इतिहास एक सामान्य परिचय

इतिहास

इतिहास इति+ह+आस् शब्दों के मेल से बना हुआ है। जिसका अर्थ है ऐसा निश्चित रूप से हुआ। अर्थात बीती हुई घटनाओं को हम इतिहास कहते हैं। किन्तु अतीत की सभी घटनाओं को इतिहास नही कह सकते हैं।’’प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित अतीत के क्रमबद्ध ज्ञान को इतिहास कहते हैं’’ व्यूरी ने इतिहास को विज्ञान कहा है। इनके अनुसार-

इतिहास विज्ञान है न कम न ज्यादा

परन्तु इसे मानविकी विषय के महत्वपूर्ण विषयों में जाना जाता है। लिपि के आधार पर इतिहास को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा गया है।

  1. प्रागैतिहास          
  2. आद्यइतिहास           
  3. इतिहास  

प्रागैतिहासिक पंचांगः

पृथ्वी की समय सारणी को प्रागैतिहासिक पंचांग कहा जाता है। इस समय सारणी को अनेक महाकल्पों में विभाजित किया गया है, महाकल्य कल्यों में बटें हैं एवं कल्प का विभाजन युगों में किया जाता है।

प्रागैतिहास काल

प्रागैतिहासिक स्थलों की खोज एवं संरक्षण का कार्य भारतीय पुरातत्व विभाग करता है। भारतीय पुरातत्व विभाग का जनक कनिघंम को माना जाता है। राबर्ट ब्रुशफूट को भारतीय प्रागैतिहास का पिता कहा जाता है। क्योंकि इन्होंने ही 1863 ई0 में मद्रास के पल्लवरम से पुरापाषाण उपकरण की खेाज की।
प्रागैतिहासिक काल को तीन भागों में बांटा गया है। 

  1. पुरापाषाण काल
  2. मध्य पाषाण काल
  3. नव पाषाणकाल    

पुरापाषाण काल

पुरापाषाण काल को भी तीन भागों में बांटा गया है।

  1. पूर्व-पुरा पाषाण काल
  2. मध्य-पुरा पाषाण काल  
  3. उच्च पुरापाषाण काल

पूर्व पुरा पाषाण काल (Lower Palaeolithic) (25 लाख ई0पू0 से 9 लाख ई0पू0)

इस काल से मानव आखेटक एवं खाद्य संग्राहक था। उसे अग्नि की जानकारी थी, किन्तु उसका प्रयोग करना नहीं जानता था। इस काल के उपकरण भारत के विभिन्न भागों से प्राप्त हुए हैं। इन्हें दो प्रमुख भागों में बांटा जा सकता है।
चापर-चापिंग पेबुल संस्कृति-इसे सोहन-संस्कृति भी कहा जाता है क्योंकि पंजाब के सोहन घाटी से सर्वप्रथम इसके उपकरण प्राप्त हुए हैं।
हैण्ड एैक्स संस्कृति- इसके उपकरण सर्वप्रथम बदमदुरै तथा अन्तिरपक्कम (मद्रास) से पाये गये हैं।
कुछ मुख्य स्थल निम्नलिखित है-
आरम्भिक सोहन प्रकार के पेबुल उपकरण चित्तौड़ (राजस्थान) सिंगरौली तथा बेलन नदी घाटी (क्रमशः उ0प्र0 मिर्जापुर, इलाहाबाद) साबरमती तथा माही नदी घाटियाँ (गुजरात) वेल्लौर एवं गिंड्नूर (आन्ध्रा) मयूर भंज (उड़ीसा) से प्राप्त दिये गये हैं। महाराष्ट्र में गोदावरी नदी की सहायक प्रवरा नदी के पास नेवासा में कर्नाटक के मालप्रभा और घाट प्रभाव की घाटियों में भी इस तरह के उपकरण मिले हैं। बेलन घाटी के लोहरा नाला क्षेत्र से इस काल की अस्थि निर्मित मातृदेवी की प्रतिमा मिली है।
मध्य-पुरा पाषाण काल (Middle, Palaeolithic Age): इस समय के औजारों में जैस्पर चर्ट के पत्थरों का प्रयोग किया गया है। फ्लैक के बने औजार प्रयुक्त होने लगे, इन औजारों में बेघनी और खुरचनी प्रमुख है। मध्य-पुरा पाषाण काल को ’फलक संस्कृति’ की संज्ञा दी जाती है।
इस काल के उपकरण महाराष्ट्र, गुजरात, आन्ध्रा, उड़ीसा, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर मिर्जापुर, आदि विविध पुरास्थलों से प्राप्त हुए हैं। अब मध्य-पुरा पाषाण कालीन स्थल अफगानिस्तान, ईरान, ईराक और पाकिस्तान में भी मिले हैं। इनमें अधिकांश उपकरण ’मोस्तरी संस्कृति’ से खूब मिलते-जुलते हैं।

उत्तर-पुरापाषाण काल(Upper, Palaeolithic Age)

हम 40 हजार ई0पू0 से 10 हजार ई0पू0 इस काल का मुख्य पाषाण उपरकण ब्लेड हैं। इस समय मुख्यतः दो प्रकार के परिवर्तन हुए-
1.    चकमक उद्योग की स्थापना।
2.    आधुनिक मानव होमोसेपियन्स का प्रार्दुभाव।
सिन्धु नदी के आस-पास के क्षेत्रों के छोड़कर लगभग पूरे भारत से उत्तर पुरापाषाण काल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। टोंस घाटी से रोड़ी-ढोकी, मालना में चबुतरे तथा हड्डी की मातृदेवी के साक्ष्य मिले हैं। कुछ पुरातत्व विज्ञानी इस समय के शैल मित्रों की जानकारी देते हैं।

मध्य पाषाण काल(Mesolithic Age)

9 हजार ई0पू0 से 4 हजार ई0पू0- वैश्विक स्तर पर पहली बार मध्य-पाषाणिक उपकरण फ्रांस के मडास्वीयसंस्कृति नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। भारत में इस काल के उपकरणों की खोज का श्रेय ’कार्लोइल’ महोदय को जाता है।     मध्य पाषाणिक मानव आखेटक एवं खाद्य संग्राहक के साथ-साथ पशुपालक भी हो गया। पशुपालन के प्रमुख प्रमाण आदमगढ़ (म0प्र0) व बागौर (राजस्थान) से प्राप्त होते हैं। प्रथम पालतू पशु कुत्ता व दूसरी बकरी थी। इलाहाबाद के स्थलों सराय नहर राय और महदहा से स्तम्भ गर्त के प्रमाण मिले हैं। विंध्य क्षेत्र और भीम बेटका से प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की जानकारी मिली है।
लगभग पूरे भारत से मध्य पाषाणिक स्थलों के साक्ष्य मिले हैं सबसे अधिक स्थल मध्य गंगाघाटी से प्राप्त हुए हैं। नर्मदा नदी घाटी, सोन नदी घाटी, बेलन नदी घाटी, भीम वेटका, विंध्य नदी घाटी, प्रवरा नदी घाटी आदि क्षेत्र प्रमुख हैं।
मध्य पाषाणिक स्थलों में सबसे महत्वपूर्ण राजस्थान के तिलवाड़ा और वागौर, गुजरात के लंघनाज, प्रतापगढ़ के सरायराय नहर, दमदम, इलाहाबाद के चोपानी मण्डो, लेखइया, मोरहना पहाड और वगहीखोर, बंगाल में वीरभानपुर, असम में सारूतारू, उड़ीसा के कुचाई, मध्य प्रदेश में भीम बेटका और होसंगावाद आदमगढ़ तथा दक्षिण भारत में तमिलनाडु के टेरी समूह आदि प्रमुख माने जाते हैं।

नव पाषाण काल(Neolithic Age)

9 हजार ई0पू0 से 1 हजार ई0पू0- नव पाषाण काल क्रान्ति का युग कहा जाता है। भारत में नवपाषाण की खोज सर्वप्रथम 1860 ई0 में टौंस नदी घाटी से लेनसूरियर ने किया। मानव अब खाद्य संग्राहक युग से खाद्य उत्पादक युग के प्रवेश कर चुका था।
इस काल में निम्नलिखित परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं।
1.    मानव ने आग का उपयोग करना सीख लिया।
2.    अब वह स्थाई रूप से रहने लगा।
3.    पहली बार कृषि के साक्ष्य बलूचिस्तान के मेहरगढ़ से प्राप्त हुए हैं प्रथम उपजाने वाली फसल गेहँ और जौ थी। मेहरगढ़ के साक्ष्य 7 हजार ई0पू0 के है।
4.    इलाहाबाद के कोलडिहवा से 6 हजार ई0पू0 के चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
5.    इसी समय मानव ने धातुओं का प्रयोग करना सीख लिया। पहली बार प्रयोग में लायी जानी वाली धातु ताँबा थी।
अब मानव ने कुम्हार के चाक पर मिट्टी के बर्तनों को (मृद्भाण्ड) बनाना सीख लिया।
नव पाषाण काल का क्षेत्रः- नव पाषाण काल के साक्ष्य भारत से लगभग सभी भागों से प्राप्त हुए मुख्य निम्न हैं-

 1.   बुर्जाहोम:- यह कश्मीर का प्रसिद्ध नव पाषाण कालीन स्थल हैं। बुर्जाहोम का अर्थ है-जन्म स्थान। इस स्थान से पता चलता है कि मानव गर्त (गड्डौ) आवास में रहता था। मानव की कब्रों के साथ हमें कुत्तों की हड्डियों के प्रमाण भी मिले हैं।
2.    गुफकराल:- यह स्थल भी कश्मीर में हैं गुफकराल का अर्थ है कुम्हार की गुफा। इससे भी मानव के रहने के पैटर्न पर प्रकाश पड़ता है। गुफकराल से अन्य उपकरणों के साथ-साथसिलबट्टे तथा हड्डी की बनी सुइयां भी मिलती है, जिससे सूचित होता है कि लोग कपड़ा-सीने की विधि से परिचित थे।
3.     चिरांद:- यह बिहार में स्थित नव पाषाण कालीन स्थल है यहाँ से हिरण की हड्डियों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं साथ ही अधिक मात्रा में औजार भी प्राप्त हुए हैं।
4.    उतनूर (आन्ध्र प्रदेश) 

5. पैय्यम पल्ली (तमिलनाडु)
6.    नासिक, ब्रम्हगिरि, हल्लूर, टी-नरसीपुर, पिकली हल (कर्नाटक) आदि नवपाषाणिक स्थल है।

ताम्र पाषाणिक संस्कृति:-

तकनीकी दृष्टि से ताम्र पाषाणिक संस्कृति नवपाषाण काल के बाद और नदी घाटी सभ्यता के विकसित होने के पहले की मानी जाती है। परन्तु वास्तविक रूप में यह संस्कृति नव पाषाणकाल के साथ ही विकसित होती रही और भारत में इसकी स्थिति नदी घाटी सभ्यता के समकालीन पहले और बाद तक दिखाई देती है। अब अनेक अनुसंधानों से सिद्ध हो चुका है कि सैन्धव संस्कृति का विकास भी इन्हीं ताम्र पाषाणिक संस्कृतियों से हुआ। माना जाता है कि भारत में पहली बार ग्राम संस्कृति की स्थापना इन्ही ताम्र पाषाणिक लोगों ने ही की। इनकी खोज का श्रेय संकालिया, मजूमदार, मैके, माधव स्वरूप वत्स, अमला नन्द घोष, विष्ट, सहित अनेक सैन्धव सभ्यता से जुड़े हुए पुरातत्व विज्ञानियों को जाता है।
मानव द्वारा प्रयोग में लाया गया पहली धातु ताँबा मानी जाती है। लगभग 5000 ठब् इसकी खोज हो चुकी थी। वैश्विक स्तर पर सबसे पहले मेसोपाटामियाई लोगों ने इस धातु का प्रयोग किया। भारत में इस धातु का प्रयोग 3500 ठब् के आस-पास शुरू हुआ। इसका स्वतन्त्र प्रयोग न होकर इसके साथ-साथ पाषाणिक उपकरण भी चलते रहे। इन्हीं ताँबे एवं पाषाणों के गृहपयोगी एवं कृषि उपयोगी उपकरणों के माध्यम से ग्रामीण संस्कृति को एक स्थायी आधार देने का प्रयास किया गया।
महत्वपूर्ण ताम्र पाषाणिक संस्कृतियों में, राजस्थान में पनपी वनास घाटी की आहार एवं गिलुन्द संस्कृति, मध्य क्षेत्र की मालवा, कायथा नवदा टोली एरण संस्कृति तथा महाराष्ट्र की जोरवे, पूनम गाँव, इनामगांव, चन्दौली, नासिक, दैमावाद आदि संस्कृति महत्वपूर्ण मानी जाती है। वास्तव में ताम्र पाषाणिक ग्रामीण संस्कृति, दक्षिण भारत मास्की, ब्रम्हगिरि एवं गंगाघाटी, पूरे भारत से पायी गयी हैं। यह ग्रामीण संस्कृतियां किसी न किसी रुप में अपने विभिन्न मृदभाण्डिक विशेषताओं के साथ भारत में द्वितीय नगरीकरण अर्थात छठी शताब्दी ईसा पूर्व में पहले तक विभिन्न स्थानीय विशेषताओं के साथ विद्यमान रही। राजस्थान की आहार संस्कृति को ताम्रवती के नाम से भी जाना जाता है। गिलुन्द एक बड़ा ताम्र पाषाणिक स्थल माना जाता है। उत्तर पश्चिमी सीमान्त क्षेत्र के अनेक नवपाषाणिक स्थलों से ताम्र पाषाणिक संस्कृतियों के क्र्रमिक विकास का साक्ष्य मिलता है। गुमला घाटी मेहरगढ़ से लेकर अनेक सैन्धव स्थलों से भी ताम्र पाषाणिक संस्कृतियों के साक्ष्य मिले हैं। मालवा ताम्र पाषाणिक संस्कृति   के मृदभाण्ड उत्कृष्ट कोटि में जाने जाते थे। वही पूनम गांव एवं इमाम गांव से ताम्र पाषाणिक संस्कृति नगरीय संस्कृति की तरफ बढ़ती हुई दिखाई देती है।
ताम्र पाषाणिक संस्कृति के लोग कृषि मृदभाण्ड घासपूष एवं कच्चे मकान तथा ग्रामीण धार्मिक एवं आर्थिक व्यवस्था को संचालित कर रहे थे। धर्म एवं अर्थव्यवस्था को एक निश्चित आधार मिला हुआ था। शिल्प एवं प्रौद्योगिक का भी विकास दिखाई देता है।
दक्षिण भारत में जहाँ ताम्रपाषाणिक संस्कृति की पृष्ठभूमि पर लोहे के प्रयोगों एवं विशेषताओं से युक्त महापाषाणिक संस्कृति दिखाई देती है, वहीं उत्तर भारत में ताँबे एवं टिन के प्रयोग से निर्मित काँसे को आधार बनाकर विकसित कांस्य युगीन प्रथम नगरीय हड़प्पा सभ्यता का विकास होता है। निःसंदेह इन्हीं ग्रामीण संस्कृतियों ने ही भारत में नगरीय संस्कृति को न सिर्फ आधार प्रदान किया अपितु धार्मिक, आर्थिक एवं निश्चित प्राचीनतम स्वरूप प्रदान कीं।

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता The Indus valley Civilization

हड़प्पा सभ्यता को निम्नलिखित नामों से जाना जाता है-

1. हड़प्पा संस्कृतिः- इस संस्कृति का सबसे पहले खोजा गया स्थल पंजाब प्रान्त में स्थित हड़प्पा था। इसलिये इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता या हड़प्पा संस्कृति कहा जाता है।

2. सिन्धु सभ्यताः- इस सभ्यता के प्रारम्भिक स्थल सिन्धु नदी के आसपास ही पाये गये, इसलिए इस सभ्यता को सिन्धु सभ्यता कहा जाने लगा। किन्तु अब इस सभ्यता का क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है।
3. कांस्य युगीन सभ्यताः- सैन्धव लोगों ने ही सर्वप्रथम तांबे में टिन मिलाकर कांसा तैयार किया, इसलिए इसे कांस्य युगीन सभ्यता कहा गया।
4. प्रथम नगरीय क्रान्तिः- सिन्धु सभ्यता में ही सर्वप्रथम नगरीय क्रान्ति के चिन्ह दृष्टिगोचर होते हैं। अतः इसको प्रथम नगरीय क्रान्ति के नाम से भी जाना जाता है।
5. सिन्डनः- सैन्धव लोगों ने ही सर्वप्रथम कपास की फसल उगाई, इसी कारण युनानी इस सभ्यता को सिन्डन (कपास) कहने लगे।
उपर्युक्त सभी नामों से इस सभ्यता को पुकारा जा सकता है। किन्तु सर्वाधिक उपयुक्त नाम हड़प्पा सभ्यता ही होगा।

सिंधु घाटी सभ्यता (The Indus valley Civilization) की खोज

सबसे पहले हड़प्पा सभ्यता के विषय में जानकारी 1826 ई0 में चाल्र्स मैसन ने दी। 1852 और 1856 ई0 में जान ब्रिन्टन एवं विलियम ब्रिन्टन नामक इंजीनियर बन्धुओं ने करांची से लाहौर रेलवे लाइन निर्माण के समय यहाँ के पुरातात्विक सामाग्रियों को तत्कालीन पुरातत्व विभाग के प्रमुख कनिंघम से मूल्यांकन करवाया। कनिघंम को भारतीय पुरातत्व विभाग का जनक कहा जाता है। भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना लार्ड कर्जन के समय में अलिक्जेन्डर कनिंघम ने की थी। जब पुरातत्व विभाग के निर्देंशक जान मार्शल थे तभी दयाराम साहनी ने 1921 ई0 में हड़प्पा स्थल की खोज की। अगले ही वर्ष 1922 ई0 में राखलदास बनर्जी ने इसके दूसरे स्थल मोहनजोदड़ों की खोज की।

सिंधु घाटी सभ्यता (The Indus valley Civilization) का काल निर्धारण

सैन्धव सभ्यता का काल निर्धारण भारतीय पुरातत्व विभाग का विवादग्रस्त विषय है। इतिहासकारों ने इस सभ्यता का काल निर्धारण भिन्न-भिन्न प्रकार से निर्धारित किया है। कुछ प्रमुख इतिहासकारों द्वारा निर्धारित तिथियां निम्नलिखित हैं-

1. 3250 ई0पू0 से 2750 ई0- इस तिथि का निर्धारण 1931 ई0 में जान मार्शल ने किया।
2. 2350 ई0पू0 से 1750 ई0पू0 –डी0पी0 अग्रवाल द्वारा निर्धारित यह तिथि कार्बन डेटिंग पर आधारित है।
3. 2800 ई0पू0 से 2500 ई0पू0- इस काल का निर्धारण अर्नेस्ट मैके ने किया।
4. 2500 ई0पू0 से 1500 ई0पू0- यह मार्टिमर ह्वीलर द्वारा निर्धारित तिथि है।
5. 2500 ई0पू0 से 1700 ई0पू0-रेडियो कार्बन-14 (ब्.14द्ध जैसी नवीन पद्धति के द्वारा निर्धारित तिथि है। जो वर्तमान में सर्वाधिक मान्य है।

सिंधु घाटी सभ्यता (The Indus valley Civilization) के निर्माताः

सिन्धु सभ्यता की पुरातात्विक खुदाई से प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि यह एक मिश्रित प्रजाति वाली सभ्यता थी जिसमें निम्नलिखित चार प्रजातियाँ सम्मिलित थी-

1.    प्रोटो आस्ट्रेलायड
2.    अलपाईन
3.    भूमध्यसागरीय
4.    मंगोलायड

इसमें प्रोटो आस्ट्रेलायड सर्वप्रथम आने वाली प्रजाति थी किन्तु सभ्यता के निर्माण का श्रेय भूमध्य सागरीय को दिया जाता है।
सिन्धु सभ्यता का विस्तारः-सिन्धु सभ्यता का विस्तार आधुनिक तीन देशों भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान में मिलता है। अफगानिस्तान के प्रमुख स्थलों में मुण्डीगाक एवं शुर्तगोई हैं। इस सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल सुत्कांगेडोर (ब्लुचिस्तान) पूर्वी पुरास्थल आलमगीरपुर, उत्तरी पुरास्थल मांडा (जम्मू कश्मीर) तथा दक्षिणी पुरास्थल दैमाबाद। सैन्धव स्थलों का विस्तार त्रिभुजाकार आकृति लिए हुए हैं। जिनका क्षेत्रफल लगभग 20 लाख वर्ग किलोमीटर है।
सैन्धव सभ्यता के प्रमुख नगरः-

(1) हड़प्पा

हड़प्पा पंजाब के मांटगोमरी जिले में स्थित है। इसका सर्वप्रथम उल्लेख चाल्र्स मैशन ने किया जबकि पुरातत्व विभाग के निदेशक जान मार्शल के समय में 1921 में दयाराम साहनी ने इस स्थल की खोज अन्तिम रूप से की। इस स्थल की खोज से माधोस्वरूप वत्स (1926) तथा मर्टिमर  ह्वीलर (1946) भी सम्बन्धित थे।
  •  हड़प्पा से प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीलें को नगर टीले तथा पश्चिमी टीले को दुर्ग टीला के नाम से जाना जाता है।
  •  यहाँ पर एक 12 कक्षों वाला अन्नागार प्राप्त हुआ है। हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा कब्रिस्तान स्थित है जिसे समाधि आर-37 कहा जाता है।
  • यहाँ अभिलेखयुक्त मुहरें भी प्राप्त हुई हैं।
  • कुछ महत्वपूर्ण अवशेषों में एक बर्तन पर बना मछुआरे का चित्र, शंख का बना बैल, स्त्री से गर्भ से निकलता हुआ पौधा, पीतल का बना इक्का, ईंटों के वृत्ताकार चबूतरे, गेहँू तथा जौ के दाने प्राप्त हुए हैं।

(2) मोहनजोदड़ोंः-

सिन्धु नदी के दायें तट पर सिन्धु प्राप्त के लरकाना जिले में स्थित मोहनजोदड़ों की खोज 1922 ई0 में राखालदास बनर्जी ने किया। सिन्धी भाषा में मोहनजोदड़ों को मृतकों या मुर्दों का टीला कहा जाता है।

  • मोहनजोदड़ों का सबसे महत्वपूर्ण स्थल विशाल स्नानागार है। इस स्नानागार को मार्शल ने तात्कालीन विश्व का आश्चर्य बताया है।
  •  विशाल अन्नागारः- यह मोहनजोदड़ों की सबसे बड़ी इमारत थी।
  • मोहनजोदड़ों के पश्चिम भाग में स्थित दुर्ग टीले को स्तूप टीला कहा जाता है जिसका निर्माण सम्भवतः कुषाण शासकों ने कराया था।
  • मोहनजोदड़ों से प्राप्त कुछ महत्वपूर्ण अवशेष निम्नलिखित हैं- महाविद्यालय भवन, सी0पी0 की बनी हुई पटरी, योगी की मूर्ति, काँसे की नृतकी, मुद्रा पर अंकित पशुपति शिव, हाथी का कपाल खण्ड, घोडे़ के दांत एवं गीली मिट्टी के कपड़े के साक्ष्य मुख्य हैं।
  • मोहनजोदड़ों की खुदाई से इसके भवनों से सात स्तर प्रकाश में आये हैं। अन्तिम स्तर पर विखरे हुए नर कंकाल प्राप्त हुये हैं जबकि यहाँ से कोई कब्रिस्तान प्राप्त नहीं हुआ।

(3) चान्हूदड़ोंः-

सिन्धु नदी के बांये तरफ स्थित जिसकी खोज 1931 में एम0जी0 मजूमदार ने की। यह नगर अन्य नगरों की तरह दुर्गीकृत नहीं था। यहाँ से हड़प्पोत्तर अवस्था की झूकर-झाकर संस्कृति का प्रमाण प्राप्त हुआ है।

  •   यहाँ के निवासी मनके, सीप, अस्थि तथा मुद्रा की कारीगरी में बहुत कुशल थे।
  •   यहाँ के प्रमुख अवशेषों में अलंकृत हाथी, कुत्ता द्वारा दौड़ाई गयी बिल्ली, लिपिस्टिक, विभिन्न प्रकार के खिलौने प्रमुख हैं।

(4) लोथलः-

गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के किनारे यह स्थल स्थित है। इसकी खोज एस0आर0 राव ने 1955 ई0 में किया। इस स्थल से कोई पूर्वी टीला नहीं मिला है अर्थात पूरा स्थल एक ही टीले द्वारा घेरा गया था। यहाँ के भवनों के दरवाजे और खिड़कियाँ अन्य स्थलों से विपरीत सड़कों की ओर खुलती थी।
इस स्थल के प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • यह स्थल पश्चिम एशिया से व्यापार का प्रमुख बन्दरगाह था।
  • फारस की मुद्रा शील या पक्के रंगों में रंगे पात्रों के अवशेषों से यह पता चलता है कि लोथल एक सामुद्रिक व्यापारिक केन्द्र था।
  • यहाँ से धान और बाजरे का साक्ष्य, फारस की मुहर, घोड़े की लघु मृण्यमूर्ति, तीन युगल समाधि, मुहरें, बाट-माप आदि पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं।

(5) कालीबंगाः-

कालीबंगा राजस्थान के गंगा नगर जिले में सरस्वती दृश्यद्वती नदियों के किनारे स्थित था इसकी खोज अमलानन्द घोष ने 1951 में की। यहाँ के पश्चिमी और पूर्वी टीले दोनों अलग-अलग रक्षा प्राचीर से घिरे हुए थे। यहाँ के मकान कच्ची ईंटों से निर्मित हुए थे जबकि नालियों में पक्की ईंटों का प्रयोग मिलता है।

  • जुते हुए खेत, हवनकुण्ड, अलंकृत ईंट, बेलनाकार मुहर, युगल तथा प्रतीकात्मक समाधियां आदि कालीबंगा से प्राप्त  प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य हैं।
  • कालीबंगा में अन्तमष्टि संस्कार हेतु तीन विधियां जिसमें पूर्ण समाधीकरण, आंशिक समाधीकरण एवं दाह संस्कार प्रचलित थी।
  •  कालीबंगा से भूकम्प आने से प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  •  यहां से एक ही खेत में एक साथ दो फसलों का उगाया जाना तथा लकड़ी को कुरेद कर नाली बनाना आदि प्रमुख साक्ष्य मिले हैं।

(6) बनवाली:-

यह स्थल हरियाणा के हिसार जिले में सरस्वती नदी के किनारे स्थित था इसकी खोज 1974 ई0 में आर0एस0 विष्ट ने की थी।

  • यहाँ पर जल निकासी का अभाव दिखता है।
  • पुरातात्विक साक्ष्यों में मिट्टी के बर्तन, सेलखड़ी की मुहर, हड़प्पा कालीन विशिष्ट लिपि से युक्त मिट्टी की मुहर, फल की आकृति, तिल, सरसों का ढेर, अच्छे किस्म का जौ, मातृ देवी की मृण्ड मूर्ति, तांबे के वावांग, चर्ट के फलक आदि प्रमुख हैं।

(7) धौलावीरा:-

गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तहसील में स्थित है। इसकी खोज 1967-68 में जे0पी0 जोशी ने किया।

  • यह नगर आयताकार तथा तीन भागों किला, मध्य नगर, निचला नगर में विभाजित था।
  • धौलावीरा से सैन्धव लिपि के दस ऐसे अक्षर प्रकाश में आये हैं जो काफी बड़े हैं तथा विश्व की प्राचीन अक्षर माला में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

(8) सुरकोटडा:-

इसकी खोज जे0पी0 जोशी में 1964 में की। यह स्थल भी गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है। अन्य नगरों के विपरीत यह नगर दो दुर्गीकृत भागों गढ़ी तथा आवास क्षेत्र में विभाजित था। यहाँ से घोड़े की हड्डी, एक कब्रिस्तान से शवाधान की नई विधि कलश शवाधान का साक्ष्य प्राप्त होता है।

(9) कोटदीजी:-

सिन्धु प्रान्त में खैरपुर में स्थित इस स्थल की खोज धु्रवे ने 1935 ई0 में किया। यहाँ के प्रमुख अवशेषों में वाणाग्र, कांस्य की चूडि़यां, धातु के उपकरण तथा हथियार प्रमुख हैं।

(10) देशलपुर:-

इस स्थल का उत्खनन 1964 ई0 में के0वी0 सौन्दर राजन ने कराया।

  • यहाँ से एक सुरक्षा प्राचीर, मिट्टी तथा जेस्पर के वाट, गाडि़यों के पहिये, छेनी, ताँबे की छूरियां, अँगूठी आदि महत्वपूर्ण अवशेष मिले हैं।

(11) रोजदी:-

गुजरात के सौराष्ट्र जिले में स्थित सैन्धव कालीन महत्वपूर्ण स्थल हैं। यहाँ से प्राप्त मृदभाण्ड लाल, काले तथा चमकदार हैं। रोजदी से हाथी के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

(12) आलमगीरपुर:-

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित सैंन्धव सभ्यता का सबसे पश्चिमी स्थल है। यहाँ की खुदाई से मृदभाण्ड, रोटी बेलने की चैकी, कटोरे के बहुसंख्यक टुकड़े, सैन्धव लिपि के दो अक्षर, कुछ बर्तनों पर मोर, गिलहरी आदि की चित्रकारियां प्राप्त हुई हैं।

13) दैमाबाद:-

महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले में प्रवरा नदी के बायें किनारे स्थित सैन्धव सभ्यता का सबसे दक्षिणी स्थल है। यहाँ से मृदभाण्ड, सैंन्धव लिपि की एक मोहर, प्याले, तस्तरी, बर्तनों पर दो सीगों की आकृति, मानव संसाधन आदि के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।   

(14) माण्डी:-

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जिले में स्थित हड़प्पा सभ्यता का नवीनतम स्थल है। इस स्थल से सोने के छल्ले, टकसाल गृह आदि के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं।

(15) कुन्तासी:-

गुजरात के राजकोट जिले में स्थित है इस स्थल की खुदाई से लम्बी सुराहियां, दोहत्थे कटोरे, मिट्टी की खिलौना गाड़ी, चूडि़यां, अगूंठी आदि अवशेष प्राप्त हुए हैं।

(16) रोपड़:-

पंजाब के सतलज नदी के तट पर स्थित इस स्थल की खोज 1955-56 में यज्ञदत्त शर्मा ने की।

  •  यहाँ से हड़प्पा संस्कृति के पांच स्तरीय क्रम प्राप्त हुए हैं।
  • मानवीय शवाधान या कब्र के नीचे एक कुत्ते का शवाधान प्राप्त हुआ है।

(17) राखीगढ़ी:-

हरियाणा के जींद जिले में घग्घर नदी के तट पर स्थित इस स्थल की खोज 1969 ई0 में सूरजभान ने किया। राखीगढ़ी को हड़प्पा सभ्यता की प्रान्तीय राजधानी कहा जाता है।

(18) रंगपुरा:-

यह स्थल अहमदाबाद जिले में स्थित है यहाँ पर 1931 ई0 एम0एस0 वत्स तथा 1953 में एस0आर0 राव ने खुदाई करवायी।

  • यहाँ सैन्धव संस्कृति के उत्तरा अवस्था के दर्शन होते हैं। यहाँ से मातृ देवी तथा मुद्रा का कोई साक्ष्य नहीं मिला है।
  • यहाँ धान की भूसी के ढेर, कच्ची ईंटो के दुर्ग, नालियां, मृदभाण्ड, पत्थर के फलक आदि मिले हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता के समय राजनीतिक संगठन एवं सामाजिक दशा

राजनीतिक संगठनः-

सिन्धु सभ्यता के लिपि के पढ़े न जाने के कारण यहाँ की शासन प्रणाली पर केवल अनुमान ही लगाया जाता है। समकालीन मेसोपोटामियां सभ्यता में मन्दिर के प्रमाण मिले हैं वहाँ पर पुरोहितों का शासन माना जाता है परन्तु सिन्धु सभ्यता से ऐसे किसी भी मन्दिर के प्रमाण प्राप्त नही हुए हैं अतः यहाँ पर पुरोहितों का शासन नहीं माना जा सकता हालांकि प्रसिद्ध इतिहासकार ए0एल0 बासम ने यहाँ पर पुरोहितों का शासन माना है। डाॅ0 आर0एस0 शर्मा सिन्धु सभ्यता में वणिक वर्ग का शासन मानते हैं जो इस समय विद्वानों में सबसे ज्यादा मान्य है। पिग्गट ने बताया  किस सामराज्य की दो जुड़वा राजधानियाँ हड़प्पा और मोहनजोदड़ों है।

सामाजिक दशा:-

सिन्धु सभ्यता से हमें एक शासक वर्ग का पता चलता है पुरोहितों के प्रमाण भी कुछ मिले हैं यहाँ का शासन वणिक समुदाय द्वारा चलाया जाता था। मकानों के प्रारूप के आधार पर श्रमिक और दासों का अनुमान भी लगाया जाता है अतः वहाँ की सामाजिक संरचना में उपर्युक्त वर्ग की कल्पना की जाती है।

1. स्त्रियों की दशा:-

सिन्धु सभ्यता में सबसे अधिक मृण्य मूर्तियां नारी की प्राप्ति हुई है। इससे अनुमान लगाया जाता है कि समाज में उनकी दशा अच्छी थी परन्तु इस विषय में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि राजस्थान और गुजरात से किसी भी नारी की मृण्य मूर्ति के प्रमाण नहीं प्राप्त हुए हैं।
लोथल और कालीबंगा से युगल शवाधान के आधार पर सती प्रथा का अनुमान लगाया जा सकता है सिन्धु सभ्यता में दास प्रथा प्रचलित थी।

वस्त्र आभूषण रहन-सहन:-

सिन्धु सभ्यता को कपास उपजाने का श्रेय प्राप्त है। यहाँ से सूती वस्त्र के प्रमाण मिले हैं। वस्त्रों पर बुनाई भी होती थी। मोहनजोदड़ो से हाथी के दांत की बनी सुइयों एवं कंघी का प्रमाण है। वही से ताँबे के सीसे प्राप्त हुए हैं। चान्हूदड़ो से लिपिस्टिक काजल आदि के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं।

आर्थिक दशाः-

1. कृषि:- हड़प्पा वासी सामान्यतः जाड़े में नवम्बर- दिसम्बर में अपनी फसलों को बोते थे तथा अगली बरसात आने के पूर्व मार्च-अप्रैल में काट लेते थे। इन लोगों को 9 प्रकार की फसलें ज्ञात थी- गेहँ, जौ, कपास, सरसो, राई, तिल, मटर तरबूज, खजूर। हड़प्पाई लोग फसलों के बोने में भ्वम (हो) (हल की प्रारम्भिक अवस्था) का प्रयोग करते थे। फसल काटने के लिए पत्थर के हशिये का प्रयोग किया जाता था। वनावली से मिट्टी के हल के प्रमाण मिलें है वहाँ से बढि़या किस्म का जौ प्राप्त हुआ है।
चावल:- सिन्धु सभ्यता के लोगों को चावल का ज्ञान नहीं था परन्तु  इसके कुछ प्रमाण मिले है लोथल से चावल प्राप्त हुआ है जबकि रंगपुर से धान की भूंसी । परन्तु सामान्यतः यहाँ चावल के अस्तित्व को नही माना जाता।
सिंचाई:- सिंचाई के साधनों में वर्षा जल का प्रयोग होता था। लेकिन नहरों का प्रयोग नहीं होता था। नहरों का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में प्राप्त होता है। नहरों का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य खारवेल के हाथी-गुफा अभिलेख में मिलता है।
पशुपालन:-सिन्धु सभ्यता में पशुओं का ज्ञान विभिन्न प्रकार की मृण्य मूर्तियों और मुहरों पर उनके अंकन से होता है। कूबढ़ वाले बैल की महत्ता सबसे अधिक थी। एक श्रंृगी साँड भी था। गाय का प्रमाण यद्यपि माना जाता है परन्तु इसका अंकन न तो मुहरों पर मिलता है और न ही इसकी कोई मृण्य मूर्ति प्राप्त होती है हलांकि एस0आर0 राव ने लोथल से गाय की मृण्य मूति प्राप्त होने का दावा किया है।
घोड़ा:-सिन्धु सभ्यता के लोगों को घोड़ों का ज्ञान नहीं था परन्तु इसके कुछ प्रमाण प्राप्त हुए हैं जैसे-लोथल एवं रंगपुर से मृण्य मूर्ति, सुर कोटडा से सैन्धव कालीन से अस्थि पंजर आदि। बलुचिस्तान में स्थित राना घुड़ई से घोड़े के दाँत मिले हैं लोथल से घोड़े की मृण्य मूति प्राप्त हुई है इसी तरह मोहनजोदड़ों के उपरी स्तर से घोड़े के प्रमाण मिले हैं।
बाघ:- सिन्धु सभ्यता के लोगों को बाघ का ज्ञान था लेकिन शेर का ज्ञान नहीं था।
उद्योग धन्धे:- सूती वस्त्र यहाँ का सबसे प्रमुख उद्योग रहा होगा चूँकि कपास सैन्धव लोगों की मूल फसल थी सूती वस्त्र के प्रमाण मोहनजोदड़ों से प्राप्त हुए हैं। वस्त्रों पर बुनाई भी की जाती थी। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक व्यक्ति तिपतिया शाल ओढ़े हुए हैं यूनानी कपास के कारण ही इसे सिन्डन कहते थे।
ताँबे सैन्धव सभ्यता में प्रमुख रूप से प्रयोग की जाने वाली धातु थी। ताँबा मुख्य रूप से राजस्थान के खेतड़ी से (झुन-झुन जिला) प्राप्त किया जाता था। बलुचिस्तान और मगन (मध्य एशियाई देश) से भी ताँबा के प्रमाण मिले हैं। ताँबें में टिन मिलाकर काँसा तैयार किया जाता था। टिन अफगानिस्तान से मंगाया जाता था। ताँबे से बनी वस्तुयें काँसें की अपेक्षा अधिक मात्रा में मिली हुई है।
मुहरें मनके मृदभाण्ड धातु मूर्तियां और नगर बनाने वाले लोगों का भी समुदाय था।
व्यापार:- व्यापार मूलतः दो प्रकार का होता था आन्तरिक व्यापार एवं वाह्य व्यापार।

आन्तरिक व्यापार:-

सैन्धव लोगों का आन्तरिक व्यापार अत्यन्त उन्नत अवस्था में था एक ही तरह के बाट-माप का प्रयोग और उनका 16 गुने के रूप में होना विभिन्न नगरों में अन्नागार प्राप्त होना बैलगाड़ी के पहिए का ठोस होना उनमें आपस में किसी न किसी तरह से सम्बन्ध को प्रदर्शित करता है।
क्षेत्र:- सिन्धु सभ्यता के लोग महाराष्ट्र कर्नाटक और तमिलनाडु तक व्यापार करने के लिए जाते रहे होगें। महाराष्ट्र के दैमाबाद से एक काँसे का रथ प्राप्त हुआ है जिसे एक नग्न पुरुष चला रहा है। दैमाबाद का सम्बन्ध सिन्धु क्षेत्र से लगाया जा रहा है। कर्नाटक के कोलार से सैन्धव लोग सोना प्राप्त करते थे इसी तरह तमिलनाडु के दोछा बेक्टा से वे हरा पत्थर प्राप्त करते थे। इस तरह सुदूर दक्षिण तक सैन्धव लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध पहले से ही था।
बंगाल बिहार और उत्तर-पूर्वी राज्यों से उनके किसी व्यापारिक सम्बन्ध का पता नहीं चलता।

वाह्य व्यापार:-

सैन्धव लोगों के वाह्य व्यापार का साक्ष्य भी मिला है। एक प्रकार के बाट-माप मुहरों की उपस्थिति बन्दरगाह नगरों का होना लोथल से गोदी बाड़े का प्रमाण प्राप्त होना। लोथल में फारस की मुहर प्राप्त होना इनके वाह्य व्यापार को प्रदर्शित करता है।
सिन्धु सभ्यता की बेलनाकार मुहरें मेसोपोटामियां के आधा दर्जर नगरो (उर, किश, तिल अस्मर नित्पुर, टेटे गावरा, हमा) से प्राप्त हुए हैं। मेसोपोटामिया के शासक सारगोन काल की मिट्टी की पट्टिकाओं पर मेलुहा, ढिलमुन और मगन से व्यापार का उल्लेख मिलता है। मेलुहा की पहचान मोहनजोदड़ों से की जाती है। ढिल्मुन की पहचान बहरीन से, मगन की पहचान अभी संदिग्ध है परन्तु इसका उल्लेख ताँबे के प्रमुख स्रोत के रूप में हुआ है। सम्भवतः यह आधुनिक ओमान अथवा बलुचिस्तान का कोई क्षेत्र रहा होगा।
व्यापारिक देशः-1- मेसोपोटामियां (ईराक, ईरान, अफगानि -स्तान, ढिल्मुन (बहरीन) रूस का दक्षिणी तुर्कमेनिस्तान, मिश्र, कुबैत (फैल्का द्वीप) तिब्बत।
नोट:- इस व्यापार में यूरोपीय देश, दक्षिणी पूर्वी एशियाई देश, चीन और अमेरीकी देशों ने भाग नहीं लिया।
निर्यात की वस्तुयें:- सूती वस्त्र, मसाला, हाथी दांत, काली लकड़ी, मुहरें आदि।
आयातित वस्तुयेंः-
1- लाजवर्द मणि-अफगानिस्तान का बदख्सा क्षेत्र।
2- चाँदी – अफगानिस्तान
3- टिन – ईरान, अफगानिस्तान
4- संगमराब अथवा हरिताश्म ;श्रमकद्ध ईरान से।
5- फिरोजा टिन और चांदी – ईरान से।
6- फिलन्ट एवं चर्ट के पत्थर – त्वीतप (रोड़ी) पाकिस्तान के सिन्ध एवं  .. नाानत (सक्खर) क्षेत्र से।
सैन्धव लोगों ने अफगानिस्तान में अपना व्यापारिक उपनिवेश बसाया जबकि ढिलमुन (बहरीन) उनके बीच व्यापारिक बिचैलिए का कार्य करता था।

सिंधु घाटी सभ्यता के समय कला प्रौद्योगिकी एवं लिपि

कला प्रौद्योगिकी

मृदभाण्ड:-

मृद भाण्ड लाल या गुलाबी रंग के होते थे। इन्हें कुम्हार के चाक पर बनया जाता था। इन्हें भठ्ठों में पकाया जाता था इन पर कई तरह की चित्रकारियां होती थी जिनमें पशु पक्षी मानव आकृति एवं ज्यामितीय आकृतियां प्रमुख हैं। इनमें ज्यामीतिय चित्र सबसे अधिक प्रचलित थे। लोथल से एक ऐसा मृद भाण्ड मिला है जिसमें एक वृक्ष पर एक चिडि़या बैठा है और उसके मुँह में रोटी का टुकड़ा है नीचे एक लोमड़ी खड़ी है। यह पंचतन्त्र की प्रसिद्ध कथा चालाक लोमड़ी का अंकन है।

मृण्य मूर्ति:-

मृण्य मूर्तियां चिकोटी विधि से बनाई गयी है इन मृण्य मूर्तियों में पशु पक्षी आदि की मृण्य मूर्तियां खोखली हैं जबकि मानव मृण्य मूर्तियां ठोस है मानव मृण्य मूर्तियों में सर्वाधिक मृण्य मूर्तियां नारी की प्राप्त हुई है परन्तु यह आश्चर्य जनक तथ्य है की नारी मृण्य मूर्तियां राजस्थान और गुजरात के किसी भी क्षेत्र से प्राप्त नहीं हुई हैं। नारी मृण्य मूर्तियों में कुआंरी नारी का अंकन सर्वाधिक है। परन्तु हड़प्पा से एक ऐसी मुहर प्राप्त हुई है जिसमें एक नारी को उल्टा दर्शाया गया है और उसके गर्भ से एक पौधा निकलते हुए दिखाया गया है। ऐसा लगता है कि हड़प्पा वासी नारी की पूजा पृथ्वी की उर्वरा शक्ति के रूप में करते थे।

प्रस्तर मूर्तियां:-

प्रस्तर मूर्तियों में मोहनजोदड़ों से प्राप्त पुजारी का सिर (मंगोलायड प्रजाति का) और हड़प्पा से प्राप्त नृत्यरत एक मानव की मूर्ति सर्वाधिक प्रसिद्ध है जिसका बांया पैर कुछ उठा हुआ है। उसके हाथ की भंगिमायें भी अलग हैं।

धातु की मूर्तियाँ:-

धातु की मूर्तियों में ताँबा और कांसे की मूर्तियां प्राप्त हुई है इनमें मोहनजोदड़ों से प्राप्त काँसे की नर्तकी सर्वाधिक प्रसिद्ध है। धातु मूर्तियों को मघूच्छिष्ट विधि या भ्रष्ट मोम विधि या स्वेजांग विधि से बनाई जाती थी। मोहनजोदड़ों से प्राप्त कांसे की नर्तकी प्रोटोआस्ट्रेलायड प्रजाति की है इसी तरह चान्हूदड़ों से काँसें की बैलगाड़ी एवं इक्का गाड़ी काली बंगा से वृषभ मूर्ति प्रसिद्ध है लोथल से प्राप्त ताँबे के कुत्ते की मूर्ति भी आकर्षक है। दैमाबाद से काँसे का रथ प्राप्त हुआ है।

मनके बनाने का कारखाना:

 (गुरिया ठमंके) मनके एक प्रकार की गुरिया थी यह सभी धातुओं और मिट्टी जैसे-सेलखड़ी, सोना, चाँदी, ताँबा, काँसा आदि के बनाये जाते थे। इनमें सर्वाधिक संख्या सेलखड़ी के मनकों की है। चान्हूदड़ों और लोथल से मनके बनाने के कारखाने प्राप्त हुए हैं।

मुहरें

सिन्धु सभ्यता में बहुत सी मुहरें प्राप्त हुई हैं इन मुहरों पर सैन्धव लिपि तथा विभिन्न प्रकार के पशु पक्षियों आदि का अंकन मिलता है। मुहरें सबसे अधिक सेलखड़ी या स्टेटाइट की बनी हुई है। इनकी आकृति आयताकार अथवा वर्गाकार (चैकोर) है। ये विभिन्न अन्य आकृतियों में भी मिली हैं।
मैंके को मोहनजोदड़ों से एक मुहर प्राप्त हुई है जिसपर एक व्यक्ति का चित्र है जो पद्यमासन मुद्रा में बैठा है। इसके दाहिनी ओर बाघ और हाथी तथा बांयी ओर गैंडा और भैसा अंकित है इसके नीचे दो हिरण भी हैं मार्शल महोदय ने इसे शिव का आदि रूप माना है।

लिपि:-

सैन्धव लिपियों में 400 चित्राछर है इसके विपरीत मेसोपोटामियां से कीलाक्षर लिपि प्राप्त हुई है वहाँ 900 अक्षर हैं उन्हें पढ़ा जा चुका है परन्तु सैन्धव लिपि को अभी तक पढ़ा नही गया है। हलाँकि इसको पढ़ने का दावा ज्ञण्छण् बर्मा, एस0आर0 राव, आई महादेवन, रेवण्ड हेरस आदि विद्वानों ने किया है। हेरस महोदय ने इसे तमिल भाषा में अनुवादित करने का दावा भी किया है। हलाँकि सबसे पहले केरल के एक सैनिक अधिकारी ने इसे पढ़ने का दावा किया था। इसे न पढ़े जाने का कारण यह है कि इसका कोई द्वि-भाषिक लेख नही मिला है। इसे आद्य द्रविण या आद्य संस्कृत का प्रारम्भिक रूप माना जा सकता है। सैन्धव लिपि बायें से दायें एवं दायें से बायें लिखी जाती थी। इस विधि को बोस्ट्रोफेदन पद्धति या फिर हलायुद्ध, गोमुत्रिका पद्धति भी कहा जाता है।
यह लिपि सैन्धव मुहरों मृदभाण्डों एवं ताम्र पट्टिकाओं से प्राप्त हुई है।

ऋग्वैदिक संस्कृति एंव उत्तर वैदिक काल

ऋग्वैदिक संस्कृति (1500 ई0पू0 से 1000 ई0पू0)

आर्यों का मूल क्षेत्रः- ऋग्वेद में अफगानिस्तान की चार नदियों कुंभा काबुल, क्रुमू (कुर्रम) गोमद (गोमती) एवं सुवास्तु (स्वात) नदियों का उल्लेख मिलता है ऋग्वेद में ही सप्त सैंन्धव का उल्लेख है। यह पंजाब एवं सिन्धु के सात नदियों वाला क्षेत्र था। ये सातों नदियां थी-

  1. सिन्धु:-इस नदी का उल्लेख सबसे अधिक बार आया है।
  2. सरस्वती:- यह आर्यों की सबसे पवित्र नदी थी क्योंकि नदी सूक्त में इसे नदीतम कहा गया है।
  3. सतुद्री (सतलज)
  4. परुष्णवी (रावी)
  5. विपासा (ब्यास)
  6. अस्किनिल (चिनाव)
  7. वितस्ता (झेलम)

ऋग्वेद में कश्मीर की एक नदी मरुद्वृधा का उल्लेख है। ऋग्वेद में यमुना का तीन बार और गंगा का एक बार उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद में पश्चिमी हिमालय की एक चोटी मूजवन्त का उल्लेख है जहाँ से ऋग्वैदिक आर्य सोम प्राप्त करते थे। इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रारम्भिक आर्य लोग पंजाब एवं अफगानिस्तान के क्षेत्र में बसे थे। इस क्षेत्र को ब्रहमवर्त कहा गया।

उत्तर वैदिक क्षेत्र

उत्तर वैदिक काल में आर्यों के प्रसार का वर्णन शतपथ ब्राहमण नामक ग्रन्थ में मिलता है। इसमें एक कथा का वर्णन है जिसके अनुसार विदेह माधव सरस्वती नदी के तट पर निवास कर रहे थे उन्होंने वैश्वानर अग्नि को मुख में धारण किया हुआ था। घृत का नाम लेते ही अग्नि उनके मँह से निकलकर पृथ्वी पर आ गिरा अग्नि आगे बढ़ते हुए जंगलों को नष्ट करने लगा उसके पीछे-पीछे विदेह माधव और उनके पुरोहित गौतम राहूगढ़ चलने लगे। अकस्मात् बिहार के सदानीरा (आधुनिक-गण्डक) नदी को यह अग्नि नही जला पाया। यही आर्यों की पूर्वी सीमा हो गयी। शतपथ ब्राह्मण में विध्यांचल पर्वत का उल्लेख उसी ग्रन्थ में रेवा (नर्मदा) नदी का उल्लेख है। अब पूर्वी हिमालय की चोटियों का पता चलने लगा इस प्रकार उत्तर वैदिक काल में आर्यों को सम्पूर्ण उत्तरी भाग का ज्ञान हो गया।

आर्य जब ब्रह्मवर्त से आगे बढ़े तब धीरे-धीरे उन्हें गंगा यमुना दोआब के क्षेत्रों की जानकारी हुई अब इस क्षेत्र को ब्रम्हर्षि देश कहा जाने लगा। जब आर्यों को विंध्याचल पर्वत और बिहार तट के क्षेत्रों की जानकारी हो गई तब इसे मध्य देश कहा गया। वैदिक युग के बाद नर्मदा के उत्तर में सम्पूर्ण भारत को आर्यावर्त से सम्बोधित किया गया।

वैदिक संस्कृति जानने के स्रोत:

1. पुरातात्विक साक्ष्य:-
(I)ऋग्वैदिक कालीन पुरातात्विक स्रोतः-

  1. लाल मृदभाण्डः- ये सर्वाधिक संख्या में प्राप्त हुए हैं।
  2. काले मृद भाण्ड:-
  3. ताम्र पुंन्ज:-
  4. गेरुवर्णी मृदभाण्ड (O.E.P)

ये सभी मृदभाण्ड प्राक्, लौह अवस्था या ऋग्वैदिक काल को द्योतित (इंगित) करता है।

उत्तर वैदिक कालीन पुरातात्विक साक्ष्य:-

  1.  P.G.W.(चित्रित धूसर मृदभाण्ड) Painted Grey ware
  2. उत्तरी काली पालिश वाले मृदभाण्ड:- ये मृदभाण्ड लौह अवस्था का संकेत करते हैं तथा उत्तर वैदिक युग से मिलने प्रारम्भ हो जाते हैं। इनका पूरा नाम है-Northern Black Pollieed ware है। परन्तु ये सर्वाधिक संख्या में मौर्य काल में पाये गये हैं।

साहित्यिक साक्ष्य

1. ऋग्वैदिक कालीन साहित्यिक साक्ष्य
ऋग्वैदिक कालीन केवल एक वेद ऋग्वेद है। उसी से ऋग्वैदिक संस्कृति के बारे में जानकारी मिलती है। इसके तीन भाग है-बाल्खिल्य, साकल, पास्कल |
उत्तर वैदिक साहित्यिक साक्ष्य:- उत्तर वैदिक साहित्यिक साक्ष्यों में वेद-ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद आते हैं।

उत्तर वैदिक कालीन तीन प्रमुख वेद हैं।

सामवेद:-

साम का अर्थ है गायन इसमें ऋग्वैदिक मन्त्रों को कैसे गाया जाय का उल्लेख मिलता है। ये ऋग्वेद के अभिन्न माने जाते हैं।

यजुर्वेद:-

इसमें कर्मकाण्डों का वर्णन है। मात्र यही वेद गद्य और पद्य दोनों में लिखा गया है।

अथर्ववेद:-

इसे ब्रम्ह वेद भी कहते हैं इसमें लौकिक बातों का वर्णन है। प्रथम तीन वेद को (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद) त्र्यी कहा जाता है।

  • ब्राहमण:- ब्राहमण वेदों की व्याख्या करने के लिए गद्य में लिखे गये भाग हैं। प्रत्येक वेद के अलग-अलग ब्राहमण हैं।
  • आरण्यक:- वेद के वे भाग जो जंगलों में लिखे गये हैं आरण्यक कहलाते हैं। इसमें आत्मा पुरुष आदि का उल्लेख मिलता है।
  • उपनिषद अथवा वेदांग:- ये वेदों के अन्तिम भाग हैं उप का अर्थ है नजदीक, निषद का अर्थ है बैठना अर्थात ये भाग गुरु के समीप बैठकर लिखे गये हैं। इसमें अनेक गूढ़ बातों जैसे-आत्मा और ब्रम्ह का विवेचन है।

ऋग्वेद:-

यह आर्यों का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है इसमें कुल 10 मण्डल 1028 सूक्त (या 1017) एवं 10580 मंत्र हैं मंत्रों को ऋचा भी कहा जाता है। सूक्त का अर्थ है अच्छी उक्ति प्रत्येक सूक्त में 3 से 100 तक मंत्र या ऋचायें हो सकती है। वेदों का संकलन महर्षि कृष्ण द्वैपायन ने किया है। इनका एक नाम वेद व्यास भी है। इन दशों (10) मण्डलों में 2 से 7 सबसे प्राचीन है जबकि 1,8, 9, 10 परवर्ती काल का है। प्रत्येक मण्डल और उससे सम्बन्धित ऋषि निम्नलिखित हैं।

मण्डल               सम्बन्धित ऋषि

प्रथम मण्डल      –   मधुच्छन्दा, दीर्घात्मा, अडिंग्रा
द्वितीय मण्डल    –   गृत्समद
तृतीय मण्डल     –   विश्वामित्र (गायत्री मंत्र इसी में है जो सूर्य या सविता देवता से सम्बन्धित हैं।
चतुर्थ मण्डल      –   वामदेव (कृषि से सम्बन्धित)
पाँचवा मण्डल    –   अत्रि
छठा मण्डल       –   भरद्वाज
सातवां मण्डल    –   वशिष्ठ (इसमें दशराज्ञ युद्ध का वर्णन है।
आठवां मण्डल   –    कष्व ऋषि (इसी मण्डल में 11 सूक्तों का वाल्यखिल्य है।)
नवां मण्डल       –    पवमान अंडिग्रा (सोम का वर्णन मै कवि हूँ ………)
दशवां मण्डल    –    क्षुद्र सूक्तीय, महासूक्तीय नदी सूक्त

ब्राह्मण:- ऋग्वेद के दो ब्राह्मण हैं-1. ऐतरेय 2. कौशितकी

  1. ऐतरेय ब्राह्मण:- इस ब्राह्मण के रचयिता महीदास माने जाते हैं उनकी माँ का नाम इतिरा था इसीलिए उनके द्वारा लिखा गया ग्रन्थ का नाम ऐतरेय पड़ गया। इसे ब्राह्मण पंचिका भी कहा जाता है।
  2. कौशीतकी:- इसके लेखक कौशीतक माने जाते हैं।

आरण्यकः- ऋग्वेद के दो आरण्यक ऐतरेय और कौशीतकी हैै।
उपनिषद:- ऐतरेय और कौशीतकी।
2. सामवेद:– यह दूसरा वेद है साम का अर्थ है गायन। इसमें मुख्यतः ऋग्वैदिक मंत्रों के उच्चारण पर बल दिया गया। इस वेद में कुल 1549 मन्त्र है। जिसमें इसके स्वयं के 75 मन्त्र ही है बाकी सब ऋग्वेद से लिए गये हैं। इसी कारण इसे ऋग्वेद का अभिन्न माना जाता है। इसी वेद में सा0 ……….. रे…………गामा………… का उल्लेख है। इसकी मुख्यतः तीन शाखाये हैं।
1. कौथुम 2. राणायनीय 3. जैमनीय (तलवकार)

ब्राहमण:- ताण्डय, षडविश, जैमिनीय

  1. ताण्डय ब्राहमण:- यह सबसे प्राचीन एवं सबसे बड़ा ब्राहमण है। इसीलिए इसे महाब्राह्मण भी कहते हैं। यह पाँच अध्यायों में विभाजित है। इसी कारण इसे पंचविष कहा जाता है।
  2. षडविश:- यह छः अध्यायों में विभाजित है इसमें भूत-पे्रत, अकाल आदि के शमन का विधान मिलता है। इसी कारण इसे अद्भुत् ब्राम्हण कहा जाता है।

आरण्यक:- जैमिनीय, छान्दोग्य
उपनिषद:- जैमिनीय, छान्दोग्य

  • छान्दोग्य:- यह सबसे प्राचीन और सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपनिषद माना जाता है। इसी उपनिषद में देवकी पुत्र कृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है तीनों आश्रमों का उल्लेख भी सर्वप्रथम इसी में है। इसी उपनिषद में उद्दालक अरूण और उनके पुत्र श्वेत केतु के बीच आत्मा और ब्रह्म के बीच अभिन्नता का विख्यात संवाद मिलता है।

3. यजुर्वेद:- इस वेद का मुख्य विषय कर्मकाण्ड है मात्र यही वेद गद्य और पद्य दोनों में लिखा गया है यह 40 अध्यायों में विभाजित है तथा इसमें कुल 1990 मन्त्र है इसकी दो मुख्य शाखायें हैं।

1. शुक्ल यजुर्वेद    2. कृष्ण यजुर्वेद

शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता भी कहा जाता है।
यजुर्वेद
शुक्ल यजुर्वेद-वाजसनेयी संहिता

  1. काण्व
  2. मध्यन्दिन

कृष्ण यजुर्वेद

  • काठक
  •  कपिष्ठल
  •   मैत्रीय
  •   तैतरीय

वास्तविक यजुर्वेद शुक्ल यजुर्वेद को ही माना जाता है।
ब्राह्मण:- शुक्ल यजुर्वेद के ब्राह्मण को शतपथ ब्राह्मण एवं कृष्ण यजुर्वेद के ब्राह्मण को तैतरीय ब्राह्मण कहा जाता है।

(I) शतपथ ब्राह्मण:- यह अत्यन्त महत्वपूर्ण ब्राह्मण है इसके लेखक महर्षि याज्ञवल्क्य माने जाते हैं। इस ब्राह्मण में जलप्लावन कथा, पुन्र्जन्म का उल्लेख, पुरखा उर्वशी आख्यान एवं अश्विन कुमार द्वारा यवन ऋषि के यौवन दान आदि का उल्लेख मिलता है। (अश्विन को सांयकाल का तारा कहा जाता है)

आरण्यकः-1.वृहदारण्यक अरण्यक 2. शतपथ आरण्यक 3. तैतरीय आरण्यक
उपनिषदः-1. वृहदारण्यक उपनिषद 2. कठोप निषद 3. ईशापनिषद 4. श्वेताश्वतर उपनिषद 5. मैत्रायणी उपनिषद 6. महानारायणी उपनिषद

कठोप निषदः- कठोप निषद में यम और नचिकेता का प्रसिद्ध संवाद है इसी उपनिषद में आत्मा को पुरुष कहा गया है।
बृहदारण्यक उपनिषद:- इस उपनिषद में याज्ञवाल्क्य और गार्गी का प्रसिद्ध संवाद है। राजा जनक के दरबार में जब आत्मा और बह्मा की चर्चा चल रही थी तभी एक प्रश्न के उत्तर में याज्ञवल्क्य ने गार्गी से कहा ’’आगे बोलोगी तो सर फोड़ दूँगा’’ इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उत्तर वैदिक काल में महिलायें भी विदुषी होती थी परन्तु इसमें विदुषी पुत्री जन्म की कामना की गई है।- बृहदारणयक इसमें भी सीमा निर्धारित थीं।

4. अथर्ववेद अथवा ब्रम्हवेद:-

अथर्वा ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्ववेद पड़ा इस वेद में कुल 20 अध्याय 731 सूक्त और 6000 मन्त्र हैं। इस वेद में जादू-टोना, वशीकरण, भूत-प्रेत आदि के मन्त्र तथा विभिन्न प्रकार की औषधियों का वर्णन है। लोक जीवन से सम्बन्धित विषयों का उल्लेख होने के कारण इसे बेदत्रीय में शामिल नही किया जाता है।

ब्राह्मण:- गोपथ
आरण्यक:- इस वेद का कोई आरण्यक नही है।
उपनिषद:- मुण्डकोपनिषद 2. माण्डम्योपनिषद 3. प्रश्नोपनिषद

  • मुण्डकोप उपनिषद में सत्यमेव जयते का उल्लेख मिलता है। इसी उपनिषद में यज्ञों को टूटी हुई नवकाओं के समान बताया गया है जिसके द्वारा जीवन रुपी भवसागर को पार नही किया जा सकता।

नोट- तैत्तरीय उपनिषद में अधिक अन्न उपजाओं का उल्लेख है।

वैदिकोत्तर साहित्य:-

वैदिक युग के बाद वेदों को समझने में वैदिकोत्तर साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है। इस साहित्य में मुख्यतः वेदांग और उपवेद आते हैं।

वेदांगः- इन्हें वेद का अंग माना जाता है इनकी कुल संख्या छः है-

  1. शिक्षा:- यह उच्चारण शास्त्र से सम्बन्धित है। इसे स्वन विज्ञान भी कहा जाता है।
  2. कल्प:- कर्मकाण्ड से सम्बन्धित।
  3. व्याकरण:- इसका मुख्य कार्य भाषा को वैज्ञानिक शैली प्रदान करना है।
  4. निरुक्त:- इसमें शब्दों की व्युत्पत्ति बताई गयी है।
  5. छन्द:- पद्यों को चरणों में सूत्र बध्य करने के लिए छन्दों की रचना की गई इसे चतुण्पदीय वृद्ध भी कहा जाता है।
  6. ज्योतिष:- ब्रह्माण्ड एवं नक्षत्रों की भविष्यवाणी ज्योतिष का विषय है।

उपवेदः- ये वेदों के भाग माने जाते हैं। चारों वेद के साथ ये अलग-अलग जुड़े हैं। जैसे ऋग्वेद का उपवेद-आयुर्वेद, सामवेद का उपवेद-गन्धर्ववेद यजुर्वेद का उपवेद-धनुर्ववेद, अथर्ववेद का उपवेद-शिल्प वेद।

सूत्र साहित्य (600 ई0पू0-300 ई0पू0)

वैदिक युग के समारित के बाद सूत्र साहित्य का संकलन किया गया इसके अन्तर्गत तीन प्रमुख सूत्र आते हैं।

  1. श्रौत सूत्र:- इस सूत्र में यज्ञ से सम्बन्धित जानकारी मिलती है इसी सूत्र का एक भाग शुल्व सूत्र है जिसके द्वारा यज्ञ वेदियों के निर्माण आदि का पता चलता है। इसी के द्वारा रेखा गणित की उत्पत्ति मानी जाती है।
  2. गृह सूत्र:- इसमें गृह कर्मकाण्डों एवं यज्ञों का वर्णन है जैसे- संस्कार आदि इसके रचयिता आश्वलायन हैं।
  3. धर्म सूत्र:- इसमें राजनैतिक सामाजिक धार्मिक कर्तव्यों का उल्लेख मिलता है। इससे सामाजिक व्यवस्था जैसे-वर्णाश्रम, पुरुषार्थ आदि की भी जानकारी मिलती है। इसके लेखक आपस्तम्ब माने जाते हैं प्रमुख सूत्रकारों में गौतम, आपस्तम्ब, बौद्धायन, वशिष्ठ, आश्वलयन आदि हैं। जिनमें गौतम सूत्र सर्वाधिक प्राचीन है। वशिष्ठ सूत्र में नारी की दशा का वर्णन करते हुए वह प्रसिद्ध श्लोक है।

’’पिता रक्षति कौमारे।
भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रः।
न स्त्री स्वातन्त्रयमर्हति’’।।

स्मृतियां:- स्मृतियां हिन्दू धर्म के कानूनी ग्रन्थ हैं ये पद्य में लिखे गये हैं इन्हें अन्तिम रूप से गुप्त काल में संकलित किया गया है सबसे प्राचीन दो स्मृति मनु एवं याज्ञवल्क्य स्मृति है।

  1. मनु स्मृति – 200 ई0पू0 -200 ई0
  2. याज्ञवल्क्य – 100 ई0  – 300 ई0
  3. नारद स्मृति – 300 ई0 – 400 ई0
  4. पाराशर स्मृति- 300 ई0 – 500 ई0
  5. काव्यायन स्मृति – 400 ई0 – 500 ई0
  6. देवल स्मृति – 8 वीं ईसवी के बाद
  • देवल स्मृति में जो लोग हिन्दू धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपना लिए थे उन्हें पुनः हिन्दू धर्म में लौटने का विधान बताया गया है।

याज्ञवल्क्य केभाष्यकर:-

1. विज्ञानेश्वर 2. विश्वरुप 3. अपरार्क
मनुस्मृति:- यह प्राचीनतम स्मृति है इसमें भारत की सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्थाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है इस स्मृति पर बाद में बहुत से विद्वानों ने भाष्य लिखे।
भाष्यकार:- 1. मेघातिथि 2. कुल्लूक भट्ट 3. गोविन्द राम 4. भररुचि
नोटः- अपरार्क या आदित्य प्रथम एक शिलाहार राजा थे जिन्होंने याज्ञवल्क्य स्मृति पर भाष्य लिखा।
मिताछरा:- इसके लेखक विज्ञानेश्वर है इससे पता चलता है कि पिता की जीवन काल में भी पुत्र को सम्पत्ति का हस्तांन्तरण हो सकता है। यह असम और पूर्वी भारत को छोड़कर सम्पूर्ण भारत वर्ष में प्रचलित है।
दायभाग:- इसके लेखक जीमूत वाहन इससे पता चलता है कि पिता के मरने के बाद ही पुत्र को सम्पत्ति का हस्तान्तरण हो सकता है। यह असम और पूर्वी राज्यों में प्रचलित है।
धर्मशास्त्र:- यह धर्मसूत्र स्मृतियों और टीकाओं का सामूहिक नाम है।

पुराण:-

पुराण का अर्थ है प्राचीन आख्यान इसमे प्राचीन राज वंशावलियों का वर्णन मिलता है इसके लेख लोमहर्ष अथवा इनके पुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं। वेद व्यास को भी इनका संकलन कर्ता माना जाता है। पुराणों की कुल संख्या 18 है। इसमें मत्स्य या वायु पुराण सर्वाधिक प्राचीन है।

ऋग्वैदिक एंव उत्तर वैदिक कालीन संस्कृति

ऋग्वैदिक संस्कृति

    1. राजनैतिक संगठन– आर्य जब मध्य एशिया के Bactria से सप्त-सैन्धव क्षेत्र में आये तब वे विभिन्न जनों में विभक्त थे जन के प्रमुख को राजन् कहा जाता था। जन विश में विश-ग्राम में ग्राम-कुल या गृह में विभक्त थे। विश के प्रमुख को विशपति, ग्राम के प्रमुख को ग्रामणी एवं कुल के प्रमुख को कुलप कहा जाता है जबकि गृह का प्रमुख गृहपति होता था।
जन——-विश——-ग्राम——कुल या गृह
नोटः- जन शब्द 275 बार तथा विश का उल्लेख 170 बार ऋग्वेद में हुआ है।

जन का प्रमुख राजन् कहलाता था इसका पद आनुवंशिक था एवं इसका राजभिषेक किया जाता था। राजन् पर नियन्त्रण रखने के लिए दो संस्थायें सभा और समिति थी। सभा योग्य और वृद्ध लोगों के लिए संस्था थी (राज्य सभा की तरह) जबकि समिति में वयस्क लोक भाग लेते थे (लोक सभा) की तरह समिति का नियंत्रण सभा की अपेक्षा अधिक था। समिति के अध्यक्ष को ईशान् कहा जाता था। हलांकि ऋग्वेद में सबसे प्राचीन संस्था का नाम विदथ मिलता है। इसी प्रकार गण भी एक संस्था थी।
नोटः- प्रजा राजा को उपहार देती थी जिसे बलि कहा गया उत्तर वैदिक काल में यह कर हो गया (बाध्य करके वसूला गया भाग कर होता है) अतः पूरे वैदिक काल में कर लिया जाता था ऐसा माना जाता है।
ऋग्वैदिक जनों के राजाओं के बीच आपस में संघर्ष होता रहता था ऐसा प्रथम संघर्ष हरियूपिया नामक स्थान पर मिलता है।
प्रथम संघर्ष:- ऋग्वेद से पता चलता है कि हरियूपिया नामक स्थान पर याब्यावती नदी के तट पर तुर्वश और बीचवृन्त तथा श्रृजंयो के बीच संघर्ष हुआ। हरियूपिया की पहचान हड़प्पा से की जाती है। इस युद्ध में श्रृंजयों की विजय हुई यही संघर्ष आगे बढ़कर दस राज्ञ युद्ध में बदल गया।
दस राज्ञ युद्ध:–(स्थान परुष्णवी (रावी) नदी के किनारे, उल्लेख ऋग्वेद के सातवें मण्डल में -भारत वंश (त्रित्स वंश) के राजा सुदास के पुरोहित विश्वामित्र थे सुदास ने विश्वामित्र की जगह वशिष्ठ को अपना पुरोहित बना लिया फलस्वरूप विश्वामित्र ने दस जनों को इकठ्ठा कर सुदास के विरूद्ध युद्ध कर दिया परन्तु विजय सुदास को ही मिली इस दस-जनों में पंच जन का नाम विशेष रूप से उल्लेख है-पुरु, यदु, अनु द्रुहा तुर्वश तथा अन्य में अलिन, पक्थ भलानस, विषाणी, शिव।
दस राज्ञ युद्ध में दोनों तरफ से आर्य एवं अनार्यों ने भाग लिया था।

  • राजा के पदाधिकारी:- ऋग्वेद से राजा के सहयोगियो का पता चलता है। इन सहयोगियों में पुरोहित, सेनानी और ग्रामणी प्रमुख थे। पुरोहितों का स्थान सर्वोच्च था इन्हें रत्निन कहा जाता था अन्य अधिकारियों में गुप्तचरों को स्पर्श एवं पुलिस को उग्र कहा गया है। सैन्य संगठन- ऋग्वैदिक काल में राजा के पास कोई स्थायी सेना नही थी परन्तु इसकी आवश्यकता पड़ने पर एक अस्थायी सेना जिसे मिलिशिया कहा जाता था का गठन कर लिया जाता था। इसका संचालन व्रात गण, ग्राम और सर्ध नामक कबायली टोलियां करती थी।
  • सामाजिक संगठन:- ऋग्वैदिक आर्य विभिन्न जनों में विभाजित थे जन विश मे विश् ग्राम में और ग्राम गृह या कुल में विभक्त थे। समाज की सबसे छोटी इकाई गृह या परिवार थी इसका मुखिया गृहपति होता था और यह सामान्यतः परिवार का पिता होता था अर्थात यह पितृ प्रधान परिवार था। इस परिवार में पत्नी की भी स्थिति महत्वपूर्ण थी। ऋग्वेद में एक स्थान पर जायेदस्तयम् शब्द मिलता है जिसका अर्थ है पत्नी ही गृह है। शुनः शेप ऋजास्व एवं दिवालिये जुआरी दृष्टान्तों से स्पष्ट है कि पिता की स्थिति सर्वोच्च थी यह परिवार संयुक्त परिवार था क्योंकि अन्य सभी सम्बन्धियों के लिए (चाचा, चाची, नाना, नानी, भतीजा आदि) एकही शब्द नप्तृ का उल्लेख मिलता है।
  • वर्ण व्यवस्था:- ऋग्वेद से ही वर्ण व्यवस्था की शुरूआत होती है वर्ण के दो अर्थ हैं एक वरण करना अथवा चुनना एवं दूसरा रंग ऋग्वेद के नवें मण्डल में एक व्यक्ति कहता है ’’मैं कवि हूँ मेरा पिता वैद्य हैं और मेरी माता आटा पीसने वाली है विभिन्न कार्यों को करते हुए भी हम लोग एक साथ रहते हैं’’ यह कार्य के आधार पर समाज का विभाजन दर्शाता है। ऋग्वेद से पता चलता है कि आर्य गौर वर्ण के थे जबकि अनार्य श्याम वर्ण के इस तरह रंग के आधार भी विभाजन की शुरूआत हुई।

प्रारम्भ में आर्य तीन वर्णों ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य में विभाजित थे। ऋग्वेद के दशवें मण्डल के पुरुष सूक्त में पहली बार चारों वर्णों का एक साथ उल्लेख मिलता है जिसमें एक आदि पुरुष के मुख से ब्राहमण भुजाओं से क्षत्रिय जाघों से वैश्य एवं पैरों से शूद्र की उत्पत्ति दिखाई गयी।
ब्राहमणोडस्य मुखम् आसीत्।
बाहुः राजन्यः कृता।।
उरुतदस्यद्वेश्यः पादभ्याँ।
शुद्रो अजायत्।।’’

  • दास प्रथा:- ऋग्वेद में दास प्रथा का उल्लेख मिलता है। दास दासियों दोनों का उल्लेख है।
  • स्त्रियों की दशा:- ऋग्वैदिक समाज में स्त्रियों की दशा अत्यन्त उच्च थी। उनके सभी तरह के अधिकार प्राप्त थे केवल सम्पत्ति का अधिकार प्राप्त नही था यह अधिकार बाद में गुप्तकाल में पहली बार याज्ञवल्य स्मृति में प्राप्त होता है। सामान्यतः उनके निम्न अधिकार थे।
  1. विवाह की आयु:- ऋग्वैदिक काल में वयस्क होने पर ही (लगभग 16 वर्ष की आयु) विवाह होता था।
  2. उपनयन संस्कार:- पुरुषों की तरह स्त्रियों का भी उपनयन संस्कार होता था यह संस्कार शिक्षा से सम्बन्धित था। इसी संस्कार के बाद वेद पढ़ने का अधिकार प्राप्त होता था ऋग्वेद काल में बहुत सी विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है जैसे-अपाला, घोसा, लोपा, मुद्रा, शिक्ता आदि।
  3. राजनीतिक अधिकार:-    स्त्रियां सभा समिति एवं विदभ में भाग ले सकती थी।
  4. विधवा विवाह:- ऋग्वेद में विधवा विवाह का भी उल्लेख है।
  5. बहुपति प्रथा:- ऋग्वेद से पता चलता है कि समाज में बहुपति प्रथा भी विद्मान थी।
  6. नियोग प्रथा:- ऋग्वेद में नियोग प्रथा का उल्लेख है इस प्रथा के अन्तर्गत पति के विदेश होने पर या 10 वर्षों से अधिक अनुपस्थित होने पर नपंुसक होने पर स्त्रियां किसी नजदीकी रिश्तेदार से पुत्र की कामना कर सकती थी। इसमें देवर को विशष रूप से मान्यता प्राप्त थी। इससे उत्पन्न पुत्र को पति की ही संन्तान माना जाता था। इससे उत्पन्न सन्तान को क्षेत्रज के नाम से जाना जाता है वहीं कुमारी कन्या (अमाजू) से उत्पन्न सन्तान कनीन तथा विधवा (पुनर्भू) से उत्पन्न सन्तान को पुनर्भव के नाम से जाना जाता था।

   स्त्रियों में निम्न कुप्रथायें नही थी।
1. सती प्रथा    2. पर्दा प्रथा    3. दहेज प्रथा
ऐसी स्त्रियाँ जो जीवन भर विवाह नही करती थी केवल शिक्षा प्राप्त करती थी उन्हें अमाजू कहा जाता था।
इस समय विवाह के दो प्रकार प्रचलित थे अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह अनुलोम विवाह में पुरुष उच्च वर्ण का होता था जबकि महिला निम्न वर्ण की इसे मान्यता भी प्राप्त थी। इसके विपरीत प्रतिलोम विवाह में पुरुष निम्न वर्ण एवं महिला उच्च वर्ण की थी इसे सामाजिक मान्यता नही प्राप्त थी।
वस्त्र आभूषण:- सामान्यतः तीन प्रकार के वस्त्र प्रचलित थे

  1. नीवी:- अन्दर पहनने वाला वस्त्र।
  2. वासः- सामान्य वस्त्र।
  3. विश्वास:- ऊपर से पहना जाने वाला वस्त्र।

सूती कपड़ा ऊनी कपड़ा आदि का उल्लेख मिलता है कपड़ो में कढ़ाई भी होती थी। पगड़ी को ऊष्णीय कहा गया।
आभूषण:- ऋग्वेद में न तो लोहें का उल्लेख है और न ही चांदी का केवल एक ही धातु अयस का उल्लेख मिलता है। अयस का अर्थ ताँबा या काँसा से लगाया गया है। ऋग्वेद में  स्वर्ण आभूषणों का उल्लेख है जिसमें कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं।

  1. रुक्म:- यह स्वर्ण का गले का हार था।
  2. निष्क:- यह स्वर्ण ढे़र था जिसका उपयोग विभिन्न कार्यों में होता था जैसे-गले का हार एवं तौल या माप की इकाई के रूप में।
  3. मन् (Mana):- यह भी स्वर्ण ढेर था।

खान-पान:- ऋग्वेद में चावल और मछली का उल्लेख का उल्लेख नही है आर्य शाकाहारी और मांसाहारी दोनों थे ज्यादातर भोजन दूध और उससे मिश्रित वस्तुओं का होता था। एक प्रकार की खिचड़ी तैयार की जाती थी। दूध में यव् को मिलाकर क्षीर पकौदन तैयार किया जाता था। जबकि सत्तू को दही में मिलाकर करंभ नामक भोजन बनाया जाता था।
पेय पदार्थों में सोम और सुरा का उल्लेख आता है।
1. सोम:- यह आर्यो का मुख्य पेय था ऋग्वेद का पूरा नवां मण्डल सोम देवता को ही समर्पित है।
2. सुरा:– यह एक मादक पेय था जिसकी निन्दा की गई है।
अमोद-प्रमोद:- मनोरंजन के साधनों में नृत्यगान, रथ दौड़, पासा धूत क्रीड़ा आदि प्रमुख थे।
आर्थिक दशा:- ऋग्वैदिक युग में कृषि की अपेक्षा पशु पालन का ज्यादा महत्व था क्योंकि आर्य कबायली थे और भम्रण शील थे उनका जीवन स्थाई नहीं था ऐसी दशा में पशु पालन का महत्व बढ़ जाता है। ऋग्वेद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पशु गाय थी।
गाय:- ऋग्वेद में 176 बार गाय का उल्लेख मिलता है इससे इसकी महत्ता का पता चलता है अधिकांश लड़ाईयां गायों के लिए ही होती थी गायों के लिए निम्न शब्द प्रयोग किये जाते थे। इसे वैदिक काल में सम्पत्ति के रूप में प्रयोग किया जाता था जो कई के रूप में जानी जाती थी।

  1. गविष्टि:- वैसे गविष्टि का साहित्यिक अर्थ गायों का अन्वेषण है परन्तु यह शब्द युद्ध का प्रयाय बन गया था क्योंकि अधिकांश पशुओं की चोरियां गायों के लिए ही होती थी। ’पणि’ नामक व्यापारी पशुओं की चोरी के लिए विख्यात थी। एक अन्य प्रकार के दान शील व्यापारी वृबु का भी उल्लेख है।
  2. अघन्या:- इसका साहित्यिक अर्थ न मारने योग्य है।
  3. अष्ट कर्णी:– इसका अर्थ जिसके कान पर 8 का निशान हो अथवा छेदे हुए कान वाली।
  4. गोषु, गभ्य आदि-युद्ध के प्रयाय शब्द हैं।

2. अश्व:- गाय के बाद दूसरा महत्वपूर्ण पशु, घोड़ा था इसका उपयोग मूलतः रथों में होता था।
ऋग्वेद में बैल, भैंसा, भेंड़, बकरी, ऊँट आदि सभी पशुओं का उल्लेख है परन्तु सिन्धु काल में प्रचलित बाघ और हाथी का उल्लेख नही है।
कृषि:- ऋग्वेद में कृषि का स्थान भी महत्वपूर्ण था परन्तु ऋग्वेद के केवल 24 मंत्रों में ही कृषि का उल्लेख है। कृषि से सम्बन्धित निम्नलिखित शब्द महत्वपूर्ण है-
1. चर्षणी-कृषि या कृष्टि    2. क्षेत्र-जुता हुआ खेत
3. उर्वरा-उपजाऊ भूमि    4. लाडग्ल-हल
5. वृक-बैल                      6. कीवास्-हलवाहे
7. सीता-हल से बनी हुई नालियां या कूड़
8. खिल्यः- दो खेतों के बीच छोड़ी गई पट्टी-इस शब्द का प्रयोग परती ऊसर आदि भूमियों के लिए भी किया गया है यह ऐसा क्षेत्र था जहाँ घास उग आता था।
9. करीस-गोबर का खाद  10. अवट्-कुएँ के लिए
11. तितऊः चलनी           12. उर्दर:- मांपने का बर्तन
ऋग्वेद में एक ही फसल मव का उल्लेख है जो जौ गेंहू के लिए प्रयुक्त हुआ है।
3. उद्योग धन्धे:- आर्यो का मुख्य व्यवसाय वैसे तो पशुपालन था परन्तु ऋग्वेद में बढ़ई, रथकार, बुनकर, कर्मार आदि शिल्पियों का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में केवल एक ही धातु अयस् का उल्लेख ताँबा अथवा काँसा के लिए किया गया है ऋग्वेद में बढ़ई के लिए तक्षन तथा धातुओं के लिए तथा धातुओं पर कार्य करने वाले को कर्मार कहा गया है सोना के लिए हिरण्य शब्द तथा सिन्धु नदी के लिए हिरण्यी शब्द मिलता है क्योंकि सिन्धु नदी से सोना बहुतायत में निकाला जाता था। बौने जो धातुओं पर कार्य करते थे उन्हें ऋबु कहा गया है कड़ाई बुनाई के लिए सिरी पेशस्करी शब्द प्रयुक्त हुआ है नाई के लिए वप्ता एवं चमड़े पर कार्य करने वालों को चर्मकार कहा गया।
व्यापार:- ऋग्वेद में यद्यपि समुद्र शब्द प्राप्त होता है परन्तु आर्यों को वास्तविक समुद्र की जानकारी नही थी। यहाँ समुद्र से तात्पर्य जल राशि से है इस समय सिक्के भी प्रचलित नही थे। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि आन्तरिक एवं वाह्य व्यापार वस्तु विनिमय पर आधारित था। ऋग्वेद में कुछ शब्द स्वर्ण के ढेर के रूप में प्रयुक्त हुए हैं जिनका उपयोग तौल की इकाई के रुप में किया जाता था।
निष्क:- ऋग्वेद में स्वर्ण ढेर था जिसका प्रयोग वस्तु विनिमय में भी हो रहा था आगे चलकर निष्क ही भारत का प्रथम स्वर्ण सिक्का कहलाया। मौर्य काल में भी स्वर्ण सिक्कों का उल्लेख है परन्तु प्रारम्भिक सिक्के आहत सिक्के होते थे पहली बार स्वर्ण सिक्के चलाने का श्रेय हिन्द यवन ;प्दकव.ळतमंजेद्ध शासकों को दिया जाता है क्योंकि उन्होंने ने ही भारत में पहली बार लिखित सिक्के चलाये सबसे अधिक स्वर्ण मुद्रायें गुप्त काल में जारी की गई परन्तु सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण के सिक्के चलाने का श्रेय कुषाण शासको को जाता है।
धार्मिक दशा:- ऋग्वैदिक आर्य कबायली थे अतः वे एक स्थान पर स्थिर नही थे उनका ज्यादातर सामना प्रकृति की विभिन्न शक्तियों से होता था इसी कारण आर्यों के प्रारम्भिक देवता प्रकृति के देवता है यास्क ने अपने ग्रन्थ निरुक्त में ऋग्वैदिक देवताओं की देव मण्डली बनाई है जो निम्नलिखित है इनकी कुल संख्या 33 है।

  1. आकाश के देवता:- घौष, सूर्य, ऊषा, मित्र, सविता, विष्णु, अश्विन पूजन, वरुण, अदिति।
  2. आन्तरिक्ष के देवता:- इन्द्र, वायु, मारुत, रुद्र, पर्जन्य, आप आदि।
  3. पृथ्वी के देवता:- अग्नि, सोम, अरण्यानी, बृहस्पति, सिन्धु, सरस्वती।

इन्द्र:- यह ऋग्वेद के सबसे प्रमुख देवता है इसकी स्तुति में सर्वाधिक 250 सूक्त है यह मुख्यतः वर्षा एवं झंझावत का देवता है अनार्यों के किले तोड़ने के कारण इसका एक नाम पुरन्दर भी पड़ गया। वृत्तासुर नामक राक्षस को मारने के कारण इसका एक नाम वृत्तहन्ता था। बादलों को भेदने के कारण पुरभिद एवं सोम का अधिक पान करने के कारण सोमापा नाम पड़ गया। इन्द्र का प्राचीन समय में कृष्ण के साथ संघर्ष का उल्लेख है।
अग्नि:- ऋग्वैदिक देव मण्डली में अग्नि का स्थान दूसरा था इस पर कुल 200 सूक्त रचे गये हैं इसका मुख्य कार्य आर्यों एवं देवताओं के बीच मध्यस्थ का था।

वरूण:- ऋग्वैदिक देवताओं में वरुण का स्थान तीसरा था मूलतः यह जल का देवता था इसके साथ ही यह प्रकृति के नैतिक एवं भौतिक नियमों का संरक्षक भी था। इस रुप में इसका एक अन्य कार्य पापियों को दण्ड देना भी था। ऋग्वेद में इसका एक नाम ऋतस्यगोपा भी मिलता है। वरूण की तुलना ईरानी देवता आहुरमज्जा से की जाती है।
सोम:- यह वनस्पतियों का देवता था ऋग्वेद का पूरा नवां मण्डल इसी देवता को समर्पित है।
अश्विन:- ये आर्यों के चिकित्सक देवता थे इस रुप में इन्होंने आर्यो के टूटे पैरों को जोड़ने का कार्य किया उनके नावों आदि की मरम्मत भी की ये जुड़वा भी माने जाते हैं एवं तारे थे।
अरण्यानी:- यह जंगल की देवी थी।
मरुत:- यह आँधी का देवता था।
धौ धौष:- यह आर्यों का सबसे प्राचीन, देवता एवं पिता तुल्य था।
मित्र:- उदित होता हुआ सूर्य।
सविता:- जब सूर्य चमकने लगता है तब इसे सूर्य सविता कहा जाता है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध गायत्री मंत्र इसी सविता को समर्पित है।
पूजन:- पशुओं और वनस्पतियों का देवता।
विष्णु:- ऋग्वेद में इनके द्वारा आकाश को स्थिर करने का उल्लेख है।
रूद्र:- ऋग्वेद में इनके क्रोध रूप का वर्णन है।
धर्जन्य:- बादल-मूलतः यह वर्षा एवं नदी के देवता है।
ऊषा:- यह देवी थी। सूर्य निकलने के पूर्व की बेला को ऊषा काल कहा गया है।
अदिति:- यह आर्यों की सर्वशक्ति मान या सार्वभौम प्रकृति की देवी थी।
आप:- श्रृष्टि करने वाला देवता ।
वृहस्पति:- आर्यों के गुरु एवं यज्ञ के देवता।
सरस्वती:- ज्ञान की देवी।
ऋतु की संकल्पना:- ऋग्वेद में ऋतु की संकल्पना विस्तृत रूप में की गई है यह प्रकृति में व्याप्त भौतिक एवं नैतिक नियम है इनके देवता को वरुण (ऋतस्यगोपा) कहा गया है।
ऋग्वैदिक काल के प्रारम्भ बहुदेववाद का प्रचलन मिलता है फिर एक समय में एक ही देवता को प्रमुखता दी गई। मैक्समूलर ने इस प्रकृति को भ्मदवजीपेउ (हीनोथिज्म) कहा है ऋग्वेद के दसवें मण्डल में एकेश्वर बाद की झलक दिखाई पड़ती है जहाँ ’’ एक संत् विप्राः बहुधा वदन्ति’’ अर्थात सत्य एक है ज्ञानी उसे भिन्न प्रकार से बताते हैं एवं ’’महद देवानां सुरत्वमेकम्’’ अर्थात देवताओं की शक्ति एक ही है।

उपासना की रीति एवं उद्देश्य:-

देवताओं की उपासना की रीति मुख्यतः स्तुति पाठ करना, और यज्ञ बलि अर्पित करना या याज्ञाहुति में शाक जौ आदि वस्तुएं चढ़ाई जाती थी परन्तु इन्हें चढ़ाते समय कोई अनुष्ठाानिक या कर्मकाण्ड नहीं होते थे। पशुओं की बलि चढ़ाने के लिए एक स्तम्भ से बांधा जाता था जिसे यूप कहा जाता था।
आर्यों की उपासना का मुख्य उद्देश्य लौकिक था इस रुप में वे संतति पशु धन धान्य आदि की कामना करते थे वे लोग आध्यात्मिक उत्थान या जन्म मृत्यु के कष्टों से मुक्ति के लिए पूजा पाठ नही करते थे।

उत्तर वैदिक कालीन संस्कृति:-

राजनैतिक दशा:- उत्तर वैदिक काल में छोटे-छोटे जन् आपस में मिलाकर एक बड़ी इकाई जनपद में परिवर्तित हो गये। ऐतरेय ब्राह्मण में पहली बार राष्ट्र शब्द का उल्लेख भी मिलता है। उदाहरणार्थ पुरु भारत – कुरु एवं तुर्वश और क्रीवि मिलकर पांचाल हो गये। इस प्रकार राजा की महत्ता में वृद्धि हुई। राजा ने इसका फायदा उठाया और अपने पर से सभा और समिति के नियन्त्रण को समाप्त कर दिया।
उत्तर-वैदिक काल में सर्वप्रथम समाप्त होनी वाली संस्था विद्थ थी। इस काल में राजा अलग-अलग उपाधियां धारण करने लगे। उदाहरणार्थ-मध्यदेश के राजा को राजन, पूर्व देश के राजा को सम्राट पश्चिम के राजा को स्वराट और उत्तर के राजा को विराट एवं दक्षिण के राजा को भोज कहा गया जो राजा इन चारों दिशाओं के राजाओं को जीत लेता था उन्हें एकराट कहा जाता था।

अथर्ववेद से पता चलता है कि सभा और समिति का महत्व अभी भी था क्योंकि उसे अथर्ववेद में प्रजापति की ’दो पुत्रियां’ कहा गया है। इस काल में कई राजाओं के नाम प्राप्त होते हैं। अथर्ववेद में मृत्युलोक के देवता परीक्षित का उल्लेख है उपनिषदों में कई राजाओं के नाम मिलते हैं उदाहरणार्थ-
काशी        –    अजातशत्रु।
विदेह        –    जनक।
केकय       –    अश्वपति।
पांचाल      –    प्रवाहण जैवलि।
कुरु          –    उद्धालक आरुणि।
शतपथ ब्राह्मण से पता चलता है कि याज्ञवक्य ने राजा जनक से शिक्षा प्राप्त की केकय जनपद का राजा अश्वपति एक दार्शनिक राजा था। कुरु जनपद के राजा उद्दालक अरुणि एवं उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता के विषय में विख्यात संवाद् का उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद में है। वृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य एवं गार्गी का प्रसिद्ध संवाद है।
राजा का राज्याभिषेक राजसूय यज्ञ के द्वारा सम्पन्न होता था इसका विस्तृत वर्णन हमें शतपथ ब्राहमण में मिलता है इस ग्रन्थ से पता चलता है कि राजा राज सूर्य यज्ञ के समय रत्निन् के यहाँ जाता था।
रत्निन्:- ये राज्य के योग्य कर्मचारी थे शतपथ ब्राहमण में 12 रत्नियों का उल्लेख है जिनका समर्थन राजा प्राप्त करने की कोशिश करता था।

  1. सेनानी:-उत्तर वैदिक काल में यह सबसे महत्वपूर्ण रत्निन् था ऐतरेय ब्राहमण से पता चलता है।
  2. पुरोहित:- इसका स्थान दूसरा था।
  3. ग्रामणी
  4. युवराज
  5. महिषि:– राजा की प्रमुख रानी या पट्ट रानी।
  6. सूत   – राजा का सारथी।
  7. क्षत्ता:- द्वार पाल।
  8. भागदुध:- कर लेने वाला अधिकारी कर का भाग 1/6 होता है।
  9. संग्रहीता:- कोषाध्यक्ष
  10. अक्षवाप:- अक्ष क्रीडा में राजा का साथी।
  11. पालागल:- विदूषक का पूर्वज
  12. गोविकर्तन:- आखेट में राजा का साथी या जंगल का प्रमुख भी होता था

राजसूय यज्ञ के अतिरिक्त राजा अश्वमेघ यज्ञ एवं वाजपेय यज्ञ करता था। अश्वमेघ यज्ञ राज्य के विस्तार से सम्बन्धित था जबकि वाजपेय यज्ञ एक प्रकार की रथ दौड़ थी जिसमें राजा का रथ सबसे आगे रहता था।

अथर्ववेद में सूत और ग्रामणी को कत्र्त अर्थात राजा बनाने वाला कहा गया है।

कर प्रणाली:-

उत्तर-वैदिक युग में बलि एक प्रकार का कर हो गया। भू-राजस्व के लिए भाग शब्द मिलता है। इसको वसूलने वाले अधिकारी को भागदुध एवं इकठ्ठा करने वाले अधिकारी को संग्रहिता कहा गया। यह कर वैश्य वर्ग ही देता था जिसकी उत्पत्ति विश् शब्द से मानी जाती है इस कारण राजा का एक नाम विशमत्ता पड़ गया जबकि वैश्य को अन्यस्य बलिकृतः या अनास्यद्य कहा गया है।
सेना:- उत्तर वैदिक काल में भी स्थायी सेना की कल्पना नहीं थी आवश्यकता पड़ने पर विभिन्न कबाचली टोलियां एक स्थायी सेना का गठन कर लेती थी।

सामाजिक दशा:

उत्तर वैदिक काल में आर्यों की सामाजिक व्यवस्था का आधार वर्णाश्रम व्यवस्था थी यद्यपि वर्ण व्यवस्था की नींव ऋग्वैदिक काल में ही पड़ गयी थी परन्तु वह स्थापित उत्तर-वैदिक काल में ही हुई। समाज में चार वर्ण ब्राहमण, राजन्य, वैश्य और शूद्र थे। इनमें ब्राहमणों की प्रतिष्ठा सर्वाधिक थी। ऋग्वैदिक काल में कुल सात पुरोहित थे। उत्तर वैदिक काल में उनकी संख्या बढ़कर 17 हो गई इनमें ऐसे पुरोहित जिन्हें ब्रम्ह का ज्ञान होता था वे ब्राहमण कहलाये इनका मुख्य कार्य यज्ञ और अनुष्ठान था-
दूसरा वर्ण राजन्य था ऐतरेय ब्राहमण से पता चलता है कि इसकी स्थिति ब्राहमणों से श्रेष्ठ थी वैश्व वर्ण की उत्पत्ति विश् शब्द से हुई समाज का यही वर्ग कर देता था इसीलिए इसका नाम अनस्यबलकृत भी पड़ गया।
शूद्रों की दशा समाज में निम्न थी उसका कार्य अन्य वर्गों की सेवा करना था उत्तर-वैदिक काल में इस वर्ण का उपनयन संस्कार बन्द कर दिया गया जिससे उसकी सामाजिक दशा का हास हुआ। उसके कुछ अन्य नाम पड़ गये जैसे- अनस्यप्रेष्य: (अन्य वर्णों का सेवक) कामोत्थाप्स (मनमाने ढंग से उखाड़ फेंके जाने वाले) यथा काम बध्य (इच्छानुसार वध किया जाने वाला) इससे पता चलता है कि समाज में इनकी दशा गिर रही थी।
इस समय समाज में एक अन्य वर्ग रथकार का स्थान महत्वपूर्ण था इसका भी उपनयन संस्कार ऊपर के तीन वर्णों की भाँति होता था।

आश्रम व्यवस्था:-

उत्तर वैदिक काल में आश्रम व्यवस्था की शुरुआत हुई कुल चार आश्रम माने जाते हैं जिसमें से प्रथम तीन आश्रम ब्रम्हचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ उत्तर वैदिक काल में ज्ञात थे। चैथा आश्रम सन्यास इस समय अज्ञात था प्रथम तीन आश्रमों का उल्लेख सर्वप्रथम एक साथ छान्दोग्य उपनिषद में मिलता है।
ब्रम्हचर्य:- इस आश्रम का मूल उद्देश्य मनुष्य का बौद्धिक विकास तथा शिक्षा प्राप्त करना था। इसी समय उपनयन संस्कार किया जाता था ब्राहमण का उपनयन संस्कार 8 वर्ष की अवस्था में क्षत्रिय का 11 एक वैश्व का 12 वर्ष की अवस्था में उपनयन संस्कार होता था।
शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षकों को आचार्य कहा जाता था जो शिक्षक पैसा लेकर शिक्षा प्रदान करते थे उन्हें उपाध्याय कहा जाता था। जो कन्या आश्रम में जीवन भर शिक्षा प्राप्त करती थी उन्हें अमाजू और जो निश्चित समय तक प्राप्त करती थी उन्हें सद्योवधू कहा जाता था। इसी तरह जो छात्र जीवन भर शिक्षा प्राप्त करते थे उन्हें नैष्ठिक और जो निश्चित समय तक शिक्षा प्राप्त करते थे उपकुर्वाण कहा जाता था।
गृहस्थ आश्रम:- यह आश्रमों में सर्वश्रेष्ठ था तथा समाज के सभी वर्गों के लिए मान्य था। इस आश्रम में एक व्यक्ति को तीन ऋणों से मुक्ति प्राप्त करनी पड़ती थी साथ ही उसे पंचमहा यज्ञ सम्पादित करना पड़ता था।
त्रिश्रृण:- इनमें शामिल थे।

  1. देव ऋण:- देवताओं को यज्ञ आदि करके प्रसन्न किया जाता था।
  2. रह्म ऋण या ऋषि ऋण:- वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन आदि करके।
  3. पितृ ऋण:- पुत्र की उत्पत्ति करके।

नोटः- इन तीन ऋणों में मातृ ऋण सम्मिलित नही था।
पंचमहायज्ञ:- इसमें सम्मिलित थ।

  1. देव यज्ञ।
  2. ब्रम्ह यज्ञ या ऋषि यज्ञ ।
  3. पितृ यज्ञ।
  4. भूत यज्ञ (सभी प्राणियों के कल्याण के लिए)।
  5. नृत्य यज्ञ अथवा अतिथि यज्ञ या मनुष्य यज्ञ।

वानप्रस्थ आश्रम:- इस आश्रमों को सम्पादित करने वाले व्यक्ति का सम्पर्क समाज से बना रहता था। हलाँकि अब वह घर से निकलकर जंगल आदि में रहता था।
सन्यास:- इसमें व्यक्ति का समाज से सम्बन्ध समाप्त हो जाता था।
नोट:- इन आश्रमों का सम्बन्ध पुरुषार्थ समाप्त हो जाता था। जीवन के उद्देश्य को निर्धारित करते हैं इनकी संख्या चार है- धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष। इनमें प्रथम तीन को त्री वर्ग में सम्मिलित किया जाता है।
गोत्र प्रथा:- उत्तर वैदिक काल में ही गोत्र प्रथा की शुरुआत हुई प्रारम्भ में गोत्र का अर्थ ऐसे स्थान से था जहाँ एक ही कुल की गायें पाली जाती थी। परन्तु बाद में एक ही वंश से उत्पन्न पुरुषों के लिए यह शब्द प्रयुक्त होने लगा।
स्त्रियों की दशा:– ऋग्वैदिक काल की अपेक्षा उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की दशा में गिरावट आयी। जिसके उदाहरण निम्नलिखित हैं।

  1. स्त्रियों का सभा और विद्थ में भाग लेना बन्द हो गया।
  2. स्त्रियों का उपनयन संस्कार बन्द हो गया इससे उनकी शिक्षा में गिरावट् आयी। हलांकि इस समय कई विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है जैसे-याज्ञवल्क्य को दो पत्नियाँ मैत्रेयी और कत्यायनी थी। इसी तरह गार्गी अत्यन्त विदुषी महिला थी। अन्य स्त्रियों में सुभला वेदवती आदि के नाम भी मिलते हैं।
  3. विवाह की आयु गिरकर 14 वर्ष हो गई अर्थात अब उनका अल्प आयु में विवाह होने लगा।

नोट:- सम्पत्ति का अधिकार अब भी नही था पर्दा प्रथा एवं सती प्रथा प्रचलित न थीं। समाज में स्त्रियों की गिरती स्थिति का पता समकालीन वैदिक साहित्यों से चलता है जैसे- ऐतरेय ब्राहमण के अनुसार ’पुत्री ही समस्त दुःखों का स्रोत है’ मैत्रायणी संहिता-स्त्रियों को पासा एवं सुरा के समान समाज की बुराई के रूप में दर्शाया गया है।
वृहदारण्यक उपनिषद:- याज्ञवल्क्य एवं गार्गी के बीच का प्रसिद्ध संवाद है।
नोटः– इसका अर्थ यह नही है कि स्त्रियों की दशा बहुत गिर गयी थी। शतपथ ब्राहमण में उन्हें अर्धांगिनी कहा गया है।

आर्थिक दशा

कृषि:- उत्तर वैदिक काल में कृषि सबसे प्रमुख व्यवसाय था शत्पथ ब्राहमण में 6, 8, 12, एवं 24 बैलों तक जोते जाने वाले हलों का उल्लेख है। इसी पुस्तक में कृषि की पूरी प्रक्रिया का वर्णन मिलता है हल के लिए सीर एवं जुलाई के लिए कृषन्तः बुवाई के लिए वपन्तः मड़ाई के लिए मृणन्त एवं कटाई के लिए लुन्नतः शब्द मिलता है। एक हजार ईसा पूर्व में लौह के अविष्कार के कारण (एटा जिले के अंतरजी खेड़ा में) कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ा। लोहे के लिए श्याम् अयस अथवा कृष्ण अयस का उल्लेख मिलता है। इस समय उत्पन्न होने वाली कई फसलों के नाम मिलते हैं जैसे-चावल के लिए ब्रीहि अथवा तंडुल, गेहँू के लिए गोधूम, गन्ने के लिए ईक्षु, सरसों के लिए सारीशाक उड़द के लिए माष सावाँ के लिए श्यामाक सन के लिए शण अलसी के लिए उम्पा आदि शब्द मिलते हैं।
सिंचाई के साधनों में भी बढ़ोत्तरी हुई। ऋग्वेद में जहाँ केवल एक ही साधन अवट् (कुआँ) का उल्लेख है वहीं अथर्ववेद में पहली बार नहरों का उल्लेख मिलता है।
पशुपालन:- उत्तर वैदिक काल से हाथी, बाघ शेर आदि सभी पशुओं का उल्लेख मिलता है।
उद्योग-धन्धे:- उत्तर वैदिक कालीन ग्रन्थों में कई तरह के उद्योगों के प्रचलन का उल्लेख है इस समय के प्रमुख उद्योगों में।

  1. कुलाल या कुम्भकार:- यह विभिन्न प्रकार की मिट्टी के बर्तन बनाते थे। जैसे-P.G.W., N.B. W.
  2. टोकरी बनाने वाले:- इन्हें विदलकारी कहा जाता था।
  3. रंगरेज:- रंगों पर कार्य करने वाले।
  4. रजयित्री:- कपड़े रगने वाली।
  5. वर्णकार:- सोने पर कार्य करने वाले।
  6. चर्मकार

व्यापार:- उत्तर वैदिक काल में यद्यपि आर्यों को समुद्र की जानकारी थी परन्तु सिक्कों का प्रचलन अब भी नहीं हुआ था। आर्यों को पश्चिम और पूर्वी समुद्र (अरब सागर और हिन्द महासागर) की जानकारी थी। इस समय तक बन्दरगाह का उल्लेख नही मिलता है न ही किसी बाहरी देश के साथ व्यापार का ही उल्लेख मिलता है। निण्क, मन, रुक्म आदि शब्द ऋग्वैदिक की तरह ही और उसी अर्थ में प्रयुक्त किये जाते रहें।
उत्तर वैदिक काल में यद्यपि नगर शब्द का उल्लेख मिलता है परन्तु ये नगर प्रारम्भिक अवस्था के ही थे ज्यादा से ज्यादा इन्हें हम आद्य नगर ;च्तवजव ।तइंदद्ध की संज्ञा दे सकते हैं। इस समय के कुछ नगरों में हस्तिनापुर, कौशाम्बी, काशी आदि का उल्लेख मिलता है।
धार्मिक दशा:- उत्तर वैदिक काल में धार्मिक दशा में तीन महत्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टि गोचर होते हैं-

  1. देवी-देवताओं में परिवर्तन।
  2. उपासना की रीति में परिवर्तन।
  3. उपासना के उद्देश्य में परिवर्तन।

चैथा परिवर्तन उपनिषदीय प्रक्रिया के रूप में दिखाई पड़ता है।
1. देवी-देवताओं में परिवर्तन:- उत्तर वैदिक युग में ऋग्वैदिक देवताओं की महत्ता घट गई अब प्रजापति, विष्णु और शिव सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता हो गये पहले के एक देवता विश्वकर्मा का प्रजापति में विलय हो गया।
2. उपासना की रीति में परिवर्तन:- उत्तर वैदिक युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण धार्मिक परिवर्तन उपासना की रीति में ही दृष्टिगोचर होता है अब वैदिक मन्त्र स्तुति की जगह कर्मकाण्ड अधिक महत्वपूर्ण हो गये। प्रत्येक वेद के साथ अलग-अलग पुरोहित जुड़ गये उदाहरणार्थ-
वेद               पुरोहित
ऋग्वेद      –    होता (मन्त्रोच्चार करना)
सामवेद    –    उद्गाता (मन्त्र गायन)
यजुर्वेद     –    अध्वर्यु (कर्म-काण्ड)
अथर्ववेद  –    ब्रम्हा
इन सभी पुरोहितों पर नजर रखने का कार्य ब्रम्हा अथवा ऋत्विज करता था।
यज्ञ:- उत्तर-वैदिक काल में मुख्यतः तीन प्रकार के यज्ञ प्रचलित थे।

  1. गृह कर्माणि यज्ञ:- ये यज्ञ संस्कार विवाह आदि विभिन्न समयों में सम्पादित किये जाते थे।
  2. ऐसे यज्ञ जो उत्सवों त्यौहारों आदि अवसर पर सम्पादित किये जाते थे। इन यज्ञों में दशयज्ञ, सौत्रामणि यज्ञ, अग्निहोतृ यज्ञ आदि प्रमुख हैं।
  3. ऐसे यज्ञ जो सामूहिक किये जाते थे और कई दिनों तक चलते थे इन यज्ञों में अग्निष्टोम, राज सूय, अश्वमेघ, बाजपेय, पुरुषमेघ आदि या प्रमुख है।

दश यज्ञ:- यह यज्ञ आमावस्या के समय किया जाता था इस यज्ञ के प्रधान देवता अग्नि और इन्द्र थे।
सौत्रमणि यज्ञ:- इस यज्ञ में सुरा की आहुति दी जाती थी मूलतः यह इन्द्र के लिए किया हुआ यज्ञ था।
अग्निष्टोम:- इस यज्ञ में सोम का सर्वाधिक उपयोग होता था।
पुरुषमेद्य यज्ञ:- यह यज्ञ पाँच दिनों तक चलता था इसमें पुरुष की भी बलि दी जाती थी सर्वाधिक 25 यूपों का निर्माण इसी यज्ञ में किया जाता था।
उद्देश्य:- शतपथ ब्राहमण में पहली बार पुर्नजन्म के सिद्धान्त का उल्लेख मिलता है अब धार्मिक क्रिया-कलाप का उद्देश्य लौकिक के साथ-साथ पारलौकिक भी हो गया। उत्तर-वैदिक काल में ही मूर्ति पूजा के प्रारम्भ का संकेत मिलता है।
उत्तर वैदिक के अन्तिम चरणों में याज्ञिक कर्म काण्डों के विरूद्ध उपनिषदों में प्रतिक्रिया दिखाई पड़ती है उपनिषदों में ही आत्मा और ब्रम्ह के अद्वैतवाद के सिद्धान्त का निरुपण किया गया। मुण्डकोपनिषद में यज्ञों की टूटी हुई नवकाओं के समान बताया गया है जिसके द्वारा जीवन रुपी भवसागर को पार नही किया जा सकता।

महा काब्य युग,सूत्र काल,संस्कार,विवाह

महा काब्य युग (Ebie Age)

रामायण और महाभारत को आदि महाकाब्य अथवा आर्ष महाकाव्य माना जाता है इसमें महाभारत की शुरूआत पहले मानी जाती है लेकिन सर्वप्रथम रामायण पूरा हुआ। रामायण:- महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित भारत का आदि महाकाव्य है। प्रारम्भ में इसमें 6000 श्लोक थे बाद में उनकी संख्या बढ़कर 12000 और अन्ततः 24000 हो गई। इस पुस्तक का अन्तिम रूप से संकलन गुप्त काल में माना जाता है। बाद में इस पुस्तक का अनुवाद अनेक भाषाओं में भी हुआ। बंगाल के शासक नुसरत शाह के समय में कृत्तिवास ने इसका बंगला में अनुवाद किया। इसी तरह चोल शासक कुलोत्सुंग तृतीय के समय में कम्बन ने तमिल भाषा में अनुवाद किया। आधुनिक काल में पेरियार ने बींसवी शताब्दी में तमिल भाषा में सच्ची रामायण लिखी। पेरियार का पूरा नाम ई0वी0 रामास्वामी नायकर है।

’महाभारत’

लेखक-वेद व्यास महाभारत की प्रस्तावना में वेद व्यास ने लिखा है कि ’’ इस पुस्तक में जो कुछ भी है वह अन्य पुस्तकों में भी है परन्तु इस पुस्तक में जो कुछ नहीं है वह कहीं भी नही है।’’ महाभारत में कौरवों और पाण्डवों की कथा है महाभारत का संकलन धीमे-धीमे किया गया। प्रारम्भ में जब इसमें 8800 मंत्र थे तो इसे जय संहिता तथा जब इसमें 24000 मंत्र हुए तो इसे भारत और जब मंत्रों की संख्या 100000 हो गई तो इसे शत् सहस्त्री संहिता या महाभारतकहा गया। महाभारत में कुल 18 पर्व हैं इसमें भीष्म पर्व का भाग गीता है। गीता में भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है इसी पुस्तक में सर्वप्रथम अवतार के बाद का उल्लेख है। गीता कर्म, भक्ति प्रथा, ज्ञानकी त्रिवेणी है। महाभारत का सर्वप्रथम तमिल भाषा में अनुवाद पेरुनदेवनार ने किया जबकि बंग्ला भाषा में अुनवाद अलाउद्दीन हुसैन शाह के समय में किया। (यह अनुवाद कुष्ण चरितम् के द्वारा हुआ था)

सूत्र काल (600 ई0पू0-300 ई0पू0)

  सामाजिक दशा:- वैदिक युग की समाप्ति के बाद सूत्र काल आता है। 600 ई0पू0 से 300 ई0पू0 के बीच का काल सूत्र काल है। इसी समय वैदिक और वैदिकोत्तर साहित्यों का संकलन किया गया। सूत्रकाल में सामाजिक दशा में पहला परिवर्तन यह आया कि वर्ण जातियों में परिवर्तित हो गये अर्थात उनकी सामाजिक दशा अब जन्म से निर्धारित की जाने लगी। इस प्रकार इस काल में चार जातियों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की शुरूआत होती है। पाणिनी ने इस शूद्रों को दो वर्गों निरवसित एवं अनिरवसित में बाँटा है। पाँचवी शताब्दी ई0पू0 में ही एक अस्पृश्य वर्ग चाण्डाल का उल्लेख मिलने लगा है। इनकी उत्पत्ति प्रतिलोम विवाहों (ब्राह्मण कन्या शूद्र पिता) के फलस्वरूप मानी गई है। निरवसित वर्ग भी धीरे-धीरे सामाजिक व्यवस्था से बहिष्कृत होता गया और उसकी दशा गिरकर चाण्डाल की हो गई। इस प्रकार अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाहों के फलस्वरूप अनेक प्रकार की जातियों का उदय हुआ।

संस्कार: 

संस्कार का अर्थ है परिष्कार अथवा शुद्धिकरण इसके माध्यम से व्यक्ति को समाज के योग्य बनाया जाता था। संस्कारों का उल्लेख गृह सूत्रों में मिलता है। 16 संस्कार सबसे ज्यादा प्रचलित थे जो जन्म से पूर्व प्रारम्भ मृत्यु के बाद तक चलते थे।

संस्कारों की क्रमबद्ध श्रेणियां निम्नलिखित है- जन्म पूर्व संस्कार गपुंसी   1.गर्भाधन 2.पुंसवन- पुल प्राप्ति के लिए किया गया संस्कार। 3. सीमान्तोनयन -इसमें स्त्री के बालों को ऊपर उठाया जाता था तथा मन्त्रोचरण किया जाता था जिसमें गर्भ में बच्चे की आदि वैदिक शक्तियों से रक्षा की जा सके। जानानि   4. जाति कर्म-जन्म के समय सम्पादित किया गया संस्कार 5. नामकरण। 6. निष्कर्मण-प्रथम बार घर से निकालने पर अचूक   7. अन्न पसान 8. चूड़ाकर्म या मुंडन 9. कर्ण भेदन विउ   10. विद्यारम्भ 11. उपनयन- इस संस्कार के बाद ही बालक द्विज कहलाता था इस संस्कार के द्वारा बालक को यज्ञनोपवीत धारण कराया जाता था। उपनयन संस्कार मुख्यतः शिक्षा से सम्बन्धित था। वेकेश   12. वेदारम्भ 13. केशान्त 14. समावर्तन-यह संस्कार गुरू द्वारा सम्पादित होता था। गुरुकुल में शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् विद्यार्थी के घर लौटने से पहले यह संस्कार विद्यार्थी के घर लौटने से पहले यह संस्कार सम्पन्न होता था और विद्यार्थी स्नातक कहलाता था।

विवाह:

हिन्दू धर्म में विवाह को एक संस्कार माना जाता है। गृह सूत्र में आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन प्राप्त होता है ये निम्नलिखित हैं-

  1. ब्रह्म विवाह: यह आधुनिक विवाह का रुप था इसमें पिता वर को अपने घर बुलाकर कन्या सौंप देता था।
  2. दैव विवाह: इस विवाह में कन्या का पिता एक यज्ञ का आयोजन करता था और यज्ञ करने वाले पुरोहित से अपनी कन्या का विवाह कर देता था। धार्मिक दृष्टि से इसे महत्वपूर्ण माना जाता था।
  3. आर्ष विवाह: इस विवाह में वर पक्ष वधू पक्ष को एक जोड़ी गाय या बैल देता था।
  4. रजापत्य: यह ब्रह्म विवाह की ही तरह था इसमें पिता वर वधू को आदेश देता था कि धर्मानुकूल अपने जीवन को बितायें।
  5. असुर: यह विक्रय विवाह था इसमें पिता वर से कन्या का मूल्य लेकर उसे बेंच देता था।
  6. गान्धर्व विवाह: यह आधुनिक प्रेम विवाह था इसमें माता-पिता को जानकारी नही होती थी। स्वयंबर विवाह गान्धर्व का एक विशेष रूप था।
  7. राक्षस: इसे अपहरण विवाह भी कहा जाता था इसका क्षत्रियों में विशेष प्रचलन था। कृष्ण और पृथ्वीराज के विवाह इसके उदाहरण हैं।
  8. पिशाच: यह विवाह का सबसे निकृष्ट रूप था। इसमें बलात्कार आदि करके कन्या का विवाह कर लिया जाता था।

ऊपर के चार विवाह शास्त्र सम्मिलित थे जबकि असुर, गन्धर्व, राक्षस एव पैशाच को शास्त्रकारों ने मान्यता नहीं दी।

16 महाजनपदों का उदय

16 महाजनपदों का उदय

16 महाजनपदों का उदय (The Arising 16 Mahajanpada)

छठी शताब्दी ई0पू0 में उत्तर भारत में 16 महाजनपदों का उदय हुआ। ऋग्वेद के जन उत्तर-वैदिक काल में जनपदों में परिवर्तित हो गये थे, और यही जनपद बुद्ध काल में महाजन पदों में बदल गये। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय एवं जैन ग्रन्थ भगौती सूत्र में इन 16 महाजनपदोंका उल्लेख मिलता है। ये निम्नलिखित थे।

1- कम्बोज महाजनपद

कम्बोज- यह उत्तरा पथ में स्थित था| आधुनिक काल के राजौरी और हजारा  जिले में यह महाजनपद था, इसकी राजधानी हाटक अथवा राजपुर थी। कम्बोज अपने श्रेष्ठ घोड़ो के लिए विख्यात था। कंबोज प्राचीन भारत के १६ महाजनपदों में से एक था। इसका उल्लेख पाणिनी के अष्टाध्यायी में १५ शक्तिशाली जनपदों में से एक के रूप में भी मिलता है। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय, महावस्तु मे १६ महाजनपदों में भी कम्बोज का कई बार उल्लेख हुआ है – ये गांधारों के समीपवर्ती थे। इनमें कभी निकट संबंध भी रहा होगा, क्यों कि अनेक स्थानों पर गांधार और कांबोज का नाम साथ साथ आता है। इसका क्षेत्र आधुनुक उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मिलता है। राजपुर, द्वारका इनके प्रमुख नगर थे। इसका उल्लेख इरानी प्रचीन लेखों में भी मिलता है जिसमें इसे राजा कम्बीजेस के प्रदेश से जोड़ा जाता है।प्राचीन वैदिक साहित्य में कंबोज देश या यहाँ के निवासी कांबोजों के विषय में कई उल्लेख हैं जिनसे ज्ञात होता है कि कंबोज देश का विस्तार उत्तर में कश्मीर से हिंदूकुश तक था।

2- गान्धार महाजनपद

गान्धार-यह आधुनिक पेशावर तथा रावलपिण्डी के इलाके में स्थित था| इसकी राजधानी तक्षशिला थी यह विद्या एवं व्यापार का प्रसिद्ध केन्द्र था। रामायण से पता चलता है कि इस नगर की स्थापना भरत के पुल तक्ष ने की थी। तक्षशिला में ही प्राचीन विश्व विद्यालय था जहाँ का आचार्य चाणक्य था। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में यहाँ पुष्कर सारिन का राज्य था। इसमें अवन्ति के शासक चण्ड प्रद्योत को पराजित किया था। पौराणिक 16 महाजनपदों में से एक। पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफ़ग़ानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र। इसे आधुनिक कंदहार से जोड़ने की ग़लती कई बार लोग कर देते हैं जो कि वास्तव में इस क्षेत्र से कुछ दक्षिण में स्थित था। इस प्रदेश का मुख्य केन्द्र आधुनिक पेशावर और आसपास के इलाके थे। इस महाजनपद के प्रमुख नगर थे – पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) तथा तक्षशिला इसकी राजधानी थी । इसका अस्तित्व 600 ईसा पूर्व से 11वीं सदी तक रहा। कुषाण शासकों के दौरान यहाँ बौद्ध धर्म बहुत फला फूला पर बाद में मुस्लिम आक्रमण के कारण इसका पतन हो गया।

3- अश्मक महाजनपद

अश्मक इसकी राजधानी पोतना अथवा पोटिल थी। यह नगर आन्ध्र प्रदेश में गोदावरी नदी के तट पर स्थित था केवल यही महाजनपद दक्षिण भारत में था।

4- मगध महाजनपद 

मगध इस राज्य में आधुनिक पटना  गया तथा शाहबाद का कुछ हिस्सा पड़ता था। इसकी राजधानी राजगृह गिरिब्रज थी। भगवान बुद्ध के पूर्व बृहद्रथ तथा जरासंध यहाँ के प्रतिष्ठित राजा थे। अभी इस नाम से बिहार में एक प्रंमडल है – मगध प्रमंडल। (२) सुमसुमार पर्वत के भाग, (३) केसपुत्र के कालाम, (४) रामग्राम के कोलिय, (५) कुशीमारा के मल्ल, (६) पावा के मल्ल, (७) पिप्पलिवन के मौर्य, (८) आयकल्प के बुलि, (९) वैशाली के लिच्छवि, (१०) मिथिला के विदेह

5- अंग महाजनपद

अंग इसकी राजधानी चम्पा थी। इस महाजनपद में भागलपुर तथा मुंगेर के कुछ जिले आते थे। इस नगर का वस्तुकार महागोविन्द था। प्राचीन काल में चम्पा अपने वाणिज्य और व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। इस समय यहाँ का शासक ब्रह्मदत्त था। उसने मगध के शासक भट्टीय को पराजित कर इसके कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया परन्तु बाद में विम्बिसार ने अंग को मगध राज्य में मिला लिया।

6- वज्जि महाजनपद

वज्जि: यह आठ राज्यों का एक संघ था,  इसमें तीन कुल विदेह, वज्जि तथा लिच्छवी प्रमुख थे। लिच्चिछवियों की राजधानी वैशाली थी। वैशाली की आधुनिक पहचार बसाढ़ नामक नगर से की जाती है।

7- काशी महाजनपद

काशी वज्जि के पश्चिम में काशी जनपद स्थित था, इसकी राजधानी वाराणसी थी। इस समय यहाँ का राजा ब्रह्मदत्त था। कोशल के राजा कंस ने काशी को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।

8- कोशल महाजनपद

कोशल राजधानी श्रावस्ती थी श्रावस्ती की पहचान आधुनिक सहेत-महेत नामक ग्राम से की जाती है। कोशल के दो भाग थे उत्तरी एवं दक्षिणी कोशल, उत्तरी कोशल की राजधानी श्रावस्ती जबकि दक्षिणी कोशल की राजधानी कुशावती थी। बुद्ध काल में यहाँ का राजा प्रसेनजित था। यह बुद्ध की आयु का था। कोशल राज्य में कपिलवस्तु गणराज्य भी सम्मिलित था इसकी पहचान आधुनिक सिद्धार्थ नगर जिले के पिपरहवा नामक स्थान से की जाती है।

9- मल्ल महाजनपद

मल्ल इस महाजनपद के दो भाग थे एक की राजधानी कुशीनगर जबकि दूसरे की पावा थी यह महाजनपद आधुनिक देवरिया में पड़ता था। कुशीनगर में बुद्ध को। एवं पावा में महावीर को महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ था।

10- वत्स महाजनपद

वत्स  यह महाजनपद आधुनिक इलाहाबाद का क्षेत्र था इसकी राजधानी कौशाम्बी थी विष्णु पुराण से पता चलता है कि हस्तिनापुर कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया। यहाँ कास प्रसिद्ध राजा उदयन था। उदयन को प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु पिन्डोला भरद्वाज ने बौद्ध मत में दीक्षित किया। कौशाम्बी प्रसिद्ध व्यापारिक नगर था।

11- पांचाल महाजनपद

पांचाल यह महाजनपद आधुनिक रुहेलखण्ड में स्थित था इसके दो भाग थे उत्तरी पांचाल और दक्षिणी पांचाल उत्तरी पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र (वर्तमान रामनगर) और दक्षिण पांचाल की राजधानी काम्पिल्य (फरुर्खाबाद का कम्पिल्य) थी। कान्यकुब्ज का प्रसिद्ध नगर इसी महाजनपद में पड़ता था। कान्यकुब्ज का ही नाम बाद में कन्नौज और महोदय नगर पड़ गया। द्रौपदी भी पांचाल की ही थी।

12- शूरसेन महाजनपद

शूरसेन  इसकी राजधानी मथुरा थी कृष्ण मथुरा के ही राजा थे।

13- कुरु महाजनपद

कुरु मेरठ दिल्ली एवं हरियाणा के आस-पास का क्षेत्र कुरु महाजनपद में था। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। महाभारत कालीन हस्तिनापुर का नगर भी इसी राज्य में स्थित था। बुद्ध काल में यहाँ का राजा कोरब्य था।

14-मत्स्य महाजनपद

मत्स्य राजधानी विराट अथवा विराट्नगर थी। यह महाजनपद वर्तमान राजस्थान के जयपुर के आस-पास स्थित था वर्तमान अलवर और भरतपुर के जिले भी इसमें सम्मिलित थे।

15- चेदि महाजनपद

चेदि वर्तमान बुन्देल खण्ड का इलाका ही प्राचीन काल में चेदि महाजनपद था। इसकी राजधानी सोत्थीवती थी। जिसकी पहचान महाभारत के शक्तिमती से की जाती है। महाभारत काल में यहाँ का शासक शिशुपाल था जिसका वध कृष्ण ने किया था।

16- अवन्ति महाजनपद

अवन्ति पश्चिमी भारत में अवन्ति जनपद प्रमुख था| इसके दो भाग थे। उत्तरी अवन्ति की राजधानी उज्जैन थी और दक्षिणी अवन्ति की राजधानी महिष्मती थी। बुद्ध कालीन अवन्ति का राजा चण्डप्रद्योत था। जिसका पीलिया नामक बीमारी का इलाज बिम्बिसार के वैद्य जीवक ने किया था। बौद्ध पुरोेेेहित महाकत्यायन के प्रभाव से चण्डप्रद्योत बौद्ध बन गया था।

इन सोलह महाजनपदों में चार-मगध, वत्स, कोशल, एवं अवन्ति सर्वाधिक प्रसिद्धि थी। इनके बीच प्रतिद्वन्दिता में अन्ततः मगध को विजय मिली और वहाँ पर एक नये वंश हर्यक वंश की नींव पड़ी।

मगध राज्य का उत्कर्ष,हर्यक वंश,शिशुनाग वंश,नन्द वंश

सोलह महाजनपदों में मुख्य प्रतिद्वन्दिता मगध और अवन्ति के बीच में थी इनमें भी अन्तिम विजय मगध को मिली। क्योंकि उसके पास अनेक योग्य शासक (बिम्बिसार, अजातशत्रु आदि) थे। लोहे की खान भी मगध में थी हलाँकि अवन्ति के पास भी लोहे के भण्डार थे। मगध की प्रारम्भिक राजधानी राजगिरि या गिरिब्रज पाँच तरफ पहाडि़यों से घिरी थी बाद की राजधानी पाटिलपुत्र, गंगा, सोन एवं सरयू के तट पर स्थित थी इन सब कारणो से अन्ततः विजय मगध को मिली।

हर्यक वंश (पितृहन्ता वंश):

  • संस्थापक-बिम्बिसार
  • राजधानी-   प्रारम्भिक-राजगिरि या गिरिब्रिज
  • बाद में राजधानी- पाटिलपुत्र

विम्बिसार: (544 ई0पू0 से 492 ई0पू0):

विम्बिसार का अन्य नाम श्रेणिय अथवा श्रेणिक था। बिम्बिसार ने अपने राज्य की नींव विभिन्न वैवाहिक सम्बन्धों के फलस्वरूप रखी और विस्तृत की उसने कुल तीन राजवंशो में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये।

  1. मद्र देश की राजकुमारी क्षेमा से विवाह किया।
  2. लिच्छवि राज्य में चेटक की पुत्री चेलना से विवाह किया।
  3. कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला से विवाह किया। इसके फलस्वरूप उसे दहेज में काशी का प्रान्त मिल गया।

बिम्बिसार ने अंग राज्य के शासक ब्रह्मदत्त को पराजित कर उसे अपने राज्य में मिला लिया इस प्रकार विजयों और वैवाहिक सम्बन्धों के द्वारा उसने अपने राज्य का विस्तार किया। विम्बिसार ने अवन्ति के शासक चण्डप्रद्योत से मित्रता कर ली उसने अपने राज्य वैद्य जीवक को उसके इलाज के लिए भेजा था। बिम्बिसार बौद्ध एवं जैन दोनों धर्मों को मानने वाला था बुद्ध स्वयं इसके दरबार में आये थे विम्बिसार की हत्या उसके पुत्र अजातशत्रु ने कर दी।

अजात शत्रु या कुणिक (492-460 ई0पू0)

अजातशत्रु का कोशल नरेश प्रसेनजित से युद्ध हुआ प्रसेनजित की पराजय हुई परन्तु बाद में दोनों में समझौता हो गया। प्रसेनजित ने अपनी पुत्री वाजिरा का विवाह अजातशत्रु के साथ कर दिया।
अजातशत्रु का लिच्छिवियों से भी युद्ध हुआ अपने कूटनीतिज्ञ मंत्री वत्सकार की सहायता से उसने लिच्छिवियों पर विजय प्राप्त की इस तरह काशी और वैशाली दोनों मगध राज्य के अंग बन गये। अजातशत्रु के समय में ही प्रथम बौद्ध संगीत का आयोजन किया गया। अजातशत्रु की हत्या उदयन या उदय भद्र ने कर दी थी।

उदय भद्र या उदयिन (460 ई0पू0 से 444 ई0पू0)

उदयिन ने गंगा और सोन नदियों के संगम पर पाटिलपुत्र या कुसुंग नगर की स्थापना की और बाद में अपनी राजधानी राजगृह से वहीं स्थानान्तरित कर ली।
उदयिन के बाद उसके तीन पुत्रों अनिरूद्ध, मुण्डक और दर्शक ने बारी-बारी से शासन किया। पुराणों में दर्शक का एक नाम नाग दशक भी मिलता है। इन्हें हटाकर शिशुनाग नामक व्यक्ति ने एक नये राज्य वंश शिशुनाग वंश की नींव डाली।

शिशुनाग वंश

  • संस्थापक: शिशुनाग
  1. शिशुनाग (412 ई0पू0 से 394 ई0पू0)– इसकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि अवन्ति राज्य को जीतकर अपने राज्य में सम्मिलित करना था। इसने अपनी राजधानी वैशाली स्थानान्तरित कर ली।
  2. कालाशोक या कांकवर्ण (394 ई0 366 ई0पू0)- कालाशोक के समय में ही द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशालीमें हुआ इसने अपनी राजधानी वैशाली से पाटिलपुत्र स्थानान्तरित कर ली। इस प्रकार पाटिलपुत्र मगध राजवंश की स्थाई राजधानी बन गई।

नन्द वंश

  • संस्थापक-महानन्दिन
महापद्मनन्द (4 th B.C.का यह मगध का सर्वश्रेष्ठ शासक था इसी ने सर्वप्रथम कलिंग की विजय की तथा वहाँ एक नहर खुदवायी गयी। इसका उल्लेख प्रथम शताब्दी ई0पू0 में खारवेल के हाँथी गुम्फा अभिलेख में मिलता है। वह कलिंग जिनसेन की जैन प्रतिमा भी उठा लाया। इससे पता चलता है कि महापदम्नन्द जैन धर्म का अनुयायी था पुराणों में इसे एकराट् और एकछत्र शासक कहा गया है। प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य पाणिनी और काव्यायन इसके काल के थे।

घनानन्द: घनानन्द ने जनता पर बहुत से कर आरोपित किये थे इससे जनता असंतुष्ट थी इसी के शासन काल में उत्तर- पश्चिमी भारत पर सिकन्दर का आक्रमण हुआ लेकिन वह ब्यास नदी तट तक ही आया तथा उसके बाद वह वापस लौट गया घनानन्द के दरबार में तक्षशिला का आचार्य विष्णुगुप्त आया था, राजा ने उसको अपमानित कर दिया फलस्वरूप चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता से उसने घनानन्द को गद्दी से हटाकर एक नवीन राजवंश मौर्य वंश की स्थापना की।
विदेशी आक्रमण:- भारत पर प्रारम्भ में ईरानी या फारसी हरवामनी ने आक्रमण किया इसके उपरान्त सिकन्दर का आक्रमण हुआ।

ईरानी अथवा फारसी आक्रमण:-

फारस वालों को हरवामनी भी कहा जाता है सबसे पहले क्षयार्ष नामक शासक ने आक्रमण किया परन्तु इसे कोई विशेष सफलता नहीं मिली इसी के बाद डेरियस प्रथम या दारा ने भारत पर आक्रमण किया।

डेरियस प्रथम या दारा प्रथम:-

इसने भारत पर 516 ई0पू0 में आक्रमण कर पश्चिमोत्तर भाग को जीत लिया तथा उसे अपने 20वें प्रान्त (क्षत्रप) के रूप में शामिल किया। इतिहास के पिता माने जाने वाले हेरोडोट्स ने लिखा है कि दारा प्रथम को इस प्रान्त से 360 टेलेन्ट स्वर्ण धूलि की आया होती थी। ईरानी सम्पर्क के फलस्वरूप भारत के पश्चिमोत्तर भागों में एक नयी लिपि खरोष्ठी का प्रचलन हुआ। यह लिपि ईरानी आइमेइक लिपि से उत्पन्न हुई थी। कुछ नये शब्द भी प्रचलित हुए जैसे राजाज्ञा के लिए दिपि शब्द मिलता है।

सिकन्दर का आक्रमण:-

सिकन्दर यूनान के मकदूनियाँ क्षेत्र का रहने वाला था विश्व विजय की आकांक्षा से उसने भारत पर आक्रमण करने का निश्चय किया तक्षशिला के शासक आम्भी ने उसे भारत पर आक्रमण का निमंत्रण भी भेजा था। उत्तर-पश्चिम भारत की राजनैतिक स्थिति सिकन्दर के अनुकूल थी यहाँ छोटे-छोटे राजतंन्त्र एवं गणतंत्र स्थित थे जिनमें आपस में संघर्ष हो रहा था। सिकन्दर का सबसे जबरदस्त विरोध पुरु के राजा पोरस ने किया दोनों के बीच वितस्ता या झेलम का प्रसिद्ध युद्ध हुआ इस युद्ध में पुरु की पराजय हुई परन्तु उसके बातचीत से सिकन्दर बेहद प्रभावित हुआ और पुरु का राज्य उसे वापस कर दिया।
आक्रमण का प्रभाव:- सिकन्दर भारत में कुल 19 महीने रहा। उसकी सेनाओं ने व्यास नदी के आगे बढ़ने से मना कर दिया। इतिहासकारों में इस आक्रमण के प्रभावों को लेकर मतभेद है। प्रसिद्ध इतिहासकार विसेन्ट स्मिथ ने लिखा है कि ’’सिकन्दर आँधी की तरह आया और वापस चला गया परन्तु भारत अपवर्तित रहा’’ परन्तु सिकन्दर के भारत पर आक्रमण का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य पड़ा।

  1. सिकन्दर के आक्रमण के फलस्वरूप चार नये व्यापारिक मार्गों की खोज हुई क्योंकि सिकन्दर सिन्धु के रास्ते से वापस हुआ था जबकि उसका सेनापति निर्याकस दूसरे रास्ते से सिकन्दर की मृत्यु बेबीलोन में हुई।
  2. भारत में यूनानी मुद्राओं के अनुकरण पर उलूक शैली के सिक्के ढाले गये।
  3. उसने कई नये नगरों का निर्माण भी किया जिसमें-निर्केया, वूकेफाल तथा सिकन्दरिया प्रमुख थे।
  4. सिकन्दर ने उत्तर पश्चिम से एक लाख साॅडो को अपने गृह नगर मकदूनियाँ भेजा था।
  5. सिकन्दर द्वारा उत्तर पश्चिम के छोटे-छोटे राज्यों की सत्ता समाप्त करने से चन्द्रगुप्त को प्रेरणा मिली आगे चलकर उसने भारत में एक विस्तृत साम्राज्य मौर्य वंश की नींव डाली।
  6. सिकन्दर के समय में कुछ इतिहासकारों ने उत्तरी पश्चिमी भारत में सती प्रथा का उल्लेख किया है।

मौर्य साम्राज्य-चन्द्रगुप्त मौर्य -बिंदुसार

संस्थापक-चन्द्रगुप्त मौर्य

कौटिल्य को भारत का मैकियावली भी कहते हैं। मैकियावली की पुस्तक का नाम The Prince है। यह इटली का था। चन्द्रगुप्त मौर्य का नाम यूनानी लेखकों ने सेन्ड्रोकोट्स के रूप में वर्णित किया है। सेन्ड्रोकोट्स की पहचान चन्द्रगुप्त से करने वाला व्यक्ति विलियम जोन्स था। इस मौर्य साम्राज्य को जानने के स्रोत प्रमुख निम्नलिखित है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र:- कौटिल्य का मूल नाम विष्णु गुप्त था। इसकी उपाधि चाणक्य थी। ’अर्थशास्त्र’ चाणक्य द्वारा राजनीति पर लिखी गयी पहली प्रमाणिक पुस्तक है। अर्थशास्त्र में कुल 15 अधिकरण (15 भाग), 180 प्रकरण (180 उपभाग) एवं 6000 श्लोक हैं। डा0 शाम शास्त्री ने सर्वप्रथम 1909 में इसे प्रकाशित करवाया। अर्थशास्त्र राजनीति पर लिखी गयी सामान्य पुस्तक है। इससे न तो किसी शासक का वर्णन है और न ही पाटिलपुत्र या किसी राज्य का वर्णन है। यह Third person के रूप में लिखी गयी है। इस पुस्तक के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित है-

सप्तांग सिद्धान्त:-

कौटिल्य ने राज्य को सात अंगो से निर्मित माना है इसे ही राज्य का सप्तांग सिद्धान्त कहते हैं। ये अंग थे-

  1. स्वामी:- अर्थात राजा।
  2. अमात्य:- यह योग्य अधिकारियों का एक वर्ग था इन्हीं अधिकारियों में से विभिन्न विभागों के अध्यक्षों मंत्रियों आदि की नियुक्ति होती थी। अर्थशास्त्र में लिखा है कि ’’राज्य रूपी रथ का पहिया बिना योग्य अमात्यों के नही चल सकता’’
  3. जनपद:- राज्य क्षेत्र
  4. दुर्ग:- किले
  5. कोष:- धन
  6. दण्ड – सेना
  7. मिल

इन सप्तांग सिद्धान्तों में शत्रु सम्मिलित नही थे।

सामाजिक वर्णन:-

अर्थ शास्त्र में पहली बार शूद्र को भी आर्य कहा गया है और उन्हें भी ब्राह्मण क्षत्रिय एवं वैश्य के साथ सेना में भर्ती होने की छूट प्रदान की गयी। अर्थशास्त्र में दासप्रथा का भी वर्णन है इसमें 9 प्रकार के दासों का उल्लेख है। इनमें से Arhitak (आर्हितक या अहितक) नामक दास अस्थायी दास थे अर्थात इन्हें दासत्व से मुक्ति मिल जानी थी।

गुप्तचर व्यवस्था का वर्णन:-

अर्थशास्त्र पहली पुस्तक है जिसमें गुप्तचर प्रणाली पर विस्तृत उल्लेख मिलता है। गुप्तचरों को गूढ़ पुरुष कहा जाता था ये दो प्रकार के थे।  1. संस्था        2. संचार संस्था नामक गुप्तचर एक ही जगह पर रहते थे जबकि संचार भेष बदलकर इधर-उधर घूमते रहते थे। गुप्तचर विभाग का प्रमुख महा आत्यपर्सप था। भू-राजस्व:- अर्थ शास्त्र में भू-राजस्व की मात्रा के लिए भाग शब्द मिलता है। इस पुस्तक के अनुसार राज्य को भू-राजस्व का 1/6 भाग लेना चाहिए।

जहाजरानी का वर्णन:-

जहाजरानी का सर्वप्रथम उल्लेख अर्थशास्त्र में ही प्राप्त होता है। स्टेबो ने भी जहाजरानी का वर्णन किया है। कौटिल्य के अनुसार जहाजरानी पर राज्य का नियंत्रण होना चाहिए। मेगस्थनीज का इण्डिका:- मेगस्थनीज एक यूनानी राजदूत था जिसे सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा था। यह भारत में कुल पाँच वर्ष (304 ई0पू0 से 299 ई0पू0) तक रहा। इण्डिका एक पुस्तक के रूप में प्राप्त नहीं है बल्कि यह समकालीन यूनानी लेखकों जैसे एरियन, स्टेवो, प्लूटार्क जस्टिन आदि के वर्णनों में प्राप्त है। इण्डिका एक अन्य यूनानी लेखक एरियन की भी पुस्तक मानी जाती है। नोटः-कौटिल्य के वर्णन में न तो राजा का उल्लेख है न पाटलिपुत्र का न नगर प्रशासन का और न ही सैन्य प्रशासन का जबकि इन चारों का उल्लेख इण्डिका में मिलता है। मेगस्थनीज यूनानी था अतः भारत की व्यवस्था को पूर्ण रूप से समझ न सका इसी कारण उसने अपनी पुस्तक में निम्नलिखित भ्रामक विवरण दिये-

  1. भारतीय समाज में सात प्रकार की जातियां थी परन्तु हम जानते हैं कि भारतीय समाज चार जातियों में विभक्त था।
  2. मेगस्थनीज के अनुसार भारत में दास प्रथा विद्यमान नही थी यह भी गलत है कौटिल्य ने स्वयं नौ प्रकार के दासों का वर्णन किया है।
  3. मेगस्थनीज के अनुसार भारत में अकाल नही पड़ते थे यह कथन भी सत्य से परे हैं। चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में ही मगध में अकाल पड़ा था अशोक के अभिलेखों में भी अकाल का वर्णन है।
  4. मेगस्थनीज के अनुसार भारत में लेखन कला का अभाव था परन्तु हम जानते हैं कि यहाँ वेद एवं सूत्र साहित्यों की रचना हुई थी।

रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख:

यह संस्कृत भाषा का प्रथम अभिलेख है जो चपूशैली (गद्य एवं पद्य मिश्रित) में लिखित है इस अभिलेख में चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक दोनों के नामों का एक साथ उल्लेख है। इस अभिलेख के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य ने यहाँ सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था। चन्द्रगुप्त के समय में यहाँ का राज्य पाल पुष्यगुप्त वैश्य था। अशोक के समय में सुदर्शन झील के बाँध का पुनर्निमाण कराया गया उसके समय में यहाँ का राज्य पाल यवनराज कुषाण था। विशाखदत्त की मुद्रा राक्षस:- इस पुस्तक में चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए वृषल शब्द का उल्लेख किया गया है इस शब्द का अर्थ कुछ विद्वान निम्न वंश से जोड़ते हैं। चंद्रगुप्त मौर्य (321 ई0पू0):- मौर्य राजवंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की। चंद्रगुप्त ने नंदवंश के अंतिम राजा घनानंद को अपदस्थ कर राजधानी पाटलिपुत्र पर अधिकार जमाया और 321 ईसा पूर्व में मगध के राज सिंहासन पर बैैठा। चंद्रगुप्त के वंश और जाति के संबंध में विद्वान एकमत नहीं है। कुछ विद्वानों ने ब्राह्मण ग्रंथो, मुद्राराक्षस, विष्णुपुराण आदि के आधार पर चंद्रगुप्त को शूद्र माना है। ब्राह्मण परंपरा को विपरीत बौद्ध ग्रंथों का प्रमाण मौर्यों को क्षत्रिय जाति से संबंधित करता है। जैन ग्रथ भी मौर्यों की शूद्र-उत्पत्ति की ओर इशारा तक नहीं करते। सर्वाधिक मान्य मत भी यही है कि चंद्रगुप्त मौर्य क्षत्रिय थे। चंद्रगुप्त के शत्रुओं के विरूद्ध चाणक्य ने जो चालें चली उनकी विस्तृत कथा मुद्राराक्षस नामक नाटक में मिलती है, जिसकी रचना विशाखादत्त ने नौंवी सदी में की। रुद्रदामन के गिरनार अभिलेख से ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्त ने पश्चिम भारत में सुराष्ट्र तक का प्रदेश जीतकर अपने प्रत्यक्ष शासन के अधीन कर लिया था। इस प्रदेश में पुष्यगुप्त चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्यपाल था और उसने यहीं पर सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था। अशोक के अभिलेख तथा जैन एवं तमिल स्रोतों से ज्ञात होता है कि उत्तरी कर्नाटक तक का क्षेत्र चंद्रगुप्त ने विजित किया था (दक्षिण भारत)। इस प्रकार चंद्रगुप्त ने विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया, जिसमें पूरे बिहार तथा उड़ीसा और बंगाल के बड़े भागों के अतिरिक्त पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत तथा दक्कन के क्षेत्र भी सम्मिलित थे। फलतः मौर्यों का शासन केवल तमिलनाडु तथा पूर्वोत्तर भारत के कुछ भागों को छोड़कर सारे भारतीय उपमहादेश पर स्थापित हो गया। प्रमुख तथ्य: चंद्रगुप्त मौर्य

  • बैक्ट्रिया के शासक सेल्यूकस को चंद्रगुप्त ने पराजित कर उसकी पुत्री से विवाह किया तथा दहेज में हेरात, कंधार, मकरान तथा काबुल प्राप्त किया।
  • सेल्यूकस ने अपना राजदूत मेगस्थनीज को चंद्रगुप्त के दरबार में भेजा था। यूनानी लेखकों ने पाटलिपुत्र को पालिब्रोथा के नाम से संबोधित किया है।
  • ’चंद्रगुप्त’ नाम का प्राचीनतम उल्लेख रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में प्राप्त हुआ है।
  • जीवन के अंतिम दिनों में चंद्रगुप्त ने श्रवणबेलगोला में जैन विधि से उपवास पद्धति (संलेखना पद्धति) द्वारा प्राण त्याग दिये।
  • चंद्रगुप्त के समय में भूमि पर राज्य तथा कृषक दोनों का अधिकार था। (प्रबंधकर्ता-सीताध्यक्ष)
  • आय का प्रमुख स्रोत भूमिकर (भाग) था। संभवतः कर ;ज्ंगद्ध उपज का 1/6 होता था।
  • मुद्रा-पंचमार्क या आहत सिक्के।
  • इसी के काल में सर्वप्रथम कला के क्षेत्र में पाषाण का प्रयोग किया गया।
  • चंद्रगुप्त जैन धर्म का अनुयायी था।
  • चंद्रगुप्त का प्रधानमंत्री चाणक्य/कौटिल्य था।
  • इसके शासनकाल के अंत में मगध मे भीषण अकाल पड़ा था।

बिंदुसार:-

  • चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बिन्दुसार मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा।
  • बिंदुसार के काल में भी चाणक्य प्रधानमंत्री था।
  •  बिंदुसार आजीवक संप्रदाय का अनुयायी था।
  • स्टेबो के अनुसार यूनानी शासक एण्टियोकस ने बिंदुसार के दरबार में डाइमेकस नामक दूत भेजा था। बिंदुसार ने एण्टियोकस से मदिरा, सूखा अंजीर तथा एक दार्शनिक भेजने की मांग की थी, परंतु एण्टियोकस ने मदिरा तथा सूखे अंजीर तो भेजे लेकिन दार्शनिक नहीं भेजे।
  • प्लिनी के अनुसार मिस्र के राजा टालेमी द्वितीय फिलाडेल्फस ने डाइनोसियस को बिंदुसार के दरबार में भेजा था।
  • अमित्रघात अर्थात् ’शत्रुओं का वध करने वाला’ बिंदुसार की उपाधि थी। उसका अन्य नाम भद्रसार तथा सिंहसेन भी था।
  • दिव्यावदान के अनुसार उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला में विद्रोह को खत्म करने के लिए उसने अपने पुत्र अशोक को भेजा था। तारानाथ के अनुसार नेपाल के विद्रोह को भी अशोक ने समाप्त किया।
x