कृषि विज्ञान (Agriculture Sciences)

कृषि विज्ञान (Agriculture Sciences)

कृषि विज्ञान (Agriculture Sciences)

Agriculture Sciencesभूमि का जोतकर उस पर फसलों व अन्य पादपों को उगाने के मानवीय प्रयत्न को कृषि कार्य कहा जाता है। इसी प्रकार, भूमि पर फसल एवं इसक उत्पादन से संबंधित क्रमबद्ध जान को “कषि विज्ञान” कहा जाता है। कृषि विज्ञान की प्रमुख शाखाएं इस प्रकार हैं-

कृषि विज्ञान की शाखाएं

  • एग्रोनॉमिक्स (Agronomics) : भूमि व फसलों का प्रबंधन का अध्ययन इस शाखा के अंतर्गत किया जाता है।
  • एग्रोस्टोलॉजी (Agrostology) : घासों के अध्ययन का विज्ञान।
  • एपीकल्चर (Apiculture) : व्यापारिक स्तर पर शहद उत्पादन हेतु किया जाने वाला मधुमक्खी या मौन पालन कार्य।
  • आर्बोरीकल्चर (Arboriculture) : विशेष प्रकार के वृक्षों तथा झाड़ियों की कृषि जिसमें उनका संरक्षण और संवर्द्धन भी शामिल है।
  • वनस्पति विज्ञान (Botany) : पौधों के जीवन से संबंधित प्रत्येक विषय का अध्ययन।
  • उद्यान विज्ञान (Horticulture) : फल-फूल, सब्जियों, सजावटी पौधों आदि के उगाने एवं प्रबंधन का अध्ययन।
  • हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) : यह मृदा रहित कृषि के अध्ययन का विज्ञान है।
  • पेलियोबॉटनी (Palaeobotany) : पौधों के जीवाश्मों (Fossils) के अध्ययन का विज्ञान
  • फाइटोजेनी (Phytogeny) : पौधों की उत्पत्ति एवं उनके विकास के अध्ययन का विज्ञान।
  • पॉमोलॉजी (Pomology) : इसके अंतर्गत फलों के उत्पादन, श्राद्ध सुरक्षा एवं उनकी नस्ल सुधार का अध्ययन किया जाता है।
  • सेरीकल्चर (Sericulture) : व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली रेशम पालन की क्रिया जिसमें शहतूत आदि की कृषि भी सेरीकल्चर में सम्मिलित होती है।
  • फ्लोरीकल्चर (Floriculture) : व्यापारिक स्तर पर फूलों की कृषि ।
  • हार्सीकल्चर (Horsiculture): सवारी और यातायत के लिए उन्नत प्रजाति के घोड़ों और खच्चरों के व्यापारिक स्तर पर पालने की क्रिया।
  • मेरीकल्चर (Mericulture): व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु समुद्री जीवों के उत्पादन की क्रिया।
  • ओलेरीकल्चर (Olericulture) :जमीन पर फैलने वाली विभिन्न प्रकार की सब्जियों की कृषि।
  • पीसीकल्चर (Pisiculture): व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली मछली पालन की क्रिया।
  • सिल्वीकल्चर (Silviculture): वनों के संरक्षण एवं संवर्द्धन से संबंधित विज्ञान।
  • विटीकल्चर (Viticulture): व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली अंगूर उत्पादन (अंगूर की खेती) की क्रिया
  • वेजी कल्चर (Vege Culture) :दक्षिण पूर्व एशिया में आदि मानव द्वारा सर्वप्रथम की गई वृक्षों की आदिम कृषि।
  • ओलिविकल्चर (Olivieculture) : व्यापारिक स्तर पर जैतून की कृषि।
  • वर्मीकल्चर (Vermiculture): व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली केंचुआ पालन की क्रिया।

खेती करने की वैज्ञानिक विधियां

खेती करने की वैज्ञानिक विधियां

निगमित खेती (Corporate Farming) :

राष्ट्रीय किसान आयोग ने इस प्रकार की खेती की संस्तुति अपनी रिपोर्ट में की है। निगमित खेती में खेती की व्यवस्था निगम द्वारा की जाती है। भारतीय राज्य फार्स निगम लिमिटेड कुछ राज्यों में निगमित खेती का प्रबंधन करता है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि राज्यों के कुछ क्षेत्रों में इस प्रकार की खेती की जा रही है।

कार्बनिक खेती (Organic Farming) :

कार्बनिक खेती में रासायनिक उर्वरकों, वृद्धि नियंत्रकों, कीटनाशकों, कवकनाशकों एवं शाक नाशकों आदि का बिलकुल इस्तेमाल नहीं होता। राष्ट्रीय कार्बनिक खेती परियोजना की शुरुआत 10वीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत की गई। कार्बनिक खेती, सुसंगत कृषि (Precision Farming) भी कहलाती है। इसे पारिस्थितिकी कृषि के नाम से भी जाना जाता है।

दियारा खेती (Recession Farming) :

मानसून काल में बाढ़ से ग्रसित रहने वाले क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के बाद बाढ़ का पानी उतर जाने पर की जाने वाली फसलों की बुआई को दियारा कृषि कहते हैं।

शुष्क खेती (Dry Land Farming) :

20 इंच अथवा इससे कम की वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र में किसानों द्वारा युक्तिपूर्ण ढंग से की जाने वाली खेती को शष्क खेती कहते हैं। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 12% भाग शुष्क जलवायु के अंतर्गत आता है भारत में शुष्क क्षेत्र मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र,कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश में फर
अधिकतर ज्वार, बाजरा, या आंध्र प्रदेश में फैला है। शष्क खेती के अंतर्गत किसान पार, बाजरा, जौ, काकरागी जैसी फसलों की खेती करते समय कम पानी की आवश्यकता होती है।

जीरो टीलेज खेती (Zero Tillage Farming) :

जीरो टीलेज प्रणाली में फसल की जड को तथा अन्य अवशेष को खेत में छोड़ दिया जाता है तथा खेत की जुताई न करके जीरो टिलेज मशीन द्वारा अगले फसल की बुवाई की जाती है। धान के बाद गेहूं की, यह प्रणाली काफी लाभकारी है। इससे फसल के अवशेष रकम परिवर्तित हो जाते हैं तथा गेहूं की बुवाई कम खर्च में हो जाती है। इस प्रणाली का आविष्कार 1947 में कृषिवैज्ञानिक एडवर्ड फाकनर (अमेरिका) ने किया था।

बारानी कृषि :

बारानी कृषि से आशय वर्षाधीन कृषि से है। देश के कुल फसल क्षेत्र का लगभग 65 प्रतिशत क्षेत्र बारानी कृषि के अंतर्गत आता है। इन क्षेत्रों में ऐसी फसल पद्धति अपनाई जाती है जो पूरी तरह से बर्षा पर निर्भर करती है। इसके अंतर्गत मुख्यतः धान, ज्वार, बाजरा, दालें, तिलहन तथा कपास जैसी फसलें उगाई जाती हैं।

हरित गृह कृषि (Green House Agriculture) :

इस तकनीक के अंतर्गत नियंत्रित पर्यावरणीय परिस्थितियों के अंतर्गत कषि कार्य किया जाता है हरित गृह के लिए हरित गृह का निर्माण किया जाता है। आर्थिक दृष्टि से भारत के लिए यह महंगी प्रणाली है। विश्व में सर्वाधिक हरित गृह कृषि जापान में (42,000 हेक्टेयर) की जाती है। उसके बाद स्पेन (24,000 हेक्टेयर) और फिर अमेरिका में (4000 हेक्टेयर) की जाती है।

समोच्च खेती (Contour Farming) :

समोच्च खेती से तात्पर्य उस खेती से है, जो कि ढाल के विपरीत कण्टूर रेखा पर कर्षण क्रिया द्वारा की जाती है। समोच्च खेती प्रायः पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है। कृषि की इस विधि द्वारा जहां कम वर्षा वाले क्षेत्रों में नमी को सुरक्षित रखा जा सकता है, वहीं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मिट्टी के क्षरण को भी कम किया जा सकता है।

स्थानान्तरण शील कृषि (Shifting Cultivation):

यह कृषि की अति प्राचीन विधि है, जिसका अस्तित्व मानव सभ्यता के शुरुआती काल से जुड़ा हुआ है। जैसा कि नाम से ही विदित होता है, कृषि की इस विधि में पहले किसी वन-खण्ड को साफ किया जाता है। फिर वहां की झाड़ियों-वृक्षों आदि को जला दिया जाता है। इस प्रकार वह खण्ड एक छोटे आकार के खेत में बदल जाता है। साफ की गई भूमि पर तब तक खेती की जाती है, जब तक कि वहां की उर्वरा-शक्ति समाप्त नहीं हो जाती है। इस प्रकार की खेती के लिए उष्ण और उपोष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्र अनुकूल माने जाते हैं। भारत के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में इस प्रकार की कृषि का चलन अधिक है स्थानान्तरणशील कृषि को ‘झूमिंग कृषि’, ‘बुश फेलो कृषि’ एवं ‘काटना-जलाना कृषि’ नाम से भी जाना जाता है।

बीज एवं बीज प्रौद्योगिकी

बीज एवं बीज प्रौद्योगिकी

1960 के दशक में मैक्सिको से आयातित गेहूं के उन्नत बीज लार्मा रोजा (Larma Roja) का भारतीय वैज्ञानिकों ने देशी किस्म सोनेरा (Sonera) के साथ क्रास कराकर सोनेरा-64 नामक अधिक उत्पादन देने वाली किस्म का विकास किया। भारत में हरित क्रांति की शुरुआत में इस बीज का बड़ा योगदान था। धान की प्रजातियों में भी इसी विधि को अपनाया गया।

राष्ट्रीय बीज नीति :

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के प्रावधानों के अनुपालन के साथ-साथ देश में बीज उद्योग को एक संगठित स्वरूप देने हेतु केंद्रीय मंत्रिमण्डल द्वारा 18 जून, 2002 को नई राष्ट्रीय बीज नीति का अनुमोदन किया गया। इस नीति में बौद्धिक सम्पदा संरक्षण (Intellectual Property Protection) हेतु प्रावधान के अतिरिक्त Plants Variety and Farmers Rights Pro- tection Authority तथा राष्ट्रीय बीज बोर्ड के गठन का भी प्रावधान किया गया। इस बीज नीति में ट्रांसजेनिक बीजों, अनुवंशिक रूप से संवर्द्धित बीजों के उत्पादन में जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका को मान्यता देते हुए इसके परीक्षण तथा वाणिज्यिक उपयोग को जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी (GEAC) के अनुमोदन के अधीन किया गया है।

राष्ट्रीय बीज निगम (National Seed Corporation) :

राष्ट्रीय बीज निगम का गठन 1956 के कंपनी अधिनियम के अंतर्गत 1963 में किया गया। बीजों के स्तर में उन्नयन हेतु यह देश में किया गया प्रथम प्रयास था।

संकर बीज (Hybrid Seed) :

जब दो या दो से अधिक स्वपरागित फसलों के संकरण पद्धति द्वारा प्राप्त बीजों को फसल उत्पादन हेतु प्रयोग किया जाता है तब इसे संकर बीज कहते हैं। ऐसे बीजों को अगली फसल के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता है। इस कारण से ऐसे बीजों को हर साल बदलाना पड़ता है। संकर बीजों को बनाने का श्रेय शल नाम के वैज्ञानिक को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1909 में ऐसे बीज तैयार किए थे।

प्रजनक बीज (Breeders Seeds) :

प्रथम चरण में जो बीज तैयार किए जाते हैं उन्हें प्रजनक बीज कहते हैं।

आधार बीज (Foundation Seeds):

बीज उत्पाद शंखला का दूसरा चरण आधार बीज है प्रजनक बीजों को आधार बीजों में परिवर्तित करने के लिए वैज्ञानिक विधि से इनकी निगरानी की जाती है आधार बीजों का उत्पादन राष्ट्रीय बीज निगम राज्य फार्म निगम तथा राज्य बीज निगमों द्वारा विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों की सहायता से किया जाता है।

प्रमाणित बीज (Certified Seeds) :

तीसरे चरण में आधार बीजों से प्रमाणित बीजों का उत्पादन किया जाता है। कभी-कभी बिना आधार बीजों के ही उन्नत किस्म के बीजों का उत्पादन किया जाता है, इसे क्वालिटी बीज कहा जाता है।

जीन संवर्द्धित बीज (Genitically Modified Seeds) :

कृत्रिम उपायों द्वारा बीजों के प्राकृतिक गुणों में फेरबदल करके तैयार किए गए बीज को जीन संवर्धित बीज (GM Seeds) कहा जाता है।

पराजीनी बीज (Transgenic Seeds) :

कृत्रिम उपायों द्वारा बीज के जीन में किसी अन्य वनस्पति या जीव के जीन को मिलाकर विकसित किए गए बीज को पराजीनी बीज कहते हैं। ऐसे बीज पौधे की क्षमता का विकास करते हैं तथा उन्हें विशेष गुणों से युक्त बनाते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा बीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता, कीट प्रतिरोधी क्षमता में विकास के साथ-साथ उसके रंग, रूप, स्वाद तथा उसके जीवन अवधि में इच्छित परिवर्तन किया जा सकता है।

टर्मिनेटर एवं ट्रेटर बीज प्रौद्योगिकी

टर्मिनेटर प्रौद्योगिकी (Terminator Technology) : टर्मिनेटर प्रौद्योगिकी में जीनियागिरी के द्वारा बीज के कुछ गुणों या अवगुणों को निकाल दिया जाता है तथा उनके स्थान पर अन्य जीन या जीनों को समावेशित कर इच्छित परिणाम प्राप्त किए जाते हैं।

ट्रेटर प्रौद्योगिकी (Traitor Technology):

ट्रेटर प्रौद्योगिकी| टर्मिनेटर प्रौद्योगिकी के अगले चरण की प्रौद्योगिकी है जिसमें इच्छित जीन या जीनों को फसल में समावेशित किया जाता है।

उर्वरक (Fertilizer)

उर्वरक (Fertilizer)

उर्वरक (Fertilizer)

रासायनिक विधि से कारखानों में तैयार किए गए पादप पोषक तत्वों को उर्वरक कहा जाता है। मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए नाइट्रोजन फास्फोरस और पोटैशियम को प्राथमिक तत्व माना जाता है। इन्हीं तत्वों की पूर्ति के लिए कृत्रिम खाद (Artificial Manures) का निर्माण किया जाता है जिसे उर्वरक कहा जाता है।

भूमि सुधारक (Soil amendment) :

भूमि सुधारकों से तात्पर्य उन सभी पदार्थों से है, जो मिट्टी की दशा में सुधार लाकर उसे न सिर्फ संवर्धित करते हैं, बल्कि पैदावार की क्षमता को भी बढ़ाते हैं। जैसे- क्षारीय एवं लवणीय ऊसर भूमि में सुधार लाने के लिए ‘जिप्सम’ अथवा ‘पाईराइट’ का प्रयोग किया जाता है। उसी प्रकार अम्लीय भमि में सुधार लाने के लिए कैल्सिक चूना पत्थर (CaCo) या
बिना बुझा चूना (Cao) प्रयुक्त होता है।

द्रव उर्वरक :

कुछ उर्वरक द्रव रूप में मिलते हैं जिन्हें सिंचाई के समय जल में मिला दिया जाता है। कुछ द्रव उर्वरकों का विशेष यंत्रों द्वारा छिड़काव भी होता है। ‘अमोनिया एनाहाइड्रस नाइट्रोजन’ प्रायः द्रव के रूप में बाजार में मिलता है।

काइनाइट:

यह पोटैशियम क्लोराइड एवं मैग्नीशियम सल्फेट का मिश्रण है। इसमें 12 प्रतिशत तक पोटैशियम क्लोराइड होता है।

कैल्शियम अमोनिया नाइट्रेट :

कैल्शियम अमोनिया नाइट्रेट का मृदा पर क्षारीय प्रभाव होता है। इसमें नाइट्रोजन की मात्रा 25 प्रतिशत होती है।

बाइयूरेट (Biuret) :

बाइयूरेट यूरिया खाद में पाया जाने  वाला एक रसायन है जो अतिअल्प मात्रा में ही पौधों के लिए लाभकारी है। यूरिया में इसकी मात्रा 0.2 प्रतिशत तक होनी चाहिए किन्तु 0.8 प्रतिशत तक की मात्रा हानिकारक नहीं है।

अमोनिया क्लोराइड :

मृदा में सर्वाधिक अम्लीय प्रभाव छोड़ने वाला अमोनिया क्लोराइड की मात्रा 25 प्रतिशत तक होनी चाहिए।

एन. पी. के. अनुपात :

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कृषि में प्राथमिक उर्वरकों नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटैशियम (NPK) का उपयोग एक संतुलित अनुपात में किया जाना ही लाभकारी है। भारत के लिए यह अनुपात 4 : 2 : 1 है किन्तु समग्र रूप में यह अनुपात लगातार विवाद में रहा है।

जैव उर्वरक (Bio Fertilizers) :

जैव उर्वरकों का कृषि क्षेत्र में विशेष महत्त्व है, क्योंकि कृषि के विकास एवं पर्यावरण संरक्षण में इनकी विशेष उपयोगिता है। ये उर्वरक वातावरण में पाई जाने वाली नाइट्रोजन एवं भूमि में पाई जाने वाली फास्फोरस को पौधों तक पहुंचा कर कृषि को संवर्धित करते हैं। जैव उर्वरक वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण (N-Fixation) तथा मिट्टी में पाए जाने
वाले फास्फोरस को अधिक घुलनशील बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा ये उर्वरक हार्मोन्स और अम्लों का निर्माण कर पौधों को पोषण प्रदान करते हैं तथा मिट्टी की उत्पादकता में वृद्धि करते हैं। जैव-उर्वरकों के प्रयोग से 25 से 30 किग्रा. नाइट्रोजन की बचत प्रति हेक्टेयर की जा सकती है। जैव उर्वरकों के मुख्य स्रोत जीवाणु, कवक तथा सायनों बैक्टीरिया होते हैं। इन जीवाणुओं को कार्बनिक पदार्थों की भरपूर मात्रा में आवश्यकता होती है, ताकि ये नाइट्रोजन के स्थरीकरण का कार्य बखूबी कर सकें।

जैव उर्वरक

नील हरित शैवाल (Blue-Green Algae) : नील-हरित शैवाल को साइनोबैक्टीरिया भी कहा जाता है। ये निम्न श्रेणी के पादप होते हैं। ये एक कोशकीय तंतु के आकार के जीवाणु होते हैं। धान के लिए अत्यधिक लाभदायक यह शैवाल प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऊर्जा ग्रहण कर नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करता है।

हरी खाद (Green Manure) : हरी खाद के उपयोग से मृदा में अनेक लाभकारी तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है। हरी खाद के लिए लैंचा (Sesbania aculeata) तथा सनई की फसल सर्वाधिक उपयोगी है। धान के लिए कुशल किसान इसका उपयोग करते हैं। इससे 80 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर तक का लाभ मिलता है। ‘धान-गेहूं-चा’ फसल चक्र अपनाने से प्रति वर्ष मिट्टी में गंधक तथा सूक्ष्म तत्वों जस्ता, तांबा, लोहा की आपूर्ति स्वतः होती रहती है।

एजोला (Azolla): एजोला तीव्र गति से बढ़ने वाला घास वर्ग का पौधा है जो तालाबों में ठंडे पानी में होता है। इसमें सहजीवी के रूप में ‘एजोली’ एवं ‘एनाबीना’ शैवाल पाए जाते हैं। धान की फसल में इसे जैव उर्वरक के रूप में प्रयोग किया जाता है। एजोला एक फर्न है जिसमें एनाबीना एजोली नामक सहजीवी शैवाल होता है जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण के साथ-साथ मृदा के भौतिक गुणों में परिवर्तन लाता है। इसकी नाइट्रोजन स्थरीकरण की क्षमता ज्यादा होती है।

एजोटोबैक्टर (Azotobactor) : एजोटोबैक्टर नामक जीवाणुओं की उपस्थिति के कारण यह जैव उर्वरक ‘एजोटोबैक्टर’ कहा जाता है। ये विविधपोषी जीवाणु होते हैं

एजोस्पाइरिलम (Azospirillum) : एजोस्पाइरिलम के जीवाणु विविधपोषी होते हैं तथा वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को अमोनिया में परिवर्तित करते हैं।

राइजोबियम (Rhizobium) : राइजोबियम दलहनी फसलों की जड़ों में ग्रन्थियों के रूप में रहता है। यह वायुमंडल से नाइट्रोजन को प्राप्त कर एकत्र करता है तथा अपनी ग्रंथियों में उपस्थित नाइट्रोजिनेज एवं हाइड्रोजिनेज एंजाइम द्वारा नाइट्रोजन का अवकरण करता है।

माइकोराजा: माइकोराजा एक प्रकार की फफूंद है जो पौधों की जड़ों पर जालनुमा संरचना बनाती हुई मृदा में काफी अंदर तक प्रवेश कर जाती है।

फास्फोबैक्टरिन : फास्फोबैक्टरिन फास्फोरस को घुलनशील बनाता है। इससे पौधों के लिए अति लाभदायक तत्व फास्फोरस की प्राप्ति होती है।

फ्रेंकिया : दलहनी फसलों के अलावा अनेक ऐसे पेड़े-पौर हैं जिनकी जड़ों में गांठें बनती हैं। इन गांठों का निर्माण फ्रेंकिया नामक फफूंद द्वारा होता है।
सायनोबैक्टीरिया : सायनोबैक्टीरिया स्वपोषित सूक्ष्मजीव हैं। जो जलीय तथा स्थलीय वायुमण्डल में विस्तृत रूप से पाए जाते हैं। उपर्युक्त जीवाणुओं के अलावा बैरिकिया क्लासटिडियम तथा डर्कसिया आदि भू-मित्र जीवाणु मृदा में पाए जाते हैं जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करके पौधों को लाभ पहुंचाते हैं।
बायोगैस संयंत्र से प्राप्त जैव उर्वरक : गोबर गैस तथा बायो गैस संयंत्र में प्रयोग होने वाला गोबर तथा अन्य जैविक पदार्थ – उपयोग के बाद कृषि में उर्वरक के रूप में प्रयोग किया जाता है। अपशिष्ट के रूप में पाया जाने वाला यह पदार्थ सामान्य गोबर से कई गुना अधिक लाभकारी होता है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटैशियम की मात्रा क्रमशः 1.01 प्रतिशत होती है।

गोबर की खाद एवं कम्पोस्ट खाद :

कम्पोस्ट खाद गोबर की खाद, (FYM) कम्पोस्ट खाद का हमारे देश में सदियों से प्रयोग किया जाता रहा है। इसको तैयार करने की नई और अधिक प्रभावकारी विधि नारायण देव पंधारी पांडे द्वारा विकसित की गयी है। इसे नाडेप (NADEP) कहा जाता है। इस खाद के प्रयोग से मृदा की भौतिक स्थिति में तेजी से सुधार होता है तथा यह मिट्टी के कणों को बांध कर रखने में भी सहायक होता पौधों के अपशिष्ट : भारत में प्रति वर्ष विभिन्न फसलों के अवशेष यथा- भूसा, पुआल, जड़ें, डंठल इत्यादि का उत्पादन लगभग 32 करोड़ टन होता है। हार्वेस्टर से फसल की कटाई करने पर ये पदार्थ खेत में ही रह जाते हैं और अगली फसल के लिए खाद का काम करते हैं। इन पदार्थों में नाइट्रोजन 0.5 प्रतिशत, फास्फोरस तथा आक्सीजन 0.6 प्रतिशत तथा पोटैशियम 1.5 प्रतिशत पाया जाता है। धान-गेहूं फसल चक्र में धान की कटाई के बाद तथा गेहूं की बुवाई हेतु जीरो टिल मशीन (Zero Till Machine) का प्रयोग लोकप्रिय हो रहा है। इस प्रणाली में धान के लूंठ मिट्टी में ही दबे रह जाते हैं और गेहूं की बुवाई में व्यय भी कम आता है।

वर्मी कम्पोस्ट (Vermi Compost) :

वर्मी कम्पोस्टवर्मी कम्पोस्ट को Vermi Culture भी कहा जाता है। इस खाद को बनाने में गोबर, वनस्पतियां, फसल के अवशेष, पशु गृहों तथा कुक्कुट गृहों के खरपतवार इत्यादि को केचुओं के साथ मिलाकर सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाता है। केचुओं द्वारा इन पदार्थों को खाकर मल के रूप में उत्सर्जित किया जाता है जो उत्तम खाद होती है। वर्मी कम्पोस्ट में NPK की मात्रा क्रमशः 1.2 – 1.6 प्रतिशत, 1.8-2.0 प्रतिशत तथा 0.5-0.75 प्रतिशत होती है। कृषि के लिए यह सबसे उत्तम तथा पर्यावरण मित्र खाद है। उल्लेखनीय है कि केचुएं कृषि के लिए काफी लाभदायक होते हैं। इसीलिए इन्हें प्राकृतिक हलवाहा कहा जाता है। प्रसिद्ध विद्वान अरस्तू केचओं को ‘Intestine of the Earth’ कहते थे, जबकि चार्ल्स डार्विन इन्हें ‘Barometer of Soil Fertility कहते थे।

प्रमुख कीटनाशी

प्रमुख कीटनाशी

प्रमुख कीटनाशी :

निकोटीन (Nicotine), फेरोमोंस (Phero-mones), कोक्सीमिलिडम (Cocsimilidum), सायरफिड (Sairefid), टाइकोग्रेमा, इपीपाइरोपस आदि। इसके अतिरिक्त न्युक्लियर पॉली, ड्रलवाइरस तथा वियोचेटिना बीविल प्रभावी जैविक नियंत्रक है। प्रमुख कवक नाशक : बार्डोपेस्ट, फाइटोलान, ब्लिमिक्स मिकाप, क्यू-प्रोसान, मरकरी क्लोराइड, एग्रोसान जीएन एरिटान, इर्वेसान, हेक्सेसान, डाइथेन-78, कैण्टान आदि।

रोगरोधी एवं संगरोधी फसलें:

भारत में विषाणुओं से हो वाले रोगों की रोकथाम के लिए जैव प्रौद्योगिकी का तेजी से इस्तेमाल हो रहा है। विषाण जनित रोगों के प्रति पहली प्रतिरोधी फसल 1986 में तम्बाकू (Tobacco) की तैयार की गयी थी। इसमें (T.. bacco Mosaic Virus, (TNV) के आवरण प्रोटीन को नष्ट करने वाले जीन को प्रविष्ट कराया गया था। इसके अतिरिक्त देश में पपीते के रिंग स्पॉट वायरस (Ring Spot Virus) खीरे और टमाटर के मोजैक वायरस (Mosaic Virus), आलू के पतमोड़क तथा एक्स और वाई वायरस के विरुद्ध विषाण के ऊपरी आवरण को नष्ट करने वाले जीन का पिछले दिनों सफल परीक्षण किया गया है।

सूखारोधी फसलें :

सूखा से फसलों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा सूखारोधी फसलों का विकास किया गया है। जब किसी फसल में सूखारोधी या लवणतारोधी जीन डाल दिया जाता है तब ऐसी फसलें प्राकृतिक रूप से लाभकारी प्रोटीन पैदा करने लगती हैं। ये प्रोटीन हैं—एल. ई. प्रोटीन, आरएवी प्रोटीन, डिहाइड्रिन, एच. एस. प्रोटीन, ओस्मोटिन, एनोक्सिन आदि। अभी तक इन प्रोटीनों को पैदा करने वाले जीन धान, टमाटर, और आलू में डाले गए हैं।

सिंचाई की नवीनतम प्रौद्योगिकियां

सिंचाई की नवीनतम प्रौद्योगिकियां

ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) :

इसे Trickle Irigation भी कहा जाता है। इस प्रणाली में खेत में पाइप लाइन बिछा कर स्थान-स्थान पर नोजल लगाकर सीधे पौधे के जड़ में बूंद-बूंद करके जल पहुंचाया जाता है।

छिड़काव सिंचाई (Sprinkling Irrigation) :

सिंचाई की इस विधि में पाइपलाइन द्वारा पौधों पर फौव्वारे के रूप में पानी का छिड़काव किया जाता है। कपास, मूंगफली, तम्बाकू इत्यादि के लिए यह विधि उपयुक्त है।

रेन वाटर हारवेस्टिंग (Rain Water Harvesting) :

वर्षा के जल को जो अपवाह क्षेत्र में जाकर नष्ट हो जाते हैं, को एकत्रित करके सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी प्रकार ऐसे जल को बोरिंग द्वारा भूमि के अंदर जाने दिया जाता है ताकि भूमिगत जल का स्तर ऊपर की ओर बना रहे। इसे ही रेन वाटर हारवेस्टिंग कहा जाता है। यह तकनीक भू-क्षरण और बाढ़ नियंत्रण में भी सहायक होती है।

कृषि में जैव प्रौद्योगिकी

कृषि में जैव प्रौद्योगिकी

कृषि में जैव प्रौद्योगिकी, कृषि क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी का विशेष महत्त्व है। यह कृषि क्षेत्र का वह नवाचार है, जिसके द्वारा हमें ऊतक संवर्धन, भ्रूण संवर्धन एवं पौध प्रवर्धन जैसी विधियां तो प्राप्त हुई ही हैं, ऐसी प्रजातियां भी विकसित की गई हैं, जिनमें हानिकारी दोष कम, लाभकारी गुण ज्यादा हैं।

ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) :

ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) जैव प्रौद्योगिकी की वह विधा है, जिसके अंतर्गत पौधों एवं जंतुओं की कोशिकाओं, ऊतकों अथवा अंगों को पृथक कर उनका नियंत्रित ताप, दाब तथा अनुकूल परिस्थितियों में संवर्धन किया जाता है। इसके लिए कांच के विशेष पात्रों अथवा संवर्धन माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है। पौधों के लिए यह प्रक्रिया ‘पादप ऊतक संवर्धन’ कहलाती है, किंतु पौधों के अनेक अंगों में से सिर्फ ऊतक को वरीयता दिए जाने के कारण इसे ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) नाम दिया गया।

जीन संवर्धित फसलें (Genetically Modified Crops G.M.Crops) :

जीन संवर्धित फसलें (Genetically Modified Crops G.M.Crops), पादप अनुवंशकीय अभियांत्रिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी ने जीन संवर्धित फसलों को संभव बनाया है। इन्हें ‘ट्रांसजेनिक फसलें’ या ‘पराजीनी फसलें’ भी कहा जाता है। ये फसलें पराजीनी या आनुवंशिक रूप से परिवर्तित होती हैं। जैसा कि नाम से ही विदित होता है, जीन संवर्धित फसलों से तात्पर्य उन फसलों से है, जो जीन में संवर्धन कर उगाई जाती हैं। इसमें पराजीनी पादपों में इनके  नैसर्गिक जीनों के अलावा अन्य जीन बाहर से प्रविष्ट करा कर इन्हें विकसित किया जाता है। ये रोग-रोधी, कीट-रोधी एवं विषाणु रोधी तो होते ही हैं, अनेक प्रकार के कुप्रभावों के विरुद्ध इनमें प्रतिरोधी क्षमता भी होती है। आनुवंशिक गुणों में फेर-बदल कर जहां अधिक उत्पादकता वाली फसलों को संभव बनाया गया है, वहीं फसलों की पोषण क्षमता में भी वृद्धि संभव हुई है। जीन संवर्धित फसलों की तीन विशिष्टताएं हैं- संरक्षण, सुरक्षा एवं अधिक उत्पादकता।

भारत में बीटी कपास :

भारत में व्यावसायिक कृषि हेतु स्वीकृत जीन संवर्द्धित फसल बीटी कपास की खेती की अनुमति जीईएसी द्वारा 26 मार्च, 2002 को दी गयी थी। सूखारोधी फसलें : सूखा से फसलों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा सूखारोधी फसलों का विकास किया गया है। जब किसी फसल में सूखारोधी या लवणतारोधी जीन डाल दिया जाता है तब ऐसी फसलें प्राकृतिक रूप से लाभकारी प्रोटीन पैदा करने लगती है | 

अद्यतन कृषि के कुछ महत्वपूर्ण पहलू

अद्यतन कृषि के कुछ महत्वपूर्ण पहलू

राष्ट्रीय बागवानी मिशन : बागवानी उत्पादों में और वृद्धि के लिए केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय बागवानी मिशन नामक कार्यक्रम की मई, 2005 में शुरुआत की गयी है। इस मिशन के अंतर्गत वर्ष 2011-12 तक देश में बागवानी उत्पादन 300 मिलियन टन तथा बागवानी के अंतर्गत बुवाई क्षेत्र को 40 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

तिलहनों और ऑयल पाम पर राष्ट्रीय मिशन

आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा 3 अक्टूबर, 2013 को ‘तिलहनों और ऑयल पाम पर राष्ट्रीय मिशन’ (NMOOP-National Mission on Oilseeds and Oil Plam) के 12वीं योजनावधि के दौरान क्रियान्वयन को स्वीकृति प्रदान की गई है तथा इस उद्देश्य से 3,507 करोड़ रु. का वित्तीय आवंटन अनुमोदित किया गया है।

कृषि विस्तार एवं प्रौद्योगिकी पर राष्ट्रीय मिशन (NMAET)

5 फरवरी, 2014 को आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा NMAET को 12वीं योजनावधि के दौरान 13,073.08 करोड़ रु. (केंद्र का हिस्सा-11,390.68 करोड़ रु. तथा राज्यों का हिस्सा-1,682.40 करोड़ रु.) के आवंटन के साथ क्रियान्वित किए जाने को स्वीकृति प्रदान की गई।

समन्वित वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम .

  • वर्ष 2009-10 में शुरू किये गये ‘ समन्वित वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम’ (Integrated Watershed Management Programme) को कैबिनेट द्वारा गत दिनों सरकार का फ्लैगशिप कार्यक्रम घोषित किया गया।
  • 12 पंचवर्षीय योजना (2012-17) के तहत इस कार्यक्रम के लिए 29,296 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है।
  • इस कार्यक्रम के दायरे में देश के 60% उस वर्षा सिंचित क्षेत्र को लाया गया है, जहां भूमि अपक्षय प्रवण, कुपोषण, जल संकट, गरीबी और निम्न उत्पादकता जैसी समस्याएं अधिक हैं। कार्यक्रम में जहां केंद्रीय भागीदारी 90% होगी, वहीं राज्यों का योगदान 10% होगा।

औषधीय पौधे :

भारत में प्राचीनकाल से ही प्रयोग होने वाले औषधीय पौधों में से कुछ का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

नीम-

नीम को वनस्पति विज्ञान में अजेडिरक्टा इंडिका कहा जाता है। भारतीय उपमहाद्वीप में पाये जाने वाले इस वृक्ष का प्रत्येक अवयव औषधीय महत्व का होता है।

हल्दी-

घावों को शीघ्र भरने में सहायता देने वाली हल्दी में पीड़ाहारी गुण भी है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशियन द्वारा हल्दी पर किए गए शोध में कहा गया है कि इसकी एंटीआक्सीडेंट विशेषता कोषाणुओं और ऊतकों को क्षीण होने से बचाती है।

अश्वगंधा-

यह सोलेनेसी कुल का पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम विथानिया सोमनीफेरा है। अश्वगंधा में कई प्रकार के अल्केलायड पाये जाते हैं। अश्वगंधा की जड़, कौंच के बीज तथा सतावर की जड़ का पाउडर बना कर लेने से पुरुषोचित गुणों का विकास होता है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा ‘जेरीफोर्ट’ तथा ‘वन बी नामक औषधि का निर्माण किया गया है, जो ठंडे रणक्षेत्र में तैनात सैनिकों के लिए काफी लाभप्रद होता है।

सतावर-

एस्पेरागस रेसीमोसस नामक यह वनस्पति किशोरावस्था की समस्याओं की अचूक औषधि है। मासिक रक्तस्राव, दुर्बलता, दुर्गंध वृद्धि में यह लाभकारी प्रभाव छोड़ती है।

जेट्रोफा–

वानस्पतिक भाषा में जेट्रोफा को जेट्रोफा कर्कस तथा सामान्यतया रतनजोत कहते हैं। दक्षिण अमेरिका, म्यांमार, पाकिस्तान, श्रीलंका आदि देशों में पाया जाने वाला जेट्रोफा भारत में राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, झारखण्ड आदि राज्या में पाया जाता है। दाद, खाज, खुजली, गठिया, लकवा, सर्पदश, मसूड़ों के जख्म इत्यादि में जेटोफा के तेल का उपयोग किया जाता है

गिलोय-

रिनोस्फोरा कार्डिफोरिया नामक यह पौधा संपूर्ण भारत में पाया जाता है। गिलोय में बर्बेटिन एलकेलायड एवं गिलगेईन ग्लाइकोसाइड नामक रसायन पाया जाता है। गिलोय मिदोषनाशक, रक्तशोधक, अग्निदीपक होता है।

खस-खस-

खसखस का वानस्पतिक नाम वेरीवेरिया जिजेनिआयडीज है। यह भारत की मूल वनस्पति है जो प्रायः तालाबों के किनारे पाया जाता है। इसके तेल का उपयोग इत्र, शर्बत तथा साबुन बनाने में किया जाता है। मूत्र कृच्छ तथा कुष्ठ रोग में इसके रसायन का उपयोग किया जाता है।

मुलहटी-

मुलहटी एक महत्वपूर्ण एंटी आक्सीडेन्ट है। कसैले स्वाद वाले इस पादप की जड़ों तथा तनों का प्रयोग मुख्य रूप से खांसी तथा गले से संबंधित विकारों में किया जाता है। पंजाब में मुलहटी की संगठित रूप से खेती होती है। रक्तवमन, हृदयरोग, अपस्वार में मुलहटी का प्रयोग किया जाता है।

मरुस्थल रोधन एवं प्रमुख मिशन

मरुस्थल रोधन एवं प्रमुख मिशन

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार विश्व के प्रायः हर भाग में शुष्क भूमि का तेजी से विस्तार हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में विश्व की कुल भूमि का 40 प्रतिशत हिस्सा मरुभूमि है जिसके विस्तार पर यदि रोक न लगाई गई तो अगले 10 वर्षों में यह 56 प्रतिशत तक हो जायेगा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा रेगिस्तान के विस्तार को रोकने से संबंधित किए गए समझौते में भारत भी भागीदार देश है। इसके लिए बनाई गयी बीस वर्षीय सघन राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAP) तैयार की गयी है। इसके अतिरिक्त एशियाई देशों में मरुस्थल विकास कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा शुरू किया गया है। इसके लिए छह विषय आधारित नेटवर्को की पहचान की गयी है। भारत इस कार्यक्रम का मेजबान देश है। दिल्ली स्थिति केन्द्रीय बंजर भूमि अनुसंधान संस्थान (CAZRI) को इस कार्यक्रम का नेशनल टास्क मैनेजर चिह्नित किया गया है।

मरुस्थलीकरण को कम करने के प्रयास-

एकीकृत बंजरभूमि विकास कार्यक्रम (Integrated Watershed Development Programme):

एकीकृत बंजर भूमि विकास

कार्यक्रम (IWDP) वर्ष 1989-90 से चलाया जा रहा है। 1 अप्रैल, 1995 से यह कार्यक्रम जलसंभर आधार पर जलसंभर विकास के सामान्य दिशा-निर्देशों के तहत चलाया जा रहा है।

सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (Drought Prone Area Programme-DPAP)

सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (Drought Prone Area Programme-DPAP) , सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम की शुरुआत 1973 में की गयी थी।

मरुभूमि का विकास कार्यक्रम (Dryland Development Programme):

मरुभूमि विकास कार्यक्रम (DDP) वर्ष 1997-98 में राजस्थान, गुजरात और हरियाणा के उष्ण मरुभूमि इलाकों तथा जम्मू- कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के शीत मरुभूमि क्षेत्रों, दोनों ही में चाल किया गया था। कार्यक्रम का उद्देश्य पारिस्थितिकी संतुलन को प्राकृतिक संसाधनों, जैसे-जल, भूमि तथा वानस्पतिक क्षेत्र के दोहन, संरक्षण तथा विकास द्वारा सुरक्षित रखना तथा भू-उत्पादकता को बढ़ाना है।

स्मार्ट कृषि (Smart Farming)

स्मार्ट कृषि (Smart Farming)

स्मार्ट कृषि (Smart Farming) : कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए आजकल स्मार्ट कृषि (Smart Farming) शब्दावली का प्रयोग हो रहा है, जो कि परिशुद्ध कृषि (Precision Farming) का समानार्थी है। इसमें सम्मिलित हैं—वर्धित उत्पादकता (Enhanced Productivity), संवर्धित लोचकता (Improved Resilience) एवं कृषि संबंधी दुष्प्रभावों को कम करना। यही वे तरीके हैं, जिन्हें अमल में लाकर हम बढ़ती आबादी के साथ कृषि उत्पादों की बढ़ती हुई मांग को पूरा कर खाद्यान्न सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकत है। स्मार्ट कृषि में जिन सात ई का विशेष महत्त्व होता है, वे हैं-
  1. उच्चतर उत्पादकता के जरिए उत्पादन बढ़ाना (Enhancement)
  2. आर्थिक दृष्टि से कृषि की व्यवहार्यता (Economical)
  3. जीवाश्म ईंधन की ऊर्जा (Energy) का सीमित उपयोग
  4. सीमित प्राकृतिक संसाधनों का कुशल (Efficient) इस्तेमाल
  5. कृषि समुदाय में लाभों का समान वितरण (Equitable)
  6. उच्च आय स्तर हेतु रोजगारों का सृजन (Employment)
  7. पर्यावरण एवं पारिस्थितिकीय (Environmental)

स्मार्ट कृषि को उपरोक्त 7E पर केंद्रित रखकर हम जहां कृषि को लाभकारी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं, वहीं उत्पादकता को बढ़ाकर कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग को भी पूरा कर सकते हैं।

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