कोशिका विज्ञान (CYTOLOGY)

कोशिका विज्ञान

कोशिका विज्ञान (CYTOLOGY)

जीवों का शरीर एक या अनेक सूक्ष्म एवं कलायुक्त पृथक इकाइयों के रूप में होता है जिन्हें कोशिकाएं Cells कहते हैं। प्रत्येक कोशिका जीवन की एक स्वायत्त इकाई होती है। ‘राबर्टहुक’ ने सबसे पहले मृत पादप ऊतक (कार्क) में कोशिकाएॅ देखी और इन्हें Cells की संज्ञा दी। रार्बट हुक ने माइक्रोग्राफिया नामक पुस्तक लिखी। अनेक कोशिकाएॅ एक कोशिकीय जीवों के रूप में स्वतंन्त्र जीवन व्यतीत करती हैं, जबकि बहुकोशिकीय जीवों में कोशिकाएॅ शरीर की संरचना एवं क्रियात्मक इकाइायों का काम करती हैं। अधिकांश बहुकोशिकीय जीव शरीरों में स्वयं कोशिकाएॅ भी सुव्यवस्थित ऊतकों अंगों एवं अंग तन्त्रों में संगठित होती हैं। एन्टोनी वाल ल्यूवेन हाॅक सर्व प्रथम जीवित कोशिका देखी। इसके बाद जर्मन वैज्ञानिक श्लाइडेन एवं श्वान ने कोशिकावाद का प्रतिपादन किया।

कोशिकाओं को उनकी रचना के आधार पर दो भागों में बाॅटा गया है- (1) प्रोकैरियोटिक कोशिकाएॅ एवं यूकैरियोटिक कोशिकाएॅ। प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में वास्तविक केन्द्रक का आभाव, प्लास्टिक (Plastics) माइट्रोकान्ड्रिया गाल्गी उपकरण, अन्तः प्रद्रव्यी जालिकाएं अनुपस्थित होती हैं। इसके विपरीत यूकैरियोटिक कोशिकाओं में वास्तविक केन्द्रक उपस्थित होते हैं। मनुष्य की तंन्त्रिका कोशिकाएँ सबसे लम्बी (3 से 3.5 फिट) कोशिका तथा पौधों में रैमी की कोशिकाएॅ सबसे लम्बी हैं। माइकोप्लाज्मा सबसे छोटी कोशिका (व्यास 0.1 से 0.3 मिमी0) तथा डाइलिस्टर न्यूमोसिटीन्स सबसे कम लम्बाई (0.15 से 0.3मिमी0) की कोशिका होती है। कोशिका की संरचना का अध्ययन करने पर हमें निम्न भाग दिखायी पड़तें हैं

1. कोशिका भित्ति Cell Wall :-

प्राथमिक द्वितीयक तथा तृतीयक परतों से कोशिका भित्ति बनी होती है। प्राथिमिक कोशिका भित्ति सेल्यूलोज, हेमी सेल्युलोज, प्रोटीन लिपिड तथा कैल्यियम एवं मैग्नीशियम के कार्बोनेट से मिलकर बनी होती है। द्वितीयक भित्ति सबसे अधिक मोटी होती है तथा इनकी भित्तियों पर लिग्निन नामक पदार्थ का निक्षेपण रहता है। तृतीयक कोशिका भित्ति सूखे हुए जीवद्रव्य से बनी होती है। इन्हीं भित्तियों मे प्लाज्माडेस्मेटा नामक छिद्र पाये जाते हैं जो दो कोशिकाओं के बीच जीवद्रव्य के प्रवाह को बनाये रखते हैं। जन्तु कोशिकाओं में कोशिका भित्ति का तो अभाव होता है लिकिन कोशिका झिल्ली (Cell Membrane) पायी जाती है।

2. अन्त प्रद्रव्यी जालिका Endoplosmic Reticulam  :-

सिस्टर्नी (Eusterbae) पुटिका (Vesicles) एवं नालिकाओं से बनी एक रचना है। इसका एक सिरा केन्द्रक कला तथा दूसरा सिरा कोशिका कला से जुड़ा होता है। यह दो प्रकार की रूक्ष एवं चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका होती है। यह दो प्रकार की रूक्ष एवं चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका होती है। रूक्ष अतः प्रद्रव्यी जालिका के सतह पर राइबोसोम्स पाये जाते हैं और ये प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेते हैं। चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के सतह पर राइबोसाम्स तो अनुपस्थित होते है, लेकिन ये स्टीरायड का निर्माण करते हैं।

3. लवक Plastids :-

केवल पादप कोशिकाओं में पाये जाते है, रंग के आधार पर ये तीन प्रकार के हैं- (1) हरित लवक (Chloroplast) (2) वर्णी लवक (Chromoplast) तथा (3) आवर्णी लवक (Leucoplast) ये आपस में एक दूसरे में रूपान्तरित भी होते हैं। हरित लवक प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए जिम्मेदार होते हैं।

4. माइटोकान्ड्रिया Mitochondria :-

स्तनधारी प्राणियों की लाल रूधिर कणिकाओं R.B.Cके अतिरिक्त सभी जीवित कोशिकाओं में पाया जाता है। इसकी खोज सर्वप्रथम कोलिकर नामक वैज्ञानिक ने कीटों की पेशियों में किया था तथा बन्डा नामक वैज्ञानिक ने यह नाम दिया माइटोकाड्रिया में आॅक्सीकरण, अपचयन तथा फास्फेटीकरण की क्रियाओं के फलस्वरूप कोशिका के लिए आवश्यक ऊर्जा ।A.T.P के रूप में बनती है। इसी कारण माइट्रोकान्ड्रिया को कोशिका ऊर्जा घर Power House  कहते हैं।

5. गाल्गी उपकरण Galgi Apparatus :-.

इसकी खोज कैमिलो गाल्गी द्वारा किये जाने के कारण इसका नाम गाल्गी उपकरण पड़ा। इसे बहुरूपीय भी कहा जाता है, क्योंकि आवश्यकतानुसार इसका रूप बदलता रहता है। यह कोशिका भित्ति निर्माण के लिए आवश्यक पेक्टिन तथा कुछ कार्बोहाइड्रेट  का संश्लेषण करता है व लयनकाय तथा स्त्रवण पुटिकाओं का निर्माण होता है।

6. लाइसोसोम्स या लयनकाय :-

एक रसधानी के समान रचना होती है जिसमें जल अपघटनी एन्जाइम भरे होते हैं। जो कोशिका के सभी पदार्थों का पाचन करते हैं। कोशिका में इसकी उपस्थिति का पता सर्वप्रथम सी0डी0डुवे C.D Duve ने लगाया। सामान्यतया लाइसोसोम्स संचयित पदार्थों वसा, ग्लाइकोजन, प्रोटीन आदि का पाचन कर कोशिका को ऊर्जा प्रदान करते है, परन्तु कभी-कभी ये फटकर समस्त कोशिका को नष्ट कर देते हैं। इसीलिए इसे आत्महत्या की थॅली भी कहते हैं।

7. राइबोसोम Ribosomes :-

कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करते हैं, अतः इन्हें प्रोटीन निर्माण की फैक्ट्री कहा जाता है। इसे सर्वप्रथम क्लाॅडी ने प्रोटोप्लाज्मा में देखा।

8. पराक्सिसोम Peroxisomes :-

अनेक कोशिकाओं (पौधों तथा तन्तु) में पाये जाते हैं। पौधों में ये प्रकाश श्वसन तथा जन्तुओं की यकृत कोशिकाओं में विषालु हाइड्रोजन पराक्साइड को कैटेलोज एन्जाइम द्वारा तोड़ने का और एकत्रित होने से रोकने का काम करते हैं। इसके अतिरिक्त जन्तु कोशिकाओं में ये वसा उपापचय में भी भाग लेते हैं।

9. स्फेरोसोम Sphacrosomes :-

सूक्ष्म गोलाकार पुटकाएॅ होती हैं। इन पुटिकाओं में वसा तथा तेल का संश्लेषण करने वाले एन्जाइम होते हैं।

10. ग्लाइआक्सिसोम Glyoxysomes :

न्यूरोस्पोरा तथा योस्ट जैसे कवकों की कोशिकाओं में पाये जाते हैं तथा वसा युक्त पौधों के बीजों में पाये जाते हैं। ये वसा अम्ल के अपापचय तथा ग्लूकोज का वसा से पुर्नउत्पादन करते हैं।

11. सेन्ट्रोसोम अथवा तारक काय centrosmes :-

ये प्रोकैरियोट, डायटम, यीस्ट, शंकुवृक्ष तथा आवृत्तबीजी पौधों की कोशिकाओं के अतिरिक्त सभी पौधों तथा प्रोटाजोआ में पाये जाते हैं तथा कोशिका विभाजन के समय तर्कु तन्तु Spindle Fibreका निर्माण करते हैं।

12. केन्द्रक :-

इसे कोशिका का नियन्त्रक कक्ष भी कहते हैं राबर्ट ब्राउन ने कोशिकाओं में केन्द्रक की उत्पत्ति का पता लगाया। यह कोशिका तथा जीवों के आनुवांशिक लक्षणों पर नियन्त्रक रखता है। संरचना मे केन्द्रक केन्द्रक कला अथवा कैरियोथीका द्वारा घिरा रहता है जिसके अन्दर केन्द्रिका केन्द्रक द्रव्य तथा क्रोमैटिन धागे पाये जाते हैं। केन्द्रिका मुख्य रूप से राइबोन्युक्लिक अम्ल आर एन ए के संश्लेषण तथा राइबोसोम बनाने में भाग लेती है केन्द्रक द्रव्य पारदर्शक, कणिकामय तथा कुछ अम्लरागी पदार्थों से बना होता है। इसके मुख्य अवयवों में न्युक्लिक अम्ल आर एन ए तथा डी एन ए प्रोटीन (न्यूक्लिआॅहिस्टोन) एन्जाइम, लिपिड तथा खनिज पदार्थों के रूप में फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम आदि पाये जाते हैं। डी एन ए तथा आर एन ए को सम्मिलित रूप से न्युक्लिक अम्ल भी कहते हैं। इसकी खोज फ्रेडरिक मिशर ने किया था। न्यूक्लिक अम्ल न्यूक्लियोटाइड के अनेकअणुओं  से मिलकर बना होता है। ये नाइट्रोजनी क्षार प्यूरिन अथवा पिरीमिडीन्स हो सकते हैं। न्यूक्लियोटाइड में से शर्करा को निकाल देने पर इसे न्यूक्लियोसाइड कहते है। क्रोमोसोम की खोज स्ट्रासबर्गर ने की थी।

नोट – कार्क की काट मे कोशिका की खोज करने वाले वैज्ञानिक राबर्ट हुक।

  •  जीवद्रव्य जीवन का भौतिक आधार है इस मत को देने वाले- हाक्सले।
  • मानव शरीर का अध्ययन सर्वप्रथम किया – एन्ड्रियास वैसालियस ने।
  •  सबसे छोटी कोशिका- माइकोप्लाज्मा या (P.P.L.O)
  •  सबसे बड़ी कोशिका – शुतुरमुर्ग का अण्डा।
  •  कोशिका की आत्महत्या की थैली कहा जाता है – लाइसोसोम
  • ग्लूकोज का आॅक्सीकरण होता है – माइटोकान्ड्रिया में।
  •  टमाटर का लाल रंग किस वर्णीलवक के कारण होता है- लाइकोपीन।
  •  जीवित कोशिका की खोज- लुवेन हाॅक
  •  पर्णहरिम का मुख्य कार्य है- प्रकाश संश्लेषण।
  • ऊर्जा दलाल या ऊर्जा सिक्का किसे कहते हैं। (A.T.P) को
  •  स्बसे लम्बी कोशिका – मनुष्य की रीढ़ हड्डियों और मस्तिष्क मे पायी जाने वाली कोशिकाएॅ।
  •  सेन्ट्रोसोम का कार्य है- कोशिका विभाजन में सहयोग।
  • प्रोटीन निर्माण की फैक्ट्री कहते हैं। राइबोसोम।

वंशानुगति की विधियाँ (Patterns of inheritance)

वंशानुगति की विधियाँ

वंशानुगति की विधियाँ (Patterns of inheritance)

अनुवांशिक लक्षण -: जीवों के वे सब लक्षण जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं, वंशानुगति या अनुवांशिक लक्षण कहलाते हैं। जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत सजातीय एवं परस्पर सम्बन्धित जीवों की आनुवांशिक समानताओं एवं विभिन्नताओं का तथा इसकी आनुवांशिकता का अध्ययन किया जाता है, अनुवांशिकी कहलाती है। परिभाषिक शब्द के रूप में इसका सर्वप्रथम वेटसन 1905 में किया। जीवों में वंशागति समानता एवं असमानता के बारे में पाइथागोरस एवं अरस्तू आदि को पहले से जानकारी थी लेकिन वशांगति प्रक्रिया का ज्ञान किसी को नहीं था। पादरी ग्रेगर जान मेंण्डल, ने वंशागति के मूल नियम बनाकर आनुवांशिकी की नींव डाली मेण्डल को इसीलिए अनुवांशिकी का पिता कहा जाता है। मेण्डल ने अपने आठ वर्षों के संकरण प्रयोगों के लिए उद्यान मटर-पीजम सैटाइवम को चुना। उन्होने इन प्रयोगों के लिए मटर के विभिन्नताओं तुलनात्मक या दृश्यरूपों वाले निम्नलिखित सात वंश परंपरागत आनुवाशिक लक्षणों का चयन किया।

(1) जीवों में प्रत्येक आनुवांशिक लक्षण का विकास एक ऐसी सूक्ष्म रचना के प्रभाव से होता है जो युग्मकों के जरिये एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में जाती है। लक्षणों की वंशागति के लिए उत्तरदायी इन एकक रचानाओं या कणों को मेण्डल ने एकक कारक कहा।

(2) एक गुण संकरणों द्वारा मेण्डल ने अपने द्वारा छॉटे गये सभी आनुवांशिक लक्षणों के प्रबल एवं अप्रबल रूपों को पता लगाया।

(3) पृथक्करण (segregation) :-  जब अप्रबल लक्षण का कारक प्रबल लक्षण के कारक से प्रथक होता है तो यह अपने लक्षण की अभिव्यक्ति कर देता है।

मेण्डल के प्रथम पृथक्करण के नियम के अनुसार एक आनुवांशिक लक्षण की विभिन्नताएॅ अर्थात् तुलनात्मक रूपों के कारक कितने ही समय के लिए साथ-साथ रहने पर भी अपरिवर्तित शुद्ध बने रहते हैं जिसके फलस्वरूप युग्मकों में जाने वाले कारक सब शुद्ध होते हैं इसलिए पृथक्करण के नियम को बाद में युग्मकों की शुद्धता का नियम कहा गया। कुछ ने इसे संकरों के विलगन का नियम कहा।

कार्ल कोरेन्स ने मेण्डल के दूसरे प्रबलता एवं अप्रबलता के निष्कर्ष को मेण्डल के द्वितीय प्रबलता के नियम के रूप में घोषित किया।
वंषागति का गुणसुत्रीय मत- जीव कोशिकाओं के केन्द्रक में सूत्रनुमा रचनाओं की उपस्थिति की पुष्टि रूसो तथा बाल वियानी ने की। बाल्डेयर ने इसे गुणसूत्र नाम दिया। गुणसूत्र द्विसूत्री समूह है। मनुष्य जाति के गुणसूत्र प्ररूप अर्थात कैरियोटाइप में 46 गुणसूत्र होते है। परन्तु ये 23 जोड़ियों में होते है। 23वीं जोडी के गुणसूत्र असमान होते हैं। इन्हें लिंग गुणसूत्र कहते हैं। शेष 22 जोड़ियों में प्रत्येक जोड़ी के दो गुणसूत्र आकृति एवं रचना में परस्पर समान अर्थात समजात होते है। परन्तु ये अन्य सभी जोड़ियों के गुणसूत्रों से भिन्न होते हैं। युग्मकों में जोड़ीदार गुणसूत्रों का एक-एक ही सदस्य में होता है। अर्थात् इनमें गुणसूत्रों का एक सूत्री समूह होता है जिसमें कि गुणसूत्रों की संख्या देह कोशिकाओं के केन्द्रक में उपस्थिति गुणसूत्रों की संख्या से आधी होती है।

सटन (sutton 1902) :-  ने वंशागति का गुणसूत्रीय मत प्रस्तुत किया। वैज्ञानिकों को जब यह पता चला कि आनुवांशिक लक्षणों की संख्या गुणसूत्रों की संख्या से कहीं अधिक होती है तब वंशागति के गुणसूत्रीय सिद्धान्त की मान्यता समाप्त हो गयी। सटन ने ही बाद में पता लगाया कि मेण्डल के कारक गुणसूत्रों से बहुत छोटे, परन्तु इन्हीं मे स्थित होते हैं। जानसन ने इन कारकों को जीन्स का नाम दिया। ने वंशागति का जीन मत प्रस्तुत किया। इसके बाद वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि प्रत्येक गुणसूत्र में डी0एन0ए0 का केवल एक अत्यधिक लम्बा व गुण्डलित सूत्रनुमा अणु होता है और इसी अणु के छोटे-छोटे खण्ड जीन्स का काम करते है।

लिंग निर्धारण (sex determination)ः-  लैगिंक जनन में सूत्री नर व मादा युग्मक कोशिकाओं के संयुग्मन से द्विसूत्री युग्मनज अर्थात् जाइगोट बनता है। जाइगोट के भ्रूणीय विकास से नई सन्तान का शरीर बनता है। लैंगिक जनन करने वाले जीव दो प्रकार के होते है-(1) द्विलिंगी तथा (2) एकलिंगी। मैंकलांग ने लिंग निर्धारण का गुणसूत्रीवाद सिद्धान्त दिया।

किसी भी जाति विशेष के सारे सदस्यों की सारी शरीर कोशिकाओं में समान गुण सूत्रों का समूह या ढाँचा गुणसूत्र प्ररूप है। प्रत्येक जोड़ी के दो समान गुणसूत्रों को समजात गुणसूत्र कहते हैं। एकलिंगी जीवों मे प्रत्येक सन्तान को प्रत्येक जोड़ी का एक गुणसूत्र अण्डाणु के द्वारा माता से और दूसरा शुक्राणु के द्वारा पिता से प्राप्त होता है।

मानव जाति में 23 जोड़ी गुणसूत्र पाये जाते है। इसमें 22 जोड़ी गुणसूत्री स्त्री पुरूषों में समान होते है। इसीलिए इन्हें स्वजात गुणसूत्री कहते हैं। 23वें जोडे के गुण सूत्र स्त्री-पुरूषों में असमान होते है। इन्हें विषमजात गुणसूत्र अथवा हेटरोसोम्स या एलोसोम्स कहते हैं। सि़़्त्रयों में 23वी जोड़ी के गुणसूत्र ‘गगष् होते है और पूरे गुणसूत्र समूह को 44़गग द्वारा प्रदर्शित करते हैं। पुरूषों में 23वी जोड़ी का गुण सूत्र गल हैं। इनका गुणसूत्र समूह 44़गन द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

स्त्रियों के जनद अण्डाशय होते हैं। इनमें होने वाले युग्मक जनन को अण्डजनन कहते हैं। अंडाणुओं में लिंग गुणसूत्रों की समानता के कारण स्त्रियॉ समयुग्मकों कहलाती हैं। पुरूषों में जन वृषण होते है। इनमें होने वाले युग्मकजनन को शुक्रजनन कहते हैं। शुक्राणुओं में लिंग गुणसूत्रों की भिन्नता के कारण पुरूष विषमयुग्मकी कहलाते हैं।

पुरूष के शुक्राणु वीर्य में पाये जाते हैं सम्भोग के जरिये स्त्री की योनि में पहॅुचने के बाद कोई एक शुक्राणु स्त्री की अण्डवाहिनी में उपस्थित अण्डाणु से मिल जाता है। शुक्राणु का केन्द्रक अण्डाणु के केन्द्रक से मिल जाता है जिससे अण्डाणु में गुणसूत्रों की सामान्य द्विसूत्री संख्या पुनः स्थापित हो जाती है। इस प्रक्रिया को अण्डाणु का निषेचन कहते हैं।

स्तनियों, अधिकांश कीटों एवं उभयचरों, सभी एकलिंगी पादपों तथा कुछ मछलियों के गुणसूत्र में मनुष्यों के समान ही लैंगिक भेद होता है। लेकिन पक्षियों के गुणसूत्र में मनुष्यों के समान ही लैंगिक भेद होता है। लेकिन पक्षियों, सरीसृपों, पतंगों व तितलियों तथा कुछ उभयचरों और कुछ मछलियॉ मैं लैंगिक भेद मनुष्यों से भिन्न होता है। अर्थात नर में लिंग गुणसूत्र समान (zz) तथा मादा में समान (zw) होते हैं।

मनुष्यों में रूधिर वर्ग (Blood group humans)

Blood group humans

मनुष्यों में रूधिर वर्ग (Blood group humans)

कार्ल लैण्डस्टीनर ने यह बताया कि मनुष्यों  में रूधिर सबका समान नहीं होता। मानव के लाल रूधिराणुओं की कोशिकाकला में रूधिर के प्लाज्मा में रूधिराणुओं के अभिश्लेषण से सम्बन्धित प्रोटीन पदार्थ होते हैं। लाल रूधिराणुओं में ऐसे पदार्थों को प्रतिजन या एंटीजेन्स या एग्लूटीनोजेन्स तथा प्लाज्मा में उपस्थित पदार्थों को प्रतिरक्षी या एंटीबाडीज कहते हैं। प्रतिजन की ग्लाइकोप्रोटीन्स के रूप में होते हैं- A वं B प्रतिरक्षी भी दो प्रकार के होते हैं। A रोधी (Anti-a) तथा (Anti-b)रोधी  जिन्हें क्रमशः a और b लिखा जाता है।

रूधिर बैंक (Blood bank) -: बैंको में रूधिर को 30 दिन तक उसके उसी रूप में रखा जा सकता है। प्लाज्मा को सुखाकर पाउडर के रूप में रख सकते हैं। बाद में इसमें आसुत जल मिलाकर उपयोग किया जा सकता है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने रूधिर के स्थान पर पॉलीविनाइल पाइरोलिडॉन का सफल उपयोग किया है।
सम्पूरक जीन्स(Complementary Genes) -: इसमें एक अनुवांशिक लक्षण के दृश्य रूप प्रकटन में जीनों की दो विभिन्न एलोली जोड़यों के बीच ऐसी प्रभावित होती है कि किसी भी जोड़ी के प्रबल जीन की अभिव्यक्ति तभी होती है जब दूसरी जोड़ी का प्रबल जीन भी उपस्थित हो।

अनुपूरक जीन्स (Supplementary Genes) -: इस आनुवांशिकी में एक लक्षण का दृश्य रूप प्रकटन एलीली जीन्स की दो जोड़ियों के पारस्परिक प्रभाव से होता है। इसमें एक जोड़ी के प्रबल जीन की अभिव्यक्ति तो दूसरी जोड़ी के प्रबल जीन की उपस्थिति के बिना ही स्वतन्त्र रूप से हो जाती है। परन्तु दूसरी जोडी के प्रबल जीन की अभिव्यक्ति पहली जोड़ी के प्रबल जीन की उपस्थिति में होती है।

सहयोगी जीन्स(Collaborative Genes) -: इस वंशागति में भी एलीली जीन्स की दो जोड़ियॉ काम करती हैं। इनमें से प्रत्येक जोड़ी के प्रबल जीन का अपना अलग प्रभाव होता है, परन्तु दोनों जोड़ियों के प्रबल जीन्स साथ-साथ हों तो एक नये लक्षण का प्रकटन होता है।

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मानव जीनो के व्यतिक्रम से उत्पन्न होने वाले कुछ रोग

रंजकहीनता(Albinism) -: मिलैनिन की कमी से त्वचा तथा बालों का सफेद होना, रूधिर कोशिकाओं के कारण पुतलियों का गुलाबी या लाल दिखायी पड़ना ही रंजकहीनता है। मिलैनिन ‘टाइरोसिनेज’ एंजाइम की सहायता से बनता है। यह एंजाइम एक जीन के प्रभाव से बनता है।

एल्कैप्टोनूरिया(Alkaptonuria) -: इसके रोगी शरीर में ही बनने वाले होमो जेन्टीसिक अम्ल का विखण्डन नहीं कर पाते हैं। रूधिर में इस अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है। जोड़ों में इसके जमाव से गठिया रोग हो जाता है। होमोजेन्टीसिक अम्ल के विखण्डन के लिए आवश्यक एन्जाइम एक प्रबल जीन के नियन्त्रण में संश्लेषित होता है। जिन मुनष्यों में यह जीन सुप्त होता है,उन्हीं को यह रोग होता है।

(Rh-tactro) -: लैण्डस्टीनर एवं वीनर ने रीसस बन्दर के लाल रूधिराणुओं की कला में एक प्रतिजन की उपस्थित का पता लगाया और इसे ही रीसस तत्व या प्रतिजन का नाम दिया। भारतीयों में यह तत्व 97 प्रतिशत व्यक्तियों में पाया जाता हैं जिन व्यक्तियों के अन्दर यह तत्व नहीं पाया जाता उन्हें Rh निगेटिव Rh कहते है। मनुष्य के रूधिर में Rh प्रतिरक्षी Rh-Antibodies नहीं होते, लेकिन यदि रूधिर आधान में किसी Rh को किसी Rh+ का रूधिर चढ़ा दिया जाता है तो प्रापक के प्लाज्मा में धीरे-धीरे Rh प्रतिरक्षी बन जाते हैं। लेकिन Rh+ रूधिर उसे दुबारा चढ़ा दिया जाये तो प्रापक की मृत्यु हो सकती है।

Rh का लक्षण भी आनुवांशिक होता है। इसकी वंशागति मेन्डलियन नियमों के अनुसार,दो एलीली जीन्स R,r द्वारा होती है। इसमें जीन Rh+ लक्षण जीन r(Rh-लक्षण) पर प्रबल होते हैं।

एरिथ्रोब्लासटोसिस फीटैलिस :- Rh से सम्बन्धित रोग है जो केवल शिशुओं में जन्म से पहले ही गर्भावस्था में होता है। यह बहुत कम लेकिन घातक होता है। इससे प्रभावित शिशु की गर्भावस्था में ही या जन्म के शीघ्र बाद मृत्यु हो जाती है। ऐसे शिशु सदा Rh+ होते हैं। इनकी माता Rh-. तथा पिता Rh+होता है।

डाउन्स सिन्ड्रोम (Syndrome) :-  इस प्रकार के व्यक्तियों के 21वीं जोड़ी के गुणसूत्र दो के बजाय तीन होते हैं। औसतन 700 नवजात शिशुओं मे से एक इस सिन्ड्रोम वाला होता है। इस सिन्ड्रोम वाले व्यक्ति छोटे कद एवं मन्द बुद्धि वाले होते हैं। लगभग 16-17 वर्ष की आयु तक प्रायः इनकी मृत्यु हो जाती है। इनमें केवल 8 प्रतिशत व्यक्ति ही 40 वर्ष की आयु तक जीवित रहते हैं।

टरनर्स सिन्ड्रोम :-  इस सिन्ड्रोम से ग्रसित स्त्रियों के लिंग गुणसूत्रों में केवल एक x गुणसूत्र उपस्थित रहता है (44़+xx) औसतन 5000 स्त्रियों में एक स्त्री टरनर सिन्ड्रोम वाली होती है। इस प्रकार की स्त्रियों का कद छोटा तथा जननांग अल्पविकसित होता है। इस प्रकार ये स्त्रियाँ नपुंसक होती है।

क्लाइनफेल्टर्स सिन्ड्रोम :- औसतन 500 पुरूषों में से एक पुरूष में पाये जाने वाले इस सिन्ड्रोम के कारण व्यक्ति के लिंग गुणसूत्र में दो के बजाय तीन और प्रायः ग्ग्ल् गुणसूत्र होते हैं। अतः ये लिंग गुणसूत्रों के लिए ट्राईसोमिक होते है 2n+1 या 44़+XXY गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण इनका शरीर लगभग सामान्य पुरूषों जैसा होता है, लेकिन एक अतिरिक्त गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण वृषण तथा अन्य जननांग छोटे होते हैं। और शुक्राणु भी नहीं बनते। इनमें स्त्रियों जैसे स्तनों का विकास हो जाता है ऐसे क्लाइन फेल्टर सिन्ड्रोम भी पाये जाते हैं जिनमें लिंग गुणसूत्र XXY से XXX या तीन से अधिक होते हैं।

ऐन्यु प्लॉयडी में गुणसूत्रों की बदली हुई संख्या अर्धसूत्रण में एक या अधिक समजात जोड़ियों के गुणसूत्रों के परस्पर पृथक न हो पाने के कारण गुणसूत्रों की कुल संख्या कुछ कम या अधिक हो जाती है।

आनुवांषिक अणु-डी0एन0ए0 (GENETIC MOLECULE-DNA)

आनुवांषिक अणु-डी0एन0ए0

आनुवांषिक अणु-डी0एन0ए0 (GENETIC MOLECULE-DNA)

जीवों के वे सब लक्षण जो इनकी एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में जाती हैं, आनुवांशिकी लक्षण कहलाते हैं। आनुवांशिकी लक्षणों के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में जाने की प्रक्रिया को आनुवांशिकता या वंशागति कहते हैं।

नर एवं मादा लैंगिक कोशिकाएॅ युग्मक कोशिकाएॅ अथवा गैपीट्स कहलाते हैं। प्रजनन में एक नर तथा एक मादा युग्मक कोशिकाओं के संयुग्मन से एक नई कोशिका जाइगोट का निर्माण होता है। जाइगोट रूपी यह अकेली कोशिका ही जीवों की एक पीढ़ी को अगली पीढ़ी से जोड़ने वाली कड़ी का काम करती है।

कोशिकाओं की खोज 1665 में राबर्ट हुक ने कोशिकाओं में केन्द्रक की उपस्थिति का पता राबर्ट ब्राउन द्वारा नायगेली ने विभाजित होती हुई पादप कोशिकाओं में केन्द्रक के द्विविभाजन और इसमें उपस्थित दण्डवत रचनाएॅ देखी। बाद में बाल्डेयर ने इन्हें क्रोमोसोम दिया।

एल्टमान :- ने केन्द्रीय पदार्थ को निकाल कर इसमें प्रोटीन को अलग किया और शेष फास्फोरस युक्त पदार्थ को न्यूक्लीय अम्ल का नाम दिया। कोसेल नेपता लगाया कि न्यूक्लीक अम्लों का विखण्डन करने पर चार प्रकार के नाइट्रोजनी क्षार-एडीनीन एवं गुवानीन प्यूरिन समाक्षर तथा साइटोसीन एवं थयमीन पिरिमिडीन क्षार फास्फोरिक अम्ल तथा कुछ कार्बोहाइडेªट पृथक होते हैं।

लेवीन ने केन्द्रक के न्यूक्लीय अम्ल में उपस्थित शर्करा राबइोस से भिन्न होती है, इसीलिए शर्करा को डीआक्सीराइबोस नाम दिया गया। इस प्रकार केन्द्रीय कोशिकाओं में दो प्रकार के न्यूक्लीय अम्ल- डी आक्सीराइबो न्यूक्लीक अम्ल डी0एन0ए0 तथा राइबोन्यूक्लीय अम्ल आर.एन.ए. होते हैं।

डी0एन0ए0 मुख्यतः केन्द्रक में होता है और इसके न्यूक्लिओटाइड अणुओं में शर्करा डी आक्सीराइबोस तथा नाइट्रोजनीय समाक्षार एडीनीन, गुवानिन साइटोसन अथवा थायमिन होता है। इसके विपरीत आर.एन.ए. मुख्यतः कोशिकाओं के साइटोसाॅल में होता है इसके न्यूक्लियोंटाइड अणुओं में शर्करा राइबोस तथा नाइट्रोजनीय समाक्षार एडीनीय, गुवानिन तथा साइटोसीन अथवा यूरेसिल होता है। डी.एन.ए. आनुवांशिक पदार्थ का काम करता है।
कोशिकाओं के अणुओं में औसतन 14 प्रतिशत अणु प्रोटीन्स के होते हैं।

डी0एन0ए0 अणुओं की आकृति एवं स्थिति

आकृति के अनुसार जीवों में दो प्रकार के डी0एन0ए0 अणु पाये जाते है- वृत्ताकार तथा रेखाकर। पूर्व केन्द्रीय कोशिकाओं जीवाणुओं एवं नीले हरे शैवालों में केवल एक युग्मित और अत्यधिक वलित वृत्ताकार डी0एन0ए0 अणु होता हैै जो कोशिका के मध्यभाग में केन्द्रक की अनुपस्थित के कारण कोशिका द्रव्य के ही एक विशेषकृत क्षेत्र में स्थित रहता है। इसे न्यूक्लिओइड कहते हैं। कुछ जीवाणुओं में न्यक्लिओइड से बाहर भी कोशिका द्रव्य में एक या अधिक छोटे वृत्ताकार डी0एन0ए0 अणु होते है जिन्हें प्लास्पिड्स कहते हैं। यूकैरियोटिक कोशिकाओं में रेखाकार तथा वृत्तकार दोनो प्रकार के डी0एन0ए0 अणु होते हैं।

डी.एन.ए. अणु निम्नलिखित चार प्रकार के डीआक्सीराइबो न्यक्लिओटाइड अणुओं के बहुलक होते हैं।
(1) डीआक्सी एडिनिलिक अम्ल (Damp)  में नाइट्रोजनीय क्षार गुवानिन।
(2) डी आक्सी गुवानिलिक अम्ल (Damp)  में   नाइट्रोजनीय क्षार गुवानिन
(3) डीआक्सी गुवानिलिक अम्ल(Damp)   में नाइट्रोजनीय क्षार साइटोसीन।
(4) थाइमिडिलिक अम्ल(Tmp)  में नाइट्रोजनीय क्षार थायमिन होता है।

प्रत्येक D.N.A अणु स्वयं तीन घटक अणुओं का बना संयुक्त अणु होता है- एक अणु फास्फेट समूह का, एक डीआक्सीराइबोस शर्करा का तथा एक नाइट्रोजनीय समाक्षार की डी0एन0ए0 अणुओं की संरचना ज्ञात करने का प्रथम प्रयास लेवीन ने 1909- 1910 में किया। इन्होंने ट्रेटान्यूक्लिओटाइड परिकल्पना दिया, जिसके अनुसार डी.एन.ए अणुओं में विविधता की गुंजाइश कम हो।

इसे मान्यता नहीं मिली एर्विन शरमाफ ने लेवीन के मत को नकारते हुए बताया कि गुवानिन की संख्या साइटोसीन के बराबर होती है A=T,G=C,A+G=T+Cविभिन्न जीव-जातियों के डी.एन.ए. में एडीनीऩथायमिन तथा गुवानिऩसाइटोसीन का अनुपातA+T:G+Cभिन्न-भिन्न होता है। परन्तु एक ही जीव जाति के सारे सदस्यों में यह समान होता है। डी.एन.ए. का प्रत्येक अण्ुा एक नहीं बल्कि अगल बगल जुड़ी दो पाली न्यूक्लिओटाइड शृंखलाओं का बना अर्थात डी0एन0ए0 द्वैध होता है। एक शृंखला पर का समाक्षर अनुक्रमAGCTTAAGR दूसरी श्रंखला पर के TCGAATTGA अनुक्रम से जुड़ा होगा।

ट्राईलियम :-  के गुणसूत्र लगभग 30μ आकार के होते हैं। गुणसूत्रों की संरचना में निम्न भाग पाये जाते हैं-
प्रत्येक गुण सूत्र दो अर्द्धगुणसूत्रों से बना होता है। ये आपस में सर्पिल क्रम में लिपटे रहते हैं। क्रोमोटिड्स एसिटोकार्मिन क्षारीय फुशिन आदि से स्टेन किये जा सकते हैं। इनका वह भाग जो गहरा स्टेन होता है ‘हैट्रोकोमेटिन’ कहलाता है। इसमें डी0एन0ए0 कम तथा आर0एन0ए0 अधिक मात्रा में होता है। क्रोमेटिड्स का जो भाग हल्का स्टेन लेता है उसे यूक्रोमेटिन कहते हैं। इसमें डी.एन.ए. अधिक मात्रा में पाया जाता है। क्रोमेटिड्स पर अनेक उभार पाये जाते हैं। उन्हें क्रोमोमियर्स कहते हैं।

कोशिका विभाजन की मध्यावस्था व पस्चाताप अवस्था में गुणसूत्र के दोनों क्रोमोटिड्स सेन्टोमियर द्वारा परस्पर जुडे रहते हैं। मध्यावस्था में सेन्ट्रोमियर विभाजित हो जाता है। जब गुण सूत्र पर सेण्ट्रोमियर नहीं पाया जाता तो इसे एसेन्ट्रिक कहते हैं और सेण्ट्रोमियर की संख्या दो या अधिक होती है तो इसे डाइसेन्ट्रिक या पालीसेन्ट्रिक कहते हैं।

सेटेलाइट गुणसूत्र :-  कुछ गुणसूत्रों में द्वितीयक संकीर्णन होता है इसके फलस्वरूप गुणसूत्र का छोटा गोलाकार भाग सैटेलाइट कहलाता है। इस प्रकार के गुणसूत्र को सैट गुणसूत्र कहते है।

टीलोमियर :- गुणसूत्र के विशिष्ट छोर हैं, ये क्रियात्मक भिन्नता एवं धु्रवता को प्रदर्शित करते हैं। गुणसूत्र न्यूक्लिओप्रोटीन्स का बना होता है। इसमें हिस्टोन प्रोटीन लगभग 45-50 प्रतिशत डी0एन0ए0 लगभग 39-40 प्रतिशत अम्लीय प्रोटीन्स लगभग 8-9 प्रतिशत आर0एन0ए0 1-2 प्रतिशत तथा सूक्ष्म मात्रा में धातु आयन्स होते हैं।

डी0एन0ए0 की द्विकुण्डिलत संरचना :

फ्रैंकलिन तथा चिल्किंस ने 1951 एवं 1953 में डी0एन0ए0 अणु की द्विसूत्री कुण्डलिनी की भाॅति बताया।
1953 में वाटसन तथा क्रिक ने डी0एन0ए0 अणु की संरचना का त्रिविम प्रतिरूप प्रस्तुत किया। डी0एन0ए0 दो प्रति समानान्तर पाॅली न्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं से बनी कुण्डलित संरचना होती है। प्रत्येक पाॅली न्यूक्लियोटाइड का निर्माण हजारों लाखों न्यूक्लियोटाइडों से होता है। वाटसन तथा क्रिक के अनुसार थयमीन तथा एडीनिन दो हाइड्रोजन बन्धों ज्त्र। द्वारा तथा गुवानिन एवं साइटोसीन तीन हाइड्रोजन बन्धों ळत्रब् द्वारा जुड़ते है। डी0एन0ए0 अणुओं में ध्रुवीय परमाणुओं के कारण जलरागी तथा अधुवीय परमाणुओं के कारण जलरोधी आकर्षण पाया जाता है। डी0एन0ए0 अणु एक दूसरे के ऊपर स्थित होने के कारण समाक्षार जोड़ियों के बीच वान्डरवाल्स बल का आकर्षण होता है।

वाटसन एवं क्रिक ने जिस डी0एन0ए0 अणु संरचना का प्रतिरूप प्रस्तुत किया उसे अबB D.N.A  कहते हैं। इसके प्रत्येक कुण्डल में 10.4 (पहले 10) न्यूक्लियोटाइड जोड़ियाँ होती है। अब एक A.D.N.A का भी पता चला है जिसमें प्रत्येक कुण्डल में 11 न्यूक्लियोटाइड जोडियाँ होती है।B.D.N.A का ऐसा खण्ड जिसमें समाक्षरों का अनुक्रम CG CG CG होता है, उच्च लवणता की दशा में वामार्वत दिशा में कुण्डलित हो जाता है। यह द्विकुण्डलिनी टेढ़ी-मेड़ी होती है, और इसके प्रत्येक कुण्डलों में न्यूक्लियोटाइड्स की बारह जोड़ियाॅ होती है। इर्से Z-D.N.A का नाम दिया गया है।

गुणसूत्र (Chromsome) की संरचना :- कोशिका विभाजन की अन्तरावस्था के केन्द्रक में गुण सूत्र क्रोमैटिन के बने लम्बे पतले-गहरे रंग के तन्तुओं का जाल होता है। कोशिका विभाजन मध्यावस्था में गुणसूत्र स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ते हैं। इन्हें सर्वप्रथम स्ट्रासबर्गर ने देखा वाल्डेयर ने इन्हें गुणसूत्र नाम दिया। सटन एवं बाबेरी ने गुणसूत्रों आनुवंशिकी का गुणसूत्र सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

गुणसूत्रों का सामान्य आकार 0.5 से 30μ ग 0ण्2-3μ होता है। मनुष्य 5-6 μ ड्रोसोफिला के गुणसूत्र 3μ होते हैं। न्यूक्लिक अम्ल की खोज फ्रेडरिक मीशर ने की थी। न्यूक्लिक अम्ल नाम अल्टमान ने दिया डी0एन0ए0 दो पाॅली न्यूक्लियोटाइड श्रंखलाओं से बना होता है। पाॅली न्यूक्यिोटाइड शृंखला का निर्माण न्यूक्लियोटाइड से होता है। न्यूक्लियोटाइड न्यूक्लिक अम्ल की संरचनात्मक इकाइयाॅ होती हैं।

प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड तीन अणुओं से बना होता है-
(1) पेन्टोज षर्करा :-  डिआक्सीराइबोस या राइबोस प्रकार की होती है। ये क्रमशः डी0एन0ए0 तथा आर0एन0ए0 में पायी जाती है।
(2) नाइट्रोजन समाक्षार :-  प्यूरीन अथवा पिरीमिडिन होते हैं।
(3) फस्फोरिक अम्ल :-  फास्फेट के नाम से जाना जाता है।
नाइट्रोजन समाक्षार तथा पेन्टोज शर्करा अणु मिलकर न्यूक्लियोसाइड बनाते हैं। न्यूक्लियोसाइड को एडीनोसिन गुवानोसीन, थाइमिडीन, साइटिडीन, और यूरिडीन कहते हैं।

न्यूक्लियोसाइड्स एवं फास्फोरिक अम्ल परस्पर मिलकर न्यूक्लियोटाइड बनाते हैं। इस प्रकार न्यूक्लियोटाइड पाँच प्रकार के होते हैं- एडीनीलिक, गुवानिलिक, थाईमिडलिक, साइटिडिलिक तथा यूरिडिलिक अम्ल।

न्यूक्लियोसोम की संरचना अथवा गुणसूत्र की परासंरचना अथवा यूकैरियोटिव गुणसूत्र की अण्विक सरंचना।
क्रोमेटिन संरचना का माॅडल/परिकल्पना कोर्नबर्ग तथा थामस ने प्रस्तुत किया। न्यूक्लियोसोम शब्द का सर्वप्रथम थामस ने प्रस्तुत किया। न्यूक्लियोसोम लिंकर डी0एन0ए0 द्वारा जुडे़ होते हैं। न्यूक्लियोसोम 10 nm व्यास के तस्तरीनुमा होते हैं। प्रत्येक में क्षारीय प्रोटीन से बना कोड कण तथा एक डी0एन0ए0 हेलिक्स होता है।

क्रोड कण आठ अणुओं से अष्टभागी संरचना होती है। ये हिस्टोन प्रोटीन से बने होते हैं। इसमें भ्2। तथा भ्2ठ से बने दो डाइमर तथा भ्3 तथा भ्4 के दो-दो अणुओं से बना टेट्रामर होता है। क्रोड कण का व्यास 11 nm तथा ऊचाई 6 nm होती है।

डी0एन0ए0 हेलिक्स :-  डी0एन0ए0 से बना एक खण्ड होता है। इसका निर्माण लगभग 200 न्यूक्लियोटाइड्स से होता है। डी0एन0ए0 खण्ड के लगभग 160 न्यूक्लियोटाइड्स हिस्टोन क्रोड के चारों ओर दो चक्र बनाते हैं। शेष न्यूक्लियोटाइड्स लिंकर डी0एन0ए0 में अधिकतम 80 न्यूक्लियोटाइड्स होते हैं। H.1 प्रोटीन क्रोड पर लिपटे डी0एन0ए0 के दोनों सिरो से जुड़ा होता है।

गुणसूत्रों के कार्य :- अनुवांशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचाना, जीवों में उत्परिवर्तन, विभिन्नताएँ उत्पन्न करके जैव विकास में सहायक होना, लिंग निर्धारण लक्षण एवं विकृतियों की जानकारी देना, जैविक क्रियाओं का नियऩ्त्रण एवं नियमन आदि कार्य हैं।

आर0एन0ए0 की संरचना तथा कार्य (Structure and Functions of RNA)

आर0एन0ए0 की संरचना तथा कार्य

आर0एन0ए0 की संरचना तथा कार्य (Structure and Functions of RNA)

अधिकतर जीवनधारियों R.N.A एक सूत्री होता है। वुन्ड ट्यूमर वायरस तथा रियोवायरस आदि में दो सूत्री आर0एन0ए0 पाया जाता है। आर0एन0ए0 की पाॅलीन्यूक्लियोटाइड्स शृंखला का निर्माण न्यूक्लियोटाइड्स के मिलने से होता है। न्यूक्लियोटाइड्स का निर्माण राइबोज शर्करा अणु, नाइट्रोजन बेस तथा फास्फोरिक अम्ल अणु से होता है। आर0एन0ए0 अधिकतर आनुवांशिक सूचनावाहक होता है और प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेता है। अधिकांश वाइरस आर0एन0ए0 आनुवांशिक होता है। आर0एन0ए0 कोशिकाद्रव्य केन्द्रक तथा केन्द्रिका में पाया जाता है। आर0एन0ए0 का संश्लेषण

आर0एन0ए0 चार प्रकार के होते हैं।

(1) संदेषवाहक आर0एन0ए0:-  का लगभग 5-10 प्रतिशत होता है। इसकी संरचना डी0एन0ए0 श्रंखला की पूरक होती है। इसमें पैतृक सूचनाएॅ कोडोन के रूप में अंकित होती है। इसका अणुभार 25000 से 10,000,000 तक होता है। एम0आर0एन0ए0 एक विशिष्ट प्रोटीन संशेलषण हेतु टेम्पलेट की तरह कार्य करता है। यह बहुत कम समय तक जीवित रहता है।

(2) राइबोसोमल आर0एन0ए0 :-  कुल आर0एन0ए0 का लगभग 75 प्रतिशत होता है। यह राबोसोम में पाया जाता है। यह एक शंृखला से बना होता है तथा स्थान-स्थान पर लूप बना लेता है। इसका अणुभार 35,000 से 10,000,000 तक होता है।

(3) ट्रान्सफर आ0एन0एन :-  कुल आर0एन0ए0 का लगभग 20 प्रतिशत होता है। ये आकार में सबसे छोटे होते हैं। इनका अणुभार 23000 से 30000 तक होता है। इसे घुलनशील आर0एन0ए0 भी कहते हैं। यह विशिष्ट प्रकार के अमीनों अम्लों को राइबोसोम्स पर स्थित एम0आन0एन0ए0 तक पहुँचता है जिससे अमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्धों द्वारा परस्पर मिलकर प्रोटीन संश्लेषण कर सकें।

(4) वाइरल आर0एन0ए0 :- सभी पादप एवं कुछ जन्तु वाइरस में आुनवांशिक पदार्थ आर0एन0ए0 होता है, अतः इसे आनुवांशिक आर0एन0ए0 कहते हैं।

प्रोटीन संष्लेशण- राइबोसोम पर होता है। यह निम्न चरणों में पूरा होता है।
1- डी0एन0ए0 से अमीनो अम्ल संयोजन के क्रम की सूचना आर0एन0ए0 में कोडोन के रूप में व्यवस्थित हो जाती है। इसे सूचनावाहक आर0एन0ए0 कहते हैं।

2- सूचनावाहक आर0एन0ए0 केन्द्रक से कोशिकाद्रव्य में पहॅुचकर राइबोसोम्स से संलग्न हो जाता है। जो टेम्पलेट के रूप में अमीनो अम्लों के लिए एक साॅचे का कार्य करता है।

3- केन्द्रक से ट्रांसफर आर0एन0ए0 बनकर कोशिकाद्रव्य में आ जाते हैं। ये अमीनो अम्ल को टैम्पलेट आर0एन0ए0 पर पहँुचाते हैं। ट्रान्सफर आर0एन0ए0 से क्रिया करने से पहले अमीनो अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इसके लिए आवश्यक ऊर्जा ए0टी0पी0 से प्राप्त होती है।

4- टैम्प्लेट आर0एन0ए0 पर पहॅुचकर अमीनो अम्ल अपने विशिष्ट क्रम में संयोजित हैं। अमीनों अम्ल पेप्टाइड बन्धन द्वारा आपस में जुड़ जाते हैं। और प्रोटीन अणु बन जाता है।

5- प्रोटीन अणु संश्लेषण के पश्चात् राइबोसोम्स से पृथक हो जाता है और जैवकि क्रियाओं में भाग लेने लगता है। यह एन्जाइम की तरह कार्य करके लक्षणों का निर्धारण करता है।

प्लाजिड्स :-  जीवाणु कोशिकाओं में वृत्ताकार गुणसूत्र केन्द्रकीय भाग बनाते हैं। इसके अतिरिक्त कोशिका में अनेक छोटे-छोटे डी0एन0ए0 अणु होते हैं जिन्हें प्लाज्मिड्स कहते हैं।

ये निम्न प्रकार के होते हैं।
1- प्लाज्मिड्स :-  इन्हें लिंग कारक कहते हैं जो संयुग्मन में महत्वपूर्ण होते हैें।
2-  प्लाज्मिड्स :-  इन पर औषधियों एवं प्रतिजैविक पदार्थों के लिए प्रतिरोधी जीन होते हैं।
3- COL प्लाज्मिड्स :-  ये सुग्राही कोशिकाओं को नष्ट करने वाले कोल्सीन प्रोटीन के जीन होते हैं।

प्लाजिड्स का प्रयोग आनुवांशिक अभियांत्रिकी में किया जाता है। इनका उपयोग मानव इन्सुलिन, हिपेटाइटिस ठ बैक्सीन आदि बनाने में किया जाता
लैम्पबुष गुणसूत्र- ये अत्यधिक लम्बे 100μ× 20 μ होते हैं। इन्हें फ्लेमिंग ने सबसे पहले देखा, रूकर्ट ने नाम दिया ये जन्तुओं के प्राथमिक अण्डज में विशेष रूप में पाये जाते हैं।

जीनोम :- युग्मकों में पाये जाने वाले गुणसूत्रों की संख्या को प्रदर्शित करते हैं। कोशिकाओं में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के सभी गुणसूत्रों के एक समूह को जीनोम कहते हैं। इसे अगुणित संख्या भी कहते हैं। जैसे मनुष्य का जीनोम या अगुणित संख्या 23 गुणसूत्र होते हैं। मानव कोशिकाओं में 46 गुणसूत्र पाये जाते हैं।

हिस्टोन प्रोटीन :-  गुणसूत्र में न्यूक्लिक अम्ल डी0एन0ए0, आर0एन0ए0 हिस्टोन तथा नान हिस्टोन प्रोटीन्स होती हैं। हिस्टोन क्षारीय प्रोटीन्स होती है। गुणसूत्र में 5 प्रकार की हिस्टोन प्रोटीन्स होती है- H2A, H2B, H2H4 तथा H1 विभिन्न जातियों के गुणसूत्रों में H2A,H2 तथा H4 प्रोटीन लगभग समान होती हैं और ये मिलकर अष्टभागी अणु बनाती है।

डी0एन0ए0 पाॅलीमरेज एन्जाइम :- कोर्नबर्ग ने अपने प्रयोगों में यह दिखाया कि यदि परखनली में पहले से ही कुछ डी0एन0ए0 उपस्थित हों तो कुछ जीवाणुओं से पृथक किया गया एक एन्जाइम कोशिकाओं के बाहर परखनली में डी0एन0ए0 के संश्लेषण को उत्प्रेरित कर देता है। इस एन्जाइम को ही डी0एन0ए0 पाॅलीमरेज नाम दिया गया।

द्विगुणन मूल :-  डी0एन0ए0 अणु का द्विगुणन इसके कुछ निर्दिष्ट स्थानों पर ही प्रारम्भ होता है जिन्हें द्विगुणन मूल कहते हैं।
द्विगुणन मूल :-  वैज्ञानिक वाल्बियानी ने काइरोनोमस नामक कीट के डिम्भक की लार ग्रन्थि की कोशिकाओं में

सामान्य गुणसूत्रों से लगभग सौ गुना अधिक लम्बा और काफी मोटा गुणसूत्र देखा, जिसे ही असामान्य गुणसूत्र कहा गया।
ईस्केरीकिया कोलाई नामक जीवाणु के केन्द्रकाभ या न्यूक्लिटाइड में स्थित अकेला डी0एन0ए0 अणु लगभग (1700μ 1.7MM )लम्बा होता है जबकि जीवाणु स्वयं लगभग 2μ 0.002 उउ ही लम्बा होता है।

हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका के केन्द्रक में डी0एन0ए0 के 46 (23 जोड़ी) अणु होते हैं जिनकी औसत लम्बाई 4.5 सेमी ओर कुल लम्बाई 2 मीटर होता है, जबकि स्वयं केन्द्रक का व्यास लगभग 4μ से 10 μ (0.004 जव 0.01 MM) ही होता है।

नोट-

  • डी0एन0 तथा आर0एन0 में क्या समानता है- डी0एन0ए0 तथा आर0एन0ए0 पाॅली न्यूक्लियोटाइड् से बने हेते हैं।
  • उस कोशिकांग का नाम, जो प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेता है- राइबोसोम्स।
  • डी0एन0ए0 के दोनों रज्जुकों के बीच की दूरी होती है- 2।0
  • हमारे शरीर में कोशिकाएॅ होती है- लगभग 1014
  • इनमें उपस्थित डी0एन0ए0 की कुल लम्बाई है- 2*1014 मीटर।
  • हमारी कोशिकाओं की सबसे लम्बी डी0एन0ए0 अणु की लम्बाई है- 85 मिलीमीटर।
  • जो प्लाज्मिड्स लिंग कारक होते है- F प्लाज्मिड्स।
  • ड्रासोफिला की लार ग्रन्थियों में बहुत लम्बे एवं चैड़े गुणसूत्र बाल्बियानी ने देखे, जिन्हें नाम दिया गया- पोलीटीन गुणसूत्र।
  • डी0एन0ए0 द्विगुण अर्द्धसंरक्षी अर्द्ध असतत तथा एकदिश तथा द्विदिश दोनों ही प्रकार का होता है।
  • डी0एन0ए0 के एक स्टैण्ड पर डी0एन0ए0 द्विगुणन छोटे-छोटे टुकड़ों के जुड़ने से होता है। इन टुकड़ों को ओकाजाकी टुकड़े कहते हैं।
  • डी0एन0ए0 के जिस स्टैण्ड का निर्माण संतत संश्लेषण द्वरा होता है उसे लीडिंग स्ट्रैण्ड कहते हैं। यह 51-31 दिशा वाला स्ट्रैण्ड होता है।
  • डी0एन0ए0 द्विगुणन के समय जब डी0एन0ए0 अणु का कुण्डलन खुलता है तब जैसे-जैसे नये स्टैªण्डों का निर्माण होता जाता है कुण्डलन आगे की ओर खुलता जाता है। यह रचना काॅटे के समान दिखायी पड़ती है जिसे रेप्लिकेशन कांटा कहते हैं।
  • जब गुणसूत्रों को इनके विशिष्ट स्टेनों से जैसे-एसीटो कार्मिन या क्षारीय फुक्सिन से रँगा जाता है जब इसमें गाढ़ी एवं हल्की पट्टियाँ दिखायी पड़ती हैं। एमिल हेट्ज ने गहरे रंग की पट्टियों को हेटरोक्रोमेटिन तथा हलके रंग की पट्टियों वाले भाग को यूक्रोमेटिन कहा है।

पारिस्थितिकी (ECOLOGY)

ECOLOGY

पारिस्थितिकी (ECOLOGY)

वातावरण एवं समुदाय के पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम हैकेल 1896 ने किया था। उडम ने प्रकृति की संरचना एवं कार्यों के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहा है।

वातावरण में से सभी कारक आ जाते हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जीव समुदाय को प्रभावित करते हैं। इन कारकों को पारिस्थितिकी कारक भी कहते हैं जिन्हें चार समूहों में रखा गया है-

1. जलवायवीय कारक जिसमें वर्षा, ताप, प्रकाश वायुमण्डलीय गैसें, वायु गति तथा वायुमण्डलीय नमी शामिल है। जीव की उपापचयी क्रियाओं के लिए जल अत्यन्त ही आवश्यक तत्व है जो मुख्य रूप से वर्षा से प्राप्त होता है। अधिक वर्षा तथा अधिक ताप के कारण चैड़े पत्तों वाले बड़े वृक्षों के घने जंगल अधिक वर्षा तथा कम ताप के कारण नुकीली पत्तियों वाले वृक्ष (जैसे चीड़ आदि) तथा कम वर्षा व अधिक ताप के कारण मरूद्भिद् वनस्पतियाॅं उगती हैं।
ताप पौधों की भौतिक रासायनिक तथा उपापचयी क्रियाओं पर नियंत्रण रखते हैं।

पौधे 25-35°c  ताप पर अधिकतम क्रियाशील होते हैं। 0°c या इससे कम ताप पर एन्जाइम निष्क्रिय हो जाते हैं।, नष्ट नहीं होते। 60°c  ताप पर एन्जाइम का स्कन्दन एवं विकृतिकरण हो जाता है, जिसके कारण पौधे नष्ट हो जाते हैं। ताप का मुख्य स्रोत सूर्य है। सूर्य के ऊर्जा प्रकाश के रूप में मिलती है। प्रकाश से पौधों में प्रकाशसंश्लेषण, वाष्पोत्सर्जन, वृद्धि बीजांकुरण, पुष्पन, लवक का निर्माण आदि क्रियाएँ प्रभावित होती हैं।

वायु की गति भी पौधे की रचना, वृद्धि एवं कार्यिकी पर प्रभाव डालते है वायु की गति बढ़ाने से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। जबकि वृद्धि दर कम हो जाती है।

वायुमण्डलीय O2,CO2, Nगैसें  तथा जलवाष्प का वायुमण्डल में चक्रीकरण होता रहता है जिसके कारण इनकी एक निश्चित मात्रा बनी रहती है। कुछ गैंसे वायुमण्डल को प्रदूषित कर पौधों को हानि पहॅुचाती हैं। वायुमण्डलीय नमी पैाधों में वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करती हैं। वायुमण्डलीय में उपस्थित जलवाष्प वायुमण्डलीय नमी कहलाती हैं।

परितन्त्र : –  सीमित एवं निश्चित भौतिक वातावरण का प्राकृतिक तन्त्र जिसमें जैवीय तथा अजैवीय घटकों में पारस्परिक सम्बन्ध एक निश्चित नियमानुसार गतिज संतुलन में रहता है। और इसमें पदार्थों तथा ऊर्जा का प्रवाह सुनियोजित प्रकार से होता रहता है। पारितन्त्र शब्द का प्रयोग टेन्सले 1935 ने किया था। एक आत्मनिर्भर परितन्त्र के लिए ऊर्जा का स्रोत तथा पर्याप्त मात्रा में रासायनिक पदार्थों की पूर्ति का होना आवश्यक है।

परितन्त्र के जैवीय घटकों में उत्पादक, उपभोक्ता तथा उत्पादक आते हैं। उत्पादक के अन्तर्गत हरे पौधे आते हैं जो जल तथा COसे प्रकाश सेश्लेषण द्वारा पर्णहरित तथ प्रकाश की उपस्थिति में कार्बनिक भोजन निर्माण करते हैं। ये प्राथमिक उत्पादक कहलाती है।

                    
उपभोक्ता वर्ग के जन्तु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपना भोजन पौधों से प्राप्त करते है। शाकाहारी जन्तु अपना भोजन पौधों से प्राप्त करते हैं और ये प्राथमिक उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं। इस श्रेणी में कीड़े -मकोड़े बकरी, गाय, खरगोश आदि आते हैं। प्राथमिक उपभोक्ता से भोजन प्राप्त करने वाले मांसाहारी जन्तु द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता कहलाते हैं। इस श्रेणी मे मेढक बिल्ली, भेड़िया आदि आते हैं।

द्वितीय श्रेणी के मांसाहारी जन्तुओं से भोजन ग्रहण करने वाले मांसाहारी जन्तु तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता कहलाते हैं। इस श्रेणी में साॅप, मोर, शेर, चीता आदि आते हैं। इस श्रेणी के वे उपभोक्ता जो सभी शाकाहारी तथा मांसाहारी जन्तुओं से भोजन प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन उनको मारकर अन्य जन्तु भोजन नहीं ग्रहण कर सकते। वे सर्वोच्च मांसाहारी की श्रेणी में आते हैं, मनुष्य को तो सर्वभक्षी कहा गया है क्योंकि वह अपना भोजन किसी भी पोषक स्तर से प्राप्त कर सकते हैं।

अपघटक :-  उन जीवों को कहते हैं जो उत्पादक तथा उपभोक्ताओं की मृत्यु के पश्चात् उनके शरीर का अपघटन कर देते हैं जिससे जटिल कार्बनिक पदार्थ सरल तत्वों में अपघटित हो जाते हैं। ये सरल तत्व पुनः जीवधारियों द्वारा प्रयोग कर लिये जाते हैं। अपघटक की श्रेणी में मृतोपजीवी कवक तथा जीवाणु आते हैं। इन्हें प्राकृतिक सफाईकर्ता भी कहतें हैं।

अजैवीय घटकों को तीन समूहों में :-

(1) जलवायवीय जैसे प्रकाश, ताप आदि

(2) अकार्बनिक पदार्थ जैसे नाइट्रोजन,कार्बन डाइआक्साइड, आक्सीजन, जल आदि

(3) कार्बनिक पदार्थ जैसे प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइडेªट्स आदि में बाॅटा गया है।

परितंत्र में ऊर्जा हस्तान्तरण :-  परितंत्र के उत्पादक जितनी ऊर्जा खाद्य के रूप में संचित करते हैं उसकी 90 प्रतिशत ऊर्जा उत्पादक अपनी जैविक क्रियाओं में प्रयुक्त कर लेते हैं, केवल 10 प्रतिशत ऊर्जा खाद्य पदार्थों के रूप में शाकाहारी प्राथमिक उपभोक्ताओं को प्राप्त होती है। प्रत्येक पोषक स्तर पर 90 प्रतिशत ऊर्जा खर्च हो जाती है और केवल 10 प्रतिशत ऊर्जा ही अगले पोषक स्तर तक हस्तान्तरित हो पाती है। यही कारण है कि तृतीय या सर्वोच्च श्रेणी के उपभोक्ताओं की संख्या कम होती है। कार्बनिक पदार्थों के आक्सीकरण से रासायनिक ऊर्जा, गतिज ऊर्जा तथा ताप के रूप में मुक्त होकर वातावरण में चली जाती है। यहाॅ ऊर्जा का प्रवाह ऊष्मा गतिक नियम के अनुसार होता है।

पारिस्थितिक कारक :-  वातावरण का वह भाग होता है जो किसी भी पौधे को प्रभावित करता है। वातावरण जैवीय जलवायवीय मृदा तथा स्थलाकृतिक कारकों से निर्मित होता है। जैवीय कारकों के कारण ही समुदाय के सभी जीवधारी आपस में एवं वातावरण में सम्बन्धित होते हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। मृदा कारक भी पौधों के लिए महत्वपूर्ण है। मृदा का निर्माण खनिज पदार्थ लगभग 40 प्रतिशत, कार्बनिक पदार्थ लगभग 10 प्रतिशत, मृदा जल, (लगभग 25 प्रतिशत) तथा मृदा वायु लगभग 25 प्रतिशत द्वारा होता है।

जीवोम (THOKSE) :-  सबसे बड़ा स्थलीय समुदाय जो एक निश्चित बड़े क्षेत्र में फैला होता है। इसकी प्रकृति तथा क्षेत्र निर्धारण तापमान, वर्षा मृदा अक्षांश आदि कारकों पर निर्भर करता है। पृथ्वी पर पाये जाने वाले प्रमुख जीवोम में टुन्ड्रा, टैगा, शीतोष्ण पर्णपाती वन, उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी वन, घास के मैदान, मरूस्थल उष्ण कटिबन्धीय सवाना आदि आते हैं।

टुन्ड्रा क्षेत्र  60°N अक्षांश पर एशिया, यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में फैला हुआ हिम क्षेत्र है। यहाॅ का ताप लगभग 30°c से 40°c  के मध्य रहता है, विषम परिस्थितियो में टुन्ड्रा को आर्कटिक मरूस्थल भी कहते हैं। यहाॅ की वनस्पतियों में मुख्यतः लाइकेन तथा स्फैगनम पाये जाते हैं। जन्तुओं में यहाॅ रेनडियर, बर्फीले उल्लू ध्रुवीय भालू, आर्कटिक लोमड़ी आदि मिलते हैं। ग्रीष्म काल मे यहाॅ अधिकतम 10°c  का ताप रहता है।

टैगावन को वोरियल वन या उत्तरी शंकुधारी सदाबहार वन भी कहते हैं। ये वन उत्तरी अमेरिका, यूरोप तथा उत्तरी एशिया में टुन्ड्रा वनों के समीप पाये जाते हैं। इस प्रकार के वनों में शंकुधारी वृक्ष मुख्य रूप से पाये जाते हैं। जैसे चीड़ देवदार, जूनीपर, फर, स्पू्रस आदि।

  शीतोष्ण  पर्णपाती   वन :-  उत्तरी मध्य यूरोप, पूर्वी एशिया पूर्वी अमेरिका, कनाडा आदि में पाये जाते हैं। इन वनों के वृक्षों में ओक बेटुला एसर हिकोरी फर्न, माॅस, लाइकेन आदि पाये जाते हैं।

उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी वन मध्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, कांगों, भारत, जावा सुमात्रा श्रीलंका आदि देशों में पाये जाते हैं। सिनकोना, बरगद, दालचीनी, बांस ताड, ढाक, साल, टीक आदि इन वनों में पाये जाते हैं।

अमेरिका में प्रेयरीज, अफ्रीका में वेल्ड्स यूरोप तथा एशिया में स्टेपीज घास के मैदान हैं। घास के मैदानों में बारहसिंगा, बिलकारी उल्लू, बैजर, वाइसन प्रेअरीज, कुत्ते आदि जानवर पाये जाते हैं। विश्व में पाये जाने वाले मरूस्थलों में प्रमुख उत्तरी अफ्रीका का सहारा, एशिया का गोबी, पश्चिम एशिया में थार मरूस्थल प्रमुख हैं। मरूस्थल के दिन गर्म तथा रातें ठण्डी होती हैं। यहाँ पायी जाने वाली वनस्पतियों में कैक्ट्स, यूफोर्बिया, कैजुराइना खजूर, झाऊ, करील आदि है। प्रमुख जन्तुओं में रैटल सर्प, लोमड़ी, सियार, आदि हैं।

समुद्री पारिस्थितिक तट  :-  समुद्र की गहराई, तट से दूरी, प्रकाश की उपलब्धता आदि के कारण समुद्र में एक से अधिक प्रकार के पारिस्थितिक तन्त्र पाये जाते हैं। समुद्र की गहराइयों मे प्रकाश की उपलब्धता के आधार पर निम्न अनुदैध्र्य क्षेत्र पाये जाते हैं- जल की सतह से 200 मीटर गहराई पर प्रकाशी क्षेत्र 200 से 2000 मीटर की गहराई पर अप्रकाशी क्षेत्र, 2000 से अधिक गहराई का क्षेत्र वितलीय क्षेत्र कहलाता है।

समुद्री जीवों को तीन समूहों

(1) प्लवक (निष्क्रिय रूप से जल की सतह पर तैरते हैं),

(2) (तरणक सक्रिय रूप से तैरने वाले जीवधारी)

(3) समुद्र की तली पर रहने वाला, समान्यतः अपमार्जक में बाँटा गया है।

इकोटोन :- जीव समुदाय एक दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण कर जब एक ऐसे विनियम क्षेत्र का निर्माण करते है जहाँ दो क्षेत्रो के जीवों का सह अस्तित्व होता है। ऐसे माध्यमिक क्षेत्रों को ही ईकोटोन या सवंमित क्षेत्र कहते हैं।

दीप्तिकालिता :-  प्रकाश अवधि को दीप्तिकाल तथा इसके प्रभाव को दीप्तिकालिता कहते है। इसके आधार पर पौधों के कई वर्ग हैं

  1. – दीर्घ दीप्तिकाली पौधों जैसे पालक, हेनबेन आदि
  2.  अल्प दीप्तिकाली पौधे जैसे सोयाबीन, जेन्थियम आदि
  3.  प्रकाश उदासीन पौधे जैसे टमाटर, मिर्च आदि
  4.  मध्यवर्ती प्रकाशीय जैसे मिकेनिया
  5. दीर्घ अल्प प्रकाशीय जैसे ब्रायोफिल्ल
  6. अल्प दीर्घ प्रकाशीय जैसे गेंहॅू आदि।

मृदापरिच्छेदिका :-  मृदा के विभिन्न स्तरों के अनुक्रम रचना, लवणीय तथा स्वभाव को मृदापरिच्छेदिका कहा जाता है। मृदा की खड़ी कर मृदापरिच्छेदिका का अध्ययन किया जाता है तथा इसे निम्न स्तरों में विभाजित करते  हैं।

अ-  जो मिट्टी की ऊपरी पर्त है जिसमें ह्यूमस के रूप में अपघटित तथा अपघटित कार्बनिक पदार्थ पाये जाते हैं। पौधों की जड़ें समान्यतः इसी भाग में होती है।

ब-  को उपमृदा भी कहते हैं। ह्यूमस की मात्रा कम होती है। निक्षालन के कारण इसमे खनिज लवण प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।

 स –  मृदा परिच्छेदिका का सबसे निचला स्तर जिसमें मातृ चट्टानों के टुकड़े पाये जाते हैं।

द-  जिसमें मूल चट्टाने पायी जाती हैं।

नोट :-

1.दृश्य प्रकाश की तरंगें 320-750 mμ तरंग लम्बाई की प्रकाश संश्लेषण में सहायता करती है। इसमें से पीली और हरी किरणों का उपयोग विशेष रूप से नहीं होता है। सूर्य प्रकाश की पत्ती पर पड़ने वाली मात्रा का लगभग 83 प्रतिशत पत्ती द्वारा अवशोषित होता है। 12 प्रतिशत परावर्तित तथा 5 प्रतिशत पारगत हो जाता है। अवशोषित प्रकाश में से लगभग 4 प्रतिशत का उपयोग प्रकाश संश्लेषण में होता है। शेष भाग ऊष्मा के रूप में वातावरण मे ंचला जाता है।

2.अन्धकार में उगाये पौधों में पर्णहरित का निर्माण नहीं होता है। ऐसे पौधे पीले, कमजोर और लम्बे होते हैं। इस लक्षण को पाण्डुता कहते हैं।
प्रकाश पौधों में रन्ध्रों के खुलने और बन्द होने की क्रिया को प्रभावित करके वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करता है। प्रकाश की तीव्रता के कारण तापमान में वृद्धि होती है। और वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।

3.उत्तरी गोलार्द्ध में समुद्री धाराओं की दिशा दक्षिणावर्ती व दक्षिणी गोलार्द्ध में वामावर्ती होती है। यह कारिआॅलिस प्रभाव के कारण होता है।
पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करने वाला सर्वोच्च कारक सूर्यातप है।

4.राजस्थान की साॅभर झील मित पोषणी झील का उदाहरण है।

5.उष्णकटिबन्धीय सदाबहार वन धरातलीय जीवोम वानस्पतिक विकास व जीव समुदाय के दृष्टिकोण से सर्वाधिक उन्नत है। उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वनों में क्राउन शाईनेस नामक परिदृश्य दिखायी पड़ता है।

6.पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग 465 मीटर/सेकेण्ड की गति से घूमती है।

7.चैपरैल को भूमध्य सागरीय कुंजवन भी कहते हैं। इन क्षेत्रों में पूरे वर्ष मौसम शुष्क रहता है। इनका विस्तार उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, दक्षिणी आस्ट्रेलिया चिली आदि में है। वृक्ष तथा झाडियाँ यहाँ की मुख्य वनस्पति है। चैपरैल में यूकेलिप्टस, ओक, आर्टीमिसिया, गे्रविलिया आदि वनस्पतियाॅ पायी जाती हैं।

8.आरोही पादप अन्य पौधों से लिपटकर ऊपर चढ़ते है ताकि उचित मात्रा में प्रकाश प्राप्त कर सकें। परजीवी तथा अर्द्ध परजीवी पौधों से भोजन प्राप्त करते हैं।

9.अमरवेल लोरेन्थस चन्दन दूसरे पौधों पर उगते हैं। लाइकेन परस्पर सहजीविता का उदाहरण।

श्वसन Respiration

श्वसन Respiration

श्वसन Respiration

श्वसन Respiration कोशिकीय स्तर पर भोज्य पदार्थों के जैवरासायनिक आॅक्सीकरण को श्वसन कहते हैं। इस प्रक्रिया में आॅक्सीजन ग्रहण की जाती है तथा कार्बन डाइ-आॅक्साइड एवं ऊर्जा मुक्त होती है। ऊर्जा जैविक क्रियाओं के काम आती है। जटिल बहुकोशिकीय जन्तुओं में श्वसन प्रक्रिया कई चरणों में सम्पन्न होती हैं।

(1) वाह्य श्वसन :- इस प्रक्रिया में श्वसन सतह तथा बाह्य वातावरण के बीच श्वसन गैसों का आदान प्रदान होता है।

(2) गैसों का परिवहन:- इसमें श्वसन सतह से आॅक्सीजन का शरीर ऊतकों तक संवहन तथा कार्बन डाइआॅक्साइड का शरीर ऊतकों से श्वसन तक संवहन होता है।

(3) कोशिका श्वसन :- कोशिका में कार्बनिक पदार्थों का जैव रासायनिक आॅक्सीजन होता है तथा ऊर्जा मुक्त होती है जो एडिनोसिन ट्राईफास्फेट (ATP) में संचित हो जाती है।

श्वसन दो प्रकार के हाते हैं :-

(1) वायवीय श्वसन  :- आॅक्सीजन की उपस्थिति में कार्बनिक भोज्य पदार्थों (ग्लूकोज का पूर्ण आक्सीकरण) होता है। इसके फलस्वरूप कार्बनडाईऑक्सती है।

(2) अवायवीय श्वसन  :- इसमें ग्लूकोज या अन्य कार्बनिक पदार्थों का विघटन आॅक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। इस प्रकार का श्वसन कुछ जीवाणुओं, यीस्ट, तथा अन्तः परजीवी जन्तुओं आदि में होती है। ऐच्छिक पेशियों में आॅक्सीजन के आभाव में आवायवीय श्वसन के फलस्वरूप लैक्टिक अम्ल बनता है तथा बहुत कम मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है।

अवायवीय तथा वायवीय श्वसन को क्रमशः अनाक्सी तथा आक्सी श्वसन भी कहते हैं।

जलीय कशेरूकियों में प्रायः क्लोम तथा स्थलीय में फेफडे़ प्रमुख श्वसननांग होते हैं। फेफडे वक्ष भाग की फ्लूरल गुहाओं हृदय तथा मध्यावकाश के पाश्र्वों में स्थित दो बड़े अंग होते हैं। ये एक ही लम्बी श्वसनाल या टैªकिया से जुडे़ होते हैं। श्वास नली, ग्रासनली के साथ-साथ जन्तु की ग्रीवा में होती हुई कण्ठ के कण्ठ द्वार से मुख ग्रासन गुहिका के ग्रसनी भाग में खुलती है।

वायवीय श्वसन प्रक्रिया के दो प्रमुख चरण गैसीय विनिमय तथा कोशिकीय श्वसन है। गैसीय विनिमय में वाह्य श्वसन, गैसीय संवहन तथा अन्तः श्वसन आते हैं।

वायु सेकार्बन डाइ-आॅक्साइड  के बदले आॅक्सीजन ग्रहण करने की सम्पूर्ण प्रक्रिया वाह्य श्वसन है।

मनुश्य के श्वसन तंत्र के निम्न अंग है-

(1) नाषिका एवं नासामार्ग:- नासिका हमारे चेहरे पर मुख द्वार तथा माथे के एवं दोनों आॅखों के बीच उभरी हुई खोखली संरचना होती है। माथे के निकट इसके दबे हुए आधार भाग को इसका मूल कहते हैं। नासिका के छोर पर एक जोड़ी बाह्य नासाद्वार या नासा छिद्र स्थित होता है। नासिका गुहा उपास्थि के बने नासा पुट द्वारा दो भागों में बंटी रहती है। नासामार्ग की अधर तथा पाश्र्व भित्ति से घुमावदार व खोखली प्लेटों के रूप में टरबाइनल अस्थियाॅ पायी जाती हैं। ये नेजल मैक्सिला तथा एथमाॅएड अस्थियों के प्रवर्ध होते हैं।

नासा मार्ग की तंत्रिका संवेदी एपीथीलियम को श्नीडेरियन कला कहते हैं। यह गन्ध का ज्ञान कराती है। नासा मार्ग तथा मुख गुहिका दोनों ग्रसनी में खुलते हैं। ग्रसनी का नासा ग्र्रसनी भाग कण्ठद्वार द्वारा वायु नाल में खुलत है। श्वासनाल का सबसे ऊपरी भाग स्वतंत्र है। जिसमें वाक रज्जु उपस्थित होते हैं। स्वर यंत्र से वायु के बाहर निकलने पर वाक रज्जुओं मे कम्पन होता है जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है। वायु नाल ग्रीवा से होकर वक्षगुहा में प्रवेश करती है। वायु नाल ग्रास नली के अधर तल पर स्थित होता है। वायुनाल की भित्ति में भी उपस्थि के बने ब् आकार के छल्ले होते हैं जो इसकी भित्ति को पिचकने से रोकते हैं। वक्षगुहा में प्रवेश करने के पश्चात् वायुनाल दो श्वसनियों में विभाजित हो जाती है जो अपनी-अपनी ओर के फेफडों मे प्रवेश कर जाती है तथा फेफड़े के भीतर ये छोटी शाखाओं तथा उपशाखाओं में विभाजित हो जाती है।

फेफड़े- वक्षगुहा में एक जोड़ा फेफड़े हृदय के पाश्र्व में स्थित होते हैं फेफडे गुलाबी रंग के कोमल तथा स्पन्जी होते हैं। फेफडे दोहरी झिल्ली से ढके रहते हैं। जिसे प्लूरल कला कहते हैं। दोनों झिल्लियों के मध्य के स्थान को प्लूरल गुहा कहते हैं। इस गुहा में जलीय तरल भरा रहता है जिससे श्वासोच्छवास के समय दोनों कलांए एक-दूसरे के ऊपर फिसल सकें। फेफडे का निचला भाग डायाफ्राम पर टिका रहता है, डायाफ्रम एक पेशीय परदा है, जो देहगुहा को ऊपरी वपक्षगुहा तथा निचली उदरगुहा में बाॅटता है। दाहिना फेफड़ा तीन पिण्डों मे बॅटा रहता है-

(1) दाहिना अग्र पिण्ड (Right anterior lobe)
(2) दाहिना मध्य पिण्ड (Right middle lobe)
(3) द पश्च पिण्ड (Right posterior lobe)

बाॅया फेफड़ा दो पिण्डों मे बॅटा होता है-

(1) बायाॅ अग्र पिण्ड तथा

(2) बांया पश्चत पण्डि

फेफड़ों में फैला महीन नलिकाओं का जाल श्वसनीय वृक्ष कहलाता है। श्वसनी की छोटी शाखाओं केा श्वसनिका कहते हैं। प्राथमिक श्वसनिका विभाजित होकर द्वितीयक एवं तृतीयक श्वसनिका बनाती हैं। ये आगे चलकर छोर श्वसनिकाओं, फिर श्वसन श्वसनिका तत्पश्चात् कूपिका नलिकाओं में बॅटी होती है। ये कूपिका नलिकाएॅ वायु से भरे वायु कोष में खुलती हैं। प्रत्येक वायुकोष दो या अधिक वायु कोष्ठोकों मे बंटा रहता है।

स्वर-यंत्र की दीवार में 9 उपस्थियों का अन्तः कंकाल होता है।
हमारे प्रत्येक फेफड़े मे लगभग 15 करोड वायु कोष्ठक होते हैं। वायुकोष्ठकों की दीवार में महीन शलकी एपीथीलियम का भीतरी तथा महीन संयोजी ऊतक का बाहरी स्तर होता है।

 श्वसन  क्रिया :- बाहरी हवा को फेफडों में एक निश्चित दर 12 से 15 बार प्रति मिनट से बार-बार भरना और निकालना ही श्वास क्रिया या श्वासोच्छवास है। यह एक यान्त्रिक क्रिया है। हवा को फेफड़ों में भरना अन्तःश्वास तथा निकालना निःश्वास कहलाता है। श्वसन-क्रिया चार चरणों में सम्पन्न होती है-

(1) बाह्य ष्वसनः- प्रक्रिया के दो चरण होते है-

(a) श्वासोच्छवास एवं

(b) गैसीय विनियम।

(2) स्वास गैसों का ऊतकों तक संवहन तथा ऊतकों से श्वसन सतह तक संवहन।
(3) आन्तरिक श्वसन या रूधिर व ऊतकों के बीच गैसीय विनिमय।
(4) कोशिका श्वसन या ऊतक श्वसन इसी को आन्तरिक श्वसन भी कहा जाता है।

अन्तः स्वसन में फेफड़ों में वायु का दबाव वायुमंडल से 3m.mhg
कम होता है जिसके कारण वायु श्वसन मार्ग से आकर फेफड़ों में भर जाती है। निःश्वास में फेफड़ों में वायु का दबाव 1 से 2m.mhg अधिक हो जाता है जिसके कारण फेफड़ें की वायु श्वसन मार्ग से बाहर होती हुई निकल जाती है। हम श्वास द्वारा प्रतिमिनट लगभग 250 मिली आॅक्सीजन ग्रंहण करते हैं तथा 220 मिली कार्बन डाई आॅक्साइड बाहर निकालते हैं। श्वास का मापन श्वासमापी द्वारा किया जाता है। फेफड़ों से सम्बन्धित वायु की चार प्रकार की मात्राएँ महत्वपूर्ण हैं जो फुस्फुसीय मात्राएॅ या श्वास आयतन कहलाते हैं। चारों मात्राएं निम्न हैं-

(1) प्रवाही वायु- सामान्य युवा पुरूष में 500 मिली लीटर
(2) अन्तःष्वास आरक्षित वायु- युवा पुरूष में सामान्यतः 3000 मि0ली0
(3) उच्छ्वास या निःष्वास आरक्षित वायु- युवा पुरूष में 1100मि0ली।
(4) अवषेशवायु- युवा पुरूष में लगभग 1200 मि0ली0 मनुष्य की हर सामान्य साँस में लगभग 2 सेकेण्ड की अन्तः श्वास तथा 3 सेकेण्ड की निःश्वास होती है।

हमारे दोनों फेफडों में लगभग 30 करोड़ कोष्ठक होते हैं। कोष्ठकों की महीन दीवार में रूधिर कोशिकाओं का घना जाल होता है। कोष्ठों की भीतरी शल्की एपीथीलियम तथा रूधिर कोशिकाओं की एण्डो-थीलियम लगभग सटी रहती है और दोनों मिलकर एक श्वसन कला बनाती है जो  कार्बन डाइ-आॅक्साइड तथा आॅक्सीजन  लिए अत्यधिक पारगम्य होती है।

वायुमण्डल की हवा में मुख्यतः 78.98% नाइट्रोजन, 20.98% आॅक्सीजन, 0.04% कार्बन डाइ-आॅक्साइड   तथा 0.5ः जलवाष्प तथा सूक्ष्म मात्रा में हीलियम, आर्गन एवं नियाॅन गैसे होती हैं।

वायु कोष्ठकों में लगभग 2300 मिली कार्यात्मक अवशेष वायु इनमें हर समय भरी रहती है।

रूधिर में आॅक्सीजन का संवहन :- रक्त के प्लाज्मा में आॅक्सीजन  के वहन करने की क्षमता बहुत कम होती है क्योंकि जल में आॅक्सीजन की घुलनशीलता कम होती है। इसीलिए रक्त में आॅक्सीजन के संवहन के लिए हीमोग्लोबिन होता है जो लौहयुक्त संयुक्त प्रोटीन होता है। इसके अणु में चार उपिकाइयाँ होती हैं। जिनमें से प्रत्येक एक लम्बी व कुण्डलित पालीपेप्टाइड शृंखला एक लौहयुक्त पोरफाइरिन वलय से जुड़ी होती है। मौलस्का, आर्थोपोडा तथा कुछ अन्य कशेरूकियों में हीमोग्लोबिन के स्थान पर हीमोसाएनिन होता है।

हीमोग्लोबिन का रंग बैगनी तथा आॅक्सीजनीकरण के पश्चात् बने आॅक्सी हीमोग्लोबिन का रंग चमकीला लाल होता है। सामान्य व्यक्ति में हीमोग्लोबिन की मात्रा औसतन 15 ग्राम प्रति 100 मिली रूधिर होती है। एक ग्राम हीमोग्लोबिन लगभग 1.34 मिली0 आॅक्सीजन को बाॅधता है। 100 मि0ली0 शुद्ध रूधिर की हीमोग्लोबिन अर्थात आॅक्सीहीमोग्लोबिन में लगभग 20 मिली 15 ग्राम 1.34 आॅक्सीजन बँधी होती है।

रूधिर में कार्बन डाॅइआॅक्साइडका संवहन :- ऊतकों से फेफड़ों के श्वसन तल तक कार्बन डाइ-आॅक्साइड का संवहन रूधिर तीन प्रकार- (1) प्लाज्मा घुली अवस्था में, (2) बाई कार्बोनेट आयनों के रूप में तथा (3) कार्बेमिनों यौगिकों के रूप में करता है।

कोशिका श्वसन Cellular Respiration

कोशिका श्वसन

कोशिका श्वसन Cellular Respiration 

कोशिकीय आॅक्सीकरण की प्रक्रिया को कोशिकीय श्वसन कहते हैं। कोशिका श्वसन  इसके तीन प्रमुख चरण हैं- 
(1) ग्लाइकोलासिस :- इसमें ऑक्सीजन का उपयोग नहीं होता वरन् कुछ ऊर्जा अवश्य मुक्त होती है। जीवाणु तथा कुछ जन्तुओं एवं पादपों की कोशिकाएँ इसी विधि से ऊर्जा उत्पादन करती हैं। इसी समय शर्करा का विघटन होता है। इसे अनाक्सी श्वसन कहते हैं जो आक्सीजन का प्रथम चरण है जो ग्लाइकोलाइसिस कहलाता है।(2) क्रैब्स चक्र या सिट्रिक अम्ल चक्र :- आठ प्रमुख हाइड्रोजनहरण एवं कार्बोक्सिल हरण अभिक्रियाओं की एक चक्रीय श्रृंखला होती है जिसके द्वारा माइटोकाण्ड्रिया में ऐसटिल सहएन्जाइम A ऐसेटिल अंश के कार्बन परमाणुओं को हाइड्रोजन परमाणुओं से पृथक किया जाता है। कार्बन परमाणु आॅक्सीन से मिलकर  कार्बन डाइआॅक्साइड के रूप से मुक्त हो जाते हैं, परन्तु हाइड्रोजन परमाणुओं को विशेष प्रकार के हाइड्रोजन-ग्राही पदार्थ ग्रहण करते हैं। श्रृंखला का वर्णन चूॅकि सर हान्स क्रैब्स ने किया था, अतः क्रैब्स चक्र कहते हैं। चक्र का प्रारम्भ 6 कार्बनीय सिट्रिक अम्ल के संश्लेषण से होता है। इसी लिए इसे सिट्रिक अम्ल चक्र कहते हैं। इसे ट्राई कार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र भी कहते हैं।

(3) इलेक्ट्रान परिवहन तंत्र :- ग्लाइकोलाइसिस एवं क्रब्स चक्र की अभिक्रियाओं में कुछ ऊर्जा मुक्त होकर ARP में संग्रहित होती है। इन अभिक्रियाओं का मुख्य उद्देश्य ईधन पदार्थों से हाइड्रोजन परमाणुओं को पृथक करके अधिकांश हाइड्रोजन परमाणुओं को NAD’ में और कुछ को FAD में स्थानान्तरित करने को होता है। इस प्रकार NADH’H’ एवं FADH2 के हाइड्रोजन परमाणुओं के इलेक्ट्राॅन्स में बहुत सी विभव ऊर्जा संग्रहित होती है। NADH+H*4एवं FADH2 के अणु अपने हाइड्रोजन परमाणुओं को इन्हीं श्रृंखलाओं को सौंपकर वापस NAD+और FAD में उपचयित हो जाते हैं ताकि ये ग्लाइकोलाइसिस एवं क्रैब्स चक्र में फिर से भाग ले सकें। इन श्रृंखलाओं मे पहले हाइड्रोजन परमाणुओं का इनके आयनों (इलेक्ट्राॅन्स एवं प्रोटान्स) में विखण्डन होता है और फिर केवल इलेक्ट्रान्स को कुछ इलेक्ट्रानग्राही प्रोटीन्स बार-बारी से ग्रहण करके दूसरी को सौंपती है। इसीलिए इन श्रृंखलाओं को इलेक्ट्रान परिवहन तंत्र कहते हैं।

नोट :-

  • ए0टी0पी0 (ATP) संरचना का वर्णन किसने किया – लोहमैन ने
  •  किसे ऊर्जा का दलाल, जैव ऊर्जा शटल ऊर्जा मुद्रा आदि नामों से पुकारा जाता है – (ATP) को
  •  लगभग 70% कार्बन डाइआॅक्साइड का परिवहन किस रूप में होता है – बाईकार्बोनेट के रूप में।
  • नासा मार्ग की अधर तथा पाश्र्व भित्ति से घुमावदार व खोखली प्लेटों के रूप में कौन सी अस्थियाँ पायी जाती हैं – टरबाइनल अस्थियाँ।
  • नासा मार्ग की तंत्रिता संवेदी एपीथीलियम को कहा जाता है – श्नीडेरियन कला
  •  यीस्ट कोशिकाओं में पाइरुविक अम्ल किसमें टूटता है – एथिल एल्कोहल एवं  कार्बन डाइआॅक्साइड में
  •  रसायनों की परासरणी परिकल्पना का प्रतिपादन करने वाले-पीटर मिचे
  • इलेक्ट्राॅन परिवहन को अवरूद्ध करने वाले विष पदार्थ – रोटीनान, सायनाइड, कार्बन मोनो आॅक्साइड

परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System)

परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System)

परिसंचरण तन्त्र में हृदय रक्तवाहिकाएँ तथा लसिका वाहिनियों को सम्मिलित किया जाता है। हृदय एक विशाल पम्प के रूप में कार्य करता है तथा रक्त को सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित करता है। धमनियाँ शुद्ध रक्त को हृदय से शरीर में ले जाती है और शिराएँ अशुद्ध रक्त को शरीर से हृदय तक लाती है। केशिकाओं (Capillaries) में धमनी तथा शिरा के रक्त का सम्मिलन होता है। यहाँ रक्त तथा अन्तराकोशिका तरल के मध्य पोषक पदार्थ प्राप्त करने, अपशिष्ट का त्याग करने तथा गैसों के विनिमय होने की क्रिया होती है। कोशिका भित्तियों से जो लिम्फ ऊतकों में रिसता है वह लसिका वाहिनियों द्वारा एकत्रित और परिशोधित होकर पुनः रक्त में मिल जाता है।

हृदय एक पेशी का बना शंकु (cone) के आकार का खोखला मांसल अंग है जिसका आधार ऊपर होता है और शिखर (apex) नीचे। शिखर का झुकाव तनिक बांयीं ओर होता है। हृदय का वजन लगभग 300 ग्राम होता है। हृदय वक्ष में फेफड़ों के मध्य उरोस्थि या स्टर्नम के पीछे स्थित होता है। इसका आकार लगभग बन्द मुठ्ठी के समान होता है एक भित्ति द्वारा यह दायें और बायें भागों में विभाजित होता है। ये दोनों भाग पुनः दो कोष्ठों में बँटे होते हैं। ऊपर का कोष्ठ ’अलिंद’ (auricle) तथा नीचे का कोष्ठ निलय  कहलाता है। इस प्रकार दो अलिंद तथा दो निलय होते हैं। मनुष्य का हृदय चार कोष्ठीय होता है। आकार में निलय अलिंद से बड़ा होता है तथा निलय की दीवार भी अलिंद से बहुत मोटी होती है। अलिंद और निलय एक दूसरे के द्वारा जुड़े होते हैं। यह द्वार कपाटों (वाल्व) द्वारा सुरक्षित रहता है। दाँयी ओर का कपाट त्रिकपर्दी (ventricle) होता है, तथा बांयी ओर का कपाट द्विकपर्दी  tricuspid या माइट्रल वाल्व कहलाता है। अलिन्द-निलय वाल्व में से रक्त केवल अलिन्द से निलय की ओर प्रवाहित हो सकता है। इसके विपरीत दिशा में नहीं। त्रिकपदीं वाल्व तीन कपर्दिकाओं (cusps) तथा माइट्रल वाल्व दो कपर्दिकाओं से बनता है।

हृदय आवरण अथवा पैराकार्डियम के एक दोहरे कोश के भीतर बन्द होता है। इस कोश की दोनों तहों के बीच में विद्यमान सीरमी तरल इन तहों को चिकना रखता है जिससे हृदय मुक्त रूप से गतिशील बन जाता है।

हृदय की भित्ति की तीन परतें होती हैं पेरिकार्डियम नामक बाहरी परत, मायोकार्डियम नामक मध्य परत तथा एण्डोकार्डियम नामक उपकला की भीतरी परत होती है।

हृदय से सम्बद्ध रक्त वाहिकाएँ :- ऊध्र्व और निम्न महाशिराएँ अपना रक्त दायें आलिंद में डालती हैं। निम्न महाशिरा जहाँ दायें अलिंद में खुलती है, उस स्थान का यूस्टेशियस का अर्द्धचन्द्र वाल्व (Semi lunar valve of Eustachian) उचित दिशा में रक्त प्रवाह बनाये रखने में सहायक होता है। फुस्फुस धमनी दायें निलय से रक्त फेफड़ों तक ले जाती है तथा वहाँ से रक्त चार फुस्फुस शिराओं द्वारा बायें अलिंद में जाता है। बांयें निलय से रक्त ’एओर्टा’ अथवा महाधमनी में प्रवाहित होता है। एओर्टा तथा फुफ्फुस के धमनी द्वार अर्द्धचन्द्र वाल्वों द्वारा सुरक्षित रहते हैं। बांये निलय तथा महाधमनी के बीच का वाल्व एओर्टिक वाल्व कहलाता है तथा रक्त को एओर्टा से वापस बायें निलय में जाने से रोकता है। दायें निलय और फुफ्फुस धमनी के बीच का वाल्व फुफ्फुस वाल्व  कहलाता है तथा रक्त को विपरीत दिशा में फुफ्फुस धमनी से दायें निलय में जाने से रोकता है।

हृदय ऊतक से रक्त की वापसी मुख्यतः ’कारोनरी साइनस’ द्वारा होती है जो सीधे दायें अलिंद में खुलता है।

हृदय एक पम्प के समान कार्य करता है। रक्त के परिसंचरण से सम्बन्धित क्रियाएँ जो हृदय में होती हैं, उसे सम्मिलित रूप से हृदय चक्र कहा जाता है। अलिंन्द और निलय की क्रिया को दो भागों में विभक्त किया गया है। प्रंकुचन या सिस्टोल तथा अनुशिथिलन या डायस्टोल।

सिस्टोल में हृदय के कोष्ठ सिकुड़ते हैं तथा डायस्टोल में कोष्ठ रक्त से भरकर फूल जाते हैं। दोनों अलिंदों का सिस्टोल एक साथ होता है। दोनों अलिंदों का डायस्टोल भी एक ही समय होता है। यही बात निलयों पर भी लागू होती है। निलय का प्रंकुचन या सिस्टोल 0.3 सेकेण्ड तथा अनुशिथिलन कुछ अधिक 0.5 सेकेण्ड रहता है। यही क्रम जीवन पर्यन्त दिन रात चलता रहता है।

हृदय पेशी की कुछ विशेषताओं में संकुचन शीलता जिसके कारण हृदय रूपी पम्प अपने कोष्ठों में रक्त को निष्कासित कर देता है। डायस्टोल के समय ये कोष्ठ रक्त में पुनः भर जाते हैं। चालकता (conductivity) ताल (Rhythm) जिसमें बिना किसी तन्त्रिका प्रभाव के उसमें स्वचालित ताल बद्ध संकुचन होता रहता है।

धमनी नाड़ी (Arterial Pulse) :- यह अधिक दाब की एक लहर है जो धमनियों में उस समय प्रकट होती है, जब हृदय रूपी पम्प रक्त को बाहर धकेलता है। नाड़ी का स्पर्श करते समय जो स्पन्दन अनुभव होता है, वह हृदय द्वारा महाधमनी एओर्टा) में धकेले गये रक्त के पहुँचने के कारण नहीं बल्कि ओर्टा में रक्तदाब के कारण होता है। नाड़ी की गति हृदय चक्र से सम्बन्धित होती है। नाड़ी की गति 70 हो तो हृदय की धड़कन भी एक मिनट में 70 बार होती है। नाड़ी की गति का सामान्य परिसर (स्पंदन प्रति मिनट)

नवजात शिशु में 140                                पाँच वर्ष 96-100
प्रथम वर्ष में 120                                      दस वर्ष पर 80-90
द्वितीय वर्ष में 110                                    वयस्क व्यक्ति में 60-80

विश्राम के समय हृदय लगभग 70 बार प्रतिमिनट धड़कता है तथा हर बार 70ml रक्त धकेलता है। इस प्रकार एक मिनट में पम्प किये गये रक्त का परिणाम 70×70ml अर्थात लगभग 5 लीटर होता है। हृदय जितना रक्त बाहर धकेलता है ठीक उतना ही रक्त प्रति मिनट शिराओं द्वारा हृदय में वापस आता है। प्रति शिरा प्रति गमन (venous returns) और हृदय विकास का संतुलन न रहे और निलय हृदय में आने वाले सारे रक्त को निष्कासित न कर पाये तो हृदयपात (Heart failures) की स्थिति पैदा हो जाती है।

रक्त का परिसंचरण:-बायें अलिन्द से रक्त महाधमनी अथवा एओर्टा में आता है, जो शरीर की सबसे बड़ी धमनी है। इस महाधमनी से अनेक छोटी धमनियाँ निकलती हैं जो शरीर के विभिन्न भागों तक जाती हैं। धमनिकाओं की भित्ति पेशी के संकुचन अथवा शिथिलन के कारण धमनियों का आकार आवश्यकतानुसार न्यूनाधिक होता रहता है। इस प्रकार धमनीय रक्त दाब के स्थिर रहने में सहायता मिलती है तथा केशिकाओं की भित्ति के पतली होने के कारण प्लाज्मा और अन्तराली तरल का परस्पर विनिमय होता रहता है। शिराएं आपस में मिलते-मिलते दो महाशिराओं का रूप लेती है। पहली अधः महाशिरा  है जो धड़ तथा निचली शाखाओं से रक्त एकत्रित करती हैं। तथा दूसरी ऊध्र्व महाशिरा है जो सिर तथा ऊपरी शाखाओं से रक्त एकत्रित करती है। ये दोनों महाशिराएँ हृदय के दायें अलिंद में खुलती है।

फुफ्फुस परिसंचरण :- दायें अलिन्द से रक्त दायें निलय में जाता है और उसके संकुचित होने पर फुफ्फुस धमनी में धकेल दिया जाता है। फुफ्फुस धमनी दो भागों में विभाजित होकर रक्त को दायें बायें फुफ्फुस में ले जाती है। फुफ्फुसीय धमनी में अशुद्ध रक्त प्रवाहित होता है। धमनियों में रक्त उच्च दाब पर बहता है, इस दाब को प्रकुंचन दाब (systolic pressure) कहते हैं। यह दाब निलयों के संकुचन से उत्पन्न होता है। निलय के अनुशिथिल के फलस्वरूप अनुशिथिलन दाब (Diastolic pressure) उत्पन्न होता है। किसी कारणवश प्रकंचन दाब में अस्थायी वृद्धि होने पर यदि रक्त दाब में स्थायी वृद्धि हो जाये तो इसे उच्च रक्त ताप  या हाइपर टेन्सन कहते है। रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ जाने से यह धमनियों की भीतरी दीवार पर जम जाता है जिससे धमनियाँ सँकरी और कड़ी हो जाती है, इसे आर्टेरियोस्क्लेरोसिस (Arteriosclerosis) कहते हैं। इसके फलस्वरूप भी रक्तदाब बढ़ जाता है।

शरीर में रक्त की कमी, रक्तस्राव या हृदय की कार्य क्षमता में कमी आने से ’निम्न रक्त दाब’ या हाइपोटेन्शन (Hypo tension) नामक रोग हो जाता है।

शिराएं शरीर के समस्त अंगों से अशुद्ध रक्त हृदय में लाती हैं लेकिन फुफ्फुसीय शिरा इसका अपवाद है जिसमें शुद्ध रक्त बहता है।

हृदय सम्बन्धी रोग (cardiovascular disease)

हृदय सम्बन्धी रोग (cardiovascular disease)

हृदयावरण शोथ(Pericarditis) :-  इस दशा में हृदय को ढकने वाली झिल्ली में सूजन आ जाती है और हृदयावरण कोश (pericardium) में तरल एकत्रित हो जाता है। फलस्वरूप हृदय की मुक्त गति नहीं हो पाती। हृदयावरण (पेरिकार्डियम) धीरे-धीरे मोटा और कठोर हो जाता है तथा हृदय को कसने लगता है, इस कारण हृदय फैल नहीं पाता और उसमें रक्त पूरी तरह नहीं भर पाता। इसी अवस्था को संकीर्णकारी हृदयावरण शोथ कहते हैं।

अन्तः हृदयशोथ(Endocarditis) :- हृदय कोष्ठों को भीतर की ओर से ढकने वाली कला एण्डोकार्डियम में सूजन आ जाने से यह रोग हो जाता है। ऐसा रुमेटी ज्वर(Rheumatic Fever) में हो सकता है। यह माइट्रल वाल्व को प्रभावित करता है।

कोरोनरी धमनी रोग :- कोरोनरी धमनी के धीरे-धीरे संकीर्ण होते रहने से अतिरिक्त घनास्र (Thrombus)के कारण यह यकायक बंद या अवरूद्ध हो सकती है। इस प्रकार हृद पेशी का रक्त संभरण(Supply) घट जाता है जिससे हृद पेशी स्थानिक अरक्तता तथा रोगी की छाती में पीड़ा या हृद शूल होता है।

रक्त संकुल हृदपात(Congestive heart failure):- यह अवस्था हृदय की पम्प क्रिया के असफल रहने के कारण होती है। रोगी को श्वास में कष्ट होता है तथा कोमल ऊतकों में शोभ-तरल एकत्रित हो जाता है।

रक्त(Blood) :- एक तरल ऊतक है जो दो भागों का बना होता है-एक तरल अंश जिसे प्लाज्मा कहते हैं, तथा एक जरा ठोस अंश जो रक्त कोशिकाओं के रूप में होता है। रक्त की संरचना निम्नलिखित घटकों से होती है-जल 91% प्रोटीन- 8% प्रतिशत (एल्बुमिन, ग्लोबुलिन, प्रोथ्राम्बिन तथा फाइब्रिनोजन)।
लवण 0.9 प्रतिशत (सोडियम क्लोराइड, सोडियम बाईकार्बोनेट तथा कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, लौह आदि के लवण)।

रक्त का शेष भाग अनेक कार्बनिक यौगिकों जैसे ग्लूकोज, वसा, यूरिया, यूरिक एसिड, क्रिएटिनिन, कोलेस्टेªरौल तथा अमीनो एसिड की अत्यन्त मात्रा होती है। इसके अलावा रक्त में आक्सीजन तथा कार्बन डाइआक्साइड गैस, आन्तरिक स्राव, एन्जाइम, एन्टिजन (प्रतिजन) पदार्थ होते हैं

 रक्त कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं –

  1. लोहित कोशिकाएँ (Red cells erythrocytes)
  2. श्वेत कोशिकाएँ (White cells or leukocytes)
  3.  विम्बाणु (Platelets or throm-bocytes) ।

लाल रक्त कोशिकाएँ :- छोटी, उभयातल चक्रिकाओं (Biconcave) के समान होती हैं। इनके दोनों पृष्ठ अवतल होते हैं। एक क्यूबिक मिलीमीटर रक्त में लगभग 50 लाख लाल कोशिकाएँ होती हैं। ये एक आवरण अथवा पीठिका की बनी होती हैं जिसमें हीमोग्लोबिन भरा होता है। लाल कोशिकाओं के निर्माण के लिए प्रोटीन आवश्यक होता है, जो एमीनो एसिडों से बनता है। हीमोग्लोबिन के निर्माण के लिए लोहा आवश्यक होता है। लाल कोशिकाओं का निर्माण अस्थि मज्जा में होता है।

लाल रक्त कोशिका की औसत आयु 120 दिन होती है। ऐसी कोशिका का विघटन जालिका-अन्तः कला तन्त्र(Reticuloendothelial System)में विशेषतः यकृत और प्लीहा में होता है।

हीमोग्लोबिन एक जटिल प्रोटीन है जिसमें लौह की पर्याप्त मात्रा होती है। आॅक्सीजन के साथ मिलकर आक्सी-हीमोग्लोबिन बनाते हैं। इस प्रकार रक्त के द्वारा आक्सीजन फेफड़ों से सभी ऊतकों तक पहुँच जाती है। रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा 15 ग्राम प्रति 100 घन सेंटीमीटर होती है। लैंडस्टीनर की ABO पद्धति के अनुसार रक्त को चार मुख्य वर्गों A,B,O,AB में बाँटा गया है।

श्वेत रक्त कोशिकाएँ (white  blood cells) :- पारदर्शी तथा रंगहीन कोशिकाएँ जो लाल कोशिकाओं की तुलना में आकार में अधिक किन्तु संख्या में कम होती है। प्रत्येक घन मिलीमीटर रक्त में 6000-10000 (औसत 8000) श्वेत कोशिकाएँ होती हैं। इसमें कणिका कोशिकाएँ (Granulocytes )जिनका न्यूक्लियस बहुखंडित होता है तथा इनका प्रोटोप्लाज्म (जीवद्रव्य) कणिकीय होता है, इसी कारण इन्हें कणिका कोशिका कहते हैं।

उदासीन रागी कोशिकाएँ (Necrophilia cells)  श्वेत कोशिकाओं में इनकी अधिकता होती है। इन्हें बहुरूपी केन्द्रक कोशिका भी कहते हैं। इनका रंग बैगनी होता है। इयोसीन रागी कोशिकाएँ (Eosinophil cells) इनकी संख्या बहुत कम होती है तथा लाल रंग की दिखती है। तीसरी क्षारक रागी कोशिकाएँ (Basophil cells)होती हैं।

लसिका कोशिकाएँ (Lymphocytes) :- इनकी उत्पत्ति अस्थिमज्जा के अतिरिक्त लसिका पर्वों, प्लीहा, यकृत और अन्य लिम्फ ऊतकों में भी होती हैं। ये दो प्रकार की लघु एवं वृहत लिम्फ कोशिकाएँ हैं। इसके अतिरिक्त कुछ इनसे भी अधिक आकार की कोशिकाएँ होती हैं जो मोनोसाइट (एक केन्द्रक श्वेत कोशिका) कहलाती हैं। इनकी संख्या 5 प्रतिशत होती हैं।

न्यूट्रोफिल और मोनोजाइट शरीर को सूक्ष्म जीवों से बचाने के लिए आवश्यक योग देती हैं। इनमें जीवित बैक्टीरिया का भक्षण करने की क्षमता होती हे। न्यूट्रोफिलों में एक प्रोटीन विघटनकारी एन्जाइम भी होता है जिसकी सहायता से वे जीवित ऊतक को विघटित कर सकते हैं।

श्वेत कोशिकाबहुलता (Leucocytosis) :-  इस दशा में श्वेत रक्त कोशिकाओं की गणना बढ़ जाती है। सामान्यतः 10,000 प्रति घन मिमी से अधिक होने पर ऐसा होता है।

श्वेत कोशिकाअल्पता (Lymphocytosis) :-  श्वेत कोशिकाओं की संख्या 5000 प्रति घन मिमी से कम होने पर ऐसी दशा हो जाती है।

लसिका कोशिकाबहुलता (Lymphocytosis)– रक्त में लिम्फोसाइट की गणना बढ़ने की स्थिति में ऐसा होता है।

कणिका कोशिकाहीनता (Agranulocytosis)  :- बहुरूप केन्द्रक अथवा कणिकाओं की संख्या का अत्यधिक घट जाना।

क्त विम्बाणु (Platelets) :- इन लघु कोशिकाओं का आकार लाल रक्त कोशिका की तुलना में लगभग एक तिहाई, एक घन मिली रक्त में इनकी संख्या 3 लाख होती है।

रक्त प्लाज्मा :-  एक हल्के पीले रंग का तरल है जिसकी अभिक्रिया तनिक क्षारीय होती है। प्लाज्मा के माध्यम से लवण, वसा, ग्लूकोज, एमीनो एसिड तथा अन्य पोषक पदार्थ ऊतकों तक पहुँचते हैं। इसके अतिरिक्त प्लाज्मा इन ऊतकों से अपशिष्ट उत्पाद ले जाता है।

उदाहरणत : यूरिया, यूरिक एसिड तथा कार्बन डाइआक्साइड का कुछ अंश।

प्लाज्मा प्रोटीनों में तीन मुख्य है-

एल्बुमिन, ग्लोब्युलिन एवं फाइब्रिनोजन :-  एल्बुमिन 100ml रक्त में सामान्यतः 3-5 ग्राम, ग्लोब्युलिन 100ml रक्त में 2-3 ग्राम होता है।

जीवन में मानव रक्त सदा तनिक क्षारीय होता है तथा इसका Ph7 .35-7.45  होता है।

रक्त का स्कंदन(Coagulation of blood) :-  रक्त स्राव होने के तुरन्त पश्चात् रक्त गाढ़ा और चिपचिपा हो जाता है।

लसिका तथा रुधिर में अन्तर

रुधिर  (blood)                                                                                    

  1.  रुधिर में लाल रुधिराणु पाये जाते हैं।
  2. रुधिर का रंग लाल होता है।
  3. आक्सीजन तथा पोषक पदार्थ अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।
  4.  विलेय प्लाज्मा प्रोटीन अधिक होती है। न्यूट्रोफिल्स की संख्या अधिक होती हे

 लसिका (Lymph)

  1. लसिका में लाल रुधिराणु नहीं पाये जाते।
  2. लसिका का रंग श्वेत होता है।
  3. उत्सर्जी पदार्थों की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है।
  4. अविलेय प्लाज्मा प्रोटीन अधिक होती है। चलिस्फोसाइट की संख्या अधिक होती है।

खुला रुधिर परिसंचरण तन्त्र                                                                       

  1.  धमनियां कोटरों में खुलती हैं।
  2. रुधिर प्रवाह की गति बहुत धीमी होती है।
  3. इस परिसंचरण तन्त्र में रक्त केशिकाएँ नहीं होती हैं।
  4. शरीर के विभिन्न अंग रुधिर के सीधे सम्पर्क में रहते हैं।

बंद रुधिर परिसंचरण तन्त्र

  1.  धमनियां कोशिकाओं में खुलती हैं।
  2. रुधिर उच्च दबाव व गति से प्रवाहित होता है।
  3. रक्त केशिकाएँ पाई जाती हैं।
  4. शरीर के अंग रुधिर के सीधे सम्पर्क में नहीं रहते हैं। तथा एक लाल जेली के रूप में जम जाता है। इस जेली अथवा थक्का के संकुचित होने या सिकुड़ने पर इससे हल्के पीले रंग का द्रव निकलता है। जो सीरम (serum) कहलाता है।

इलेक्ट्रो कार्डियोग्राम (E.C.G) :- हृदय के संकुचन तथा अनुशिथिलन के समय हृदय पेशियों में विद्युत रासायनिक तरंगों का प्रवाह होता है। हृदय के विभिन्न कक्षों में उत्पन्न इन विद्युतीय तरंगों के अन्तरों को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम नामक मशीन की सहायता से नापा व अंकित किया जा सकता है। इन अन्तरों का इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम द्वारा अंकन इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम  कहलाता है। स्फिग्मोमैनोमीटर की सहायता से रुधिर दाब की माप की जाती है।

निवाहिका तन्त्र (Portal stem) :- केशिकाओं में विभक्त होकर किसी अंग में समाप्त हो जाती है। ऐसे तन्त्र को निवाहिका तन्त्र कहते हैं।

संवहनी तन्त्र (Conducting system) :- हृदय स्पंदन के लिए हृदय में विशिष्ट हृद पेशियों से बना संवहनी तन्त्र होता है। यह तन्त्र हृदय स्पन्दन को पूरे हृदय में पहुँचाने का कार्य करता है।

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