रेडियो सक्रिता (Radio Activity)

रेडियो सक्रिता (Radio Activity)

रेडियो सक्रिता वह प्रक्रिया है, सिजमें परमाणु है, जिसमें परमाणु के नाभिक उच्च ऊर्जा युक्त विकिरणों या परमाणविक कणों का उत्सर्जन करते हैं। वैसे सभी तत्व जिनकी परमाणु संख्या लेड 82 से अधिक है, रेडियोधर्मी हें।
रेडियो सक्रिय कण या किरणें तीन प्रकार की होती हैं- अल्फा गण, बीटा कण तथा गामा

अल्फा कण या किरण :-  (खोज-बेकेरल ने)

  1. इसका आवेश 2 इकाई धनात्मक तथा द्रव्यमान 4 इकाई होता है।
  2. इसे 2He4 के रूप में निरूपित किया जाता है।
  3. आयनन क्षमता बहुत अधिक, β कणों से लगभग 100 गुना।
  4. ये कैथोड की ओर विचलित होते हैं।

बीटा कण या किरण :- (खोज-रदफोर्ट)

  1. इसका द्रव्यमान 1 इकाई ऋणावेश तथा द्रव्यमान नहीं होता है।
  2. यह इलेक्ट्र E¹ के रूप में निरूपित किया जाता है।
  3. आयनन क्षमता कम, γ किरणों से 100 गुना।
  4. वेधन क्षमता α कणों से 100 गुना।
  5. एनोड की ओर विचलित होती है।

गामा कण या किरणें :- (मेरी और पियरे क्यूरी)

  1. ये बहुत कम तरंग दैध्र्य के  विघुत चुंबकीय विकिरण हैं।
  2. इसे γ के रूप में निरूपित कया जाता है।
  3. आयनन क्षमता बहुत कम
  4. वेधन क्षमता β कणों से 100 गुना।
  5. ये विचलित नहीं होते।

रेडियो एक्टिव तत्वों को 4 विघटन श्रेणियों  में  बाॅटा गया है जिनके नाम क्रमशः थोरियम श्रेणी, नेप्यूनियम श्रेणी, यूरेनियम श्रेणी तथा ऐक्टीनियम श्रेणी हैं। इनमें से नप्चूनियम श्रेणी कृत्रिम श्रेणी है तथा अन्य तीन प्राकृतिक श्रेणियाॅ हैं।

नाभिकीय विखण्डन (Nuclear Fission ) :- वह अभिक्रिया जिसमंे एक भारी परमाणु का नाभिक दो या दो से अधिक हल्के नाभिकों में टूटता है तथा इसके साथ दो या तीन न्यूट्रान उत्सर्जित होते हैं। इस विखंडन के फलस्वरूप गामा किरणों के रूप में तथा उत्सर्जित कणों की गतिज ऊर्जा के रूप में बड़ी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। ऊर्जा ;200(MeV)

नाभिकीय विखण्डन के उपयोगः-

परमाणु बम (Atomic Bomb ) :-  यह अनियंत्रित नाभिक विखंडन की क्रिया पर आधारित है। 1945 के द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा तथा नाकासा में दो परमाणु बम प्रयोग किये गये, जिनमें से पहला U-235 तथा दूसरा Pu-239 (प्लूटोनियम) का बना हुआ था।

परमाणु भट्ठी या न्यूक्लियर रिएक्टर (Atomic Pile or Nuclear Reactor) :- यह नियंत्रित नाभिकीय विखंडन की क्रिया पर आधारित है। इसमें नाभिकीय ईधन के रूप में विखंडनीय पदार्थ प्रायः संबर्द्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) होता है। विखंडन की श्रंखला अभिक्रिया को नियंत्रित करने के लिए कैडमियम व बोराॅन की नियंत्रक छड़ों का प्रयोग करते हैं जो कि तत्व मुक्त न्यूट्रानों को अवशोषित कर लेती है। नियंत्रक छड़ो के अन्दर ले जाने से श्रंखला अभिक्रिया धीमी हो जाती है तथा उन्हें बाहर निकालने से फिर से श्रंखला अभिक्रिया की गति तेज की जा सकती है। श्रृंखला अभिक्रिया अभिक्रिया में विखंडनों के पश्चात उत्पन्न होने वाले न्यूट्रोनों की गति अत्यधिक होती है। उनकी गति को मंद करने के लिए भारी जल (D2O) ग्रोफाइट या बेरीलियम आॅक्साइड का प्रयोग किया जाता है। इसलिए ये पदार्थ न्यूट्राॅन मंदक कहलाते है। रिएक्टररों में प्रशीतक के रूप में जल तथा कार्बन डाई आक्साइड का प्रयोग किया जाता है।

खौलते पानी किस्म के रिएक्टरों (BWR Boiling Water Reactors)में न्यूट्राॅन मंदक व प्रशीतक के रूप में साधरण जल H2O का प्रयोग होता है तथा दाबानुकूलित भारी रिएक्टरों में न्यूट्राॅन मंदक व प्रशीतक के रूप में भारी जल का प्रयोग होता है। भारतीय रिएक्टरों में अधिकांशतः भारी जल D2O का ही प्रयोग होता है।

नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) :- जब दो या दो से अधिक हल्के नाभिक संयुक्त होकर एक भारी नाभिक बनाते हैं तथा अत्याधिक ऊर्जा विमुक्त करते हैं तो इस अभिक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। यह अभिक्रिया सूर्य तथा अन्य तारों में संपन्न होती है और अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। सूर्य से प्राप्त प्रकाश और ऊष्मा ऊर्जा का स्रोत नाभिकीय संलयन ही है।

नाभिकीय संलयन के उपयोगः-

हाइड्रोजन बम :-  यह संलयन क्रिया पर आधारित है। संलयन के लिए आवश्यक उच्च ताप व उच्च दाब की परिस्थितयाॅ एक आंतरिक विखंडन बम (परमाणु बम) के विस्फोट द्वारा उत्पन्न की जाती है। प्राथम हाइड्रोजन बम सन् 1952 में बनाया गया।

रेडियो एक्टिव समस्थानिकों के उपयोग :- परसिंचरण तंत्र में रक्त के थक्के का पता लगाने के लिए सोडियम Na -24 का, रूधिर की खराबी से उत्पन्न रोगों तथा ल्यूकीमिया के उपचार में P-32ए थायराइड ग्रंथि का विकार ज्ञात करने तथा बे्रन ट्यूमर के उपचार में 1-131 अरक्तता का रोग ज्ञात करने में  Fe -59 कैंसर के उपचार में कोबाल्ट Co-60 का, कार्बन काल निर्धारण विधि C-14 द्वारा जीव (पौधे का जंतु) के अवशेषों (Fossils) का पता लगाने में तथा यूरेनियम काल निर्धारण विधि U-238 द्वारा पृथ्वी तथा पुरानी चट्टानों की आयु का पता लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त इनका उपयोग जंतु एवं पादपों में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं में ट्रेसर की तरह किया जाता है। गामा किरणों का उपयोग कीटनाशकों के रूप में किया जाता जा सकता है।

रसायन विज्ञान पदार्थ, परमाणु एवं अणु (Matter, Atom & Molicule)

रसायन विज्ञान पदार्थ, परमाणु एवं अणु (Matter, Atom & Molicule)

ऐसी कोई भी वस्तु जिसका कुछ आयतन तथा द्रव्यमान होता है और जिसका अनुभव हम अपनी ज्ञानेद्रियों से कर सकते हैं, उसे पदार्थ कहते हैं।
पदार्थ की तीन भौतिक अवस्थायें होती हैं-
1. ठोस (Solid) 2. द्रव (Liquid) 3. गैस (Gas)
ठोस पदार्थों का आकार और आयतन दोनों निश्चित होता है। द्रव का आयतन तो निश्चित होता है परन्तु आकार अनिश्चित होता है। जबकि गैसों का न कोई आकार होता है और न ही आयतन।
पदार्थों के सामान्य गुण

घनत्व (Density) :- किसी पदार्थ के प्रति इकाई आयतन के द्रव्यमान को घनत्व कहते हैं। यदि किसी पदार्थ का द्रव्यमान m तथा आयतन v हो तो घनत्व होगा          d = m/v
कठोरता :- कोई पदार्थ कितना कठोर है, इसका अनुमान इसके गुण से लगाया जाता है कि उसमें  खरोच (Scratch) की प्रतिरोधक क्षमता कितनी है?

यौगिक (Compounds) :-  वे पदार्थ जो दो या दो से अधिक तत्वों के निश्चित अनुपात में परस्पर संयोग से बनते हैं यौगिक कहलाते हैं। यौगिक के गुण, इसके संघटक तत्वों के गुणों से विल्कुल भिन्न होते हैं। जैसे- पानी, नमक चीनी, एल्कोहल।

मिश्रण (Mixtures) :- दो या दो से अधिक तत्वों अथवा यौगिकों को किसी अनिश्चित अनुपात में मिलाने से जो पदार्थ प्राप्त होता है, उसे मिश्रण कहते हैं। जैसे- वायु इसमें आॅक्सीजन, नाइट्रोजन तथा कार्बन डाइआॅक्साइड जैसे तत्व विभिन्न अनुपात में होते हैं।

परमाणु (Atom) :- परमाणु तत्व का वह छोटे से छोटा कण है, जो किसी भी रासायनिक अभिक्रिया में भाग ले सकता है, परन्तु स्वतंत्र नहीं रह सकता है।

अणु (Molecule) :- तत्व अथवा यौगिक का वह छोटे से छोटा कण जो स्वतंत्र अवस्था में रह सकता है, अणु कहलाता है। तत्वो के अणु एक ही प्रकार के परमाणुओं से मिलकर बनते हैं।

परमाणु की संरचना (Structure of atom) :- परमाणु मुख्यतः तीन कणों से मिल कर बने होते है- प्रोटाॅन, न्यूट्रान तथा इलेक्ट्रान। प्रोटान और न्यूट्रान नाभिक में स्थित होते है जहाॅ परमाणु का पूर्ण भार केन्द्रित रहता है। नाभिक धनावेशित होता है क्योंकि उसमें उपस्थित प्रोटान धनावेशित होता है, न्यूट्रान पर कोई आवेश नहीं होता है। चॅूकि परमाणु इलेक्ट्रानिक रूप से उदासीन होता है इसलिए परमाणु में उतने ऋणावेश होना आवश्यक है जो नाभिक के धनावेश को उदासीन कर सके या उसके बराबर हो सके। इलेक्ट्रान ऋणावेशित होते हैं। इलेक्ट्रान के आवेश का परिमाण प्रोटान के आवेश के परिमाण के बराबर होता है और ये नाभिक के चारों ओर तेज गति से घूमते हैं।

प्रोटान का सापेक्ष आवेश +1  होता है, न्यूट्रान आवेश रहित अथवा उदासीन होता है जबकि इलेक्ट्रान का सापेक्ष आवेश -1  होता है।
परमाणु में उपस्थित सभी कणों में न्यूट्रान सर्वाधिक भारी होता है। साधारण हाइड्रोजन को छोड़कर अन्य सभी तत्वों के परमाणुओं में न्यूट्रान पाया जाता है। नाभिक के बाहर न्यूट्रान रेडियो धर्मी हो जाता है।

परमाणु क्रमांक (Atomic number) :- किसी तत्व के परमाणु नाभिक में उपस्थित प्रोटाॅनों की संख्या को परमाणु क्रमांक कहते हैं। इसे Z से दर्शाते हैं। किसी तत्व के सभी परमाणुओं में प्रोटाॅनों की संख्या समान होती है। अतः परमाणु क्रमांक किसी तत्व का आधारभूत गुण है।

द्रव्यमान संख्या या परमाणु द्रव्यमान (Mass number of atomic mass) :- किसी परमाणु के नाभिक मे उपस्थित प्रोटाॅनों की संख्याओं का योग उस परमाणु की द्रव्यमान संख्या कहलाती है। इससे A से दर्शाते हैं।

समस्थानिक (Isotopes) :-  जिन तत्वों की परमाणु संख्या समान किन्तु परमाणु भार भिन्न-भिन्न होते समस्थानिक कहे जाते हैं। जैसे- हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक हैं-

  हाइड्रोजन              ड्यूटेरियम                 ट्राइटियम   
परमाणु संख्या –              1                            1                            1                         
परमाणु द्रव्यमान –           1                            2                           3

समभारिक (Isobars) :- वे तत्व जिनके परमाणु द्रव्यमान समान किन्तु परमाणु क्रमांक भिन्न-भिन्न होते हैं, जैसे

आर्गन (Ar)                   पोटैशियम (K)                       कैल्शियम(Ca)   
परमाणु भार-           40                        40                                                       40
परमाणु संख्या-          1                         2                                                           3

सम न्यूट्राॅनिक :- वैसे नाभिक जिनमें न्यूट्रानों की संख्या समान परन्तु प्रोट्रानों की संख्या भिन्न हो, समन्यूट्रानिक कहलाते हैं। जैसे- 6C13और 7M14 समन्यूट्रानिक हैं क्योंकि न्यूटाॅनों की संख्या समान (7) है।

सम इलेक्ट्रानिक (Isotones) :- वैसे परमाणु, अणु या आयन जिनमें इलेक्ट्रानों की संख्या समान हो, समइलेक्ट्रानिक कहे जाते हैं।
जैसे-      N2         CO               CN-
इलेक्ट्रानो की संख्या- 7+ 7 =14, 6 + 8 =14, 6 + 8 =14,

अफवाऊ का नियम :- विभिन्न कक्षकों में इलेक्ट्राॅन उनकी बढ़ती हुई ऊर्जा के क्रम में भरे जाते हैं बढ़ती हुई ऊर्जा का क्रम निम्न प्रकार है-

     1S< 2S< 2P< 3S< 3P< 4S< 3d< 5s< 4D< 5P< 6S< 4F< 5d 6P< 7S

          24Cr 29Cu इसके आधार पर अपवाद है।

पाऊली का अपवर्जन नियम :-  एक दिए गए परमाणु में किन्हीं भी दो इलेक्ट्राॅनों के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं का मान समान नहीं हो सकता।

हुण्ड का अधिकतम बहुलता नियम- इसके अनुसार इलेक्ट्रान तब तक युग्मित नहीं होते जब तक कि रिक्त कक्षक प्राप्य (available) है अर्थात् जब तक संभंव है, इलेक्ट्राॅन अयुग्मित रहते हैं।

अक्रिय गैसें, हाइड्रोजन तथा उसके यौगिक

अक्रिय गैसें, हाइड्रोजन तथा उसके यौगिक

आवर्त सारणी के शून्य वर्ग में 6 तत्व हैं, हीलियम, निआन, आर्गन, क्रिप्टन, जीनाॅन तथा रेडाॅन। ये सभी तत्व साधरण ताप पर गैसंे हैं तथा रासायनिक दृष्टि से अक्रियशील हैं, इसी कारण इन्हें अक्रिय गैसें कहतें हैं। हीलियम और आर्गन जल में विलेय हैं, अतः अल्प मात्रा में वे नदियों, समुद्रों एव वर्षा के जल में भी पयी जायी जाती हैं। रेडाॅन प्रकृति में नहीं पायी जाती, यह उच्च रेडियोएक्टिव है, जिसका शीघ्रता से क्षय होता है।

अक्रिय गैंसों के उपयोग-
(1) हीलियम :- हीलियम हाइड्रोजन को छोड़कर अन्य समस्त गैसों से हल्की है। इसकी ज्वलनशीलता तथा उठाने की शक्ति (हाइड्रोजन का 92 प्रतिशत) के कारण हीलियम वायुयान के टायरों एवं गुब्बारों के भरने में प्रयुक्त होती है।

  •  समुद्री गोताखोरो को हीलियम तथा आॅक्सीजन का मिश्रण श्वास लेने के लिए दिया जाता है।
  • हीलियम गैस प्रशीतित परमाणु रिएक्टरों में प्रशीतक माध्यम के रूप में प्रयुक्त होती है।
  •  हीलियम थर्मामीटर निम्न तापमिति में उपयोग किये जाते हैं।
  •  हीलियम का उपयोग खाद्य-पदार्थों की सुरक्षा हेतु भी किया जाता है।

(2) निअॅान :- एक बंद नली से कम दाब पर निआॅन भरकर विद्युत प्रवाहित करने से लाल रंग की चमक उत्पन्न होती है। इसलिए इसका उपयोग विज्ञापनों, विद्युत संकेतों, साइनबोर्डों तथा वायुयान के प्रकाश गृहों में होता है।

  •  नियान का उपयोग टेलीफोन सेटों, रेडियो, फोटोग्राफी, ध्वनि चालकों के उत्पादन, स्पार्क प्लग परीक्षकों तथा भयावह सिग्नलों में होता है।
  •  निआॅन का तीक्ष्ण प्रकाश कोहरे एवं तूफान में भीे दिखाई देता है इसलिए समुद्री सेवा के प्रकाश स्तंभ में इसका उपयोग होता है।

(3) आर्गन :- कम ताप चालकता, निष्क्रिय प्रकृति के कारण आर्गन प्रकाश बल्बों व तापदीप्त लैपों में भरने के काम में आती है। इसकी निष्क्रिय प्रकृति बल्बों, लैपों का जीवन काल बढ़ा देती है। यह रेडियो बल्बों तथा परिशोधक एवं धातुओं की वेल्डिंग में उपयोगी है।

(4) क्रिप्टाॅन और जिनाॅन :- क्रिप्टन का उपयोग प्रतिदीप्त विसर्जन लैम्पों में तथा काॅस्मिक किरण माॅपन हेतु आयनीकृत चेम्बर में किया जाता है। जिनाॅन को निआॅन प्रकाश में क्रिप्टान के साथ मिश्रित करने से बल्बों की उपयोगिता बढ़ जाती है।

(5) रेडाॅन :- रेडियो धर्मी होने के कारण इसका उपयोग रेडियोधर्मी अनुसंधानों में तथा कैंसर के शल्य क्रिया रहित उपचार में होता है।

हाइड्रोजन – हाइड्रोजन सबसे हल्का तत्व है। इसकी खोज 1766 में कैवेण्डिश ने की थी।

परमाण्विक/सक्रिय हाइड्रोजन :-कम दाब पर साधरण हाइड्रोजन गैस में टंगस्टन, प्लैटिनम या पैलेडियम का तार उच्च तापमान पर गर्म करने या पारा के आधे मिमी. से भी कम दाब पर हाइड्रोजन में विद्युत विसर्ग प्रवाहित करने पर हाइड्रोजन के अणु H परमाणुओं में टूटते हैं। इस अवस्था वाली हाइड्रोजन गैस को सक्रिय हाइड्रोजन कहते हैं। यह काफी क्रियाशील होती है और आॅक्सीजन, फाॅस्फोरस के साथ साधारण तापमान पर सीेधे संयोग करती है।

नवजात हाइड्रो (Nascent Hydrogen) :- रासायनिक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप किसी यौगिक से तुरंत निकली हुई हाइड्रोजन गैस को नवजात हाइड्रोजन कहते हैं। नवजात हाइड्रोजन आणविक हाइड्रोजन से अधिक क्रिया शील होती है।

आर्थों हाइड्रोजन :-  हाइड्रोजन का वह अणु जिसमें दोनों परमाणुओं के प्रचक्रण (Spins) समान्तर (Para) होते हैं।

पैरा हाइड्रोजन :- हाइड्रोजन का वह अणु जिसमें दोनों परमाणुओं के प्रचक्रण (Spins) प्रति-समान्तर (Anti-parallel) होते हैं।

भारी पानी (Havy water) :- अमेरिका के यूरे तथा उनके साथियों ने 1931 मे भारी जल का पता लगाया। उन्होंने बताया कि साधारण जल के 6000 भागों में लगभग 1 भाग भारी जल विद्यमान रहता है। इसे D2O से प्रर्दशित करते हैं।

भारी जल प्राणियों के लिए हानिकारक है और जीवन के लिए साधारण जल की भांति पोषक व सहायक नहीं है। लगभग शुद्ध भारी जल में टेडपोल और प्रोटोजोआ मर जाते है। बैक्टीरिया की वृद्धि भी भारी जल में कम हो जाती है। भारी जल पीने से चूहों की प्यास बढ़ जाती है। भारी जल का उपयोग नाभिकीय रिएक्टर में मंदक के रूप में किया जाता है। इसका अणुभार 20 होता है।

जल की कठोरता (Hardness  water) कठोर या मृदु जल (Hard & soft water) :-  वह जल जो साबुन के साथ कठिनाई से झाग, देता है, कठोर जल कहलाता है। जो जल साबुन के साथ आसानी से झाग नहीं देता है, मृदु जल कहलाता है। कठोर जल पीने के लिए सदैव हानिकारक नहीं होता है। यह लाउन्ड्री कार्य में हानिकारक होता है। औद्योगिक बाॅयलरों में कठोर जल के प्रयोग से ईधन की बरबादी होती है तथा बाॅयलर की क्षमता में कमी हो जाती है तथा बाॅयलर फटने की संभावना होती है।
मृदु जल या तो शुद्ध जल होता है या ऐसा जल होता हैं जो विलेय अशुद्धियों जैसे Na+ लवण से युक्त होता है। जल को पीने योग्य बनाने (हानिकारक कीटाणुओं को हटाने) की क्रिया स्टार्लाइजेशन कहलाती है। यह क्रिया क्लोनीनीकरण ओजोनीकरण या पराबैगनी किरणें पास करके की जाती हैं।

जल की कठोरता के कारण :-  जल की कठोरता, जल में कैल्शियम के घुलनशील लवणों (बाकार्बोनेट, सल्फेटस, क्लोराइड आदि) के कारण होती है। जल की कठोरता दो प्रकार की हाती है।

1. अस्थाई कठोरता (Temporary hardness) :-. यह कैल्शियम और मैग्नीसियम के बाइकार्बोनेट की उपस्थिति के कारण होती है, जो जल को मात्र उबाल देने पर समाप्त हो जाती है। उबलने पर विलेय बाइकार्बोनेट, अविलेय कार्बोेनेटो में परिवर्तित हो जाते है, जो छानकर दूर किए जा सकते हैं। जल में चूना जल (Ca(OH)2 ) मिलाकर भी अस्थायी कठोरता को दूर किया जा सकता है। इसे क्लार्क विधि कहतें है।

2. स्थाई कठोरता (Permanent hardness) :- यह कैल्श्यिम और मैग्नीशियम के क्लोराइड तथा सल्फेट के कारण होती है। यह कठोरता जल को मात्र उबाल देने से समाप्त नहीं होती। इसे दूर करने के लिए इसमें सोडियम कार्बोनेट का घोल मिलाते है, जिससे कैल्शियम और मैग्नीशियम के घुलनशील लवण अघुनशील कार्बोनेट में परिणत हो जाते हैं, जिन्हें छानकर अलग किया जाता है इस विधि को सोडा विधि कहते हैं।

यह कठोरता जल में साबुन मिलाकर भी दूर की जाती है। साबुन उच्च वसीय अम्लों का सोडियम लवण होता है। जल में उपस्थित कैल्शियम और मैग्नीशियम  Mके घुनशील लवण साबुन की प्रतिक्रिया से कैल्शियम और मैग्नीशियम के अघुनशील लवण के रूप में परिणत हो जाते है, जिन्हें छानकर बाहर निकाल देते हैं।

स्त्रवण विधि में जल को उबाल कर वाष्प के रूप में परिणत किया जाता है, पुनः वाष्प को संघनित कर जल में परिणत करते हैं। इसके अलावा परम्यूटिट तथा कैलगन विधि द्वारा भी जल की कठोरता को दूर किया जा सकता है।

हाइड्रोजन पराक्साइड (Hydrogen Peraoxide) :-. इसका सूत्र H2 O2 तथा अणुभार 34 होता है। इसके निम्न उपयोग हैं-

  •  यह औषधि के रूप में घाव घोने, कान साफ करने दांतों के मंजन के काम आता है।
  •  दूध, शराब आदि अन्य पेयों को सड़ने से बचाने के लिए।
  • प्रयोगशाला में आक्सीकारक के रूप में।
  • रेशम, ऊन, चमडी, हाथी दांत के विरंजन में।
  • राकेटों में नोदक (Propllant)के रूप में।

कुछ महत्वपूर्ण तत्व तथा यौगिक

(Few Important Elements and Copounds)

सोडियम के उपयोग :- सोडियम परआॅक्साइड, सोडिय सायनायड, टैट्राएथिल लेड (पैट्रोल में आपस्फोटन रोधी यौगिक के रूप में प्रयुक्त प्रयुक्त होता है) के निर्माण में, सोडियम वाष्प लैम्प में जो एक वर्णीय पीला प्रकाश उत्सर्जित करता है। सोडियम वाष्प लैम्प आजकल सड़कों पर प्रकाश के लिए प्रयुक्त होेते हैं।

सोडियम हाइड्राॅक्साइड का उपयोग :- पेट्रोलियम के परिष्करण में तथा रूई के न सिकुड़ने वाले वस्त्र बनाने में।
सोडियम सोडियम कार्बोनेट- इसका उपयोग वाशिंग सोडा के रूप में जल मृदुकरण में तथा लाॅण्ड्रियों में एवं कांच, कास्टिक सोडा, साबुन पाउडरों आदि के निर्माण में होता है।

सोडियम बाइकार्बोनेट या बेकिंग सेाडा  :-  बेंकिग पाउडर, झागयुक्त पेयों तथा फल के लवणों के निर्माण में, आमाशय की अम्लता को हटाने की औषधियों मे तथा अग्निरोधी के रूप में खिड़की के कांच के निर्माण में सोडियम सल्फेट का प्रयोग होता है।

मैग्नीषियम (Mg) :- पौधों के हरे पदार्थ में (क्लोरोफिल में) मैग्नीशियम उपस्थित होता है। इसका उपयोग फोटोग्राफी (प्रकाश बल्ब) संकेत ज्वालओं, अग्नि कार्यों तथा आतिशबाजी में प्रकाश स्रोत की तरह होता है।

कैल्शियम(Ca ) :-  कैल्शियम फाॅस्फेट हड्डियों तथा दांतों का एक अवयव होता है। कैल्शियम कार्बोनेट समुद्री जानवरों के रक्षक कवच का भी एक अवयव होता है। कैल्शियम का उपयोग पैट्रोलियम से सल्फर को हटाने में तथा परम ऐल्कोहल के निर्माण में निर्जलीकारक के रूप में होता है।

पोर्टलैण्ड सीमेण्ट :- यह सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में खोजा गया था। यह चूने के पत्थर तथा चिकनी मिट्टी का मिश्रण है। पोर्टलैण्ड सीमेण्ट का अनुमानित संघटन निम्न है, कैल्शियम आॅक्साइड (Cao)-62%  सिलिका (Sio) -22%  ऐलुमिना (Al2O3) -7.5% मैग्नीशियम (MgO) -2.5%  फेरिक आॅक्साइड (Fe2O3) -2.5%

बोरिक अम्ल :- यह एक एंटीसेप्टिक, एक नेत्र धोने वाले द्रव तथा एक भोजन संरक्षक के रूप में प्रयुक्त होता है। इसके अलावा यह काँच, चमकदार वस्तु तथा इनेमल के निर्माण में भी प्रयुक्त होता है।

कार्बन :- प्रकृति में यह मुक्त और संयुक्त दोनो अवस्थाओ में मिलता है। स्वतंत्र अवस्था में यह हीरा तथा ग्रेफाइट के रूप में मिलता है। संयुक्त अवस्था में यह निम्न खनिजों के रूप में उपलब्ध हैं।

  1.  प्राकृतिक आइड्रोकार्बन- मार्श गैस, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि।
  2. कार्बोनेट खनिज- डोलोमाइट, संगमरमर, चूना पत्थर आदि।
  3.  वातावरण में कार्बन डाॅइआक्साइड के रूप में।

कार्बन के अपरूप (Allotropic forms of carbon) क्रिस्टलीय अपरूप :- हीरा, गे्रफाइट, आक्रिस्टलीय अपरूप- आक्रिस्टलीय कार्बन के विभिन्न रूप हैं जैसे- कोयला, कोक, चारकोल या काष्ठ चारकोल, अस्थि भस्म या प्राणि-चारकोल, लैम्प कालिख, कार्बन ब्लैक, गैस कार्बन तथा पैट्रोलियम कोक।

हीरो तथा ग्राफाइट में अन्तर

हीरा                                                             ग्रेफाइट
यह देखने में पारदर्शक होता है।                       यह काला होता है।
यह अत्यंत कठोर होता है।                              यह मुलायम होता है।
यह विद्युत का कुचालक होता है                     यह विद्युत का सुचालक होता है।
इसका अपवर्तनांक अत्यंत उच्च होता है             इसका अपर्वतनांक कम होता है।

कार्बन के आक्साइड( Carbon Oxide)

कार्बन के आक्साइड

1. कार्बन मोनो आक्साइड (CO) :- यह रंगहीन तीव्र गंध से युक्त गैस है। यह गैस ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों में, जलती हुई भट्टी में, मोटर गाड़ी एवं तम्बाकू के धुएं में पाई जाती है। यह एक अति विषैली गैस है। श्वास लेने पर यह रक्त के हीमोग्लोबिन से संयुक्त होकर कार्बोक्सी हीमोग्लोबिन नामक यौगिक बनाती है। इसके बन जाने पर रक्त आॅक्सीजन को ग्रहण करने में असमर्थ हो जाता है। अतः एक प्रकार की घुटन का अनुभव होता हे। यदि अधिक मात्रा में इसे ग्रहण कर लिया जाये तो पहले झपकी सी आने लगती है, फिर बेहोशी आती है और अंत में मृत्यु हो जाती है। यह वाटरगैस (CO+H2) तथा प्रोड्यूसर गैस (CO+N2) के रूप में ईंधन के समान प्रयुक्त होती है। इसका उपयोग मेथेनाॅल, कृतिम पेट्रोल तथा फाॅस्जीन के निर्माण में भी होता है।

2. कार्बन डाई आक्साइड (CO2) :- यह गुफाओं तथा खानों में पाई जाती है तथा यह ज्वालमुखियों से निष्कासित होती है। यह एक तीव्र दुर्गन्ध युक्त रंगहीन गैस है। यह वायु से 1.5 गुना भारी है तथा जल के समान नीचे उड़ेली जा सकती है। इसे दाब 50-60 वायुमण्डल के अन्तर्गत आसानी से द्रवित किया जा सकता है तथा ठोस भी बनाया जा सकता है। ठोस कार्बन डाई आॅक्साइड तकनीकी रूप से शुष्क बर्फ कहलाती है। क्योंकि यह बिना द्रवित हुए वाष्पित ऊध्र्वापातित हो जाती है। यह – 78° पर ऊध्र्वापाति होती है। ठोसCO2 ड्राईआइस के व्यापारिक नाम से प्रशीतन में प्रयुक्त होती है। ठोस CO2 त्वचा पर जलन उत्पन्न करती है। इसलिए इसे सावधानी से प्रयुक्त करना चाहिए। यद्यपि CO2 प्रकृति में विषैली नहीं है, फिर भी यह जीवन के अनुकूल नहीं होती तथा जंतु आॅक्सीजन की कमी से मर जाते हैं।

सिलिकाॅन (Silicon)

कांच (Glass) :- काँच धात्विक सिलिकेटों जिनमें क्षार धातु के सिलिकेट होना आवश्यक है, का आक्रिस्टलीय पारदर्शक या अल्पपारदर्शक मिश्रण है। कांच एक अक्रिस्टलीय, कठोर भंगुर, पारदर्शक, अनिश्चित श्यानता का अति प्रशीतित द्रव है। यह एक वास्तविक ठोस (जैसा कि प्रतीत होता है) नहीं है, यह अन्य सिलिकेटो के मिश्रण में सिलिका का विलयन है, जो ठण्डा करने पर क्रिस्टलीय नहीं होता। कांच को निम्न सामान्य सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जाता है-

                                  xM2O,yM¹O,6SiO2

यहां M क्षार धातु जैसे Na या द्विसंयोजक K,M¹- द्विसंयोजक धातु जैसे Pb या Ca,x और y अणुओं की संख्या।

काँच की किस्में :- सोडा, मृदु (soft) सोडा लाइम य साधारण कांच- यह सोडियम तथा कैल्शियम सिलिकेटों का मिश्रण है।

2-पोटाष काठोर या पोटाॅष लाइम काॅच :- यह पोटैशियम सिलिकेटों का मिश्रण है।

3-लैड, फ्लिंट या लेड पोटष काॅच :- यह लैड तथा पौटैशियम सिलिकेटों का मिश्रण है। इसका उच्च अपवर्तनांक होता है, इसलिए प्रिज्म, लेन्स तथा अन्य तथा अन्य प्रकाशिक यंत्र बनाने में प्रयुक्त होता है।

4- क्रुक्स काँच :- यह सीरियम आॅक्साइड से युक्त विशेष प्रकार का प्राकृतिक काॅच है जो आंखों के लिए हानिकारक अल्ट्रावायलेट (UV) किरणों को रोकता है।

5- सिलिका या क्वार्टज काँच :- यह शुद्ध सिलिका से प्राप्त होता है। इसका प्रसार गुणांक निम्न होता है तथा जब इसे लाल तप्त करके जल में डुबोया जाता है तो यह टूटता नहीं है।

6- नाइट्रोजन (N2) :- वायु मुक्त नाइट्रोजन का सबसे अधिक प्राप्य स्रोत है। नाइट्रोजन जीवों तथा पौधों में पाये जाने वाले सभी प्रोटीनों का अवयव, है। नाइट्रोजन वायु में आॅक्सीजन की क्रिया को तनु करने का कार्य करती है तथा इसके दहन की दर बहुत कम होती है।

नाइट्रस आक्साइड (N2O) :- यह तीव्र दुर्गन्ध युक्त, रंगहीन, उदासीन गैस हैं। यह वायु से भारी है, ठण्डे जल में अत्यधिक विलेय है परंतु गर्म जल में नहीं। यह प्राकृत मे विषैली है। जब इसे औसत मात्रा में सूंघ जाता है तो यह पागलों जैसी हंसी उत्पन्न करती है, इसलिए इसे हास्य गैस (Laughing gas)भी कहते हैं।

नाइट्रिक अम्ल (4HNO3) :- त्वचा पर इसकी संक्षरण क्रिया तीव्र होती है। सांद्रित CO3 लोहे को निष्क्रिय कर देता है। नाइट्रिक अम्ल का प्रयोग विस्फोटक (टी0एन0टी0 नाइट्रोग्लिसरीन, डायनामाइट तथा गन काॅटन), उर्वरकों जैसे कैल्शियम तथा अमोनियम  नाइट्रेट, कृत्रिम रेशम रंग, इत्र तथा औषधियों के निर्माण मे तथा चाँदी एवं स्वर्ण के शोधन में होता है।

मोनिया (NH3) :- यह एक विशेष तीव्र गंध वाली रंगहीन गैस है। यह आॅखों में आंसू ला देती है। यह वायु से हल्की होती है तथा जल में अत्यंत विलेय है। द्रव अमोनिया प्रशीतन में प्रयुक्त होती है। यह ड्राइक्लीनिंग में ग्रीस हटाने के लिए शोधक के रूप में कृत्रिम सिल्क के निर्माण में प्रयुक्त होती है।

आक्सीजन (O2) :- यह रंगहीन, गंधहीन तथा जल में अल्प विलेय स्वादहीन गैस है। यह ज्वलनशील नहीं है परन्तु दहन क्रिया के लिये आवश्यक है। आॅक्सीजन को CO2 या हीलियम के साथ मिश्रण करके कृत्रिम श्वसन के लिए प्रयुक्त किया जाता है। द्रव आक्सीजन को सूक्ष्म विभाजित कार्बन के साथ मिलाकर कोयले की खानों मे डाॅयनामाइट के प्रतिस्थायी के रूप मे प्रयुक्त किया जाता है। द्रव आॅक्सीजन राकेटों के ईधनों का एक महत्वपूर्ण अवयव है।

ओजोन (O3) :- यह मछली जैसी विशिष्ट गंध युक्त पीली-नीली गैस है। यह एक विषैली गैस है। श्वास वायु में 100 PPM से अधिक ओजोन सिर दर्द तथा श्वास समस्या उत्पन्न करती है। शरीर ऊतकों पर इसकी विनाशकारी क्रिया होती है तथा के विस्फोटक होने के कारण यह एक खतरनाक गैस है। इसका उपयोग अधिकांशतः जल के जीवाणु शोधक के रूप में तथा सिनेमा हाल, भूमिगत सुरंगों आदि के समान भीड़युक्त स्थानों के वातावरण के संशोधन के लिए किया जाता है।

नोट :-

  1.  नाइट्रोजन की खोज डेनियल रदरफोर्ड ने तथा अमोनिया की खोज हैबर ने की थी।
  2.  आॅक्सीजन की खोज प्रीस्टले ने तथा फास्फोरस की खोज ब्रांड ने की थी।
  3.  क्लोरीन की खोज शीले ने तथा ओजोन की खोज स्कोनबेन ने की थी।
  4.  रसायनों का राज कहा जाता है – सल्फ्यूरिक अम्ल को।
  5.  सर्वाधिक विघुत ऋणात्मक तत्व है – फ्लोरीन।
  6.  सर्वाधिक  विघुत धनात्मक तत्व है – फ्रैंसियम।
  7.  प्लास्टर आॅफ पेरिस बनाया जाता है – जिप्सम से।
  8.  मानव निर्मित प्रथम तत्व है – पोलोनियम।
  9.  सबसे हल्की धातु लीथियम है तथा भारी धातु – ओसमियम।
  10.  मतदाताओं की उंगलियों पर लगाई जाने वाली स्याही बनती है – सिल्वर नाइट्रेट (AgNO3) से।
  11.  शोरो पोटैशियम नाइट्रेट होता है। शोरे का अम्ल है – नाइट्रिक अम्ल।
  12. लाल दवा कहते हैं – पोटैशियम परमैगनेट को
  13.  गैस द्रव्य की वह अवस्था है जिसका आयतन तथा आकार दोनों अनिश्चित होते हैं। गैस जिस बर्तन में भरी जाती है, वही उसका आकार हो जाती है।
  14.  गैसीय अवस्था में पदार्थ के अणुओं के मध्य दूरी अधिकतम होती है। गैसीय अवस्था में पदार्थ के अणु अनियमित रूप से गति करते हैं। ऐसी स्थिति में इनका आयतन एवं आकार दोनों अनिश्चित होता है।
  15.  जिस ताप पर द्रव का वाष्प दाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर हो जाता है, उसे क्ववथनांक कहते हैं। इस ताप पर कोई भी द्रव उबलने लगता है।

कार्बनिक रसायन (Organic Chemistry)

कार्बनिक रसायन (Organic Chemistry)

कार्बनिक रसायन
(Organic Chemistry)

यह रसायन विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत कार्बन के यौगिकों का अध्ययन किया जाता है। कार्बनिक यौगिकों के बिना जीवन की संभावना नहीं है। अंतुओं और वनस्पतियों के निर्माण में कार्बनिक यौगिक ही प्रमुख हैं। कार्बनिक यौगिकों के कुछ अति प्रमुख उपयोग निम्न है-

1. हमारा भोजन :- सभी भोज्य पदार्थ प्रायः कार्बनिक यौगिकों से निर्मित हैं जैसे- चावल, आटा, चीनी, प्रोटीन विटामिन आदि सभी कार्बनिक पदार्थ हैं।

2. हमारे दैनिक उपयोग के पदार्थ :- हमारे सूती कपड़े सेलुलोज के बने हैं। नायलोन, टेरीलीन, रेयाॅन आदि के कपड़े संश्लेषित कार्बनिक यौगिकों से निर्मित हैं। पेन, स्याही, जूते आदि कार्बनिक यौगिक ही से बने हैं। साबुन, बेसलीन क्रीम लकड़ी, कोयला, घरेलू गैस, मिट्टी का तेल आदि कार्बनिक यौगिक ही हैं।

3. औषधियाॅ :- निश्चेतक पदार्थ क्लोरोफार्म स्ट्रेप्टोमाइसिन, ऐस्पिरिन, पेनसिलिन आदि कार्बनिक यौगिक ही हैं। कीटाणुनाशक जैसे- डी0डी0 टी, गेमेक्सीन, बी0 एच0 सी0 आदि कार्बनिक यौगिक हैं।

4. यातायात :- पेट्रोल, तेल रबर, टायर आदि कार्बनिक पदार्थ हैं।

5. प्रसाधन तथा विलास सामग्री :- क्रीम, पेन्ट, साबुन, तेल फोटो फिल्म तथा प्लास्टिक के खिलौने आदि कार्बनिक यौगिक हैं।

6. विस्फोटक पदार्थ :- डायनामाइट, नाइट्रोग्लिसिरीन, टी0एन0टी0 आदि कार्बनिक यौगिक हैं।

प्रमुख हाइड्रो कार्बनों के उपयोगः-

एथिलीन अथवा इथेन (C2H4) :- यह मुख्य रूप से प्राकृतिक गैसों, कोल गैस तथा पैट्रोलियम के साथ निकलने वाली गैसों, में पाई जाती है। यह हल्की मीठी गंध वाली गैस है। इस गैस को अधिक सूंघने से मुर्छा आ जाती है। इसका उपयोग प्लास्टिक उद्योग में, मस्टर्ड गैस बनाने में, निश्चेतक के रूप में, हरे फलों को पकाने में तथा उनके संरक्षण में होता है

एसीटिलीन अथवा एथाइन (C2H2) :- यह अत्याधिक अभिक्रियाशील गैस है। आर्सीन तथा फाॅस्फीन मिली होने के कारण इसकी गंध लहसुन जैसी होती है। इसका उपयोग ईधन तथा प्रकाश के रूप में कृत्रिम रबर (निओप्रीन) बनाने में, विषैली गैस ल्यूसाइट बनाने में, जो प्रथम विश्वयुद्ध में प्रयुक्त हुई थी, होता है। इसके अतिरिक्त आॅक्सी-एसटिलीन ज्वाला बनाने में, जो धातुओं के जोड़ने तथा काटने में प्रयुक्त होती है, फलों को पकाने में भी इसका उपयोग होता है।

पेट्रोलियम :- पेट्रोलियम एक विशेष गंध युक्त भूरे काले रंग का गाढ़ा तेल होता है। यह पृथ्वी के भीतर चट्टानों के नीचे पाया जाता है यह एक प्राकृतिक ईधन है। प्राकृतिक रूप में इसे कच्चा तेल या अपरिपक्व तेल भी कहते हैं। पृथ्वी के नीचे पाये जाने के कारण इसे खनिज तेल भी कहते हैं। अपरिष्कृत पेट्रोलियम का इसी रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। अतः इसके निरंतर प्रभाजी आसवन द्वारा औद्योगिक उपयोग के विभिन्न प्रभाज प्राप्त किये जाते हैं। यह प्रक्रिया परिष्करण कहलाती है। प्रभाजी आसवन संप्राप्त प्रभाज निम्न हैं। ऐस्फाल्ट (डामर), पैराफिन मोम, स्नेहक तेल, ईधन तेल, डीजल, केरोसिन (मिट्टी का तेल), पैट्रोलियम गैस।

प्राकृतिक गैस :- यह मुख्यतः मेथेन (C2H4) होती है। (95%) इसमें मेथेन के साथ थोड़ी मात्रा में एथेन और प्रोपेन भी रहती है। प्रकृतिक गैस एक अच्छा ईंधन है। यह धुआॅ रहित ज्वाला के साथ जलती है जिससे प्रदूषण नहीं होता । इसके जलने पर कोई विषैली गैस नहीं बनती है।

द्रवित प्रेट्रोलियम गैस :- यह मेथेन (C2H6) प्रोपेन, (C2H8) तथा ब्यूटेन (C4H6) का मिश्रण है। लेकिन इसका मुख्य अवयव ब्यूटेन तथा आइसो ब्यूटेन है। इसका ऊष्मीय मूल्य काफी उच्च होता है। इसलिए यह एक अच्छा ईधन है, यह धुआॅ रहित ज्वालों के साथ जलती है, तथा जलने पर इससे कोई विषैली गैस उत्पन्न नहीं होती। गैस के सिलिण्डर में गैस रिसाव का पता लगाने के लिए एक तीक्ष्ण गंध वाला पदाथ एथिल मर्केप्टन मिला देते हैं। इसमें हाइड्रोजन सल्फाइड के समान गंध होती है जिसे आसानी से पहचाना जा सकता है। एल0पी0जी0 का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए क्योंकि गैस के अचानक रिसने से विस्फोट हो सकता है, क्योंकि एल0पी0जी0 वायु से मिलकर विस्फोटक मिश्रण बनाती है।

कोल गैस :- 54% हाईड्रोजन, 35% मीथेन 11% कार्बन मोनो आॅक्साइड 5% हाइड्रोजन एवं 3% कार्बन डाइ आॅक्साइड आदि गैसों का मिश्रण है। कोल गैस कोयले के भंजक आसवन द्वारा बनाई जाती है। यह वायु के साथविस्फोट मिश्रण बनाती है।

प्रोड्यूसर गैस :- यह मुख्यतः नाइट्रोजन व कार्बन मोनो आॅक्साइड गैसों का मिश्रण है। इसमें 60% नाइट्रोजन, 30% कार्बन मोनो आॅक्साइड व मीथेन गैस होती है। इसका उपयोग ईधन कांच व इस्पात बनाने में किया जाता है।

वाटर गैस :- यह कार्बन मोनो आॅक्साइड (CO) व हाइड्रोजन (H2) गैसों का मिश्रण होती है। इससे बहुत अधिक ऊष्मा निकलती है। इसका प्रयोग अपचायक के रूप में ऐल्कोहल हाइड्रोजन आदि के आद्यौगिक में होता है।

गैसोलीन गैस :- इससे हेक्सेन्स, हेप्टेन्स तथा आॅक्टेन्स होते हैं। इसे पैट्रोल भी कहा जाता है। कार के उपयोग में लाये जाने वाले पैट्रोल की गुणवत्ता को उसके एण्टी नोक गुण द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। पैट्रोल सेम्पुल में एण्टीनाॅक गुणों को उसके आक्टेन नंबर वैल्यू द्वारा ज्ञात किया जाता है। किसी पेट्रोल सेंपल का आॅक्टेन नम्बर जितना अधिक होता है उसका एन्टीनाॅकिंग गुण उतना ही अधिक उपयोगी होगा। आॅक्टेन नंबर का सबसे अधिक मान 100 होता है। आॅक्टेन नंबर बढ़ाने के लिए पेट्रोल में टेट्रा एथइल लैड मिलाया जाता है।

ईधनों के ऊष्मीय मान :- किसी ईधन का ऊष्मीय मान इस कथन का मापक है, कि ईधन कितना उपयोगी है। जिस ईधन का ऊष्मीय मान अधिक होता है वह उतना ही अच्छा और उपयोगी होता है।

ईधन                                        ऊश्मीय मान
लकड़ी                                 17 किलो जूल प्रति ग्राम
कोयला                                25-33 किलो जूल प्रति ग्राम
चारकोल                              33 किलो जूल प्रति ग्राम
गोबर के उपले                      6-8 किलो जूल प्रति ग्राम
कैरोसिन                              48 किलो जूल प्रति ग्राम
ऐल्कोहल                             30 किलो जूल प्रति ग्राम
बायोगैस                               35-40 किलो जूल प्रति ग्राम
मिथेन                                  55 किलो जूल प्रति ग्राम
एल0पी0जी0                        55 किलो जूल प्रति ग्राम
हाइड्रोजन                            150 किो जूल प्रति ग्राम

मेथिल ऐल्कोहल :- यह बहुत विषैला होता है, इसको पीने से व्यक्ति अंधा या पागल हो सकता है, और अधिक पीने से मृत्यु हो जाती है। इसका उपयोग मेथिलित स्पिरिट बनाने में होता है। मेथिल ऐल्कोहल युक्त एथिल ऐल्कोहल मेथिलित या विकृत स्प्रिट कहलाता है। मेथिल ऐल्कोहल और जल का मिश्रण आटोमोबाइल में रेडियेटर के लिए ऐन्टीफ्रीज के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

एथिल ऐल्कोहल या एथेनाॅल :- यह फलों, वनस्पतियों और सुंगधित तेलों में पाया जाता है। यह सभी प्रकार की शराब का मुख्य अवयव है। अतः इसे स्पिरिट आॅफ वाइन भी कहते हैं। 100% एथिल ऐल्कोहल निर्जल एथिल एल्कोहल परिशुद्ध ऐल्कोहल कहलाता है।

95.5% एथिल एल्कोहल और 4.4% जल का मिश्रण परिशोधित स्प्रिट कहलाता है।

पेट्रोल, औद्योगिक ऐल्कोहल परिशोधित स्प्रिट और बेंजीन का मिश्रण पावर ऐल्कोहल कहलाता है। इसका उपयोग मोटर ईधन में होता है।

फार्मिक अम्ल (मेथेनोइक अम्ल) यह लाल चीटियों में तथा मघुमक्खी, बर्रे, बिच्छू आदि डंक में तथा कुछ अन्य जीवों मे पाया जाता है। चींटी, मुधुमक्खी या बर्रे आदि के काटने या टंक कारने पर शरीर में खुजली, जलन व चिड़चिडापन फार्मिक अम्ल के कारण होता है।

प्रमुख विस्फोटक पदार्थ :- विस्फोटक वे पदार्थ हैं जो ताप बढ़ाने या थोड़ी चोट या झटका लगने से अपने विभिन्न अवयवों में प्रचण्ड विस्फोटक के साथ तीव्र अभिक्रिया करके गैसीय उत्पाद बनाते हैं।

ट्राइनाइट्रो टाॅइलूईन (TNT) :- इसका पूरा नाम 2, 4, 6 टाई नाइट्रो टालूईन है। यह बम तथा हथगोलों को भरने में काम आता है।

ट्राइ नाइट्रोग्लिसरीन टाॅइलूईन (TNG) :- यह एक रंगहीन तैलीय द्रव है। यह संद्र सल्फ्युरिक अम्ल सांद्र नाइट्रिक अम्ल की ग्लिसरीन के साथ क्रिया करके बनाया जाता है। इसे नोबल का तेल कहते हैं क्योंकि इसका अविष्कार ऐल्फ्रेड नोबेल ने किया था। यह डायनामाइट बनाने के काम आता है। धुआॅ रहित चूर्ण बनाने में भी इसका उपयोग होता है।

आर0डी0एक्स0 (RDX)- इस विस्फोटक को अमेरिका में साइक्लोनाइट जर्मनी में होक्सान तथा इटली में टी- 4 के नाम से जाना जाता है। इसमें प्लास्टिक पदार्थ जैसे पाॅली ब्यूटाइन, एक्रिलिक अम्ल या पाॅनीयूरेथेन को मिलाकर प्लास्टिक बान्डेड एक्पलोसिव बनाया जाता है। यह एक प्रचंड विस्फोटक है।

डायनामाइट :- इसकी खोज 1867 में ऐल्फ्रेड नोबेल ने की। इसका मुख्य अवयव नाइट्रोग्लिसरीन है। यह चट्टानों व खानों को उड़ाने के काम में आता है।

गन काॅटन :- रूई अथवा लकड़ी के रेशों पर सांद्र नाइट्रिक अम्ल की अभिक्रिया से गन काॅटन अथवा नाइट्रोलोस प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग पहाड़ों को तोड़ने तथा युद्ध में किया जाता है।

पिक्रिक एसिड :- यह TNT से अधिक विस्फोटक होता है। इसका प्रयोग बमों आदि में होता है।

साबुन तथा डिटर्जेंट (अपमार्जक) :- उच्च वसीय अम्लों के सोडियम तथा पोटेशियम लवण साबुन कहलाते हैं। कपड़ा धोने का साबुन घटिया किस्म के तेल या वसा से बनाये जाते हैं, जबकि नहाने के साबुन के लिए उच्च कोटि की वसा का प्रयोग होता है। कपड़ा धोने का साबुन प्रायः कठोर होता है क्योंकि इसे कास्टिक सोडा, से बनाते हैं। नहाने का साबुन मृदु होता है क्योंकि इसे कास्टिक पोटाश से बनाते हैं।

अपमार्जक :- अपमार्जक एक विशेष प्रकार के कार्बनिक पदार्थ हैं जिनमें साबुन की तरह मैल साफ करने का गुण होता है। साबुन का उपयोग केवल मृदु जल में किया जाता है, कठोर जल में नहीं, परंतु इसके विपरीत अपमार्जक मृदु तथा कठोर दोनों प्रकार के जल में उपयोग किये जा सकते हैं। अपमार्जक कठोर जल में उपस्थित कैल्शियम और मैग्नीशियम आयनों के साथ जल में अविलेय लवण नहीं बनाते अर्थात् अवक्षेप नहीं देते हैं। अपमार्जक का जलीय विलयन उदासीन होता है, अतः अपमार्जक बिना किसी हानि के कोमल रेशों से बने वस्त्रों को साफ करने में प्रयुक्त किये जा सकते हैं। साबुन का विलयन जल-अपघटन के कारण क्षारीय होता है, जो कोमल वस्त्रों को धोने के लिए हानिकारक है।

प्लास्टिक :- वह प्रक्रिया जिसमें एक ही प्रकार के एक से अधिक गुण आपस में जुड़कर कोई अधिक अणुभार वाला बड़ा अणु बनाते है, बहुलीकरण कहलाती है। बहुली करण में भाग लेने वाले अणुओं को एकलक और उत्पाद को बहुलक कहते हैं। बहुत से असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जैसे- एथिलीन, प्रोपलीन आदि बहुलीकरण की क्रिया के पश्चात् जो उच्च बहुलक बनाते हैं, प्लास्टिक कहते हैं।

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