसर उपलब्ध कराना था। अप्रैल 1989 ई0 में इस योजना को JRY में मिला दिया गया।

 जवाहर रोजगार योजना (JRY) :- इस योजना का प्रारम्भ 28 अप्रैल 1989 ई0 को किया गया जो पूर्व की दो योजनाओं NREP तथा RLEGPको मिलाकर बनायी गयी थी। बाद में इन्दिरा आवास योजना IAY और दस लाख कुंए की योजना (MWS) को जवाहर रोजगार योजना में मिला दिया गया।

♦ JRY के तीन उद्देश्य थे-

  1.  ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं एवं पुरुषों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना।
  2.  ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक परिसम्पत्तियों का निर्माण करना।
  3. . ग्रामीण लोगों के रहन-सहन और जीवन स्तर में सुधार करना,

तथा परिवार में कम से कम एक व्यक्ति को सौ दिन का रोजगार प्रदान करना था।

JRY के 11 वर्ष होने पर उसका नाम बदलकर जवाहर रोजगार समृद्धि योजना कर दिया गया। फलतः अब इसे सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना के एक हिस्से के रूप में माना जाता है।

 स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्व रोजगार योजना (SJGSY) :- इस योजना का प्रारम्भ 1 अप्रैल 1999 को हुआ। यह योजना का निर्माण पिछली 6 योजनाओं को मिलाकर किया गया था। इस योजना में IDRP, TRYSEM ,IAY, MWS, SITRA एवं गंगा कल्याण योजना को शामिल किया गया था। इस योजना से लाभ प्राप्तकर्ता को स्व रोजगारी के रूप में जाना जाता था। जून 2011 में इस योजना को National Rural Librigood Missionछंजपवदंस त्नतंस सपइतपहववक डपेेपवद में शामिल कर दिया गया।

 महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी अधिनियम (MNERGA) :- ग्रामीण रोजगारी भूख और गरीबी से निजात पाने के लिए केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना NERGA का शुभारम्भ प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह ने 2 फरवरी 2006 को आन्ध्र प्रदेश के अनन्तपुर में किया गया।  प्रारम्भ में इस योजना को देश के चुने हुये 200 जिलों में लागू किया गया।

इस योजना के अन्तर्गत हर ग्रामीण परिवार के सक्षम और इच्छुक व्यक्ति को सालभर में न्यूनतम 100 दिनों का काम दिया जाता है। योजना की विभिन्न विशेषताओं में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि यदि व्यक्ति को काम नहीं मिलता तो मजदूरी भत्ता दिया जाता है। काम करने की जगह मजदूर के घर से 5 किमी0 की दूरी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। महिला श्रमिकों को अपने बच्चों को साथ रखने की सुविधा दी जाती है। इस योजना के अन्तर्गत पंचायतों को अधिकार दिया गया है कि वे काम चाहने वाले लोगों की अर्जी का पूरा अध्ययन करें और 15 दिन के भीतर काम देना सुनिश्चित करें।

इस योजना में काम के बदले अनाज योजना, सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना का विलय कर दिया गया तथा 1 अप्रैल 2008 से इसे पूरे भारत में लागू कर दिया गया।

मनरेगा के तहत मजदूरों को दी जाने वाली मजदूरी की दरों को खेतिहर मजदूरों के लिए उपभोक्ता में सूचकांक से सम्बद्ध करने की घोषणा 6 जनवरी 2011 से की गयी।

  •  वर्ष 2006 से मनरेगाा की शुरूआत से ग्रामीण परिवारों को लगभग 129000 करोड़ की मजदूरी का भुगतान 31 दिसम्बर, 2012 तक किया गया। ऽ दिसम्बर 2012 तक 1348 करोड़ श्रम दिवसों का रोजगार सृजन।
  •   वर्ष 2008 से दिसम्बर 2012 तक औसतन प्रत्येक वर्ष 5 करोड़ परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराया गया।
  •  कुल सृजित श्रम दिवसों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों का हिस्सा 51ः महिलाओं का हिस्सा 47ः है।
  •   कार्यक्रम प्रारम्भ किए जाने के बाद से कुल 146 कार्य किए जा चुके हैं।
  •  वर्ष 2013-14 के बजट में रु 33,000 करोड़ का आवंटन इस योजना के लिए किया गया है।
  •   इस योजना में 90ः योगदान केन्द्र सरकार का और 10ः  राज्यों का होता है।

 राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) :- ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता निवारण के लिए राजस्थान के बांसवाड़ा से 2 जून 2011 को इस योजना का शुभारम्भ किया गया। इस मिशन के तहत ग्राम स्तर पर स्वयं सहायता समूहों (Self Help Group -SHGs) को गठित कर उनके माध्यम से लाभप्रद रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर बेहतर जीवन-यापन का स्थाई आधार प्रदान करने की सरकार की योजना है। इस योजना की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-

  1.  प्रत्येक चिन्हित ग्रामीण गरीब परिवार से एक महिला सदस्य को स्वयं सहायता समूह के अन्तर्गत लाना।
  2.   बी0पी0एल0 परिवारों के सौ प्रतिशत कबरेज के लक्ष्य को देखते हुए अनुसूचित जाति जनजाति से 50ः ए अल्पसंख्यक से 15ः तथा विकलांग व्यक्तियों से 3ः लाभार्थियों को सुनिश्चित करना है।
  3.  क्षमता निर्माण तथा कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण प्रदान करना।
  4.   वित्तीय समावेशन, ब्याज अनुदान का प्रावधान नवीनतम का संवर्धन, पूँजीगत अनुदान सुनिश्चित करना है।

कौशल विकास कार्यक्रम (National Skill Devlopment Program) :-  यह कार्यक्रम 11वीं पंचवर्षीय योजना में प्रारम्भ किया गया है। जिसका उद्देश्य पूरे देश में व्यापक स्तर पर कुशलता का विकास करना है। इसके लिए राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC) को महत्वपूर्ण भूमिका दी गयी जो कि वित मंत्रालय की एक गैर लाभ प्राप्तकारी संस्था है।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश भर में लोगों की कुशलता में वृद्धि लाकर न कि बेरोजगारी एवं गरीबी की समस्या से बाहर लाना है। बल्कि देश में आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना है।

अन्नपूर्णा योजना :- यह योजना गरीबी निवारण के सन्दर्भ में 2 अक्टूबर वर्ष 2000 को प्रारम्भ की गयी। इस योजना का प्रारम्भ उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले से हुई, जिसके अन्तर्गत निर्धन वर्ग के लोगों को 10 किलोग्राम अनाज बिना मूल्य के प्रतिमाह देने का लक्ष्य रखा गया।

अन्त्योदय अन्न योजना :- 25 दिसम्बर 2000 को इस योजना का शुभारम्भ प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा किया गया। इस योजना के तहत 2 रू0 प्रति किलोग्राम गेहूँ व 3 रू0 प्रति किलोग्राम चावल उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। प्रारम्भिक वर्षों में इस योजना में प्रत्येक परिवार को महीने में 25 किलोग्राम अनाज दिया जाता था। जिसे बाद में बढ़ाकर 35 किलोग्राम कर दिया गया।

 जनश्री बीमा योजना (JBY) :-  इस योजना का प्रारम्भ 10 अगस्त 2000 को किया गया जिसका उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे तथा उससे थोड़ा ऊपर रहने वाले ग्रामीण और शहरी व्यक्तियों को जीवन बीमा सुरक्षा प्रदान करना था। इसी से सम्बन्धित खेतिहर मजदूर बीमा योजना को माना जाता है जो कि भूमिहीन श्रमिकों के लिए प्रारम्भ की गयी थी। जिसके अन्तर्गत 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों को 100 रू0 प्रतिमाह का पेंशन  दिया जाता है।

 स्वावलम्बन योजना :- इस योजना का प्रारम्भ 27 सितम्बर 2010 को किया गया जो कि असंगठित क्षेत्र के लिए थी जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को पेंशन योजना का लाभ प्रदान कराना था।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY) :- इस योजना को 1 अक्टूबर 2007 को घोषित किया गया तथा अप्रैल 2008 से लागू किया गया। इस योजना के उद्देश्यों में असंगठित क्षेत्रों में बी0पी0एल0 परिवारों को परिवार उत्प्लावक आधार पर प्रति परिवार प्रत्येक वर्ष 30 हजार रूपये का स्मार्ट कार्ड आधारित धन रहित स्वास्थ्य बीमा प्रदान करना है। प्रीमियम वहन में केन्द्र तथा राज्य 75ः25, उत्तर पूर्वी राज्यों और जम्मू और कश्मीर के मामलों में यह अनुपात 90ः10 का है।

सर्व शिक्षा अभियान:- गरीबी एवं शिक्षा के बीच सह सम्बन्ध पाया जाता है और गरीबी निवारण के लिए आवश्यक है कि लोगों को शिक्षित किया जाये। इसी के तहत देश के 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को वर्ष 2010 तक 8वीं कक्षा तक निःशुल्क और गुणवत्ता परख प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य को लेकर वर्ष 2000-2001 में सर्व शिक्षा अभियान की घोषणा की गयी। मार्च 2009 में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान प्रारम्भ किया गया।

इस योजना के अन्तर्गत 6 से 11 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को वर्ष 2007 तक 5 वर्ष की तथा 11 से 14 वर्ष तक के बच्चों को 8 वर्ष की उच्च प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने हेतु केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से पूरा प्रयास किया जा रहा है जिसका अनुपात 65ः35 है। जबकि पूर्वोत्तर राज्यों में यह 90ः10 का है। यह योजना भारत के सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू है और इससे स्कूल छोड़ने की दर में कमी आयी है। देश के 11 लाख बस्तियों के 19 करोड़ 20 लाख बच्चे इस कार्यक्रम से लाभान्वित हो रहे हैं।

मध्यान्ह भोजन योजना :-

यह कार्यक्रम 15 अगस्त 1995 ई0 को प्रारम्भ किया गया था। सितम्बर 2004 में इस योजना को संसोधित करके प्राथमिक स्तर पर लागू किया गया और अक्टूबर 2007 से कक्षा 8 तक के बच्चों को इस योजना को दायरे में लाया गया।

इस योजना में प्राथमिक स्तर के बच्चों को 450 कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन का मध्यान्ह भोजन मुहैया कराया जाता है। प्राथमिक स्तर से ऊपर के बच्चों के लिए 700 कैलौरी और 20 ग्राम प्रोटीन का पोषाहार निश्चित किया गया है। पोषाहार मानदण्डों को पूरा करने के लिए केन्द्र सरकार प्रति प्राथमिक विद्यालय बालक प्रति विद्यालय दिवस 100 ग्राम की दर से और प्रति प्राथमिक विद्यालय के ऊपर बालक प्रति बालक दिवस 150 ग्राम की दर से खाद्यान्न मुहैया कराती है। इस स्कीम को मानीटर करने के लिए डक्ड.डप्ै शुरू किया गया जो दैनिक आधार पर एक घंण्टे के भीतर विद्यालयों से सूचना एकत्र करेगा। इस योजना के तहत केन्द्र एवं राज्य सरकारों का योगदान 75ः25 है। जबकि पूर्वोत्तर राज्यों में 90ः10 का है।

साक्षर भारत योजना :- यह योजना सितम्बर 2009 में चालू की गयी जिसमें राष्ट्रीय साक्षरता मिशन को पुनर्गठित किया गया और 7 करोड़ वयस्कों को साक्षर बनाने का लक्ष्य रखा गया।

 गोकुल ग्राम योजना :- गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए गोकुल ग्राम योजना गुजरात सरकार द्वारा प्रारम्भ की गयी जिसमें प्रत्येक गांव का चयन किया जाता है और 15 लाख रूपये की सहायता देने का प्रावधान किया गया है।

 विद्यावाहिनी योजना :- यह योजना इण्टरनेट एवं इण्टरानेट के माध्यम से 60 हजार सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जून 2003 में प्रारम्भ की गयी। इस योजना के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश के लखनऊ और इलाहाबाद, झारखण्ड से हजारीबाग, गुजरात से गांधी नगर, महाराष्ट्र से औरंगाबाद, पश्चिमी बंगाल से दक्षिण चैबिस परगना और आन्ध्र प्रदेश से बिचूर को शामिल किया गया।

आंगनबाड़ी केन्द्र :- आंगनबाड़ी केन्द्र शहरी एवं ग्रामीण क्षत्रों में खोले गये। जिनका मुख्य उद्देश्य 300 दिनों के लिये स्वास्थ्य पोषाहार शिक्षा एवं सन्दर्भित सेवाओं के अतिरिक्त अनौचारिक शिक्षा प्रदान करना है। इसमें कार्यकर्ताओं का चयन उसी क्षेत्र की महिलाओं में से किया जाता है। यह ICDS से जुड़े होते हैं।

 सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजना :- यह योजना वर्ष 2003 से प्रारम्भ की गयी जिसमें गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को निःशुल्क स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाता है और इसके अन्तर्गत केन्द्र सरकार प्रति परिवार 550 रू0 जीवन बीमा कम्पनियों को प्रीमियम के रूप में देती है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना :- अक्टूबर 2007 में प्रारम्भ की गयी यह योजना 1 अप्रैल 2008 से प्रभावी रूप में सामने आयी। इस योजना के द्वारा असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के प्रत्येक श्रमिक एवं परिवार को 30 हजार रूपये प्रति परिवार स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जायेगा। सन् 2010-11 में इसे मनरेगा से जोड़ दिया गया है।

 राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) :- इस कार्यक्रम की शुरूआत 12 अप्रैल 2005 को की गई। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनतम परिवारों को वहनीय एवं विश्वसनीय गुणवत्तापरक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराया जाता है। इसके अन्तर्गत बच्चों के स्वास्थ्य परियोजनाओं जैसे-मलेरिया, टीवी, कुष्ठ रोग, इन सभी के लिए एकही स्थान पर उपचार की सेवायें उपलब्ध कराई जा रही हैं और इसी के सन्दर्भ में सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता अर्थात आशा की नियुक्ति प्रति एक हजार आबादी के अनुपात में किया गया है। इस योजना के अन्तर्गत 2013-14 के बजट में 21,239 करोड़ रू0 खर्च किये गये।

प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना :- यह योजना 15 अगस्त 2003 को प्रारम्भ की गयी जिसका उद्देश्य देश के सभी भागों में कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता की चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना है।

 जननी सुरक्षा योजना :- यह योजना 1 अप्रैल 2005 को प्रारम्भ की गयी। इसका मुख्य उद्देश्य मातृ मृत्युदर एवं शिशु मृत्युदर पर अंकुश लगाकर गर्भवती महिलाओं के हितों का संरक्षण करना।  यह योजना छत्भ्ड का घटक और पूर्व में संचालित ’राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना’ का प्रतिस्थापन्न है। इस योजना का लाभ 19 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को पहले दो जीवित प्रसवों के समय (एक-एक हजार रु.) प्राप्त होता है।  भारत सरकार द्वारा महिला सशक्तीकरण के सम्बन्ध में कुछ विशेष प्रावधान किये गये हैं।

निर्भया फण्ड :- वर्ष 2013-14 के केन्द्र सरकार के बजट में महिलाओं के स्वाभिमान की रक्षा के लिए निर्भया फण्ड स्थापित किया गया जिसके लिए सौ करोड़ रूपये का आवंटन केन्द्र सरकार द्वारा किया गया।

 महिला स्वयं सिद्ध योजना :- महिला सशक्तीकरण वर्ष 2001 में इस योजना की घोषणा की गयी। इस योजना को पूर्व में संचालित इन्दिरा महिला योजना एवं महिला संवृद्धि योजना के स्थान पर चलाया गया। इस नयी योजना में महिलाओं के विकास एवं सशक्तीकरण को ध्यान में रखते हुए उन्हें माइक्रो क्रेडिट के माध्यम से सूक्ष्म उद्योग स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना था।

 स्वावलम्बन योजना :- यह योजना महिलाओं को प्रशिक्षित एवं कुशलता प्रदान के लिए चलाई गयी। जिससे वे पोषक्ता के साथ-साथ रोजगार परक बन सकें। स्वाधार योजना:- वर्ष 2001 में प्रारम्भ की गयी यह योजना उन महिलाओं को सहायता पहुँचाने के लिए चलायी गयी जो अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों में अथवा कठोर परिस्थितियों में फंसी थी।

 बालिका संवृद्धि योजना :- यह योजना सन् 1997 में प्रारम्भ की गयी और 19़99 ई0 में इसे पुनर्गठित किया गया। इस योजना के अन्तर्गत आंगनबाड़ी केन्दीय किशोरी शक्ति योजना और किशोरी पोषाहार कार्यक्रम को सम्मिलित किया गया है।

 धन लक्ष्मी योजना :- यह योजना मार्च 2008 में प्रारम्भ की गयी। इसके अन्तर्गत बालिकाओं के जन्म एवं पंजीकरण, टीकाकरण और कक्षा 8 तक की पढ़ाई करने पर एक निश्चित राशि उनके परिवार को दी जाती है।

 राष्ट्रीय साक्षरता मिशन :- इसकी स्थापना 5 मई 1988 ई0 को हुई, इसे सितम्बर 2009 ई0 को साक्षरता भारत योजना में शामिल किया गया।

ग्रामीण अवसंरचना और विकास (Rural Infrastructure and Development) :- भारत सरकार ने ग्रामीण शहरी एकीकरण तथा समाज के निर्धन एवं सुविधा वंचित वर्गों के विकास की समान पद्धति तैयार करने के उद्देश्य से ग्रामीण अवसंरचना के निर्माण को प्राथमिकता देती आ रही है। इस सम्बन्ध में कुछ कार्यक्रम चलाये गये-

भारत निर्माण कार्यक्रम :- ग्रामीण भारत में मूलभूत ढाँचागत सुविधाओं की समुचित व्यवस्था करने के उद्देश्य से वर्ष 2005-06 में केन्द्र सरकार द्वारा चार वर्षीय भारत निर्माण नामक योजना संचालित करने की घोषणा की गयी। इस योजना के छः घटक हैं-सिंचाई, सड़क, आवास, जलापूर्ति, विद्युतीकरण एवं दूरसंचार सम्पर्क। 

इन्दिरा आवास योजना (IAY) :- यह योजना 1985-86 में त्स्म्ळच् की एक उपयोजना के रूप में आरम्भ की गई। यह योजना केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित थी जिसमें केन्द्र का योगदान 75ः और राज्य का 25ः था परन्तु 2013 में इस अनुपात को 50-50ः कर दिया गया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जाति जनजाति तथा मुक्त बन्धुवा मजदूरों को निःशुल्क आवास उपलब्ध कराना था।

कुल निर्मित मकानों का 3ः भाग ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीबी की रेखा के नीचे के अपंग एवं मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्तियों के लिए आरक्षित किया गया है।

लाभार्थियों का चयन करने का अधिकार ग्रामसभा को प्राप्त है। स्वच्छ शौचालय और धुआं रहित चूल्हा इस योजना का मुख्य अंग है।

इस योजना के तहत दी जाने वाली सहायता राशि 1 अप्रैल 2013 से बढ़ाकर मैदानी भागों में 45 हजार से 70 हजार एवं पहाड़ी दुर्गन्ध क्षेत्रों में 48500 से 75500 रूपये प्रदान की जाती है।

इस योजना की प्रभावी मानीटरिंग के लिए MIS साफ्टवेयर स्थापित किया गया है।

 प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना :- यह योजना वर्ष 2009-10 में चलायी गयी जिन गावों में अनुसूचित जाति की जनसंख्या 50ः से ज्यादा है यह योजना उस गाँव के विकास से सम्बन्धित है।

राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (NUHM) :- मई 2013 से प्रारम्भ इस योजना में शहरी क्षेत्र के गरीबों को आवश्यक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध कराना है। इस योजना में केन्द्र सरकार का योगदान 75 एवं राज्यों का 25 जबकि पूर्वोत्तर राज्यों में यह अनुपात 90ः10 का है।

 प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) :- यह 25 दिसम्बर 2000 से 100 प्रतिशत केन्द्रीय प्रायोजित योजना थी। इसका उद्देश्य सभी पात्र सम्पर्क रहित ग्रामीण बस्तियों को हर मौसम में सम्पर्क सुविधा उपलब्ध कराना है। भारत निर्माण के अन्तर्गत मैदानी क्षेत्रों में 1000 या इससे अधिक जनसंख्या वाली और पहाड़ी रेगिस्तान यह जनजातीय इलाकों  में 500 या अधिक जनसंख्या वाली सभी बस्तियों के लिए सम्पर्क सुविधा मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्यक्रम का वित्त पोषक मुख्यतः केन्द्रीय सड़क निधि में डीजल उपकर के अर्जन से किया जाता है।

जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण योजना (JNNURN) :– यह योजना दिसम्बर 2005 में प्रारम्भ की गयी है। इसके अन्तर्गत दो मुख्य घटक हैं-शहरी निर्धनों को बुनियादी सेवायें (Basic Service for Urban Poor- BSUP) कार्यक्रम और समेकित आवास एवं गन्दी बस्ती कार्यक्रम (Intigrated Housing and Slum Development Program ISSDP) यह कार्यक्रम और संरचना विकास और आवास के विकास तथा क्षमता विकास के लिए शहरों को पर्याप्त केन्द्रीय सहायता उपलब्ध कराता है। इसका लक्ष्य शहरी गरीबों को बुनियादी सेवाएँ देना है।

 राजीव आवास योजना (RAY) :- यह योजना 2 जून 2011 को प्रारम्भ की गयी। इस योजना में राज्यों को आश्रय पुनर्विकास तथा वाहिनी आवास समूह के सृजन के लिए सहायता प्रदान करती है। इस योजना के दो चरण है-

  1.  पहला चरण योजना अनुमोदन की तारीख से 2 वर्षों का होगा।
  2. . द्वितीय चरण में 12वीं पंचवर्षीय योजना की शेष अवधि के लिए होगा।

असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम:- यह अधिनियम 16 मई 2009 को लागू हुआ। जिसका मुख्य उद्देश्य असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना था।

भारत में नियोजन (Planning in India)राष्ट्रीय विकास परिषद एवं योजना

भारत में नियोजन (Planning in India)राष्ट्रीय विकास परिषद एवं योजना

भारत में नियोजन (Planning in India)

भारत में आयोजन से अभिप्राय राज्य के अभिकरणों के द्वारा देश की आर्थिक सम्पदा और सेवाओं के एक निश्चित समय हेतु आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाना है। वर्तमान परिस्थिति में कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की अवधारणा में नियोजन के द्वारा समाज को विकसित करने का लक्ष्य रखा जाता है और यह व्यक्त किया जाता है कि आर्थिक एवं सामाजिक नियोजन साथ-साथ चलते हैं। चूँकि भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है जहाँ सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र का सह अस्तित्व पाया जाता है जिसमें आर्थिक नियोजन को विकास की प्रक्रिया में केन्द्रीय स्थान दिया गया है। आर्थिक नियोजन के उद्देश्यों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देना गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्या का निवारण करना, सामाजिक न्याय एवं आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, निवेश एवं पूंजी निर्माण में वृद्धि करना, मानव संसाधन का विकास करना एवं समावेशी विकास निहित है।

भारत में नियोजन का इतिहास (History of Planning in India) :-   भारत में नियोजित आर्थिक विकास का प्रारम्भ सन् 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रारम्भ होने के साथ हुआ परन्तु आर्थिक नियोजन का सैद्धान्तिक प्रयास स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ही प्रारम्भ हो गया था। वर्ष 1934 ई0 में एम. विश्वेश्वरैया ने ’भारत के लिए नियोजित अर्थव्यवस्था (Planed Economy in India) नामक पुस्तक की रचना की।

सन् 1938 ई0 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सर्वप्रथम राष्ट्रीय नियोजन समिति का गठन किया जिसके अध्यक्ष पं0 जवाहर लाल नेहरू थे। सन् 1944 ई0 में अर्देशिर दलाल की अध्यक्षता में मुम्बई के 8 उद्योगपतियों ने एक 15 वर्षीय योजना ’बाम्बे प्लान’ प्रस्तुत की।

महात्मा गांधी के आर्थिक विचारों से पीड़ित होकर सन् 1944 ई0 में श्री मन्नारायण ने एक योजना प्रस्तुत की जिसे गांधीवादी योजना के नाम से जाना जाता है। 1945 ई0 में मजदूर नेता एम0एन0 राय द्वारा जन योजना (People’s Plane)  प्रस्तुत की गयी।

1946 ई0 में अन्तरिम सरकार के गठन के साथ ही नियोजन एवं विकास की समस्या के अध्ययन के लिए उच्च स्तरीय सलाहकारी नियोजन बोर्ड की स्थापना की गयी। जो केन्द्र में एक स्थायी नियोजन कमीशन की स्थापना के लिए संस्तुति दी। जनवरी 1950 ई0 में जय प्रकाश नारायण ने एक योजना प्रस्तुत की जिसे सर्वोदय योजना के नाम से जाना जाता है।

योजना आयोग (Planning Commission) के0सी0 नियोगी समिति 1946 की संस्तुति के आधार पर योजना आयोग का गठन 15 मार्च 1950 को एक गैर संवैधानिक परामर्शदात्री संस्था के रूप में किया गया। भारत में योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। इसके सदस्यों एवं उपाध्यक्ष का कोई निश्चित कार्यकाल नहीं होता है और न ही कोई निश्चित योग्यता। सरकार की इच्छा से सदस्यों की नियुक्ति होती है और इनकी संख्या सरकार की इच्छा पर निर्भर होती हैं।

 योजना आयोग के कार्य : – योजना आयोग को निम्नलिखित कार्य सौंपे गए हैं-

  1.  देश के भौतिक, पूँजीगत एवं मानवीय संसाधनों का अनुमान लगाना।
  2. राष्ट्रीय संसाधनों के अधिक-से-अधिक प्रभावी एवं संतुलित उपयोग के लिए योजना तैयार करना।
  3. . योजना के विभिन्न चरणों का निर्धारण करना एवं प्राथमिकता के आधार पर संसाधनों का आवंटन करने का प्रस्ताव करना।
  4.  उन तत्वों को, जोकि आर्थिक विकास में बाधक हैं, सरकार को इंगित करना एवं उन परिस्थितियों का निर्धारण करना, जोकि वर्तमान सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों में योजना के कार्यान्वय के लिए आवश्यक हैं।
  5.  योजना के प्रत्येक चरण के क्रियान्वयन के फलस्वरूप प्राप्त सफलता की समय≤ पर समीक्षा करना तथा सुधारात्मक सुझाव देना।
  6.   समय≤ पर केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों द्वारा विशेष समस्या पर राय माँगने पर अपनी सलाह देना।

 राष्ट्रीय विकास परिषद (National Development Council) NDC :-.

राष्ट्रीय विकास परिषद एक गैर संवैधानिक संस्था है जिसका गठन आर्थिक नियोजन हेतु राज्यों एवं योजना आयोग के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए किया गया था। इसका गठन 6 अगस्त 1952 ई0 में किया गया। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष तथा योजना आयोग का सचिव इसका भी सचिव होता है। जहाँ योजना आयोग का कार्य योजना निर्माण तक ही सीमित है वहीं राष्ट्रीय विकास परिषद सहकारी संघवाद का सर्वोत्तम उदाहरण है। के. सन्थानम ने राष्ट्रीय विकास परिषद को सर्वोच्च मंत्रि परिषद (Superb Cabinet)  की संज्ञा दी है।

 राष्ट्रीय विकास परिषद के कार्य:- निम्न कार्य हैं-

  1. . राष्ट्रीय योजना के संचालन का समय≤ पर मूल्यांकन करना।
  2. . राष्ट्रीय विकास को प्रभावित करने वाली सामाजिक व आर्थिक नीतियों की समीक्षा करना।
  3.  राष्ट्रीय योजना में निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सुझाव देना तथा राष्ट्रीय नियोजन में अधिक-से-अधिक जन सहयोग प्राप्त करना, प्रशासनिक दक्षता को सुधारना, अल्पविकसित व पिछड़े वर्गों एवं क्षेत्रों के विकास के लिए आवश्यक परियोजना निर्माण का सुझाव देना एवं राष्ट्रीय विकास के लिए संसाधनों का निर्माण करना।
  4. योजना आयोग द्वारा तैयार की गई योजना का अध्ययन करना तथा विचार-विमर्श के पश्चात् उसे अन्तिम रूप प्रदान करना। इसकी स्वीकृति के बाद ही योजना का प्रारूप प्रकाशित होता है।

अन्तर्राज्यीय परिषद (Interstate Council) :-  अन्तर्राज्यीय परिषद एक संवैधानिक संस्था है केन्द्र तथा राज्यों के मध्य समन्वय स्थापित करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा इसका गठन किया जाता है। अनुच्छेद 263 के अनुसार राष्ट्रपति को इसकी स्थापना करने तथा उसके संगठन, प्रक्रिया तथा दायित्वों के बारे में व्यवस्था करने का अधिकार है। यह संस्था परामर्शदात्री के रूप में कार्य करती है। इसके निम्नलिखित कार्य हैं-

  1. राज्य तथा केन्द्र के बीच जो विवाद हों उनकी जाँच कर उचित सलाह देना।
  2.  राज्यों तथा केन्द्र के पारस्परिक हित से सम्बन्धित विषयों पर अनुसंधान करना।
  3.  उपर्युक्त विषयों के बारे में बेहतर समन्वय हेतु कार्यवाही की सिफारिश करना।

भारत में प्रथम पंचवर्षीय योजना (1 अप्रैल 1951 से 31 मार्च 1956 :-

यह योजना हैरेड डोमर माडल पर आधारित थी इस योजना की मुख्य प्राथमिकता कृषि क्षेत्र में विकास करना था तथा देश को युद्ध एवं विभाजन के असंतुलन से सुरक्षित करना था। वर्ष 1952 ई0 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम एवं 1953 ई0 में राष्ट्रीय प्रसार सेवा का प्रारम्भ किया गया। इस योजना के लक्ष्य निम्न थे-

  1.  विभाजन के फलस्वरूप क्षतिग्रस्त अर्थव्यवस्था का पुनरूत्थान करना था।
  2.  स्फीतिकारी प्रवृत्तियों को रोकना।
  3.  उत्पादन क्षमता में वृद्धि तथा आर्थिक विषमता घटाना।
  4.  खाद्यान्न संकट का समाधान करना तथा कच्चे माल की स्थिति में सुधार लाना।
  5.  ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना जो देश के विकास कार्यों को लागू करने के लिए आवश्यक हों।

 द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1 अप्रैल 1956 से 31 मार्च 1961) :-

यह योजना भारतीय सांख्यिकीय संगठन के निर्देशक प्रो0 पी.सी. महालनोविस के माॅडल पर आधारित थी। इस योजना का मूलभूत उद्देश्य देश में औद्योगीकरण की प्रक्रिया को प्रारम्भ करना जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ आधार पर विकास किया जा सके। 1956 ई0 में घोषित की गयी औद्योगिक नीति में समाजवादी तरीके से समाज की स्थापना को स्वीकार किया गया। इस योजना के निम्न लक्ष्य निर्धारित किये गये थे-

  1.  जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए 5 वर्षों में राष्ट्रीय आय में 25 प्रतिशत की वृद्धि करना।
  2.  द्रुतगामी औद्योगीकरण प्रक्रिया द्वारा आधारभूत तथा भारी उद्योगों के विकास पर बल दिया गया है।
  3.  पूंजी निवेश की दर को 7 प्रतिशत से बढ़ाकर योजना के अन्त तक 11 प्रतिशत करना।
  4.  रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना तथा आय व सम्पत्ति की असमानता को कम करना तथा आर्थिक शक्ति का विस्तार करना।

तृतीय पंचवर्षीय योजना (31 अप्रैल 1961 से 31 मार्च 1966) :-

इस योजना में भारतीय अर्थव्यवस्था को आर्थिक गतिशीलता की अवस्था (Take -off-Stage)  पहुँचाने का लक्ष्य था। इस योजना में पहली बार आगत-निर्गत माॅडल का प्रयोग किया गया आधारभूत उद्योगों के साथ-साथ कृषि को महत्व दिया गया। इस योजना के निम्नलिखित उद्देश्य थे-

  1. . राष्ट्रीय आय में 5 प्रतिशत से अधिक वार्षिक वृद्धि प्राप्त करना तथा 5 वर्षों में 30 प्रतिशत वृद्धि करना अर्थात प्रति व्यक्ति आय में इस अवधि में 17 प्रतिशत तक वृद्धि करना था।
  2.  आत्मनिर्भरता प्राप्त करना एवं उद्योग के आयात एवं निर्यात की आवश्यकताओं को पूरा करना तथा कृषि उत्पादन को बढ़ाना।
  3.  देश की श्रमशक्ति का अधिकतम प्रयोग करना तथा रोजगार उपलब्ध कराना।
  4.  अवसर की समानता को अधिकतम करना तथा आय वितरण की असामनता को कम करना एवं आर्थिक शक्ति का समान वितरण करना।

इस योजना में रूपये का अवमूल्यन किया गया था तथा 1964 ई0 में यूनिट ट्रस्ट आॅफ इण्डिया (UTI) और इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक आॅफ इण्डिया (IDBI) की स्थापना की गयी। इसी योजना के अन्तर्गत 1965 ई0 में भारतीय खाद्य निगम (FCI) और कृषि कीमत आयोग (APC) की स्थापना की गयी।

 नोटः- प्रथम तीनों पंचवर्षीय योजना में सरकार द्वारा ट्रिकल डाउन थियरी का अनुसरण किया गया।

 तीन वार्षिक योजनाएं (1966-67 से 1968-69 तक) :- भारतीय योजनाकाल के दौरान 1 अप्रैल 1966 से 31 मार्च 1969 को योजना अवकाश (Plan Holiday) नाम दिया गया।

तीनों वार्षिक योजनाओं के दौरान नई कृषि नीति अपनाई गयी और कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीज के वितरण उर्वरक का व्यापक पैमाने पर प्रयोग, सिचाई क्षमता का विस्तार व भू-संरक्षण पर जोर दिया गया।

1966 ई0 में हरित क्रान्ति की शुरूआत की गयी एवं 1969 ई0 में नारीमन समिति की सिफारिश पर लीड बैंक योजना शुरू की गयी।

 चौथी पंचवर्षीय योजना (1 अप्रैल 1969 से 31 मार्च 1974 तक) :-

इस योजना का प्रारूप डी0आर0 गाडगिल द्वारा तैयार किया गया था। यह योजना आगत-निर्गत माॅडल पर आधारित थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य स्थिरता के साथ आर्थिक विकास (Growth With  Stability तथा आत्मनिर्भरता की अधिकाधिक प्राप्ति (Progress Towards Self Reliance) था। इस योजना के निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित किये गये थे-

  1. कृषि उत्पादन के साथ-साथ देश में बफर स्टाॅफ का निर्माण करना।
  2.  .जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण लगाने तथा जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए परिवार नियोजन कार्यक्रमों को लागू करना।
  3.  पिछड़े क्षेत्रों का अधिकाधिक विकास करना। क्षेत्रीय विषमता को दूर करना था।
  4.   सार्वजनिक क्षेत्र का विकास करना तथा समाज में आर्थिक समानता तथा न्याय की स्थापना करना।

इसी योजना अवधि के दौरान जुलाई 1969 ई0 में 14 वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP)  की शुरूआत।

 पांचवीं पंचवर्षीय योजना (1 अप्रैल 1974 से 31 मार्च 1979) :-

यह योजना भी आगत निर्गत माॅडल पर आधारित थी इस योजना का मुख्य उद्देश्य गरीबी का उन्मूलन और आत्मनिर्भरता प्राप्त करना था।

इस योजना में 66 विषय क्षेत्र लिए गये थे योजना का विकास लक्ष्य 4.4 प्रतिशत निर्धारित था लेकिन वार्षिक वृद्धि दर 4.8 प्रतिशत की दर से हुई। यह योजना समय से पूर्व ही बन्द कर दी गयी थी।

इस योजना के दौरान 1974 ई0 में न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम की शुरूआत की गई तथा 2 अक्टूबर 1975 को क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना की गयी साथ ही 1977-78 ई0 में खाद्य के बदले अनाज कार्यक्रम की शुरूआत की गयी।

अनवरत योजना (Rowling Plan (1878-1980) :- पांचवी पंचवर्षीय योजना को एक वर्ष पहले समाप्त करके एक नई योजना 1 अप्रैल 1978 को प्रारम्भ की गयी। जिसे अनवरत योजना के नाम से जाना जाता है। इसका प्रतिपादन गुन्नार मिर्डाल ने किया।

अनवरत योजना के समय ही 1979 ई0 में ग्रामीण युवा स्वरोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरूआत की गयी जिसे 1999 ई0 में स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना में मिला दिया गया।

छठीं पंचवर्षीय योजना (1 अप्रैल 1980 से 31 मार्च 1985) :-

यह योजना विकेन्द्रीकरण पर आधारित थी जिसमें गरीबी निवारण एवं रोजगार सृजन को सबसे अधिक महत्व दिया गया। IRDP, NERP, TRYSEM, DWACRA, RLEGP  जैसी ग्रामीण बेरोजगारी उम्मूलन कार्यक्रम सम्पूर्ण देश में छठीं योजना में ही लागू किये गये। योजना आयोग के कार्यदल द्वारा ’गरीबी निर्देशांक’ अर्थात ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रतिदिन उपभोग गरीबी रेखा के रूप में परिभाषित किया गया।

इस योजना के उद्देश्यों में राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना, प्रौद्योगिकी का आधुनिकीरण करना, गरीबी एवं बेरोजगारी में कमी लाना एवं परिवार नियोजन के द्वारा जनसंख्या नियंत्रण करना, निहित था।

इसी योजना के दौरान 1980 में 6 बैंको का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा 12 जुलाई 1982 को नाबार्ड की स्थापना एवं 1982 में ही एक्जिम बैंक की स्थापना की गयी।

 सातवीं पंचवर्षीय योजना (1 अप्रैल 1985 से 31 मार्च 1990) :-

इस योजना का मुख्य उद्देश्य आर्थिक समृद्धि आधुनिकीरण आत्मनिर्भरता एवं खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि, रोजगार अवसरों में वृद्धि था। योजना अवधि के दौरान अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धिदर रिकार्ड 5.6ः तक पहुँच गयी थी। इस योजना के निम्नलिखित लक्ष्य थे-

  1. देशी तकनीकी विकास के लिए सुदृढ़ आधार तैयार करना।
  2.   निर्यात समृद्धि तथा आयात प्रतिस्थापन द्वारा आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन देना।
  3.   ऊर्जा संरक्षण और गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोतों का विकास। इस योजनाकाल के दौरान सन् 1986 ई0 में डाक विभाग में स्पीड पोस्ट की शुरूआत की गयी, 1986ई0 में कपार्ट (नई दिल्ली) की स्थापना की गयी, 1988 ई0 में सेबी की स्थापना की गयी।

नोट :-  प्रो0 राज कृष्णा ने 7वीं योजना को हिन्दू वृद्धिदर के रूप में वर्णित किया है।

 आठवीं पंचवर्षीय योजना (1 अप्रैल 1992 से 31 मार्च 1997) :-

केन्द्र में दो वर्षों में राजनीतिक परिवर्तन के कारण आठवीं पंचवर्षीय योजना समय पर प्रारम्भ नहीं की जा सकी थी। राष्ट्रीय विकास परिषद ने योजना के प्रारूप को 23 मई 1952 को मंजूरी दी।

यह योजना यूलर माॅडल पर आधारित थी जिसमें मानवीय संसाधन का विकास को सर्वाधिक महत्व दिया गया था। आठवीं पंचवर्षीय योजना में वार्षिक विकास दर का लक्ष्य 5.6ः निर्धारित किया गया था। इस योजना के मूलभूत उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1.  प्रोत्साहन एवं हतोसाहन की प्रभावी योजना द्वारा जन सहयोग के माध्यम से जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाना।
  2.  प्रारम्भिक शिक्षा को सर्व व्यपाक बनाना तथा 15 से 35 वर्ष की आयु वर्ग के मध्य लोगों में निरक्षरता को पूर्णतः समाप्त करना।
  3.  सभी ग्रामीण जनसंख्या के लिए पेयजल एवं टीकाकरण सहित प्राथमिक शिक्षा सुविधाओं का प्रावधान करना तथा मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करना।
  4.  खाद्यानों में आत्मनिर्भरता एवं निर्यात योग्य बचत प्राप्त करने हेतु कृषि का विकास एवं विस्तार करना।
  5. . पूर्ण रोजगार के स्तर को प्राप्त करने की दृष्टि से पर्याप्त रोजगार का सृजन करना।

इस योजना के दौरान 1 जनवरी 1995 को भारत W.T.O का सदस्य बना। शिक्षित बेरोजगारों के लिए 1993 में प्रधानमंत्री रोजगार योजना शुरू की गयी।

वार्षिक योजनाएं :- राजनीति अस्थायित्व एवं भुगतान असंतुलन के कारण 1990-92 के दौरान पंचवर्षीय योजना चालू नहीं की जा चुकी। इस योजनाकाल में 1991 ई0 में भारत में आर्थिक सुधार जिसमें उदारीकरण, निजीकरण व वैश्विकरण की घोषणा की गयी। सरकार ने 1990 में लघु उद्योगों के विकास के लिए सिडवी (Small Industrial Development Bank of India-SIDVI) की शुरूआत की।

 नवीं पंचवर्षीय योजना  (1 अप्रैल 1997 से 31 मार्च 2002) :-

नवीं पंचवर्षीय योजना में सकल घरेलू उत्पाद में 7ः वार्षिक वृद्धि दर का लक्ष्य था। किन्तु बाद में इसे घटाकर 6.5% कर दिया गया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य सामाजिक न्याय एवं समानता के साथ आर्थिक समृद्धि था। इस बात के लिए योजना अवधि के दौरान जीवन स्तर रोजगार सृजन आत्मनिर्भरता एवं क्षेत्रीय सन्तुलन पर विशेष जोर दिया गया।

 दसवीं पंचवर्षीय योजना  (1 अप्रैल 2002 से 31 मार्च 2007) :-

इस योजना में 7.7% की औसत सालाना वृद्धि दर प्राप्त होने का अनुमान लगाया गया था जो कि अब तक किसी भी योजना में प्राप्त की सर्वोच्च वृद्धि दर है। अर्थव्यवस्था के तीनों प्रमुख क्षेत्रों कृषि, उद्योग व सेवा में दसवीं योजना के दौरान प्राप्त की गयी वृद्धि दरें इनके लिए निर्धारित किये गये लक्ष्यों से काफी निकट रही हैं। कृषि में 4 प्रतिशत सालान वृद्धि का योजना का लक्ष्य था। इस क्षेत्र में 2.30 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि अनंतिम आँकड़ों के अनुसार प्राप्त की गई है। उद्योगों व सेवाओं के क्षेत्रों में क्रमशः 8.90 प्रतिशत व 9.40 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य था। इन क्षेत्रों में क्रमशः 9.17 प्रतिशत व 9.30 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दसवीं पंचवर्षीय योजना में प्राप्त की गई हैं। अनंतिम आँकड़ों के अनुसार इस योजना में निवेश की दर (Rate of Investment) सकल घरेलू उत्पाद का 32.1 प्रतिशत रही है, जबकि लक्ष्य 28.41 प्रतिशत का था। सकल घरेलू बचते जीडीपी के 23.31 प्रतिशत रखने का लक्ष्य था, जबकि वास्तविक उपलब्धि लक्ष्य से कहीं अधिक जीडीपी का 31.9 प्रतिशत रही है। योजनाकाल में मुद्रास्फीति की दर औसतन 5.0 प्रतिशत रखने का लक्ष्य था, जबकि वास्तव में यह 5.02 प्रतिशत रही थी।

 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007 से 2012) :-

इस योजना को राष्ट्रीय विकास परिषद में 19 दिसम्बर 2007 को अनुमोदित किया। योजना में 9ः की औसत वृद्धि दर के साथ अन्तिम वर्ष 2011-12 में 10 प्रतिशत वृद्धि दर का लक्ष्य रखा गया था। 11वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टि पत्र में प्रमुख बिन्दु इस प्रकार हैं-

  1.  तीव्रतम विकास के साथ अधिक संहित (Inclusive) संवृद्धि की दुतरफा रणनीति।
  2. . निर्धनता अनुपात में सन् 2007 तक 5 प्रतिशतांक की तथा सन् 2012 तक 15 प्रतिशतांक की कमी लाना।
  3.  कम-से-कम ग्यारहवीं योजना में होने वाली श्रम बल वृद्धि को उच्च गुणवत्ता युक्त रोजगार मुहैया कराना।
  4.  2001 से 2011 तक के दशक में जनसंख्या संवृद्धि की दशकीय वृद्धि दर को घटाकर 16.2 प्रतिशत के स्तर पर लाना।
  5.  ग्यारहवीं योजना अवधि में साक्षरता दर को बढ़ाकर 75 प्रतिशत करना।
  6.  सन् 2012 तक देश के सभी गाँवों में स्वच्छ पेयजल की  पहुँच सुनिश्चित करना।
  7.  योजनावधि में रोजगार के 7 करोड़ नए अवसर सृजित करना।

   12वीं पंचवर्षीय योजना (2012 से 2017) :-

राष्ट्रीय विकास परिषद की 27 दिसम्बर 2012 को सम्पन्न बैठक में 12वीं पंचवर्षीय योजना को स्वीकृत प्रदान की गयी। बारहवीं पंचवर्षीय योजना का केन्द्र बिन्दु निम्न हैं-तीव्र सम्पोषणीय और अधिक समावेशी विकास (Faster Sustainable and More Inclusive Growth)

12वीं पंचवर्षीय योजना के मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित हैं-

  • वार्षिक विकास दर का लक्ष्य 8.0 प्रतिशत।
  •  कृषि क्षेत्र में 4.0 प्रतिशत व विनिर्माणी क्षेत्र में 10.0 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि के लक्ष्य।
  •   योजनावधि में गैर कृषि क्षेत्र में रोजगार के 5 करोड़ नए अवसरों के सृजन का लक्ष्य।
  •  योजना के अन्त तक निर्धनता अनुपात से नीचे की जनसंख्या के प्रतिशत में पूर्व आकलन की तुलना में 10 प्रतिशत बिन्दु की कमी लाने का लक्ष्य।
  •   योजना के अन्त तक देश में शिशु मृत्यु-दर को 25 तथा मातृत्व मृत्यु-दर को 1 प्रति हजार जीवित जन्म तक लाने तथा 0-6 वर्ष के आयु वर्ग में बाल लिंगानुपात को 950 करने का लक्ष्य।
  • योजना के अन्त तक कुल प्रजनन दर को घटाकर 2.1 तक लाने का लक्ष्य।
  •   योजना के अन्त तक आधारिक संरचना क्षेत्र में निवेश को बढ़ाकर जीडीपी के 9 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य।
  •   योजना के अन्त तक सभी गाँवों में विघुतीकरण।
  •  योजना के अन्त तक सभी गाँों को बारहमासी सड़कों से जोड़ना।
  •  ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीडेंसिटी को बढ़ाकर 70 प्रतिशत करने का लक्ष्य।

 नोट :- वर्तमान एनडीए सरकार द्वारा योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन 1 जनवरी 2015 को किया गया।

भारतीय कृषि (Indian Agriculture)

भारतीय कृषि (Indian Agriculture)

भारतीय कृषि

भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था के आधार के रूप में जानी जाती है। पिछले कुछ दशकों से कृषि नीति खाद्यान्न उत्पादन में स्व- पर्याप्तता तथा निर्भरता की रही है खाद्यान्न उत्पादन जो सन् 1951-52 में मात्र 52 मिलियन टन था वह 2013-14 में बढ़कर 254.8 मिलियन टन हो गया। 12वीं पंचवर्षीय योजना के प्रथम तीन वर्षों में कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र के ळक्च् में क्रमशः 1.2 प्रतिशत 3.7 प्रतिशत और 1.1 प्रतिशत की वृद्धि दर रही है।भारतीय कृषि का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है।

1. समय के आधार पर भारतीय कृषि :-

(1) खरीफ की फसलें (Kharif Crops) :-  यह फसल जुलाई में बोई जाती है तथा अक्टूबर में काटी जाती है, खरीफ के मौसम में मुख्य रूप से धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास, गन्ना, अरहर, मूँग, उर्द, लोबिया, तिल, सोयाबीन और मूँगफली की खेती की जाती है।

(2) रबी की फसलें (Ravi Crops) :- ये फसलें अक्टूबर में बोई जाती है और अप्रैल के प्रारम्भ में ही काटी जाती है रबी के मौसम में मुख्य रूप से गेहूँ, जौ, चना, तोरिया, मटर और सरसों की खेती की जाती है।

(3) जायद की फसलें (Zaid Crops) :- रबी और खरीफ की फसलों के अतिरिक्त कुछ स्थानों पर मार्च से जून के मध्य जायद की फसल की खेती भी होती है, जिसमें मूँग, उर्द, तरबूज, खरबूज, ककड़ी, तरकारियाँ व सूरजमुखी आदि पैदा की जाती है।

2.उपयोग के आधार पर भारतीय कृषि

(1) खाद्यान्न फसलें  :-  भारतीय कृषि की एक प्रमुख विशेषता खाद्यान्न फसलों की प्रधानता है इसके अन्तर्गत गेहूँ, चावल मोटे अनाज तथा दलों को शामिल किया जाता है।

(2) गैर खाद्यान्न या नगदी फसलें  :-  गैर खाद्यान्न फसलों के अन्तर्गत तिलहन, कपास, जूट रबड़, चाय, काफी, गन्ना, तम्बाकू, आलू, मूँगफली इत्यादि को शामिल किया जाता है।

भारतीय कृषि में खेती की प्रकार (Types of Farminc) :-

खेती के प्रकार से अभिप्राय भूमि के उपयोग फसलों के उत्पादन, पशुधन तथा कृषि के क्रियाकलाप एवं रीतियों से लगाया जाता है। खेती के निम्नलिखित प्रकार हैं-

विशिष्ट खेती (Speicalised Farmins) :- इस प्रकार की खेती के अन्तर्गत एक ही फसल या उद्यम का उत्पादन बाजार के लिए किया जाता है तथा किसान अपने आय के लिए केवल उसी एक उद्यम पर निर्भर रहता है। जैसे-चाय, कहवा, गन्ना रबड़ आदि।

रैचिंग खेती (Ramching Farming) :-  इस प्रकार की खेती में भूमि की जुताई, बुआई, गुड़ाई आदि नहीं की जाती है और न ही फसलों का उत्पादन किया जाता है परन्तु प्राकृति वनस्पति पर तमाम प्रकार के पशुओं जैसे भेड़, बकरी, इत्यादि को चराया जाता है इस प्रकार की खेती तिब्बत, आस्ट्रेलिया, अमेरिका तथा भारत पर्वतीय तथा पठारीय क्षेत्रों में भेड़, बकरी चराने के लिए की जाती है। आस्ट्रेलिया में भेड़, बकरी रखने वालों को रैंचर की संज्ञा दी जाती है।

शुष्क खेती  :-  शुष्क खेती उत्पादन की वह प्रणाली है जिसके अन्तर्गत किसी निश्चित क्षेत्र पर पानी की अधिक मात्रा को सुरक्षित रखकर भरपूर उत्पादन किया जाता है। शुष्क खेती के क्षेत्रों में फसलों के उत्पादन के लिए भूमि में वर्षा के पानी की अधिक से अधिक मात्रा को सुरक्षित रखा जाता है।

मिश्रित खेती (Mixed Farming) :- मिश्रित खेती में फसलों उत्पादन के साथ-साथ पशु पालन तथा डेरी उद्योग भी किया जाता है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां खेती में मशीनों का प्रयोग कम किया जाता है, मिश्रित खेती एक महत्व पूर्ण स्थान रखती है इसमें पशु पालन व फसल उत्पादन एक दूसरे पर पूर्णतया निर्भर रहते है।

बहु प्रकारीय खेती (Didersified Farming)  :- इस प्रकार की खेती से तात्पर्य उन जोतो या फार्मों से है जिन पर आमदनी के श्रोत कई उद्यमों या फसलों पर निर्भर करते है और प्रत्येक उद्दम अथवा फसल से जोतो की कुल आमदनी का 50 प्रतिशत के कम ही भाग प्राप्त होता है ऐसी खेती को बहु प्रकारीय खेती कहते है।

यदि भारतीय कृषि में सबसे प्रमुख समस्या का विशलेषण करें तो वह अल्प उत्पादकता की समस्या अर्थात् विभिन्न फसलों के प्रति हेक्टेयर उत्पादकता की मात्रा अन्य देशों से बहुत कम है। कृषि में प्रयुक्त होने वाली भूमि की तुलना में उनसे प्राप्त होने वाला उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है।

भारत में कृषि के विकास को प्रभावित करने वाले तीन मुख्य कारक- बीज, उर्वरक और कृषि निवेश हैं।

बीज (Seeds) :- फसलों को उगाने के लिए किसी भी स्पेसीज का जो भाग प्रवर्ध्य (Propagule) के रूप इस्तेमाल किया जाता है, उसे बीज (Seeds) कहते हैं। उत्तम बीज कृषि उत्पादन के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते है इनका कृषि उत्पादन वृद्धि में योगदान 20 से 25 प्रतिशत तक होता है।

बीजों का वर्गीकरण फसलचक्र (Classification of Seeds Crop Cycle)

बीजों का वर्गीकरण फसलचक्र (Classification of Seeds Crop Cycle)

1. प्रजनक बीज (Breeders Seeds) :- प्रजनक बीज, पादप या जिस संस्था द्वारा पैदा किया जाता है उससे सीधा सम्बन्धित होता है इसमें सबसे अधिक शुद्धता पायी जाती है।

आधार बीज (Foundation Seeds) :- ये बीज प्रजनक बीजों से तैयार किये जाते है इनमें विशेष मानकों के आधार पर आंनुवशिक गुण और शुद्धता पायी जाती है। राष्ट्रीय बीज निगम, भारतीय राज्य फार्म निगम और राज्य बीज निगमों को आधार बीज के उत्पादन का दायित्व सौंपा गया है।

प्रमाणित बीज (Certified Seed) :- ये बीज व्यवसायिक रूप से खेती के लिए काम आने वाले बीजों की अन्तिम आवस्था है ये बीज उच्चतर गुणवत्ता युक्त होते है।

कृत्रिम बीज (Artificial Seeds) :- कृत्रिम बीज जेल (Gel) के मनके हैं जिनमें कायिक भ्रूण आवश्यक पोषक, वृद्धि नियामक, पीड़कनाशी, एंटीबायोटिक आदि होते है जिसमें भू्रण स्वस्थ्य पौधों में विकसित हो सके।

जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज (Genetically Modified Seed ) :- जब किसी पौधे के प्राकृतिक जीन में कृत्रिम उपायों द्वारा उसकी मूल संरचना को परिवर्तित कर दिया जाता है, तो ऐसे पौधे से प्राप्त बीज को जी.एम. बीज कहते हैं। इसका उद्देश्य जल की आवश्यकता को कम करना, रोग तथा कीट के प्रति संवेदनशीलता को समाप्त करना, गुणवत्ता में वृद्धि करना आदि हो सकता है।

पराजीनी बीज (Transgenic Seed) :- वह बीज जिसके प्राकृतिक जीन में कृत्रिम उपायों द्वारा किसी दूसरे पौधे या जन्तु के जीन का भाग जोड़ दिया जाता है, पराजीनी बीज कहलाता है। इसका भी उद्देश्य पौधे में किसी विशिष्ट गुण या क्षमता का विकास करना होता है।

नोट :- भारत सरकार बीज उत्पादन की तीन किस्मों को मान्यता प्रदान करता है-प्रजनन बीज, आधारी बीज और प्रमाणिक बीज।

राष्ट्रीय बीज निगम(National Seeds Corporation). इसकी स्थापना-1963 ई0 की गयी जबकि 1966 ई0 में भारतीय बीज निगम अधिनियम पारित किया गया। बीज विकास, उत्पादन एवं वितरण सम्बन्धित कार्य करना इनका मुख्य उद्देश्य है।

खेती की प्रणालियाँ(System of Farming) :- इससे अभिप्राय कृषि के आर्थिक व सामाजिक क्रियाकलापों से है। कृषि की मुख्य प्रणाली निम्नलिखित हैं-

1. सहकारी खेती( Co-operative Farming) :- सहकारी खेती के अन्तर्गत परस्पर लाभ के उद्देश्य स्वेच्छापूर्वक अपनी भूमि श्रम और पूंजी को एकत्र करके सामूहिक रूप से खेती करते हैं।

2. राजकीय खेती (State Farming) :- राजकीय खेती में भूमि का प्रबन्ध सरकारी कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। फार्म उत्पादन योजना सरकार द्वारा बनाई जाती है प्रतिदिन का कार्य दैनिक मजदूरों द्वारा किया जाता है। ऐसी फर्मों को चलाने के लिए सभी प्रकार की सुविधायें व आवश्यकतानुसार पूंजी राज्य द्वारा दी जाती है।

3. निगमित खेती (Corporate Farming) :- इसके अन्तर्गत खेती का प्रबन्ध एक निगम द्वारा किया जाता है। चूँकि निगम के सदस्यों का दायित्व सीमित होता है तथापि सम्पूर्ण व्यवस्था संचालन का कार्य मंडल द्वारा किया जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत बड़ी मात्रा में पूंजी एवं भूमि की आवश्यकता होती है। भारतवर्ष में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और चेन्नई के कुछ भागों में यह खेती प्रचलित है।

4. काश्तकारी खेती (Peasant Farming) :- इस प्रणाली में स्वयं किसान भूमि का मालिक होता है तथा राज्य से उसका सीधा सम्बन्ध होता है। वह निर्धारित लगान राज्य को देता है। कृषि का सभी कार्य किसान अपनी मर्जी से करता है। खेती की प्रणालियों में यह प्रणाली भारत में प्रसिद्ध है।

5. पूंजीवादी खेती (Capitalistic Farming) :- इस प्रकार की खेती में पूंजीपतियों के पास बड़े-बड़े भूखण्ड होते हैं जो या तो स्वयं क्रय करते हैं या सरकार द्वारा अधिगृहीत कर दिये जाते हैं। इन भू-खण्डों पर पूंजीपति आधुनिक तकनीकी एवं साधनों को काम में लाकर भूमि का अधिकतम प्रयोग करते हैं। भारत में यह प्रणाली चाय, कॉफी व रबड़ के बागान में पायी जाती है।

6. संयुक्त खेती(Joint Farming) :- इस प्रकार की खेती में दो या दो से अधिक किसान सहकारी नही बल्कि आपसी साझेदारी के आधार पर कृषि संसाधनों को प्रयुक्त करके कृषि कार्य करते हैं।

7. सामूहिक खेती(Collective Farming) :- इस प्रणाली के अन्तर्गत भूमि का स्वामित्व सम्पूर्ण समाज में निहित होता है। प्रबन्ध समिति द्वारा निर्वाचित सदस्यों को सीमित वर्ग में बांट दिया जाता है। जिन्हें कार्यानुसार वेतन मिलता है।

फसलचक्र(Crop Rotation)

एक निश्चित क्षेत्र में एक निश्चित समयावधि के दौरान फसलों को इस क्रम में उगाना जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति का कम से कम क्षति हो फसल चक्र कहलाता है। जैसे गहरी जड़ वाली फसल के बाद कम गहरी जड़ वाली फसलों को उगाना, जैसे अरहर के बाद गेहूँ। दलहनी फसलों के बाद गैर दलहनी फसलों का उगाना आदि।

फसल चक्र अपनाने से बहुत से लाभ प्राप्त होते हैं। एक ओर जहाँ मृदा की उर्वरा शक्ति बनी वहीं दूसरी ओर रोग खरपतवार व कीट की रोगथाम में सहायता मिलती है। मृदा क्षरण में सहायता तथा घरेलू व बाजार मांग की पूर्ति में सहायता मिलती है।

फसल चक्र सघनता(Crop Rotation Intensity) :- देश के विभिन्न भागों में परिस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के फसल चक्र अपनाए जाते हैं। कृषि क्षेत्र में लगातार उर्वरकों में प्रयोग से भूमि की उर्वरता एवं उत्पादकता (Fortilyty And Producitvity ) लगातार घटती जाती है फलस्वरूप एकीकृत पादप पोषक तत्व प्रबन्धनIntegrated Plant Nutrient Management को अपनाना जरूरी है। जिसके तहत खरीफ फसल के दौरान 50%NPK तत्व जीवांश खाद से तथा 50ः छच्ज्ञ उर्वरकों से देना चाहिए।

फसल सघनता (Cropping Intensity) :- एक वर्ष में कुल कृषित क्षेत्र व शुद्ध (निवल) कृषित क्षेत्र का अनुपात फसल सघनता कहलाता है इसे प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है।

एक वर्ष में बोया गया कुल क्षेत्र
फसल सघनता = × 100
शुद्ध कृषि क्षेत्र

विभिन्न प्रकार की खेतियों के नाम-

  • एरोपोनिक (Aeroponic) — पौधों को हवा में उगाना।
  • एपीकल्चर (Apiculture) — मधुमक्खी पालन
  • हॉर्टीकल्चर (Horticulture)—बागवानी
  • फ्लोरीकल्चर (Floriculture)—फूल विज्ञान
  • ओलेरीकल्चर (Olericulture)—सब्जी विज्ञान
  • पोमोलॉजी (Pomoculture)—फल विज्ञान
  • विटीकल्चर (Viticulture)—अंगूर की खेती
  • वर्मीकल्चर(Vermiculture) —केचुआ पालन
  • पिसीकल्चर (Pisiciculture) —मत्स्यपालन
  • सेरीकल्चर (Sericulture)—रेशम उद्योग
  • मोरीकल्चर (Moriculture)—रेशम कीट हेतु शहतूत (Mulberry) उगाना

उवर्रक :- उर्वरक दो प्रकार के होते हैं-

(1) कार्बनिक उर्वरकः- कार्बनिक उर्वरक प्राकृतिक उर्वरक होता है जैसे गोबर की खाद आदि।

(2) अकार्बनिक उर्वरक :- अकार्बनिक उर्वरक का तात्पर्य रासायनिक उर्वरकों से होता है जो मनुष्यों द्वारा उत्पादित किया जाता है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार कृषि के विभिन्न किस्मों के उर्वरकों (नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटास) का उपयोग एक संतुलित अनुपात में किया जाना चाहिए। भारत की अन्न फसलों हेतु आदर्श अनुपात 4ः2ः1 का है। जबकि दलहन फसलों के लिए यह अनुपात 1ः2ः1 है।

उर्वरक उत्पादन एवं उपयोग में भारत का विश्व में चीन व अमेरिका के बाद तीसरा स्थान है। भारत अभी भी नाइट्रोजनी उर्वरकों की अपनी खपत का 94: व फास्फेटी उर्वरकों की खपत का 82: की उत्पादन कर पाता है। पोटाशी उर्वरकों के लिए तो भारत पूरी तरह आपात पर ही निर्भर है।

यूरिया उर्वरक के मूल्य सरकार द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। किसानों को उचित मूल्य पर इसकी आपूर्ति जारी रखने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से सब्सिडी दी जाती है। यूरिया ही एक मात्र ऐसा उर्वरक है जो मूल्य नियंत्रण के अन्तर्गत आता है। भारत में कृषि क्षेत्र की एक तीसरी समस्या पूंजी निर्माण की है। इसके अन्तर्गत अधो संरचना, कोल्ड स्टोरेज, ऊर्जा, सड़क, सिंचाई इत्यादि में भारी मात्रा में निवेश की आवश्यकता है या उस अनुपात में निवेश नही हो पा रहा है।

भारत में कृषि जोत :-

कृषि जोत से तात्पर्य उस क्षेत्र से होता है जो प्रत्येक किसान परिवार के पास अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए उपलब्ध होता है। भारत में कृषि जोतों को तीन प्रकार से विभाजित किया गया है-लाभकर जोत, पारिवारिक जोत, तथा अनुकूलतम जोत।

लाभकर जोत (Economic Holding) :- इससे तात्पर्य उस जोत से है जो कृषक परिवार को पूर्ण कालिक रोजगार प्रदान करे तथा रहन-सहन का उचित स्तर प्राप्त किया जा सके। केन्द्रीय भूमि सुधार कमेटी के अनुसार लाभ कर जोत का आकार सिंचित भूमि का 10 एकड़ आंशिक सिंचित भूमि का 27 एकड़ लक्ष्य या असिंचित भूमि का 54 एकड़ निर्धारित है।

भारत में कृषि जोतों का एक अन्य वर्गीकरण सीमान्त, लघु, मध्यम और बड़े आकार की जोतों के रूप में किया गया है।

सीमांत जोत :- 1 हेक्टेयर से कम अथवा ढाई एकड़ से कम जोत को सीमांत जोत कहते हैं।

लघु जोत :- 1-2 हेक्टेयर वाले जोतों को लघु जोत कहा जाता है।

मध्यम जोत :- 4-10 हेक्टेयर जोत वाले क्षेत्र को मध्यम जोत कहते हैं।

बड़े आकार की जोत :- 10 हेक्टेयर से बड़े आकार की जोत को बड़े आकार की जोतों में सम्मिलित करते हैं।

भारत का विश्व में कृषि जोत भूमि के सम्बन्ध में दूसरा स्थान है। पहला स्थान न्ण्ैण्।ण् का है। कृषि योग्य भूमि की दृषि से विश्व में पांच शीर्ष राष्ट्र क्रमशः है-अमेरिका, भारत चीन, रूस, ब्राजील।

शीर्ष पांच कृषि योग्य भूमिधारी राज्यों का क्रम-राजस्थान, महाराष्ट्र, उ0प्र0, म0प्र0, आन्ध्र प्रदेश।

नोट :- भारत के पास विश्व की कुल कृषि योग्य भूमि का मात्र 11.0% है जबकि इसे विश्व जनसंख्या में लगभग 18.0% भाग का पोषण करना पड़ता है।
सिंचाई :- योजना आयोग द्वारा विभिन्न प्रकार की सिंचाई परियोजनाओं को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया गया है-

(1) छोटी सिंचाई परियोजनाएं :- इनमें वे परियोजनाएं सम्मिलित की जाती है जिसके अन्तर्गत 2000 हेक्टेयर तक क्षेत्रफल हो। लघु सिंचाई कार्यक्रमों में कुओं का निर्माण, निजी नलकूपों का निर्माण, बोरिंग तथा कुओं को गहरा करके भूमिगत जल का विकास तथा लिफ्ट सिंचाई परियोजनाओं को सम्मिलित किया जाता है।

(2) मध्यम सिंचाई परियोजनाएं :- इसमें वे परियोजनाएं सम्मिलित की जाती हैं जिसके नियंत्रण के अधीन 2000 से 10,000 हेक्टेयर कृषि योग्य क्षेत्रफल हो।

(3) बड़ी सिंचाई परियोजनाएं :- इनमें वे परियोजनाएं सम्मिलित की जाती है जिनके नियंत्रण में 10,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि योगय क्षेत्रफल हो।
वर्ष 2014 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011-12 में सर्वाधिक सिंचित क्षेत्रफल वाले पांच राज्य क्रमशः है-उ0प्र0, राजस्थान, म0प्र0, पंजाब एवं आन्ध्र प्रदेश।

  •  कुल क्षेत्रफल के प्रतिशत की दृष्टि से सर्वाधिक सिंचित राज्य है-पंजाब।
  • देश में सबसे कम सिंचित क्षेत्रफल प्रतिशत की दृष्टि से मिजोरम में पाया जाता है।
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक सिंचित क्षेत्रफल (Non Intrigated Aera) क्रमशः महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश।
  • नहर, नलकूप तथा कुआँ द्वारा सिंचित क्षेत्रों को क्षेत्रफल के आधार पर निम्नलिखित क्रम में रखा गया है-नलकूपझनहर झकुआँ

    शीर्ष पांच नलकूप सिंचित राज्य (2011-12)

  • प्रथम – पंजाब
  •  द्वितीय – राजस्थान
  • तृतीय – बिहार
  • चतुर्थ – हरियाणा
  • पंचम – आन्ध्र प्रदेश

कृषि साख की समस्या (Problem of Agriculture Credit) :-

कृषि साख की समस्या से अभिप्राय किसानों को ऋण उपलब्ध कराने से है। भारतीय किसानों की वित्तीय आवश्यकता की पूर्ति को तीन प्रकार के ऋणों द्वारा पूरा किया जाता है-

1. अल्प कालीन ऋण :- 15 माह से भी कम समय के लिए लिये गये धन को अल्पकालीन ऋण में सम्मिलित करते हैं। इसमें बीज, उर्वरक तथा पारिवारिक आवश्यकताओं के लिए ऋण लिया जाता है।

2. मध्यम कालीन ऋण :- भूमि सुधार के लिए, पशु खरीदने के लिए तथा कृषि उपकरण प्राप्त करने के लिए 15 माह से 5 वर्ष तक अवधि के लिए, लिये गये ऋण को मध्यम कालीन ऋण सम्मिलित करते हैं।

3. दीर्घकालीन ऋण :- ये ऋण पांच वर्ष से अधिक की समयावधि के लिए, लिये जाते हैं। दीर्घ कालीन ऋण के अन्तर्गत भूमि खरीदने। भूमि पर स्थायी सुधार कराने, पुराने करों का भुगतान करने तथा मंहगे कृषि यंत्रों को खरीदने को सम्मिलित किया जाता है।

भारत में किसान अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दो प्रकार के स्रोतों से ऋण प्राप्त करता है-

1. परम्परागत स्रोत :- परम्परागत स्रोत ;छवद प्दजतपजनजपवदंस ैवनतबमेद्ध जिसे गैर-संस्थागत स्रोत भी कहते हैं, के अन्तर्गत महाजन, साहूकार, देशी बैंकर अड़तिए इत्यादि से शामिल किया जाता है।

2. संस्थागत स्रोत (Instiutional Soruces) :- संस्थागत स्रोत जिसे आधुनिक स्रोत भी कहा जाता है, के अन्तर्गत सरकार, सहकारी समितियों तथा वाणिज्यिक बैंको आदि को सम्मिलित किया जाता है।

कृषि साख केे सम्बन्ध में 1951-52 ई0 में गोरवाल की अध्यक्षता में अखिल भारतीय ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति का गठन किया गया। इसी की अनुशंसा पर भारतीय स्टेट बैंक की स्थापना हुई।

ए0एम0 खुसरो की अध्यक्षता में भारतीय रिजर्व बैंक ने अखिल भारतीय ग्रामीण साख समीक्षा समिति गठित की जिसने अपनी सिफारिसें 1989 ई0 में प्रस्तुत की थी इसी आधार पर 22 अप्रैल 1998 ई0 के नर सिंहम समिति ने भी कृषि साख के सम्बन्ध में सुझाव प्रस्तुत किए।

क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों की स्थापना वर्ष 1975 ई0 में हुई जिनका मुख्य कार्य कृषि साख उपलब्ध कराना है।

वर्ष 1969 ई0 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ और इसके बाद इन व्यावसायिक बैंको ने कृषि साख उपलब्ध कराने का कार्य प्रारम्भ किया।

कृषि साख को उपलब्ध कराने वाली सबसे बड़ी संस्था नाबार्ड (NABARD) है जिसकी स्थापना 12 जुलाई 1982 ई0 को हुई। नाबार्ड का मुख्यालय मुम्बई में है। नाबार्ड भारतीय रिजर्व बैंक की वह शाखा है जो कृषि क्षेत्र में साख उपलब्ध कराने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि (RIDF) :- RIDF नाबार्ड द्वारा उन अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों से निधियाँ एकत्रकर 1995-96 से चलायी जा रही है जो कृषि क्षेत्र को ऋण देने के अपने लक्ष्य को पूरा करने में असमर्थ है। इस निधि का उद्देश्य राज्य सरकारों तथा राज्य के स्वामित्व वाले निगमों की चल रही ग्रामीण आधारभूत योजनाओं को पूरा करने के लिए, समर्थ बनाने के लिए ऋण प्रदान करना। वाद में इसके कार्य क्षेत्र को बढ़ाकर इसमें ग्रामीण पेयजल योजना, भूमि संरक्षण योजना ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों और प्राथमिक स्कूलों, आंगनबाड़ी केन्द्रों आदि को शामिल किया गया।

ग्रामीण अवस्थापना या अधोसंरचना के विकास के सम्बन्ध में 1995-96 में 200 करोड़ रूपये आवंटित किए गये जो ग्रामीण अवस्थापना विकास फण्ड Q.M (RIDE) को दिये गये। वर्ष 2014-15 के बजट में त्प्क्थ् के लिए 30 हजार करोड़ रू0 आवंटित किए गये। इस फण्ड का संचालन नाबार्ड द्वारा किया जाता है।

कपार्ट :- लोक कार्यक्रम एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद अर्थात् कपार्ट (Council For Advancement of Peole’s Action And Rural Technology-CAPART)का गठन 1 सितम्बर 1986 को किया गया था। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। कपार्ट का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण समृद्धि के लिए परियोजनाओं क्रियान्वयन में स्वेच्छिक कार्य को प्रोत्साहित करना एवं उसमें मदद करना है। कपार्ट के नौ प्रादेशिक केन्द्र स्थापित किये गये हैं। जो निम्न हैं-जयपुर, लखनऊ, अहमदाबाद, पटना, भुवनेश्वर, गुवाहाटी, हैदराबाद, चण्डीगढ़ और धारवाड़। इन प्रादेशिक केन्द्रों को अपने-अपने क्षेत्रों में स्वयं सेवी संस्थाओं के 20 लाख रूपये तक के परिव्यय वाली योजनाओं को मंजूरी देने की शक्ति प्राप्त है। बिहार के मुजफ्फरपुर के बनिया ग्राम में परामर्श एवं मार्गदर्शक केन्द्र के रूप में एक ’ग्राम ज्ञान केन्द्र’ VKC-Village Knoqladge Center) की शुरूआत 22 अप्रैल 2007 को कपार्ट द्वारा की गयी।

कृषि यंत्रीकरण (Agriculture Machanisation) :- कृषि यंत्रीकरण से अभिप्राय भूमि पर मशीनों द्वारा उन कार्यों को करने से है जो साधारण रूप से मानव शक्ति व बैल, घोड़े या अन्य किसी प्रकार के वाहक पशुओं द्वारा किए जाते हैं। दूसरे अर्थों में कहा जा सकता है कि श्रम को पूँजी से बदल देना ही कृषि का यंत्रीकरण है। भारत में कृषि यंत्रीकरण दो रूपों में अपनाया गया है-

1. परम्परागत पशुचालित कृषि उपकरणों के स्थान पर डीजल, पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरणों का प्रयोग।

2. देश में विभिन्न कृषि जलवायु तथा सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के संदर्भ में भारवाही पशुओं के महत्व एवं उनकी अनिवार्यता को दृष्टि में रखते हुए पशु चालित यंत्रों का प्रोन्नयन एवं प्रतिस्थापन करना।

कृषि यंत्रीकरण में सबसे अधिक प्रगति टै्रक्टरों एवं पावर ट्रिलरों के उत्पादन एवं उपयोग में दिखाई दे रही है। भारत प्रतिवर्ष 5 लाख से अधिक टै्रक्टरों को उत्पादित कर विश्व में अग्रणी राज्य बना हुआ है।

वर्तमान में कृषि यंत्रीकरण की सबसे बड़ी बाधा कृषि शक्ति की कम एवं अनियमित उपलब्धता और कम होता हुआ जोत का आकार है। आर्थिक समीक्षा 2013-14 के अनुसार भारत में फार्म मशीनीकरण का स्तर विकसित देशों के 90ः की तुलना में औसतन 25ः है।

ट्राइफेड (Triffed) :- जनजातीय लोगों का शोषण करने वाले निजी व्यापारियों से छुटकारा दिलाने और उनके द्वारा तैयार की गई वस्तुओं का अच्छा मूल्य दिलाने के उद्देश्य से सरकार ने अगस्त 1987 में भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ (Tribal Co-Oprative Marketing Development Federation Of India Ltd-TRIFED) की स्थापना की थी। इसने अप्रैल 1988 से कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था। इसे पेड़ों तथा वनों के उत्पादों के एकत्रीकरण, प्रसंस्करण भण्डारण और विकास की प्रमुख एजेन्सी भी घोषित किया गया है। गेहूँ और धान की सरकारी खरीद के लिए ट्राइफेड भारतीय खाद्य निगम के एजेन्ट और मोटे अनाजों, दालों और तिलहनों की सरकारी खरीद में कृषि एवं सहकारिता विभाग के एजेन्ट के रूप में काम करती है। मूल्यों के उतार-चढ़ाव से होने वाले अचानक नुकसान की भरपाई के लिए कृषि मंत्रालय इसे अनुदान देता है।

नाफेड (NAFED) :- कृषि उपजों के विपणन हेतु सहकारी क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (National Agriculture Co- Operative Federation Ltd-NAFED)की स्थापना की गई है।

कृषि उपजों का भण्डारण :- कृषि उपजों के भण्डारण की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए 1956 में ’राष्ट्रीय सहकारी विकास एवं भण्डागार बोर्ड’ तथा 1957 में केन्द्रीय भण्डागार निगम (Central Warehousing Corporation) की स्थापना की गई थी। इसके बाद राज्यों में भी राज्य भण्डागार निगम स्थापित किए गए हैं। भारतीय खाद्य निगम ;थ्ब्प्द्ध के पास अपने गोदाम हैं।

कृषि विपणन :- भारत में कृषि उपजों के व्यवस्थित विपणन को प्रोत्साहित करने के लिए बाजार को नियन्त्रित किया गया था। अधिकांश राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों ने कृषि उपजों के विपणन को नियन्त्रित करने के लिए एक अधिनियम ;।च्डब्.।बजद्ध बनाया था। 1950 के अन्त तक देश में 286 नियामक बाजार (Regulated Markets) थे, जिनकी संख्या 31 मार्च, 2009 को बढ़कर 7139 हो गई थी।

किसान क्रेडिट कार्ड योजना (KCC)

किसान क्रेडिट कार्ड योजना (KCC)

कृषकों को संगठित बैंकिंग प्रणाली तथा कम खर्चीले तरीके से पर्याप्त और यथा समय ऋण सहायता प्रदान करने के लिए अगस्त 1998 ई0 में किसान क्रेडिट कार्ड योजना चलाई गयी। इस योजना का कार्यान्वयन वाणिज्यिक बैंको, केन्द्रीय सहकारी बैंको और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के माध्यम से किया जा रहा है। नाबार्ड ने 2004 ई0 में इस योजना को संशोधित रूप प्रदान किया और अब इस योजना द्वारा दीर्घकालीन ऋण प्रदान किए जा रहे हैं।

योजना की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

(1) रू0 5000 अथवा अधिक के उत्पादन ऋण के लिए पात्र किसान, किसान क्रेडिट कार्ड प्राप्त करने के हकदार हैं, यह कार्ड किसानों को उनकी भूमि के आधार पर जारी किए जाते हैं।
(2) पात्र किसानों को किसान कार्ड और पासबुक अथवा कार्ड-सह-पासबुक उपलब्ध कराई जाती है।
(3) इनका उपयोग किसान खेती के लिए बीज, उर्वरक और कीटनाशक आदि जरूरतों की वस्तुओं को खरीदने के लिए करते हैं।
(4) प्रचलनात्मक जोत ;व्चमतंजपवदंस संदक ीवसकपदहद्धए फसल पैटर्न और वित्त श्रेणी ;ैबंसम व िपिदंदबमद्ध के आधार पर सीमा निर्धारित की जाती है।
(5) बैंकों के विवेक पर उपसीमाएं निर्धारित की जाती हैं।
(6) वार्षिक समीक्षा की शर्त पर कार्ड 3 वर्ष के लिए वैध होता है।
(7) प्रत्येक आहरण का भुगतान 12 महीने में करना होता है।
(8) प्राकृतिक आपदाओं के कारण खराब हुई फसलों के मामले में ऋण को बदलना/पुनर्निर्धारण की भी अनुमति है।
(9) लागत वृद्धि फसल पैटर्न आदि में परिवर्तन होने पर ऋण की सीमा को बढ़ाया जा सकता है।
(10) भारतीय रिजर्व बैंक के मानदंडों के अनुसार ब्याज की दर आदि में परिवर्तन किया जा सकता है।
(11) जारी करने वाली शाखाओं अथवा बैंक के विवेक पर उसकी अन्य नामित शाखाओं के माध्यम से प्रचालन ;व्चमतंजपवदेद्ध किया जाता है।
(12) कार्ड और पास बुक साथ होने पर स्लिप/चैक के माध्यम से आहरण किया जाता है।

कृषि कीमत नीति (Agriculture Price Poliey)  

कृषि मूल्यों के व्यापक उतार-चढ़ाव उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों के हित में नहीं होता है और ऐसे में कर भार कृषि कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास करती है। यदि किसी वर्ष उत्पादन आवश्यकता से अधिक हो जाता है तो सरकार अतिरिक्त उत्पादन को क्रय करके बजार स्टाॅक के रूप में FCI के खाताओं में सुरक्षित रख देती है और जिस वर्ष उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है इस वफर स्टाॅक का प्रयोग करके मांग को पूरा किया जाता है। भारत सरकार द्वारा निम्नलिखित प्रकार की कीमतें घोषित की जाती है-

वसूली कीमत (Purching Price) :- वसूली कीमत से तात्पर्य उस कीमत से होता है जिस कीमत पर सरकार मण्डी से कृषकों तथा व्यापारियों से उनकी उपज को खरीदती है जिससे कमजोर अन्य वर्ग के लोगों को उचित कीमतों पर न्यूनतम आवश्यकता मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा सके।

जारी कीमत (Issue Price) :- जारी कीमते उन कीमतों को कहते हैं जिस पर सरकार खाद्यान्न आदि वस्तुएं उपभोक्ताओं को उचित कीमत की दुकानों से उपलब्ध कराती है। सामान्यतः यह कीमत क्रय कीमत की तुलना में कम होती है। यह समाज के कमजोर वर्गों के लिए निर्धारित की जाती है। इस कीमत के होने वाली क्षति की पूर्ति सरकार द्वारा विक्रेताओं को अनुदान देकर की जाती है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) MSP :-

सामान्यतः न्यूनतम समर्थन कीमत द्वारा सरकार किसानों को यह आश्वासन देती है कि खाद्यान्नों का मूल्य इस न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे नही गिरेगा। कृषिगत उत्पादन को प्रोत्साहन देने हेतु सरकार द्वारा 20 महत्वपूर्ण फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य अति उत्पादन की स्थिति में उपज के मूल्य को गिरने से रोकना तथा इस प्रकार किसानों के हितों का संरक्षण करना है। जब कृषि उपज का बाजार मूल्य घोषित समर्थन मूल्य से नीचे चला जाता है तो सरकार स्वयं समर्थन मूल्य पर उपज खरीदने को तैयार रहती है, इससे बाजार में सम्बन्धित उपज का मूल्य सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे नही जा पाता तथा किसानों को अति उत्पादन की स्थिति में मूल्य गिरने की आशंका नही रहती है तथा वह अधिक से अधिक उत्पादन करने को प्रेरित होता है। ध्यान रहें कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की संस्तुति कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा वर्ष में दो बार (रवी एवं खरीफ) की जाती है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (Commission for Agriculture Coast and Price) CACP :- कृषिगत उत्पादों का मूल्य निर्धारित करने के लिए खाद्य मूल्य नीति समिति सन् 1964 ई0 की संस्तुति के आधार पर 1965 ई0 में कृषि मूल्य आयोग (Agriculturl Price Commission) की स्थापना की गयी। सन् 1985 ई0 में APC का नाम बदलकर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) कर दिया गया। इस आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।

(CACP) विभिन्न उत्पादों के सम्बन्ध में राज्यों के परामर्श से विभिन्न राज्यों के लिए उत्पादन लागत सम्बन्धी आकड़ों का विश्लेषण करता है। राज्य के मुख्य मंत्रियों की बैठक के पश्चात् न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है।

लागत विचार धारा :- देश में सामान्य फसलों के लिए उत्पादन की लागतें भिन्न-भिन्न उत्पादकों के लिए भिन्न-भिन्न होने के कारण एक मानक के रूप में लागत के स्तर को अपनाने में बहुत कठिनाई होती है फलतःCACP द्वारा प्रयुक्त कुछ महत्वपूर्ण लागत अवधारणाएं C-2 और C-3 है-

C-2 लागत :- C-2 लागत में वास्तविक मालिक द्वारा उत्पादन के वहन किए गये नगद और वस्तु रूप में सभी वास्तविक खर्चें तथा पट्टे पर ली गयी जमीन के लिए अदा किया गया किराया और पारिवारिक श्रम का लगाया गया मूल्य तथा स्वाधिकृत पूंजी सम्पत्तियों के मूल्यदर ब्याज और स्वाधिकृत जमीन का किराया मूल्य शामिल है।

C-3 लागत :- इसमें लागत C-2  किसानों को प्रबन्धकीय प्रारम्भिक का हिसाब लगाने के लिए C-2 लागत का 10 प्रतिशत शामिल करते हैं।

उत्पादन की लागतों का आकलन प्रति क्विंटल तथा प्रति हेक्टेयर दोनों आधारों पर लगाया जाता है। चूंकि राज्यों में लागतों में अन्तर बहुत ज्यादा पाया जाता है। इसलिए CACP  ने MSP का निर्धारण C-2 लागत के आधार पर करने की सिफारिस की।

मूल्य स्थिरीकरण कोष (Price Stabillsation fund-PSP) :- चाय, काॅफी, रबर व तम्बाकू के मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के उद्देश्य से आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति ने मूल्य स्थिरीकरण कोष की स्थापना के प्रस्ताव को 20 फरवरी 2003 को अनुमोदित किया। चार हेक्टेयर की एक भी जोतों वाले धारक इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। मूल्य स्थिरीकरण में लिए बैंचमार्क (Bench Mark) मूल्य का निर्धारण विगत सात वर्षों के अन्तर्राष्ट्रीय मूल्य के आधार पर चल मध्य (Seven Yearly Moving Average of Inter National Price) के द्वारा निर्धारित किया जाता है। बाजार मूल्य के इससे 20ः तक अधिक या कम होने पर कोई कदम नही उठाया जाता है किन्तु मूल्य में 20ः तक अधिक की कमी आने पर उत्पादकों को इस भाव से राहत प्रदान की जाती है। इस प्रकार बाजार मूल्य के बेंच फार्म मूल्य के 20ः के भी अधिक होने पर उत्पादकों को अतिरिक्त राशि कोष में जमा करनी पड़ती है।

प्रतिरोधक भण्डार (resistive reserves)

प्रतिरोधक भण्डार (resistive reserves)

फर स्टाक बनाने का एक मात्र उद्देश्य खाद्य सुरक्षा प्रदान करना होता है यह एक ऐसा प्रारम्भिक स्टाॅक है जिसके फसल खराब होने की स्थिति में अनाज निकाला जाता है। सन् 1994 ई0 के बाद से स्टाॅक प्रत्येक तिमाही के लिए अलग-अलग निर्धारित किया जा रहा है। यदि स्टाॅक वर्ष भी प्रत्येक तिमाही के लिए निर्धारित वफर स्टाॅक मापदण्डों से कम रह जाता है तो अनाज की खरीद के लिए उच्चतम मूल्य प्रोत्साहनों के माध्यम से स्टाॅक की कमी को पूरा करने के लिए कदम उठाया जाता जाता है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution Systems-P.D.S)
उपभोक्ताओं को सस्ते मूल्य पर उचित दर राशन दुकानों द्वारा उपभोग वस्तुएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा PDS 1950 ई0 में लागू किया गया। इसके अन्तर्गत गरीबों को सस्ते मूल्य पर खाद्यान्न वितरित करके उन्हें मँहगाई के बोझ से बचाने का प्रयास किया जाता है। उपभोक्ताओं को निम्न माध्यमों से वस्तुएं उपलब्ध करायी जाती है-

1. मिट्टी के तल की विक्रय दुकाने
2. सुपर बाजार
3.नियंत्रित उपभोक्ता भण्डार
4.राशन या सरकारी सस्ते गल्ले की दुकाने
5. सहकारी-उपभोक्ता भुगतान

यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से लोगों को मिलने वाले खाद्यान्नों का मूल्य उसके आपूर्ति लागत से कम है तो लागत एवं मूलय के इस अन्तर को खाद्यान्न अनुदान या Food Subsidy कहा जाता है।

नवीनीकृत सार्वजनिक वितरण प्रणाली :-
सन् 1992 ई0 में नवीनीकृत सार्वजनिक वितरण प्रणाली प्रारम्भ की गयी जिसमे देश के सबसे पिछड़े हुए क्षेत्रों, रेगिस्तानी इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और गरीब मलिन बस्तियों में 50 रू0 प्रति कुन्तल से कम मूल्य पर गेहूँ एवं चावल उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है इसके अन्तर्गत छः प्रमुख आवश्यक वस्तुओं गेहूँ, चावल, चीनी, खाद्य तेल, मिट्टी का तेल, कोयला के साथ-साथ चाय, साबुन, दाल, आयोडीन नमक को भी शामिल किया गया है
लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली :-
TPDS प्रणाली 1 जून 1997 ई0 में प्रारम्भ की गयी। यह प्रणाली भारत में सभी राज्यों में लागू है जिसमें दिल्ली और लक्षद्वीप इसके दायरे से बाहर हैं। इस योजना के अन्तर्गत गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले प्रत्येक परिवार को एक न्यूनतम कीमत पर अनुदान युक्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
TPDS के तीन स्तर हैं-1. अन्त्योदय अन्न योजना (AAY) :- 25 दिसम्बर 2000 को यह योजना प्रारम्भ की गयी जिसमें प्रत्येक परिवार को 2 रू0 प्रति किग्रा गेहूँ तथा 3 रू0 प्रति किग्रा चावल देने का लक्ष्य रखा गया था इस दर पर 35 किग्रा खाद्यान्न उपलब्ध कराया गया था।

2. गरीबी रेखा से नीचे के परिवार (BPL) :- सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत ठण्च्ण्स् परिवारों को 4.15 रूपये प्रति किग्रा गेहूँ 5.56 रू0 प्रति किग्रा चावल की दर से 35 किग्रा प्रति महीना खाद्यान्न उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।

3. गरीबी रेखा के ऊपर के परिवार (APL) :- इस प्रकार के परिवार को खाद्यान्नों में लागत के बराबर मूल्य लेने का लक्ष्य बनाया गया है।

नोट :-  वर्ष 2010 में सरकार द्वारा एक आदेश जारी कर अन्त्योदय अन्न योजना और B.P.L परिवारों के खाद्यान्नों की सीमा को 10 किग्रा परिवार बढ़ाकर 25 किग्रा से बढ़ाकर 35 किग्रा कर दिया गया।

भूमि विकास बैंक:-

भूमि विकास बैंक की स्थापना कृषकों की दीर्घ कालीन प्रान्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु की गयी थी। यह बैंक भारत में सर्वप्रथम 1929 ई0 मद्रास में स्थापित किया गया था। यह कृषकों की चल अचल सम्पत्ति को बंधक बनाकर ऋण प्रदान करता है।

’स्वाभिमान’ कार्यक्रम:- ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएं प्रदान करने के लिए वित्तीय समावेशन पर राष्ट्र व्यापी कार्यक्रम स्वाभिमान  का शुभारम्भ 10 फरवरी 2011 को नई दिल्ली में किया गया। यह कार्यक्रम भारत सरकार द्वारा भारतीय बैंक संघ IBA के सहयोग से ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र के मध्य विद्यमान आर्थिक विषमता को कम करने हेतु प्रारम्भ किया गया जिसका मोटो-’सुनहरे कल का अभियान’ है।

राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (National Agriculture Insurance Scheme) :- देश में सर्वप्रथम फसल बीमा योजना 1973-1984 में के दौरान चलाई गयी। बाद में अप्रैल 1985 ई0 में केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने व्यापक फसल बीमा योजना (Comprehensive Crop Insurance Scheme)  प्रारम्भ की। इसी के स्थान पर 1999-2000 में राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना लागू की गयी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य सूखे, बाढ़, ओलावृष्टि, चक्रवात, आग, कीट बीमारियाँ आदि जैसी प्राकृति आपदाओं के कारण फसल को हुई क्षति से किसानों को संरक्षण प्रदान करना है ताकि आगामी मौसम में उनकी ऋण साख बहाल हो सके। यह योजना ऋण ग्रस्तता पर ध्यान दिए बिना सभी कृषकों के लिए उपलब्ध है। वर्तमान में कृषि बीमा आयोग द्वारा इस योजना के विकल्प के रूप में मौसम आधारित फसल बीमा योजना प्रारम्भ की गयी है।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना:- इस योजना का प्रारम्भ सितम्बर 2007 में किया गया। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का उद्देश्य कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों की सम्पूर्ण विकास सुनिश्चित करना। इस योजना के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

(1) राज्यों को प्रोत्साहित करना ताकि कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश में वृद्धि की जा सके।
(2) कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र की योजनाओं के आयोजन और कार्यान्वयन की प्रक्रिया में राज्यों को लचीलापन और स्वायत्तता प्रदान करना।
(3) जिलों एवं राज्यों के लिए कृषि योजनाओं की तैयारी कृषि जलवायु की परिस्थितियों, प्रौद्योगिकी और प्राकृतिक स्रोतों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
(4) यह निश्चित करना कि स्थानीय जरूरतों को राज्यों की कृषि योजनाओं में बेहतर ढंग से प्रतिबिम्बित किया जाए।
(5) कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों में किसानों को बेहतर रिटर्न दिलाना।

वर्ष 2002-01 में माइक्रो मैनेजमेंट आॅफ एग्रीकल्चर स्कीम प्रारम्भ की गयी जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि विभिन्न राज्यों को मिलने वाली सहायता प्राथमिकता के आधार पर निर्धारित होना चाहिए। इसके अन्तर्गत राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड का मुख्यालय हैदराबाद में तम्बाकू बोर्ड का मुख्यालय गुण्टूर आन्ध्र प्रदेश में, 295 बोर्ड कोपट्टम केरल में स्थापित किया गया है। मसाला बोर्ड कोच्चि केरल में, काॅफी बोर्ड बैंग्लूर कर्नाटक में स्थापित किया गया है जबकि राष्ट्रीय जूट बोर्ड कलकत्ता में स्थापित है।

राष्ट्रीय कृषक आयोग एवं नई राष्ट्रीय कृषि नीति :- किसानों एवं कृषि क्षेत्र के लिए कार्य योजना पर सुझाव देने के लिए वर्ष 2004 ई0 में डाॅ0 एम0एस0 स्वामी नाथन की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय कृषक आयोग ने दिसम्बर 2004, अगस्त 2005, अप्रैल 2006 तथा अक्टूबर 2006 में गठित किया गया। इसके अन्तर्गत यह बात सामने आयी कि कृषि उपजों के मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ाव से किसानों की रक्षा हेतु केन्द्र एवं राज्य सरकार के साथ-साथ वित्तीय संसाधनों द्वारा नियंत्रित मार्केट रिस्क स्टेवालाइजेशन फण्ड को गठित किया जाय। इसी के साथ सूखें एवं वर्षा सम्बन्धी आपदाओं से किसानों की रक्षा के लिए एग्रीकल्चर रिश्क फण्ड की स्थापना की संस्तुति भी आयोग ने की।
नई राष्ट्रीय कृषि नीति ने निम्न बातों पर जोर दिया-

1. सभी कृषि उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाय।
2. सभी राज्यों में राज्य स्तरीय किसान आयोग के गठन का सुझाव।
3. किसानों के लिए बीमा योजनाओं का विस्तार किया जाए।
4. कृषि सम्बन्धी मामलों के लिए स्थानीय पंचायतों के अधिकारों में वृद्धि की जाय।
5. केन्द्र एवं राज्य में कृषि मंत्रालयों का नाम बदलकर कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय करने का सुझाव दिया गया।
6. राज्य सरकारों द्वारा कृषि हेतु अधिक संसाधनों के आवंटन की सिफारिस की गयी।

किसान काल सेन्टर:- प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी 21 जनवरी सन् 2004 को नई दिल्ली में ’किसान काल सेंटर तथा कृषि चैनल का उद्घाटन किया। इसके माध्यम से किसान कृषि सम्बन्धी समस्त जानकारी टेलीफोन काल द्वारा प्राप्त कर सकते हैं।

सरल नाॅलेज सेन्टर:- भारत सरकार ने ग्रामीण विकास बैंक NABRD के द्वारा देश के ग्रामीण इलाकों में सरल नाॅलेज सेंन्टर्स Rural Knowledge Center की स्थापना की गयी। इसका उद्देश्य किसानों को सूचना प्रौद्योगिकी व दूर संचार तकनीक द्वारा वांछित जानकारियाँ उपलब्ध कराना है।

प्रत्यक्ष हस्तान्तरण योजना  (DBT) :- यह योजना वर्ष 2013 ई0 में प्रारम्भ की गयी। इसके सम्बन्ध में नंदन नीलकणि की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी थी जिसके सुझाव पर इसे प्रारम्भ किया गया। इसके अन्तर्गत मनरेगा की मजदूरी, वृद्धावस्था पेंशन छात्रवृत्ति तथा अन्य सभी हस्तांतरण सीधे लाभर्थियों के बैंक में खाते में दिए जाएगें।

भारत मेे खाद्य सुरक्षा (National Food Security Of India) :-

भारत में खाद्य सुरक्षा का अर्थ सभी लोगों के लिए सदैव भोजन की उपलब्धता पहुँच और उसे प्राप्त करने का सामथ्र्य खाद्य सुरक्षा सार्वजनिक वितरण प्रणाली शासकीय सतर्कता और खाद्य सुरक्षा के खतरे की स्थिति में सरकार द्वारा की गई कार्यवाही पर निर्भर करती है। जीवन के लिए भोजन उतना ही आवश्यक है जितना की साँस लेने के लिए वायु। लेकिन खाद्य सुरक्षा मात्र दो जून की रोटी पाने मात्र नहीं है अपितु उससे कहीं अधिक है। खाद्य सुरक्षा के निम्नलिखित आयाम हैं।

1. खाद्य उपलब्धता का तात्पर्य देश में खाद्य उत्पादन खाद्य आयाम और सरकारी अनाज भण्डारों में संचित पिछले स्टाॅक से है।
2. खाद्य पहुँच का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति में खाद्य मिलता रहे।
3. सामथ्य का अर्थ लोगों के पास अपनी भोजन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त और पौष्टिक भोजन खरीदने के लिए।

किसी देश में खाद्य सुरक्षा केवल तभी सुनिश्चित होती है जब सभी लोगों के लिए पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध हो तथा लोगों के पास गुणवक्ता युक्त खाद्य पदार्थ खरीदने के क्षमता हो और खाद्य पदार्थ की उपलब्धता में कोई बांधा न आये। 1970 की दशक में संयुक्त राष्ट्र संघ ने खाद्य सुरक्षा का अर्थ बताया है कि आधारित खाद्य पदार्थों की सदैव उपलब्धता। प्रो अमत्र्य सेन ने हकदारियों के आधार पर खाद्य सुरक्षा में एक नया आयाम जोड़ा।

विश्व खााद्य सम्मेलन 1995 में यह घोषणा की गई कि व्यक्तिगत पारिवारिक, क्षेत्रीय राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा का अस्तित्व तभी है जब सक्रिय और स्वस्थ्य जीवन व्यतीत करने के लिए पर्याप्त सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्य तक सभी लोगों की भौतिक एवं आर्थिक पहुँच सदैव हो।’’

खाद्य एवं पोषाहार की सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से 10 सितम्बर 2013 को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम अधिसूचित किया गया। इस अधिनियम के अन्तर्गत 75% ग्रामीण आबादी और 50% शहरी आबादी को कुल लाभान्वित किया जाने का प्रावधान किया गया है। इसमें प्राथमिकता वाले परिवारों के लिए प्रति व्यक्ति 5 किग्रा0 खाद्यान्न और अन्त्योदय योजना के तहत परियोजना के लिए 3 रू0 किग्रा0 चावल 2 रू0 किग्रा0 गेहूँ और 1 रू0 किग्रा0 मोटे अनाज की आर्थिक सहायता देय कीमतों पर प्रत्येक परिवार 35 किग्रा0 खाद्यान्नों का हकदार है। इस अधिनियम ने महिलाओं और बच्चों को पोषाहार सम्बन्धी सहायता दिए जाने पर विशेष बल दिया गया है। इसके घटकों में बफर स्टाॅक और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ-साथ एकीकृत बाल विकास सेवाएँ काम के बदले अनाज दोपहर का भोजन, अन्त्योदय अन्य योजना आदि है। खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने में सरकार को भूमिका के अलावा अनेक सहकारी समितियां और गैर सरकारी संगठन हैं जो इस दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।

कृषि विज्ञान की क्रान्तियाँ (Reeducation of Agriculture)

कृषि विज्ञान की क्रान्तियाँ (Reeducation of Agriculture)

भारत में हरित क्रान्ति (Green Revolution in India) :-

नेशनल डेरी रिसर्च इन्स्टीट्यूट की स्थापना 1955 ई0 में कर्नाल हरियााणा में की गई थी।

पीली क्रान्ति (Yellow Revolution) :- 

कृषि क्षेत्र में अनुसन्धान एवं विकास की अगली कड़ी पीली क्रान्ति है। इसके तहत तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से उत्पादन प्रसंस्करण एवं प्रबन्ध प्रौद्योगिकी का सर्वोत्तम उपयोग करने की दृष्टि से तिलहन प्रबन्ध प्रौद्योगिकी मिशन प्रारम्भ किया गया। पीली क्रान्ति के परिणाम स्वरूप भी हमारा देश खाद्य तेलों और तिलहन उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सका है।

नीली क्रान्ति (Blue Revolution) :-

देश में मत्स्य उत्पादन में वृद्धि के लिए चलाई गई योजना नीली क्रान्ति कहलाती है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक राष्ट्र है। (आर्थिक समीक्षा 2014-15) देश में मछली उत्पादन में शीर्ष राज्य क्रमशः पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, केरल एवं तमिलनाडु का है। संसार में सर्वाधिक मछली उत्पादन चीन में होता है। राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड की स्थापना हैदराबाद में है।

गोल क्रान्ति (Round Revolution) :-

केन्द्रीय आलू अनुसन्धान शिमला द्वारा विकसित प्रौद्योगिकयों एवं रोगरोधी किस्मों के परिणाम स्वरूप भारत में ’’आलू क्रान्ति’’ सम्भव हुई जिस गोल क्रान्ति की संज्ञा दी जाती है भारत चीन के बाद विश्व की दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है। देश में शीर्ष तीन आलू उत्पादक राज्य क्रमशः उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल तथा बिहार है।

संसार के प्रत्येक देश में अनुसन्धान के फलस्वरूप वहाँ की परम्परागत खेती का सुधार हुआ। सन् 1908 ई0 में अमेरिका सोसाइटी आॅफ इग्रोनामी की स्थापना हुई। भारत के सन्दर्भ में हरित क्रान्ति का तात्पर्य छठे दश के मध्य (1966-67) में कृषि उत्पादन में उस तीव्र वृद्धि से है जो ऊँची उपज वाली बीजों एवं रासायनिक खादों व नई तकनीक के प्रयोग के फलस्वरूप हुई।

हरित क्रान्ति शब्द के जन्मदाता डाॅ0 विलियम गार्ड थे और भारतीय परिप्रेक्ष्य में डा0 एम0एस0 स्वामीनाथन को माना जाता है जबकि हरित क्रान्ति के जन्मदाता के रूपा में नूरमाॅन बोरलाॅग को जाना जाता है। हरित क्रान्ति का प्रभाव मुख्यता गेहूँ और कुछ हद तक धान की फसल पर दिखाई पड़ता। इसका प्रभाव सम्पूर्ण भारत में न होकर कुछ क्षेत्रों पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि तक सीमित रह गया।

देश की बढ़ती हुयी जनसंख्या को ध्यान में रखकर दूसरी हरित क्रान्ति की आवश्यकता डा0 ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम ने बताई। जिसमें मिट्टी से लेकर विपणन तक किस-किस पहलुओं का समावेश हो। इसी सम्बन्ध में नई दिल्ली में 2006 ई0 में एक सम्मेलन कृषि मन्त्रालय भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद CSRI व एसोचैम के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित हुआ है। जिसका मुख्य थीम ’नाॅलेज एग्रीकल्चर’ था।

श्वेत क्रान्ति (White Revolution) :-

दूध उत्पादन में तीव्र वृद्धि ही श्वेत क्रान्ति कहलाता है। (1964-65) में सघन पशु विकास का कार्यक्रम चलाया गया। जिसके अन्तर्गत धवल श्वेत क्रान्ति लाने के लिए पशुमालिकों को पशु पालन के तरीके में सुधार लाने के लिए व्चमतंजपवद सिनक चलाया गया, जिसके सूत्राधार वर्गीज कुरियन थे।
विश्व में दूध उत्पादन में भारत का पहला स्थान है तथा दूसरा स्थान अमेरिका का है। भारत में सबसे अधिक पशु संख्या भी है।

गुलाबी क्रान्ति (Pink Revolution) :-

भारत के समस्त मछली निर्यात में झींगा मछली का महत्वपूर्ण योगदान है। भारत में संसार को सर्वाधिक झींगा मछली निर्यातक राष्ट्र है। इस मछली के उत्पादन को तैयार करने के लिए एक मिशन तैयार किया गया, जिसके फलस्वरूप झींगा मछली के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई। जिस गुलाबी क्रान्ति की संज्ञा प्रदान की गई।
गुलाबी क्रान्ति का सम्बन्ध प्याज उत्पादन से भी है।

कृष्ण क्रान्ति (Black Revolution) :-

पेट्रोलियम पदार्थों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए कृष्ण क्रान्ति की तरफ सरकार का कदम बढ़ा है। इसी परिप्रेक्ष्य में बायो डीजल में उत्पादन करने में सरकार की योजना है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने 2004 को बायो टेªड के रूप में मनाया था।

धूसर क्रान्ति (Grey Revolution) :-

उर्वरक उपभोग में वृद्धि हेतु किए गए प्रयास को धूसर क्रान्ति की संज्ञा दी गई। उर्वरकों के उपभोग में पुदुचेरी का प्रथम तथा आन्ध्र प्रदेश का दूसरा स्थान है।

रजत क्रान्ति (Silver Revolution) :-

मुर्गी तथा अण्डा उत्पादन में सुधार के लिए किये गये प्रयास को रजत क्रान्ति के उपमा दी जाती है भारत का विश्व में अण्डा उत्पादन में चीन एवं यू0एस0ए0 के बाद तीसरा स्थान है। शीर्ष तीन अण्डा उत्पादक राज्यों में आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल है।

सुनहरी क्रान्ति (Golden Revolution) :-

सुनहरी क्रान्ति का तात्पर्य बागवानी उत्पादन में वृद्धि से है, जिसमें विशेषकर सेब उत्पादन से है। भारत का सब्जी तथा फल उत्पादन में दूसरा स्थान है। वर्ष 2012-13 में बागवानी क्षेत्र में फिर से GDP में 30.40% का योगदान किया था।

इन्द्र धनुषीकरण क्रान्ति (Rainbow Revolution) :-

कृषि क्षेत्र की विभिन्न क्रान्तियों जैसे-हरित, श्वेत, काली, नीली, पीली आदि को एक श्रंखला क्रान्ति के रूप में लेकर चलने को इन्द्र धनुषी क्रान्ति कहा जा रहा है। नई कृषि नीति का वर्णन इन्द्र धनुषीय क्रान्ति के रूप में किया जाता है।

सदाबहारी क्रान्ति(Evergreen Revolution) :

हरित क्रान्ति की सफलता के बाद देश के खाद्यान्न अनुपालन को वर्तमान स्तर से दुगुना करने के लिए सदाबहारी क्रान्ति के आवश्यकता महसूस की जा रही है। इस क्रान्ति का विचार एम0एस0 स्वामीनाथ ने 25 जनवरी 2006 को ओ0एम0 बंटूर ने एक व्याख्यान में व्यक्त किया था। विज्ञान की सर्वश्रेष्ठ तकनीकों के इस्तेमाल व आर्गेनिक फार्मिक में शोध को बढ़ावा देने पर उन्होंने बल दिया।

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